क्या आर्य विदेशी थे ?

आजकल एक दलित वर्ग विशेष (अम्बेडकरवादी ) अपने राजनेतिक स्वार्थ के लिए आर्यों के विदेशी होने की कल्पित मान्यता जो कि अंग्रेजी और विदेशी इसाई इतिहासकारों द्वारा दी गयी जिसका उद्देश्य भारत की अखंडता ओर एकता का नाश कर फुट डालो राज करो की नीति था उसी मान्यता को आंबेडकरवादी बढ़ावा दे रहे है | जबकि स्वयम अम्बेडकर जी ने “शुद्र कौन थे” नाम की अपनी पुस्तक में आर्यों के विदेशी होने का प्रबल खंडन किया है | आश्चर्य की बात है कि अम्बेद्कर्वादियो के आलावा तिलक महोदय जेसे अदलितवादी लेखक ने भी आर्यों को विदेशी वाली मान्यता को बढ़ावा दिया है | पहले इस मान्यता द्वारा द्रविड़ (दक्षिण भारतीय ) और उत्तर भारतीयों में फुट ढल वाई गयी जबकि जिसके अनुसार उत्तर भारतीयों को आर्य बताया और उन्हें विदेशी कह कर मुल्निवाशी दक्षिण भारतीयों का शत्रु बताया और हडप्पा और मोहनजोदड़ो को द्रविड सभ्यता बताया लेकिन फिर बाद में इन्होने द्रविड़ो को भी विदेशी बताया और भारत में मुल्निवाशी दलित और आदिवासियों को बताया .. जबकि न तो उन्होंने आर्यों को समझा और न ही दस्युओ को ,वास्तव में आर्य नाम की कोई नस्ल या जाति कभी थी ही नही आर्य शब्द एक विशेषण है जिसका अर्थ श्रेष्ट है | और कई लोगो ,महापुरुषों और भाषाओ में आर्य शब्द का प्रयोग किया गया है | आर्य शब्द की मीमासा से पहले मै कुछ अंश विदेशी इतिहास कारो और विद्वानों के उद्दृत करता हु जिससे उन लोगो के षड्यंत्र और कपट का पता आप लोगो को चलेगा … इस सन्धर्भ में मेकाले का प्रमाण देता हु मेकाले ने अपने पिता  को एक पत्र लिखा था जिसमे उसने उलेख किया है कि हिन्दुओ को अपने धर्म और धर्मग्रन्थो के खिलाफ भड़का कर कर अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार कर इसाईयत को बढ़ावा देना था ,देखे मेकाले का वह पत्र –

इसी तरह life and letter of maxmullar में भी maxmullar का एक पत्र मिलता है जिसको उसने १८६६ में अपनी पत्नि को लिखा था पत्र निम्न प्रकार है – ” *I hope I shall finish the work and I feel convinced though I shall not live to see it yet this addition of mine and the translation of the vedas will here after tell to great extent on the fate of india and on the growth of millions of souls in that country. it is the root of their religion and to show them what the root is I feel sure, is the way of uprooting all that has sprung from it during the last three thousand years.”
अर्थात मुझे आशा है कि मै यह कार्य सम्पूर्ण करूंगा और मुझे पूर्ण विश्वास है ,यद्यपि मै उसे देखने को जीवित न रहूँगा, तथापि मेरा यह संस्करण वेद का आध्न्त अनुवाद बहुत हद तक भारत के भाग्य पर और उस देश की लाखो आत्माओ के विकास पर प्रभाव डालेगा | वेद इनके धर्म का मूल है और मुझे विश्वास है कि इनको यह दिखना कि वह मूल क्या है -उस धर्म को नष्ट करने का एक मात्र उपाय है ,जो गत ३००० वर्षो से उससे (वेद ) उत्त्पन्न हुआ है |
इसी तरह एक और दितीय पत्र मेक्समुलर ने १६ दि. १८६८ को भारत के तत्कालीन मंत्री ड्यूक ऑफ़ आर्गायल को लिखा था –
” the ancient religion of india is doomed , if christianity does not step in , whose fault will it be ?
अर्थात भारत के प्राचीन धर्म का पतन हो गया है , यदि अब भी इसाई धर्म नही प्रचलित होता है तो इसमें किसका दोष है ?
इन सबसे विदेशियों का उद्देश हम समझ सकते है |
क्या आर्य इरान के निवासी थे –                                                                                                               
इस षड्यंत्र के तहत इन्होने आर्य को इरान का निवाशी बताया है और आज भी सीबीएसई आदि पुस्तको में यही पढ़ाया जाता है कि आर्य इरान से भारत आये जबकि ईरानियो के साहित्य में इसका विपरीत बात लिखी है वहा आर्यों को भारत का बताया है और आर्य भारत से ईरान आये ऐसा लिखा है जिसे हम सप्रमाण उद्द्रत करते है –
“चंद  हजार साल पेश अज  जमाना माजीरा  बुजुर्गी  अज  निजाद  आर्यों  अज  कोह  हाय  कस्मने  मास्त  कदम  निहादन्द  | ब  चू  आवो  माफ्त न्द  दरी  जा  मसकने  गुजीदन्द द  आरा  बनाम  खेश  ईरान  खिया द न्द |”( जुगराफिया  पंज  किताऊ  बनाम  तदरीस  दरसाल  पंजुम  इब्त दाई  सफा  ७५ ,कालम  १ सीन  अव्वल  व  चहारम  अज  तर्क  विजारत  मुआरिफ  व  शुरशुद 🙂
अर्थ – अर्थात कुछ हजार साल पहले आर्य लोग हिमालय पर्वत से उतर कर यहा आये और यहा का जलवायु अनुकूल पाकर ईरान में बस गये |
इस प्रमाण से आर्यों के ईरान से आने की कपोल कल्पना का पता चलता है और उसका खंडन भी हो जाता है |
क्या आर्य उतरी ध्रुव से आये थे ?                                                                                                             
इस मान्यता को बल दिया बाल गंगाधर तिलक ने उन्होंने आर्यों को उतरी ध्रुव का बताया लेकिन जब उमेश चंद विद्या रत्न ने उनसे इस बारे में पूछा तो उनका उत्तर काफी हास्य पद था | देखिये तिलक जी ने क्या बोला –“आमि  मुलवेद  अध्ययन  करि  नाई  | आमि  साहब  अनुवाद  पाठ  करिया  छे  “( मनेवर  आदि  जन्म भूमि  पृष्ठ  १२४ )
अर्थात – हमने  मुलवेद नही पढ़ा , हमने तो साहब (विदेशियों ) का किया अनुवाद पढ़ा है |
उतरी ध्रुव विषयक अपनी मान्यताओ के संधर्भ में तिलक महोदय ने लिखा है – It is clear that soma juice was extracted and purified at neight in the arctic ” 
अर्थ – ” उतरी ध्रुव में रात्रि के समय सोमरस निकला जाता था “| तिलक जी की इस मान्यता का उत्तर देते हुए नारायण भवानी पावगी ने अपने ग्रन्थ ” आर्यों वर्तालील आर्याची जन्मभूमिं ” में लिखा है –
” किन्तु  उतरी ध्रुव में सोम लता  होती ही नही ,वह तो हिमालय के एक भाग मुंजवान  पर्वत  पर  होती  है ” 
इससे स्पष्ट है कि आर्यों के उत्तरी ध्रुव के होने की लेखक की अपनी कल्पना थी | वास्तव में जब तक आर्यों को एक जाति और नस्ल की दृष्टि से देखेंगे तो इसी तरह की समस्या आती रहेंगी आर्यों से पहले हमे आर्य शब्द के बारे में जानना चाहिय |
आर्य शब्द की मीमासा –                                                                                                                              
आर्य शब्द का प्रयोग अनेक अर्थो में वेदों और वैदिक ग्रंथो में किया गया है , जिसे मुख्यत विशेषण ,विशेष्य के लिए प्रयोग किया गया है |
निरुक्त ६/२६ में यास्क ” आर्य: ईश्वरपुत्र:” लिख कर आर्य का अर्थ ईश्वर पुत्र किया है | ऋग्वेद ६/२२/१० में आर्य का प्रयोग बलवान के अर्थ में हुआ है |
ऋग्वेद ६/६०/६ में वृत्र को आर्य कहा है अम्बेद्कर्वदियो का मत है कि वृत्र अनार्य था जबकि ऋग्वेद में ” हतो वृत्राण्यार्य ” कहा है यहाँ आर्य शब्द बलवान के रूप में प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है बलवान वृत्र और वृत्र का अर्थ निघंटु में मेघ है अर्थात बलवान मेघ |

इसी तरह वेदों के एक मन्त्र में उपदेश करते हुए कहा है ” कृण्वन्तो विश्वार्यम ” अर्थात सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ यहाँ आर्य शब्द श्रेष्ट के अर्थ में लिया गया है यदि आर्य कोई जाति या नस्ल विशेष होती तो सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ ये उपदेश नही होता |

आर्य शब्द का विविध प्रयोग –                                                                                                                     
  1. ऋग्वेद १/१०३/३ ऋग. १/१३०/८ और १०/४९/३ में आर्य का प्रयोग श्रेष्ठ के अर्थ में हुआ है |
  2. ऋग्वेद ५/३४/६ ,१०/१३८/३ में ऐश्वर्यवान (इंद्र ) के रूप में प्रयुक्त हुआ है |
  3. ऋग्वेद ८/६३/५ में सोम के विशेषण में हुआ है |
  4. ऋग्वेद १०/४३/४ में ज्योति के विशेषण में हुआ है |
  5. ऋग्वेद १०/६५/११ में व्रत के विशेषण में हुआ है |
  6. ऋग्वेद ७/३३/७ में प्रजा के विशेषण में हुआ है |
  7. ऋग्वेद ३/३४/९ में वर्ण के विशेषण में हुआ है |

ऋग्वेद १०/३८/३ में ” दासा आर्यों ” शब्द आया है यहाँ दास का अर्थ शत्रु ,सेवक ,भक्त आदि ले और आर्य का महान ,श्रेष्ट और बलवान तो दासा आर्य इस पद का अर्थ होगा बलवान शत्रु ,महान भक्त .श्रेष्ठ सेवक आदि | यहाँ दास को आर्य कहा है |

अत: स्पष्ट है कि आर्य शब्द नस्ल या जातिवादी नही है बल्कि इसका अर्थ होता है महान ,श्रेष्ठ ,बलवान .ऐश्वर्यवान ,ईश्वरपुत्र , आदि जो की विश्व के किसी भी व्यक्ति ,जाति ,वंश के लिए प्रयुक्त हो सकता है |
अन्य महापुरुषों द्वारा ,सभ्यताओ ,भाषा में आर्य शब्द –                                                                          
” ईरान के राजा आर्य मेहर की उपाधि लगाते थे क्यूंकि वे अपने आप को सूर्यवंशी क्षत्रिय समझते थे |”
” अनातौलिया की हित्ती भाषा में आर्य शब्द पाया जाता है “
“न्याय दर्शन १-१० पर वात्सायन भाष्य में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है | “
” महाभारत में अनेक स्थलों के साथ साथ उद्योग पर्व में आर्य शब्द का उलेख है “
” रामायण बालकाण्ड में आर्य शब्द आया है –     • श्री राम के उत्तम गुणों का वर्णन करते हुए वाल्मीकि रामायण में नारद मुनि ने कहा है – आर्य: सर्वसमश्चायमं, सोमवत् प्रियदर्शन: | (रामायण बालकाण्ड १/१६) अर्थात् श्री राम आर्य – धर्मात्मा, सदाचारी, सबको समान दृष्टि से देखने वाले और चंद्र की तरह प्रिय दर्शन वाले थे “
” किष्किन्धा काण्ड १९/२७ में बालि की स्त्री पति के वध हो जाने पर उसे आर्य पुत्र कह कर रुधन करती है |”
” भविष्य पुराण में अह आर्य में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है इसी में मुहम्मद को मलेछ बताया है “
” मृच्छकटिका नाटक में ” देवार्य नंदन ” शब्द में आर्य का प्रयोग हुआ है “
आर्य से आरमीनियो शब्द बना है जिसका अर्थ है शूरवीर “
• श्री दुर्गा सप्तशती में श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् के अंतर्गत देवी के १०८ नामों में से एक नाम आर्या आता है | (गीता प्रेस गोरखपुर पृष्ठ ९
• छन्द शास्त्र में एक छन्द का नाम आर्या भी प्रसिद्ध है |
    भगवद्गीता में श्री कृष्ण ने जब देखा कि वीर अर्जुन अपने क्षात्र धर्म के आदर्श से च्युत होकर मोह में फँस रहा है तो उसे सम्बोधन करते हुए उन्होंने कहा – कुतस्त्वा कश्मलमिदं, विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम्, अकीर्ति करमर्जुन | (गीता २/३) अर्थात् हे अर्जुन, यह अनार्यो व दुर्जनों द्वारा सेवित, नरक में ले-जानेवाला, अपयश करने वाला पाप इस कठिन समय में तुझे कैसे प्राप्त हो गया ?
यहा श्री कृष्ण ने अर्जुन को आर्य बनाने के लिए अनार्यत्व के त्याग को कहा है |
सिखों के गुरुविलास में आर्य शब्द का उलेख – ” जो तुम सुख हमारे आर्य | दियो सीस धर्म के कार्य |

बौद्धों के विवेक विलास में आर्य शब्द -” बौधानाम सुगतो देवो विश्वम च क्षणभंगुरमार्य  सत्वाख्या यावरुव  चतुष्यमिद क्रमात |”
” बुद्ध वग्ग में अपने उपदेशो को बुद्ध ने चार आर्य सत्य नाम से प्रकाशित किया है -चत्वारि आरिय सच्चानि (अ.१४ ) “
धम्मपद अध्याय ६ वाक्य ७९/६/४ में आया है जो आर्यों के कहे मार्ग पर चलता है वो पंडित है |
जैन ग्रन्थ रत्नसार भाग १ पृष्ठ १ में जैनों के गुरुमंत्र में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है – णमो अरिहन्ताण णमो सिद्धाण णमो आयरियाण णमो उवज्झाणाम णमो लोए सब्ब साहूणम “यहा आर्यों को नमस्कार किया है अर्थात सभी श्रेष्ट को नमस्कार
• जैन धर्म को आर्य धर्म भी कहा जाता है | [पृष्ठ xvi, पुस्तक : समणसुत्तं (जैनधर्मसार)]
जैनों में साध्वियां अभी तक आर्या वा आरजा कहलाती हैं
काशी विश्वनाथ मंदिर पर आर्य शब्द लिखा हुआ है |
इस तरह अन्य कई प्रमाण है आर्य शब्द के प्रयोग के जिन्हें विस्तार भय से यहाँ नही लिखते है |

दस्यु अनार्य शब्दों की मीमासा – कुछ इतिहासकारों का मत है कि वेदों में दास ,असुर आदि शब्दों द्वारा भारत के मुल्निवाशियो (द्रविड़ो या आदिवासियों ,दलितों ) को सम्बोधित किया है जबकि वेदों में दास ,असुर शब्द किसी जाति या नस्ल के लिए प्रयुक्त नही हुआ है बल्कि इसका भी आर्य के समान विशेषण ,विशेष्य आदि पदों में प्रयोग हुआ है | यहा कुछ प्रमाण द्वरा स्पष्ट हो जाएगा – अष्टाध्यायी ३/३/१९ में दास का अर्थ लिखा है -दस्यते उपक्षीयते इति दास: जो साधारण प्रत्यन्न से क्षीण किया जा सके ऐसा साधारण व्यक्ति वा. ३/१/१३४ में आया है ” दासति दासते वा य: स:” अर्थात दान करने वाला यहा दास का प्रयोग दान करने वाले के लिए हुआ है | इसी के ३/३/११३ में लिखा है ” दासति दासते वा अस्मे” अर्थत जिसे दान दिया जाए यहा दान लेने वाले को दास कहा है अर्थात ब्रह्मण यदि दान लेता है तब उसे भी दास कहते है |” इसी में ३/१/१३४ में दास्यति य स दास: अर्थात जो प्रजा को मारे वह दास ” यहा दास प्रजा को और उसके शत्रु दोनों को कहा है | अष्टाध्यायी ५/१० में हिंसा करने वाले ,गलत भाषण करने वाले को दास दस्यु (डाकू ) कहा है | निरुक्त ७/२३ में कर्मो के नाश करने वाले को दास कहा है | दास शब्द का वेदों में विविध रूपों में प्रयोग – 

  1. मेघ के विशेषण में ऋग्वेद ५/३०/७ में हुआ है |
  2. शीघ्र बनने वाले मेघ के रूप में ऋग्वेद ६/२६/५ में हुआ है |
  3. बिना बरसने वाले मेघ के लिए ७ /१९/२ में हुआ है |
  4. बल रहित शत्रु के लिए ऋग्वेद १०/८३/१ में हुआ है |
  5. अनार्य (आर्य शब्द की मीमासा दी हुई है उसी का विलोम अनार्य है अत: ये भी विशेषण है ) के लिए ऋग्वेद १०/८३/१९ में हुआ है |
  6. अज्ञानी ,अकर्मका ,मानवीय व्यवहार से शून्य व्यक्ति के लिए ऋग्वेद १०/२२/८ में प्रयोग हुआ है |
  7. प्रजा के विशेषण में ऋग्वेद ६/२५/२,१०/१४८/२ और २/११/४  में प्रयोग हुआ है |
  8. वर्ण के विशेषण रूप में ऋग्वेद ३/३४/९ ,२/१२/४ में हुआ है |
  9. उत्तम कर्महीन व्यक्ति के लिए ऋग्वेद १०/२२/८ में दास शब्द का प्रयोग हुआ है अर्थात यदि ब्राह्मण भी कर्महीन हो जाय तो वो भी दास कहलायेगा |
  10.                                                                 गूंगे या शब्दहीन के विशेषण में ऋग्वेद ५/२९/१० में दास का प्रयोग हुआ है |

इन विवेचनो से स्पष्ट हो जाता है कि दास शब्द का प्रयोग किसी नस्ल या जाति के लिए नही हुआ ये निर्जीव बादल आदि और सजीव प्रजा आदि दोनों के लिए भी हुआ है | इसी तरह असुर शब्द भी विविध अर्थो में प्रयुक्त हुआ है – ” इसका प्रयोग भी आर्य के विलोम में अनेक जगह हुआ है | ” निघंटु में मेघ के पर्याय में असुर का प्रयोग हुआ है | ऋग्वेद ८/२५/४ में असुर का अर्थ बलवान है | ईरान में अहुरमजदा कर ईश्वर के नाम में प्रयोग किया जाता है | स्कन्द स्वामी निरुक्त की टीका करते हुए पृष्ठ १७२ पर असुर का अर्थ प्राणवानुदगाता कियाहै | दुर्गाचार्य ने पृष्ठ ३६१ पर प्रज्ञावान अर्थ किया है | उपरोक्त सभी उदाहरणों से स्पष्ट है कि वेदों में दास ,आर्य ,असुर कोई विशेष जाति ,नस्ल के लिए प्रयुक्त नही हुए है ..जबकि कुछ लोग कुचेष्टा द्वारा वेदों में आर्य अनार्य का अर्थ दर्शाते है | कुछ विशेष शब्दों को देख उन्हें आदिवासी या मूलनिवासी बताते है | इसमें एक उदाहरण इंद्र और वृत्र के युद्ध का दिया जाता है जबकि ये कोई युद्ध नही बल्कि आकाशीय घटना है इस बारे में शतपत ब्राह्मण में स्पष्ट लिखा है – – “    तस्मादाहुनैतदस्मि  यद  देवा सुरमिति ” (शतपत  ११/६/१/९ ) अर्थात वृत्रा सुर युद्ध हुआ नही  उपमार्थ  युद्ध  वर्णन  है | इस के बारे में हमारे निम्न लेख में विस्तार पूर्वक देख सकते है – ” वेदों में इंद्र  अब कुछ उन शब्दों पर गौर करेंगे जिन्हें मुल्निवाशी या आदिवासी बताया है | वेद और आदिवासी युद्ध – वेदों में इतिहास नही है इस बारे में पिछले कई लेखो और आगे भी कई लेखो में लिखते रहेंगे लेकिन कुछ लोग वेदों में जबरदस्ती बिना निरुक्त और वेदांगो की साहयता से किये हुए भाष्य को पढ़ या स्वयम कल्पना कर वेदों में इतिहास मान कर उसमे कई आदिवासी और मूलनिवासी सिद्ध करते है | इनमे से कुछ निम्न है – (अ) काले रंग के अनार्य या आदिवासी – ऋग्वेद में आये कृष्ण शब्द को देख कई लोगो ने काले रंग के आदिवासी की कल्पना की है ये बिलकुल वेसे ही है जेसे मुस्लिम शतमदीना देख मदीना समझते है , ईसाई ईश शब्द को ईसामसीह ,रामपालीय  कवीना शब्द से कबीर , वृषभ शब्द से जैन ऋषभदेव ऋग्वेद १/१०१/१ ,१/१३०/८ ,२/२०/७ ,४/१६/१३ और ६/४७/२१ ,७/५/३ में कृष्ण शब्द का प्रयोग हुआ है जिसे अम्बेडकरवादी असुर मूलनिवासी बताते है | जबकि १/१०१/१ में कृष्णगर्भा शब्द है जिसका अर्थ नेरुक्तिक प्रक्रिया से मेघ की काली घटा होता है | ऋग्वेद ७/१७/१४ में सायण ने भी कृष्ण का अर्थ काले बादल किया है | ऋग्वेद १/१३०/८ में त्वच कृष्णामरन्ध्यत इस मन्त्र में काले मेघ छा जाने पर अन्धकार हो जाने का वर्णन है ..इस मन्त्र की व्याख्या में एक पुराने भाष्यकार वेंकट माधव ने त्वच कृष्ण का अर्थ मेघ वशमनयत किया है |ऋग्वेद २/२०/७ में कृष्णयोनी शब्द है यहा योनी शब्द दासी के विशेषण में आया है और कृष्ण का अर्थ काला मेघ और दासी का अर्थ मेघ की घटाए अत कृष्ण योनि का अर्थ हुआ मेघ की विनाशकारी घटाए | कृष्णयोनी – कृष्णवर्णा: मेघ: योनीरासा ता: कृष्णयोन्य दास्य: (वेंकट ) ऋग्वेद ४/१६ /१३ में भी कृष्ण का अर्थ काले मेघ है | ऋग्वेद ६/४७/२१ पर महीधर ने भी कृष्ण का अर्थ कोई व्यक्ति विशेष के लिए नही कर काली रात्रि किया है | ऋग्वेद ७/५/३ में अस्किनी पद आया है जिसका अर्थ काले रंग की जाति पाश्चात्य विद्वानों ने किया है जबकि निघंटु १/७ में इसको रात्रि का पर्याय दिया है जिसका अर्थ है अँधेरी रात अत: स्पष्ट है कि वेदों में कोई काले आदिवासी ,काले मूलनिवासी नही है बल्कि ये सब मेघ ,रात्रि आदि के लिए प्रयुक्त हुए है | (ब) चपटी नाक वाले आदिवासी –  ऋग्वेद ५/२९/१० में अनास शब्द आया है जिसका अर्थ पश्चमी विद्वानों ने चपटी नाक वाले आदिवासी किया है | जबकि धातुपाठ अनुसार अनास का अर्थ होगा नासते शब्द करोति अर्थात जो शब्द नही करता है अर्थात बिना गरजने वाला मेघ (स ) लिंग पूजक आदिवासी –  ऋग्वेद ७/२१/५ और १०/९९/३ में शिश्नदेव शब्द आया है जिसे कुछ लोग लिंग पूजक आदिवासी बताते है चुकि सिन्धु सभ्यता में कई लिंग और योनि चित्र मिले है जिससे उनका अनुमान किया जाता है जबकि शिश्नदेवा का अर्थ यास्क ने निरुक्त ४/१९ में निम्न किया है – ” स उत्सहता यो  विषुणस्य जन्तो : विषमस्य मा  शिश्नदेवा अब्रह्मचर्या ” यहा शिश्नदेव  का  अर्थ  अब्रह्मचारी  किया  है  अर्थात  ऐसा  व्यक्ति  जो  व्यभिचारी  हो | आदिवासियों के विशिष्ट व्यक्ति और उनकी समीक्षा –  पाश्चात्य विद्वानों और उनके अनुयायियों ने वेदों में से निम्न शब्द शम्बर , चुमुरि ,धुनि ,प्रिप्रू ,वर्चिन, इलिविश देखे और इन्हें आदिवासियों का मुखिया बताया | (अ) शम्बर – ये ऋग्वेद के १/५९/६ में आया है यास्क ने निरुक्त ७/२३ में शम्बर का अर्थ मेघ किया है ” अभिनच्छम्बर मेघम ” (ब) चुमुरि – यह ऋग्वेद के ६/१८/८ में आया है चुमुरि शब्द चमु अदने धातु से बनता है | चुमुरि का अर्थ है वह मेघ जो जल नही बरसाता | (स) वर्चिन – यह ऋग्वेद के ७/९९/५ में है ये शब्द वर्च दीप्तो धातु से बना है जिसका अर्थ है वह मेघ जिसमे विद्युत चमकती है | (द) इलीबिश – ये ऋग्वेद १/३३/१२ में है इस शब्द से मुस्लिम कुछ विद्वान् शेतान इब्लीस की कल्पना करते है जो की कुरआन में ,बाइबिल आदि में आया है लेकिन यहा वेदों में यह कोई शेतान नही है सम्भवत वेदों के इसी शब्द से अरबी ,हिब्रू आदि भाषा में इब्लीस शब्द प्रचलित हुआ हो क्यूंकि चिराग ,अरव , अल्लाह ,नवाज आदि संस्कृत भाषा से उन भाषाओ में समानता दर्शाते शब्द है | निरुक्त ६/१९ में इलीबिश के अर्थ में यास्क लिखते है ” इलाबिल शय: ” अर्थात भूमि के बिलों में सोने वाला अर्थात वृष्टि जल जब भूमि में प्रवेश कर जाता है तो उसे इलिबिश कहते है | (य) पिप्रु – ये ऋग्वेद ६/२०/७ में आया है ये शब्द ” पृृ पालनपूरणयो: ” धातु से बनता है | जिसका अर्थ है ऐसा मेघ जो वर्षा द्वारा प्रजा का पालन करता है | (र) धुनि – ये ऋग्वेद ६/२०/१३ में है    निरुक्त १०/३२ में धुनि का अर्थ लिखा है ” धुनिमन्तरिक्षे मेघम | ” अर्थात यह एक प्रकार का मेघ है | धुनोति इति धुनि: अर्थात ऐसा मेघ जो काँपता है गर्जना करता है | अत: स्पष्ट है की वेदों में किसी आदिवासी का उलेख या युद्ध नही बल्कि सभी जड सम्बन्धी और विशेषण सम्बन्धी शब्द है | प्रश्न – हम ये मान लेते है कि आर्य शब्द विशेषण है और ये किसी के लिए भी प्रयुक्त हो सकता है जो श्रेष्ठ हो लेकिन स्वर्ण इस देश के नही थे बल्कि बाहर से आये थे ? उत्तर – हमारे किसी भी ग्रन्थ में सवर्णों का बाहर से आया नही लिखा है बल्कि भारत से क्षत्रिय ,ब्राह्मण ,वेश्य आदि अन्य देशो में गये इसका वर्णन है |                                                       भारतीय वैदिक सभ्यता की अन्य सभ्यताओ से समानता को देखते हुए लोग ये कल्पना करते है की विदेशी भारत में आये और यहा की सभ्यता को नष्ट कर अपनी विदेशी सभ्यता प्रचारित की जबकि ये बात कल्पना है आर्य भारत से अन्य देश में गये थे इसके निम्न प्रमाण – मनु स्मृति में आया है कि – शनकैस्तु  क्रियालोपादिमा: क्षत्रियजातय:। वृषलत्वं गता लोके ब्रह्माणादर्शनेन्॥10:43॥  – निश्चय करके यह क्षत्रिय जातिया अपने कर्मो के त्याग से ओर यज्ञ ,अध्यापन,तथा संस्कारादि के निमित्त ब्राह्मणो के न मिलने के कारण शुद्रत्व को प्राप्त हो गयी। ” पौण्ड्र्काश्र्चौड्रद्रविडा: काम्बोजा यवना: शका:। पारदा: पहल्वाश्र्चीना: किरात: दरदा: खशा:॥10:44॥ पौण्ड्रक,द्रविड, काम्बोज,यवन, चीनी, किरात,दरद,यह जातिया शुद्रव को प्राप्त हो गयी ओर कितने ही मलेच्छ हो गए जिनका विद्वानो से संपर्क नही रहा। इन श्लोको से स्पष्ट है कि आर्य लोग भारत से बाहर वश गये थे और विद्वानों के संग न मिलने से उनकी मलेछ आदि संज्ञा हुई | मुनि कात्यायन अपने याजुष ग्रन्थ प्रतिज्ञा परिशिष्ट में लिखता है कि ब्राह्मण का मूलस्थान भारत का मध्य देश है | महाभारत में लिखा है कि ” गणानुत्सवसंकेतान दस्यून पर्वतवासिन:| अजयन सप्त पांडव ” अर्थात पांड्वो ने सप्त गणों को जीत लिया था | इस तरह स्पष्ट है कि आर्य विदेशो से नही बल्कि भारत से अन्य देशो में गये थे | भारतीयों का विदेश गमन – भारतीयों का मिश्र गमन – भविष्य पुराण खंड ४ अध्याय २१ में कण्व ऋषि का मिश्र जाना लिखा है जहा उन्होंने १०००० लोगो का शुद्धिकरण किया था | भारतीयों का रूस और तुर्किस्थान गमन – lassen की indiscehe alterthumskunda में भारत का तुर्क और रूस में गमन के बारे में लिखते हुए लिखता है कि ” it appears very probable that at the dawn of history ,east turkistaan was inhabited by an aryan population ” भारतीयों का सिथिया देश में गमन – सिथिया देश किसी समय भारत से निकले शक नामक क्षत्रियो ने बसाया था जिसका प्रमाण विष्णुपुराण ३/१/३३-३४ में है ” वैवस्त मनु के इस्वाकु ,नाभागा ,धृष्ट ,शर्याति ,नाभा ने दिष्ट ,करुष ,प्रिश्ध्र ,वसुमान ,नरीशयत ये नव पुत्र  थे | हरिवंश अध्याय १० श्लोक २८ में लिखा है – ” नरिष्यंत के पुत्रो का ही नाम शक था “ विष्णु पुराण ४/३/२१ में आया है कि इन शको को राजा सगर ने आधा गंजा करके निकाल दिया और ये सिन्थ्निया (शकप्रदेश ) जा कर वश गये | भारतीयों का चीन गमन – मनुस्मृति के अलावा चीनियों के आदिपुरुषो के विषय में प्रसिद्ध चीनी विद्वान यांगत्साई ने सन १५५८ में एक ग्रन्थ लिखा था | इस ग्रन्थ को सन १७७३ में हुया नामी विद्वान ने सम्पादित किया उस पुस्तक का पादरी क्लार्क ने अनुवाद किया उसमे लिखा है कि ” अत्यंत प्राचीन काल में भारत के मो लो ची राज्य का आह . यू . नामक राजकुमार युनन्न प्रांत में आया | इसके पुत्र का नाम ती भोगंगे था | इसके नौ पुत्र हुए | इन्ही के सन्तति से चीनियों की वंश वृद्धि हुई | ” यहा इन राजकुमार आदि का चीनी भाषानुवादित नाम है इनका वास्तविक नाम कुछ और ही होगा जेसे की शोलिन टेम्पल के निर्माता बोधिधर्मन का नाम चीनियों ने दामो कर दिया था | इन सबके अलवा भारतीय क्षत्रिय वेश्य ब्राह्मण अन्य कारणों से भी समुन्द्र पार कर अन्य देशो में जाते थे क्यूंकि भारतीयों के पास बड़ी बड़ी यांत्रिक नौकाये थी जिनका उलेखभारतवर्ष के प्राचीन वाङ्गमय वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि में जहाजों का उल्लेख आता है। जैसे बाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में ऐसी बड़ी नावों का उल्लेख आता है जिसमें सैकड़ों योद्धा सवार रहते थे।

नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम। सन्नद्धानां तथा यूनान्तिष्ठक्त्वत्यभ्यचोदयत्‌॥
अर्थात्‌-सैकड़ों सन्नद्ध जवानों से भरी पांच सौ नावों को सैकड़ों धीवर प्रेरित करते हैं।
इसी प्रकार महाभारत में यंत्र-चालित नाव का वर्णन मिलता है।
सर्ववातसहां नावं यंत्रयुक्तां पताकिनीम्‌।
अर्थात्‌-यंत्र पताका युक्त नाव, जो सभी प्रकार की हवाओं को सहने वाली है।
कौटिलीय अर्थशास्त्र में राज्य की ओर से नावों के पूरे प्रबंध के संदर्भ में जानकारी मिलती है। ५वीं सदी में हुए वारहमिहिर कृत ‘बृहत्‌ संहिता‘ तथा ११वीं सदी के राजा भोज कृत ‘युक्ति कल्पतरु‘ में जहाज निर्माण पर प्रकाश डाला गया है।

नौका विशेषज्ञ भोज चेतावनी देते हैं कि नौका में लोहे का प्रयोग न किया जाए, क्योंकि संभव है समुद्री चट्टानों में कहीं चुम्बकीय शक्ति हो। तब वह उसे अपनी ओर खींचेगी, जिससे जहाज को खतरा हो सकता है। अत : स्पष्ट है कि भारतीय नावो द्वारा अन्य देशो में जाया करते थे | इसी कारण भारतीयों और अन्य देशो की सभ्यताओ में काफी समानताये है | जिनको विस्तारित रूप से p n oak जी की पुस्तको , स्वामी रामदेव जी गुरुकुल कांगड़ी की भारतवर्ष का इतिहास ,रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पति ,स्टेपहेन केनप्प की पुस्तको , पंडित भगवतदत्त जी की वृहत भारत का इतिहास , वैदिक वांगमय का इतिहास में देख सकते है | सिन्धु सभ्यता और आर्य आक्रमणकारी –  कुछ लोग सिन्धु सभ्यता के बारे में यह कल्पना करते है कि सिन्धु सभ्यता को विदेशी आर्यों ने नष्ट कर दिया जबकि हमारा मत है कि सिन्धु सभ्यता आज भी विद्यमान है | केवल सिन्धु वासियों के पुराने नगर नष्ट हुए है जो की प्राक्रतिक आपदाओं के कारण हो सकते है |

एक योगी जिसके 3-4 सर है ,यह असल में भगवान शिव है |

 

सिन्धु घाटी सभ्यता और मेवाड़ के एकलिंगनाथ जी

आप देख सकते है की सिन्धु घाटी सभ्यता  के शिव और मेवाड़ के एकलिंगनाथ यानि भगवान शिव में कितनी समानता है ,एक समय मेवाड़ में भी सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग रहते थे और आज भी वह के लोग 4 सर वाले शिव की पूजा करते है

कृष्ण और वृक्ष से निकलते 2 यक्ष
आपको वह कहानी तो पता ही होगी की भागवान कृष्ण अनजाने में 2 वृक्ष उखाड़ देते है जिसमे से 2 यक्ष निकलते है ,यह सील वही कहानी बता रहा है ,आप 2 वृक्ष देख सकते है जो उखाड़ गए है (विद्वान् अनुसार ) और उनके बिच एक व्यक्ति नजर आ रहा है जो यक्ष हो सकता है ,दूसरा यक्ष शायद इस सील के दुसरे भाग में हो क्युकी यह सील टुटा हुआ है |
भारत में रथ थे और घोड़े भी ,सच तो यह है की आज जो घोड़े यूरोप और एशिया में है वे 70 साल पहले भारतीय घोड़ो से विकसित हुए है |

गणेश
नंदी से लड़ते गणेश या नंदी संग युद्ध कला सीखते कार्तिक
उपरोक्त एक चित्र में दाय तरफ एक चित्र है ये चित्र लज्जा गौरी नामक देवी से मिलता है चुकि सिन्धु वासी भी आज के तरह लिंग और योनि पूजक थे इस कारण वहा कई लिंग और योनि प्रतीक मिले है आज भी कामख्या आदि शक्तिपीठो में देवी की योनि पूजी जाती है |
नीचे लज्जा गौरी का एक चित्र जो पूर्वी और दक्षिण भारत ,नेपाल आदि में पूजी जाती है –
इसी तरह एक अन्य शील में सर्प देवी मिली है –
ये सर्प देवी का चित्र मनसा देवी से काफी मिलता है –
इतना ही नही ये सर्प देवी अन्य सभ्यताओ में भी है सम्भवत भारत से ही इनका प्रचार अन्य सभ्यताओ में हुआ होगा –
ये चित्र Minoan Goddess 1600 BC का है |
इस तरह से आधुनिक भारतीय और सिन्धु सभ्यताओ में समानता देखि जिससे स्पष्ट होता है की सिन्धु सभ्यता नष्ट नही हुई |
जेसे आज पौराणिक सभ्यता के साथ वेद और वैदिक ज्ञान है उसी तरह सिन्धु सभ्यता में भी था चुकी सिन्धु लिपि अभी तक पढ़ी नही गयी है लेकिन फिर भी कुछ शीलो पर बने चित्रों से वैदिक मन्त्रो का उस समय होना प्रसिद्ध है | सिन्धु लिपि ब्राह्मी से मिलती है इसके अलावा सिन्धु सभ्यता में कई यज्ञ वेदिया मिली है अर्थात सिन्धु वासी अग्निहोत्र करते थे |

मित्रो उपर्युक्त जो चित्र है वो हडप्पा संस्कृति से प्राप्त एक मुद्रा(सील) का फोटोस्टेट प्रतिकृति है।ये सील आज सील नं 387 ओर प्लेट नंCXII के नाम से सुरक्षित है,, इस सील मे एक वृक्ष पर दो पक्षी दिखाई दे रहे है,जिनमे एक फल खा रहा है,जबकि दूसरा केवल देख रहा है। यदि हम ऋग्वेद देखे तो उसमे एक मंत्र इस प्रकार है- द्वा सुपर्णा सुयजा सखाया समानं वृक्ष परि षस्वजाते। तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्तयनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ -ऋग्वेद 1/164/20 इस मंत्र का भाव यह है कि एक संसाररूपी वृक्ष पर दो लगभग एक जैसे पक्षी बैठे है।उनमे एक उसका भोग कर रहा है,जबकि दूसरा बिना उसे भोगे उसका निरीक्षण कर रहा है।

इसी तरह
वेदों में ७प्राण ,ब्राह्मणों  में ७ ऋषि ७ देविया ,७ किरण ,आयुर्वेद में अन्न से वीर्य तक बनने के ७ चरण ७ नदिया आदि के रूप में ७ के अंक का महत्व है सिन्धु सभ्यता की एक शील में ७ लोगो का चित्र है |
इसी तरह सिन्धु सभ्यता में स्वस्तिक का चिन्ह मिला है जिसे यहा देखे ये अक्सर शुभ कार्यो में बनाया जाता है यज्ञ करते समय रंगोली के रूप में इसे यज्ञ वेदी को सजाने में भी बनाया जाता था |

 

ऋग्वेद में स्वस्तिवाचन से कई अर्थ है स्वस्ति का अर्थ होता है कल्याण करने वाला ,उत्तम ,शुभ आदि ये चिन्ह शुभ और कल्याण का प्रतीक है इसलिए इसका नाम स्वस्तिक हुआ है |
इस तरह अन्य कई प्रमाण मिल सकते है जिन्हें विस्तार भय से छोड़ते है इन सभी से सिद्ध है की सिन्धु सभ्यता आज भी विद्यमान है किसी ने उसे नष्ट नही किया थोडा बहुत अंतर अवश्य आया है क्यूंकि कोई भी चीज़ सदा एकसी नही होती लोगो के साथ साथ उन में भी बदलाव आता है |
जिस तरह कल्पना की गयी थी की आर्यों और विदेशियों की सभ्यता मिलती है तो आर्य विदेशी है जिसे हमने गलत साबित किया लेकिन सिन्धु वासियों और अन्य विदेशी सभ्यता भी मिलती है इस आधार पर अगर ये कहे की सिन्धुवासी भी विदेशी थे वो भी गलत ही होगा क्यूंकि हमने पहले बता दिया की भारतीय लोग दुसरे देशो में जाया करते थे |
सिन्धु सभ्यता और अन्य सभ्यता में समानता –
सिन्धु सभ्यता में मिली सर्प देवी और मिनोअनन देवी की समानता दर्शाई गयी है सिन्धु लिपि अन्य देशो की प्राचीन लिपि से काफी मिलती है जिसे चित्र में दर्शाया है –
इसमें सिन्धु लिपि और प्राचीन चीन की लिपि की समानता बताई गयी है |
    a is Upper Palaeolithic (found among the cave paintings), b is Indus Valley script, c is Greek (western branch), and d is the Scandinavian runic alphabet.
उपरोक्त चित्र में सिन्धु ,ग्रीक ,रूमानिया लिपि में समानता दिखाई गयी है |
अन्य समानताये –                                                                                                                                    
मोहनजोदड़ो में सफेद पत्थर से बनी मुर्तिया मिली है जो कि असीरिया की सभ्यता से मिलती है | चांदी के चौकौर टुकड़े प्राप्त हुए है जो कि बेबीलोन से मिलते है .खुदाई में एक मंदिर मिला है जिसमे पद्मासन लगाये एक देवता या योगी है जो भी बेबीलोन से मिलता है | ऊपर एक सर्प देवी का चित्र भी है जो मेसोन्न देवी से मिलता है | घरो पर प्लास्टर मिला है जो की मेसोपोटामिया से लाया जाता होगा ,कुछ बर्तन मिले है जो की मेसोपतामिया की सभ्यता में मिले बर्तनों से मिलते जुलते है | डाकृर साईस का कथन है कि ” बेबीलोन और भारत में ३००० इ पु से ही सम्बन्ध थे |”(his lecture on the origion and growth of religion among the babilonions)
इसी तरह बेबीलोन के एक रेशमी वस्त्र का नाम सिन्धु है |
अत: यहा स्पष्ट है कि सिन्धु वासियों के भी अन्य देशो से सम्बन्ध थे यदि समानता से आर्यों को विदेशी कहते है तो सिन्धुवासियो को क्यूँ नही |
उपरोक्त प्रमाणों से हमने बताया की आर्य भारत से बाहर के नही थे लेकिन कुछ लोग डीएनए टेस्ट का प्रमाण देते है जबकि डीएनए टेस्ट ने कई बार अलग अलग परिणाम दिए है आधुनिक डीएनए टेस्टों से भी ये साबित हुआ है की सवर्ण और दलित आदिवासी ,द्रविड़ सभी के पूर्वज एक ही थे कोई विदेशी नही थे –http://timesofindia.indiatimes.com/india/Aryan-Dravidian-divide-a-myth-Study/articleshow/5053274.cms
जिसे निम्न लिंक में देखे | अब हम विदेशियों द्वरा काफी पहले निकाला गलत डीएनए रिपोर्ट की समीक्षा करते है –
माइकल की डीएनए रिपोर्ट की समीक्षा –                                                                                          
२००१ टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर छपी कि अमेरिका के वाशिंगटन में उत्ताह विश्वविध्यालय के बायोलोजी डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष माइकल बाम्शाद ने डीएनए टेस्ट के आधार पर बताया कि भारत की sc ,st जातियों का डीएनए एक जेसा है तथा विदेशियों और gen का एक जेसा है | जिससे उसने निष्कर्ष निकाला कि ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य आदि विदेशी थे और st sc मुल्निवाशी |
इस पर हम आपसे पूछते है कि मान लीजिये कि आपके परिवार वाले अमेरिका जा कर वश गये | तो उनका डीएनए आपसे मिलेगा अथवा नही | आप कहेंगे कि अवश्य मिलेगा | इसी प्रकार भारत से सवर्ण लोग विदेशो में गये थे | ब्राह्मण विद्या के प्रचार हेतु ,क्षत्रिय दिग्विजय हेतु ,वेश्य व्यपार हेतु , और इनमे से कई लोग विदेशो में ही बस गये | अनेक विदेशी उन्ही की संताने है | आज भी बहुत सारे भारतीय विदेशो में जाकर व्यापार ,नौकरी कर रहे है | अनेक श्रमिक भी बाहर जा कर बस गये है | तो उनका डीएनए भारत में रह रहे उनके परिजनों से क्यूँ नही मिलेगा ? तो दोनों में से किसे मूल निवासी कहेंगे |  परिवार वाले या बाहर वालो को अथवा दोनों को ?
पूर्वकाल में भारत साधन सम्पन्न देश था इसलिए शुद्रो को विदेश जाने की ज्यादा आवश्यकता नही हुई |
दूसरी बात यह कि माइकल ने केवल दक्षिण के १ या २ गाँवों का ही डीएनए टेस्ट क्यूँ करवाया क्या १०० करोड़ आबादी में १ या २ गाँव से निष्कर्ष निकालना तर्क संगत होगा ? इसके आलावा हमारे दलित भाइयो के गौत्र (चौहान ,परमार,गहलोत ,सौलंकी ,राठोड ) आदि क्षत्रियो से मिलते है जिससे भी सिद्ध होता है कि दोनों के पूर्वज एक ही थे |
उपरोक्त सभी निष्कर्षो से हमने सिद्ध किया कि सुवर्ण दलित आदि के पूर्वज एक ही थे कोई विदेशी नही थे | तथापि हमारे देश में कुछ बाहरी आक्रमण कारी आये थे जेसे अंग्रेज ,मुगल ,फ़ारसी ,तुर्की ,शक ,हुन ,यूनानी ..
इनमे से कई जातयो को हमारे क्षत्रिय राजाओ ने भगा दिया और कुछ यही बस गये ये विदेशी जातीय भी आज सभी वर्गों में कुछ विशेष पहचान के साथ पायी जाती है क्यूंकि इन्होने भारतीयों से विवाह आदि सम्बन्ध स्थापित किये थे |
विदेशियों का भारत आगमन –                                                                                                                
सरस्वती “अगस्त १९१४ ” में लिखा है कि रीवा राज्य में एक ताम्र पत्र मिला है | उसमे लिखा है कि कलचुरी राजा कर्ण ने तातारी हूणों को परास्त करके उनकी कन्या के साथ विवाह किया खत्रियो और राजपूतो में आज भी हूण संज्ञा विद्यमान है |
” पुत्रोस्य खगदलितारिकरीन्द्रकुम्भमुत्ताफ्लै: स्म ककुभोर्चति कर्णदेव :||
अजनि कलचुरीणा स्वामीना तेन हुणान्वयजलनिधिलक्ष्म्या श्रीमदावल्लदेव्याम ||”-राजपूताने के इतिहास से उद्दृत
राजा चन्द्रगुप्त ने सेलुक्स की पुत्री से विवाह किया |
कनिष्क नाम के हूण राजा ने भारत में बौद्ध धर्म ग्रहण कर यही निवास किया .इसी तरह मिलेंद्र भी भारत में बौद्ध बना उन्ही के कई वंशज भारत में ही बसे रह गये |
कुछ शक भारत में आकर बसे उन्होंने यहा बस गये जिनमे राजा कुशान प्रमुख है इन्होने यहा हिन्दू मत शेव मत स्वीकार किया आज भी ब्राह्मणों में शाकदीपी ब्राह्मण होते है |
उदयपुर राज्य के राजा गौह की शादी ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौशेरवा की पौत्री के साथ हुई थी | लोगो का विचार है की जिला बस्ती के रहने वाले कलहंस क्षत्रिय भी ईरान के रहने वाले है | जेसा की हमने पहले बताया की कण्व ऋषि ने मिश्र में जा कर शुद्धिकरण किया था और इनमे से कइयो को भारत भी बसाया जिनमे कई शुद्र ,क्षत्रिय ,वेश्य और ब्राह्मण थे |
इसी तरह इस्लामिक आक्र्मंकारियो से भयभीत हो कर पारसी लोग इरान से भारत वश गये |
गुजरात में एक जगह अफ़्रीकी आदिवासी भी है जो आज भी अफ़्रीकी संस्कृति और भाषा रहन सहन प्रयोग में करते है |
प्रसिद्ध अग्रेँज इतिहासकार कर्नल.टाड के अनुसार बप्पा ने कई अरबी युवतियोँ से विवाह करके 32 सन्तानेँ पैदा जो आज अरब मेँ नौशेरा पठान के नाम से जाने जाते हैँ।
उपरोक्त वर्णन से हमने भारत में कुछ विदेशी जातियों पर प्रकाश डाला जिससे हम इस निष्कर्ष पर पंहुचे है कि भारत के हर वर्ग में मध्यकाल में कुछ विदेशी जातियों का भी मिश्रण है चाहे वो शुद्र हो या ब्राह्मण |
लेकिन इससे भी यह सिद्ध नही होता कि बहुत काल पहले आर्य विदेश से आये थे उपरोक्त वर्णन से यही सिद्ध हुआ है कि भारतीय लोग विदेशो में गये और वही बस गये थे फिर बाद में कुछ आक्रमणकारी भारत में आये जिनमे मुस्लिम ,अंग्रेजो को छोड़ बाकी सभी यही आर्य (हिन्दू) ,बुद्ध ,जैन आदि संस्कृति में घुल मिल गये जो कि इस देश की मूल संस्कृति थी | चुकी हमारी आदत यह हो गयी है कि जब तक कोई विदेशी हमे न कहे तब तक हम लोग मानते नही है इसलिए आर्यों के मूलनिवासी होने और आर्यों के विदेशी न होने पर कुछ पाश्चत्य विद्वानों का भी मत से आपको अवगत कराते है –
पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि में आर्य भारत के मूल निवासी –                                                               
(१) यवन राजदूत मैगस्थ नज लिखता है -भारत अनगिनत और विभिन्न जातियों में बसा हुआ है | इनमे से एक भी मूल में विदेशी नही थी , प्रत्युत स्पष्ट ही सारी इसी देश की है |
(२) नोबल पुरूस्कार विजेता विश्वविख्यात विद्वान् मैटरलिंक अपने ग्रन्थ सीक्रेट हार्ट में लिखता है ” It is now hardly to be contested that this source(of knowledge) is to be found in india.thence in all probability the sacred teaching spread into egypt,found its way to acient persia and chaldia , permeated the hebrew race and crept in greece and south of europe, finaaly reaching china and even america.” अर्थात अब यह निर्विवाद है कि विद्या का मूल स्थान भारतवर्ष में पाया जाता है और सम्भवत यह पवित्र विद्या मिश्र में फेली | मिस्र से ईरान तथा कालदिया का मार्ग पकड़ा ,यहूदी जाति को प्रभावित किया ,फिर यूनान तथा यूरोप के दक्षिण भाग में प्रविष्ट हुई ,अंत में चीन और अमेरिका पंहुची |”
(३) इतिहासविद मयूर अपनी muir : original sanskrit text vol २ में कहता है ” यह निश्चित है कि संस्कृत के ग्रन्थ चाहे कितना भी पुराना हो आर्यों के विदेशी होने का कोई उलेख नही मिलता है |”
(४)विश्वविख्यात एलफिन्सटन अपनी पुस्तक ” elphinston:history of india vol1 “में लिखते है “न मनुस्मृति में न वेदों में आर्यों के बाहर से आने का कोई वर्णन प्राप्त नही होता है |
अब हम यही कह कर लेख समाप्त करना चाहेंगे कि आर्य कोई भी विदेशी जाति नही थी न ही सवर्णों ने विदेश से आकर यहा की संस्कृति को नष्ट किया ये सब यही के मूलनिवासी थे और आर्य एक विशेषण है जो किसी के साथ भी प्रयुक्त हो सकता है वनवासी ,शुद्र ,दलित सभी के साथ बस उसके कर्म श्रेष्ट हो रामायण में जाम्बवान ,हनुमान ,बालि ,सुग्रीव आदि वनवासी जातियों के लिए आर्य शब्द प्रयुक्त हुआ है अत: स्पष्ट है कि ये भी आर्य बन सकते है |
अत: हमारा दलित भाइयो से आग्रह है कि देश की एकता के लिए इस झूट आर्यों के विदेशी होने को तियांजली दे देनी चाहिय और अपने आर्य महापुरुषों को पक्षपात रहित हो कर सम्मान देना चाहिय |
संधर्भित ग्रन्थ एवम पुस्तके –
(१) क्या वेदों में आर्यों और आदिवासियों का युद्ध का वर्णन है ?-श्री वेद्य रामगोपाल जी शास्त्री 
(२) वैदिक सम्पति- रघुनन्दन शर्मा 
(३) वेदार्थ भूमिका -स्वामी विद्यानंद सरस्वती 
(४) निरुक्त-यास्क (भाषानुवाद-भगवतदत्त जी )
(५) बौद्धमत और वैदिक धर्म-स्वामी धर्मानंद जी 
(६) भारतीय संस्कृति का इतिहास -प. भगवतदत्त 
(७) कुलियात आर्य मुसाफिर -प. लेखराम जी 
(८) भारतीय संस्कृति का इतिहास-स्वामी रामदेव 
(९) बोलो किधर जाओगे – आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक जी 
(१० ) शुद्र कौन थे – डा. भीमराव अम्बेडकर 
(११) आर्यों का आदिदेश -विद्यानंद सरस्वती    

81 thoughts on “क्या आर्य विदेशी थे ?”

  1. Michael ka DNA test mDNA par adharit hai jise Mitochondrial DNA bhi kahate hai. mDNA se aap kewal kisi vyakti ki Maa ki vanshavli ka pata kar sakte hai, example:
    Rahul Gandhi ki maa sonia italian hai to mDNA se yahi pata chalega ki Rahul gandhi ki maa Italy se.

    Yadi pita ka DNA janna ho to YDNA dekha jaata hai par YDNA nikalna muskil hota hai aur madhyadhara ke vidhvan mDNA ke ko hi pasand karte hai.

    Michael ka DNA report bahot pahale pada tha par itna yaad hai ki usne kaha tha ki Brahmin, kshatriya, vaishya aadi ki Maa Bhartiya hi thi jisse kuch logo ne nirkash nikala ki Arya europe se aakar Bharat me base aur Bhartiya mahilao se shaadi ki.
    Par yadi maan bhi le ki arya videshi hai to kya ve europe se hazar kilometer dur Bharat aaye bina striyo?

    us samay anusar to europe se Bharat aane ko kai saal lagne chahiye.
    aur aisa bhi nahi tha ki unhe pata tha ki unhe Bharat me hi jana hai aur ve Bharat jaane ka rasta jante the.
    Paschimi vidvano ke anusar Arya khanabados aur jangli log the jo shikar karke gujara karte the.
    To yadi yah maan le ki arya bina striyo ke sath nikle the to ve kai saal tak apne vansh ko sambhale kaise rahe?
    bina striyo ke to unka vansh badega nahi aur kya pata ki kisi desh ne unpar hamla kiya aur ve sab ke sab mar gaye.
    iska ek hal hai ki arya jaha gaye vaha vivah kar apna vansh badaya aur ve log aage gaye aur yahi kiya to fir isse yah samasya utpan hogi ki unka DNA kai jatiyo ke DNA ka mishran hoga to fir yah kahana ki Aryo ka DNA 98% milta hai yah ya to jhuth hai ya DNA testing me galti hai.

    Kuch DNA test batate hai ki Bhartiya upmahadvip aur iran ke logo me kuch khas genes hai jo europe me paae nahi jaate.

    kuch genes europe aur bhartiyo me samaan hai par Madhya asia me nahi paya jata.

    yah kuch baate hai jo sidh karti hai ki ham videshi nahi hai.

  2. ये तो तय है की आर्य सभ्यता से पहले हड़प्पा सभ्यता थी उसे ही द्रविड़ सभ्यता कहा जाता है। हड़प्पा सभ्यता काफी विकसित थी अबशेषों से ये तो पता चलता है। आज भी कई रिवाज ओर चिन्ह इस्तेमाल होते है। द्रविड़ शैव मतानुयाई है। ये भी द्रविड होने का भान कराता है । ये मूल निवासी है ये भी सत्य है अभी तक ज्ञात सूत्रो से । लेकिन आर्य विदेशी थे या सत्य नहीं है। मेरा मनना है जब सिंधु नदी घाटी की हड़प्पा सभ्यता का पतन होना शुरू हुआ चाहे बाढ़ से या बीमारी से । युद्ध का कोई अबशेष नहीं मिला इस क्षेत्र मे। जो लोग बचे होगे बे वो दूसरे क्षेत्रों मे चले गए होंगे। यही से कुछ लोग हिदुकुश या एशिया माइनर क्षेत्र मे पहुचे होगे । 700-750 साल इन लोंगों ने इसी क्षेत्र मे विताए। यही पर इनलोगो ने अपने ज्ञान से प्रकर्ति को समझने का प्रयास किया। अपने तप के बल से इंद्र , मित्र , वरुण और अश्वनी कुमार आदि देवताओं को जाना । वोगाज कोई का शिला लेख जो एशिया माइनर मे मिला है इसकी पुष्टी करता है। यही से ये लोग बाद मे भारत वापस आए हो अपनी नई सभ्यता के साथ जिसे आर्य कहा । आर्य का मतलब इसवारपुत्र होता है। इन्द्र आदि देवों से साक्षात्कार होने के बाद इन लोंगों ने अपने लिए इसवर पुत्र शब्द इस्तेमाल किया जो की संस्कृत मे आर्य होता है। देवों की भाषा को इनहोने अपना लिया। इसीलिए संस्कृत को देवभाषा कहा गया। भारत आने पर हड़प्पा सभ्यता के बचे लोंगों के साथ इनका युद्ध हुआ होगा। जिससे हड़प्पा सभ्यता के लोग जंगलो मे छिप कर रहने लगे। आर्यों के ज्ञानी लोगों ने अपनी ज्ञान परंपरा को आगे बड़ाया। द्रष्टा बनकर सारी श्रष्टि को देखा। ओर जो ज्ञान मिला उसे सूची बद्ध किया। ओर ऋगु वेद की रचना हुई। पूर्व वरती सभ्यता के जो लोग दक्षिण की तरफ चले गए। उनमे ओर आर्यों मे सन्स्क्रतिक आदान प्रदान हुआ। द्रविड़ों ने आर्य सबयता को अपनाना शुरू कर दिया। लेकिन जो जगलों मे रहने लगे थे उनको आर्य सभ्यता मे शामिल नहीं किया गया। ऋगु वेद (स्वस्ति वाचन ) मे उनही को भील ओर निषाद कहा गया।

    1. नमस्ते विनोद जी,

      ऐसा नहीं अहि जैसा की आपने लिखा है
      ” आर्य का मतलब इसवारपुत्र होता है। इन्द्र आदि देवों से साक्षात्कार होने के बाद इन लोंगों ने अपने लिए इसवर पुत्र शब्द इस्तेमाल किया जो की संस्कृत मे आर्य होता है। देवों की भाषा को इनहोने अपना लिया। इसीलिए संस्कृत को देवभाषा कहा गया” इत्यादि

      आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ होता है यह आचरण से सम्बंधित है न की स्थान विशेष से .
      जो व्यक्ति जैसा आचरण करता है वैसी ही कहलाता है जैस व्यास मुनि आचरण से ब्राहमण बने ऐसे अनेकों उदहारण हैं

    2. मिस्र की सभ्यता

      ‘ हार्म्सवर्थ हिस्ट्री आफ़ दि वर्ल्ड ‘ में मिस्र की भूमि की उत्पत्ति के विषय में लिखा है कि ‘ मिस्र की भूमि प्रति एक शत वर्ष मे पाँच इच्ञ के हिसाब से नील नदी के द्वारा मिट्टी एकत्र करती है । इस सभय तक मिट्टी का जो सबसे बड़ा स्तर एकत्र हो रहा है उसकी मोटाई 26 फिट से 62 फिट तक है, अतः 35 फिट का औसत मानने से यह ज़मीन 6000 वर्षों मे इतनी मोटी हो पाई होगी , किन्तु इससे भी अधिक उसे 10,000 वर्ष की मानना चाहिये । इसके पहले वहाँ पूर्णरुप से मैदान ही था और बुशमैनों की प्रकार के जंगली मनुष्य वहाँ रहते थे ।…… मिस्र कि लिखित इतिहास वहाँ के प्रथम राजवंश से आरम्भ होता है जो ईस्वी सन् पूर्व 5,500 तक जाता है और छठे, बारहवें तथा अठारहवें राजवंश से मिल जाता है । इस लिखित इतिहासकाल के पूर्व का समय नहीं कहा जा सकता कि वह और कितने समय पूर्व तक जाता है ‘ ।

      इसका तात्पर्य यह है कि मिस्र की भूमि केवल 10,000 वर्ष की पुरानी है । वहाँ की लिखित सभ्यता तो वहाँ के प्रथम राजवंश से ही आरम्भ होती है जो केवल ( 5500+ 2016=7516 ) वर्ष प्राचीन सिद्ध होती है । इसके पूर्व का समय अन्धकार में है, अतः वहाँ की सभ्यता का साधक-बाधक नहीं है, अतएव वहाँ की सभ्यता जो लिखित प्रमाणों से सिद्ध होती है वह 7516 वर्ष प्राचीन है और हमें मान्य है, किन्तु हम देखते हैं कि भारतीय आर्यों की लिखित सभ्यता इससे बहुत अधिक प्राचीन प्रमाणित होती है, *क्योंकि सभी इतिहास प्रेमी जानते हैं कि भारत के अन्तिम सम्राट् राजा चन्द्रगुप्त के दरबार में युनान का राजदूत मेगस्थनीज़ रहा करता था और उसने राज्य के पुस्तकालय से एक वंशावली प्राप्त की थी जिसे उसने अपने ग्रन्थ में उद्धत किया था ।* इसी प्रकार उस वंशावली को ओरायन ने भी लिखा था । इस वंशावली के विषय में मेगस्थनीज़ ने लिखाऐ कि इसमें बकस के समय से अलगज़ेंडर–चन्द्रगुप्त के समय तक 154 राजाओं की गणना है, जिनके राज्यकाल की अवधि 6451 वर्ष तीन मास है । ओरायन इतना और कहता है कि इस अवधि में तीन बार प्रजासत्तात्मक राज्य भी स्थापित हुए थे । इस वर्णन को कई एक विद्वानों ने कुछ मतभेद के साथ अपने-अपने ग्रन्थों में उद्धृत किया है । यह वर्णन सम्राट् चन्द्रगुप्त के समय का है । चन्द्रगुप्त को हुऐ 2337 वर्ष हो चुके । अतएव दोनों समयों को मिलाने से ( 6451+2337 😊 8788 वर्ष होते हैं जो मिस्र की सभ्यता से ( 8788 – 7516 😊 1272 वर्ष अधिक होते हैं । यदि मिस्र के पहले राजा से बारह सौ वर्ष पूर्व तक भी वहाँ की सभ्यता को मान लें तो भी वह यहाँ की सभ्यता से प्राचीन नहीं हो सकती । इसी प्रकार एक दूसरे ऐतिहासिक प्रमाण से भी आर्यो की लिखित सभ्यता 8000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन सिद्ध होती है । इतिहास के पढने वाले जानते हैं कि *’ दबिस्थान ‘* नामक लेख जो कशमीर में मिले हैं उनमें *बेक्ट्रिया* में राज्य करनेवाले हिन्दू राजाओं की नामवली लिखी है । यह नामावली सिकन्दर तक 5600 वर्ष प्राचीन सिद्ध होती है । इन राजाओं के लिए महोदय ने लिखा है कि ये राजा निश्चय ही हिन्दू थे । इससे भी मिस्र की सभ्यता भारत की सभ्यता से प्राचीन सिद्ध नहीं होती, किन्तु अर्वाचीन ही सिद्ध होती है ।

      ऊपर मेगस्थनीज़ द्वारा उद्धृत जिह वंशावली का उल्लेख किया गया है, वह कितनी सही थी, इसका अनुमान इसी से हो सकता है कि उसमें महिने तक भी दिये हुए हैं । इसके अतिरिक्त उसमें यहाँ चरितार्थ हुई तीन बार की प्रजासत्तात्मक शासनप्रणाली का भी वर्णन है, जिससे एक तो यह बात अच्छी प्रकार सिद्ध हो जाती है कि उस वंशावली के समस्त राजा इसी देश में हुए हैं । ऐसा नहीं कि आर्यों के कही बाहर से आने का भी समय उसी में मिला हो, दूसरे प्रजासत्तात्मक जैसी उदार नीति का भी पता मिलता है, जिससे आर्यों की तत्कालीन उच्च सभ्यता में कोई शंका नहीं रह जाती । *मिस्र की सभ्यता के लिए विद्वानों के ह्रदय में जो स्थान है वह वहाँ के पिरामिडों और उनमें रक्खी हुई ममी ( मुर्दों ) के ही कारण है, परन्तु स्मरण रखना चाहिए कि उनकी इस सभ्यता मे भारतीय आर्यों का सहयोग है । मिस्र के इन मुर्दो मे जो नील का रंग लगा हुआ है और इन मुर्दों को गाडंने में इमली की लकडी काम में लाई गई हे वे दोनों पदार्थ वहाँ इसी देश से गये हैं । नील और इमली भारत के सिवा संसार में और कहीं होती ही नहीं, इसीलीए नील को इण्डिगो कहते हैं, जिसका अर्थ भारतीय होता है और इमली को टेमेरिणड कहते हैं, जो तमरेहिन्द का अपभ्रंश है ।*

      *इस नील रंग का व्यापार मिस्र की जिस नदी के द्वारा होता था उसे भी यहाँ नील ही कहते थे जो वहाँ नाइल के नाम से अबतक प्रसिद्ध है । जायसवाल महोदय कहते हैं कि भारतवासी नील नदी को जानते थे । हम कहते हैं कि यहाँवाले नील नदी को जानते ही न थे, प्रत्युत उन्होंने ही उसका नामकरण भी किया था ।* इसलिए मिस्र की सभ्यता भारतीय आर्यों की सभ्यता से प्राचिन नहीं प्रत्युत वह भारतीय इतिहास के अंतिम राजवंश से भी नवीन है । ऐसी दशा मे उन सभ्यता की तुलना वेदों के समय के साथ नहीं हो सकती । वेद तो आर्यों के प्रारम्भिक इतिहास से भी पूर्व के हैं, अतएव वे न केवल मिस्र की सभ्यता से ही प्रत्युत संसार की समस्त मानवीय सभ्यताओं से भी अधिक प्राचीन हैं ।

  3. सत्य को प्रामाणिकता के साथ स्थापित करने वाला एक शोध पूर्ण लेख है।
    कृपया नमन स्वीकार करें.

  4. अरे यह website जाली है इसपर केस करो । आर्य विदेशी थे।

    1. आर्य विदेशी थे तो देशी कौन, इस्लामिक या जयभिम थे ?

    1. बिना तथ्यों के यदि आप मानना चाहें तो आप स्वतंत्र हैं
      लेकिन बुद्धिमान पुरुषों के लिए ऐसा उचित नहीं है

  5. एक दम बकवास लेख हे इसमे कोई सच्चाइ नही हे सच्च तो यह हे की आर्य विदेशी हे तुम लोग कितनी गप गोले लगाओ लेकिन हकीकत छुप नही सकती dna टेस्ट मे साबित हो चुका हे !

  6. Apki tadap mein samaj sakata hu writer ji aap kahate he ki harapa culture arayo ka tha jis me apane incomplete praman bhi diye par mein ek baat aap se pouch ta hu ki harapa culture mein payee gayee Lippi bhasha araya ab tak kunye nahin pad payee yaadi harapa culture arayo ka hey tu Lippi bhi ani chahiyee padkar dikhao rahi baat haam mulnivasi dalit adivasi ki aryao ne hamein harane ke baad humse shiksha ka adikar chin liya is liye hum hamari harapa Lippi nahin paad sakte arayon ke DNA aur hum mulnivasi dalit advasi ke DNA alag kunye baatyegee aap ?

    1. Priy Mitra,

      1. prarambh men sabhee jagah vaidik dharm hee thaa aur purane aalekhon men Brahmi lipi men likha AUm milta hai jo swastik ki shakl ka hai
      yah hadappa men bhee hai aur anya pracheen aalekhon bartanon aadi par bhee hai

      2. rahee aaryaon aur Daliton ke DNA alag hone ki baat to bandhuwar DNA to pratyek ke alga hote hein

      3. rahee aapki dalit walee bat to Mitra varn vyavastha ko karm aadharit hotee hai janm aadharit naheen . jo ek varg vishesh ne janm aadharit varn vyavastha ka palan kiya hai wo galat hai vaidik dharm to karmanusar varn vyavastha ko manta hai.

      Maharshi ved vyas, Rishi Jabal, Valmiki aadi anekon udaharan hein jo ninm kul mne utpanna hokar bhee brahmman kahlaye

      aur kitane aise hein jo brahamman kul men utpanna hokar bhee karmon ke anukul n hone ke karan patit huye jaise brahaman aadi

      1. Priya mitra tumhara comment padha aap kahate he ki sabse purani sanskriti vedic hey chalo maan bhi liya lekin vedic sanskriti ki bhasha sanskut hey harapa culture main payee gaayi Lippi Sanskrit nahin hey yaadi woo Sanskrit hey too vedic log usee Q nahin paad sakte ? Iska kya jawab hey aap me pass rahi baat dalit adivasi mulnivasi logo ke DNA ki medical science main Y chromosom DNA hey jise ek pita hi apne bhachu ko deta hey yee DNA dalit aur adivasi ka alag aur aryon ka alag Q hey is sandarb main aap Dr Michael bamshad ka shoudh avashya paadee aryo ka Y chromosum DNA Eurasia ke nikat Pradesh jise black sea bhi kaha jaata he waha rehne wale logo ke DNA see Q 99.99% milta julta hey iska kaya jawab hey aap ke paas? Agar arya bhartiya hey too unka DNA hum mulnivasi logo see Q nahin milta hey ? Batayege aap

        1. Priya mitra ,

          Hadappa sanskriti jisakee aap bat kar rahe hein wo madhya kal ki hai us samay brahmi lipi ka prachalan tha .
          brahmi lipi ke likhe kai shilalekh milte hein

          rahee sanskrit ki bad to madhya kal se purv pashan kal ke jo abhilekh hein wo aap dekh leejiye ki wo kish bhasha men hein
          🙂

          rahee aapki Aryaon ke bahar se aane ki bat to bandhuwar aisa koi praman to do kahan likha hua hai

          hamara itihas to varshon purana hai kisee prachin itihas ki pustak men to isaka varnan hoga 🙂
          aisa naheen hai

          aapko fir bata deta hun aarya aur anarya ye donon gun wachak shabd hein
          yadi mere karm uttam hein to men aarya hun anyatha men patit hokar anarya ho jaunga aur aapke karm uttam hein to aao aarya kahlayenge anarya naheen

          kaun aisa hoga jo aarya arthat uttam karm aacharan vyvahar wala banana aur kahlwana naheen chahega

          Namste

          1. Nalanda University me bharat ka poora itihaas pada tha par wo aryans ko raas nahi aaya isliye use jalwa diya gaya . I hope you know this. Arya videshi hi the or arya jaati ek khanabadosh jaati thi jo asal me bharat me aakar hi civilized hue the. Dravids aur Shudra bharat ke moolniwasi hain. Yahi sach hai.

            1. kis aaryan ne nalanda university ko tudwa diya jala diya us aaryan kaa naam to batlao ji. aur aapke hisaab se aary kinhe bolte hain yah batlana ji. yah bhi bhi batlana kaun se mat ko maante ho fir us vishay par charcha karenge. dhanywaad

      2. Pr tum logo ne to varn vyawtha ka khub fayda utaya. janm se thappa lga diya or esa hjaro varso se ho raha hai.
        Soch to deko inki insan insan k chune se apavitra ho jata hai.
        Brahamno ki kartuto pr to karodo panne bhar do km hai bhai.
        Bhagwan tumhe full hyzenic teknik se bnata hai turant apavitra ho jate ho
        jati tumne bnai nafrat tumne bhari. grna tum kro. pani tum na pine do. mandiro pr tum na jane do (aaj bhi). brabri pr tum na betne do.
        or bat krte ho b.r. ambedkr ki unhone apni jati k bare me hi socha. obc or st ko fokat me arkchan diya.

        1. ओम जी
          पहली बात अम्बेडकर साहब ने खुद लिखा है “शुद्र कौन थे ” में की सभी की माता पिता एक थे | फिर आप अपने मसीहा को ही गलत साबित कर रहे हो अम्बेडकर साहब को | दूसरी बात यह बतलाना वर्ण किसे बोलते हैं ? वर्ण वयवस्था किसे बोलते हैं ? एक बात और बतलाना जब एक ही माता पिता से सभी हुए जैसे आपके मसीहा अम्बेडकर साहब ने खुद स्विकार किया है तो आप उनको गलत कैसे बोल रहे हो ? थोडा अपनी अक्ल लगाओ जी |क्या एक माँ बाप से अलग अलग जाती बन जाती है ? ये दलित क्या होता है जब खुद अम्बेडकर साहब ने माना है की सबके माता पिता एक हैं तब तो सभी दलित हुए भाई | किस ग्रन्थ में दलित आया है ? यह राजनेताओ का राजनीति का कारण है और इस कारण इसका फायदा उठा रहे हैं नेता | आप बताओ ब्राह्मण किसे बोलते हैं क्षत्रिय किसे बोलते हैं वैश्य किसे बोलते हैं और शुद्र किसे बोलते हैं ? हमारी वर्ण वयवस्था की लेख पढ़ो सब शंका समाधान हो जायेगी | आपके जवाब की प्रतीक्षा में जो सवाल मैंने पूछे हैं | धन्यवाद |

        2. Om JI

          Lagta hai aapko tahyon ka pata naheen hai.
          Jin Dr. Bhi Rao Ambedkar ji ki aap bat kar rahe hein jara malum to karo unhen scholar ship kisane dilwayee
          Wo mumbai men kisake ghar rahe
          unki sahyata kisane ki wo aarya samajee hee to the

          Jara Dr. Ambekar ke Swami Shraddhanand ji ke bare men kahe gaye wachan to dekhiye ki jitana aur wastavik hit swami shradhdanand ji ne Daliton ka kiya hai utana kisee ne naheen kiya wo daliton ke bade hitaisee the “

  7. Isme jitni v parman diya gaya h. Ki arya bedasi nahi h, jaida tar parman. Ved, Ramayan, mahabhart, se di gai h. Scientifically bhout kam h. Ved, Ramayan, mahabhart adi sabko Brahmano ne likha tha. Ye Sab ek kori kalpana h, ye Sab likhne ka matalb tha ki mulniwasio ka sosan kar sake ar Brahman (bedsi. Dhurt, chalak, behsijanwar) yes ki jindge ji sake. ar iska parman. Brahman,chahe koi v ho wo brhaman h, xhatriy koi v xhatriy, isi tarh vesyai. Parantu jab bat sudar ki ati h to 6743 cast m bant di gai. Q 2500 sal se mulniwasio ko siksha se dur, astar vidiya se dur unke apne jamin se dur, ar to ar. Sc, st, obc, ko mandir m Jane tak se dur rakha gaya unke per mandir m pad gaya to mandir apbitar ho jayega, insab vato se v pata chalta h ki arya vedsi the. (India) m ane ka matalb srif sasan karna ar mulniwasio ko lutna tha.

    1. बंधुवर वेद तो ईश्वरीय ज्ञान है वो किसी ने लिखा नहीं इश्वर प्रदत्त है .
      रामायण की चर्चा कि है वो वह वाल्मीकि ऋषि ने लिखी है
      महा भारत महर्षि वेद व्यास कृत है
      कर्मों के आधार पर वर्ण का निर्धारण होता है अतः निम्न कुल में उत्पन्न होने के बाद भी ये महर्षि कहलाये
      इसमें कोई संदेह नहीं
      आपकी मंदिरों में प्रवेश कि बात तो ऐसा करना गलत है
      यदि कोई शुद्र है तो वह अपवित्र नहीं है ऐसा ही शाश्त्र सम्मत है
      और शुद्र तो व्यंजन पकाने का कार्य करते आये हैं
      यदि वह अपवित्र हैं तो ऐसा क्यों ऋषि दयानंद ने भी यही लिखा है

  8. Aray wo bedsi log the jisne mulniwasio ke khoon 2500 Salo tak chusa, mulniwasio ke purbaj k hatiyare h ye bedsi,

    1. aap ye kis aadhar par kis praman ke aadhar par kah rahe hein

      aarya shabd to sabhya hone ka prateek hai kya aap arya/sabhya naheen hein ?

  9. 5ooo varsh se araya anaraya ke beach youdh chalta ah raha hay harappa kaal mein arya apne aap ko dev kahate the aur mulnivasi dalit adivasi OBC wo ayra us waqat hum logo ko asur , rakshas kahate the ye youdh hazaro saal take chalete aa raha hey aur aab bhi chaal raha hey aur aab ye yudh vicharik yudh mein rupantar huva hey agar hamare BABASAHIB AMBEDKAR NAA hote too aaj bhi hum achut , avarn hote yee desh hamahara hum he is desh ke mulnivasi hey koi hum par prashna Kare hum tyar hay hamara DNA check karke ke dekho hamara DNA is desh ke adivasi samaj see milta hey Dalit adivasi ye log rang see kale hey Q ? ki ye log ek vansh ke hay aur woo vansh hay NAAG vansh woo naag vansh jiska raaj tha hadappa kaal mein yaa kahe sindhu kaal mein us waqat vedsh aye huve EURASIAN logo ne chal aur kapat see hum mulnivasi yo kaa raaj hadap liya lekin aab baas hum mulnivasi aab jaag gayye hay aab hum mulnivasi hamare desh ki satta hamare haat mein lekar rahege is mein hamare mulnivasi Mahan SAMRAT ASHOK ka raaj phir se ayega aur akar hi rahega JAY MULNIVASI JAY BHIM JAY JUMBOO DEEP

  10. बहुत अच्छी जानकारी दी है अापने इस पोस्ट में पढ़कर अच्छा लगा
    धन्यवाद

  11. आर्य बैसा ही सभ्य हे जेसा अंग्रेज था जो अपने को सबसे उत्तम मानता था

    1. आर्य शब्द का अर्थ ही श्रेष्ट होता है बंधू
      स्वयम के मानने और न मानने से कोई आर्य नहीं होता अपितु उसके श्रेष्ठ कर्म उसे आर्य बनाते हैं

  12. 1.मूलनिवासी कौन होते है और ये किस देश के मूलनिवासी थे ?

    2. मूलनिवासीयों की भाषा क्या थी और वो किस धर्म को मानने वाले थे या मानते हैं ?

    3. मूलनिवासी किस जाती से सम्बंधित थे ?

    4. मूलनिवासी मुसलमानों को भी विदेशी आर्यो जैसा ही मानते है क्या ,क्योंकि मुस्लमान भी विदेशी थे ?

    5. इतिहास में ऐसा वर्णित है मुगलों और अंग्रेजो ने भी भारत में रहने वालों का बहुत शोषण किया है ,तो मूलनिवासी केवल आर्यों से इतनी नफरत क्यों करते है ?

    6.यदि आर्यों से मूलनिवासियों से शिक्षा का अधिकार छीन लिया था तो पूजनीय रविदास जी संत कैसे कहलाये ?

    7. 1835 से पहले एक अंग्रेज ने कहा था के उसने भारत के सब क्षेत्रों में घुमा है और वहां उसने एक भी भिखारी, चोर नही देखा और 97% साक्षरता मिली उसको भारत में ,तो क्या केवल 3 % ही मूलनिवासी थे भारत में ,यदि 3 % से ज्यादा थे तो 97 % शिक्षित लोगों में कौन लोग शामिल थे ?

    8. पूजनीय भीम राव आंबेडकर जी के गुरु एक ब्राह्मण थे और उनकी पहली पत्नी भी ब्राह्मण थी और गायकवाड़ राजा ने अंबेडकर जी को स्कोलरशिप देकर विदेश पढ़ने भेजा था ,आंबेडकर जी के ब्राह्मण गुरु की की सिफारिश पर और भीमराव आंबेडकर जी को ब्राह्मण गुरु ने अपना उपनाम अम्बेडकर भी भीमराव जी को दिया ।

    इसकी चर्चा कोई मूलनिवासी नही करता जो अपने आप को अम्बेडकरवादी कहता है ।

    कृपया जूठ का प्रचार बंद करे और जातिगत ज़हर फैला कर देश को बर्बाद ना करें।

    सादर
    राहुल भारत

    1. fir jmin jaydad. vyapari. mandiro madho k karta dharta. sankryachay. sb uper cast hi kyu hai. jb hmre bap dada sb pade likhe the to unki buddi kya khas charne gai thi jo jyadatr dalit garib or anpad hai. 1000jaro salo se jb hm sampann the pade like the to hmne azadi ka bad hi kyu thodi bahut tarkki ki hai……
      bate kahi or fek bhai…

      1. ओम जी
        पहली बात यह की मूर्ति पूजा करना छोडो मूर्ति पूजा वेद के आधार पर गलत है | दूसरी बात बतला दू कई ऐसी मंदिर हैं जहा दूसरी कास्ट के ही भी होते हैं | खैर उन पाखंडो को छोडो और सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटो | वेद की ओर लौटो | वेद में कहीं जाती नहीं है | उसमे वर्ण वयवस्था है | आप हमारे वर्ण वयवस्था पर लेख पढ़े आपको सारी अज्ञानता दूर हो जायेगी | एक बात बताओ जी वाल्मीकि जी पराशर जी क्या तरक्की नहीं किये थे ? थोड़ा उनके बारे में भी जानकारी देना | यहाँ तक आप जिसे खुद अपने मसीहा अभी मानते हो अम्बेडकर साहब को उन्होंने खुद लिखा है “शुद्र कौन थे ” में सभी के माता पिता एक ही थे | फिर जाती कैसे बनी | फिर जब सबके माता पिता एक हैं तो जाती अलग कैसे हो गयी | जाती का क्या मतलब होता है यह बतलाना | क्या किसी ग्रन्थ में दलित सब्द आया है यह भी दिखाना | खुद को दलित बोलकर खुद अपने आपको नीचा दिखाते हो | सभी आर्य हैं इस बात को समझो | धन्यवाद

    2. राहुलजी
      आपकी पोस्ट आज मेने पढी
      आपके विचार से बिलकुल सहमत हूँ

  13. Dosaron ko dosh dene wale hi arayans hote hain aap log bhartiya nahi the aur na honge kyonki aap ne kud ko bada kehkar dosaron chota batana hi videshi mol ka tark hota tha wo aap log aaj tak Ker rahin hai

    1. रवि कुमार जी
      आप जैसे ग्यानी से मैं कुछ सवाल करना चाहता हु जिससे मुझे कुछ ज्ञान की प्राप्ति हो सके | फिलहाल अभी एक ही सवाल कर रहा हु | जवाब मिलने पर और भी सवाल करूँगा |आप यह बताओ की भारत के कितने नाम है और यह नाम किन कारणों से पड़ा | और दूसरी बात यह की मैं यह जानना चाहता हु की आपका मत मजहब क्या है जिससे उसी तरह से चर्चा की जाए | उम्मीद करता हु की आप यह बताने की कोशिश करेंगे भारत के कितने नाम हैं और क्यों नाम पड़ा | आपके जवाब की प्रतीक्षा में |
      धन्यवाद

  14. आर्य विदेशी नहीं थे , ये सब अंग्रेजो और वामपंथियो के इतिहास पढ़ पढ के पागल हो गए है , आर्य अगर वदेशी होते तो वेदों पर चलने का नहीं बोलते

    1. सही कहा भाई हडप्पा संस्कृती भी आर्य कि शाखा थी पर लोग उसे द्रविड कर रहे है

  15. कुछ रचनाकार मध्य एशिया से चारे की खोज में आये हुए विदेशियों को आर्य कहते है . कहते है की अर्यो ने द्रविनो को पीटकर कुछ को अफगानिस्तान , ईरान भगा दिया कुछ को दक्षिण भारत की ओर भगा दिया . यह अलौकिक सत्य है की मध्य एशिया से आये हुए ब्राहमण , अहीर , आभीर , ईत्यादी अनेको भारत में निवास करती अनेको जातीय नहीं हो सकती बल्कि आगंतुको की जाति विदेशी रही होगी किन्तु रचना करो के वर्गीकरण में एकही जाती के एक समूह को द्रविण और दुसरे समूह को आर्य सूचि बद्ध किया गाय है .विदेशी आर्यो की जाती अबतक किसी ने नहीं बताया है . जबतक जाती नहीं बताई जाती विदेशी कहना देश द्रोह है .

    1. क्या मलेच्छरो को आर्य कि संग्या देना ठिक है जिन का कोई धर्म न था भाई वेद पढो विदेशी मल्लेच्छरो कि कथा नही कियोकि वे स्वयम नास्तिक है

  16. अगर आर्य युरोप से आए होते तो वे माँसाहारी होते क्योकी यूरोपिय लोग माँस खाते है आर्य(सिर्फ कहने के लिए) बराहमण कैसे हुए क्योंकि बराहमण माँस नहीं खाते

    1. विशाल जी
      आर्य मतलब श्रेष्ठ | और वर्ण वयवस्था के आधार पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुत्र को आर्य बोला जाता है जो कर्म के आधार पर बनते हैं ना की जाती के आधार पर |
      धन्यवाद जी आपका

  17. पहली बात यह समझो कि ,
    【१】आर्य शब्द को यूरोप ने सबसे पहले कहां से लिया ?
    【२】 भारत आने से पूर्व वे इस इस शब्द से परिचित थे क्या ?
    【३】और यह आर्य शब्द है किस भाषा का ?
    【४】और क्या कोई यह प्रमाणित कर सकता है कि आर्य एक जाति थी ?
    【५】और अगर ये वास्तव में जाति थी तो जिस प्रकार संस्कृत साहित्य में हूण , कुषाण , म्लेच्छ , यवन , नाग , किन्नर , गन्धर्व , इत्यादि जातियों का वर्णन मिलता है। द्रविड और अनार्य जातियों का उल्लेख क्यों नही मिलता ?
    【६】क्यों द्रविण शब्द को एक क्षेत्र , प्रदेश विशेष व अनार्य को एक अशिष्ट लोगों के लिए प्रयोग किया गया। जाति के लिये क्यों नही ?
    【७】क्यों आर्य शब्द का अर्थ संस्कृत में श्रेष्ठ दिया गया है ? जब ये एक जाति थी तो जाति अर्थ भी होना चाहिए था ?
    【८】संस्कृत के किसी ग्रन्थ में ये उल्लेख क्यों नही मिलता कि हमारे पूर्वज बाहर से आये ?

    ■ये प्रश्न उन दलितवादियों , शोषित , और पिछडेपन का प्रलाप अलापने वालों के लिए। उनके द्वारा लिखे गये ये पोस्ट उनकी बुद्धि और उनकी सोच का दायरा बताते हैं। कि ये लोग वास्तव में शारीरिक और आर्थिक रूप से पिछडे हुये नही है वल्कि मानसिक रूप से पिछडे हुये लोग हैं। जो कि समाज में वैचारिक और बौद्धिक आतंकवाद फैलाने लगे हुये हैं।

    1. fir jmin jaydad. vyapari. mandiro madho k karta dharta. sankryachay. sb uper cast hi kyu hai. jb hmre bap dada sb pade likhe the to unki buddi kya khas charne gai thi jo jyadatr dalit garib or anpad hai. 1000jaro salo se jb hm sampann the pade like the to hmne azadi ka bad hi kyu thodi bahut tarkki ki hai……
      bate kahi or fek bhai…

      1. ओम जी
        पहली बात यह की मूर्ति पूजा करना छोडो मूर्ति पूजा वेद के आधार पर गलत है | दूसरी बात बतला दू कई ऐसी मंदिर हैं जहा दूसरी कास्ट के ही भी होते हैं | खैर उन पाखंडो को छोडो और सत्य सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटो | वेद की ओर लौटो | वेद में कहीं जाती नहीं है | उसमे वर्ण वयवस्था है | आप हमारे वर्ण वयवस्था पर लेख पढ़े आपको सारी अज्ञानता दूर हो जायेगी | एक बात बताओ जी वाल्मीकि जी पराशर जी क्या तरक्की नहीं किये थे ? थोड़ा उनके बारे में भी जानकारी देना | यहाँ तक आप जिसे खुद अपने मसीहा अभी मानते हो अम्बेडकर साहब को उन्होंने खुद लिखा है “शुद्र कौन थे ” में सभी के माता पिता एक ही थे | फिर जाती कैसे बनी | फिर जब सबके माता पिता एक हैं तो जाती अलग कैसे हो गयी | जाती का क्या मतलब होता है यह बतलाना | क्या किसी ग्रन्थ में दलित सब्द आया है यह भी दिखाना | खुद को दलित बोलकर खुद अपने आपको नीचा दिखाते हो | सभी आर्य हैं इस बात को समझो | धन्यवाद

  18. यह सत्य है कि आर्य का मुल निवास हिमालय के आस पास था क्योकि जिन महान मुनियो ने वेद लिखे वे मुलत:हिमालय के वासी थे यदि किसी को ऐतराज हो तो स्वयम हिमालय मै आये आर्य धरती के उस छोर पर रहते जहां धरती अंत समझा जाता था ू कूल्लन पीठ को वेदो मै धरती पर रहने योग्य अंतिम स्थान वताया है और वहां आज. देव शासन का प्रत्यक्ष उदाहरण मलाणा जैसे गांव है यदि किसी को कोई संदेह है तो स्वयम आप देवताओ से वहां ईस बात की पुष्टी कर सकते है यदि अम्बेडकर जैसे स्वार्थी लोग जिन्होने पुरे जीवन मै अपनी जाति का भले के सिवा शेष भारत को अनदेखा किया लोग कैसे सत्य को स्वीकार करते क्योकि जिन आर्यो ने हजारो बर्षो से उन्हे विदेशी आक्रमणो से बचाया आज वह समाज उन्हे विदेशी कैसे कह सकता है कारण मात्र लोगो को उन कि संस्कृती से दुर वह धर्म के विरूध करना था ताकि वे विदेशी शासन का सदा समान करे मकैले जिन होने हमे ये दिया जो हम आज है वॉह,जिससे लोग अपनी ही रिवाजो वह भाषा से नफरत कर रहे क्या खूव है साधारण सि बात है हम तो आज ः भी पश्चिम संस्कृती के गुलाम है तो भला अपने मालिको कैसे नाराज कर सकते थे

    1. तिलक जी से क्या पूछना चाहिए ? थोडा जानकारी देना जी

  19. देशी विदेशी क्या है , ये तो लोगो की संकीर्ण मानसिकता है पॄथ्वी किसी के बाप की जागीर नही…हम जहाँ चाहे रह सकते है । प्रक्रति ने भूमि बँटवारा नही किया है ।

  20. यह तिलक महोदय कौन थे……

    बाल गंगाधर तिलक तो नही।

  21. Nalanda University me bharat ka poora itihaas pada tha par wo aryans ko raas nahi aaya isliye use jalwa diya gaya . I hope you know this. Arya videshi hi the or arya jaati ek khanabadosh jaati thi jo asal me bharat me aakar hi civilized hue the. Dravids aur Shudra bharat ke moolniwasi hain. Yahi sach hai.

    1. janab pahle yah maalum karo nalanda ko kisane jalwa diya. itihaas dekho itihaas ki jaankaari lo. fir charcha karna. hawa me baaten karne se kuch nahi hota. pahle yah maalum karo kisane ise tudwaya. uska naam to pahle batla do ji. fir aage charchaa karenge is baare me. aur apana naam bataye to achha hoga ji.

        1. krishn ji
          yah sawal aapse nahi maine in mahashay (Proud Dravid). se puchha tha. aur aapne jo bataya hai wah sahi naam nahi hai. haa yah baat sahi hai ki uska surname khilji thaa yaa bole to hain. aur isse bhi badi ascharay hogi jisane nalanda university ko jalaya uske naam par aaj bhi bihaar me district hai. main naam bhi jaanta hu aur uske naam ke baad pur bhi laga hai example (balraam ke naam par shayad balraampuri , usi tarah uske naam ke baad pur laga huwa hai bihaar me, ) kyu nahi us sahar kaa naam badal diya jaa raha hai jisane nalanda university ko jalaya thaa. aap bologe to us sakhsh kaa naam bhi batla dunga magar pahle yah naam to naam lu Proud Dravid ji ka kya naam aata hai . wah kise bolte hain ki kisane nalanda university ko jalaya. dhanywaad ji aapka.

  22. सही post है बुद्धिमान इतने से ही समझ जायेंगे बाकि ऐसे ही बड़बड़ाते रहेंगे। अगर आर्य बहार से आये है तो अभी भी उनकी भाषा मतलब संस्कृत भी वहाँ बोली जाती होगी जहा से वो आये लेकिन वो तो हमसे सिख रहे है। और बाकि ये जो लोग जाती पाति की बात करते है वो सब वोट बैंक है राजनीती है देश को अपना ना समझना है।

  23. ब्राह्मणो को f.i.r करनी चाहीए। बीना सोचे समजे कुछ भी बोल देते हे। अभीन्न अंग हे उसे केसे विदेशी घोषित कीया??? साबित करके दीखाओ।

    1. pahle kis mat ke ho yah batalana ji. aur aary kise bolte hain yah jaankari dena. bachho jaisi baat karna sahi nahi manywar.

      1. विशाल जी,
        राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुशंधान एंव प्रशिक्षण परिषद के रिपोर्ट ने बताया की ब्राम्हण प्राचीन काल में गोमांस खाते थे । कैसे आप बोल रहे हो की ब्राम्हण मांस नहीं खाते?

        1. और मैंने बहुत से ब्राम्हण को साथ में मांस खाते देखा है।मैं ने पूछा ब्रम्हं लोग तो मांस नही खाते तो फिर आप क्यों कहा रहे हो कहने पर बोलता है किस में लिखा है कि ब्राम्हण मांस नहीँ खाते।अगर ब्राम्हण यही के है तो आप लोगो को असमिज,झारखंडी,मणिपुरी,नागा संताली ,गोंडी क्षेत्रीय बोली क्यो नही आती ?हिन्दी ही भाषा क्यो आती है । इतना श्रेष्ठ समझते हो तो ये धर्म के नाम पर क्यो लूट रहे हो मंदिरो मे बैठकर,क्यों अंधविश्वास फैला रहे हो क्या राम राम बोलने से दिन बर का खाना मिल जायेगा हमारे देश मे लक्षमी देवी है तो बाकी लोग गरीब क्यो है सरस्वती है तो देश मे अशिक्षा क्यों है ।ब्राम्हणवाद फैलाना बंध कीजिए और ये नही कि “राम राम जपना पराया माल अपना”
          लूट सके तो लूट ले,राम नाम की लूट।अंत समय पछतायेगा,जब प्राण जायेगा छूट।obc st st भारत के मूल निवासी है ।अब आप लोगो के मंसूबे पूरा नही होगा ।आप लोग सयुक्त राष्ट्र संघ के फैसले से तिलमिला गए हो।

          1. “और मैंने बहुत से ब्राम्हण को साथ में मांस खाते देखा ”

            बंधुवर किसी का वर्ण कर्म से निर्धारित होता है जन्म से नहीं
            यदि कोई ऐसा करता है तो वह शुद्र होगा

        2. मांस कभी आर्यों का आहार नहीं रहा
          यदि कोई कहता है तो झूठ है

    1. गलत है
      हम नहीं करते न समर्थन करते हैं अपितु इसे हटाने के लिए प्रयासरत हैं

      1. रीश्वा जी ये जातिवाद छोड़ीये और इंसानियत पर आइये।सयुक्त राष्ट्र संघ ने तो घोषित कर दिया कि obc st scमूल निवासी हैं और ना ही उनकी संस्कृति हिन्दू धर्म की संस्कृति से मिलती हैऔर ना ही ये हिन्दू है ये हाई कोर्ट ने भी कई बार फैसला सुनाया है।आप लोग जबरदस्ती हिन्दू बनाने के लिए RSS जैसे संघ का सहारा ले रहे हो।

        1. आप लोगो ने तो कबीर की जाति भी चोरी की अब आरक्षण का विरोध कर रहे हो ।बाबा साहब ने तो समाज में व्याप्त जातिवाद,अंधविश्वास ,उच्च -नीच शोषण ,कुप्रथाओं को देखकर संविधान बनाये थे और दुनिया ने माना कि भारत का संविधान सबसे सर्वपरी है।संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो अब ब्राम्हण को तो सभा मे आने के लिए इनकार कर दिया क्योकि वे जातिवाद उच्च-नीच,छुआछुत भेदभाव करते है और बोले जहां ब्राम्हण है वहां विकास मुमकिन है और हमेशा ब्राम्हणवाद से लढ़ते रहना चाइये जैसे गौतम बुद्ध बाबा साहब और कई महापुरुष लडे।

          1. Tulsee ram ji

            kya aapko pata hai ambedkar ji koi videsh padhne ke liye kisne bheja?
            kya aapko pata hai wo Mumbai men jis makan men rahe wo kiska tha

            wo aarya samaji ka tha

            yadi aapko jankari naheen to Swami shraddhanad ji ke bare men diya Ambedkar ji ke vaktavya dekh leejiye

        2. “आइये।सयुक्त राष्ट्र संघ ने तो घोषित कर दिया कि obc st scमूल निवासी हैं और ना ही उनकी संस्कृति हिन्दू धर्म की संस्कृति से मिलती हैऔर ना ही ये हिन्दू है ये हाई कोर्ट ने भी कई बार फैसला सुनाया है”

          ye jhuth kisee aur ko jaake bataiyega

  24. बौद्ध मुस्लिम आर्य विदेसी हैं थे रहेंगे।
    जय सिंधु जय शिव

  25. Bhadva giri – sudr kabhi raja nahi ban sakta
    nothing is immpossible ..
    manusmruti k isi niyamo ne vanchit rakha raja shahi se..
    sudr kabhi dhan nai jama kar sakta ..
    aur 1 bhadvagiri.. chuttiyappppa
    dekho 1 aur chuttiya pppa
    sudr kon pairo se paida huye?
    land fakiri.. hajaro salo se chalayi gayi..
    1 aur chuttiyapppa
    sudr kabhi gnan nahi grahan kar sakta.
    chuttyapppa chuttiyapppa.. sala a😤😤😤😤😈😤😤😈😈😈😈😈😈

    1. वघेला साहब ये आपको गलत फहमी है

      वर्ण कर्म से निर्धारित होता है जन्म से नहीं
      ऐसे अनेकों उदहारण हैं जहाँ ऐसा हुआ है

    1. प्रमाण ?

      आपके आंबेडकर साहब आर्यों कि प्रशंशा करते थे
      आर्यों के मकान में रहे
      मुंबई का उनका पता देख लें

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