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क्या वेदों में जानवरों से हिंसा करना लिखा है ?

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अभी बहुत दिन नहीं हुए बिहार चुनाव के समय उठे गोकशी के मुद्दे के । तब कुछ स्वघोषित सेक्युलर पार्टियों ने तथाकथित सम्प्रदायी पार्टी भाजपा को हराने के लिए अपनी स्तर इतनी गिरा दी कि मान मर्यादा और लज्जा को ताक पर रख हमारे सनातन धर्म पर बेवजह लांक्षन लगाए । अब जैसे कि उदाहरण के लिए रघुवंश सिंह(राजद उपाध्यक्ष) ने मुस्लिम भोट के लिए यहाँ तक कह दिया कि प्राचीन भारत में ऋषि-मुनि भी गौमांस खाते थे । इसपर बहुत हंगामा भी हुआ था । लेकिन नाम ‘रघुवंश’ यानी श्री रामचन्द्र जी का वंश और कर्म शूद्रों से भी नीच! रघुवंश सिंह ने किस आधार पर यह कहा कि ऋषि-मुनि भी गौमांस खाते थे? कौन सी सद्ग्रंथ से ऐसा प्रमाणित करेंगे ? स्पष्ट है वेदों से तो नहीं लेकिन वाम मार्गियों के पुस्तकों में अवश्य ही मिल जाएगा । वैसे यह कोई नई बात नहीं । एक तरीके से इन सब बयानों के लिए हम भी जिम्मेदार हैं । बहरहाल कभी-कभी रजरप्पा के काली मंदिर, नेपाल के एक मंदिर आदि में दी जाने वाली बलियों पर सवाल उठाया जाता है कि क्या सनातन धर्म पशुओं पर अत्याचार करना सीखाता है? तो इसका जवाब है की सनातन धर्म में कही भी इस तरीके की बात नहीं लिखा हुआ है । और जब वेदों में मंदिर के बारे में कुछ लिखा ही नहीं तो फिर मंदिर जाना और जानवरों को मारना कैसे सनातन धर्म का सीखा सकता है? तो अब यह भी सवाल उठता है की फिर ऐसी प्रथा फिर कहाँ से शुरू हुई तो इसका जवाब है पुराणों और वाममार्गियों के कुलार्णव से वो भी महाभारत के बाद जब सभी धार्मिक मर गए तब अलपबुद्धियों ने पुराण जैसे मिथ्याग्रन्थ बना डाले अपने पेट भरने को ।
फिर ये भी सवाल है कि वेदों में पशुओं से संबंधित क्या लिखा हुआ है? तो आइये जानते हैं कि क्या सही है क्या गलत!

वैसे तो प्रभु ने वेदों में बहुत जगह पशुओं से संबंधित उपदेश दिए हैं । लेकिन उन सबको यहाँ लिखना उचित और संभव भी नहीं होगा। इसलिए यहाँ संक्षेप में ही कुछका वैदिक मन्त्रों का वर्णन करेंगे । यजुर्वेद के तेरहवें अध्याय के 47-52 मन्त्रों में पशुओं से सम्बंधित वर्णन है ।

इमं मा हिँसीर्द्विपादं पशुं सहस्त्राक्षो मेधाय चीयमानः ।
मयुं पशुं मेधमग्ने जुषस्व तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ।
मयुं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु ॥ 47 ॥

पदार्थ :- हे (अग्ने) अग्नि के समान मनुष्य के जन्म को प्राप्त हुए (मेधाय) सुख की प्राप्ति के लिए (चीयमानः) बढ़े हुए (सहस्त्राक्षः) हजार प्रकार की दृष्टि वाले राजन्! तू (इमम्) इस (द्विपादम्) दो पद वाले मनुष्यादि और (मेधम्) पवित्रकारक फलप्रद (मयुम्) जंगली (पशुम्) गवादि पशु जीव को (मा) मत (हिंसी) मारा कर, उस (पशुम्) पशु की (जुषस्व) सेवा कर, (तेन) उस पशु से (चिन्वनः) बढ़ता हुआ तू (तन्वः) शरीर में (निषीद) निरंतर स्थिर हो, यह (ते) तेरे से (शुक्) शोक (मयुम्) शस्यादिनाशक जंगली पशु को (ऋच्छतु) प्राप्त होवे (ते) तेरे (यम्) जिस शत्रु से हम लोग (द्विष्मः) द्वेष करें, (तम्) उसको (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥ 47 ॥

भावार्थ :- कोई भी मनुष्य सब के उपकार करनेहारे पशुओं को कभी ना मारे, किन्तु इनकी अच्छे प्रकार रक्षा कर और इन से उपकार लेकर सब मनुष्यों को आनन्द देवे । जिन जंगली पशुओं से ग्राम के पशु, खेती और मनुष्यों को हानी हो, उनको राजपुरुष मारें और बन्धन करें ॥ 47 ॥

इमं मा हिँसारेकशफं पशुं कनिक्रदं वाजिनं वाजिनेषु ।
गौरमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ।
गौरं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु ॥ 48 ॥

पदार्थ :- हे राजन्! तू (वाजिनेषु) संग्राम के कामों में (इमम्) इस (एकशफम्) एक खुरयुक्त (कनिक्रदम्) शीघ्र विकल व्यथा को प्राप्त हुए (वाजिनम्) वेगवाले (पशुम्) देखने योग्य घोड़े आदि पशु को (मा)(हिंसीः) मत मार । मैं ईश्वर तेरे लिये (यम्) जिस (आरणयम्) जंगली (गौरम्) गौरपशु की (दिशामि) शिक्षा करता हूँ, (तेन) उसके रक्षण से (चिंवानः) वृद्धि को प्राप्त हुआ (तन्वः) शरीर में (निषीद) निरंतर स्तिथ हो, (ते) तेरे से (गौरम्) श्वेत वर्ण वाले पशु के प्रति (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे और (यम्) जिस शत्रु को हम लोग (द्विष्मः) द्वेष करें, (तम्) उसको (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥ 48 ॥

भावार्थ :- मनुष्यों को उचित है कि एक खुर वाले घोड़े आदि पशुओं व उपकारक वन के पाशुओं को भी कभी न मारें । जिनके मरने से जगत् की हानि और न मारने से सब का उपकार होता है, उनका सदैव पालन-पोषण करें और जो हानिकारक पशु हों, उन को मारें ॥ 48 ॥

इमं साहस्त्रं शतधारमुत्सं व्यच्यमानं सरिरस्य मध्ये ।
घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ।
गवयमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ।
गवयं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु ॥ 49 ॥

पदार्थ :- हे (अग्ने) दया को प्राप्त हुए परोपकरक राजन्! तू (जनाय) मनुष्यादि प्राणी के लिये (इमम्) इस (साहस्त्रम्) असंख्य सुखों का साधन (शतधारम्) असंख्य दूध की धाराओं से निमित्त (व्यच्यमानम्) अनेक प्रकार से पालन के योग्य (उत्सम्) कुए के समान रक्षा करनेहारे वीर्यसचेतक बैल और (घृतम्) घी को (दुहानाम्) पूर्ण करती हुई (अदितिम्) नहीं मारने योग्य गौ को (मा हिंसीः) मत मार व (ते) तेरे राज्य में जिस (आरण्यम्) वन में रहने वाले (गवयम्) गौ के समान नीलगाय से खेती की हानि हो उसको (अनुदिशामि) उपदेश करता हूँ, (तेन) उसके मारने से सुरक्षित अन्न से (परमे) उत्कृष्ट (व्योमन्) सर्वत्र व्यापक परमात्मा और (सरिरस्य) वृस्तित व्यापक आकाश के (मध्ये) मध्य में (चिन्वानः) वृद्धि को प्राप्त हुआ तू (तन्वः) शरीर मध्य में (निषीद) निवास कर (ते) तेरे (शुक्) शोक (तम्) उस (गवयम्) रोझ को (ऋच्छतु) प्राप्त होवे और (यम्) जिस (ते) तेरे शत्रु का (द्विष्मः) हम लोग द्वेष करें, उसको भी (शुक) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥49॥

भावार्थ :- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है । हे राजपुरुषों! तुम लोग को चाहिए कि जिन बैल आदि पशुओं के प्रभाव से खेती आदि कम; जिन गौ आदि से दूध, घी आदि उत्तम पदार्थ होते हैं कि जिन के दूध आदि से सब प्रजा की रक्षा होती है, उनको कभी मत मारो और जो जान इन उपकारक पशुओं को मारें, उनको राजादि न्यायाधीश अत्यंत दंड देवें और जो जंगल में रहने वाले नीलगाय आदि प्रजा की हानि करें, वे मारने योग्य हैं ॥ 49 ॥

इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम् ।
त्वष्टुः प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ।
उष्ट्रमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ।
उष्ट्रं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु ॥ 50 ॥

पदार्थ :- हे (अग्ने) विद्या को प्राप्त हुए राजन्! तू (वरुणस्य) प्राप्त होने योग्य श्रेष्ठ सुख के (नाभिम्) संयोग करनेहारे (इमम्) इस (द्विपादम्) दो पगवाले मनुष्य, पक्षी आदि (चतुष्पादम्) चार पगवाले (पशूनाम्) गाय आदि पशुओं की (त्वचम्) चमड़े से ढाँकने वाले और (तवष्टुः) सुखप्रकाशक ईश्वर की (प्रजानाम्) प्रजाओं के (प्रथमम्) आदि (जनित्रम्) उत्पत्ति के निमित्त (परमे) उत्तम (व्योमन्) आकाश में वर्तमान (ऊर्णायुम्) भेड़ आदि को (मा हिंसीः) मत मार (ते) तेरे लिए मैं ईश्वर (यम्) जिस (आरण्यम्) बनैले (उष्ट्रम्) हिंसक ऊँट को (अनुदिशामि) बतलाता हूँ, (तेन) उससे सुरक्षित अन्नादि से (चिन्वानः) बढ़ता हुआ (तन्वः) शरीर में (निषीद) निवास कर (ते) तेरा (शुक्) शोक उस जंगली ऊँट को (ऋच्छतु) प्राप्त हो और जिस द्वेषीजन से हम लोग (द्विष्मः) अप्रीति करें (तम्) उसको (ते) तेरा (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥ 50 ॥

भावार्थ :- हे राजन्! जिस भेड़ आदि के रोम व त्वचा मनुष्यों के सुख के लिए होती है और जो ऊँट भार उठाते हुए मनुष्यों को सुख देते हैं, उनको जो दुश्मन मारना चाहें, उनको संसार के दुखदायी समझो और उनको अच्छे प्रकार दण्ड देना चाहिए और जो जंगली ऊँट हानिकारक हों, उन्हें भी दण्ड देना चाहिए ॥ 50 ॥

अजो ह्यग्नेरजनिष्ट्र शोकात् सोऽ अपश्यज्जनितारमग्रे ।
तेन देवा देवतामग्रमायंस्तेन रोहमायन्नुप मेध्यासः ।
शरभमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ।
शरभं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु ॥ 51 ॥

पदार्थ :- हे राजन्! तू जो (हि) निश्चित (अजः) बकरा (अजनिष्ट) उत्त्पन्न होता
है, (सः) वह (अग्रे) प्रथम (जनितारम्) उत्पादक को (अपश्यत्) देखता है, जिससे (मेध्यासः) पवित्र हुए (देवाः) विद्वान् (अग्रम्) उत्तम सुख और (देवताम्) दिव्यगुणों के (उपायम्) उपाय को प्राप्त होते हैं और जिस से (रोहम्), वृद्धियुक्त प्रसिद्धि को (आयन्) प्राप्त होवें, (तेन) उस से उत्तम गुणों, उत्तम सुख तथा (तेन) उससे वृद्धि को प्राप्त हो । जो (आरण्यम्) बनैली (शरभम्) शेही (ते) तेरी प्रजा को हानि देने वाली है, उसको (अनुदिशामि) बतलाता हूँ, (तेन) उससे बचाये हुए पदार्थ से (चिन्वानः) बढ़ता हुआ (तन्वः) शरीर में (निषीद) निवास कर और (तम्) उस (शरभम्) शल्यकारी को (ते) तेरा (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त हो और जिस द्वेषीजन से हम लोग (द्विष्मः) अप्रीति करें, उसको (शोकात्) शोकरूप (अग्नेः) अग्नि से (शुक्) शोक बढ़कर अत्यंत शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे ॥ 51 ॥

भावार्थ :- मनुष्यों को उचित है की बकरे और मोर आदि श्रेष्ठ पशु पक्षियों को न मारें और इनके रक्षा कर के उपकार के लिए संयुक्त करें और जो अच्छे पक्षियों को मारने वाले हों, उनको शीघ्र ताड़ना देवें । हाँ, जो खेती को उजाड़ने हारे श्याही आदि पशु हैं, उन को प्रजा की रक्षा के लिए मारें ॥ 51 ॥

त्वं यविष्ठ दाशुषो नृः पाहि श्रृणुधी गिरः।
रक्षा तोकमुत त्मना ॥ 52 ॥

पदार्थ :- हे (यविष्ठ) अत्यन्त युवा! (त्वम्) तू रक्षा किए हुए इन पशुओं से (दाशुषः) सुखदाता (नृन्) धर्मरक्षक मनुष्यों की (पाहि) रक्षा कर, इन (गिरः) सत्य वाणियों को (श्रृणुधि) सुन और (त्मना) अपनेआत्मा से मनुष्य (उत्) और पशुओं के (तोकम्) बच्चों की (रक्षा) कर ॥ 52 ॥

भावार्थ :- जो मनुष्य मनुष्यादि प्राणियों के रक्षक पशुओं को बढ़ाते हैं और कृपामय उपदेशों को सुनते-सुनाते हैं, वे आन्तर्य सुख को प्राप्त होते हैं ॥ 52 ॥

इत्यादि मंत्रों से यह स्पष्ट हो ही गया होगा कि सनातन धर्म किसी भी निर्दोष पशु को मारने का उपदेश नहीं करता। तो फिर जो रजरप्पा आदि मंदिरों में निर्दोष पशुओं की हत्या होती है वह वेद विरोधी होने के कारण त्यजनीय है। मान्यताओं के नाम पर अपने तोंद भरने की अज्ञानियों पुराणियों की एक चाल है जिसमें लाखों लोग फंसे हुए हैं। तो अब यह सोचने की बात है कि निर्दोष पशु की हत्या से पुण्य कैसे मिलेगा? और जो पुराणी बोलें कि वे केवल दुष्ट पशुओं की बलि देवे हैं तो क्यों नहीं दुष्ट मनुष्यों की देते? इससे समाज का ही भला होवेगा पर तुम्हारा पेट नहीं भरेगा! अगर हम इस्लाम में पशुओं की हत्या का रोना रोते हैं तो पहले अपने अंदर की कुरीतियों को नष्ट करें। इसलिए जो निर्दोष जानवरों को मारे हैं और खाते हैं फिर बाद में गंगा में डुबकी मार पाप छुड़ाने जाते हैं वे सदैव नरक में ही गमन करते हैं। इसलिए सभी से अनुरोध है कि निर्दोष व अहानिकारक पशुओं को कभी प्रताड़ित ना करें और शाकाहार की ओर लोट आएँ। और जिनको अब भी खाना है जानवरों का वे इस्लाम या किश्चिन बन जाएँ। कृपया सनातन धर्म को बदनाम ना करें।

अभिषेक आर्य

7 thoughts on “क्या वेदों में जानवरों से हिंसा करना लिखा है ?”

  1. MANANIYE ARYA RIGVEDA 4/18/13 MEIN KOI DOG KI ANTARIYAN PAKA KE KHA RAHA HAI WO KYA HAI KRIPYA BATAYIEN

    SHANKA DUR KARIEN

    DHANYVAD

    1. http://www.onlineved.com/rig-ved/?language=2&sukt=18&mandal=4&mantra=13&commentrator=5
      प्रभु को भूल जाने पर जीवनोपाय के आभाव में गरीबी में कुत्तो की आंतो को पकानेवाला बना |
      पूरा मन्त्र का अर्थ पढ़े आपको जानकारी मिल जायेगी | क्या बोला गया है |
      धन्यवाद

      1. AMIT JEE IN MANTRO MEIN HI HANIKARAK PASHU KO MARNE KO BOLA HAI MERE KO LAGTA HAI AGAR UN PASHU ON KO BHI BINA MARE HUE DUR KAR DIA JAYE TO KYA BURAI HAI ??

        MERE KO LAGTA HAI KI PASU AGAR HANI KARAK BHI HO TO USSE DUR BHAGAYE

        MARE NAHIN

        MERI IS QUESTION KA BHI UTTAR DEIN DHANYVAD

  2. MEIN BAS YEHI EK SAWAL PUCH RAHA THA KI AGAR HANIKARAK PASU KO DUR KAR DIA JAYE BINA MARE KYA VED ISKI PERMISSION DENGE ??

  3. RISHAW ARYA JEE BAHUT BAHUT DHANYAVAD ACHA MERA EK SAWAL KA UTTAR DE DEJEYE SWAMI DAYANAND NE

    YAJURVED 13.48 Mein swami dayanad ne gaur ka matlab shwet varna ke pashu kaha hai ?? iska kya matlab hai ?? thoda batyenge jara mera confusion clear kijiye ? dhanyvad ?? thanks

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