वेद में मनु शब्द : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

मनु शब्द भिन्न 2 विभकित्यो मे ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद तथा अर्थवर्वेद में कई स्थलो पर प्रयुक्त  हुआ

वेद मे मनु शब्द है  और इसलिए कई विद्वानो का ऐसा मत है  कि जिस मनु का वेदो में उल्लेख है उसी के उपदेश मनुस्मृति मे वणित है । यह मत प्राचिन वेदाचाययो के कथनो से अनुकुलता नही रखता । इसमे सन्देह नही कि मनुस्मृति के लेखको का वेदो से समंबध जोड देने मे मनुस्मृति के गौरव में आधिक्य हो जाता है । इसी गोरव को दृष्टि में रखकर कई विद्वानो ने मनुस्मृति के लेखक के विषय में वेदो के पन्ने पलटने का यत्र किया उदाहरण के लिए ऋग्वेद 1।80।16अ1।114।2 तथा 2।33। 13 मे मनु और पिता दो शब्द साथ साथ आये है। इससे लोगो ने यह अनुमान किया है कि यह वही प्रजापति मनु है जिनहोने सृष्टि को उत्पन किया तथा मनुस्मृति की नीव डाली । परन्तु यह मत उन लोगो को स्वीकार नही हो सकता जो वेदो को ईश्वर जो वेदों को ईश्वर की और मानते है और जिनको वेदो मे इतिहास मानने से इनकार है । इस कोटि मे प्राचिन उपषित्कार दर्शनकार नैहत्क वैयाकरण तथा शंकरा चायर्य आदि मध्यकालीन विद्वान भी सम्मिलित है स्वामी दया-नन्द का जो स्पष्ट मत है कि वेदो मे किसी पुरूष-विशेष का उल्लेख नही है । आजकल के यूरोपियन संस्कृतज्ञ तथा उनके अनुयायी भारतीय विद्वानसें का तो दृष्टिकोण ही ऐतिहासिक है। यह लोग पत्येक वैदिक ग्रन्थ को उसी दृष्टि से देखते है और उनको अपने मत की पुष्टी में पुष्कल सामग्री प्राप्त हो जाती है ।उनका यह मत कहाॅ तक ठीक है इस पर हम यहाॅ विचार नही कर सकते  । परन्तु इसमें भी सन्देह नही कि केवन पिता और मनु दो शब्दो को साथ साथ देखकर उनसे किसी विशेष पुरूष का अथ्र्र ले लेना युक्ति -संगत नही है जब तक कि ऐसा करने के लिए अन्य पुष्कल प्रमाण न हों । यदि निरक्तकार यास्काचार्य का मत ठीक है कि वेदो में समस्त पद यौगिक है तो मानना पडेगा कि किसी विशेष पुरूष का नाम मनु होने से पूर्व यह शब्द अपने यौगिक अर्थ में बहुत काल तक प्रचलित रह चुका होगा । यह बात आजकल की समस्त व्यक्ति वाचक संज्ञाओं से भी सिद्ध होती है । चाहे किसी व्यक्ति का नाम चुन लीजिए । पहले वह अवश्य ही यौगिक रहा होगा । और बहुत दिनो पश्चात व्यक्यिाॅ उस नाम से प्रसिद्ध हुई होगी इसलिए इसमें कुछ भी अनुचित नही है कि मनु शब्द का वेद मुत्रो में यौगिक अर्थ लिया जाये । यजुवैद 5।16 में आये हुए मनवे शबद का अर्थ उव्वट ने यजमानय और महीधर ने मनुते जानातीत मनुज्ञानवान यजमान किया है। इसी प्रकार यदि ऋग्वेद में भी मनु का अंर्थ ज्ञानवान किया जाय तो क्या अनथ होगा। फिर ऋग्वेद के जिन तीन मंत्रो  की आद्यैर हमने ऊपर संकेत किया है उनमे से पहले (1।8016) में मनु पिता और अर्थवा मनुष्पिता ) तीनो शब्द आये है जिनमे से एक विशेयष्य और अन्य विशेष्ण है । ऋग्वेद 1।114।2 मे अर्थवा का न नाम है न संबध 2।33।13 मे मनु पिता का भेषजा अर्थात ओषधियो से संबध है । इस प्रकार अर्थवा या मनु या प्रजापति शब्दो से ऐतिहासिक पुरूषो का सम्बन्ध जोडना एक ऐसी अटकल है जिस पर आधुनिक विद्वान लटठ हो रहे है । आजकल का युग अटकल युग है जिसको शिष्ट भाषा मे aAge of hypotheses कह सकते है हमारा यहाॅ केवल इतना ही कथन है कि वेदों मे आये हुए मनु और मनुस्मृति के आदि गृन्थकार से कुछ सम्बध नही है । ऋग्वेद 8।3013 में  पार्थना की गई –

मा नः पथः पित्रयान मानवादधिदूरे नैष्ट परावत

अर्थात हम (पित्रयात मानवात पथः) अपने पूर्वजों के बुद्धि-पूर्वक मार्ग से विचलित न हो । इससे भी कुछ विद्धानो ने यह अनुमान किया है कि मानवात पथः का अर्थ है मनु महाराज क बताये मार्ग से । (vide Principles of Hindu law vol I by jogendra chamdra Ghos and P.V Kane History of Dharma shastra )

ऋृग्वेद 10।63।7 मे (येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः) कुछ लोगो के विचार से किसी मनु-विशेष का उल्लेख है जिसने सबसे प्रथम यज्ञ किया था । परन्तु इन दोनों मंत्रो में मनु का अर्थ विचारवान या ज्ञानवान पुरूष क्यो न लिया जाए और क्यों यह मान लिया जाय कि अमुक व्यक्ति की और ही संकेत है इसके लिये अटकल के सिवाय और क्या हेतू हो सकता कोई ऐसी ऐतिहासिक घटनाये हमारे ज्ञान में नही है जिनसे बाधित होकर हम यहाॅ मनु शब्द को विशेष व्यक्ति का नाम मान ले । फिर यह तो बडी ही हास्यप्रद बात होगी कि मनु वेदो के गीत गावें और वेद मनु के । क्यो न वेद में आये हुए मनु का अर्थ ईश्वर ही लिया जाए जैसा कि मनुस्मृति के निम्न श्लोक से विदित हैः-

एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम ।

इन्द्रमेके परे पा्रणमपरे ब्रहाशाश्वतम ।।

(अघ्याय 12।123)

अर्थात कुछ लोग ईश्वर को अग्रि नाम से पुकारते है कुछ मनु नाम से कुछ प्रजापति नाम से कुछ इन्द्र नाम से कुछ प्राण नाम से और कुछ ब्रहा शाश्वत नाम से ।

कुछ लोग कह सकते है कि ऋृग्वेद के कुछ मंत्रो का ऋषि भी तो मनु था । क्या यह वही मनु नही था जिसने मनुस्मृति के विचारो का प्रचार किया। यह अवश्य एक मीमासनीय प्रश्र है। कुछ लोग ऋषियो को मंत्रो का कर्ता मानते है और कुछ केवल द्रष्टा । यास्काचार्य का तो यही मत है ।  कि ऋषि मंत्रो के द्रष्टा मात्र थे और चादर की दृष्टि से उनका नाम वैदिक सूक्तो के आरम्भ में लिखा चला आता है । जो लोग इन ऋषियो को मत्रो के कर्ता मानते है उनके लिए कठिनाई यह अवश्य होगी कि अग्रिम वायु आदित्य और अगिरा की क्या स्थिति होगी । सायणाचार्य ने ऋृषियो को मत्रो के कर्ता मानते उनके लिये एक कठिनाई यह अवश्य होगी कि अग्रिम वायु आदित्य और अंगिरा की क्या स्थिति होगी ।सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य की उपक्रमणिका मे स्पष्ट लिखा है कि

जीवविशेषेरग्रिवाटवादित्यैवेदानामुत्पादितत्वात ।

ऋग्वेद एपाग्रेरजायत । यजुवेदो वायो। समवेद

आदियादिति श्रुतेरीश्वरस्पारन्यादि प्ररेकत्वेन निर्मातृत्व द्रष्टव्यम।।

अर्थात अग्रिम वायु आदित्य नामी जीव विशेषो से वेदों का आविर्भाव हुआ । यदि मनु किसी मंत्र का कर्ता भी होत तो भी अन्य पुष्ट प्रमाणो के अभाव में यह कहना कठिन था कि जिस मनु ने अमुक वेद – मत्र बनाया उसीने मानव धर्म शास्त्र का आरंम्भ  किया ।  इसी प्रकार तैतरीय संहिता 2।2।50।2 मे लिखा है  कि यदै कि च मनुरवदत तदृ भेषजम और ताण्डय ब्राह्मण 23।6।।17 का वचन है कि मनुवै सत किचावदत तद भेषज भेषजतरयै अर्थात मनु ने जो कुछ कहा वह औषधि है । इन वाक्यो से भी हमारे प्रष्न पर कुछ अधिक प्रकाश नही पडता । ऋग्वेद 2।33।13 मे मनु का भेषज से कुछ सम्बन्ध है परन्तु ऊपर दो वाक्यों में भेषज शब्द का वास्तविक अर्थ न लेकर आलंकारिक अर्थ लिया गया है और उन स्थलो पर यह स्पष्ट नही है कि मनु के किसी वचन और उन स्थलों पर यह स्पष्ट नही है कि मनु के किसी वचन की और संकेत है ।

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