वर्णव्यवस्था का स्वरूप

वर्णव्यवस्था का स्वरूप

डॉ. वेदव्रत…..

समाज के सुव्यवस्थित संचालन, प्राणिमात्रा- के अभ्युदय, सुख एवं शान्ति के लिए यह परमावश्यक है कि सामाजिक कार्यों का विभाजन व्यक्ति की योग्यता, गुण-कर्म, प्रकृति एवं प्रवृत्ति के आधर पर हो। प्रत्येक प्राणी प्रत्येक कार्य को सम्पादित करने में समर्थ नहीं होता अतः जो व्यक्ति जिस कार्य में समर्थ है, उसे उसी कार्य का दायित्व दिया जाना चाहिए। स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था श्रम विभाजन या कर्म विभाजन पर ही आधृत है। समाज के विधिवत् सचालन के लिए शिक्षक, रक्षक, पोषक तथा सेवक की आवश्यकता होती है। इनके संयोजन के बिना समाज उन्नति नहीं कर सकता। अज्ञान, अन्याय, अभाव एवं असहयोग समाज की प्रगति में बाध्क हैं। समाज से अज्ञान के नाश के लिए शिक्षक के रूप में ब्राह्मण, अन्याय-अत्याचार को मिटाने के लिए रक्षक के रूप में क्षत्रिय, अभाव के लिए पोषक के रूप में वैश्य तथा असहयोग को मिटाने के लिए सेवक के रूप में शूद्र की परिकल्पना की गई।

व्यक्ति की कार्य क्षमता के आधार पर कर्म विभाजन करना वर्णव्यवस्था है। वर्ण शब्द की निष्पत्ति वृज वरणे धातु से होती है, जिसका अर्थ है- वरण करना या चुनना। इसे हम सरल भाषा में इस प्रकार से विवेचित कर सकते हैं- जिस व्यवस्था के द्वारा व्यक्ति अपनी कार्य क्षमता के आधर पर कर्म का वरण करता है, वह वर्णव्यवस्था कहलाती है। आचार्य यास्ककृत वर्ण शब्द की व्युत्पत्ति भी इसी अर्थ को प्रकट करती है। महर्षि दयानन्द भी ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में वर्ण व्यवस्था के विवेचन में उपरोक्त भाव को स्पष्ट करते हैं।

सर्वप्रथम वर्ण व्यवस्था की विवेचना  ऋग्वेद में दृष्टि गोचर होती है। वेद के इस मन्त्र में आलंकारिक

भाषा में वर्ण व्यवस्था के स्वरूप का अतीव रोचक वर्णन प्राप्त होता है। ब्राह्मण शरीर का मुख, क्षत्रिय भुजा, वैश्य जंघा तथा शूद्र पैर है। जिस प्रकार मुख सब अंगों में श्रेष्ठ है, वैसे ही विद्वान्, गुणवान्, श्रेष्ठ

कर्म वाला मनुष्य ब्राह्मण जानना चाहिए। ताण्डय एवं शतपथ ब्राह्मण में भी ब्राह्मण को मुख की

उपमा दी गई है। क्षत्रिय को समाज की भुजा कहा गया है। भुजाएँ शक्ति की प्रतीक हैं। शतपथ ब्राह्मण में युद्ध उसका बल कहा गया है। वैश्य को उरु (जंघा) कहा गया है, जिस प्रकार जंघायें सारे शरीर को थामे रहती हैं तथा उनके गतिमान् होने पर शरीर में रस का संचार होता है, उसी प्रकार से वैश्यवर्ग भी समाज का सचालक एवं जीवन रक्षक है। वैश्य द्वारा अर्जित धन से ही सभी वर्णों का निर्वाह होता है।शुद्र को समाज का पैर कहा गया है। जिसप्रकार पैर शरीर का भार वहन करके उसे आराम देते हैं, ठीक इसी प्रकार शूद्र अन्य वर्णों की सेवाशुश्रूषा करके उन्हें सुख प्रदान करता है। शतपथ ब्राह्मण में शूद्र की महत्ता को बतलाते हुए कहा गया है कि शूद्र श्रम का मूर्तिमान रूप है तथा उसी पर सारा राष्ट्र अवलम्बित है।

जिस प्रकार से शरीर के ये विभिन्न अवयव आकृति एवं कार्य सम्बन्धी विविधता के होने पर भी शरीर की आवश्यकताओं को सम्पन्न कराते हुए उन्नति में सहायक हैं ठीक इसी प्रकार चारों वर्ण समाजरूपी शरीर के अंग हैं तथा चारों ही समाज के सुचारू रूप से सचालन में सहायक सिद्ध होते हैं।

वेदप्रतिपादित इस वर्ण व्यवस्था की पुष्टि में अन्य प्रमाण भी उपलब्ध हैं। शतपथकार ने भी वेद के आधार पर वर्ण व्यवस्था का विधान किया है। आचार्य प्रजापति द्वारा की गई सृष्टि के वर्णनप्रसन्ग में वर्णों की सृष्टि का वर्णन करते हुए लिखते हैं– मुख से ब्राह्मणों की सृष्टि की। मुख से उत्पन्न होने के कारण ये मुख्य हुए। बाहु और वक्ष से राजन्य (क्षत्रिायों) की सृष्टि की। वक्ष और बाहु से उत्पन्न होने के कारण क्षत्रिय बलशाली हुए। मध्य भाग से वैश्यों की तथा पैरों से शूद्रों की उत्पत्ति की। वर्णोत्पत्ति विषयक वेदोक्त भाव ही आचार्य मनु को अभीष्ट हैं। रामायण, महाभारत एवं श्रीमद्भागवत में भी वर्णों का यही स्वरूप दिखाई देता है।

वर्णविभाजन उपनयन के समय होता है या अध्ययन के उपरान्त, यह विषय भी विचारणीय है। आचार्य मनु के मत में वर्ण का विभाग उपनयन के समय में भी होता है, इसीलिए वे कहते हैं कि ब्राह्मण वर्ण का उपनयन ८ वर्ष, क्षत्रिय वर्ण का उपनयन १० वर्ष तथा वैश्य वर्ण का उपनयन १२ वर्ष में करना चाहिए। मनुस्मृति के अनुसार आचार्य उपनयन संस्कारोपरान्त वेदाध्ययन तथा ब्रह्म ज्ञान कराके एक नवीन जन्म प्रदान करता है। शरीर जन्म की अपेक्षा इस जन्म के आधर पर ही ब्राह्मणादि को द्विज कहा जाता है। इससे भी यही ध्वनित होता है कि वर्ण विभाजन मुख्यतः अध्ययनोपरान्त अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम के उपरान्त होता था। शतपथ ब्राह्मण की भी यही मान्यता है। इसके अनुसार अध्ययन काल में यज्ञ में दीक्षित होकर ब्रह्मचारी ब्राह्मण कर्मवाला ही होता है। अध्ययन के उपरान्त गुणों के आधार पर उसके कर्म का विभाजन होता था। वर्ण विभाजन का यही समय अधिक व्यवहारिक एवं तर्क संगत प्रतीत होता है।प्राचीनकाल में वर्ण व्यवस्था गुण एवं कर्म पर आश्रित

थी। वर्ण शब्द का अर्थ एवं व्युत्पत्ति स्वतः सिद्ध करते हैं कि वर्ण व्यवस्था जन्मना न होकर कर्माश्रित

है। जिसका कर्मानुसार वरण किया जाए, वह वर्ण है। ब्राह्मण क्षत्रियादि शब्द भी कर्मणा वर्ण व्यवस्था

के प्रतिपादिक है। वर्णों के नाम का निर्वचन स्वतः वर्णों के कर्मों का बोध कराता है। ब्रह्मन शब्द से

तदधीते तद्वेद इस अर्थ में अण् प्रत्यय करने से ब्राह्मण शब्द निष्पन्न होता है। इस प्रकार ब्राह्मण शब्द

का अर्थ हुआ, जो वेदाध्ययनरत है अथवा उसको जानता है। शास्त्र भी यही कहते है कि ब्राह्मण का मुख्य कर्म वेद का पढ़ना एवं पढ़ाना है। जो प्रजा की रक्षा एवं पालन करता है, वह क्षत्त्र कहलाता है-क्षदति रक्षति जनान् सः क्षत्राः। क्षत्र से अपत्य अथवा स्वार्थ में क्षत्रिय शब्द निष्पन्न होता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में भी क्षत्र का अर्थ क्षत्रिय दृष्टिगोचर होता है। वैश्य शब्द की व्युत्पत्ति भी कर्मणा वर्ण व्यवस्था को सूचित करती है। जो विविध व्यवहारिक व्यापारों में प्रविष्ट रहता है, वह वैश्य कहलाता है- यो यत्रा तत्रा व्यावहारिकविद्यासु प्रविशति सः वैश्यः, व्यवहारविद्याकुशलो जनो वा। ब्राह्मण ग्रन्थ के विभिन्न प्रमाण भी वैश्य शब्द की इस

व्युत्पत्ति को प्रमाणित करते हैं। अपने अज्ञान के कारण शोचनीय अवस्था को प्राप्त व्यक्ति शूद्र कहलाता है- शोचनीयः शोच्यां स्थितिमापन्नो वा, सेवायां साधूः अविद्यादिगुणसहितो मनुष्यो वा। तैत्तिरीय ब्राह्मण में

भी शूद्र विषयक यही भाव दिखाई देता है। अविद्या और अज्ञान से जिसकी निम्नजीवन स्थिति रह जाती

है, वह शूद्र है।

महाभारत में धर्मराज युधिष्ठीर भी ब्राह्मणादि वर्णों को परिभाषित करते हुए यह नहीं कहते कि जो ब्राह्मण कुल में उत्पन्न है, वो ब्राह्मण, क्षत्रियकुलोत्पन्न क्षत्रिय, वैश्य कुलोत्पन्न वैश्य तथा शूद्र कुलोत्पन्न शूद्र है। ब्राह्मण के स्वरूप को प्रतिपादित करते हुए महाराज युधिस्थीर कहते हैं कि सत्य, दान,क्षमा, तप, किसी

से घृणा न करना आदि गुण जिस व्यक्ति में दिखाई दें, वह ब्राह्मण है। इसी प्रकार महाभारत में एक अन्य प्रसन्ग में ऋषि भारद्वाज द्वारा ब्राह्मणादि चार वर्णों का स्वरूप पूछे जाने पर ऋषि भृगु उत्तर देते हुए

कहते हैं कि सत्य बोलना, दान देना एवं तप करना तथा द्रोह, ईर्ष्या, घृणा और हिंसा न करना ,ये गुण

जिस व्यक्ति में दिखाई दें, उसे ब्राह्मण जानना चाहिए । क्षत्रिय वर्ण के स्वरूप को बताते हुए ऋषि कहते हैं

कि जो क्षात्रकर्म अर्थात राष्ट्र, समाज एवं पीडितों की रक्षा करता है, वेदाध्ययन एवं दान करता है, उसे

ब्राह्मण जानना चाहिए। व्यापार, पशुपालन, कृषि, दान एवं वेदाध्ययन में संलग्न व्यक्ति को वैश्य जानना

चाहिए।  सर्वभक्षी, सभी कर्मो को करने वाला, पढने में रूचि न रखने वाला, सदाचार हीन एवं अशुचि

व्यक्ति को शूद्र जानना चाहिए ।

उपरोक्त सन्दर्भ में यह तथ्य ध्यातव्य है कि आचार्य भृगु ने यह नहीं कहा कि ब्राह्मणादि वर्णों में उपरोक्त

गुण होने चाहिए, अपितु उनका मन्तव्य है कि सत्यादि गुण जिसमें हो, उसे ब्राह्मण,क्षात्रज गुण जिसमें हो,

उसे क्षत्रिय, व्यापारिक गुण जिसमें हो, उसे वैश्य तथा वेदाध्ययन से विरत तथा सर्वभक्षी आदि गुण सम्पन्न

व्यक्ति को शूद्र जानना चाहिए। इससे भी यही ध्वनित होता है कि वर्ण व्यवस्था कर्माश्रित ही है न कि

जन्मना। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्टरूप से प्रतिपादित किया है कि ईश्वर ने चातुर्वर्ण्य की सृष्टि गुण एवं कर्म के विभाग के आधार पर की है।

शास्त्रों में अनेकत्र यह प्रतिपादित किया गया है कि अपने कर्मों की श्रेष्ठता एवं हीनता के कारण व्यक्ति उच्च एवं निम्न वर्ण को प्राप्त हो जाता है। वेदाध्ययन न करने पर द्विज (ब्राह्मण,क्षत्रिाय, वैश्य) शूद्रत्व को प्राप्त हो जाते हैं। कालान्तर में वर्ण विभाग कार्य कुशलता एवं वंश परम्परा के आधार पर होता चला गया।

संसार में सभी व्यक्ति गुण एवं सामर्थ्य की दृष्टि से भि पाये जाते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्तियों का व्यक्तित्व भी भिन्न होता है। प्रकृति त्रिागुणात्मिका है। ब्राह्मण सत्व गुण प्रधान होताहै। क्षत्रिय में रजोगुण की प्रधनता होती है। मनुष्य रजो गुण की प्रधनता होने पर क्रियाशील एवं शक्तिशाली बनता है। वैश्य में प्रायः रजोगुण एवं तमोगुण समान होते हैं। शूद्र में तमोगुण की प्रधनता मानी गई है।

वर्णव्यवस्था यथार्थ रूप में समाज का कार्मिक एवं चारित्रिक मूल्यांकन है। जिस प्रकार शरीर के सब अंग परस्पर भलीभॉति सम्बद्ध रहते हैं तथा सब अंगों का समान महत्त्व है। किसी भी अंग में होने वाली पीड़ा की प्रतीति समस्त शरीर में होती है। ठीक इसी प्रकार चारों वर्ण परस्पर एक दूसरे पर आश्रित हैं तथा कार्यों में विविध्ता एवं विषमता होने पर भी चारों वर्णों का महत्त्व समान ही है। समाज के किसी भी वर्ण को होनेवाली पीड़ा की अनुभूति समस्त समाज को होनी चाहिए । यही जीवित समाज काल क्षण तथा वर्णव्यवस्था का उद्देश्य है। समाज की उन्नति एवं स्थिरता चारों वर्णों के सह अस्तित्व पर ही निर्भर है। समाज में व्याप्त अज्ञान, अत्याचार, अभाव, वैमनस्यता का समूल रूप से उन्मूलन वेद प्रतिपादित वर्ण व्यवस्था द्वारा ही सम्भव है।

-तदर्थ प्रवक्ता,

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय,हरिद्वार

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