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आलाराम स्वामी की पीड़ाः-राजेन्द्र जिज्ञासु

आलाराम स्वामी की पीड़ाः

स्वामी आलाराम नाम के एक बाबा जी ने उन्नीसवीं शताब्दी  के अन्तिम वर्षों में आर्य समाज में प्रवेश किया। वे किस प्रयोजन से आर्य समाज में आये- यह जानने का किसी ने तब यत्न नहीं किया। बाबा ने घूम-घूम कर आर्य समाज का अच्छा प्रचार किया। बोलने की कला में उन्हें सिद्धि प्राप्त थी, पर कुछ ही वर्षों में आर्य समाज के घोर विरोधी के रूप में सनातन धर्म के बहुत बड़े नेता व विचारक बन गये। ऋषि दयानन्द और आर्य समाज को कोसने से लीडर बनना व धन कमाना बड़ा अचूक नुस्खा आपके भी काम आया।

आप ही ने प्रयाग में सत्यार्थप्रकाश पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए एक प्रसिद्ध केस करके अपनी राजभक्ति की धूम मचा दी। सत्यार्थप्रकाश राजद्रोह फैलाने वाला ग्रन्थ है, इसलिए आप इसे जत करने पर तुल गये, परन्तु हाथ कुछ भी न लगा।

आर्य समाज में रहते हुए एक बार मेरे जन्म स्थान के समीप जफरवाल कस्बा में बाबा आलाराम ने आर्य समाज के प्रचार की धूम मचा दी। वे हास्यरस में बोलते हुए एक लावणी बहुत सुनाया करते थेः- ‘धौल दाहढ़े मरें पुत्र आरज बन जायेंगे।’ अर्थात् श्वेत दाढ़ी वाले वृद्धों के मर जाने पर इनके पुत्र आर्य बन जायेंगे। पौराणिक दल के नेता बनकर बाबाजी ने ‘दयानन्द मिथ्यात्व प्रकाश’ की एक पुस्तकमाला निकाली। इसके पाँच-छह भाग मेरे पुस्तकालय में हैं। यह पुस्तकमाला धर्म प्रचार के प्रयोजन से तो लिखी नहीं गई थी। इसका मुय प्रयोजन लोगों को राजभक्ति की घुट्टी पिलाना था। यह पुस्तकमाला के मुखपृष्ठ पर छपा करता था।

मैंने माननीय आचार्य सोमदेव जी से प्रार्थना की है कि वे बाबा आलाराम सागर की इस पुस्तकमाला पर एक 32 पृष्ठ की प्रामाणिक पुस्तक लिख दें। इससे महर्षि के व्यक्तित्व, उपकार, सुधार तथा वैदिक धर्म की विशेषताओं का नई पीढ़ी को ठोस ज्ञान होगा। ‘सत्यार्थप्रकाश’ का भयभूत विरोधियों पर ऐसा सवार हुआ कि बाबा आलाराम को अपनी पुस्तकमाला में ‘प्रकाश’ शद जोड़ना पड़ा। मौलवी सनाउल्ला को अपनी पुस्तक का नाम ‘हक प्रकाश’ रखना पड़ा। यह सत्यार्थप्रकाश का चमत्कार ही तो था।

 

Impact of Satyarth Prakash