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अग्निहोत्र का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व – प्रो. डी.के. माहेश्वरी

पिछले अंक का शेष भाग…..

मीठे पदार्थ

शक्कर, सूखे अंगूर, शहद, छुआरा आदि भी यज्ञ के समय प्रयोग होते हैं। आजकल हवन सामग्री एक कच्चे पाउडर के रूप में बाजार में आसानी से उपलब्ध  है जो निम्न पदार्थों से निर्मित की जाती है- चन्दन तथा देवदार की लकड़ी का बुरादा, अगर और तगर की लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े, कपूर-कचरी, गुग्गुल, नागर मोथा, बलछार, जटामासी, सुगन्धवाला, लौंग, इलायची, दालचीनी, जायफल आदि। आजकल विभिन्न संस्थान हवन सामग्री निर्मित कर रहे हैं, जिनमें ये सभी पदार्थ एक अलग अनुपात में होते हैं।

यज्ञ के चिकित्सीय पहलू

प्राचीन समय से आयुर्वेदिक पौधों के धुएँ का प्रयोग मनुष्य विभिन्न प्रकार की बीमारियों से निदान पाने के लिए करते आ रहे हैं। यज्ञ से उत्पन्न धुएँ को खाँसी, जुकाम, जलन, सूजन आदि बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मध्यकालीन युग में प्लेग जैसी घातक बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए धूप, जड़ी-बूटी तथा सुगन्धित पदार्थों का धूम्रीकरण किया जाता था।

यज्ञ द्वारा प्राप्त हुई रोगनाशक उत्तम  औषधियों की सुगन्ध प्राणवायु द्वारा सीधे हमारे रक्त को प्रभावित कर शरीर के समस्त रोगों को नष्ट कर देती है तथा हमें स्वस्थ और सबल बनाती है। तपेदिक का रोगी भी यदि यक्ष्मानाशक औषधियों से प्रतिदिन यज्ञ करे तो औषधि सेवन की अपेक्षा बहुत जल्दी ठीक हो सकता है। वेदों में कहा गया है- हे मनुष्य! मैं तेरे जीवन को स्वस्थ, निरोग तथा सुखमय बनाने के लिए तेरे शरीर में जो गुप्त रूप से छिपे रोग है, उनसे और राजयक्ष्मा (तपेदिक) जैसे असाध्य रोग से भी यज्ञ की हवियों से छुड़ाता हूँ। विभिन्न रोगों की औषधियों द्वारा किया हुआ यज्ञ जहाँ उन औषधियों की रोग नाशक सुगन्ध नासिका तथ रोम कूपों द्वारा सारे शरीर में पहुँचाता है, वहाँ यही यज्ञ, यज्ञ के पश्चात् यज्ञशेष को प्रसाद रूप में खिलाकर औषध सेवन का भी काम करता है। इससे रोग के कीटाणु बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं। वेदों में कहा गया है कि-

हे मनुष्य! यह यज्ञ में प्रदान की हुई रोगनाशक हवि तेरे रोगोत्पादक  कीटाणुओं को तेरे शरीर में से सदा के लिए बाहर निकाल दे अर्थात् यज्ञ की रोगनाशक गन्ध शरीर में प्रविष्ट होकर रोग के कीटाणुओं के विरुद्ध अपना कार्य कर उन्हें नष्ट कर देती है।

अग्निहोत्र से पौधों को पोषण मिलता है, जिससे उनकी आयु में वृद्धि होती है। अग्निहोत्र जल के स्रोतों को भी शुद्ध करता है। यज्ञ के उपरान्त वायु में धूम्रीकरण के प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से सत्यापित करने के लिए डॉ. सी. एस. नौटियाल, निदेशक, सी.आई.आर.-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान, लखनऊ व अन्य शोधकर्ताओं  ने वायु प्रतिचयन यन्त्र का प्रयोग किया। उन्होंने यज्ञ से पूर्व वायु का नमूना लिया तथा यज्ञ के उपरान्त एक निश्चित अन्तराल में २४ घण्टे तक वायु का नमूना लिया और पाया कि यज्ञ के उपरान्त वायु में उपस्थित वायुजनित जीवाणुओं की संख्या कम थी। कुछ आँकड़ों के अनुसार, औषधीय धुएँ से ६० मिनट में ९४ प्रतिशत वायु में उपस्थित जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। सुगन्धित और औषधीय धुएँ से अनेक पौधों के रोग जनक जीवाणु, जैसे बरखोलडेरिया ग्लूमी जो चावल में सीडलींग रॉट (Seedling rot of rice), कटोबैक्टीरियम लैक्युमफेशियन्स जो फलियों में विल्टिंग (Wilting in beans), स्यूडोमोनास सीरिन्जी जो आडू में नैक्रोसिस (Necrosis of peach tree tissue), जैन्थोमोनास कम्पैस्ट्रिस जो क्रूसीफर्स में       लैक रॉट (Black rot in crueifers) करते हैं, आदि को नष्ट किया जा सकता है।

वायुजनित प्रसारण रोग के संक्रमण का एक मुख्य मार्ग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O. 2004) के अनुसार, विश्व में ५७ लाख मृत्यु में से १५ लाख (>२५त्न) वायुजनित संक्रमित रोगों के कारण होती है। औषधीय धुएँ से मनुष्य में रोग फैलाने वाले रोगजनक जीवाणुओं जैसे-कॉर्नीबैक्टीरियम यूरीलाइटिकम जो यूरीनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन, कॉकूरिया रोजिया जो कैथेटर रिलेटिड बैक्टीरीमिया, स्टेफाइलोकोकस लैन्टस जो स्प्लीनिक ऐ  सेस स्टेफाइलोकोकस जाइलोसस जो एक्यूट पॉलीनैफ्रिइटिस ऐन्टेरोबैक्टर ऐयरोजन्स जो नोजोकॉमियल इन्फैक्षन करते हैं आदि को नष्ट किया जा सकता है। सुगन्धित तथा औषधीय धुएँ का प्रयोग त्वचा सम्बन्धी तथा मूत्र-तन्त्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने में भी किया जाता है। धुएँ के प्रश्वसन से (Inhalation) फुफ्फुसीय और तन्त्रिका सम्बन्धी विकार दूर हो जाते हैं।

औषधीय धुएँ का बीजांकुरण में मह                          व

एक दिलचस्प खोज में पता चला है कि प्रकृति में धुँआ बीज अंकुरण को उत्तेजित  करता है। विभिन्न प्रकार के कार्बनिक पदार्थों का १८०-२००ष्ट सेल्सियस तापमान पर दहन एक अधिक सक्रिय, ऊष्मीय रूप से स्थिर 3-methy1-2H-furo[2,3-C] pyron-2-one यौगिक बनाता है जो कि बीज अंकुरण को उत्तेजित करता है। धुएँ से अंकुरित पौधों की भी वृद्धि होती है, क्योंकि धुँआ बीज और अंकुरित पौधों को सूक्ष्मजीवी के आक्रमण से बचाता है, जिससे पौधे निरोगी तथा हृष्ट-पुष्ट रहते हैं।

यज्ञ के भौतिकीय पहलू

भौतिक संसार में ऊर्जा की दो प्रणालियाँ ऊष्मा और ध्वनि हैं। यज्ञ के दौरान ये दोनों ऊर्जाएँ (यज्ञ से उत्पन्न होने वाली अग्नि और गायत्री तथा अन्य मन्त्रों द्वारा उत्पन्न ध्वनि) मिलकर हमारी वांछित शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक इच्छाओं को पूर्ण करने में सहयोग प्रदान करती है। यज्ञ की अग्नि में जो विशेष पदार्थ आहुत किये जाते हैं, उन्हें अग्नि में आहुत करने का एक वैज्ञानिक आधार है। वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण है कि मन्त्रों द्वारा उत्पन्न विद्युत-चुम्बकीय तरंगें हमारी आत्मिक इच्छाओं को लौकिक स्तर पर प्रसारित करने में मदद करती है।

यज्ञ में दहन के उत्पाद से सम्बन्धित अभी तक कुछ वैज्ञानिक पहेलियाँ अनसुलझी हुई हैं, जैसे-भौतिक विज्ञान के सन्दर्भ में यज्ञ में दहन प्रक्रिया की व्याख्या करना कठिन है, जिसके निम्न कारण हैं-

* यज्ञ में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थों के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं।

* जिन स्थितियों में यज्ञ होता है, वह अनिश्चित होती हैं।

पदार्थों का दहन निम्न कारकों पर निर्भर करता है-

* दहन में प्रयोग किये गये पदार्थों की प्रकृति और उनका अनुपात।

* तापमान।

* वायु की नियन्त्रित आपूर्ति

* निर्मित हुए पदार्थों के बीच आकर्षण।

यज्ञ की प्रक्रिया में औषधीय व सुगन्धित पदार्थों का वाष्पीकरण

पौधों (लकड़ी) के अन्दर प्रचुर मात्रा में सेलुलोज होता है, जिसका पूर्ण दहन होने से पहले इसका वाष्पीकरण होता है। अग्निकुण्ड में जिस प्रकार से समिधाओं को व्यवस्थित किया जाता है, उस पर अग्निकुण्ड का तापमान और वायु की आपूर्ति निर्भर करती है। अग्निकुण्ड का तापमान सामान्यतः २५० सेल्सियस से ६०० सेल्सियस तक होता है, जबकि इसकी ज्वाला का तापमान १२०० सेल्सियस से १५०० सेल्सियस तक होता है। यह तापमान यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले मुख्यतः सभी वाष्पीय पदार्थों का वाष्पीकरण करने में सक्षम होता है। जब सेलुलोज व अन्य पदार्थों, जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन आदि का दहन किया जाता है तो पर्याप्त मात्रा में वाष्प उत्पन्न होती है, जिसमें हाइड्रोजन, ऑक्सीजन तथा कार्बनिक पदार्थों का मिश्रण होता है, जिसमें ठोस कण अत्यधिक विभाजित अवस्था में होते हैं, जो यान्त्रिक प्रसार के लिए पर्याप्त सतह प्रदान कराते हैं। इस प्रकार धुआँ कोलॉइडल कणों के रूप में कार्य करता है, जो सुगन्धित पदार्थों को वायु के तापमान और दिशा के आधार पर प्रसारित करने का कार्य करता है। कोई भी पदार्थ जलकर गैस रूप में असंख्य गुना व्यापक हो जाता है। यह बात वैज्ञानिक रूप में भी सिद्ध हो चुकी है। १९६६ में आयोजित कैलिफोर्निया यूनीवर्सिटी की एक गोष्ठी में वैज्ञानिकों ने माना कि अग्नि में किसी भी हव्य को ‘ऑक्सीकृत’ कर अनन्त आकाश में पहुँचा देने की क्षमता है।

वसायुक्त पदार्थों का दहन

यज्ञ में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ मुख्य रूप से घी तथा वनस्पति मूल के अन्य वसायुक्त पदार्थ हैं। घी, लकड़ी के तीव्र दहन में मुख्य सहायक है। सभी वसायुक्त पदार्थ फैटी एसिड (वसीय अम्ल) के संयोजन से बने होते हैं, जो आसानी से वाष्प में परिवर्तित हो जाते हैं। ग्लिसरॅाल के दहन से ऐसीटोन निकाय, पायरुविक ऐल्डिहाइड, ग्लायऑक्जल आदि बनते हैं। इन प्रक्रियाओं में उत्पादित हाइड्रोकार्बन पुनः धीमे दहन से गुजरते हैं, जिसके फलस्वरूप मिथाइल और इथाइल एल्कोहॉल, फॉर्मेल्डिहाइड, एसिटेल्डिहाइड, फॉर्मिक एसिड, ऐसिटिक एसिड आदि का निर्माण होता है।

प्रकाश रासायनिक प्रक्रिया

जब सभी वाष्पशील पदार्थ वातावरण में दूर तक फैल जाते हैं, तब यह प्रक्रिया प्रकाश रासायनिक प्रक्रिया कहलाती है, जो सूर्य की किरणों की उपस्थिति में होती है। ऋषि-मुनियों ने इसी कारण यज्ञ को बाहर खुले में अर्थात् धूप में करने को प्राथमिकता दी है। इस प्रकार धूम्रीकरण से उत्पन्न उत्पाद ऑक्सीकरण, अपचयन व प्रकाश रासायनिक प्रक्रिया में जाते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड के अपचयन के बाद फॉर्मेल्डिहाइड का निर्माण होता है, जिसे निम्नलिखित रासायनिक क्रिया से दर्शाया गया है-

CO2+H2O+112,000 Cal=HCHO+O2

जैसा कि विदित है, फॉल्डिहाइड वातावरण में उपस्थित हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है, इसी प्रकार यज्ञ से उत्पन्न हुए अन्य पदार्थ, जैसे फॉर्मिक अम्ल व एसिटिक अम्ल भी अच्छे रोगाणुरोधक का कार्य करते हैं। प्रकाश रासायनिक प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता में कमी व ऑक्सीजन की सान्द्रता में वृद्धि होती है, यही कारण है कि यज्ञ करने से वातावरण शुद्ध हो जाता है।

यज्ञ में जो धूम्रीकारक पदार्थ प्रयोग में लाये जाते हैं, उनके धूम्रीकरण से कुछ प्रभाव कीट-पतंगों पर भी पड़ता है। जैसे- कपूर के धूम्रीकरण से कीट-पतंगे नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार वाष्पशील पदार्थों के धुएँ के सम्पर्क में आने से अनेक घातक कीट भी नष्ट हो जाते हैं।

आजकल औषधीय धुएँ का उपयोग विज्ञान की अनेक शाखाओं जैसे-कृषि, खरपतवार नियन्त्रण, उद्यान-कृषि, पारिस्थितिक प्रबन्धन, प्राकृतिक वास नवीनीकरण आदि में किया जा रहा है। इस लेख में वायुवाहित जीवाणुओं पर प्राकृतिक उत्पादों के धुएँ के पुराऔषध गुण सम्बन्धी दृष्टिकोण के मह                  व और व्यापक विश्लेषण तथा वैज्ञानिक पुष्टीकरण को दर्शाया गया है, अतः आधुनिक युग में औषधीय वायु एवं धुएँ के मह   व को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला गया है कि अगर हम प्रदूषण मुक्त और रोगमुक्त जीवन व्यतीत करना चाहते हैं तो हमें अग्निहोत्र का अपने दैनिक कार्यों में समावेश करना होगा तथा यज्ञ से हम समस्त सुख, समृद्धि एवं शान्ति को प्राप्त कर सकते हैं।

(लेखक का ऐसा मानना है।)

विज्ञान प्रगति से साभारः

सम्पर्क सूत्रः– पूर्व डीन, फैकल्टी ऑफ लाइफ सांइसेज डिपार्टमेंट ऑफ बॉटनी एण्ड माइक्रोबायोलॉजी, गुरुकुल कांगड़ी यूनीवर्सिटी, हरिद्वार-२४९४०४ (उत्तराखण्ड )

मो.: ०९८३७३०८८९७