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सांई बाबा मत 2

सांई बाबा मत

– सत्येन्द्र सिंह आर्य

पिछले अंक का शेष भाग….

सांई मत ने इस प्रकार पतंजलि मुनि के योग दर्शन को तो अप्रासंगिक ही बता दिया। सांई की आत्मश्लाघा देखिए-

‘‘केवल सांई-सांई के उच्चारण मात्र से ही उनके (भक्तों के) समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे।’’

‘‘जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते हैं, उन्हें मेरी कथाएँ श्रवण कर स्वभावतः प्रसन्नता होगी। विश्वास रखो कि जो कोई मेरी लीलाओं का कीर्तन करेगा, उसे परमानन्द और चिरसन्तोष की उपलब्धि हो जाएगी। यह मेरा वैशिष्ट्य है कि जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, जो श्रद्धापूर्वक मेरा पूजन, निरन्तर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूँ।’’

ऐसे मुक्ति प्रदाता सांई बाबा के चरित्र पर कुछ विशेष विवरण इस पुस्तक में नहीं दिया गया। जो कुछ कहा गया है वह बिना चमत्कार वाली चर्चा के नहीं है। सांई अनपढ थे और चिलम (धूम्रपान) पीते थे। एक घटना इस प्रकार है-चाँद पाटिल नाम के किसी व्यक्ति की घोड़ी खो गईथी। उसने सांई से इस सम्बन्ध में पूछा तो फकीर (सांईबाबा) बोले, ‘‘थोड़ा नाले की ओर भी तो ढूँढ़ो।’’ चाँद पाटिल नाले के समीप गए तो अपनी घोड़ी को वहाँ चरते देखकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचा कि फकीर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, वरन् कोई उच्च कोटि का मानव दिखाई पड़ता है। घोड़ी को साथ लेकर जब वे फकीर के पास लौटकर आए तब तक चिलम भरकर तैयार हो चुकी थी। केवल दो वस्तुओं की और आवश्यकता रह गयी थी। एक तो, चिलम सुलगाने के लिए अग्नि और दूसरा साफी (कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा जिसको चिलम के नीचे लगाकर धूम्रपान किया जाता है) को गीला करने के लिए जल। फकीर (सांई बाबा) ने अपना चिमटा भूमि में घुसेड़कर ऊपर खींचा तो उसके साथ ही एक प्रज्जवलित अंगारा बाहर निकला और वह अंगारा चिलम पर रखा गया। फिर फकीर ने सटके से ज्यों ही बलपूर्वक जमीन पर प्रहार किया, त्यों ही वहाँ से पानी निकलने लगा और उसने साफी को भिगोकर चिलम से लपेट लिया। इस प्रकार सब प्रबन्ध कर फकीर ने चिलम पी और तत्पश्चात् चाँद पाटील को भी दी।

एक साधारण सी बात है कि फकीर चिलम पीता था। उसके वर्णन के लिए भी दो चमत्कार (जो कि सृष्टिक्रम के विरुद्ध हैं) जोड़ दिये। ‘श्री सांई सच्चरित्र’ नाम की इस ३०४ पृष्ठों वाली पुस्तक में सैकड़ों चमत्कारों का उल्लेख है। जिस भी व्यक्ति या घटना की चर्चा है, वह केवल चमत्कारों के सहारे सांई का महिमामण्डन करना, उसे त्रिकालज्ञ एवं दुःखहर्ता सिद्ध करना है। एक उदाहरण देखिए।

श्री बालाराम धुरन्धर नाम के एक व्यक्ति मुम्बई से चलकर शिरडी में सांई बाबा से मिलने के लिए आए। यहाँ शिरडी में उनके पहुँचने से पूर्व ही बाबा  ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि ‘‘आज मेरे बहुत से दरबारीगण आ रहे हैं।’’ अन्य लोगों द्वारा बाबा के उपरोक्त वचन सुनकर धुरन्धर परिवार को महान् आश्चर्य हुआ उन्होंने अपनी यात्रा के सम्बन्ध में किसी को भी इसकी पहले से सूचना नहीं दी थी। सभी ने आकर उन्हें प्रणाम किया और बैठकर वार्तालाप करने लगे। बाबा ने अन्य लोगों को बतलाया कि ‘‘ये मेरे दरबारी गण हैं, जिनके सम्बन्ध में मैंने तुमसे पहले कहा था।’’ फिर धुरन्धर भ्राताओं से बोले, ‘‘मेरा और तुम्हारा परिचय ६० जन्म पुराना है।’’ मुसलमान तो पूर्व जन्म, पुनर्जन्म को मानते नहीं, ऊपर से ६० जन्मों के सम्बन्ध के स्मरण की बात तो निरी बकवास ही है।

भोजन और थोड़ा विश्राम करके जब वे लोग पुनः मस्जिद में आए और आकर बाबा के पैर दबाने लगे। ‘‘इस समय बाबा चिलम पी रहे थे। उन्होंने बालाराम को भी चिलम देकर एक फूँक लगाने का आग्रह किया। यद्यपि अभी तक उन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया था, फिर भी चिलम हाथ में लेकर बड़ी कठिनाई से उन्होंने एक फूंक लगाई और आदरपूर्वक बाबा को लौटा दी। बालाराम के लिए तो यह अनमोल घड़ी थी। वे ६ वर्षों से श्वास रोग से पीड़ित थे, पर चिलम पीते ही वे रोगमुक्त हो गए।’’

बाबा के चिलम पीने के दुर्गुण को दुर्गुण न बताकर उसको भी रोग-मुक्त करने का एक चमत्कार घोषित कर दिया।

जल से दीपक जलाने का एक और चमत्कार-‘‘बाबा को प्रकाश से बड़ा अनुराग था। वे सन्ध्या समय दुकानदारों से भिक्षा में तेल माँग लेते थे तथा दीपमालाओं से मस्जिद को सजाकर, रात्रिभर दीपक जलाया करते थे। यह क्रम कुछ दिनों तक ठीक इसी प्रकार चलता रहा। अब बनिए तंग आ गए और उन्होंने संगठित होकर निश्चय किया कि आज कोई उन्हें तेल की भिक्षा न दे। नित्य नियमानुसार जब बाबा तेल माँगने पहुँचे, तो प्रत्येक स्थान पर उनका नकारात्मक उत्तर से स्वागत हुआ। किसी से कुछ कहे बिना बाबा मस्जिद की ओर लौट आए और सूखी बत्तियाँ दीयों में डाल दी। बनिये तो बड़े उत्सुक होकर उन पर दृष्टि जमाये हुए थे। बाबा ने टमरेल उठाया जिसमें बिल्कुल थोड़ा-सा तेल था। उन्होंने उसे पुनः टीनपाट में उगल दिया और वही तेलिया पानी दीयों मे डालकर उन्हें जला दिया।’’

तेल के बजाये पानी से दीये जलाने के साँई बाबा के तथाकथित चमत्कार का भण्डाफोड़ २२-१०-२०१४ को टी.वी. के चैनल (न्यूज २४) पर शाम के साढ़े चार बजे पौराणिक सन्तों ने किया। उन्होंने तेल मिश्रित बाती दीये में रखी और उसमें  पानी भर लिया और दीया जला दिया। जितनी देर बाती में तेल का अंश है, उतनी देर तो दीया (उसमें पानी भरा होने पर भी) जलेगा ही। शंकराचार्य जी के समर्थक इन सन्तों ने कहा कि कि वे सांई-बाबा के सब चमत्कारों की पोल खोलेंगे।

सांई के व्यक्तित्व का यह विवरण इस पुस्तक में मिलता है-‘‘बाबा दिन भर अपने भक्तों से घिरे रहते और रात्रि में जीर्ण-शीर्ण मस्जिद में शयन करते थे। इस समय बाबा के पास कुल सामग्री-चिलम, तम्बाकू, एक टमरेल, एक लम्बी कफनी, सिर के चारों ओर लपेटने का कपड़ा ओर एक सटका था जिसे वे सदा अपने पास रखते थे। सिर पर सफेद कपड़े का एक टुकड़ा वे सदा इस प्रकार बाँधते थे, कि उसका एक छोर बाएँ कान पर से पीठ पर गिरता हुआ ऐसा प्रतीत होता था, मानों बालों का जूड़ा हो। हफ्तों तक वे इसे स्वच्छ नहीं करते थे। पैर में कोई जूता या चप्पल भी नहीं पहनते थे। केवल एक टाट का टुकड़ा ही अधिकांश दिन में उनके आसन का काम देता था। सर्दी से बचने के लिए वे धूनी (लकड़ी जलाकर आग) से तपते थे।’’ सांई बाबा की मृत्यु सन् १९१८ में हुई और उसके बाद तो सांई मन्दिरों में चढ़ावे का अम्बार बढ़ता ही गया। केवल अंध-श्रद्धा पर ही यह मत पुष्पित-पल्लवित होता गया एवं हो रहा है। मानवोपयोगी किसी सिद्धान्त या नियम से इस पंथ का कुछ भी सरोकार नहीं है। और इनके तथाकथित चमत्कारों की पोल पट्टी इनके के ही पौराणिक बन्धु सार्वजनिक रूप से कर रहे हैं। अन्य किसी को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।

पुट्टुपर्थी वाले श्री सत्य सांई बाबा मत का गोरख धन्धा भी शिरडी वाले बाबा के चमत्कार वाले बखानों से कुछ अलग नहीं है। अज्ञानान्धकार में जकड़े हिन्दू समाज में ताबीज, कण्ठी, झाड़-फूँंक और भभूत का भ्रमजाल चरम पर है। सत्य सांई बाबा सारी उम्र हवा में से भभूत (राख) पैदा करने का दावा करते रहे। उनके कई भक्त तो उनके चित्र में से भी भभूत निकलने का दावा करते थे। यह गनीमत रही कि उनके शव में से भभूत नहीं निकली। ये लोग भभूत को चमत्कारी दवा बताते थे, परन्तु विरोधाभास देखिए कि जो बाबा भभूत से रोग ठीक करने का उपक्रम करता था, उसी ने पुट्टुपर्थ्ीा में ५०० करोड़ की लागत से एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल भी स्थापित किया। जब भभूत से ही रोग ठीक हो रहे थे, तो सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल की स्थापना करने का औचित्य समझ से परे है, पर सत्यानारायण राजू उर्फ सत्य-सांई बाबा को पता था कि राख से कुछ होना जाना नहीं है। इसीलिए ८६ वर्ष की आयु में जब उनके गुरदे, लिवर, फेफड़े आदि जवाब देने लगे, तो बाबा को भी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में ही भर्ती कराया गया, राख का सहारा नहीं लिया गया। सच्चाई सिर चढ़कर बोली।

वैदिक वाङ्मय में एवं रामायण, महाभारत जैसे इतिहास ग्रन्थों में कहीं भी भभूत (राख) का किसी औषधि या आशीर्वाद के रूप में उल्लेख का प्रश्न ही नहीं है। यह भ्रमपूर्ण अवधारणा उन नाथों, सिद्धों, तथाकथित योगियों के सम्प्रदायों से उत्पन्न हुई है जिनका शास्त्र सम्मत प्रामाणिक वैदिक धर्म (हिन्दू धर्म) में कोई स्थान नहीं है। ये लोग आबादी से दूर निर्जन स्थानों में वनों में आग जलाकर (जिसे उनकी भाषा में धूनी लगाना कहा जाता था) बैठते थे और किसी नाम या तथाकथित मन्त्र का जाप करते थे। यही उनका तप था। धीरे-धीरे उन लोगो ने उदरपूर्ति के लिए यह प्रचार शुरु कर दिया कि उनके मन्त्र-जाप से वह धूनी (अग्नि) अलौकिक शक्ति सम्पन्न हो जाती है, जिसके पास बैठकर वे जप करते हैं, और उसकी राख भी। कई फकीरों ने उसी राख से मस्तक पर तिलक लगाना आरम्भ कर दिया, उसी को शरीर पर लगाना आरम्भ कर दिया । यही बाद में आशीर्वाद के तौर पर और रोगोपचार के लिए दवा के रूप में बाँटी जाने लगी। यही राख सत्य सांई बाबा का मुख्य चमत्कार बन गयी। उनके शिष्य जाने-अनजाने में इतने भ्रमित हुए कि मरे हुए बाबा के लिए भी कहते रहे कि बाबा समाधि लगाए हैं। बड़े नाटकीय ऊहापोह के पश्चात् उनके शव का अन्तिम संस्कार किया जा सका।

भभूतवादियों ने यह प्रचार बड़े जोर शोर से किया कि जो इस भभूत (भस्म) को धारण करता है, उससे तो मृत्यु भी डरती है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने कहा है- ‘‘जब रुद्राक्ष भस्म धारण करने से यमराज के दूर डरते हैं, तो पुलिस के सिपाही भी डरते होंगे? जब रुद्राक्ष भस्म धारण करने से कुत्ता, सर्प, सिंह, बिच्छु, मच्छर और मक्खी आदि भी नहीं डरते तो न्यायाधीश (यमराज) के गण क्यों डरेगे?’’ सत्यार्थ प्रकाश -एकादश समुल्लास

सांई बाबाओं की आध्यात्मिक शक्ति का शोर मात्र छल कपट और हाथ की सफाई के अलावा कुछ नहीं था। चमत्कारों के सहारे उन्होंने भोली भाली, ज्ञान-शून्य जनता को ठगा और उनके कर्त्ताधर्त्ता अब भी ठग रहे हैं। कोई तर्क संगत, बुद्धिगम्य और मानवोपयोगी, विज्ञान-परक सिद्धान्त इन्होंने प्रतिपादित नहीं किया। चमत्कारों का प्रोपैगेण्डा, ढौग, छल-कपट, सांई का महिमा मण्डन अवतारीकरण, ईश्वरीकरण ही इस मत का सर्वस्व है।

सन्दर्भ पुस्तकें

१. श्री सत्य सांई बाब का कच्चा चिट्ठा

२. श्री सांई सच्चरित्र

३. अवतार गाथा

४. सरिता पाक्षिक पत्रिका का अगस्त २०१४ (द्वितीय) अंक

५. सद्गृहस्थ सन्त-भक्त रामशरण दास

– ७५१/६, जागृति विहार, मेरठ, (उ.प्र.)

 

सांई बाबा मत

सांई बाबा मत

– सत्येन्द्र सिंह आर्य

वर्ष 1875 ईसवी में आर्य समाज की स्थापना के समय भारत में लगभग एक सहस्र मत-मतान्तर विद्यमान थे। उनमें से कुछ की समीक्षा महर्षि दयानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने अमर ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में की है। आर्य समाज जैसे सुधारवादी आन्दोलन के आरभ होने के बाद भी नये-नये मतों का उद्भव होता रहा है। सांई बाबा मत भी उन्हीं में से एक है। 20 वीं शतादी के आरभ में इस मत का उदय महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ।

मध्य-युग (भक्ति काल) में सांई शबद ‘स्वामी’ के अर्थ में, ‘ईश्वर’ के लिए, किसी को आदरपूर्वक सबोधित करने के लिए प्रयोग में होता रहा है। जैसे किसी कवि ने लिखा-

सांई इतना दीजिए जा में कुटम समाय।

मैं भी भूखा न रहूँ, पथिक न भूखा जाय।।

परन्तु इस शबद से किसी मत-पंथ का बोध नहीं होता था। उन्नीसवीं शताबदी के अन्त और बीसवीं शताबदी के आरमभ में शिरडी (महाराष्ट्र) की एक मस्जिद के मुस्लिम फकीर की प्रसिद्धि सांई-बाबा के नाम से हो गयी और उसके नाम से एक नया पंथ चल पड़ा। सांई-बाबा के नाम से मन्दिर बन गये और वही मुस्लिम फकीर हिन्दुओं की अन्ध भक्ति के कारण अवतार, भगवान और न जाने क्या-क्या बन गया।

स्वार्थ की पराकाष्ठा के कारण व्यक्ति कम परिश्रम से कम समय में माला-माल होना चाहता है। मत-पंथों का धन्धा इस हेतु सर्वाधिक अनुकूल सिद्ध होता है। आन्ध्र प्रदेश के अनन्तपुर जिले में चित्रवती नदी के किनारे पुट्टुपर्ती ग्राम में वर्ष 1926 में जन्में ‘सत्यनारायण राजू’ नाम के बालक ने भी युवा होते-होते यही धन्धा अपनाया और ये ‘‘श्री सत्य सांई बाबा’’ नाम से विखयात हो गये। ‘सांई बाबा’ और ‘‘श्री सत्य सांई बाबा’’-ये दोनों नाम एक जैसे ही हैं। अगर ये सत्य नारायण राजू (पुट्टुपर्ती वाले सांई बाबा) अपने को किसी अन्य नाम से पुजवाते तो कुछ कठिनाई भी आती और प्रसिद्धि प्राप्त करने में कुछ समय भी लगता। वह पुराना ‘सांई बाबा’ चला-चलाया नाम था, इन्होंने कह दिया मैं ही आठ वर्ष पहले ‘सांई बाबा’ था, उसी का अवतार मैं हूँ।

(शिरडी वाले सांई बाबा की सन् 1918 में मृत्यु हो गयी थी।) अब ये अवतार बन गये और पुजने लगे। वेद-विद्या के प्रचार-प्रसार के अभाव में देश में भेड़-चाल है। लोग सत्य, सदाचार, न्याय की तुलना में चमत्कार की ओर को खिंचे चले जाते हैं। इन्होंने भी हाथ की सफाई दिखाई, अपने झबरे बालों में से भभूत, हाथ-घड़ी निकालने का चमत्कार दिखाया, कुछ गप्पें अपने बारे में प्रचारित करायीं और सिद्ध बन गये।

शिरडी वाले तो सिर्फ सांई-बाबा ही थे और उनका अवतार होने का सिक्का चल गया था। पहले वाले सांई बाबा के भक्तों ने उन्हें (नये बाबा को) मान्यता नहीं दी, तो इनके भक्तों ने क्या किया, कि सांई बाबा नाम तो उस तथा कथित अवतार का ले लिया तथा ‘‘सत्य’’ शबद जो ‘‘सत्यनारायण राजू’’ नाम बचपन का था, उससे ले लिया। ‘‘श्री ’’ अपनी ओर से समान की दृष्टि से लगाया और बन गए पूरे ‘‘श्री सत्य सांई बाबा’’। यह इसलिए भी किया कि पहले वाले सांई बाबा को असत्य सिद्ध करने की आवश्यकता ही न रही। भक्तों ने स्वयं ही कहना आरमभ कर दिया कि सत्य तो ये ही हैं। ऊपर से चमत्कारों का  प्रोपैगेण्डा आरभ कर दिया जैसे कि इनके चित्र से शहद का टपकना, राख का झड़ना, लाईलाज बीमारियों का ठीक होना। ठगी करने के लिए ये ढोंग आवश्यक हैं ही। पुट्टुपर्थी वाले बाबा (अभी साल दो साल पूर्व ही इनकी मृत्यु हुई है) माडर्न महात्मा अपने को प्रदर्शित करते थे और स्वयं को बाल ब्रह्मचारी बताते थे, परन्तु विवाहित थे और इनकी पत्नी हैदराबाद के एक अस्पताल में नर्स थी। यही अवतारी बाबा पहले औरगांबाद (मराठवाड़ा) में पागलों की भाँति आवारागर्दी करते फिरते थे। यह सब विवरण सार्वदेशिक पत्रिका के 16 सितबर सन् 1973 के अंक में प्रकाशित हुआ है। बड़ी राशि के लेन-देन के सिलसिले में इसी बाबा के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा भी चलाया गया था, जिसमें कुछ रकम तो बाबा को वापस करनी पड़ी थी, परन्तु अर्काट जिले के दो भाइयों श्री टी.एम. रामकृष्ण तथा मुथुकृष्ण के लगभग एक लाा रुपये डकारने में ये अवतारी पुरुष? सफल हो गये थे।

लगभग एक डेढ़ शताबदी के अन्दर काफी सीमा तक एक जैसे ही नाम वाले इन दो सांई बाबाओं के नाम पर सांई-बाबा मत चल निकला और ऐसा चला कि अपनी पन्थाई दुकानदारी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता देखकर एक जगत् गुरु शंकराचार्य तक भी व्यथित हो गए।

सांई बाबा मत का कोई ऐसा प्रामाणिक ग्रन्थ दृष्टि में नहीं आया, जिसमें इस पंथ के ईश्वर, धर्म, सृष्टि-निर्माण, आत्मा-परमात्मा विषयक आध्यात्मिक विवेचन, स्वर्ग, नरक, मुक्ति जैसे विषयों की चर्चा, सुसन्तान के निर्माण, सुाी गृहस्थी बनने के बुद्धि-गय सुझाव दिये गये हों। जो पुस्तकें उपलध हैं, वे इस प्रकार की हैं, जैसे-‘‘अवतार गाथा,’’ ‘सांई बाबा का चमत्कारी व्यक्तित्व’, A Man of Miracles

‘‘श्री सांई सच्चरित्र’’ (श्री सांई बाबा की अद्भुत जीवनी और उनके अमूल्य उपदेश) आदि। पूर्व-उल्लिखित ‘‘श्री सांई सच्चरित्र’’ पुस्तक मूल रूप से मराठी में है और इसके लेखक हैं, कै. गोविन्दराव रघुनाथ दाभोलकर (हेमाडपन्त)। पुस्तक के  हिन्दी संस्करण के अनुवादक श्री शिवराम ठाकुर हैं। इस पुस्तक का जो संस्करण मुझे प्राप्त हो सका, वह सन् 2007 में प्रकाशित हुआ 18 वां संस्करण है, जिसकी 1 लाख प्रतियाँ मुद्रित हुई हैं, ऐसा उल्लेख है और उससे पहले संस्करण (17 वाँ) की प्रतियाँ ढाई लाख बतायी गयी हैं। यदि वास्तव में पुस्तक की इतनी बड़ी संखया में प्रतियाँ छपी हैं, तो यह विस्मयकारी है। पुस्तक में 51 अध्याय हैं।

पुस्तक में सांई बाबा के जीवन की चमत्कारों से परिपूर्ण झाँकिया आदि से अन्त तक भरी पड़ी हैं। मत-पंथ कोई भी हो बिना चमत्कारों के टिक नहीं सकता। ईसाइयत, इस्लाम, जैन, बौद्ध, चारवाक, ब्रह्माकुमारी, राधास्वामी आदि सभी मत अपने-अपने संस्थापकों के जीवन में काल्पनिक चमत्कारों की गाथाएँ जोड़कर ही खड़े रह सके हैं। महाराज मनु प्रोक्त धर्म के 10 लक्षणों से उनका कुछ लेना-देना नहीं होता। सांई बाबा मताी उसी प्रकार चमत्कारों एवं आडबरों का गोरख धन्धा है। सांई को भगवान, भगवान का अवतार, अद्भुत चामत्कारिक शक्तियों से समपन्न अलौकिक दिव्यआत्मा सिद्ध करने के लिए आकाश-पाताल एक किये गये हैं। ‘श्री सांई सच्चरित्र’ पुस्तक के आरा में प्रथम अध्याय में वन्दना करने का उपक्रम करते हुए लेखक सांई का पूरा अवतारीकरण करने का प्रयत्न करता है। उन्हीं के शबदों में-

‘‘पुरातन पद्धति के अनुसार प्रथम श्री गणेश को साष्टांग नमन करते हैं, जो कार्य को निर्विघ्न समाप्त कर उसको यशस्वी बनाते हैं और कहते हैं, कि श्री सांई ही गणपति है।’’

….‘‘श्री सांई भगवती सरस्वती से भिन्न नहीं है, जो कि स्वयं ही अपना जीवन संगीत बयान कर रहे हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश, जो क्रमशः उत्पत्ति, स्थिति और संहारकर्त्ता हैं और कहते हैं कि सांई और वे अभिन्न हैं। वे स्वयं ही गुरु बनकर भवसागर से पार उतार देंगे।’’

सांई बाबा को अन्तर्यामी (सर्वज्ञ) सिद्ध करने के लिए लेखक ने एक घटना का उल्लेख किया है। लेखक शिरडी पहुँचे और वहाँ साठेवाड़ा नाम के स्थान पर अपने एक शुभचिन्तक श्री काक साहेब दीक्षित (जो सांई बाबा के बड़े भक्त और नजदीकी थे) के साथ इस आशय की बात कर रहे थे कि गुरु धारण करने की आवश्यकता नहीं है। इस पर काका साहेब ने उन्हें कहा ‘‘भाई साहब, यह निरी विद्वत्ता छोड़ दो। यह अहंकार तुहारी कुछ भी सहायता न कर सकेगा।’’ इस  प्रकार दोनों पक्षों के खण्डन-मण्डन में एक घण्टा व्यतीत हो  गया और बात अनिर्णीत ही रही। लेखक महोदय आगे कहते हैं-‘‘जब अन्य लोगों के साथ मैं मस्जिद गया तब बाबा ने काका साहेब को समबोधित कर प्रश्न किया कि साठेवाड़ा में क्या चल रहा था? किस विषय में विवाद था? फिर मेरी ओर दृष्टिपात कर बोले कि इन ‘हेमाडपन्त’ ने क्या कहा। ये शबद सुनकर मुझे अधिक अचमभा हुआ। साठेवाड़ा और मस्जिद में पर्याप्त अन्तर था। सर्वज्ञ या अन्तर्यामी हुए बिना बाबा को विवाद का ज्ञान कैसे हो सकता था?’’

बाबा की इस सर्वज्ञता? या अन्तर्यामीपन की पोल एक पौराणिक सद्गृहस्थ-सन्त भक्त रामशरण दास (पिलखुआ) ने इस प्रकार खोली है-

‘‘सांई साहब मुसलमान हैं। वह भी अपने को अतवार तथा और भी न जाने क्या-क्या बतलाया करते थे। बहुत से मनुष्य इनके चंगुल में फँस गये थे, परन्तु कुछ दिन हुए एक लुहारिन ने इनके अवतारपने की सब पोल खोल दी। सांई जी को जब सब लोग बड़ी श्रद्धा के साथ घेरे हुए थे, तो उस समय एक लुहार भी बड़ी श्रद्धा के साथ आपको अपने मकान पर लिवा लाया। लुहार की स्त्री लुहारिन भी वहीं पर उनके पास बैठ गई। कुछ देर में सांई साहब ने एकाएक बहुत क्रोध में आकर बुरा-बुरा मुँह बनाकर अपना डंडा उठाकर धड़ाम से एक किवाड़ में दे मारा और कहा कि ‘जा साले!’ सबने हाथ जोड़कर पूछा कि सांई साहब क्या बात है? सांई साहब ने अपने को त्रिकाल दर्शी कहते हुए कहा कि अरब में इस समय एक कुत्ता काबे को नापाक कर रहा था। मुझे वह दिख रहा था। मैंने उसे यहीं पर बैठे हुए दे मारा है। यह सुनकर सब लोग हाथ जोड़कर और भी ज्यादा श्रद्धा करने लगे।’’

‘‘लुहारिन होशियार थी, उसने कहा कि सांई साहब मैं आपके लिए चावल बनाकर लाती हूँ, आप बैठे रहना। वह अन्दर गई और चावल बनाये, जब चावल बन चुके, तो उसने एकबर्तन में पहले बूरा (चीनी) रखा और फिर बूरा के ऊपर चावल इस तरह से रखे कि जिससे वह बूरा बिल्कुल ही न दिखे। फिर उस बर्तन को लाकर उसने सांई साहब के सामने रख दिया। लुहारिन चावल रखकर एकदम अन्दर मकान में चली गई। सांई साहब ने समझा कि वह मेरे लिए बूरा लेने गयी है। जब बहुत हो गयी तो उन्होंने उसे बुलाया और कहा कि बूरा क्यों नहीं लाई? उसने कहा कि बूरा तो घर में है ही नहीं। साँई साहब ने क्रोध में भरकर कहा कि हम बिना बूरा के चावल नहीं खाते। इतना कहते ही लुहारिन उठी और सांई साहब की दाढ़ी पकड़कर दे मारा और उनका सब सामान उठाकर बाहर फेंक दिया। पूछने पर उसने कहा कि भला इसे हजारों कोस का कुत्ता तो दिखता है, पर बिल्कुल सामने रखा चावलों से ढका बूरा नहीं दिखता। सब यह देखकर चकित हो गये और सबने उसके ढोंग को समझ लिया।’’

सद्गृहस्थ-सन्त, भक्त रामशरणदास-पृष्ठ 385-86

साधु, फकीर, सन्त, संन्यासी तो जमीन पर पैर रखकर सामान्य जन कीााँति चलते फिरते हैं, परन्तु उनके भक्त और अनुयायीगण उनको समुद्र की सतह पर चला देते हैं, आकाश में पक्षियों की भाँति उड़ता हुआ दिखा देते हैं। सांई बाबा के साथाी लेखक ने ऐसा ही किया। ‘‘श्री सांई सच्चरित्र’’ पुस्तक के पृष्ठ 16 पर श्री सांई ने निम्नलिखित अति सुन्दर उपदेश दिया-

‘‘तुम चाहो कहीं भी रहो, जो इच्छा हो, सो करो, परन्तु यह सदैव स्मरण रखो कि जो कुछ तुम करते हो, वह सब मुझे ज्ञात है। मैं ही समस्त प्राणियों का प्रभु हूँ और घट-घट में व्याप्त हूँ।’’

‘‘मेरे ही उदर में सब जड़ व चेतन प्राणी समाये हुए हैं। मैं ही समस्त ब्रह्माण्ड का नियंत्रणकर्त्ता व संचालक हूँ। मैं ही उत्पत्ति स्थिति और संहारकर्त्ता हूँ। मेरी भक्ति करने वालों को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता।’’

‘‘बाबा की विशुद्ध कीर्ति का वर्णन निष्ठापूर्वक श्रवण करने से भक्तों के पाप नष्ट होंगे। अतः यह मोक्ष प्राप्ति का भी सरल साधन है। सत्य युग में  शम तथा दम, त्रेता में त्याग, द्वापर में पूजन और कलियुग में भगवत कीर्तन ही मोक्ष का साधन है।’’

शेष भाग अगले अंक में….