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शिक्षा – योगेन्द्र दमाणी

जब से मैंने क, ख, ग, घ, सीखा है तब से मैं यह सुनता आया हूँ कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह शायद ठीक ही  है। शायद शब्द का व्यवहार इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरा यह सौभाग्य कम हो पाया कि उस प्रधानता को मैं देख सकूँ। इतने बड़े देश में सब तरह के कार्य होते हैं और किसी एक को कम या अधिक रूप में देखना उचित भी नहीं। हर एक से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। जैसे कृषि को ही लें। खेतालिहानों में हम पाते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता के साथ कृषि का कार्य करते हुए बड़े होते हैं उन्हें कृषि सिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। बहुत कम अक्षरी शिक्षा में भी ये लोग अपना जीवन-निर्वाह कर लेते थे, अब भी कर लेते हैं। कुछ ऐसा माहौल बनाया या बिगाड़ा गया कि अक्षरी शिक्षा का भूत इन पर भी सवार कराया जाने लगा और अब वो आत्महत्या करते हुए पाए जा रहे हैं। (कारण कुछ और भी हो सकते हैं।) हमारे यहाँ शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षरी शिक्षा के ज्ञान को ही माना जाने लगा। शिक्षा का मतलब ए, बी, सी, डी, ही हो गया। लोहार के बेटे को यह बताने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी कि लोहे को पीटा कैसे जाता है, यह तो वह परिवार के साथ काम करते हुए स्वयं ही सीख जाता था। इसी तरह बुनकर, बढ़ई या और कोई भी अन्य हाथ से काम करने वाले के लिए भी यही बात लागू थी। भारत सोने का देश था क्योंकि सामान्य ज्ञान और शिल्पकला की वजह से लोग अपने सीमित दायरे में रहते हुए संचय क रते थे और जीवन खुशी से व्यतीत करते थे। आज सब तरफ त्राहि-त्राहि हो रही है। शिल्पविद्या की शिक्षा पर फिर से बल दिया जा रहा है। क्योंकि हम पहले गलत दिशा में चलते हैं और फिर सुधार के कार्यक्रम लागू करते हैं। जब बच्चे अपने या अपने आसपास के लोगों के साथ जीविकोपार्जन की शिक्षा लेते थे तब उनक ो हमारे तथा कथित सय समाज ने बाल मजदूरी का नाम दे दिया। इस दिशा में कार्य करने वालों की भावना अच्छी थी  कि नहीं, उनके पास ऐसे कार्यों को करने या करवाने के  पीछे किनका-किनका या किसका हाथ था, है यह तो इतिहास बतायेगा परन्तु यह सत्य है इसी एक मुद्दे ने इस देश से शिल्पकला रूपी स्वर्णिम भारत को हमसे छीन लिया। अक्षरी शिक्षा के नाम पर हजारों स्कूल और कॉलेज खोले गये। हर चीज से कुछ न कुछ लाभ होता ही होगा लेकिन इनकी हानि भी अब नजर आने लगी है और इस इन्टरनेट के जमाने में जब सब कुछ आन-लॉइन है तब तो अब के अध-पढ़े युवक-युवतियाँ तो अधर में ही है। सारा काम अब प्लास्टिक मनी कर देगी । किसी को किसी की आवश्यकता नहीं। सारे बाजार बन्द। घर से निकलना बन्द। यह आधुनिकता की हद है सुना है कि जापान का बच्चा, बचपन से ही छोटी-मोटी मोटर या अन्य यन्त्र बना लेता है क्योंकि वह बचपन से इन चीजों को करता है। (जिसे हम चाइल्ड-लेबर कहते हैं।) उसे अंग्रेजी सीखने के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता वह तो अपना समय शिल्पविद्या विकसित करने में लगाता है। चीनी आज किसी का मुहताज नहीं क्योंकि हर आदमी की चाहत कम है हर हाथ शिल्पकला का हाथ है और इस कारण उन्हें कम लागत पर सामान विकसित करना आ गया और इसलिए वे पूरे विश्व में छाते जा रहे हैं।

मैं अभी कुछ दिन पहले अमेरिका में था। वहाँ के मूल लोगों को अपनी भाषा के अलावा कोई और भाषा आती ही नहीं। वह चाहे अंग्रेजी हो या स्पेनिश। वहाँ भी बचपन से बच्चे काम करते देखे जा सकते हैं। चाइल्ड-लेबर का वहाँ कोई ऐतराज नहीं। क्योंकि अल्प शिक्षा पर भी वो अपना जीवन बड़े आराम से व्यतीत कर लेते हैं। दुनिया के किसी अन्य कोने में क्या हो रहा है या नहीं यह जानकारी उन्हें हो या न हों किन्तु अपने कार्य में  वे दक्ष हैं और इसका एकमात्र कारण है कि बचपन से खेलते-खेलते हुए वे पा लेते हैं अपने जीवन यापन की जानकारी में प्रगाढ़ता। यह नहीं है कि भारत पहले ऐसा ही था। हमारा अध्यात्म तो उनसे कई गुना आगे है किन्तु ‘जब अपने ही घर को आग लग गई अपने चिराग से’ तो कोई क्या क रे । हमने आध्यात्म की शिक्षा बिल्कुल छोड़ दी। चार आश्रमों के  आधार पर 25 वर्षों तक शिक्षा तत्पश्चात् गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर संन्यास। यहाँ शिक्षा का गूढ़ अर्थ था (शिक्षा, जिससे विद्या, सयता, धर्मात्मता, जितेन्द्रियता आदि की बढ़ती होवे और उनसे अविद्या आदि दोष छूटें। उसी को शिक्षा कहते हैं- महर्षि दयानन्द सरस्वती) अक्षरी शिक्षा के साथ-साथ जिनका जो कार्य था वह माता-पिता अपने बच्चों को वही ज्ञान, या उसके लगाव वाला ज्ञान देते-देते उसे इतना दक्ष  बना देते थे कि वह गृहस्थ का भार बड़े आराम से उठा सकता था। यदि इस 25 वर्ष की अवधि को सब अपनाते तो कोई बेरोजगारी नहीं होती। पचास वर्ष का होने पर व्यक्ति समाज सेवा में लगते और अन्तिम पच्चीस पूरे विश्व के साथ-साथ अध्यात्म के लिए समर्पित होता। गृहस्थ इसका (समस्त आश्रमियों का) पूरा भार उठाता था। आज रिटायर करना पड़ता है, होते नहीं हैं। यह नहीं सोचते कि अगर आप रिटायर नहीं होंगे तो एक युवक का भाग्य आप छीन रहे हैं और इसका प्रतिफल या तो रोगों में या अवसाद आदि में आखिर तो मिलेगा ही। यह पहला या आखिरी जीवन नहीं, इसका कारण ये अक्षरी शिक्षा का तांडव है जो कि जानबूझकर हमारे समाज को विघटित करने एवं कराने के उद्देश्य से विदेशी षडयन्त्रों के रूप में हमारे अपनों द्वारा कराया जाता है। आप कोई भी इस तरह के  कार्य में जिससे आपकी संस्कृति बिखरती है लग जाइए आप को कोई न कोई विदेशी पुरस्कार तो पुकार ही लेगा।

शिक्षा पद्धति को सही दिशा में ले जाना है तो इस मानसिकता से हमें हटना होगा कि चाइल्ड लेबर कुछ होता है। हम अगर लेबर से मुंह मोड़ने लगे तो सिर्फ  और सिर्फ बेरोजगार ही दिखेगा। हर अक्षरी शिक्षा के पण्डित को भी हाथ के  हुनर जानने वाले की आवश्यकता अवश्य पड़ती है। तो उसकी कीमत ज्यादा और हुनर वाले की कीमत कम क्यों? यदि इस कीमत के  फासले को कम कर दिया जाय तो फिर से लोग हस्तकला सीखने के लिए प्रेरित हो जाएंगे। शिक्षा वह भी है और यह भी -यह मूलमन्त्र है। सिर्फ स्कूलों, कॉलेजों की डिग्री काम करने का ठप्पा का ही महत्व तो नहीं होना चाहिए। इन डिग्री देने वालों को पहले तो किसी बिना डिग्री वाले ने ही दी होगी। इसमें जब कोई सन्देह नहीं तो फिर उसी से हम बैर क्यों कर बैठे। अंग्रेजी शिक्षा ने क्लर्क  तो बहुत उत्पन्न कर दिये जो नौकरिया करने के लिए तत्पर हैं। महीने का मेहनताना मिल जाय बस। कोई यह भी नहीं सोचता कि हम उतना नौकरी देने वाले को दे या पा रहे हैं कि नहीं। किसी क्लर्क को आप रख कर देखिए। वह काम ठीक से करे या न करे। तन्खाह तो उसे सही समय पर चाहिए ही। हमने भी ऐसे अनगिनत कानून बना डाले कि नौकरी देने वाला ही व्यावहारिक रूप में मानो सबसे बड़ा गुनाहगार हो। इस मानसिकता से हटे बिना हम विदेशी शिकन्जे में फँसे रहेंगे। हम कमजोर रहें, अपनी संस्कृति से दूर रहें-यही उनकी नीति रही है। आज व्यवसाय वाले के सामने अनगिनत व्यवधान डाले जाते हैं। जहाँ अक्षरी शिक्षा नीति के कारण हजारों लोग बेरोजगार हैं, (जिसमें उनका दोष नहीं) वहाँ इतने कानून कि कुछ शुरुआत के पहले आप उन कानूनों को कैसे पालन करेंगे यही दिमाग खराब कर देता है। इस शिक्षा नीति ने हमें या तो सिर्फ राईट या सिर्फ लेट कर दिया है। समन्वय का इसमें अवसर ही नहीं है। कारोबार करने वाले और उसमें काम करने वाले दोनों का सही समन्वय भी तो आवश्यक है। किसी कारखाने के बन्द होने में दोनों पक्ष कहीं न कहीं उत्तरदायी होते हैं। बंगाल तो इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यहाँ काम करने वाला समय के बाद पहुँचता है और जल्दी जाने की चेष्टा करता है। पैसे देने वाला भी जितना देर से व जितना कम दे सके यही सोचता है। वह भी क्या करे उधार ने जीवन तबाह कर रखा है। सब कुछ इतना उलट-पुलट क्यों हो रहा है इसे विचारने की आवश्यकता है। गूढ़ता में खोजने पर गलत शिक्षा, आध्यात्म रहित शिक्षा, हस्तकला रहित शिक्षा, अत्यधिक भौतिकता, कानून की गलत धाराएँ चारों ओर यही सब नजर आएँगे। हुनर की शिक्षा के स्कूल खोलिए, प्रेक्टिकल काम करने का मौका विकसित कराइये बचपन से ही। बच्चों को बढ़ई, लोहार, कुहार राजमिस्त्री, वैद्य, मैकनिक, कृषि आदि की डिग्री भी दीजिए। जो अक्षर ज्ञान चाहे उनके लिए वो और जो ये सब चाहें उनको ये। बच्चे सही शिक्षा प्राप्त कर सकें इसके उपाय करने की नितान्त आवश्यकता है। सिर्फ हमारी आज की कथित अक्षरी शिक्षा से समन्वय नहीं होगा। अति सर्वत्र वर्जयेत।

 

आखिर संस्कृत व हिन्दी भाषा का विरोध क्यों? : शिवदेव आर्य

sanskrit

 

वर्तमान में प्रचलित संस्कृत और हिन्दी के विवाद के शब्द निश्चित ही आपके कानों में कहीं से सुनायी  दिये होगें। कुछ ही दिन पहले केन्द्र सरकार ने हिन्दी को बढ़ावा देने की बात कही थी, जिसका विपक्ष के लोगों और दक्षिणी लोगों ने विरोध किया था। आज आजादी के छः दशकों के बाद भी हमारे देश के काम-काज की भाषा हिन्दी नहीं बन पायी है, क्योंकि देश के जो भी नीति-निर्माता रहे उन्होंने हिन्दी के साथ बहुत भेदभाव किया, जिसके कारण हिन्दी आगे नहीं बढ़ पायी है।

आज भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और समझी जाने वाली भाषा हिन्दी है। सम्पूर्ण विश्व में भी हिन्दी का वर्चस्व है। लेकिन उसके पाश्चात् भी भारत के नेताओं ने कभी हिन्दी को बढ़ावा नहीं दिया। हिन्दी राजभाषा है, इसके बाद जब उसका इतना बुरा हाल हो सकता है तो फिर और भाषाओं के विकास की चर्चा करना ही व्यर्थ है। हिन्दी सप्ताह सभी सरकारी कार्यालयों में मनाना होता है। आज कार्यालयों के बाहर हिन्दी सप्ताह में भी सरकारी कर्मचारी हिन्दी में काम करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इससे ज्यादा दुर्गति इस भाषा की क्या हो सकती है?

हिन्दी की दुगति का एक और सबसे बड़ा कारण आधुनिक शिक्षा नीति है। आज प्रत्येक अमीर व गरीब व्यक्ति हिन्दी माध्यम से अपने बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहता है। उनके मन में अंग्रेजी  इतने अन्दर तक बैठ चुकी है कि वे समझते है कि अंग्रेजी के बिना तो पढ़ना ही व्यर्थ है। इसके कारण आने वाली पीढ़ी अंग्रेजी के प्रति तेजी से बढ़ रही है। यह एक भयंकर समस्या है, क्योंकि अंग्रेजी से पला-बढ़ा बच्चा भारतीय संस्कृति और भारतीय परम्पराओं के लुप्त होने का खतरा बढ़ गया है। आज भारत के एक गाॅव किसान का बेटा भी हिन्दी भाषा में लिखे अंकों को न तो बोल पाता है और न ही समझ पाता है। इसके पीछे कारण हिन्दी का घटता वर्चस्व और अंग्रेजी का बढ़ता महत्त्व है।

आज भारतीय व्यक्ति हिन्दी बोलने में शर्म महसूस करता है और अंग्रेजी बोलने में वह गर्व महसूस करता है। इसके पीछे सरकार की नीतियाॅं, शिक्षा और पश्चिमी सभ्यता है। आज तक पीछे की सरकारों ने हिन्दी को दबाने का काम किया है। अगर मोदी सरकार हिन्दी को बढ़ाने का काम करती है तो इसमें इतने विरोध की क्या आवश्यकता ? अपने ही हिन्दी भाषी बहुल देश में अगर हिन्दी का विकास नहीं होगा तो फिर कहाॅं होगा? अंग्रेजी के उत्थान के लिए अनेक विकसित देश लगे हुए है पर क्या भारत की हिन्दी भाषा का विकास कोई और देश करेगा?

संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 2011 से सी-सेट का प्रश्न पत्र लगाया गया। इस प्रश्न पत्र के आते ही हिन्दी भाषी प्रान्तों के छात्र, कृषक परिवार के छात्र अर्थात् जो भी कला वर्ग से पढ़ा  हुआ छात्र है, वह इस परीक्षा से इस प्रश्नपत्र ने बाहर कर दिया, क्योंकि इस प्रश्नपत्र का विषय ही ऐसा बनाया है कि इसमें हिन्दी पृष्ठभूमि के छात्र आगे जा ही न सकें। यह तथ्य लगातार तीन वर्षों से आयोजित हुई परीक्षा के परिणामों से स्पष्ट है। जहाॅं पहले हिन्दी पृष्ठभूमि के छात्र सर्वोच्च अंक प्राप्त करते थे। आज वे प्रारम्भिक सौ छात्रों में भी नहीं आ पा रहे है। इससे सैंकड़ों हिन्दी भाषी छात्र  आई.ए.एस., आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. बनने से चूक रहे हैं। वर्ष 2011 में प्रारम्भिक परीक्षा में 9324 लोग अंग्रेजी माध्यम से उत्तीर्ण हुए, जबकि हिन्दी भाषी छात्रों का विरोध करना बिल्कुल उचित है। क्योंकि वे इस परीक्षा के पहले चरण में ही बाहर हो रहे है। यह संविधान में उल्लिखित सामाजिक न्याय की भावना के अतिरिक्त मूलभूत अधिकारों अनुच्छेद 14 यानी समानता का अधिकार को राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन था नियुक्ति से सम्बन्धित  विषयों अवसर की समानता की गारष्टी का भी उल्लंघन है।

2011 में अलघ समिति की अनुशंसा के आधार पर संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में व्यापक परिवर्तन किये गये थे पर इस समिति ने अंग्रेजी को शामिल करने की कोई बात नहीं कही थी फिर भी बिना किसी आधार के अंगे्रजी को शामिल कर दिया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अंग्रेजी का है। आजादी के बाद 1979 तक तो अंगे्रजी के माध्यम से ही यह परीक्षा होती थी। अनेक प्रयासों के बाद 1979 के बाद भारतीय भाषाओं के         माध्यम से उच्च पदों पर पहुॅंच सकें है। 2011 में कपिल सिब्बल की कृपा से यह सारी योजना बनी कि कैसे हिन्दी भाषियों के वर्चस्व को कम किया जाये। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये सारे नीतिनिर्माता नेता एवं उच्चपदस्थ अधिकारी विदेशों में रहकर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ते हैं, और फिर उसी विदेशी शिक्षानीति को भारत में लागू करते हैं। आज ऐसे लोगों के कारण ही हमारी भारतीय संस्कृति और भारतीय परम्परायें लुप्त हो रही हैं। सबसे बड़ा आन्तरिक खतरा आज हमें इन्हीं लोगों से है। आज अगर हिन्दी भाषी छात्र मोदी सरकार से न्याय की माॅंग करती है तो गलत क्या है? हिन्दी समर्थक सरकार है तो निश्चित हिन्दी भाषी छात्रों की विजय है और होनी भी चाहिए।

1 अगस्त से 8 अगस्त तक संस्कृत सप्ताह प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस वर्ष मोदी सरकार ने सभी सी.बी.एस.सी. विद्यालयों में पत्र भेजकर संस्कृत सप्ताह मनाने का अनुग्रह किया है। इस पर देश में कही पर भी       विरोध नहीं हुआ है, लेकिन तमिलनाडू में जयललिता और करुणानिधि ने इसे अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भेद-भाव की राजनीति बताया है। इन नेताओं से मैं पूछना चाहता हूॅं कि जब विगत सरकार अंग्रेजी को हर जगह बसा रही थी, तब करुणानिधि कहाॅं गये थे? सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इनको बहुत अच्छा उत्तर दिया कि बोलने से पहले अपने नाम बदल लो, क्योंकि जयललिता और करुणानिधि शुध्द संस्कृत के नाम है। जिस भाषा का ये नेता समर्थन कर रहे हैं। वह तमिल भाषा भी संस्कृत पर ही आश्रित है अगर तमिल भाषा को वे सुरक्षित रखना चाहते है तो उससे पहले संस्कृत की सुरक्षा करनी पडे़गी। यह प्रयास निश्चित ही संस्कृत भाषा के लिए संजीवनी का काम करेगा, क्योंकि गत दिवसों में स्वयं गृहमन्त्री ने सदन में यह बताया कि संस्कृत भाषा सब भाषाओं की जननी है। इसके उच्चारण को समस्त विश्व ने वैज्ञानिक  माना है। इसका विकास होना चाहिए। सरकार का यह प्रयास नितान्त स्तुत्य है।

प्रिय पाठकगण! हिन्दी और संस्कृत भाषा आज तक उपेक्षा का परिणाम यह हो रहा है कि लोग हिन्दी भाषी व संस्कृतभाषी को हीन समझ रहे हैं। अंग्रेजी भाषी लोग अपने को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझ रहे हैं। चारों तरफ अंग्रेजी का ऐसा आतंक मच गया है कि लोग यह समझने लग गये है कि अंग्रेजी के विना तो जीवन व्यर्थ है। यह भावना हमें समाज से हटानी होगी। आज सरकार यदि संस्कृत और हिन्दी के संरक्षण का प्रयास करती है तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए। मेरा मानना है कि जो भी वास्तविक देशभक्त हैं, जिसके अन्दर देशहित की भावना है, वह व्यक्ति कभी भी हिन्दी और संस्कृत का विरोध करेगा  ही नहीं । भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अगर हम जीवित रखना चाहते हैं तो हमें निश्चित ही इन दोनों भाषाओं की रक्षा करनी चाहिए। इन्हीं भाषाओं के बाद अन्य भाषाओं की रक्षा सम्भव है। शुध्द हिन्दी पूर्णतः संस्कृत पर आधारित है। संस्कृत की सुरक्षा में सभी की सुरक्षा है। इसीलिए हम सबको अपने अपने प्रयासों से इन भाषाओं की रक्षा करनी चाहिए। हमारा एक अल्प प्रयास भी इन भाषाओं के लिए संजीवनी का काम करेगा। आप सबके विचारों की प्रतीक्षा में…….

गुरुकुल पौन्धा, देहरादून