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चलें यज्ञ की ओर…. शिवदेव आर्य, गुरुकुल-पौन्धा, देहरादून

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वेद व यज्ञ हमारी संस्कृति के आधार स्थम्भ हैं। इसके बिना भारतीय संस्कृति निश्चित ही पंगु है। यज्ञ का विधिविधान आदि काल से अद्यावधि पर्यन्त अक्षुण्ण बना हुआ है। इसकी पुष्टि हमें हड़प्पा आदि संस्कृतियों में बंगादि स्थलों पर यज्ञकुण्डों के मिलने से होती है।

वैदिक काल में ऋषियों ने यज्ञों पर अनेक अनुसन्धान किये। अनुसन्धान की प्रथा वहीं तक समाप्त नहीं हो गई अपितु इसका निर्वाहन निरन्तर होता चला आ रहा  है।  यज्ञ से प्राप्त अनेक लाभों को दृष्टि में रखते हुए शतपथ ब्राह्मणकार ने लिखा है कि ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतं कर्म’ अर्थात् यज्ञ संसार का सबसे श्रेष्ठ कर्म है और इसी श्रेष्ठ कर्म को करने  से मनुष्य सर्वदा सुखी रहता है। इसी बात को ऋग्वेद में निरुपित करते हुए लिखते हैं कि-

‘ईजानाः स्वर्गं यन्ति लोकम्’

यज्ञ शब्द के  विवेचन से हमें ज्ञात होता कि ‘यज्ञदेवपूजासंगतिकरणदानेषु’ इस धातु से यज्ञ शब्द सि द्ध होगा, जिसका अर्थ होगा – देवताओं की पूजा, संगतिकरण तथा दान।

देवपूजा से तात्पर्य है कि देवों की पूजा अर्थात् परमपिता परमेश्वर, अग्नि,  वायु, इन्द्र, जल, विद्युत्, सूर्य, चन्द्र आदि देवताओं एवं वेदविज्ञ विद्वान् मनीषियों का यथावत् आदर सत्कार करना। संगतिकरण का अर्थ होगा कि पदार्थों की परस्पर संगति करना। संगतिकरण शब्द ही यज्ञ में विज्ञान का द्योतक है। यही शब्द यज्ञ में विज्ञान को सिद्ध करता है। क्योंकि सम्पूर्ण विज्ञान में पदार्थों का संयोग ही तो है। इस यज्ञ में अनेकशः पदार्थों का हवि के रूप में संयोग होता है। दान अर्थात् परोपकार के कार्यों को करना। यज्ञ में वेदमन्त्रों के द्वारा पदार्थों को अग्नि में आहुत किया जाता है। अग्नि उस पदार्थ को सूक्ष्म करके अन्तरिक्ष में जाकर सभी प्राणियों को लाभ प्रदान करता है। यह परोपकार करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। यज्ञ हमारे जीवन का अमूल्य अंग है। इस बात को प्रकाश जी की ये पंक्ति सिद्ध करती  हैं कि-

यज्ञ जीवन का हमारे श्रेष्ठ सुन्दर कर्म है।

यज्ञ करना-कराना आर्यों का धर्म है।।

                महर्षि देव दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में उद्धृत किया  है कि ‘जब तक इस होम करने का प्रचार रहा तब तक आर्यावर्त देश रोगों  से रहित और सुखों से पूरित था। अब भी प्रचार हो तो वैसा ही हो जाये।’

यज्ञ शब्द के अर्थ से यज्ञ के अनेक लाभ स्वयं ही  सिद्ध हो जाते हैं। वेद-मन्त्रों में यज्ञ के बहुशः लाभों को उद्धृत किया गया है। यज्ञ हमारे परर्यावरण की हानिकारक दुर्गन्ध युक्त वायु को समाप्त कर शुद्ध वायु  को स्थान प्रदान कराता है। यह पदार्थ विद्या  का ही परिणाम है। अग्नि का ही यह सामथ्र्य है कि वह हानिकारक वायु को वहां से हटा कर शुद्ध वायु का प्रवेश कराती है। इससे पर्यावरण की शुद्धि तथा रोगों का विनाश अपने आप ही हो जाता है क्योंकि प्रायः करके सभी रोग पर्यावरण के प्रदुषण होने के कारण ही होते हैं।

जिन रोगों का शमन करने के लिए मेडिकल साइंस आज तक मौन है वहां यही यज्ञ चिकित्सों रोगों का शमन करती है। अथर्ववेद में यज्ञ चिकित्सा का बहुत विस्तृत पूर्वक वर्णन किया गया है।

यज्ञ के गुणों का वखान करते हुए स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज अपने अमर-ग्रन्थ सत्यार्थ-प्रकाश के द्वादश (12) समुल्लास में लिखते हैं कि ‘अग्निहोत्रादि यज्ञों से वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि द्वारा आरोग्यता का होना, उससे धर्म, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है।’

वेद हमें स्पष्ट रूप से यज्ञ करने का आदेश देता है कि -मनुष्यैरेवं भूतो यज्ञः सदैव कार्यः…..(यजुर्वेद-१.२२), कस्त्वा विमुंचति स त्वा विमुंचति कस्मै त्वा विमुंचति…(यजुर्वेद-२.२३)  इत्यादि मन्त्रों के माध्यम से ऋषि हमें नित्य-प्रति यज्ञ कर अपने चरमपद (मोक्ष) को पाने के लिए सदैव उद्यत रहना चाहिए, ऐसा  उपदेश देते हैं।

क्या यही हुतात्माओं का भारतवर्ष है? शिवदेव आर्य

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आज हमारे भारतवर्ष को गणतन्त्र के सूत्र में बन्धे हुए 66 वर्ष हो चुकें हैं। इन वर्षों में हमने बहुत कुछ पाया और बहुत कुछ खोया है। गणतन्त्रता का अर्थ है – हमारा संविधान, हमारी सरकार, हमारे कर्तव्य और हमारा अधिकार।

                भारत का प्रत्येक नागरिक जब गणतन्त्र दिवस का नाम सुनता है तो हर्ष से आप्लावित हो उठता है परन्तु जब वही नागरिक इस बात पर विचार करता है कि यह गणतन्त्रता तथा स्वतन्ता हमें कैसे मिली? तो उसकी आंखों से अश्रुधारा वह उठती है और कहने  लग जाता है कि –

दासता गुलामी की बयां जो करेंगे,

मुर्दे भी जीवित से होने लगेंग।

सही है असह्य यातनायें वो हमने,

जो सुनकर कानों के पर्दे हिलेंगे।।

26 जनवरी जिसे गणतन्त्र दिवस के नाम से जाना जाता है। इस दिवस को साकार करने के लिए अनेक वीर शहीदों ने अपने प्राणों की बलि दी थी। गणतन्त्र के स्वप्न को साकार रूप में परिणित करने के लिए अनेकों सहस्त्रों युवा देशभक्तवीरों ने अपनी सब सुख-सुविधाएं छोड़कर स्वतन्त्रता के संग्राम में अपने आप को स्वाहा किया। बहुत से विद्यार्थियों ने अपनी शिक्षा-दीक्षा व विद्यालयों को छोड़ क्रान्ति के पथ का अनुसरण किया। बहनों ने अपने भाई खोये, पत्नियों को अपने सुहाग से हाथ धोने पड़े, माताओं से बेटे इतनी दूर चले गये कि मानो मां रोते-रोते पत्थर दिल बन गयी। पिता की आशाओं के तारे आसमान में समा गये। जिसे किसी कवि ने अपनी इन पंक्तियों में इस प्रकार व्यक्त किया है-

गीली मेंहदी उतरी होगी सिर को पकड़ के रोने में,

ताजा काजल उतरा होगा चुपके-चुपके रोने में।

जब बेटे की अर्थी होगी घर के सूने आंगन में,

शायद दूध उतर आयेगा बूढ़ी मां के दामन में।।

सम्पूर्ण भारतवर्ष में हा-हाकार मचा हुआ था। अंग्रेज भारतीयों को खुले आम सर कलम कर रहे थे। चारों ओर खुन-ही-खुन नजर आ रहा था। पर ऐसे विकराल काल में हमारे देशभक्तों ने जो कर दिखाया उसे देख अंग्रेजों की बोलती बन्द हो गयी।

जब देश में जलियावाला हत्या काण्ड हुआ तो उधम सिंह ने अपने आक्रोश से लन्दन में जाकर बदला लिया। साईमन के विरोध में लाला लाजपत राय ने अपने को आहूत करते हुए कहा था कि- ‘मेरे खून की एक-एक बूंद इस देश के लिए एक-एक कील काम करेगी’। एक वीर योध्दा ऐसा भी था जो देश से कोसों दूर अपनी मातृभूमि की चिन्ता में निमग्न था और होता भी क्यों न? क्योंकि

-‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिया गरीयसी।’

अर्थात् जननी और जन्मभूमि दोनों ही स्वर्ग से भी महान होती हैं। इसीलिए वेद भी आदेश देता है कि- ‘वयं तुभ्यं बलिहृतः स्यामः’ अर्थात् हे मातृ भूमि! हम तेरी रक्षा के लिए सदैव बलिवेदी पर समर्पित होने वाले हों। शायद इन्हीं भावों से विभोर होकर सुभाष चन्द्र बोस जी ने आजाद हिन्द फौज सेना का गठन किया और ‘तुम मुझे खुन दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा लगाकर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया।

वह दिन भला कोई कैसे भूला सकेगा? जिस दिन राजगुरु, सुखदेव व भगतसिंह को ब्रिटिश सरकार ने समय से पहले ही  फांसी लगा दी।

अत्याचारियों के कोड़ों की असह्य पीडा को सहन करते हुए भी चन्द्रशेखर आजाद ने इंकलाब जिन्दाबाद का नारा लगाया। अरे! कौन भूला सकता है ऋषिवर देव दयानन्द को जिनकी प्रेरणा से स्वामी श्रद्धानन्द ने चांदनी चैक पर सीने को तानते हुए अंग्रेजों को कड़े शब्दों में कहा कि – दम है तो चलाओ गोली।

देशभक्तों को देशप्रेम से देदीप्यमान करने का काम देशभक्त साहित्यकारों तथा लेखकों ने किया। बंकिमचन्द्र चटर्जी ने ‘वन्दे मातरम्’ लिखकर तो आग में घी का काम किया। जो गीत देश पर आहुत होने वाले हर देशभक्त का ध्येय वाक्य बन गया। इस गीत को हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख सभी ने अपनाया । उन शहीदों के दिल के अरमान वस यही थे, जिनको कवि अपने शब्दों में गुन गुनाता है-

मुझे तोड़ लेना बन माली, उस पथ पर देना फेंक।

मातृभमि पर शशि चढ़ाने, जिस पथ पर जाएॅं वीर अनेक।।

मातृभूमि की रक्षार्थ शहीद होने वाले शहीदों की दासता कैसे भूलाई जा सकती है? हुतात्माओं ने स्वतन्त्रता के लिए अहर्निश प्रयत्न किया। भूख-प्यास-सर्दी-गर्मी जैसी कठिन से कठिन यातनाओं को सहन किया। धन्य हैं वो वीरवर जिन्होंने हिन्दुस्तान का मस्तक कभी भी नीचे न झुकने दिया। स्वतन्त्रता के खातिर हॅंसते-हॅंसते फांसी के फन्दे को चुम लेते थे, आंखों को बन्द कर कोड़ों की मार को सह लेते थे, अपना सब कुछ भूलाकर बन्दूकों व तोपों के सामने आ जाते थे। मां की लोरी, पिता का स्नेह, बहन की राखी, पत्नी के आंसू और बच्चों की किल्कारियां जिनको अपने पथ से विचलित नही कर पाती। उनका तो बस एक ही ध्येय हो ता था-‘कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम्’। देशभक्त जवान अंग्रेजों को ललकारते हुए कहा करते थे-

शहीदों के खून का असर देख लेना,

मिटा देगा जालिम का घर लेना।

झुका देगें गर्दन को खंजर के आगे,

खुशी से कटा देगें सर देख लेना।।

वीर हुतात्माओं के अमूल्य रक्त से सिंचित होकर आजादी हमें प्राप्त हुई है। जिस स्वतन्त्रत वातावरण में हम श्वास ले रहें हैं वह हमारे वीर हुतात्माओं की देन है। स्वतन्त्रता रूपी जिस वृक्ष के फलों का हम आस्वदन कर रहे हैं उसे उन वीर हुतात्माओं ने अपने लहु से सींचा है । आजादी के बाद स्वतन्त्रता का जश्न मनाते हुए नेताओं ने वादा किया था कि-

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।

वतन पर मिटने वालों का यही निशां होगा।।’

परन्तु बहुत दुःख है कि शायद वर्तमान में हमारे नेता इस आजादी के मूल्य को भूल बैठे हैं। उनके विचार में आजादी शायद खिलौना मात्र है, जिसे जहां चाहा फेंक दिया। जब चाहा अपने पास रख लिया किन्तु ऐसा नहीं है। हमारे नेताओं ने देश को जिस स्थिति पर लाकर खडा कर दिया है, क्या यही है वीर हुतात्माओं के स्वप्नों का भारत? क्या यही है मेरा भारत महान्? क्या यही दिन देखने के लिए वीरों ने अपनी बलि दी? आखिर क्यों हो रहा है।? इस परिदृश्य को देखते हुए कि कवि ने ठीक ही कहा है –

शहीदों की चिताओं पर न मेले हैं न झमेले हैं।

हमारे नेताओं की कोठियों पर लगे नित्य नये मेले हैं।।

धन्य है इस देश के नेता, जो गरीब जनता की खून-पसीने की कमाई को निज स्वार्थता में अदा कर देते हैं। घोटाले कर अपने घर को भर लेते हैं। वन्दे मातरम् गीत को न गाने वाले उन नेताओं व मुस्लिम भाईयों से मैं पूछता हूं कि जो विचार आज ये नेता या मुस्लिम भाई रखते हैं। यह विचार बिस्मिल्ला खां ने भी तो सोचा होगा। उस समय की मुस्लिम लीग ने तो कोई चिन्ता नहीं की थी। वे तो देश की स्वतन्त्रता में संलग्न थे, पर शायद इन्हें देश की एकता सहन नहीं हो रही है। देशभक्त ऐसे विचार नहीं रखा करते हैं।

क्यों हम इतने दीन-हीन हो गए है कि किसी शत्रु के छद्म यु द्ध का प्रत्युत्तर नहीं दे पा रहे है? क्यों 26 नवम्बर के मुम्बई हमले को हम इतनी आसानी से भूल जाते हैं? क्यों हम व्यर्थ में मन्दिर-मस्जिद के विवाद में फस रहें हैं? क्यों हमारी न्यायिक प्रक्रिया में इतनी शिथिलता व अन्याय है कि आतंकवादी लोग आज भी मौज मस्ती से घूम रहे हैं? यहाॅं धन से न्याय खरीदा जाने लगा है।

हे ईश्वर! यह कैसी राजनीति है? जिससे चक्कर में पड़कर हम अपनी भाषा, संस्कृति व देश की उन्नति को भूल बैठे है। क्यों  हम इतने कठोर हृदयी हो गए कि गरीब जनता का हाल देख हमारा हृदय नहीं पिघंलता है? क्यों हम पाप करने से नहीं रुक रहे? क्यों हम अपने देश की सीमाओं को सुरक्षित नहीं कर पा रहे हैं?

हमारे गणतन्त्र को खतरा है उन आतंकवादी गतिविधियों से, देशद्रोहियों से, सम्प्रदायवादियों से, धर्मिक संकीर्णता से, भ्रष्टाचार से एवं शान्त रहने वाली इस जनता से। हम भारतवासियों का यह कर्तव्य है कि देश की रक्षा एवं संविधान को मानने के लिए हम अपने आपको बलिदान कर देवें। हमें प्रत्येक परिस्थितयों में अपने देश की रक्षा करनी है। यह सत्य है कि विभिन्नता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। खासकर मैं युवाओं से कहना चाहता हूं-

हे नवयुवाओ? देशभर की दृष्टि तुम पर ही लगी,

है मनुज जीवन की ज्योति तुम्ही से  जगमगी।

दोगे न तुम तो कौन देगा योग देशोद्धार में?

देखो कहा क्या हो रहा है आज कल संसार में।।

आओ! हम सब मिलकर गणतन्त्र के यथार्थ स्वरूप को जानकर संविधान के ध्वजवाहक बनें और तभी जाकर हम सर उठाकर स्वयं को गणतन्त्र घोषित कर सकेंगे और कह सकेंगे कि – जय जनता जनार्दन।

और अन्त में मैं वाणी को विराम देता हुआ यही कहना चाहूंगा-

ये किसका फसना है ये किसकी कहानी है,

सुनकर जिसे दुनिया की हर आंख में पानी है।

दे मुझको मिटा जालिम मत मेरी आजादी को मिटा,

ये आजादी उन अमर हुतात्माओं की अन्तिम निशानी है।।

 

 

भस्मासुर बनते सन्त : आचार्य धर्मवीर जी

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भारतीय परपरा में धर्म का सबन्ध शान्ति के साथ है। जहाँ धर्म है वहाँ शान्ति और सुख अनिवार्य है परन्तु आज के वातावरण में धर्म अशान्ति और परस्पर संघर्ष का पर्याय होता जा रहा है। धार्मिक स्थान पर रहने वाले लोगों को साधु, सन्त आदि शदों से पहचाना जाता था। साधु का अर्थ ही अच्छा होता है, संस्कृत भाषा में जो दूसरों के कार्यों को सिद्ध करने में अपने जीवन की सार्थकता समझता है उसे ही साधु कहते हैं। जिसका स्वभाव शान्त है वही सन्त होता है। आजकल इन शदों का अर्थ ही बदल गया है, जो स्वार्थ सिद्ध करने में लगा है वह साधु है, जो अशान्ति फैला रहा है वह सन्त है। जो जनता को मूर्ख बना रहा है वह योगी है। पुराने समय में साधु लोग जिन स्थानों पर निवास करते थे उन स्थानों को आश्रम कहा जाता था। वहाँ जाकर सबको विश्राम मिलता था। वहाँ किसी के आने-जाने पर प्रतिबन्ध नहीं होता था, उनके यहाँ मनुष्य क्या, पशु-पक्षीाी निर्भय होकर विचरते थे। उनके निवास स्थान का गर्मी-सर्दी, शारीरिक कष्ट, पशुओं के द्वारा हानि न पहुँचे इतना ही उद्देश्य था। इसके लिए उन्हें न तो बड़े-बड़े महलों की आवश्यकता थी, न सुरक्षा के लिए किले जैसे आश्रम बनाने की जरूरत, न अपनी फौज, कमाण्डो रखने का झंझट। जब वैराग्य हो गया तो किसका भय, किससे द्वेष, फिर आश्रम की ऊँची-ऊँची दीवारें किसकेाय से बनाई जायें।

आज सन्त वह है जो अशान्त हुआ घूम रहा है। ठग संन्यासी हो गया, विलासी-विरक्त कहला रहा है, यह सब क्यों हो रहा है? क्यों होने दिया जा रहा है? आज हमारे पास ऐसे बहुत उदाहरण हैं जिनसे इन दुर्घटनाओं के कारणों को समझ सकते हैं। सन्त रामपाल दास चौबीसों घण्टे दूरदर्शन और समाचार-पत्रों का विषय बना हुआ है। आज तात्कालिक समस्या के समाधान के रूप में सरकार ने उसे गिरतार कर लिया परन्तु इससे समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। यह समस्या सरकार और समाज की बनाई हुई है, यदि इसके कारणों पर विचार करके उसके समूल विनाश का प्रयास नहीं किया गया तो यह समस्या प्रतिदिन खड़ी रहेगी।  केवल उसके नाम बदलते रहेंगे। कभी यह समस्या भिण्डरावाला के रूप में, कभी आसाराम बापू के रूप में, कभी राम-रहीम के रूप में, कभी रामपाल दास के रूप में। इन सन्तों में और चन्दन तस्कर वीरप्पन में भौतिक अन्तर इतना है कि एक आदमी डाकू बनकर डकैती करता है दूसरा सन्त या गुरु बनकर डकैती या ठगी करता है। एक जंगलों में छिपता है तो दूसरा नगरों में किलेनुमा महल बनाकर रहता है। एक बदनाम है और दूसरे की चरण वन्दना होती है। परिणाम दोनों का एक जैसा होता है। जब इनसे जनता का दुःख बढ़ जाता है, सरकार के अस्तित्व पर संकट आता है तब दोनों को अपराधी मानकर पुलिस, फौज, प्रशासन उनको गिरतार करने, दण्ड देने में जुट जाता है। इन दोनों के बनाने के लिए सरकार और समाज ही पूर्ण रूप से उत्तरदायी हैं।

रामपाल दास को सन्त किसने बनाया? समाज के समानित समझे जाने वाले लोगों ने। रामपाल दास हरियाणा सरकार की सेवा में एक जूनियर इञ्जीनियर था, गबन के कारण उसे सरकारी नौकरी से निष्कासित कर दिया गया। वह आज इतना बड़ा सन्त बन बैठा। वह अपने को कबीर का अवतार मानता है। जब दुष्ट व्यक्ति धार्मिकता का आडबर करता है तो जनता को मूर्ख बनाता है। धर्म के क्षेत्र में भक्त सन्तों को बड़ा बनाने का कार्य करते हैं। रामपाल दास कबीरदासी मठ में रहते हुए अपने दुराचरण के कारण अपनी मण्डली में निन्दा का पात्र बना, इसके एक चेले ने इसकी पोल खोलते हुए एक पुस्तक लिखी ‘शैतान बण्यो भगवान’ इस पुस्तक से क्रोधित होकर रामपाल दास ने उसे गुण्डों से पिटवाया। उसने अपनी कहानी अपने परिचितों में अपने क्षेत्र के लोगों को सुनाई। रामपाल दास की दुष्टता से गाँव के लोग  भी तंग थे, वहाँ की महिलाओं से दुर्व्यवहार की घटनाओं से ग्रामवासी उत्तेजित थे। आश्रम के पास खेती करने वालों के खेतों पर कजा करने के उसके प्रयास से वहाँ के किसान भी परेशान थे। सरकार में सन्त की पहुँच बढ़ गई थी, लोगों की सुनवाई नहीं हो रही थी, तब आचार्य बलदेव जी के नेतृत्व में ग्रामवासियों ने संघर्ष किया। सरकार को बाध्य होकर कार्यवाही करनी पड़ी। एक युवक का बलिदान भी हुआ। रामपाल दास को सरकार ने गिरतार भी किया, वह जेल में भी रहा, जमानत पर छूटा, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को उसका आश्रम उसे लौटाने का निर्देश दिया। ग्रामीणों के लिए फिर संकट आ गया, रोष बढ़ता रहा, बलदेव जी के नेतृत्व में फिर संघर्ष हुआ। इसमें तीन लोगों का बलिदान हुआ। रामपाल दास से आश्रम खाली कराया गया फिर उसने वही सब हिसार के बरवाला आश्रम में करना प्रारभ किया, आज उसी घटना का अगला दृश्य जनता के सामने है।

इस घटनाचक्र में रामपाल दास ने समाचार पत्र और दूरदर्शन के माध्यम से ऋषि दयानन्द को गालियाँ देना, पुस्तकों के उद्धरण को गलत तरीके से प्रस्तुत करना, समाचार पत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर आर्यसमाज और ऋषि दयानन्द की निन्दा करने का अभियान जारी रखा। आर्यसमाज ने अपने सीमित साधनों से उसका उत्तर देने का प्रयास किया परन्तु उसके साधनों के सामने यह बहुत स्वल्प था। जब मनुष्य का दुर्भाग्य आता है तो दुर्बुद्धि साथ लाता है। रामपाल दास अपने मुकद्दमे की पेशी पर जाने से बचता रहा और वह दिन आ गया जब न्यायालय ने किसी भी स्थिति में उसे गिरतार कर न्यायालय में प्रस्तुत करने का आदेश दिया। एक सप्ताह तक पुलिस प्रयास करने पर भी उसे गिरतार करने में सफल नहीं हो सकी तब आश्रम तोड़कर, बिजली, पानी बन्द कर उसे पकड़ने का प्रयास किया और 14 दिन बाद उसे गिरतार किया जा सका।

इस घटना में विचारणीय बिन्दु है कि इसके लिए दोषी कौन है? क्या रामपाल दास दोषी है? इसका उत्तर है नहीं। क्या जनता दोषी है? इसका भी उत्तर है नहीं। फिर इसका दोषी कौन है? इसका उत्तर है सरकार, प्रशासन, पुलिस अधिकारी, राजनेता और समाज के धनी लोग इसके लिए उत्तरदायी हैं। जब समाज के लोग ऐसे व्यक्ति को माध्यम बनाकर अपने काम सिद्ध करते हैं तो वे ही लोग समाज में ऐसे लोगों की प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं। इन बड़े सपन्न प्रतिष्ठित लोगों को इन साधुओं की पूजा करते देखते हैं तो सामान्य जनता इनके भँवरजाल में फंस जाती है। समाज में अधिकांश लोग आज भी धर्म, अधर्म, झूठ-सच इसका अन्तर करने में समर्थ नहीं है। वे तो किसी को भी इस स्थान पर सन्त की वेशभूषा में देखकर उस पर सहज विश्वास कर लेते हैं, अपना सबकुछ उसको सौंपने के लिए तैयार हो जाते हैं, यही कारण है कि इन धार्मिक ठगों के भक्तों, अनुयायियों की संया हजारों में नहीं, लाखों में पहुँच गई है। इनकी बढ़ती भीड़ लोगों को अपनी ओर इतना आकर्षित करती है कि सामान्य व्यक्ति उस भीड़ का हिस्सा बनकर अपने को धन्य समझ लेता है। भक्तों के धन से ये सन्त कुबेर बन जाते हैं, इनकी झोपड़ियाँ महलों में बदल जाती हैं। इनके भक्तों की भीड़ से समाज में इनका महत्त्व बढ़ता जाता है। पुलिस इनसे डरती है, सरकारी अधिकारी इनकी सेवा करते हैं, मन्त्री इनको प्रणाम करते हैं और निर्वाचन के समय इनके भक्तों के वोट प्राप्त करने के लोभ में इनके चरण छूकर आशीर्वाद लेते हैं। ऐसे में वे अपने को सर्वशक्तिमान् समझने लगें तो आश्चर्य की क्या बात है?

रामपाल दास के प्रसंग में भी यही कुछ हुआ है। रामपाल दास का बचाव पहले से सरकारी अधिकारी करते आ रहे हैं, पुलिस कमिश्नर का वक्तव्य ध्यान देने योग्य है, उन्होंने पत्रकारों से कहा कि पुलिस के दस प्रतिशत लोग रामपाल दास के प्रभाव में हैं, इसी कारण पुलिस को अपने कार्य में सफलता नहीं मिल रही। इस तथ्य की जानकारी मिलने पर कार्य-नीति बदली गई और अपरिचित पुलिस को इस कार्य में लगाया गया तब जाकर पुलिस को सफलता मिली। स्मरण रखने की बात है कि भूतपूर्व मुयमन्त्री भूपेन्द्रसिंह हुड्डा की पत्नी रामपाल दास के ट्रस्ट की ट्रस्टी है, यह भी समाचार पत्रों में आ चुका है। मनोहर लाल खट्टर नये मुयमन्त्री हैं, उन्हें प्रशासन को निर्देशित करने में कठिनाई है। यह स्वाभाविक है परन्तु मुयमन्त्री स्वयं रोहतक के रहने वाले हैं, अतः यह समझना चाहिए कि वे रामपाल दास और उसके साथ घटी घटनाओं से भलीभांति परिचित हैं फिर भी इस घटनाक्रम में लोगों को ऐसा लगा कि सरकार जानबूझकर कार्यवाही करने से बचना चाहती है। आलोचकों और पत्रकारों की दृष्टि में ऐसी सोच का ठोस कारण है, खट्टर सरकार ने रामपाल दास से चुनाव में उसका समर्थन माँगा था और भक्तों से भाजपा को मत देने की माँग की गई थी।

राजनीति में एक-एक मत का और मतदाता का मूल्य होता है। मतदाता मतदाता है, वह चोर है, डाकू है, सन्त है, दादा है, जिसके साथ जितने मत जुड़े हैं वह उतना ही महत्त्वपूर्ण है। ऐसी परिस्थिति में राजनेता भूल जाते हैं कि वह कौन है, उन्हें तो बस मतदाता की चरण-वन्दना करनी होती है। रामपाल दास के साथ-साथ भाजपा ने राम-रहीम बाबा का चुनाव में समर्थन लिया। उसके भक्तों के मत ही भाजपा को विजयी बनाने में समर्थ हुए, पिछले दिनों एक बड़े कांग्रेसी नेता ने स्वीकार किया कि कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण, राम रहीम बाबा का भाजपा को समर्थन देना है। इस का समर्थन, कांग्रेस को भी चाहिए, चौटाला को भी चाहिए, फिर राजनीति में रहना है तो भाजपा कैसे पीछे रह सकती है। बाबा राम रहीम के समर्थन का धन्यवाद मनोहर लाल खट्टर ने अपने मन्त्रीमण्डल के सहयोगियों के साथ बाबा के आश्रम में पहुँचकर चरण-वन्दना करके किया। ध्यान देने की बात है कि बाबा राम रहीम रामपाल दास से बड़ा बाबा है, उसके आश्रम में होने वाले अवैध कार्यों की जाँच पड़ताल करने का साहस पहली सरकारों मेंाी नहीं था वर्तमान सरकार में भी नहीं है। वहाँ पत्रकार की हत्या का प्रसंग बहुत चर्चित रहा है, समय-समय पर आलोचनायें होती हैं। सरकारें अपने स्वार्थ और दुर्बलता के कारण सार्थक कार्यवाही करने में समर्थ नहीं हो सकी हैं। जो भी कार्यवाही देखने में आई वे न्यायालय द्वारा की गई है। अभी बाबा राम रहीम के डेरे का एक वाद न्यायालय में लबित है। बाबा ने अपने अन्तरंग कार्यकर्त्ताओं को बड़ी संया में बलपूर्वक नपुंसक बना दिया जिससे अन्तरंग कार्यों में उनसे कोई बाधा नहीं पहुँचे। न्यायालय इस बात की जाँच कर रहा है। सरकार में यह साहस नहीं है कि आश्रम के विषय में आई शिकायतों की जाँच कर कार्यवाही कर सके।

बाबा लोग अपने कार्यक्रमों में राजनेताओं को बुलाकर अपना प्रभाव प्रदर्शित करते हैं और राजनेता उनके कार्यक्रमों में जाकर आशीर्वाद लेते हैं। इन बाबाओं में कई तो निपट मूर्ख होते हैं और इन बाबाओं के भक्तों कीाीड़ में बड़े शिक्षाविद्, प्रशासक, राजनेता हाथ बांधे पंक्ति में खड़े रहते हैं। कुछ वर्ष पहले शेखावत मुयमन्त्री थे, आसाराम का जयपुर में कार्यक्रम था, आसाराम ने अनेक स्थानों से सिफारिश दबाव डालकर मुयमन्त्री को अपने कार्यक्रम में बुलाया था।

राजनेताओं को भीड़ ऐसे लुभाती है जैसे ठेका शराबियों को। फिर कौन, किसे दोष दे? आसाराम ने आश्रम बनाये, भूमि पर अवैध कजे किये, महिलाओं का शोषण किया, भक्तों के धन से धनपति बन बैठा, प्रायः करके हर बाबा-सन्त की यही कहानी है।

भिण्डरावाला की कहानी से इस देश के नेताओं ने कोई शिक्षा नहीं ली। इन्दिरा गाँधी ने उसे अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए आगे किया था परन्तु भारत सरकार के लिए वह कितना बड़ा सिरदर्द बना और इन्दिरा गाँधी की हत्या का कारण बना। आजकल एक नहीं दर्जनों सन्त इसी कार्य में लगे हुए हैं, ये पाखण्ड फैलाकर जनता के विश्वास को दिन-रात लूटने में लगे हुए हैं। मोदी की जन-धन योजना तो सफल हो या न हो पर इन पाखण्डियों की जन-धन योजना शत-प्रतिशत सफल है। एक निर्मल बाबा, हरी-लाल चटनी खिलाकर लोगों का भाग्य बदल रहा है। कुमार स्वामी ब्रह्मर्षि बनकर बीज-मन्त्र दे रहा है और ऐसे लोगों को इन राजनेताओं से खूब सहयोग और समर्थन मिलता है। दक्षिण का सोना स्वामी हो या नित्यानन्द स्वामी, सभी लोग जनता को मूर्ख बनाकर लूटते हैं और कामिनी काञ्चन के स्वामी बनते हैं, अपनी प्रवृत्तियों का स्वामित्व तो इन्हें न मिला और न ही मिलेगा।

इन सारी घटनाओं को देखने से एक बात साफ होती है कि जनता को समझदार और जागरूक किये बिना इसका सुधार सभव नहीं है। आर्यसमाज इन्हीं लोगों की ऐसी बातों का खण्डन करता है तो नासमझ लोग कहते हैं सभी को अपनी आस्था चुनने का अधिकार है, सबको अपने विचारों का प्रचार करने की स्वतन्त्रता है परन्तु आर्यसमाज भी तो विचार ही दे रहा है। क्या गलत बातों से सावधान करना, विचार का प्रचार करना नहीं है? क्योंकि गलत विचारों के निराकरण के बिना सद्विचारों को स्थान नहीं मिल सकता। रामपाल दास के दुष्कृत्यों के विरोध में आर्यसमाज ने आवाज उठाई, आन्दोलन किया, आज उसी का परिणाम है कि रामपाल दास का यथार्थ रूप जनता के सामने आ सका।

इस घटनाक्रम में बाबा की ओर से गोलीबारी में पुलिस वाले और कुछ लोग घायल हुए परन्तु पुलिस को गोली नहीं चलानी पड़ी। रामपाल दास को पुलिस ने गिरतार किया या रामपाल दास ने समर्पण किया यह तो प्रशासन और सरकार की नीयत को बतायेगा। परन्तु एक दुर्घटना का अन्त हुआ। पुलिस को बधाई, ईश्वर का धन्यवाद। इस घटनाक्रम पर पञ्चतन्त्र की पंक्ति सटीक लगती है-

प्रथमस्तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः।

ततो राजा च मन्त्री च सर्वं वै मूर्खमण्डलम्।।

– धर्मवीर

 

जिज्ञासा समाधान : आचार्य सोमदेव जी

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जिज्ञासाअथर्ववेद में निनलिखित दो मन्त्र इस

प्रकार से हैं-

अष्टाचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या।

तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः।।

तस्मिन् हिरण्यये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते।

तस्मिन्यद्यक्षमात्मन्वत्तद्वै ब्रह्मविदो विदुः।।

– अथर्ववेद 10/2/31-32

पहले मन्त्र में मनुष्य के शरीर की संरचना का वर्णन किया गया है। संक्षेप में, यह स्पष्ट रूप में कहा गया है कि हमारे शरीर में आठ चक्र हैं। मैं अपने अल्प ज्ञान के आधार पर यही समझता हूँ कि वेद-मन्त्र का संकेत मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र नामक आठ चक्रों पर है। इस शरीर में एक आनन्दमय कोश है जो कि आत्मा का निवास-स्थान है। इस आत्मा में जो परमात्मा विद्यमान है, ब्रह्म-ज्ञानी उसे ही जानने का प्रयास करते हैं। जहाँ तक मैंने वैदिक विद्वानों के मुखारविन्द से सुना है, ब्रह्म-रन्ध्र आनन्दमय कोश में ही विद्यमान है। उनका यह भी कथन है कि मस्तिष्क को भी हृदय कहा जाता है। मस्तिष्क की स्थिति आनन्दमय कोश में है।

जब स्तभवृत्ति द्वारा, श्वासों की गति को कुछ क्षणों के लिए रोक दिया जाता है तो मन के द्वारा ध्यान लगाने में सुविधा होती है। जब श्वासों को ब्रह्म-रन्ध्र की स्थिति में रोका जाए तो मन शीघ्र ही एकाग्र हो जाता है क्योंकि दोनों ही एक कोश में विद्यमान है। स्वभाविक रूप से ब्रह्मरन्ध्र (सहस्रार) में धारणा करते हुए आत्मा का अन्तःकरण के द्वारा चिन्तन करना अधिक सरल हो जाता है। वक्षस्थल के समीप जिसे व्यवहारिक भाषा में हृदय कहा जाता है, ध्यान बिखरने लगता है क्योंकि ध्यान लगाने वाला तो इस कोश में है नहीं।

ऊपर लिखित तथ्यों को ध्यान रखते हुए मेरी निनलिखित जिज्ञासायें हैं और प्रार्थना है कि उनका अपनी पत्रिका में यथोचित समाधान करते हुए कृतार्थ करें।

(क) अथर्ववेद में किन आठ चक्रों का वर्णन किया गया है।

(ख) इन आठ चक्रों का क्या महत्त्व है, विशेषतया ध्यान की पद्धति में?,

(ग) क्या ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान करना युक्ति-युक्त नहीं? क्या यह वर्जित है?

समाधान की प्रतीक्षा में,

– रमेश चन्द्र पहूजा, प्रधान, आर्यसमाज मॉडल टाऊन, यमुनानगर

समाधान आज अध्यात्म के नाम पर अनेक भ्रान्तियाँ चल रही हैं। यथार्थ में अध्यात्म क्या है? इसको प्रायः लोग समझते ही नहीं। बिना समझे अध्यात्म के नाम पर भ्रान्ति में जीवन जी रहे होते हैं। आत्मा-परमात्मा के विषय को अधिकृत करके विचार करना उसके अनुसार जीना अध्यात्म है। ठीक-ठीक वैदिक सिद्धान्तों को समझना उनको आत्मसात करना उनके अनुसार अपने को चलाना अध्यात्म है। यह अध्यात्म तनिक कठिन है। इस कठिनता भरे अध्यात्म को अपनाने के लिए साहस और पुरुषार्थ की आवश्यकता है। प्रायः आज का व्यक्ति पुरुषार्थ से बचना चाहता है इसलिए उसको सरल मार्ग चाहिए। यम-नियम आदि के बिना ही कुण्डलिनी जाग्रत कर मोक्ष चाहता है। इन कुण्डलिनी आदि के साथ चक्रों के चक्र में भी घुमने लगता है।

महर्षि दयानन्द ने हमें विशुद्ध अध्यात्म का परिचय ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका उपासना विषय, मुक्ति विषय में व सत्यार्थप्रकाश, समुल्लास 7 व 9 में तथा अध्यात्म से ओतप्रोत ग्रन्थ आर्याभिविनय में करवा दिया है। महर्षि के इस अध्यात्म में कुण्डलिनी और चक्रों की कोई चर्चा नहीं है। महर्षि दयानन्द ने हठयोग प्रदीपिका पुस्तक को अनार्ष ग्रन्थ माना है और ये कुण्डलिनी आदि उसी अनार्ष ग्रन्थ की देन है। न ही सांय आदि शास्त्र में इनका वर्णन है। ऋषियों के ग्रन्थों में तो यमनियामादि के द्वारा ज्ञान प्राप्त कर उस ज्ञान से मुक्ति कही है न कि कुण्डलिनी जागरण से। अस्तु।

अथर्ववेद के जो मन्त्र आपने उद्धृत किये हैं उन मन्त्रों के आर्ष भाष्य उपलध नहीं हैं, अन्य विद्वानों के भाष्य उपलध हैं। जो भाष्य उपलध हैं उन विद्वानों का मतैक्य नहीं है। कुछ विद्वान् प्रचलित चक्रों की बात करते हैं कुछ नहीं। जो प्रचलित चक्रों को मानते हैं वे इन्हीं चक्रों परक अर्थ करते हैं और जो नहीं मानते वे चक्र का अर्थ आवर्तन घेरा आदि लेते हुए शरीर में स्थित ओज सहित अष्ट धातुओं का जो वर्णन है उसको लेते हैं अथवा अष्टाङ्ग योग को लेते हैं। ये विद्वानों की अपनी मान्यता है। यथार्थ में मन्त्र में आये अष्ट चक्र में कौनसे आठ चक्र कहे हैं, यह निश्चित नहीं हैं। हमें अधिक संगत अष्ट धातु परक अर्थ लगता है, फिर भी यह अन्तिम नहीं है।

महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में तन्त्रादि ग्रन्थों को भी पढ़ा था। उन तन्त्र ग्रन्थों में शरीर रचना विशेष की बातें लिखी थी। उन पुस्तकों में कई पुस्तकों का विषय नाड़ीचक्र था। महर्षि ने शव परीक्षण भी किया था जो उन नाड़ीचक्र आदि विषय वाली पुस्तकों के अनुसार खरा नहीं उतरा अर्थात् नाड़ीचक्र आदि वहाँ कुछ नहीं मिला। उससे ऋषि का और अधिक दृढ़ निश्चय आर्ष ग्रन्थों पर हुआ। वर्तमान के चिकित्सकों को भी ये चक्र कुण्डलिनी नहीं मिले हैं। जब ये चक्र हैं ही नहीं तो इनकी ध्यान में उपयोगिता भी कैसी? ध्यान में उपयोगी अपना शुद्ध व्यवहार, सिद्धान्त की निश्चितता, वैराग्य, यम-नियमादि योग के अंग हैं। इनको कर व्यक्ति अच्छी प्रकार ध्यान कर सकता है अन्यथा तो शरीर के चक्रों में ही लगा रहेगा।

हाँ मन्त्र में आये अष्टचक्र से यदि अष्टधातु शरीर में स्थित रसादि सात और आठवाँ ओज लिया जाता है तो निश्चित रूप से इनका महत्त्व है।

आपने पूछा क्या ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान करना युक्ति युक्त नहीं? क्या यह  वर्जित है? इस पर हमारा कथन कि महर्षि पतञ्जली जी ने योगदर्शन में ‘धारणा’ के लिए कहा है, धारणा की परिभाषा करते हुए महर्षि ने सूत्र बनाया ‘देशबन्धश्चित्तस्य धारणा’ अर्थात् चित्त का शरीर के एक देश (स्थान) विशेष पर बान्धना (स्थिर) करना धारणा है। इस सूत्र का भाष्य करते हुए महर्षि व्यास ने कुछ स्थानों के नाम गिनाये हैं

नाभिचक्रे, हृदयपुण्डरीके, मूर्ध्नि, ज्योतिषि, नासिकाग्रे, जिह्वाग्र इत्येवमादिषु देशेषु….धारणा।

अर्थात् नाभी, हृदय, मस्तक, नासिका और जिह्वा के अग्रभाग आदि देश में मन को स्थिर करना। यहाँ मुयरूप से मन को एक स्थान पर रोकने की बात कही है वह स्थान कोई भी हो सकता है, ब्रह्मरन्ध्र भी ऋषि के कथन से तो हमें यह प्रतीत नहीं हो रहा कि ध्यान करने के लिए ब्रह्मरन्ध्र विशेष स्थान है और अन्य स्थान सामान्य है। हाँ यह अवश्य प्रतीत हो रहा है कि सभी स्थान अपना महत्त्व रखते हैं। उनमें चाहे नासिकाग्र, जिह्वाग्र हो अथवा ब्रह्मरन्ध्र। यह वर्जित भी नहीं है कि ब्रह्मरन्ध्र में ध्यान नहीं करना चाहिए, ब्रह्मरन्ध्र में मन टिका कर ध्यान किया जा सकता है।

आपने विद्वानों से सुना है कि ब्रह्मरन्ध्र आनन्दमय कोश में रहता है। मस्तिष्क को हृदय कहा जाता है। मस्तिष्क की स्थिति आनन्दमय कोश में है। आपने जो विद्वानों से सुना है कि हृदय मस्तिष्क है अथवा मस्तिष्क में है यह ऋषि के प्रतिकूल कथन है। हमने कई बार जिज्ञासा समाधान में ऋषि कथनानुसार हृदय स्थान का वर्णन किया है। अब फिर कर रहे हैं ‘जिस समय….. परमेश्वर करके उसमें प्रवेश किया चाहें, उस समय इस रीति से करें कि कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर के ऊपर जो हृदय देश है। जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है उसमें कमल के आकार वेश्म अर्थात् अवकाश रूप स्थान है…….।’ ऋग्वेदादिभाष्य-भूमिका इतना स्पष्ट कथन होते हुए भी मस्तिष्क को हृदय कहना, ऋषि मान्यता को न मानना है। इसी हृदय प्रदेश में ध्यान करने वाला आत्मा रहता है। यहाँ पर ठीक-ठीक किया गया ध्यान बिखरेगा नहीं अपितु अधिक-अधिक ध्यान लगेगा।

इसलिए ध्यान उपासना को अधिक बढ़ाने के लिए महर्षि दयानन्द ने जो उपासना पद्धति विशेष बताई है उसके अनुसार चले चलावें इसी से अधिक लाभ होगा। और जो ऋषि मान्यता से विपरीत अन्य विद्वानों के विचार हैं उसको छोड़ने में ही लाभ है। ऋषि मान्यता के विपरीत चाहे कितने ही बड़े विद्वान् की बात क्यों न हो वह हमारे लिए मान्य नहीं है।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर

पूना प्रवचन में स्वयं कथित अपना जीवन वृत्तान्त पन्द्रहवां व्याख्यान (4 अगस्त 1875)

हमसे बहुत से लोग पूछते हैं कि हम कैसे जानें कि आप ब्राह्मण हैं और कहते हैं कि आप अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों की चिट्ठियाँ मगा दें या आपको जो पहचानता हो उसको बतलावें।

इसलिए मैं अपना कुछ वृत्तान्त कहता हूँ। दूसरे देशों की अपेक्षा गुजरात में कुछ मोह अधिक है, यदि मैं अपने पूर्व मित्रों तथा सम्बन्धियों को अपना पता दूं या पत्र—व्यवहार करूँ तो मेरे पीछे एक ऐसी व्याधि लग जावेगी, जिससे

कि मैं छूट चुका हूँ। इस भय से कि कहीं वह बला मेरे पीछे न लग जावे,पत्रादि मँगा देने की चेष्टा नहीं करता।

धारंगधरा नाम का एक राज्य गुजरात देश में है। इसकी सीमा पर एक मौरवी नगर है, वहाँ मेरा जन्म हुआ था। मैं औदीच्य ब्राह्मण हूँ । औदीच्य ब्राह्मण सामवेदी होते हैं, परन्तु मैंने बड़ी कठिनता से यजुर्वेद पढ़ा था। मेरे घर

में अच्छी जमींदारी है। इस समय मेरी अवस्था 50 वर्ष की होगी। आठवें वर्ष मेरे बाद एक बहन पैदा हुई थीं। मेरा एक चचेरा दादा था, वह मुझसे बहुत ही प्यार करता था। मेरे कुटुम्बियों के इस समय 15 घर होंगे। मुझको लड़कपन में ही रूद्राध्याय सिखलाकर शुक्ल यजुर्वेद का पढ़ाना आरम्भ कर दिया था।

मेरे पिता ने मुझको शिव की पूजा में लगा दिया। दशवें वर्ष से पार्थिव (मिट्टी के महादेव) की पूजा करने लग गया।

मुझे पिता ने शिवरात्रि का व्रत रखने को कहा था। परन्तु मैंने शिवरात्रि का व्रत न किया। तब शिवरात्रि की कथा मुझे सुनाई, वह कथा मेरे मन को बहुत मीठी लगी और मैंने उपवास रखने का पक्का निश्चय कर लिया। मेरी

माँ कहती थी कि उपवास मत कर, मैंने माता का कहना न मानकर उपवास किया। मेरे यहाँ नगर के बाहर एक बड़ा देवल है। वहाँ शिवरात्रि के दिन रात के समय बहुत लोग एकत्रित होते हैं और पूजा करते हैं । मेरे पिता, मैं और

बहुत मनुष्य इकट्ठे थे। पहिले पहर की पूजा कर ली, दूसरे पहर की पूजा भी हो गयी। अब बारह बज गये और धीरे—धीरे आलस्य के कारण लोग जहाँ के तहाँ झुकने लगे। मेरे पिता को भी निद्रा आ गई। इतने में पुजारी बाहर गया।

मैं इस भय से न सोया कि कहीं मेरा उपवास निष्फल न हो जाय। इतने में यह चमत्कार हुआ कि मन्दिर में बिल से चूहे बाहर निकले और महादेव की पिण्डी के चारों तरफ फिरने लगे। पिण्डी पर जो चावल चढ़ाये हुए थे, उन्हें ऊपर चढ़कर खाने भी लगे मैं जागता था, इसलिए यह सब कौतुक देख रहा था। इससे एक दिन पहले शिवरात्रि की कथा मैं सुन ही चुका था।

उसमें शिव के भयानक गणों, उसके पाशुपत अस्त्र, बैल की सवारी और उसके आश्चर्यमय सामर्थ्य के विषय में बहुत कुछ सुन चुका था। इसलिए चूहों के इस खेल को देखकर मेरी लड़कपन बुद्धि आश्चर्य में पड़ गई और मैंने सोचा कि

जो शिव अपने पाशुपत अस्त्र से बड़े —बड़े दैत्यों को मारता है, क्या वह ऐसे तुच्छ चूहों को भी अपने ऊपर से नहीं हटा सकता। इस प्रकार की बहुत—सी शंकायें मेरे मन में उठने लगीं।

मैंने पिताजी को जगाकर पूछा कि ये महादेव इस छोटे चूहे को नहीं हटा देते। पिताजी ने कहा कि तेरी बुद्धि बड़ी भ्रष्ट है, यह तो केवल देवता की मूर्त्ति है। तब मैंने निश्चय किया कि जब मैं इसी त्रिशूल धारी शिव को प्रत्यक्ष

देखूंगा, तब ही पूजा करूँगा, अन्यथा नहीं। ऐसा निश्चय करके मैं घर को गया, भूख लगी थी माता से खाने को माँगा। माता कहने लगी, ट्टमैं तुमसे पहले ही कहती थी कि तुझसे भूखा नहीं रहा जायेगा। तूने ही हट करके उपवास

किया।’’ माँ ने फिर मुझे खाना दिया और कहा कि दो दिन तो उनके अर्थात् पिताजी के पास मत जाना और न उनसे बोलना, नहीं तो मार खायेगा, खाना खाकर मैं सो गया। दूसरे दिन आठ बजे उठा, मैंने सारी कथा अपने चाचा से कह दी। मेरे चाचा ने बुद्धिमत्ता से मेरे पिता को समझा दिया कि इसको आगे विघा पढ़नी है, इसलिए व्रत उपवास आदि इससे कुछ न कराया करो।

इस समय मैं इनसे यजुर्वेद पढ़ता था और दूसरे एक पण्डित मुझे व्याकरण पढा़ते थे। सोलहवें या सत्रहवें वर्ष में यजुर्वेद समाप्त हुआ। इसके बाद मैं अपनी जमींदारी के गाँव में पढ़ने के लिए गया। वहाँ हमारे घर में एक दिन नाच होता था, उस समय मेरी छोटी बहन मरणासन्न थी। कण्ठ बन्द हो गया था। मैं वहाँ गया और उसके बिस्तरे के पास खड़ा हुआ। सबसे पहले मैंने मौत वहीं देखी। जब मेरी बहन मर गई , तो मुझे बड़ा भय हुआ। मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि सबको इसी प्रकार मरना है। सब लोग रोते थे, पर मेरी छाती भय से धड़क रही थी। इसलिय मेरी आँखों से एक आँसू भी नहीं गिरा। मेरी यह दशा देखकर पिता ने मुझको पाषाण हृदय कहा।

मेरी माता मुझे बहुत प्यार करती थी, किन्तु उसने भी ऐसा ही कहा। मुझे सोने के लिए कहते थे पर मुझे कभी अच्छी तरह नींद न आती थी, किन्तु मैं हर घड़ी चौंक— चौंक उठता था और मन में भांति— भांति के विचार उठते थे।

बहन के मरने के पश्चात् लोक रीति के अनुसार पाँच छः बार रोना होने पर भी जब मुझे रोना नहीं आया तो सब लोग मुझे धिक्कारने लगे। उन्नीसवें वर्ष में मुझसे अत्यन्त स्नेह रखने वाले मेरे चाचा को भी मृत्यु

ने आन दबाया। मरते समय उन्होंने मुझे पास बुलाया। लोग उनकी नाड़ी देखने लगे। मैं उनके पास बैठा था, मुझे देखकर उनके टप—टप आँसू गिरने लगे। मुझे भी उस समय बहुत रोना आया, मैंने रो—रो कर आँखें सुजा लीं। ऐसा रोना मुझे कभी नहीं आया। इस समय मुझे ऐसा मालूम होने लगा कि चाचा की तरह मैं भी मर जाऊँगा। ऐसा विश्वास हो जाने पर अपने मित्रों और पण्डितों से अमर होने का उपाय पूछने लगा। जब उन्होंने योगाभ्यास की ओर संकेत किया तो मेरे मन में यह सूझी कि घर छोड़कर चला जाऊँ । इस समय मेरी आयु 20 वर्ष की थी।

मेरी बढ़ी हुई उदासीनता देखकर पिता ने जमींदारी का काम करने को कहा, परन्तु मैंने न किया फिर पिता ने निश्चय किया कि मेरा विवाह कर दें ताकि मैं बिगड़ न जाऊँ। यह विचार घर में होने लगा, यह मालूम करके मैंने

दृढ़ निश्चय कर लिया कि विवाह कभी नहीं करूँगा। यह भेद मैंने एक मित्र से प्रकट किया तो उसने मना किया और विवाह करने के लिए जोर देने लगा। मेरा विचार घर छोड़कर चले जाने का था, पर किसी ने सलाह न दी। जो

कहते वे विवाह करने को ही कहते। एक महीने के भीतर विवाह करने की तैयारी हो गई। यह देखकर मैं एक दिन शौच के मिश (बहाने) से एक धोती साथ लेकर घर से निकल पड़ा और एक सिपाही द्वारा कहला भेजा कि एक

मित्र के घर गया हूँ। मैं एक पास के गाँव में गया। इधर घर में मेरी प्रतीक्षा दस बजे रात तक होती रही। इसी रात को चार घड़ी के तड़के मैं गाँव से निकलकर आगे चल दिया और अपने गाँव से दस कोस के अन्तर पर एक गाँव के हनुमान् के मन्दिर पर ठहरा। वहाँ से चलकर सायला योगी के पास गया, परन्तु वहाँ पर मुझे शान्ति नहीं मिली और लोगों से सुना कि लालाभक्त नामी एक योगी है। तब उनकी ओर चल पड़ा। मार्ग में एक वैरागी एक मूर्त्ति रखकर बैठा हुआ था। बात—चीत होने पर वह बोला कि अगुंली में सोने का छल्ला डालकर वैराग्य की सिद्धि कैसे होगी? मुझे इस प्रकार खिजाकर मेरे तीनों छल्ले मूर्त्ति के भेंट चढ़वा लिए। लालाभक्त के पास जाकर मैं योग—साधना करने लगा। रात को एक वृक्ष के ऊपर बैठ गया, तो वृक्ष के ऊपर घूघू बोलने लगा। उसकी आवाज सुनकर मुझे भूत का भय हुआ। मैं मठ के भीतर घुस गया। फिर वहाँ से अहमदाबाद के समीप कोट काँगड़ा नामी गाँव में आया,वहाँ बहुत से वैरागी रहते थे। एक कहीं की रानी वैरागी के फन्दे में आ गई थी। इस रानी ने मेरे साथ ठट्टा किया, परन्तु में जाल से छूट गया, इस स्थान पर मैं तीन महीने रहा था। यहाँ पर वैरागी मुझ पर हंसी उड़ाने लगे, इसलिए जो रेशमी किनारेदार धोती मैं पहनता था, वह मैंने फेंक दी। मेरे पास केवल 3 रुपये रह गये थे, इनसे सादी धोती खरीदकर पहन ली और तब से अपना ब्रह्मचारी नाम रख लिया।

उन्हीं दिनों मैंने सुना कि कार्तिक के महीने में सिद्धपुर के स्थान पर एक मेला होता है। यह सोचकर कि वहाँ शायद मुझे कोई योगी मिल जावे और अमर होने का मार्ग बता दे, मैंने सिद्धपुर को प्रस्थान किया। मार्ग में मुझे अपने

गाँव का आदमी मिला, उसने जाकर मेरे बाप को बतला दिया कि सिद्धपुर की ओर चला गया हूँ। मेरा पिता और घर के लोग बराबर मेरी खोज में ही थे। इस आदमी की जबानी सुनकर मेरे पिता चार सिपाहियों सहित सिद्धपुर को

आये। मैं एक मन्दिर में बैठा हुआ था। एकाएक मेरे पिता और चार सिपाहीमेरे सामने आकर खड़े हो गये। देखते ही मेरा कलेजा धड़कने लगा। इस भय से कि पिता मुझको मारेंगे, मैंने उठकर उनके पाँव पकड़ लिए। वे मुझ पर बहुत

ही क्रुद्ध हुए, मैंने उनसे कहा कि एक धूर्त बहकाकर मुझे यहाँ लाया हैं, मैं घर जाने को तैयार ही था कि आप आ गये। उन्होंने मेरा तूँबा तोड़ डाला और मेरी छाई फाड़ डाली और कुछ कपड़े मुझे दिए। मेरे पीछे दो सिपाही सदा

के लिए कर दिए। रात को जहाँ मैं सोता था एक सिपाही मेरे सिरहाने बैठा जागता रहता था। मैंने चाहा कि इस सिपाही को धोखा देकर निकल जाऊँ और इसलिए मैं यह जानने के लिए कि सिपाही रात को सोता है या नहीं, खुद भी जागता रहा। सिपाही को तो यह निश्चय हो जाये कि मैं सो रहा हूँ और इसलिए मैं नाक से खर्राटे भरने लगता था। इस प्रकार तीन रातें जागना पड़ा, चौथी रात सिपाही को नींद आ गई, तब एक लोटा हाथ में ले बाहर निकला।

यदि कोई देख पावे तो झट कह दूँगा कि शौच को जाता हूँ । वहाँ से निकलकर गाँव के बाहर एक बाग में चला गया। प्रातःकाल होते ही एक वृक्ष पर भूखा बैठा रहा। रात को जब अँधेरा हो गया, सात बजे नीचे उतरकर चल

दिया। अपने गाँव और घर के मनुष्यों से यह अन्तिम भेंट थी। इसके पश्चात् एक बार प्रयाग (इलाहाबाद) में मेरे गाँव के बहुत से लोग मुझको मिले, परन्तु मैंने उनको अपना पता नहीं दिया, तब से आज तक कोई नहीं मिला।

सिद्धपुर से बड़ोदे को आया, वहाँ से नर्मदा नदी के तट पर विचरने लगा इस समय नर्मदा के तट पर योगानन्द स्वामी रहते थे। यहाँ एक दक्षिणी ब्राह्मण कृष्ण शास्त्री भी रहते थे, इनके पास मैं कुछ—कुछ पढ़ता रहा।

तत्पश्चात् राजगुरु के पास वेदों को पढ़ा। 23 या 24 वर्ष की अवस्था में मुझे चाणूद कनाली में एक संन्यासी मिला। मुझे पढ़ने में बहुत ही अनुराग था और संन्यास आश्रम में पढ़ने का बहुत सुभीता होता है। इसलिए उसके उपदेश से

मैंने श्राद्ध आदि करके संन्यास ले लिया, तब से ही दयानन्द सरस्वती नाम धारण किया। मैंने दण्ड गुरु के पास धर दिया।

चाणूद में दो गोसाईं आये, जो राजयोग करते थे, मैं भी उनके साथ अहमदाबाद तक गया। वहाँ पर एक ब्रह्मचारी मिला। पर कुछ दिनों बाद मैंने  उसका साथ छोड़ दिया। वहाँ से मैं जाते—जाते हरिद्वार पहुँचा, वहांँ कुम्भ का

मेला था। वहाँ से हिमालय पहाड़ पर उस जगह पहुँचा जहाँं से अलकनन्दा नदी निकलती है। बर्फ बहुत पड़ी हुई थी और पानी भी बहुत ठण्डा था। वहाँ बर्फ लगने से पैर में कुछ तकलीफ हुई। हिमालय पर्वत पर पहँुंच कर यह विचार हुआ कि यहीं शरीर गला दूँ।

फिर मन में आया कि यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के बाद शरीर छोड़ना चाहिए। यह निश्चय करके मैं मथुरा में आया। वहाँ मुझे एक धर्मात्मा संन्यासी गुरु मिले। उनका नाम स्वामी विरजानन्द था, वे पहले अलवर में रहते थे। इस

समय उनकी अवस्था 81 वर्ष की हो चुकी थी। उन्हें अभी तक वेद—शास्त्र आदि आर्ष ग्रन्थों में बहुत रुचि थी। ये महात्मा दोनों आँखों से अँधे थे, और इनके पेट में शूल का रोग था। ये कौमुदी और शेखर आदि नवीन ग्रन्थों को

अच्छा नहीं समझते थे और भागवत आदि पुराणों का भी खण्डन करते थे। सब आर्ष ग्रन्थो के वे बड़े भक्त थे। उनसे भेंट होने पर उन्होंने कहा कि तीन वर्ष में व्याकरण आ जाता है। मैंने उनके पास पढ़ने का पक्का निश्चय कर लिया। मथुरा में एक भद्र पुरुष अमरलाल नामक थे, उन्होंने मेरे पढ़ने के समय में जो—जो उपकार मेरे साथ किए, मैं उनको भूल नहीं सकता। पुस्तकों और खाने—पीने का प्रबन्ध सब उन्होंने बड़ी उत्तमता से कर दिया। जिस दिन उन्हें कहीं बाहर जाना होता, तो वे पहिले मेरे लिए भोजन बनाकर और मुझे खिलाकर बाहर जाते थे। सौभाग्य से ये उदारचेता महाशय मुझे मिल गये थे।

विघा समाप्त होने पर मैं आगरे में दो वर्ष तक रहा, परन्तु पत्र व्यवहार के द्वारा या कभी—कभी स्वयं गुरुजी की सेवा में उपस्थित होकर अपने सन्देह निवृत्त कर लेता था। आगरे से मैं ग्वालियर को गया, वहाँ कुछ—कुछ वैष्णव मत का खण्डन आरम्भ किया, वहाँ से भी स्वामी जी को पत्रादि भेजा करता था। वहाँ माधवमत के एक आचार्य हनुमन्त नामी रहते थे। वे किरानी का स्वांग भर कर शास्त्रार्थ सुनने बैठा करते थे। एक—आध बार जब मेरे मुख से कोई अशुद्ध शब्द निकला, तो उन्होंने अशुद्धि पकड़ ली। मैंने कई बार उनसे पूछा कि आप कौन हैं, परन्तु उन्होंने यही उत्तर दिया कि मैं एक किरानी हूँ, सुनने—सुनाने से कुछ बोध प्राप्त हुआ है। एक दिन इस विषय में वार्त्तालाप हुआ कि वैष्णव लोग जो माथे पर खड़ी रेखा लगाते हैं, वह ठीक हैं या नहीं। मैंने कहा यदि खड़ी रेखा लगाने से स्वर्ग मिलता हो, तो सारा मुँह काला करने से स्वर्ग से भी कोई बड़ी पदवीं मिलती होगी। यह सुनकर उनको बड़ा क्रोध आया और वे उठ गये।

तब लोगों से पूछने पर मालूम हुआ कि यही उस मत के आचार्य हैं। ग्वालियर से मैं रियासत करौली को गया। वहाँ पर एक कबीर पन्थी मिला, उसने एक बार वीर के अर्थ कबीर किए थे और कहने लगा कि एक कबीर उपनिषद् भी है। वहाँ से फिर मैं जयपुर को गया, वहाँं हरिश्चन्द्र नामी एक बड़े विद्वान् पण्डित थे। वहाँ पहिले मैंने वैष्णव मत का खण्डन करके शैव मत स्थापित किया। जयपुर के महाराज सवाई रामसिंह भी शैवमत की दीक्षाले चुके थे। शैव मत के फैलने पर हजारों रूद्राक्ष की मालायें मैंने अपने हाथोंसे लोगों को पहनाईं। वहाँ शैवमत का इतना प्रचार हुआ कि हाथी घोड़ों के गलों में भी रूद्राक्ष की माला पहनाई गईं। जयपुर से मैं पुष्कर को गया, वहाँ से अजमेर आया। अजमेर पहुँचकर शैवमत का भी खण्डन करना आरम्भ किया। इसी बीच में जयपुर के महाराजा

लाटसाहब से मिलने के लिए आगरे जाने वाले थे। इस आशंका से कि कहीं वृन्दावन निवासी प्रसिद्ध रंगाचार्य से शास्त्रार्थ न हो जावे। राजा रामसिंह ने मुझे बुलाया और मैं भी जयपुर पहुँच गया, परन्तु वहाँ मालूम होने पर कि मैंने शैवमत का खण्डन आरम्भ कर दिया है राजा साहब अप्रसन्न हुए । इसलिए मैं भी जयपुर छोड़कर मथुरा में स्वामी जी के पास गया और शंका— समाधान किया। वहाँ से मैं फिर हरिद्वार को गया। वहाँ अपने मठ पर पाखण्ड मर्दन लिखकर झण्डा खड़ा किया। वहाँ वाद—विवाद बहुत सा हुआ फिर मेरे मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि सारे जगत् से विरूद्ध होकर भी गृहस्थों से बढ़कर पुस्तक आदि का जंजाल रखना ठीक नहीं है। इसलिए मैंने सब कुछ

छोड़कर केवल एक कौपीन (लंगोट) लगा लिया और मौन धारण किया। इस समय जो शरीर में राख लगाना शुरू किया था, वह गत वर्ष बम्बई में आकर छोड़ा। वहाँ तक लगाता रहा था। जब से रेल में बैठना पड़ा, तब से कपडे

पहनने लगा। जो मैंने मौन धारण किया था, वह बहुत दिन सध न सका, क्यों कि बहुत से लोग मुझें पहचानते थे । एक दिन मेरी कुटी के द्वार पर एक मनुष्य यह कहने लगा ट्टनिगमकल्पतरोर्गलितं फलम्’’ अर्थात् भागवत से बढ़कर और कुछ नहीं है, वेद भी भागवत से नीचे हैं।’’

तब मुझसे यह सहन न हो सका, तब मौन व्रत को छोड़कर मैंने भागवतका खण्डन प्रारम्भ किया। फिर यह सोचा कि ईश्वर की कृपा से जो कुछ थोड़ा बहुत ज्ञान अपने को हुआ है, वह सब लोगों पर प्रकट करना चाहिए। इस विचार को मन में रखकर मैं फरूखाबाद को गया, वहाँ से रामगढ़ को गया। रामगढ़ में शास्त्रार्थ शुरू किया। वहाँ पर जब दो चार पण्डित बोलते थे, तब मैं कोलाहल शब्द कहा करता था, इसलिए आज तक वहाँ के लोग मुझको

कोलाहल स्वामी कहा करते हैं। वहाँ पर चक्रांकितों के चेले दस आदमी मुझे मारने को आये थे, बड़ी कठिनता से उनसे बचा। वहाँ से फरूखाबाद होकर कानपुर आया कानपुर से प्रयाग गया। प्रयाग में भी मारने वाले आये थे। पर

एक माधवप्रसाद नामी धर्मात्मा पुरुष था, उसकी सहायता से बचा। यह गृहस्थ माधव प्रसाद ईसाई मत ग्रहण करने को तैयार था, उसने इन सब पण्डितों को नोटिश दे रखा था, कि यदि आप अपने आर्य धर्म में तीन महीने के भीतर

मेरा विश्वास न करा देंगे, तो मैं ईसाई धर्म को स्वीकार कर लूँगा मेरे आर्य धर्म पर निश्चय दिला देने से वह ईसाई नहीं हुआ। प्रयाग से मैं रामनगर को गया। वहाँ के राजा की इच्छानुसार काशी के पण्डितों से शास्त्रार्थ हुआ। इस

शास्त्रार्थ में यह विषय प्रविष्ट था कि वेदों में मूर्ति पूजा है या नहीं। मैंने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि प्रतिमा शब्द तो वेदों में मिलता है परन्तु उसके अर्थ तौल नाप आदि के हैं। वह शास्त्रार्थ अलग छपकर प्रकाशित हुआ है,

जिसको सज्जन पुरुष अवलोकन करेंगे।

इतिहास शब्द से ब्राह्मण ग्रन्थ ही समझने चाहिए इस पर भी शास्त्रार्थ हुआ था। गत वर्ष के भाद्रपद मास में मैं काशी में था। आज तक चार बार काशी में जा चुका हूँ। जब—जब काशी में जाता हूँ तब—तब विज्ञापन देता हूँ कि यदि किसी को वेद में मूर्ति पूजा का प्रमाण मिला हो तो मेरे पास लेकर आवें परन्तु अब तक कोई भी प्रमाण नहीं निकाल सका।

इस प्रकार उत्तरीय भारत के समस्त प्रान्तों में मैंने भ्रमण किया है। दो वर्ष हुए कि कलकत्ता, लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, जयपुर आदि नगरों में मैंने बहुत से लोगों को धर्मोपदेश दिया है। काशी फरूखाबाद आदि नगरों में चार पाठशालाएँ आर्ष— विघा पढ़ाने के लिए स्थापित की हैं। उनमें अध्यापकों की उच्छृंखलता से जैसा लाभ पहुँचना चाहिए था नहीं पहुँचा। गत वर्ष मुम्बई आया, यहाँ मैंने गुसांई महाराज के चरित्रों की बहुत कुछ छानबीन की। बम्बई में आर्य समाज स्थापित हो गया। बम्बई,अहमदाबाद, राजकोट आदि प्रान्तों में कुछ दिन धर्मोपदेश किया, अब तुम्हारे इस नगर में दो महीनों से आया हुआ हूँ।

यह मेरा पिछला इतिहास है, आर्य धर्म की उन्नति के लिए मुझ जैसे बहुत से उपदेशक आपके देश में होने चाहिए। ऐसा काम अकेला आदमी भली प्रकार नहीं कर सकता, फिर भी यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि अपनी बुद्धि  और शक्ति के अनुसार जो कुछ दीक्षा ली है उसे चलाऊँगा। अब अन्त में ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि सर्वत्र आर्य समाज कायम होकर मूर्त्ति पूजादि दुराचार दूर हो जावें, वेद शास्त्रों का सच्चा अर्थ सबको समझ में आवे और उन्हीं के अनुसार लोगों का आचरण हो कर देश की उन्नति हो जावे। पूरी आशा है कि आप सज्जनों की सहायता से मेरी यह इच्छा पूर्ण होगी।

ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः

 

DAYANANDA AND ARYA SAMAJ – Romain Rolland

Indian religious thought raised a purely Indian Samaj against Keshab’s Brahmo Samaj and against all attempts at Westernization, even during his life-time, and at its head was a personality of the highest order, Dayananda Saraswati (1824-1883).

This man with the nature of a lion is one of those, whom Europe is too apt to forget when she

Judges India, but whom she will probably be forced to remember to her cost; for he was that rare combination, a thinker of action with a genius for leadership.

While all the religious leaders of whom we have already spoken and shall speak in the future were and are from Bengal. Dayananda came from quite a different land, the one which half a century later gave birth to Gandhi—the north-west coast of the Arabian Sea. He was born in Gujarat at Tankara (Morvi) in the State of Kathiawar of a rich family belonging to the highest grade of Brahamins no less versed in Vedic learning than in mundane affairs both political and commercial. His father took part in the government of the little native state. He was rigidly orthodox according to the letter of the law with a stern domineering character, and this last to his

sorrow he passed on to his son.

As a child Dayananda was, therefore, brought up under the strictest Brahmin rule, and at the age

of eight was invested with the Secred Thread and all the severe moral obligations entailed by this privilege rigorously enforced by his family.’ It seemed as if he was to become pillar of orthodoxy in his turn, but instead he became the Samson, who pulled down the pillars of the temple; a  striking example among a hundred others of the vanity of human effort, when it imagines that it is possible by a superimposed education to fashion the mind of the rising generation and so dispose of the future. The most certain result is revolt.

That of Dayananda is worth recording. When he was fourteen his father took him to the temple to celebrate the great festival of Shiva. He had to pass the night a strict fast in pious vigil and prayer. The rest of the faithful went to sleep. The young boy alone resisted its spell. Suddenly he saw a mouse nibbling the offerings to the God and running over Shiva’s body. It was enough. There is no doubt about moral revolt in the heart of a child. In a second his faith in

the idol was shattered for the rest of his life. He left the temple, went home alone through the night, and thenceforward refused to participate in the religious rites.

It marked the beginning of a terrible struggle between father and son. Both were of an unbending

and autocratic will, which barred the door to any mutual concession. At nineteen Dayananda ran

away from home to escape a forced marriage. He was caught and imprisoned. He fled again, this time for ever (1845). He never saw his father again. For fifteen years this son of a rich Brahmin,

despoiled of everything and subsisting on alms, wandered as a sadhu clad in the saffron robe along roads of India. Dayananda went in search of learned men, ascetics, studying here philosophy, there the Vedas, learning the theory and practice of the Yoga.

He visited almost all the holy places of India and took part in religious debates. He suffered, he braved fatigue, insult and danger. However, Dayananda remained far from the human masses through which he passed for the simple reason that he spoke nothing but Sanskrit throughout this period.

Dayananda did not see, did not wish to see, anything round him but superstition and ignorance, spiritual laxity, degrading prejudices and the millions of idols he abominated. At length about 1860 he found at Mathura an old Guru even more implacable than himself in this condemnation of all weakness and his hatred for superstition, a Sanyasi blind from infancy and from the age of eleven quite alone in the world, learned man, a terrible man Swami Virijananda Sarasvati. Dayananda put himself under his ‘discipline” which in its old literal seventeenth century sense scarred his flesh as well as his spirit.

Dayananda served this untamable and indomitable man for two and a half years as his pupil. It is,

therefore, mere justice to remember that his subsequent course of action was simply the fulfillment of the will of the stern blind man, whose surname he adopted, casting his own to oblivion. When they separated Virjananda extracted from him the promise that he would consecrate his life to the annihilation of the heresies that had crept into the Puranic faith, to reestablish the ancient religious methods of the age before Budha, and to disseminate the truth.

Dayananda immediately began to preach in Northern India, but unlike the benign men of God

who open all heaven before the eyes of their hearers, he was a hero of the Iliad or of the Gita with the athletic strength of Hercules,’ who thundered against all forms of thought other than his own, the only true one. He was so successful that in five years Northern India was completely changed. During these five years his life was attempted four or five times—sometimes by poison.

Once a fanatic threw a cobra at his face in the name of Shiva, but he caught it and crushed it. It

was impossible to get the better of him; for he possessed an unrivalled knowledge of Sanskrit and the Vedas, while the burning vehemence of his words brought his adversaries to naught. They likened him to a flood. Never since Sankara had such a prophet of Vedism appeared. The orthodox Brahmins, completely overwhelmed, appealed from him to Benares their Rome. Dayananda went there fearlessly, and undertook in November, 1869, a Homeric contest before millions of assailants, all eager to bring him to his knees, he argued for hours

together alone against three hundred pandits—the whole front line and the reserve of Hindu

orthodoxy) He proved that the Vedanta as practiced was diametrically opposed to the primitive Vedas.

He claimed that he was going back to the true word. They had not the patience to hear him out. He was hooted down and excommunicated. A void was created round him, but the echo of such combat in the style of the Mahabharata spread throughout the country, so that his name became famous over the whole of India. At Calcutta where he stayed from December

15, 1872 to April 15, 1873, Ramakrishna met him.

He was also cordially received by the Brahmo Samaj. Keshab and his people voluntarily shut their eyes to the differences existing between them; they saw in him a rough ally in their crusade against orthodox prejudices and the millions of Gods. But Dayananda was not a man to come to an understanding with religious philosophers imbued with Western ideas. His national Indian theism, its steel faith forged from the pure metal of the Vedas alone, had nothing in common with theirs, tinged as it was with modern doubt, which denied the infallibility of the Vedas and the doctrine of transmigration.’ He broke with them the richer for the encounter,2 for he owed them3 the very simple suggestion, whose practical value had not struck him before, that his propaganda would be of  little effect unless it was delivered in the language of the people. He went to Bombay, where shortly afterwards his sect, following the example of the Brahmo Samaj but with a better genius of organization proceeded to take root in the social life of India. On April 7, 1875 he founded at Bombay his first Arya Samaj, or Association of the Aryans of India, the pure Indians, the descendants of the old conquering-race of the Indus and the Ganges,

(These italic words express that the author is influenced by the speculated historical elements

which were imposed upon our history by foreigners.

Swamiji did not really take this view of Arya in any of his writings—Editor) and it was exactly in those districts that it took root most strongly. From 1877, the year when its principles were definitely laid down at Lahore, to 1883, Dayananda spread a close network over Northern India. Rajputana, Gujrat, the United Provinces of Agra and Oudh, and above all in the Punjab which remained his chosen land, practically the whole of India was affected. The only province where his influence failed to make itself felt was Madras. (He could not have the time and chance to preach his gospel in Madras—Editor) He felt, struck down in his prime, by an assassin. The concubine of a Maharajah, whom the stern prophet had denounced, poisoned him. He

died at Ajmer on October 30, 1883. But his work pursed its uninterrupted and triumphant course, from 40,000 in 1891 the number of its members rose to 1,01,000 in 1901, to 2,40,000 in 1911 and to 4,58,000 in 1921.1 Some of the most important Hindu personalities, politicians and Maharajahs belonged to it. Its spontaneous and impassioned success in contrast to the slight reverberations of Keshab’s Brahmo Samaj shows the degree to which Dayananda’s stern

teachings corresponded to the thought of his country and to the first stirrings of Indian nationalism, to which he contributed.

It may perhaps be useful to remind Europe of the reasons at the bottom of his national awakening, now in full flood. Westernization was going too far, and was not always revealed by its best side. Intellectually it had become rather frivolous attitude of mind, which did  away with the need for independence of thought, and transplanted young intelligences from their proper environments teaching them to despise the genius of their race. The instinct for self-preservation

revolted. Dayananda’s generation had watched, as he had done. Not without anxiety, suffering and irritation, the gradual infiltration into the veins of India of superficial European rationalism on the one hand, whose ironic arrogance understood nothing of the depths of the Indian spirit, and on the other hand, of a Christianity, which when it entered family life fulfilled only too well Christ’s prophecy he had come to bring division between father and son.

The enthusiastic reception accorded to the thunderous champion of the Vedas, a Vedist

belonging to a great race and penetrated with the sacred writings of ancient India and with her heroic spirit, is then easily explained. He alone hurled the defiance of India against her invaders.

 

Dayananda declared war on Christianity and his heavy massive sword cleft it as under with scant reference to the scope of exactitude of his blows. Nevertheless as Glasenapp rightly remarks,

they are of paramount interest for European Christianity of which ought to know what is the image of itself as presented by its Asiatic adversaries.

Dayananda had no greater regard for the Qoran and the Puranas, trampled underfoot the

body of Brahmin orthodoxy. He had no pity for any of his fellow countrymen, past or present, who had contributed in any way the thousands-year decadence of India, at one time the mistress of the world.’ He was a ruthless critic of all who, according to him, had falsified or profaned the true Vedic  religion.’ He was a Luther fighting against his own misled and misguided Church of Rome,’ and his first care was to throw open the wells of the holy books,

so that for the first time his people could come to them and drink for themselves. He translated and wrote commentaries on the Vedas in the vernacular— Its was in truth an epoch-making date for India when a Brahmin not only acknowledged that all human beings have the right to know the Vedas, whose study had been previously

prohibited by orthodox Brahmins, but insisted that their study and propaganda was the duty of every Arya

It is true that his translation was an interpretation, and that there is much to criticize with

regard to accuracy’ as well as with regard to the rigidity of the dogmas and principles he drew from the text, the absolute infallibility claimed for the one book, which according to him had emanated direct from the “Prehuman” or Superhuman Divinity, his denials from which there was no appeal, his implacable condemnations, his theism of action, his credo of battle,’ and finally his national God. But in default of outpourings of the heart and the calm sun of the spirit, bathing the nations of men and their Gods in its effulgence Dayananda transfused into the languid body of India his own formidable energy, his certainty, his lion’s blood.

His words rang with heroic power. He reminded the secular passivity of a people, too prone to bow to  fate, that the soul is free and that action is the generator of destiny. He set the example of a complete clearance of all the encumbering growth of privilege and prejudice by a series of hatchet blows. If _ his metaphysics were dry and obscure  his theology was narrow and in my opinion retrograde_,_ (The underlined only expresses the want of opportunity  and inability in contacting and penetrating the mystery of Dayananda’s Theology—Editor) his social activities and practices were of intrepid boldness, with regard to questions of fact he went further than the Ramakrishna Mission ventures to-day.

His creation, the Arya Samaj, postulates in principle equal justice for all men and all nations,

together with equality of the sexes. It repudiates a hereditary caste system, and only recognizes professions or guilds, suitable to the complementary aptitudes of men in society; religion was to have no part in these divisions but only the service of the state, which assesses the tasks to be performed. The state alone, if it considers it for the good of the

community, can raise or degrade a man from one caste to another by way of reward or punishment, Dayananda wished every man to have the opportunity to acquire as much knowledge as would enable him to raise himself in the social scale as high as he was able. Above all he would not tolerate the abominable injustice of the existence of the untouchables, and nobody has been a more ardent champion of their outraged rights. They were admitted to the Arya Samaj on the basis of equality; for the Aryas are not a caste. The Aryas are all men of superior principles; and the ‘Dasyus’ are they who lead a life of wickedness and sin.

Dayananda was no less generous and no less bold in his crusade to improve the condition of

women a deplorable one in India. He revolted against the abuses from which they suffered recalling that in the heroic age they occupied in the home and in society a position at least equal to men. They ought to have equal education according to him, and supreme control in marriage,’ for men and women, and though he regarded marriage as  indissoluble, he admitted the remarriage of widows and went so far as to envisage a temporary union for women as well as men for the purpose of having children, if none had resulted from marriage.

Lastly the Arya Samaj, whose eighth principle was ” to diffuse knowledge and dissipate ignorance” had played a great part in the education of India— especially in the Punjab and the United Province and it has founded a host of schools for girls and boys. Their laborious hives are grouped round two model establishments,’ The Dayanand Anglo—Vedic College of Lahore and the Gurukula of Kangri, national bulwarks of Hindu education, which seek

to resuscitate the energies of the race and to use at the same time the intellectual and technical conquests of the West. To these let us add philanthropic activities such as orphanages, workshops for boys and girls, homes for widows, and great works of social service at the

time of public calamities, famine etc.

I have said enough about this Sanyasi with the soul of a leader, to show how great an uplifted of

the peoples he was in fact the most vigorous force of the immediate and present action in India at the moment of the rebirth and reawakening of the national consciousness. His Arya Samaj whether he wished it or not prepared the way in 1905 for the revolt of Bengal. He was one of the most ardent prophets of reconstruction and of national organization. I feel that it was he who kept the vigil; his purpose in life was action and its object his nation. For a people lacking the vision of wider horizon, the accomplishment of the action and the creation of nation might perhaps be enough. But not for India— before her will still lie the universe.

Namaste Meaning – swargeeya pandit sukhdev vidya vachaspati

हमारी आर्य जाति का वेद ही एक मात्र स्वतः प्रमाण धर्म -पुस्तक है। यही हमारा ईश्वरीय ज्ञान है। अपने आपको आर्य हिन्दू कहनेवाला कोई भी व्यक्ति इस सिद्धान्त से इन्कार नहीं करेगा । वैदिकधर्मी तथा पौराणिकधर्मी, सभी के आचार- व्यवहार का मूलस्त्रोत वेद ही होना चाहिए। वैसे तो भारतवर्ष के अन्दर बहुत से धर्म प्रचलित है। परन्तु हमें इस लेख में उन धर्मो से कोई शिकायत नहीं करनी, जो वेद को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि जब वे वेदों को श्रद्धा की दृष्टि से देखते ही नहीं तो उनके सामने वेदों का प्रमाण उपस्थित करके हम क्या कहेंगे ? अतः हे वेदानुयायी भाइयो! आओ, आज हम इस बात पर विचार करें कि वैदिक साहित्य के अनुसार हमारा परस्पर सत्कार एवम् आशीर्वादसूचक शब्द क्या होना चाहिए ? हमारी जाति में तो एकता को आने में ही डर लगता है। हमारे रीति -रिवाज एक नहीं, हमारे विचार एक नहीं, हमारी शिक्षा एक नहीं, मतलब कहने का यह कि हमारा कुछ भी एक नहीं। ‘एकता’के विश्राम के लिए जब कि हमारा कुछ भी एक नहीं, तो एकता आवे कहाँ से ? कोई कहता है ‘नमस्ते’ तो दूसरा चिल्लाता हैं ‘जय गोपाल जी’ ; एक ने बड़े मीठे स्वर में कहा ‘सीताराम’,  तो दूसरा भन्नाकर बोलता है ‘बोलो राधेश्याम’;  और लगे दोनों लड़ने । एक ने किया ‘राम -राम’ तो दूसरे ने उत्तर दिया ‘जय श्रीकृष्ण ’। एक करे दण्डवत् और प्रणाम तो दूसरा करे सलाम । कुछ समझ में नहीं आता कि कौन ठीक कहता है ?

भला पूछो तो ‘राम – राम कहने वालों से कि क्या महाराजा रामचन्द्र जी अपने पिता दशरथ को सत्कार करते समय ‘राम-राम ’ ही कहा करते थे और राजा दशरथ भी अपने बेटे को ‘राम-राम’ ही कहा करते थे और राजा दशरथ भी अपने बेटे को ‘राम -राम ’ कहकर ही उत्तर देते थे ? जिस समय राधा (जिसके बारे में सुना गया है कि वह श्रीकृष्ण की विवाहिता पत्नी नहीं थी) और कृष्ण परस्पर बड़ी उत्कण्ठा से चिर प्रतीक्षा के पश्चात् मिलते थे तो वे भी कया परस्पर ‘राधाकृष्ण ही कहा करते थे ? स्थूलबुद्धि तो यही कहती है। कि रामचन्द्र और दशरथ ‘ राम – राम ’ नहीं पुकारते होंगे। यह भी समझ में आता है। कि कृष्ण ने भी कभी किसी का ‘जय गोपाल ’ सूचक शब्द से सम्मान नहीं किया होगा।

मिलें परस्पर सम्मान करने के लिए या आशीर्वाद लेने के लिए और बोलें किसी स्त्री या पुरूष का नाम! यह कैसी अप्रासंगिक बात है।

पूर्व पक्षी महाराजा रामचन्द्र और कृष्ण विष्णु के अवतार थे, अतः वे साक्षात् परमात्मा थे। परस्पर मिलते समय यदि परमात्मा का नाम लिया जाये तो उसमें क्या दोष है ?

सिद्धान्ती एक तो भाई परमात्मा अवतार लेता ही नहीं। यदि ‘दुर्जनताषन्याय’ से मान भी लिया जाए कि परमात्मा अवतार लेता है, तब भी तो उस समय वह पुरूष ही बना था। उस पुरूष बने परमात्मा का नाम लेना अपके मत में बुरा नहीं, अच्छा है। तो ठीक रहा, ऐसे पुरूष बने परमात्मा का नाम हर स्थान- पर बिना प्रसंग के भी ले लिया करो। लेने से शायद पाप तो न हो पर व्यवहार तो नहीं चलेगा। एक मालिक को पानी की प्यास लगी है और वह अपने नौकर से कहता ‘राम – राम’पति को लगी भूख और वह लगा अपनी स्त्री से कहने ‘राधाकृष्ण । भाई ! इन दोनों स्थानों पर आपके कथनानुसार सम्भवतः ‘राम -राम’और राधाकृष्ण कहना पाप तो नहीं, पर इतना कहने मात्र से तो मालिक तथा पति दोनों ही प्यासे तथा भूखें मरेंगे। तुम इस प्यास और भूख के अवसर पर ‘राम – राम’ को स्मरण करो या न करो, हमें इससे काई मतलब नहीं, परन्तु हमारा कहना यह है कि प्यास के समय यह अवश्य कहो कि ‘पानी लाओं’और भूख के समय यह अवश्य कहो कि ‘भोजन लाओ । तभी जान बचेगी।

छोटा अपने बड़े का सत्कार करने गया और कहने लगा ‘राम -राम’ । बड़े ने भी आशीर्वाद में दोहरा दिया ‘राम -राम’ , तो इससे क्या सत्कार और आशीर्वाद सूचित हो गये ? कदापि नहीं । जैसे ‘राम – राम’ आदि शब्दों के प्रयोग से भूख और प्यास नहीं बुझती, इसी प्रकार इन शब्दों से सत्कार एवम् आशीर्वाद भी सूचित नहीं होते।

पू० तो आप ही बताइये , ऐसे अवसर पर किस शब्द का प्रयोग किया जाए ?

सि० शब्द ऐसा कहो जो वेदप्रतिपादित हो।

हमारा यह दावा है कि वेदों में ‘राम – राम’ आदि शब्दों से कहीं भी सत्कार – सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं है। वेदों में तो क्या आप सारे प्राचीन संस्कृत साहित्य – को भी पढ़ जाइये, कहीं एक – दूसरे के साथ ‘राम – राम’ या ‘राधाकृष्ण’ आदि शब्दों का प्रयोग नहीं है। पौराणिक धर्मावलम्बियों को अपने पुराण, महाभारत तथा रामायण या मनुस्मृति आदि ग्रन्थों को भी देखना चाहिए । उनमें कहीं भी इन मनुष्यवाचक शब्दों का परस्पर सत्कार के लिए प्रयोग विहित नहीं है। सभी वेद, पुराण, इतिहास तथा स्मृति आदि ग्रन्थ और शब्द की आज्ञा देते है। आर्यसमाज उसी शब्द का प्रचार करना चाहता है।

पू० वह शब्द क्या है ?

सि० वेदादि सत्य शास्त्र तथा पुराणदि ग्रन्थ सभी एक स्वर से यही कहते हैं कि परस्पर ‘ नमस्ते ’ शब्द का प्रयोग होना चाहिए।

इस नमस्ते शब्द में बहुत से प्रमाण देने से पूर्व इस शब्द का अर्थ जान लेना आवश्यक है । ‘नमस्ते ’ शब्द को दो टुकड़ों में बाँटा जा सकता है-

‘नमः -ते’ । व्याकरण के जाननेवाले जानते है कि ‘ते’ शब्द का अर्थ है – तुम्हारे लिए (ते, तुभ्यम् -तुम्हारे लिए) परिणमत: ‘नमस्ते’ शब्द का अर्थ यह हुआ कि तुम्हारे लिए नमः। अब केवल विवाद है ‘नमः’ शब्द पर। आइए, हम इस ’नमः’ शब्द के अर्थ का भी विवेचन करें। ‘नमः’ शब्द के निम्न अर्थ अधिक प्रसिद्ध हैं-

                () नमः = सत्कार, श्रद्धा, किसी के सामने झुकना।

क – अमरकोष में आया है ‘नमो नतौ’ । ‘नमस्’ अव्यय ‘ ज्ञति’ अर्थात् किसी के सामने झुकने के अर्थ में आता है।

ख – यास्क निघण्टु ३ । ५ में ‘नमस्यति ’ का अर्थ किया है ‘परिचरति’ । अर्थात् सेवा करने, सत्कार करने के अर्थ में नमस्यति शब्द आता है।

ग – सिद्धान्तकौमुदी में ‘णम’ धातु प्रहत्व अर्थात सत्कार अर्थ में आता है।

घ – पं० शिवदत्त तत्वबोधिनी की टिप्पणी में लिखते हैं-

अपकृष्टत्वज्ञानबोधनानुकूलो व्यापारो नमः पदार्थः।

अर्थात् जब मनुष्य दूसरे के सामने ऐसी किया करे जिससे वह उस दूसरे से छोटा प्रतीत हो, वही क्रिया ‘ नमः’ शब्द का अर्थ है। जैसे जब कोई हाथ जोड़कर माथा नवाकर किसी के सामने झुकता है तो वह उससे छोटा ही प्रतीत होता है। अर्थात् ‘नमः’करनेवाला दूसरे का सत्कार कर रहा होता है।

                () नम:= भेंट, त्याग

क – आप्टे संस्कृत कोश में ‘नमः’ शब्द का अर्थ किया है – a gift, present-  जिसका अर्थ भेंट ही है।

ख – श्री पं० शिवदत्त जी तत्वबोधिनी पर टिप्पणी करते समय लिखते है – ‘ एषोऽर्घः   शिवाय नमः इत्यादौ त्यागो नमः शब्दार्थः । शिव के लिए जब अर्घ भेंट किया जाता हो, वहाँ यदि ‘नमः’ शब्द का प्रयोग हो तो उसका अर्थ ‘ त्याग’ है।

ग – नमः sacrifice त्याग । आप्टे संस्कृत कोश।

                (3) नमः = अन्न

क – यास्क निघण्टु २।७ में ‘नमः’ शब्द का अर्थ ‘ अन्न’ भी किया गया है। अन्न यहाँ सब भेाग सामग्री का उपलक्षक या प्रतिनिधि है। इसमें अपने निर्वाह के कपड़े, रूपया, पैसा, पशु तथा मकानादि सभी आ जाते है।

ख – शतपथ ब्राह्मण ६।३।१। १७ में भी कहा है ‘ अन्न नमः’ अर्थात् अन्न ही ‘नमः’  है।

ग – आप्टे संस्कृत कोश में ‘ नम:’ शब्द का अर्थ किया है Food भोजन।

                (नमः = वज्र

क – यास्क निघण्टु २ । २० में नमः शब्द का अर्थ वज्र भी किया गया है। वज्र – का मतलब उन सब भयंकर शस्त्रास्त्रों से है। जिनसे दुष्टों का संहार किया जाए।

ख – नमः a thunder bolt वज्र । आप्टे संस्कृत कोश।

                () नमः = यज्ञ

शतपथ ब्राह्मण ७। ४।१।३०।। २।४।२।२४।।२।६।१।४२।।९।१।१।१६।। में ‘ यज्ञों वै नमः ‘ कहकर ‘नमः’ शब्द का अर्थ ‘यज्ञ’भी किया गया है। इसी प्रकार शतपथ – ब्राह्मण में कहा है –

                ‘तस्मादु नायज्ञियं ब्रूयान्नमस्तऽइति यथा हैनं’(अयज्ञियं) ब्रूयाद् यज्ञस्त इति तादृक्तत् ।।

यह वाक्य भी यही सिद्ध करता है कि ‘ नमः शब्द ’यज्ञ’ का भी वाचक है।

यधपि संस्कृत साहित्य में ‘ नमः ’ शब्द के कई अर्थ है। तथापि थोड़े से अर्थ हम ने यहाँ प्रसंगवशात् दिये हैं। इस प्रकार यदि हम ‘ नमः ’ शब्द के अर्थों का संक्षेप में संग्रह करें तो वह संग्रह इस प्रकार होगा –

नमः – सत्कार, श्रद्धा, किसी के सामने झुकना, नीचा होना, त्याग , अन्न (सम्पूर्ण भोग्य सामग्री) , वज्र (सम्पूर्ण धातक शस्त्रास्त्र): यज्ञ और भेंट ।

पू० यह कैसे प्रतीत हो कि इन बहुत से अर्थों में से ‘नमः ’ शब्द का कहाँ क्या अर्थ है ?

सि० थोड़ी – सी भी बुद्धि का प्रयोग किया जाए तो यह उलझन भी आसानी से सुलझ सकती है। प्रकरण, समय तथा स्थानादि को देखकर यह बात बड़ी आसानी से पहचानी जा सकती है कि ‘ नमः ’ शब्द का कहाँ क्या अर्थ होना चाहिए। संस्कृत साहित्य में ‘ सैन्धव’ शब्द के ‘नमक’ और ‘घेाड़ा ’ दोनों अर्थ है। एक आदमी रसोई – घर में भोजन करते समय अपने नौकर से कहता है –

सूपाय किचित् सैन्धवमानीयताम्, नूनमघ न्यूनमाभाति।

अर्थात् दाल के लिए थोड़ा ‘ सैन्धव’ले आओ, कुछ कम मालूम होता है। यह सुनते ही नौकर सैन्धव अर्थात् सेन्धा नमक ले आएगा, घोड़ा नहीं । और जब मालिक को हवाखेरी करने जाना होगा, उस समय नौकर सैन्धव – घोड़ा ही लाएगा, नमक नहीं । ठीक इसी तरह ‘ नमः ’ शब्द का प्रयोग को  देखकर पहचानो कि यहाँ ‘ नमः ’ शब्द का  प्रयोग किस दृष्टि से है। पाठक अब इस बात को समझ गए होंगे कि इन सब अर्थो को कण्ठाग्र कर लेने पर यह कहनेवालों की जबान बन्द हो जाएगी कि छोटा तो बड़ों को ‘नमस्ते’  करे पर बड़ा छोटों को नमस्ते कैसे करे ?

जिस समय छोटा, पुत्र या शिष्य आपने पिता या आचार्य को ‘ नमस्ते ’ करता है उस समय उसका यही अर्थ होता है कि आपके लिए सत्कार हो, मैं आपके सामने झुकता हूँ , मेरे हृदय में आपके प्रति श्रद्धा है इत्यादि। और उसके उत्तर – में पिता या आचार्य अपने बेटे या शिष्य को आशीर्वाद देते हैं कि ‘ नमस्ते ’ अर्थात् ’ तेरे लिए अन्नादि समस्त भेाग्य सामग्री प्राप्त हो, तू फूले – फले, समृद्धिशाली हो।’ इत्यादि। यही तो बड़ों का आर्शीवाद होता है। अब चाहे परस्पर ‘ नमस्ते करते हुए क्यों न हृदय में परमात्मा का नाम याद करते रहो । हमें इसमे कोई आपत्ति नहीं। इसी का नाम है भूख के समय भोजन माँगना , प्यास के समय पानी माँगना तथा सत्कार के समय सत्कार और आशीर्वाद के समय आशीर्वाद देना । परमात्मा का नाम स्मरण करने से तुम्हें कोई नहीं रोकता।

बराबरवाले परस्पर ‘ नमस्ते ’ करके एक – दूसरे का सत्कार ही करते हैं, परन्तु इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि यदि बड़ा भी छोटों को सत्कार करने के अभिप्राय से ‘ नमस्ते ’ करता है तो भी कोई दोष नहीं और कोई पाप नहीं । संसार में तो यह होता ही है कि बड़ा भी छोटे का सत्कार करता है, क्याकि वह छोटा बड़े के सत्कार का साधन बन सकता है। यदि तुम स्वयं सत्कार चाहते हो तो औरों का भी सत्कार करो। छोटों का सत्कार करना उनको अपने समान बनाने का अच्छा साधन है। जितना तुम उसका सत्कार करोगे उतना ही वह तुम्हारा भी सत्कार करेगा और कराएगा।

यदि ’नमस्ते ’ शब्द का शास्त्रोक्त प्रयोग देखना हो तो आइए सारे वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य पर सरसरी नजर डालें, बहुत स्थानों पर ‘ नमस्ते’ शब्द का प्रयोग मिलेगा। हमें स्थान – स्थान पर नमस्ते शब्द का प्रयोग मिलेंगा । हम स्थान-स्थान पर ‘ नमस्ते’ शब्द का प्रयोग दिखायेंगे, प्रकरण तथा स्थान को देखकर पाठकवृन्द स्वयं विचार लेंगे कि उपरिलिखित ‘ नमः’ शब्द के अर्थों में से कौन – सा अर्थ उपयुक्त है। ‘ ते’ शब्द का अर्थ सब जगह ’तुम्हारे लिए’ ही होगा।

यजुर्वेद का सारा १६ वाँ अध्याय मन्त्र ३२ उठाकर देख जाइए ।, उसमें ’ नमस्ते ’ शब्द का बहुत प्रयोग है-

() नमो ज्येष्ठाय कनिष्ठाय नमः पूर्वजाय चापरजाय नमो मध्यमाय चापगल्भाय नमो जघन्याय बुध्न्याय ।।

इस मन्त्र में छोटे , बडे , पूर्वज एवं नीच तथा मध्यम आदि सब के लिए ’ नमस्ते ’ का प्रयोग है।

() नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वा नमो नमो कुलालेभ्यः कर्मारेभ्यश्च वो नमो नमो निषादेभ्यः पुञिजष्ठेभ्यश्च वा नमो नमः श्वनिभ्यो मृगयुभ्यष्च वो नमः ।।

(यजु० १६।२७)

यहाँ तो तक्ष – तरखान , राजमिस्त्री , रथकार, कुलाल -कुम्हार, निषाद अर्थात् चाण्डाल तथा कुत्तों के शिक्षक, आदि सब के लिए ’ नमस्ते ’ का प्रयोग है अर्थात् इनके लिए अन्नादि भोग्य सामग्री देने का विधान है।

() नमो वञचते परिवञचते स्तायूनां पतये नमो नमो निषडिग्णऽइषुधिमते तस्कराणां पतये नमो नमः सृकायिभ्यो जिघा् सद्भ्यो मुष्णतां पतये नमो नमोऽसिमद्भ्यो नक्तञचद्भ्यो विकृन्तानां पतये नमः।

(यजु० १६।२१)

इस मन्त्र में छली, कपटी चोरों के सरदार , हिंसक, लुटेरे तथा गठकतरे आदि सभी के लिए ’ नमस्ते ’ शब्द का प्रयोग होता है अर्थात् उन्हें नमः वज्र से मारने का विधान है।

यजुर्वेद के १६ वें अध्याय के हमने तीन ही मन्त्र केवल दिखाने मात्र के लिए लिखे हैं यह तो सारा अध्याय नमस्ते श्ब्द से भरा पड़ा है।

हमारे पौराणिक भाई कहते है। कि यह तो रूद्राध्याय है इसमें परमात्मा के प्रति ‘नमस्ते’ है।

यथा – नमस्ते रूद्र मन्यवे – ’ इत्यादि।                                                               (यजु० १६।१)

मै अपने उन पौराणिक भाइयों से पूछता हूँ कि यदि वस्तुतः इस अध्याय में सर्वत्र रूद्र अर्थात् परमात्मा को ही ‘नमस्ते’ है, तब तो इस अध्याय में आए चोर , लुटेरे, डाकू, कुत्ते, शूद्र तथा चाण्डालादि सभी प्राणी परमात्मा के ही रूप हो गए जिनको भिन्न – भिन्न अभिप्राय से ’ नमस्ते किया गया है। तब तो भाई । जब तुम्हारे घर में चोर, लुटेरे, कसाई या चाण्डाल घुस आवें तब तुम उनकी अर्घ आदि देकर पूजा किया करो। वे लुटेरे आपकी भक्ति से बड़े प्रसन्न होंगे, और आपको आपने घर में रूपया – पैसा तथा अन्य सामान आदि रखने की तकलीफ भी नहीं होगी, क्योंकि वे सब उठाकर ले जायेंगे। शूद्र और चाण्डालों को भी मन्दिरों से आने से क्यों रोकते हों ? भाई ! वे भी तुम्हारे कथनानुसार रूद्र परमात्मा के ही तो रूप हैं।

() नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्तेऽअस्त्वर्चिषे।

(यजु० १७।११)

() नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेषजेभ्यः मृत्यो मूलेभ्यो ब्राहाणेभ्य इद नमः

(अथर्व० ६।१४।३)

नमस्ते लाङलेभ्यो                                                                                            (अथर्व० २।९।४)

() नमस्ते राजन्                                                                                                     (अथर्व० २।१०।२)

() नमस्ते अग्न ओजसे

सामवेद प०१, अथ् प०१, द०२, मं०१।।

इन सब स्थानों में ’ नमस्ते शब्द का प्रयोग है।

() नमोमहद्भ्यो नमो अर्भकेम्यो नमो युवभ्यो नमो आशिनेभ्यः।

(ऋग्०   १। २७। १३)

यहाँ पर क्रमशः बड़े , छोटे, जवान तथा बूढ़े सब के लिए नमस्ते किया गया है। अर्भक शब्द का अर्थ है छोटा। यास्क मुनि निरूक्त ३।४।२० में लिखते है- ’दभ्रमर्भकमित्यल्पस्य’ अर्थात् ’दभ्र’और ’अभ्रक’शब्द थोड़े या छोटे के अर्थ में आते हैं।

(९) शतपथ ब्राह्मण में आता है कि गार्गी अपने पति याज्ञवल्क्य को नमस्ते करती है।

सा होवाचनमस्ते याज्ञवल्क्य।

(१०) याज्ञवल्क्य यद्यपि ऋषि थे, वे पदवी में अपने से छोटे राजा जनक को नमस्ते करते हैं –

होवाचजनको वैदेहोनमस्ते (शतपथ)

(११) महर्षि ’यम’ जो कि नचिकेता के आचार्य होने के कारण अपने शिष्य से बडे थे, अपने शिष्य नचिकेता को नमस्ते कहते हैं-

नमस्तेऽस्तु ब्रहा्न् स्वस्ति तेऽस्तु।

(कठोपनिषद् व० १ कं० ९)

(१२) गीता में अर्जुन ने कृष्ण को नमस्ते किया-

नमो नमस्तेऽस्तु सहस्त्रकृत्वः , पुनष्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।

नमःपुरस्तादथ पृष्ठतस्ते, नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।।

गीता १।३९।४०

(१३) पौराणिक काल के भवभूति नाम के महाकवि लिखित ग्रन्थ उत्तररामचरित में राम ने सीता को नमस्ते किया है –

भगवति ! नमस्ते (उत्तररामचरित)

(१४) आइए, अब हम पुराणों को टटोलें कि उन में भी कहाँ – कहाँ नमस्ते शब्द का प्रयोग है।

                देवदेव जगन्नाथ , नमस्ते भुवनेश्वर।

                जीवच्छाद्धं महादेव, प्रसादेन विनिर्मितम् ।।

(लिंग पु० ३। २७। ७)

हे सम्पूर्ण संसार के स्वामी महादेव ! कृपापूर्वक तुम ने जीवित श्रद्धा का निर्माण किया है। इसलिए तुम्हें नमस्ते हो।

(१५) पृथ्वी वराहरूपधारी भगवान् की स्तुति करती हुई बोली-

शेषपर्यड़क्शयने, धृतवक्षःस्थ्लश्रिये ।

नमस्ते सर्वदेवेश, नमस्ते मोक्षकारिणे।।

(वाराह पु० १। २१)

शेषनागरूपी शय्या पर छाती पर लक्ष्मी को धारण करने वाले भगवान् को नमस्ते हो, मोक्षदायक भगवान् को नमस्ते हो।

(१६) वराह पृथ्वी से बोला –

नमोऽस्तु विष्णवे नित्यं, नमस्ते पीतवाससे।

      नमस्ते चाघरूपाय, नमस्ते जलरूपिणे।।

(वाराह पु० ११। ११)

पीतवस्त्रधारी विष्णु को नित्य नमस्ते हो, पापरूप विष्णु को नमस्ते हो, जलरूप विष्णु को नित्य नमस्ते हो।।

नमस्ते सर्वसंस्थाय, नमस्ते जलशायिने

 नमस्ते क्षितिरूपाय, नमस्ते तैजसात्मने।।

(वाराह पु० ११। १२)

सर्वव्यापक, जल में सोने वाले, पृथ्वीरूप तथा तेजः स्वरूप विष्णु को नित्य नमस्ते हो।

(१७) केतकी का फूल जड़ होता हुआ भी महादेव को नमस्ते करता है-

नमस्ते नाथ मे जन्म , निष्फलं भवदाज्ञया।

(शिव पु० विधेश्वर सं० अ० ८, श्लोक १७)

हे नाथ ! मेरा जन्म आपकी आज्ञा से निष्फल हो गया। मैं आपको नमस्ते करता हूँ । यहाँ नमस्ते शब्द में कहीं कुछ व्यंग्य तो नहीं!

(१८) ब्रह्मा तथा विष्णु महादेव को नमस्ते करते हैं –

नम: सकलनाथाय, नमस्ते सकलात्मने ।।२८ ।।

(शिव पु० विधेश्वर सं० १, अध्याय १०)

सब के नाथ तथा सब के आत्मा शिव के लिए नमस्ते हो।

(१९) पौराणिकों के यहाँ। स्त्री तथा शूद्र अच्छी दृष्टि से नहीं देखे जाते।’ स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम्ंइत्यादि मनगढ़न्त वाक्यों के प्रमाण से वे स्त्री तथा शूद्र को पढ़ने का अधिकार तक नहीं देते । अतः प्रतीत ऐसा होता है कि हमारे पौराणिक भाई, स्त्री तथा शूद्र को नीच समझते हैं। परन्तु पुराणों में तो उन स्त्री और शूद्रों के लिए भी नमः शब्द का प्रयोग है-

द्धिजानाञ्च नमः पूर्वमन्येषाञ्च नमोऽन्तकम्।

स्त्रीणां क्वचिदिच्छन्ति, नमोऽन्तं यथाविधि ।।

(शिव पु०विधेश्वर सं० १। अ० ११। श्लो० ४२)

द्धिजों के लिए पूर्व नमः शब्द का प्रयोग करना चाहिए तथा अन्यों के लिए अन्त में नमः शब्द प्रयुक्त होना चाहिए और स्त्रियों के लिए भी यथाविधि कहीं नमः शब्द का अन्त में प्रयोग करते हैं। (कहीं पूर्व भी)

परिणामतः पौराणिकों का यह कहना कि नीचों के लिए नमस्ते नहीं होता, ठीक नहीं।

(२०) दक्ष अपनी पुत्री सतीको नमस्ते करता है-

वीरिणीसम्भवां दृष्ट्वा, दक्षस्तां जगदम्बिकाम्

नमस्कृत्य करौ बद्ध्वा, बहु तुष्टाव भक्तितः ।। २७।।

(शिव पु० रूद्र० सं० २ सती खं० अध्याय १४)

दक्ष ने अपने स्त्री वीरिणी से उत्पन्न जगत् की माता सती को देखकर दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते करके भक्ति से उसकी स्तुति की ।

पौराणिक भाई अब इसका उत्तर दें कि यदि पिता अपनी पुत्री को नमस्कार या नमस्ते करके सत्कार करे तो उसका क्या मतलब होता है ? क्या यह अपने से छोटे को नमस्ते करने का प्रमाण नहीं है ?

(२१) मनुस्मृति में एक वाक्य आता है कि –

क्षत्रियाद् विप्रकन्यायां, सूतो भवति जातितः।

(मनु० १०।११)

अर्थात् एक ब्राह्मण की लड़की में क्षत्रिय के द्धारा जो सन्तान पैदा हो उसे सूत कहते हैं। इस वाक्य के प्रमाण से हमारे पौराणिक – धर्मी भइयों के सिद्धान्त में सूत एक वर्णसंकर शूद्र होता है। परन्तु पुराण के अध्ययन से पता चलता है कि सूत नामवाले वर्ण संकर शूद्र को भी ऋषियों ने नमस्ते किया। ऋषि बोले –

सूतसूत महाभाग, व्यासशिष्य नमोऽस्तु ते

तदेव व्यासतो ब्रूहि, भस्ममाहात्म्यमुत्तमम् ।।१।।

(शिव पु० विधेश्वर सं० १ अध्याय २३)

हे सौभाग्य युक्त ! व्यास के शिष्य सूत ! हम आपको नमस्ते करते है। आप व्यास से पढ़ा हुआ भस्म का महात्म्य हमें सुनाइए।।

क्या यहाँ बड़े ने छोटे को नमस्ते नहीं किया ? एक और भी बात यहाँ प्रसडक्वशात् लिख देनी आवश्यक है और वह यह कि पुराणों के अनुसार इन सूत जी ने जो कि शूद्र से भी पतित है। पुराणों को गा – गाकर सुनाया है । मालूम होता है कि पुराण अवश्यमेव शूद्र के ही लिए हैं । इसीलिए भागवत में आया है कि –

स्त्रीशूद्रद्धिजबन्धूनां , त्रयी श्रुतिगोचरा।

कर्मश्रेयसि मूढानां, श्रेय एवं भवेदिह ।। २५।।

इति भारमाख्यानं, कृपया मुनिना मृतम् ।। २५।।

(भागवत स्कं० १ अध्याय ४)

अर्थात स्त्री, शूद्र तथा जो पतित द्धिज हैं वे वेदाध्ययन नहीं कर सकते इसलिए उनके लिए मुनि ने महाभारत की रचना की जिससे कि वे भी अपना कर्तव्याकर्तव्य निश्चय कर सकें।

(२२) विष्णु का दधीचि को नमस्ते –

बिभेमीति सकृद् वक्तुमर्हसि त्वं नमस्तव ।।१२।।

जगाम निकटं तस्य, प्रणनाम मुनिं हरिः ।।४३।।

(शिव पू० रूद्र० सं० २। सती खं० २। अ० ३९)

विष्णु ने दधीचि से कहा – मैं एक बार कहने में डरता हूँ। तुम पूजा के योग्य हो। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। तब विष्णु जी उस दधीचि के समीप गए और उसको भी प्रणाम किया।

(२३) ब्रह्म ने अपने पुत्र को नमस्ते किया-

ब्रह्मोवाच-

नमस्ते भगवन् यद्र, भास्कारामिततेजसे ।। ४१।।

भगवन् भूतभव्येश, मम पूत्र महेश्वर

सृष्टिहेतोस्त्वमुत्पन्नो, ममाङेऽनङनाशनः।। ४५।।

(शिव पु० वायु सं० ७। खं० 1। अ० १२)

ब्रह्मा बोले – सूर्य के समान महातेजस्वी भगवान् यद्र के लिए नमस्ते हो ।। ४१ ।। हे भगवन् ! हे भूत, भविष्य तथा वर्तमान के अधिपति मेरे पुत्र महेश्वर ! हे कामनाशक ! तुम मेरे शरीर से सृष्टि के निमित्त उत्पन्न हुए हो ।। ४५ ।।

ऐसे स्थल पर हमारे पौराणिक भाई कहा करते हैं कि यहाँ वस्तुतः पिता अपने पुत्र को नमस्ते नहीं करता। यहाँ परमेश्वर स्वयं ही पुत्र रूप में प्रकट हुए हैं , अतः नमस्ते परमेश्वर को ही है।

मेरा निवेदन यह है कि पौराणिकसम्मत वेदान्त के अनुसार तो सारा संसार ही ब्रह्मरूप है लौकिक माता, पिता तथा पुत्रादि सभी सम्बन्धी भी ब्रह्मरूप ही हैं। अतः यदि वे परस्पर नमस्ते करें तो क्या दोष ? तब भी तो आप के कथनानुसार ब्रह्म ही ब्रह्म को नमस्ते करेगा।

(२४) शिव ने अपनी स्त्री पार्वती को नमस्ते किया –

तथा प्रणयभङेन , भीतो भूतपतिः स्वयम्।

पादयोः प्रणमन्नेव, भवानीं प्रत्यभाषत ।। ४० ।।

(शिव पु० वायवीय० सं० ७।खं १। अध्याय २४)

तथा स्वयं शिव ने प्रीतिभंग से भयभीत होकर पार्वती के चरणों में नमस्ते करके उत्तर दिया।

(२५) ब्रह्म ने अपनी पत्नी सावित्री के चरणों में गिरकर नमस्ते किया-

चापराधं भूयोऽन्यं, करिष्ये तव सुव्रते !

पादयोः पतितस्तेऽहं, क्षम देवि नमोऽस्तु ते ।।१५०।।

 (पझ० पु० सृ० खं० अ० १७)

ब्रह्म बोले – हे सुवते देवि ! मैं तुम्हारे पेरों पर गिरा हूँ । क्षमा करो । मैं फिर तुम्हारे अपराध नहीं करूँगा । तुम्हें नमस्ते हो।

इन उपर के दो श्लोकों में तो पति अपनी स्त्रियों के पैरों पर गिरकर नमस्ते कर रहे हैं यह अपनी स्त्री के चरणों में गिरकर नमस्ते करना तो वेदविरूद्ध पौराणिक लीला है। परन्तु पति – पत्नी का परस्पर प्रेम से सत्कारार्थ नमस्ते करना आर्य समाज का वैदिक सिद्धान्त है।

इस नमस्ते के लिए प्रमाण बहुत अधिक हैं। अतः लेख की काया कढ़ने के भय से मैं केवल प्रमाण देता चला जाऊॅंगा। जहाँ आवश्यक होगा वहाँ अर्थ भी कर दिया जायेगा-

(२६) वासना वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम्

सर्वभूतनिवासानां वासुदेव नमोऽस्तु ते ।। ३४ ।।

 (विष्णु सहस्त्रनाम)

वसुदेव को नमस्ते किया गया है।

(२७) नमस्ते भगवन् रूद्र देवानां पतये नमः

   सर्वोपासितरूपाय सुरासुरपतये नमः।।

(पार्थिव पूजन)

यहाँ सुरासुर पति रूद्र को नमस्ते किया गया है।

(२८) गोविन्द  नमो नमस्ते      

हे गोविन्द  ! तुम्हें नमस्ते हो ।

(२९) या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संसिथता

            नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे,

                                नमस्ते जगद्व्यापिके चित्स्वरूपे।

   नमस्ते सदानन्दरूपे नमस्ते,

                                जगत्तारिणी त्राहि दुर्गे नमस्ते ।।

(देवी भागवत)

इन उपरिलिखित श्लोकों में जगद्रक्षिका दुर्गा को नमस्ते किया गया है।

(३०) नमस्ते भगवन् भूयो, देहि मे मोक्ष शाश्वतम्

 (सारस्व सूत्र २५८)

हे भगवान ! तुम्हें बार- बार नमस्ते हो। तुम मुझे मुक्ति दो।

(३१) नमस्ते वाङ्मनोतीतरूपाय

 (सत्यनारायण)

वाणी तथा मन के अगोचर प्रभु को नमस्ते हो।

(३२) इसी प्रकार दुर्गापाठ के पञ्चम अध्याय के श्लोक १६ से लेकर ७९ तक अनेक स्थलों पर नमस्ते शब्द आया है।

(३३) जगदादिरनादिस्त्वं, नमस्ते स्वात्मवेदिने

(शिव पु० उत्तर खं० अध्याय १४ श्लो० २८)

हे प्रभो ! तुम जगत् के आदि कारण ओर स्वयम् अनादि हो, तुम्हें नमस्ते हो।

(३४) श्रीमद्गवत में श्रीकृष्ण ने उत्तम ब्राह्मणों को नमस्ते किया है-

विप्रान् स्वालाभसन्तुष्टान्, साधून् भूतसुहत्तमान्।

निरहङकारिणः शान्तान्ः शान्तान् नमस्ते शिरसाऽसकृद्।।

ऐसे विप्रों को बार – बार नमस्ते हो, जब सब मित्र अहंकारशून्य शान्ति तथा लाभ न होने पर भी सन्तोष करने वाले हैं।

(३५) बृहदारण्यकोपनिषद् में आया है कि राजा जनक ने अपने आसन से उठकर मुनि याज्ञवल्क्य को नमस्ते किया –

जनकोऽहं वैदेहः कूर्चादुपापसर्पन्नुवाच नमस्ते।

(३६) वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग ५० श्लोक १७ में विश्वामित्र ने ’नमस्तेऽस्तु’ आपको मेरा नमस्ते हो, ऐसा कहकर वसिष्ठ से विदा ली थी।

(३७) सीता जङग्ल में विराध नाम के राक्षस को नमस्ते करती है-

मां वृका भझयिष्यन्ति, शार्दूला दीपिनस्तथा

मां हरोत्सृज्य काकुत्स्थौ नमस्ते राक्षसोत्तम ।।

(वाल्मीकि रामायण काण्ड २। सर्ग २। श्लोक १३)

(३८) अथर्ववेद में स्त्री जाति के लिए नमस्ते का प्रयोग है –

नमस्ते जायमानायै, जाताया उत ते नमः

 (अथर्ववेद १०।१०।१)

नमस्ते शब्द का व्यवहार अथर्ववेद तथा अन्य वेदों के अन्दर बहुत अधिक है। विज्ञ पाठक स्वयं भी देख सकते है।

इस प्रकार हम ने नमस्ते शब्द का व्यवहार संक्षेप रूप से वेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, गीता, रामायण तथा पुराणादि सभी ग्रन्थों में दिखा दिया है। मैं समझता हूँ कि इतने विवेचन से हमारे पण्डितम्मन्य पौराणिक भाइयों की आँखें अवश्य खुल गई होंगी ।

पू० नमस्ते इस शब्द में दो विभाग हैं- नमः – ते । वास्तव में यहाँ था – नमः – तुभ्यम् । परन्तु यह याद रखना चाहिए कि तुभ्यम् के स्थान पर ते आदेश पद्य (श्लोकादि) में ही होता है, गद्य अर्थात् सीधी बोलचाल की भाषा में नही होता है। । अतः व्याकरण की दृष्टि से आर्यसमाजियों का बोलचाल की भाषा में नमस्ते शब्द का प्रयोग अशुद्ध है। तभी तो भट्टोजी दीक्षित ने सिद्धान्तकौमुद्री मे तुभ्यम् के सथान पर ते आदेश होने का जो प्रमाण दिया है, वह श्लोक में दिखाकर दिया है। यथा-

श्रीस्त्वावतु मापीह, दत्तात्ते मेऽपि शर्म सः।

स्वामी ते मेऽपि हरिः पातु वामपि नौ हरिः ?।।१।।

सि० पौराणिक भाई की यह शंका व्यर्थ है। यदि वह सिद्धान्तकौमुदी का ठीक तरह से मनन करे तो उसे ऐसी बात कहने की हिम्मत ही न पड़े । आगे चलकर कौमुदीकार ने एक वार्तिक लिखा है –

समानवाक्ये निघातयुष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः

इस वार्तिक के अनुसार एक ही वाक्य में, (भिन्न वाक्य में नहीं) हम तुभ्यम् के स्थान पर ते आदेश कर सकते है। इसमें यह आग्रह हठ नहीं है कि वह किसी पद्य में ही आया है। इसीलिए भट्टोजी दीक्षित ने आगे जो ते आदेश होने का दृष्टान्त दिया है वह पद्य का नहीं है अपितु गद्य अर्थात् सीधी बोलचाल की भाषा का है। यथा – शालीनं ते ओदनं वास्यामि।

यहाँ यह गद्य वाक्य है। अगले –

ʿʿ एते वां नावादया आदेशा अनन्वादेशे वा वक्तव्या ’’

इस वार्तिक को पढ़ने से यह बात ओर भी स्पष्ट हो जाती है , कि जब हम देखते हैं कि इस वार्तिक का प्रत्युदाहरण भट्टोजी दीक्षित ने गद्य में ही दिया है-

ʿतस्मै ते नमः

परिणमतः हम यह दावे से कह सकते हैं कि नमस्ते शब्द ठीक है, प्रामाणिक है तथा इसी का बोलचाल की भाषा में प्रयोग होना चाहिए।

पू० नमस्ते शब्द को दो टुकड़ों में बाँटा जाता है। नमः, ते । ते शब्द तुभ्यम् के स्थान पर आदेश होता है। परन्तु विचारणीय बात यहाँ पर यह है कि तुभ्यम् शब्द युष्मद् शब्द की चतुर्थी विभक्ति के एक वचन का रूप है। इसका अर्थ है तेरे लिए । ऐसी अवस्था में यह कैसा असभ्य व्यवहार होगा कि पुत्र अपने पिता को यह कहे कि तेरे लिए नमः हो ? आदर के लिए उसको कहना तो यह चाहिए था कि आपके लिए नमः हो । अतः समझ में यही आता है कि आर्यसमाज में नमस्ते शब्द का व्यवहार अनुपयुक्त है।

सि० यह कोई आवश्यक नहीं कि ते एकवचन का रूप प्रयोग करने से बड़ों का अनादर होता है। यह तो केवल प्रत्येक भाषा का अपना – अपना तरीका होता है। अंग्रेजी में ’ही’इस एक – वचन के रूप का अर्थ है वह । परन्तु इसका प्रयोग छोटे – बडें सब के लिए समान रूप से होता है। यदि कोई छोटा पुरूष बड़े के लिए ही इस एकवचनान्त शब्द का व्यवहार करता है, तो इसमें बड़ा व्यक्ति अपना अपमान नहीं समझता, क्योंकि यह उसकी भाषा के व्यवहार का तरीका है। परन्तु हाँ, यदि हम नमस्ते शब्द में ते शब्द का हिन्दी अनुवाद करके किसी महापुरूष से कहें कि तेरे लिए नमः तो यह एक अपमानसूचक प्रयोग होगा , क्योकि इस हिन्दी के व्यवहार का यही भाव समझा जाता है। थोड़ी देर के लिए यदि हम मान भी लें कि ते शब्द अपमानसूचक है, तो पौराणिक भाइयों से पूछा जा सकता है कि पूर्व दिये हुए पुराणों के उदाहरण में परमात्मा के लिए , अपने – अपने पिता के लिए , गुरूओं के लिए , ऋषियों के लिए तथा अपने अन्य पूज्यों के लिए, एकवचन के ते शब्द का प्रयोग क्यों किया गया है? क्या वहाँ अपमानसूचित नहीं होता ? दिवचन का प्रयोग तो एक के लिए हो ही नहीं सकता । शेष रह गया बहुवचन का प्रयोग । अब यदि ते के स्थान पर बहुवचन वः शब्द प्रयुक्त कर देते तो हमारे पौराणिक भाई यह प्रश्न कर बैठते , कि छोटों को नमः करते समय बहुवचनान्त शब्द के प्रयोग की क्या आवश्यकता ? बहुत हद तक यह उनका प्रश्न ठीक भी होता । इन आपत्तियों से बचने के लिए वैदिक साहित्यज्ञों ने ते एक वचनान्त शब्द का सब के लिए प्रयोग करना उचित समझा और यह युक्तियुक्त भी है।

हमारे पौराणिक धर्मियों के तो पुराण उनके विश्वास के अनुसार वेद हैं । जैसा कि भागवत में आया है-

ऋग्यजुः सामाथर्वाख्या, वेदाश्चत्वार उद्धृताः।

इतिहासपुराणं , पञ्चमो वेद उच्यते।।२०।।

 (भागवत स्कं० १। अ० ४२०)

इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः।

सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजेसर्वदर्शनः ।।३९।।

(भागवत स्कं० ३।अ० १२३९)

इन दोनों श्लोकों के अनुसार पुराणों को पाँचवाँ वेद माना गया है । इन पौराणिकों के वेद में से भी हम ने अच्छी तरह दिखा दिया है कि छोटे – बड़े सब के लिए ’ नमस्ते ’ उपयुक्त है। सच्चे वेदों (ऋग्, यजु ,साम और अथर्व) में से भी ‘नमस्ते’ की प्रामाणिकता को सिद्ध कर दिया गया है। अतः हे आर्य भाइयों ! आओ, हम एक – दूसरे में अनेकता तथा विद्वेष फैलानेवाले ’सीताराम’ तथा ’ राधेश्याम’ आदि असम्बद्ध शब्दों का परित्याग करके परस्पर के सत्कार एवम् आशीर्वाद के लिए वैदिक ’नमस्ते ’ को ही अपनायें और परस्पर नमस्ते करके एकता के सूत्र में बॅंध जायें। आप भी परस्पर नमस्ते कीजिए और मैं भी आपसे सादर नमस्ते करके विदा होता हॅूं।

नमस्ते वासुदेवाय नमः सङक्र्षणाय

प्रद्युम्नायःनिरूद्धाय तुभ्यं भगवते नमः।।

नारायणाय ऋषये पुरूषाय महान्मने।

विश्वेश्वराय विश्वाय सर्वभूतात्मने नमः।।

भागवत ५।अध्याय ११। स्कन्ध २९-३०

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Vedas For Beginners – 4 : WHY GOD HAS NO FORM?

K:  Sister! Please give reply to yesterday’s question

 

V:   Your question was what was wrong in assuming God had a form? Okay. There are many faults that are involved in treating God as having a form. Firstly, God is known as Sachitananda.   This has three words.viz, “Sat”  “Chit” and “Anand”. The term “Sat” means being present uniformly at all times, present, past and future. In the other words, that which does not undergo change is called as “Sat”.  That which is Knowledge is known as “Chit” The term “Anand” indicates free from sorrow at all times which is known as Bliss. God is called Satchitananda because He is changeless, His knowledge is never destroyed, and who never experiences any sorrow.

 

It is in this context we should see how the objects in the world fare. All the things that have a form in the world are all subject to change and therefore they are not “Sat”. Only formless God and soul could be called under “Chit” Whoever is having a form or body cannot be away from sorrows. He does not enjoy happiness at all the times. He is afflicted with the feeling of hot and cold, hunger and thirst, fear and sorrow, sickness-ageing-death. God is distinct from these two.

 

The first fault in assuming God as having a Form, is with a form, he ceases to be Satchitananda and changeless. This is because all bodies have inbuilt qualities of birth- growth-decay and death. God is above these characteristics.

The second fault is God with a body becomes finite; Whereas God is infinite in nature. He is omnipresent.

The third fault with god having a form is He begins to cease “Beginning less and endless” This is because every thing with a form has an origin and therefore it has a beginning. It cannot be called as beginning less and endless. The thing which has an origin must have an end. That which is created is destroyed in the end.

The fourth fault is God with a body cannot be “All-Knowing” for the reason a body is limited by space and time and therefore it cannot have knowledge of all things. Because of this God cannot become “Antaryami” He cannot understand the mind of everybody.

The fifth fault is God ceases to be eternal. That which remains and has no reason for being remainant is called “Nitya” He being Nitya is not a combination of things. Whereas the things that have a form is the combination of certain elements.

The sixth fault is God instead of being supporter of all He himself becomes dependent on others. The entire world is dependent on God and He is supporter of all. He has assumed the entire world. Whereas if God is treated as having a body He is required to be dependent on some other material. Precisely, for this reason, the traditionalists have set apart places treating God with a body. Some have placed God in seventh heaven, others at Kailas, golok, etc. It is funny that God who is a supporter of the entire world have made himself dependent. If God were to remain dependent on world then how the world could support itself?  Similarly there are so many faults in treating the god with a form or body.

 

K: God is no doubt formless. However, Scholars are of the opinion that God takes shape and reincarnates from time to time. For ex, vapor is formless but when required by time it takes a gross form. We can multiply such examples. When physical things could be formless and yet could assume shape why not God who is formless, could not take a form?

 

V:  The example of water vapor and fire pointed out does not appear to be correct. Water and fire are not basic elements. Many atoms make for water vapor and this take gross shape in the form of cloud and again become water. If water vapor were to be made of one atom then it would not have taken gross form. So is the case of Fire. Many atoms make a fire ball and assume a gross form. To say that fire is all pervading and formless is totally wrong notion. Fire is subtler than earth and water elements. Hence it could be said that fire is pervading in Earth and water. But it is not pervading in air and ether. But it is true that both water and air is pervading in fire for the reason these are more subtle than fire. The subtle pervades the gross. In all things where fire is pervading they have shape and form. All the things in the world which have a form are caused because of all pervading fire. Because the quality of fire is form. Physical things become gross from subtle by the association of many atoms. God is omnipresent, and all alone. He cannot therefore assume shape and take a form. Now, about the god descending from time to time. This is only assumption and nothing else. The term Avatar means to descend and ascend. Only a finite bodies can do this and not applicable to infinite entity like God. The act of ascending, descending, Avatar, coming and going is unthinkable about an entity which is omnipresent. Wherefrom He can come and go when He is found to be everywhere?

 

K: Does not God take Avatar to vanquish Ravan, Kans, Hiranyakashipu etc? I have heard that God takes Avatar whenever Dharma is threatened?

 

V: God has not taken Avatar ever nor He will ever do so in future. From time to time great men are born who have vanquished the wicked, showed the right path and therefore people have called them with some honorific titles. Some people have named them as Nabi or son of God. Still some other has described such great men as Avatar or God personified. But the fact remains that great men remained as such. Why you don’t talk rationally? Can God not capable of destroying by remaining formless?  Hundreds of living beings are born every second and does God goes on destroying them? With one earth quake lakhs of men are killed. Epidemics wipe out hundreds of living beings. Is it sensible to believe that God takes Avatar just to kill wretched beings? Do men like Ravan, Kans ever count? Is it not ludicrous and insulting to God to assume god taking avatar to kill the wicked when He is capable of Creating, Sustaining and destroying the world? It is also not free from blame to say that God takes Avatar when Dharma is threatened. Probably those people who believe in Avatars believe this to be true. But they stand condemned by their own statement. Look! The people having belief in Avatar agree on Ten Avatars and also four Yugas. These Yugas are viz, Satyayuga, Threthayuga, Dwaparyuga and Kaliyuga. In Satyayuga, Dharma stands on four steps. In Threthayuga it stands on three steps, in Dwapara Dharma and Adharma stands equally on two steps each. In other words in Dwapara the elements of Punya [Virtue] and Papa {Non-Virtue] share equal honors. In Kaliyug it is believed that   Non-virtue {Papa} rests on three steps and Virtue [Punya] rests only on one step. Now think of the order of Avatars in all the yugas. It is said four Avatars took place in Satyayuga, three Avatars in Threthayuga and two in Dwaparayuga. And they believe one Avatar taking place at the end of Kaliyuga. Now what is to be pondered over here, why four Avatars took place in Satyayuga when Dharma was resting on all four steps and no Adharma was present. In Threthayuga when Dharma was resting on three steps why three Avatars? Why one less? When in Dwapar when both Dharma and Adharma was present in the proportion of 50:50 why only two Avatars? In Kaliyug when Dharma and Adharma is in the ratio of 25:75 why only one Avatar is outstanding and that too at the end of the Yug? Logically speaking, the number of Avatars should be more with the increase in the proportion of Non-virtue. Whereas the number of Avatars went of decreasing with the rise in the proportion of Non-Virtue. Now tell me what is the relationship between Avatars with the loss of Dharma?

 

K:  The Avatar men have shown amazing things not capable of being done by ordinary men. For ex, lifting of Govardhan Mountain with little finger, etc. Because of this we are compelled to believe that they are all Avatars of God.

 

V: First of all it is wrong to say that someone lifted a mountain with a finger. Even if we accept this could be true, this does not demonstrate anyway the greatness of God or God’s avatar. You may ask why? Before God, who has upheld Sun, planets and countless stars the lifting of Govardhan Mountain appears to be too trifle. There are hundreds of Mountains big and small in the world you live. God has upheld the world and what greatness is involved in upholding a Govardhan Mountain? What heroism is there in upholding a Govardhan Mountain? This is like a student of M.A answering a paper set for 3 rd standard. Yes. If a 3rd standard boy were to answer a paper for M.A then it deserves full praise. This is because it is unbelievable. If God’s Avatar were to lift a mountain there is nothing great or amazing here.

 

K: If God were not to take Avatar then how to believe that God is All-Powerful?  Where is his   omniscientness of God if He could not take an Avatar? He is All-Powerful who could do anything.

 

V: You are irrational. If God were to take Avatar he ceases to be All-Powerful and gets reduced to an entity with limited strength. You may wonder how? He who was doing things earlier without a body and limbs will now start doing the work with limbs. Earlier he was seeing things without eyes. Now he sees with his physical eyes. Earlier he was listening without ears. Now he listens with physical ears. The import of this is, earlier to taking Avatar he was doing everything without a body and now he is dependent on body. Where is His omniscient ness when he becomes dependent? Like the man with finite knowledge depending on Body God also becomes dependent on body. Now where is the difference between man and god? God also becomes subject to hunger and thirst, cold and hot that torment a man. Hate, Love, fever that man experience will also be felt by God. The extraordinary thing is God becomes subservient and not at all remain Independent. He requires food, water, clothes and shelter. How could you say that he is all powerful when he starts depending on his body for execution of jobs when earlier he was doing everything with no support from any side?   A person with just a blink of an eye makes a person unconscious and yet another make him unconscious with the help of a drug. Who is powerful among these two? Definitely the person who renders unconscious with a blink of an eye for the reason he does not dependent on drugs for this job.

 

Now, you would have understood that God is powerful without taking Avatar. It is totally wrong notion to believe that being All- Powerful means that He is capable of doing everything. All-Powerful means that all powers are with him. He can join subtle things and could disintegrate them. He would award the human beings based on their Karma. He could create, sustain and dissolve the world and run it as per laws. He requires nobody’s help in the execution of his jobs. That is the meaning of being all-powerful or omniscient. Rendering impossible things as possible is not the meaning of being All-Powerful.

 

 

K: Does God not make impossible the possible?  He is no God who cannot make impossible things possible.

 

V: Not making impossible things possible, not undoing the Rule [i.e. making or mending the rules] is God’s divinity. If you were to believe that God could turn impossible to possible then I would ask “can God kill himself? Or can God create another God? Please reply.

 

K: God may not kill himself. But since he is All-Powerful He could create another God as equal to himself.

 

V:  No Sister! God cannot create another God of equal standing. You may ask why? Listen. Now imagine that God has created another God. Now is this created god could be equal to the creator? No. This is because one is old God and another is Created God. One is Visible God and another is invincible God and thus there are two Gods. One is ageless because he is eternal. The age of other God has just begun for he is created. The first God is all-pervading and other is pervaded. Both cannot become all-pervading.  If you were of opinion that both are pervading 50:50 then none are omniscient and omnipresent. Hence all-Pervading does not mean that He could do everything and anything. God could do which could be done by him.

 

K: What is wrong in accepting that god could take Avatar? What is the risk here?

 

V: When God could not Avatar at all, the acceptance of God taking Avatar, would amount to twisting and killing the truth. This is the first danger. Secondly God himself gets entangled in decadence. Narayan becomes Nara. Nara becoming Narayan could be treated as growth, but the reverse is definitely a sign of downfall. If a poor becomes rich then it is his real improvement but if a rich becomes poor it is definitely a sign of retrograde progress.  Thirdly, a fraudulent declares himself as an Avatar and misleads the followers. He makes money out of them and leads a sinful life. There are umpteen examples in Bharath where some fraudulent men have declared themselves as Avatars and totally cheated the people. Fourthly, people start tolerating the injustice and fraud. People begin watching loot, murder rape and destruction of property by hooligans and don’t protest against them. They feel it is not in their hands to prevent the injustice and of the opinion that only when God takes Avatar he would put down effectively all the cases of injustice. Then only that Dharma reins and evil is vanquished. This sort of wishful thinking is due to the belief in the concept of Avatar. Communities or group of people who don’t believe in the concept of God taking Avatar stand firm against assaults  and resist firmly the cases of injustice and destruction bravely. They firmly believe that God has given those hands to protect themselves and never tolerate Adharma. They don’t look towards God for jobs that could be done by them. To be frank, the theory of Avatarvad has ruined the Aryan community and destroyed their self-confidence. This has caused untold hardships for Aryans and contributed to their prolonged slavery. Our history is a witness to this tragedy.

 

K: Your logic is fine, convincing and effective. Now tell me how to meditate on God who is said to be formless.

 

V: It is really God’s kindness that the effect of true principles have made impression on you. I will reply to your question tomorrow.

 

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This is the translated version of the original Hindi  “Do bahinonke bathe” written by late Pt. Siddagopal”Kavirathna”

Translated by : Vasudev Rao.

‘महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द और गुरूकुल प्रणाली’-मनमोहन कुमार आर्य

gurukul 1

ओ३म्

महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द और गुरूकुल प्रणाली

महर्षि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) आर्य समाज के संस्थापक हैं। आर्य समाज की स्थापना 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई के काकडवाड़ी स्थान पर हुई थी। इसी स्थान पर संसार का सबसे पुराना आर्य समाज आज भी स्थित है। आर्य समाज की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य वेदों का प्रचार व प्रसार था तथा साथ ही वेद पर आधारित धार्मिक तथा सामाजिक क्रान्ति करना भी था जिसमें आर्य समाज आंशिक रूप से सफल हुआ है। चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद सभी सत्य विद्याओं के ग्रन्थ हैं। यह वेद सृष्टि के आरम्भ में सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्ता, सर्वान्तर्यामी परमेश्वर से अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न प्रथम चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को उनके अन्तःकरण में सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर की प्रेरणा द्वारा प्राप्त हुए थे। आजकल गुरू अपने शिष्यों को ज्ञान देता है और पहले से भी यही परम्परा चल रही है। वह बोल कर, व्याख्यान व उपदेश द्वारा ज्ञान देते हैं। ज्ञान प्राप्ति का दूसरा तरीका पुस्तकों का अध्ययन है। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने ऋषियों वा मनुष्यों को ज्ञान देना था। ईश्वर अन्तरर्यामी है अर्थात् वह हमारी आत्माओं के भीतर भी सदा-सर्वदा उपस्थित रहता है। अतः वह अपना ज्ञान आत्मा के भीतर प्ररेणा द्वारा प्रदान करता है। यह ऐसा ही है जैसे गुरू का अपने शिष्य को बोलकर उपदेश करना। गुरू की आत्मा में जो विचार आता है वह उन विचारों को अपनी वाणी को प्रेरित करता है जिससे वह बोल उठती है। शिष्य के कर्ण उसका श्रवण करके उस वाणी को अपनी आत्मा तक पहुंचाते हैं। इस उदाहरण में गुरू का आत्मा और शिष्य की आत्मायें एक दूसरे से पृथक व दूर हैं अतः उन्हें बोलना व सुनना पड़ता है। परन्तु ईश्वर हमारे बाहर भी है और भीतर भी है। अतः उसे हमें कुछ बताने के लिए बोलने की आवश्यकता नहीं है। वह जीवात्मा के अन्तःकरण में प्रेरणा द्वारा अपनी बात हमें कह देता है और हमें उसकी पूरी यथार्थ अनुभूति हो जाती है। इसी प्रकार से ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को ज्ञान दिया था।

 

वर्तमान सृष्टि में वेदोत्पत्ति की घटना को 1,96,08,53,114 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। इस लम्बी अवधि में वेद की भाषा संस्कृत से अनेकों भाषाओं की उत्पत्ति हो चुकी है। वर्तमान में संस्कृत का प्रचार न होने से यह भाषा कुछ लोगों तक सीमित हो गई। इसके विकारों से बनी भाषायें हिन्दी व अंग्रेजी व कुछ अन्य भाषायें हमारे देश व समाज में प्रचलित हैं। संस्कृत का अध्ययन कर वेदों के अर्थों को जाना जा सकता है। दूसरा उपाय महर्षि दयानन्द एवं उनके अनुयायी आर्य विद्वानों के हिन्दी व अंग्रेजी भाषा में वेद भाष्यों का अध्ययन कर भी वेदों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर से वेदों की उत्पत्ति होने, संसार की प्राचीनतम पुस्तक होने, सब सत्य विद्याओं से युक्त होने, इनमें ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के सत्य स्वरूप का यथार्थ वर्णन होने आदि कारणों से वेद आज व हर समय प्रासंगिक है। इस कारण वेदों का अध्ययन व अध्यापन सभी जागरूक, बुद्धिमान व विवेकी लोगों को करना परमावश्यक है अन्यथा वह इससे होने वाले लाभों से वंचित रहेंगे। वेदों से दूर जाने अर्थात् वेद ज्ञान का अध्ययन व अध्यापन बन्द होने के कारण संसार में अज्ञान व अन्धविश्वास उत्पन्न हुए जिससे हमारे देश व मनुष्यों का पतन हुआ और हम गुलामी व अनेक दुःखों से ग्रसित हुए। महर्षि दयानन्द ने संसार में सत्य ज्ञान वेदों का प्रकाश करने और प्राणी मात्र के हित के लिए वेदों का प्रचार व प्रसार किया और वेदों का पढ़ना-पढ़ाना व सुनना-सुनाना सभी मनुष्यों जिन्हें उन्होंनंे आर्य नाम से सम्बोधित किया, उनका परम धर्म घोषित किया।

 

अब विचार करना है कि वेदों का ज्ञान किस प्रकार से प्राप्त किया जाये। इसका उत्तर है कि जिज्ञासु या विद्यार्थी को वेदों के ज्ञानी गुरू की शरण में जाना होगा। वह बालक को अपने साथ तब तक रखेगा जब तक की शिष्य वेदादि शास्त्रों की शिक्षा पूरी न कर ले। हम जानते हैं कि जब बच्चा जन्म लेता है तो उस समय वह अध्ययन करने के लिए उपयुक्त नहीं होता। लगभग 5 वर्ष की आयु व उसके कुछ समय बाद तक वह माता-पिता से पृथक रहकर ज्ञान प्राप्त करने के लिए योग्य होता है। ऐसे बालकों को उनके माता-पिता किसी निकटवर्ती गुरू के आश्रम में ले जाकर उस गुरू द्वारा बच्चों का प्रारम्भिक अध्ययन से आरम्भ कर सांगोपांग वेदों का अध्ययन करा सकते हैं। उस स्थान पर जहां बालक-बालिकाओं को वेदों का अध्ययन व अध्यापन कराया जाता है गुरूकुल कहा जाता हैं। यह गुरूकुल कहां हों, इनका स्वरूप व अध्ययन के विषय आदि क्या हों इस पर विचार करते हैं। अध्ययन करने का स्थान माता-पिता व पारिवारिक जनों से दूर होना चाहिये जहां शिष्य अपने गुरू के सान्निध्य में रह कर निर्विघ्न अपनी शारीरिक व बौद्धिक उन्नति करने के साथ अपने श्रम व तप के द्वारा गुरू की सेवा कर सके। अध्ययन करने का स्थान वा शिक्षा का केन्द्र गुरूकुल किसी शान्त वातावरण में जहां वन, पर्वत व नदी अथवा सरोवर आदि हों, होना चाहियेे। गुरू, शिष्यों व भृत्यों के आवास के लिये कुटियायें आदि उपलब्ध हों। एक गोशाला हों जिसमें गुरूकुल वासियों की आवश्यकता के अनुसार दुग्ध उपलब्ध हो। यदि अन्न आदि पदार्थों की भी व्यवस्था हों, तो अच्छा है अन्यथा फिर भिक्षा हेतु निकट के ग्राम व नगरों में जाना होगा। वर्तमान परिस्थिति के अनुसार भोजन वस्त्र आदि की भी सुव्यवस्था होनी चाहिये और पुस्तकें व अन्य आवश्यक सामग्री भी उपलब्ध होनी चाहिये। यह सब सुव्यवस्था होने पर गुरूजी को पढ़ाना है व बच्चों को पढ़ना है। वेदों का ज्ञान शब्दमय होने से शब्द का ज्ञान शिष्य को गुरू से करना होता है। वेदों के शब्द रूढ़ नहीं हैं। वह सभी धातुज या यौगिक हैं। अतः घातु एवं यौगिक शब्दों के ज्ञान में सहायक पुस्तक व ग्रन्थों का होना आवश्यक है। सम्भवतः यह ग्रन्थ वर्णमाला, अष्टाध्यायी, धातु पाठ, महाभाष्य, निधण्टु व निरूक्त आदि ग्रन्थ होते हैं। गुरूजी को क्रमशः इनका व वेदार्थ में सहायक अन्य व्याकरण ग्रन्थों व शब्द कोषों का ज्ञान कराना है। गुरूकुल में अध्ययन पर कुछ आगे विचार करते हैं। हम जानते हैं कि हम वर्तमान में रहते हैं। बीता हुआ समय भूतकाल और आने वाला भविष्य काल कहलाता है। जब हम भाषा का प्रयोग करते हैं तो क्रिया पद को यथावश्यकता भूत, वर्तमान व भविष्य का ध्यान करते हुए तदानुसार संज्ञा, सर्वनाम आदि का प्रयोग करते हैं। यह व्याकरण शास्त्र के अन्तर्गत आते हैं। अतः गुरूकुल में गुरूजी को शिष्य को पहले वर्णमाला व व्याकरण शास्त्र का ज्ञान कराना होता है।  व्याकरण शास्त्र का ज्ञान हो जाने के बाद गुरूजी से प्रकीर्ण विषयों को जानकर वेद के ज्ञान में सहायक इतर अंग व उपांग ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं और उसके बाद वेदों का अध्ययन करने पर विद्या पूरी हो जाती है। विद्या पूरी होने पर शिष्य स्नातक हो जाता है। अब वह घर पर रहकर स्वाध्याय आदि करते हुए कृषि, चिकित्सा, ग्रन्थ लेखन, आचार्य व उपदेशक, पुरोहित, सैनिक, राजकर्मी, वैज्ञानिक, उद्योगकर्मी आदि विभिन्न रूपों में सेवा करके अपना जीवनयापन कर सकता है। वेद, वैदिक साहित्य एवं वेद व्याकरण का अध्ययन करने के बाद स्नातक अनेक भाषाओं को सीखकर तथा आधुनिक विज्ञान व गणित आदि विषयों का अध्ययन कर जीवन का प्रत्येक कार्य करने में समर्थ हो सकता है। यह कार्य उसको करने भी चाहिये। हम ऐसे लोगों को जानते हैं जिन्होंने गुरूकुल में अध्ययन किया और बाद में वह आईपीएस, आईएएस आदि भी बने। विश्वविद्यालय के कुलपति, कुलसचित, संस्कृत अकादमियों के निदेशक, सफल उद्योगपति आदि बने, अनेक सांसद भी बने। स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण भी आर्य गुरूकुलों की देन हैं। अतः वेदों का अध्ययन कर भी जीवन में सर्वांगीण उन्नति हो सकती है, यह अनेक प्रमाणों से सिद्ध है। यह उन लोगों के लिए अच्छा उदाहरण हो सकता है जो अपने बच्चों को धनोपार्जन कराने की दृष्टि से महंगी पाश्चात्य मूल्य प्रधान शिक्षा दिलाते हैं और बाद में आधुनिक शिक्षा में दीक्षित सन्तानें अपने माता-पिता आदि परिवारजनों की उपेक्षा व कर्तव्यहीता करते दिखाई देते हैं।

 

प्राचीनकाल में गुरूकुल वैदिक शिक्षा के केन्द्र हुआ करते थे जो महाभारत काल के बाद व्यवस्था के अभाव में धीरे धीरे निष्क्रिय हो कर समाप्त हो गये। स्वामी दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश में गुरूकुलीय शिक्षा पर विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में स्कूलों में शिक्षा दी जाती थी। इसका उद्देश्य शासक वर्ग अंग्रेजों का भारत के बच्चों को अंग्रेजी के संस्कार देकर उन्हें गुप्त और लुप्त रूप से वैदिक संस्कारों से दूर करना और उन्हें अंग्रेजियत और ईसाईयत के संस्कारों व परम्पराओं के निकट लाना था। स्वामी दयानन्द ने अंग्रेजों की इस गुप्त योजना को समझा था और इसके विकल्प के रूप में गुरूकुलीय शिक्षा प्रणाली का अपने ग्रन्थों में विधान किया जिससे अंग्रेजी शिक्षा के खतरों का मुकाबला किया जा सके। स्वामी श्रद्धानन्द महर्षि दयानन्द सरस्वती के योग्यतम् अनुयायी थे। उन्होंने गुरूकुलीय शिक्षा के महत्व को समझा था और अपना जीवन अपने गुरू की भावना के अनुसार हरिद्वार के निकट एक ग्राम कांगड़ी में सन् 1902 में गुरूकुल की स्थापना में समर्पित किया और उसको सुचारू व सुव्यवस्थित संचालित करके दुनियां में एक उदाहरण प्रस्तुत किया। स्वामी श्रद्धानन्द का यह कार्य अपने युग का एक क्रान्तिकारी कदम था। उनके द्वारा स्थापित गुरूकुल ने आज एक विश्वविद्यालय का रूप ले लिया है। आज समय के साथ देशवासियों व आर्य समाजियों का भी वेदों के प्रति वह अनन्य प्रेमभाव दृष्टिगोचर नहीं होता जो हमें महर्षि दयानन्द के साहित्य को पढ़ कर प्राप्त होता है। यहां वेद भी अन्य भाषाओं व उनके साहित्य की ही तरह एक विषय बन कर रह गये हैं और प्रायः अपना महत्व खो बैठे हैं। इसका एक कारण समाज की अंग्रेजीयत तथा आत्मगौरव, स्वधर्म व स्वसंस्कृति के अभाव की मनोदशा है। संस्कृत व वेदों का अध्ययन करने से उतनी अर्थ प्राप्ति नहीं हो पाती जितनी की अन्य विषयों को पढ़ कर होती है। नित्य प्रति ऐसे अनेक लोग सम्पर्क में आते हैं जो संस्कृत पढ़े है और पढ़ा भी रहे हैं परन्तु उनका पारिवारिक व समाजिक जीवन सन्तोषजनक नहीं है। ऐसे लोगों को देखकर लोगों में संस्कृत के प्रति उत्साह में कमी का होना स्वाभाविक है।

 

हमारे आर्य समाज के विद्वानों व नेताओं को इस समस्या पर गम्भीरता से विचार करना चाहिये। सरकार व निजी प्रतिष्ठानों में आज हिन्दी, अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व है जहां संस्कृत प्रायः गौण, उपेक्षित व महत्वहीन है। वर्तमान में संस्कृत केवल धर्म संबंधी कर्मकाण्ड की भाषा बन कर रह गई है। समाज में इस मनोदशा को बदलकर संस्कृत के व्यापक उपयोग के मार्ग तलाशने होंगे। हमें लगता है कि संस्कृत पढ़े हमारे स्नताकों को हिन्दी व अंगेजी भाषा सहित आधुनिक ज्ञान, विज्ञान तथा गणित आदि विषयों का अध्ययन भी करना चाहिये जिससे वह सरकारी सेवा व अन्य व्यवसायों में अन्य अभ्यर्थियों के समान स्थान प्राप्त कर सकें जो सम्प्रति प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं।  संस्कृत के भविष्य से जुड़े एक प्रसंग का उल्लेख करना भी यहां उचित होगा। कुछ सप्ताह पूर्व वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून में पाणिनी कन्या महाविद्यालय, वाराणसी की विदुषी आचार्या डा. नन्दिता शास्त्री ने कहा कि संस्कृत भाषियों की संख्या दिन प्रति घट रही है। विगत जनगणना में यह 15-20 हजार ही थी। यदि यह 10 हजार या इससे कम हो जाती है तो सरकार के द्वारा संस्कृत को मिलने वाली सभी सुविधायें व संरक्षण बन्द हो जायेंगे और यह दिन संस्कृत प्रेमियों के लिए अत्यन्त दुखद होगा। स्वामी श्रद्धानन्द के बाद स्वामी दयानन्द के अनुयायियों ने स्वामी श्रद्धानन्द का अनुकरण कर अनेक गुरूकुल खोले जिनकी संख्या वर्तमान में 500 से अधिक है। यदि यह सभी गुरूकुल सुव्यवस्थित रूप से चलायें जा सकें तो यह वैदिक धर्म की रक्षा और उसके प्रचार प्रसार का सबसे बड़ा साधन सिद्ध हो सकते हैं और भविष्य में भी होंगे। वेद, वैदिक साहित्य, धर्म, संस्कृत और संस्कृति की रक्षा व देश के भावी स्वरूप की दृष्टि से में इन गुरूकुलों की भूमिका महत्वपूर्ण हैं। इसका उन्नयन करना आर्य समाज का तो कार्य है ही साथ ही सरकार में वेदों को मानने वाले लोगों को वेदों की रक्षा व प्रचार के लिए प्रभावशाली योजनायें एवं कार्य करने चाहियें। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो ‘धर्मो एव हतो हन्ति’ की भांति धर्म रक्षा में प्रमाद करने से यह धर्म हमे ही मार देगा।

 

स्वामी श्रद्धानन्द आर्य समाज के प्रसिद्ध नेता थे। वह आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब तथा सार्वदेशिक सभा के भी प्रधान रहे। शुद्धि आन्दोलन के भी वह प्रमुख सूत्रधार रहे और सम्भवतः यही उनकी शहादत का कारण बना। स्वामी जी का देश की आजादी के आन्दोलन में भी महत्वपूर्ण योगदान था। समाज सुधार के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां अनेकों हैं। हम उनके जीवन को वेदों का मूर्त रूप देखते हैं जिसमें कहीं कोई कमी हमें दिखाई नहीं देती। काश कि महर्षि दयानन्द अधिक समय तक जीवित रहते तो श्रद्धानन्द उनके सर्वप्रिय शिष्य होते। आर्य समाज व महर्षि दयानन्द की भक्ति के लिए उन्होंने घर फूँक तमाशा देखा। उनका व्यक्तित्व आदर्श पिता, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श समाज सुधारक, आदर्श नेता, आदर्श स्वतन्त्रता सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार, लेखक, विद्वान, शिक्षा शास्त्री, धर्म गुरू, वेदभक्त, वेद सेवक, वेद पुत्र, ईश्वर पुत्र व ईश्वर के सन्देशवाहक का था। 23 दिसम्बर, 1926 को वह एक षडयन्त्र का शिकार होकर एक कातिल अब्दुल रसीद द्वारा शहीद कर दिये गये। हम समझते हैं कि उन्होंने अपने रक्त की साक्षी देकर वैदिक सिद्धान्तों व मान्यताओं की साक्षी दी है। हम उन्हें अपनी श्रद्धाजंलि प्रस्तुत करते हैं। जब तक सृष्टि पर मनुष्यादि प्राणी विद्यमान हैं, विवेकी देशवासी स्वामी श्रद्धानन्द जी के यश, कीर्ति, उनके कार्य और बलिदान को स्मरण कर उनसे प्रेरणा लेते रहेंगे।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

            देहरादून-248001

फोनः 09412985121

‘मर्यादा पुरूषोत्तम एवं योगेश्वर दयानन्द’-मनमोहन कुमार आर्य

dayanand 2

ओ३म्

मर्यादा पुरूषोत्तम एवं योगेश्वर दयानन्द


 

महर्षि दयानन्द को 13, 15 और 17 वर्ष की आयु में घटी शिवरात्रि व्रत, बहिन की मृत्यु और उसके बाद चाचा की मृत्यु से वैराग्य उत्पन्न हुआ था। 22 वर्ष की अवस्था तक वह गुजरात प्राप्त के मोरवी नगर के टंकारा नामक ग्राम में स्थित घर पर रहे और मृत्यु पर विजय पाने की ओषधि खोजते रहे। जब परिवार ने उनकी भावना को जाना तो विवाह करने के लिए उन्हें विवश किया। विवाह की सभी तैयारियां पूर्ण हो गई और इसकी तिथि निकट आ गई। जब कोई और विकल्प नहीं बचा तो आपने गृह त्याग कर दिया और सत्य ज्ञान की खोज में घर से निकल पड़े। आपने देश भर का भ्रमण कर सच्चे ज्ञानी विद्वानों और योगियों की खोज कर उनकी संगति की और संस्कृत व शास्त्रों के अध्ययन के साथ-साथ योग का भी क्रियात्मक सफल अभ्यास किया। योग की जो भी सिद्धियां व उपलब्धियां हो सकती थी, उन्हें प्राप्त कर लेने के बाद भी उनका आत्मा सन्तुष्ट न हुआ। अब उन्हें एक ऐसे गुरू की तलाश थी जो उनकी सभी शंकायें और भ्रमों को दूर कर सके। मनुष्य की जो सत्य इच्छा होती है और उसके लिए वह उपयुक्त पुरूषार्थ करता है तो उसकी वह इच्छा अवश्य पूरी होती है और ईश्वर भी उसमें सहायक होते हैं। ऐसा ही स्वामी दयानन्द के जीवन में भी हुआ और उन्हें प्रज्ञाचक्षु दण्डी गुरू स्वामी विरजानन्द सरस्वती का पता मिला जो मथुरा में संस्कृत के आर्ष व्याकरण एवं वैदिक आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन कराते थे। सन् 1860 में आप उनके शरणागत हुए और अप्रैल 1863 तक उनसे अध्ययन व ज्ञान की प्राप्ति की। अध्ययन पूरा कर गुरू दक्षिणा में स्वामीजी ने अपने गुरू को उनकी प्रिय लौंगे प्रस्तुत की। गुरूजी ने भेंट सहर्ष स्वीकार की और दयानन्द जी को कहा कि वेद और वैदिक धर्म, संस्कृति व परम्परायें अवनति की ओर हैं और विगत 4-5 हजार वर्षों में देश व दुनियां में मनुष्यों द्वारा स्थापित कल्पित, अज्ञानयुक्त, अन्धविश्वास से पूर्ण मान्यतायें व परम्परायें प्रचलित हो गईं हैं। हे दयानन्द ! तुम असत्य का खण्डन तथा सत्य का मण्डन कर सत्य पर आधारित ईश्वर व ऋषियों की धर्म-संस्कृति व परम्पराओं का प्रचार व उनकी स्थापना करो। स्वामी दयानन्द ने अपने गुरू की आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार किया और कहा कि गुरूजी ! आप देखेंगे कि यह आपका अंकिचन शिष्य व सेवक आपसे किये गये अपने इस वचन को प्राणपण से पूरा करने में लगा हुआ है। ऐसा ही हम अप्रैल, 1863 से अक्तूबर, 1883 के मध्य उनके जीवन में घटित घटनाओं में देखते हैं।

 

इस घटना के बाद स्वामी दयानन्द ने देश भर का भ्रमण किया। वेदों पर उन्होंने अपना ध्यान केन्द्रित किया। उसे प्राप्त करने के लिए प्रयास किये। उन्होंने इंग्लैण्ड में प्रथम बार प्रो. फ्रेडरिक मैक्समूलर द्वारा प्रकाशित चारों वेद मंगाये। उन्होंने चारों वेदों का गहन अध्ययन किया और पाया कि वेद ईश्वरीय ज्ञान हैं जो सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा की आत्माओं में सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी ईश्वर द्वारा प्रकट, प्रेरित, प्रविष्ट व स्थापित किये गये थे। उन्होंने यह भी पाया कि वैदिक संस्कृत एवं लौकिक संस्कृत में भारी अन्तर है। लौकिक संस्कृत के शब्द रूढ़ हैं जबकि वेदों के सभी शब्द नित्य होने के कारण घातुज या यौगिक हैं। उन्होंने यह भी जाना कि वेदों के शब्दों के रूढ़ अर्थों के कारण अर्थ का अनर्थ हुआ है। उन्होंने पाणिनी की अष्टाध्यायी, काशिका, पंतंजलि के महाभाष्य, महर्षि यास्क के निघण्टु और निरूक्त आदि ग्रन्थों की सहायता से वेदों के पारमार्थिक एवं व्यवहारिक अर्थ कर एक अपूर्व महाक्रान्ति को जन्म दिया और अपने पूर्ववर्ती पौर्वीय व पाश्चात्य वैदिक विद्वानों के वेदार्थों की निरर्थकता व अप्रमाणिकता का अनावरण कर सत्य का प्रकाश किया। महर्षि दयानन्द ने अपनी वेद विषयक मान्यताओं और सिद्धान्तों, जो कि शत प्रतिशत सत्य अर्थों पर आधारित हैं, का प्रकाश किया और इसके लिए उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि, संस्कृत वाक्य प्रबोध, व्यवहारभानु आदि अनेकानेक ग्रन्थों का सृजन किया। महर्षि दयानन्द सरस्वती का यह कार्य मर्यादा पालन के साथ-साथ मर्यादाओं की स्थापनाओं का कार्य होने से इतिहास में अपूर्व है जिस कारण वह मर्यादाओं के संस्थापक होने से मर्यादा पुरूषोत्तम विशेषण के पूरी तरह अधिकारी है। इतना ही नहीं, उन्होंने वैदिक मर्यादा की स्थापना के लिए वेदों के संस्कृत व हिन्दी में भाष्य का कार्य भी आरम्भ किया। सृष्टि के आरम्भ से उनके समय तक उपलब्ध वेदों के भाष्यों में आर्ष सिद्धान्तों, मान्यताओं व परम्पराओं से पूरी तरह से समृद्ध कोई वेद भाष्य संस्कृत वा अन्य किसी भाषा में उपलब्ध नहीं था। मात्र निरूक्त ग्रन्थ ऐसा था जिसमें वेदों के आर्ष भाष्य का उल्लेख व दिग्दर्शन था। महर्षि दयानन्द ने उसका पूर्ण उपयोग करते हुए एक अपूर्व कार्य किया जो उन्हें न केवल ईश्वर की दृष्टि में अपितु निष्पक्ष संसार के ज्ञानियों में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करता है।

वेदों का प्रचार प्रसार ही मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य सिद्ध होता है। धन कमाना व सुख भोगना गौण उद्देश्य हैं परन्तु मुख्य उद्देश्य वेदों का अध्ययन व अध्यापन, प्रचार व प्रसार, उपदेश व शास्त्रार्थ, सत्य का मण्डन व असत्य का खण्डन, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, अवतारवाद, ऊंच-नीच की भावनाओं से मुक्त होकर सबको समान मानना व दलित व पिछड़ों को ज्ञानार्जन व धनोपार्जन में समान अधिकार दिलाना, अछूतोद्धार व दलितोद्धार आदि कार्य भी मनुष्य जीवन के कर्तव्य हैं, यह ज्ञान महर्षि दयानन्द के जीवन व कार्यों को देख कर होता है। आज देश व समाज में वेदों का यथोचित महत्व नहीं रहा जिस कारण समाज में अराजकता, असमानता, विषमता, अज्ञानता, अन्धविश्वास, परोपकार व सेवा भावना की अत्यन्त कमी, दुखियों, रोगियों व निर्धनों, भूखों, बेरोजगारों के प्रति मानवीय संवेदनाओं व सहानुभूति में कमी, देश भक्ति की कमी या ह्रास आदि अवगुण दिखाई देते हैं जिसका कारण वेदों का अप्रचलन, अप्रचार व अवैदिक विचारों का प्रचलन, प्रचार व प्रभाव है। यह बात समझ में नहीं आती कि जब वेद सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए, वेदों से पूर्व संसार में कोई ग्रन्थ रचा नहीं गया और न प्राप्त होता है, वेदों की भाषा व उसके विचारों व ज्ञान का अथाह समुद्र जो मानव जाति के लिए कल्याणकारी है, फिर भी उसे भारत व संसार के लोग स्वीकार क्यों नहीं करते? हम संसार के सभी मतावलम्बियों से यह अवश्य पूछना चाहेंगे कि आप वेदों से दूरी क्यों बनाये हुए हैं? क्या वेद कोई हिंसक प्राणी है जो आपको हानि पहुंचायेगा, यदि नहीं फिर आपको किस बात का डर है? यदि है तो वह निःसंकोच भाव से क्यों नहीं बताते? महर्षि दयानन्द का मानना था जिसे हम उचित समझते हैं कि यदि सारे संसार के लोग वेदों का अध्ययन करें, समीक्षात्मक रूप से गुण-दोषों पर विचार करें और गुणों को स्वीकार कर लें तो सारे संसार में शान्ति स्थापित हो सकती है। अशान्ति व विरोध का कारण ही विचारों व विचारधाराओं की भिन्नता है, कुछ स्वार्थ व अज्ञानता है तथा कुछ व अधिक विषयलोलुपता एवं असीमित सुखभोग की अभिलाषा व आदत है। महर्षि दयानन्द यहां एक आदर्श मानव के रूप में उपस्थित हैं और वह हमें इतिहास में सभी बड़े से बड़े महापुरूषों से भी बड़े दृष्टिगोचर होते हैं। अतः यदि उन्हें मर्यादा पुरूषोत्तम कहा जाये तो यह अत्युक्ति नहीं अपितु अल्पयुक्ति है। उन्होंने स्वयं तो सभी मानवीय मर्यादाओं का पालन किया ही, साथ हि सभी मनुष्यों को मर्यादा में रहने वा मर्यादाओं का पालन करने के लिए प्रेरित किया और उससे होने वाले धर्म, अर्थ, काम मोक्ष के लाभों से भी परिचित कराया।

 

आईये, अब स्वामी दयानन्द जी के योगेश्वर होने के स्वरूप पर विचार करते हैं। हम जानते है कि संसार में एक सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्ता ईश्वर है और वही योगेश्वर भी है। उसके बाद हमारे उन योगियों का स्थान आता है जिन्होंने कठिन योग साधनायें कीं और ईश्वर का साक्षात्कार किया। यह लोग सच्चे योगी कहला सकते हैं। अब विद्या को प्राप्त करने के बाद विद्या का दान करने का समय आता है। यदि कोई सिद्ध योगी योग विद्या का दान नहीं करता व अपने तक सीमित रहता है तो वह स्वार्थी योगी ही कहला सकता है। महर्षि दयानन्द ने देश भर में घूम-घूम कर योगियों की संगति की, योग सीखा और उसमें वह सफल रहे। इतने पर ही उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। इसके बाद भी उन्होंने विद्या के ऐसे गुरू की खोज की जो उनकी सभी शंकायें व भ्रान्तियां दूर कर दें। इस कार्य में भी वह सफल हुए और उन्हें विद्या के योग्यतम् गुरू प्रज्ञाचक्षु दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती प्राप्त हुए। उनसे उन्हें पूर्ण विद्या का दान प्राप्त हुआ और वह पूर्ण विद्या और योग की सिद्धि से महर्षि के उच्च व गौरवपूर्ण आसन पर विराजमान होकर भूतो भविष्यति संज्ञा के संवाहक हुए। स्वामी श्रद्धानन्द ने उन्हें बरेली में प्रातः वायु सेवन के समय समाधि लगाये देखा था। महर्षि जहां-जहां जाते व रहते थे, उनके साथ के सेवक व भृत्य रात्रि में उन्हें योग समाधि में स्थित देखते थे। उनके जीवन में ऐसे उदाहरण भी है कि वेदों के मन्त्रों का अर्थ लिखाते समय उन्हें जब कहीं कोई शंका होती थी तो वह एक कमरे में जाते थे, समाधि लगाते थे, ईश्वर से अर्थ पूछते थे और बाहर आकर वेदभाष्य के लेखकों को अर्थ लिखा देते थे। जीवन में वह कभी डरे नहीं, यह आत्मिक बल उन्हें ईश्वर के साक्षात्कार से ही प्राप्त हुआ एक गुण था। अंग्रेजों का राज्य था, सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम हो चुका था, उस समय वह 32 वर्ष के युवा संन्यासी थे। उन्होंने उस संग्राम में गुप्त कार्य किये जिसका विवरण उन्होंने कभी प्रकट नहीं किया न उनके जीवन के अनुसंधानकर्ता व अध्येता पूर्णतः जान पाये। इसके केवल संकेत ही उनके ग्रन्थों में वर्णित कुछ घटनाओं में मिलते हैं। इस आजादी के आन्दोलन के विफल होने पर उन्होंने पूर्ण विद्या प्राप्त कर पुनः सक्रिय होने की योजना को कार्यरूप दिया और अन्ततः वेद प्रचार के नाम से देश में जागृति उत्पन्न की। अन्तोगत्वा 15 अगस्त, 1947 को देश अंग्रेजों की दासता से स्वतन्त्र हुआ। उनके योगदान का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि स्वराज्य को सुराज्य से श्रेष्ठ बताने वाले प्रथम पुरूष स्वामी दयानन्द थे और उनके आर्य समाजी विचारधारा के अनुयायियों की संख्या आजादी के आन्दोलन में सर्वाधिक थी। लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, महादेव रानाडे, क्रान्ति के पुरोधा श्यामजी कृष्ण वर्मा, पं. राम प्रसाद बिस्मिल, शहीद सुखदेव आदि सभी उनके अनुयायी व अनुयायी परिवारों के व्यक्ति थे। महर्षि दयानन्द को इस बात का भी श्रेय है कि उन्होंने योग को गृहत्यागी संन्यासी व वैरागियों तक सीमित न रखकर उसे प्रत्येक आर्य समाज के अनुयायी के लिए अनिवार्य किया। आर्य समाज के अनुयायी जो ईश्वर का ध्यान सन्ध्या करते हैं वह अपने आप में पूर्ण योग है जिसमें योग के आठ अंगों का समन्वय है। स्वयं सिद्ध योगी होने और योग को घर-घर में पहुंचाने के कारण स्वामी दयानन्द योगेश्वर के गरिमा और महिमाशाली विशेषण से अलंकृत किये जाने के भी पूर्ण अधिकारी है।

 

महर्षि दयानन्द के वास्तविक स्वरूप को जानने व मानने का कार्य इस देश के लोगों ने अपने पूर्वाग्रहों, अज्ञानता व किन्हीं स्वार्थों आदि के कारण नहीं किया। इससे देश वासियों व विश्व की ही हानि हुई है। उन्होंने वेदों के ईश्वर प्रदत्त ज्ञान को सारी दुनियां से बांटने का महा अभियान चलाया लेकिन संकीर्ण विचारों के लोगों ने उनके स्वप्न को पूरा नहीं होने दिया। आज आधुनिक समय में भी हम प्रायः रूढि़वादी बने हुए हैं। आत्म चिन्तन व आत्म मंथन किये बिना किसी धार्मिक व सामाजिक विचारधारा पर विश्वास करना रूढि़वादिता है जो देश, समाज व विश्व के लिए हितकर नहीं है। हम अनुभव करते हैं कि शिक्षा में मजहबी शिक्षा की पूर्ण उपेक्षा कर वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ तर्क, युक्ति, सृष्टिक्रम के अनुकूल ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के स्वरूप का अध्ययन सभी देशवासियों को अनिवार्यतः कराया जाना चाहिये। मनुष्य ईश्वर को कैसे प्राप्त कर सकता है, उसे प्राप्त करने की योग की विधि पर भी पर्याप्त अनुसंधान होकर प्रचार होना चाहिये जिससे हमारा मानव जीवन व्यर्थ सिद्ध न होकर सार्थक सिद्ध हो। लेख के समापन पर हम मर्यादा पुरूषोत्तम और योगश्वर दयानन्द को कोटिशः नमन करते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

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