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आर्य समाज को अपयश से बचाओः-प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

आर्य समाज को अपयश से बचाओः

व्यक्तियों में भी कमियाँ हो सकती हैं और संगठन में समाज में भी दोष हो सकते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो स्वयं तो कोई साहसिक कार्य आज पर्यन्त कर नहीं सके, उन्हें समाज के संगठन के दोष गिन-गिन कर सुनाने व प्रचारित करने की बड़ी लगन लगी रहती है। श्री सत्यपाल जी आर्य,मन्त्री प्रादेशिक सभा से व कुछ अन्य सज्जनों से पता चला कि एक जन्मजात दुखिया ने अपनी एक पोथी में चुन-चुन कर ऐसे कई नाम दिये हैं, जिनकी अन्तिम वेला में समाज ने सेवा नहीं की। ऐसे विद्वानों, महात्माओं, साधुओं में श्री महात्मा आनन्द स्वामी जी का नाम भी गिनाया गया है। लिखा है कि अन्तिम वेला में वे अपनी पुत्री के घर पर जा कर मरे।

यह बड़ी घटिया सोच है। हर कोई मानेगा कि समाज की जीवन भर सेवा करने वालों की अन्तिम वेला में समाज द्वारा सेवा व रक्षा की जानी चाहिये। अपनी कोई कमी है तो वह हमें दूर करनी चाहिये। जिस दुखिया ने दस नाम गिनाये हैं, उसको ऐसे दो चार नामों का भी पता न चला, जिनकी अन्तिम वेला में श्रद्धा भक्ति से आर्यसमाज ने सेवा की। क्या महात्मा नारायण स्वामी जी, स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी की, स्वामी आत्मानन्द जी की आर्यसमाज ने श्रद्धा भक्ति से सेवा नहीं की थी? पं. माथुर शर्मा जी, स्वामी सोमानन्द जी, स्वामी सपूर्णानन्द जी, स्वामी सुव्रतानन्द जी, स्वामी भूमानन्द जी, पं. देवप्रकाश जी, मास्टर पूर्णचन्द जी आदि की स्वामी सर्वानन्द जी ने दिनरात सेवा नहीं की थी? क्या पं. नरेन्द्र जी को आर्यों ने फैं क दिया? चौ. वेदव्रत जी वानप्रस्थी ने धूरी में मेरे पास प्राण छोड़े। मैं तब अविवाहित ही था। स्वामी ज्ञानानन्द जी तो चलते-चलते चल बसे। जिस महापुरुष ने सूची बनाकर आर्यसमाज के अपयश फैलाने का यश लूटा है, उसे यह भी तो बताना चाहिये था कि उसने किस विद्वान् की, संन्यासी की कभी सेवा की?

यह झूठ है कि महात्मा आनन्द स्वामी जी को आर्यसमाज ने अन्त में नहीं पूछा। वे बेटी के घर मरने तो नहीं गये थे। यह आकस्मिक घटना थी। मैं स्वयं महात्मा जी से विनती करके आया कि कुछ समय के लिए मेरे पास आयें। कोई काम नहीं लेंगे। न कथा और न प्रवचन होगा। सेवा करेंगे। धूरी के बाबू पुरुषोत्तमलाल जी ने आग्रपूर्वक कहा कि आप मेरे पास चलें। मैं बढ़िया इलाज करवाऊँगा। चौबीस घण्टे आपकी सेवा में रहूँगा। जब तक आपकी शवयात्रा नहीं निकलेगी, मैं सब काम धंधे छोड़कर आपकी सेवा में रहूँगा।

क्या स्वामी सर्वानन्द जी महाराज, महात्मा आनन्द स्वामी की सेवा से इनकार कर देते? क्या स्वामी सत्यप्रकाश जी की दीनानाथ जी ने जी जान से सेवा नहीं की थी? कुछ ऐसे नाम भी दुखिया जी गिना देते तो औरों को सेवा करने की प्रेरणा मिलती। हमारे आशय को आर्य जन समझें। महात्मा आनन्द स्वामी जी का अवमूल्यन मत करें। उनके सेवकों की कमी नहीं थी।

‘आर्यसमाज की स्थापना और इसके नियमों पर एक दृष्टि’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

महर्षि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) उन्नीसवीं शताब्दी के समाज व धर्म-मत सुधारकों में अग्रणीय महापुरुष हैं। उन्होंने 10 अप्रैल सन् 1875 ई. (चैत्र शुक्ला 5 शनिवार सम्वत् 1932 विक्रमी) को मुम्बई में आर्यसमाज की  स्थापना की थी। इससे पूर्व उन्होंने 6 या 7 सितम्बर, 1872 को वर्तमान बिहार प्रदेश के आरा स्थान पर आगमन पर भी वहां आर्यसमाज स्थापित किया था। उपलब्ध इतिहास व जानकारी के अनुसार यह प्रथम आर्यसमाज था। महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी के लेखक पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय रचित जीवन चरित में इस विषय में उल्लेख है कि नगर के सभी सम्भ्रान्त पुरुष महाराज के दर्शनार्थ आते थे और सन्ध्यासमय उनके पास अच्छी भीड़ लग जाती थी। स्वामीजी ने आरा में एक सभा की भी स्थापना की थी जिसका उद्देश्य आर्यधर्म और रीतिनीति का संस्कार करना था, परन्तु उसके एकदो ही अधिवेशन हुए। स्वामी जी के आरा से चले जाने के पश्चात् थोड़े ही दिन में उसकी समाप्ती (गतिविधियां बन्द) हो गई। जिन दिनों आर्यसमाज आरा की स्थापना हुई, तब न तो सत्यार्थप्रकाश प्रकाशित हुआ था और न हि संस्कारविधि, आर्याभिविनय वा अन्य किसी प्रमुख ग्रन्थ की रचना ही हुई थी। आरा में स्वामीजी का प्रवास मात्र 1 या 2 दिनों का होने के कारण आर्यसमाज के नियम आदि भी नहीं बनाये जा सके थे। यहां से स्वामीजी पटना आ गये थे और यहां 25 दिनों का प्रवास किया था। आरा में स्वामीजी ने पं. रुद्रदत्त और पं. चन्द्रदत्त पौराणिक मत के पण्डितों से मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ किया था। प्रसंग उठने पर आपने बताया था कि सभी पुराण ग्रन्थ वंचक लोगों के रचे हुए हैं। आरा में स्वामी जी के दो व्याख्यान हुए जिनमें से एक यहां के गवर्नमेंट स्कूल के प्रांगण में हुआ था। व्याख्यान वैदिक धर्म विषय पर था जिसमें बोलते हुए स्वामी जी ने कहा था कि प्रचलित हिन्दूधर्म और रीतिरिवाज वेदानुमोदित नहीं हैं, प्रतिमापूजा वेदप्रतिपादित नहीं है, विधवा विवाह वेदसम्मत और बालविवाह वेदविरुद्ध है। व्याख्यान में स्वामी जी ने कहा था कि गुरुदीक्षा करने की रीति आधुनिक है तथा मन्त्र देने का अर्थ कान में फूंक मारने का नहीं है, जैसा कि दीक्षा देने वाले गुरू करते थे।

 

स्वामी दयानन्द जी ने 31 दिसम्बर 1874 से 10 जनवरी 1875 तक राजकोट में प्रवास कर वैदिक धर्म का प्रचार किया। यहां जिस कैम्प की धर्मशाला में स्वामी ठहरे, वहां उन्होंने आठ व्याख्यान दिये जिनके विषय थे ईश्वर, धर्मोदय, वेदों का अनादित्व और अपौरुषेयत्व, पुनर्जन्म, विद्याअविद्या, मुक्ति और बन्ध, आर्यों का इतिहास और कर्तव्य। यहां स्वामीजी ने पं. महीधर और जीवनराम शास्त्री से मूर्तिपूजा और वेदान्त-विषय पर शास्त्रार्थ भी किया। स्वामीजी का यहां राजाओं के पुत्रों की शिक्षा के कालेज, राजकुमार कालेज में एक व्याख्यान हुआ। उपदेश का विषय था ‘‘अंहिसा परमो धर्म यहां स्कूल की ओर से स्वामीजी को प्रो. मैक्समूलर सम्पादित ऋग्वेद भेंट किया गया था। राजकोट में आर्यसमाज की स्थापना के विषय में पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय रचित महर्षि दयानन्द के जीवन चरित में निम्न विवरण प्राप्त होता है-स्वामीजी ने यह प्रस्ताव किया कि राजकोट में आर्यसमाज स्थापित किया जाए और प्रार्थनासमाज को ही आर्यसमाज में परिणत कर दिया जाए। प्रार्थनासमाज के सभी लोग इस प्रस्ताव से सहमत हो गये। वेद के निभ्र्रान्त होने पर किसी ने आपत्ति नहीं की। स्वामीजी के दीप्तिमय शरीर और तेजस्विनी वाणी का लोगों पर चुम्बक जैसा प्रभाव पड़ता था। वह सबको नतमस्तक कर देता था। आर्यसमाज स्थापित हो गया, मणिशंकर जटाशंकर और उनकी अनुपस्थियों में उत्तमराम निर्भयराम प्रधान का कार्य करने के लिए और हरगोविन्ददास द्वारकादास और नगीनदास ब्रजभूषणदास मन्त्री का कर्तव्य पालन करने के लिए नियत हुए। आर्यसमाज के नियमों के विषय में इस जीवन-चरित में लिखा है कि स्वामीजी ने आर्यसमाज के नियम बनाये, जो मुद्रित कर लिये गये। इनकी 300 प्रतियां तो स्वामीजी ने अहमदाबाद और मुम्बई में वितरण करने के लिए स्वयं रख लीं और शेष प्रतियां राजकोट और अन्य स्थानों में बांटने के लिए रख ली गई जो राजकोट में बांट दी र्गइं, शेष गुजरात, काठियावाड़ और उत्तरीय भारत के प्रधान नगरों में भेज दी गईं। उस समय स्वामी जी की यह सम्मति थी कि प्रधान आर्यसमाज अहमदाबाद और मुम्बई में रहें। आर्यसमाज के साप्ताहिक अधिवेशन प्रति आदित्यवार को होने निश्चित हुए थे। यह ध्यातव्य है कि राजकोट में आर्यसमाज की स्थापना पर बनाये गये नियमों की संख्या 26 थी। इनमें से 10 नियमों को आगे प्रस्तुत किया जा रहा है।

 

इसके बाद मुम्बई में 10 अप्रैल, सन् 1875 को आर्यसमाज की स्थापना हुई। इससे सम्बन्धित विवरण पं. लेखराम रचित महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र से प्रस्तुत है। वह लिखते हैं कि ‘स्वामीजी के गुजरात की ओर चले जाने से आर्यसमाज की स्थापना का विचार जो बम्बई वालों के मन में उत्पन्न हुआ था, वह ढीला हो गया था परन्तु अब स्वामी जी के पुनः आने से फिर बढ़ने लगा और अन्ततः यहां तक बढ़ा कि कुछ सज्जनों ने दृढ़ संकल्प कर लिया कि चाहे कुछ भी हो, बिना (आर्यसमाज) स्थापित किए हम नहीं रहेंगे। स्वामीजी के लौटकर आते ही फरवरी मास, सन् 1875 में गिरगांव के मोहल्ले में एक सार्वजनिक सभा करके स्वर्गवासी रावबहादुर दादू बा पांडुरंग जी की प्रधानता में नियमों पर विचार करने के लिए एक उपसभा नियत की गई। परन्तु उस सभा में भी कई एक लोगों ने अपना यह विचार प्रकट किया कि अभी समाज-स्थापन न होना चाहिये। ऐसा अन्तरंग विचार होने से वह प्रयत्न भी वैसा ही रहा (आर्यसमाज स्थापित नहीं हुआ)।’ इसके बाद पं. लेखराम जी लिखते हैं, और अन्त में जब कई एक भद्र पुरुषों को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब समाज की स्थापना होती ही नहीं, तब कुछ धर्मात्माओं ने मिलकर राजमान्य राज्य श्री पानाचन्द आनन्द जी पारेख को नियत किए हुए नियमों (राजकोट में निर्धारित 26 नियम) पर विचारने और उनको ठीक करने का काम सौंप दिया। फिर जब ठीक किए हुए नियम स्वामीजी ने स्वीकार कर लिए, तो उसके पश्चात् कुछ भद्र पुरुष, जो आर्यसमाज स्थापित करना चाहते थे और नियमों को बहुत पसन्द करते थे, लोकभय की चिन्ता करके, आगे धर्म के क्षेत्र में आये और चैत्र सुदि 5 शनिवार, संवत् 1932, तदनुसार 10 अप्रैल, सन् 1875 को शाम के समय, मोहल्ला गिरगांव में डाक्टर मानक जी के बागीचे में, श्री गिरधरलाल दयालदास कोठारी बी.., एल.एल.बी. की प्रधानता में एक सार्वजनिक सभा की गई और उसमें यह नियम (28 नियम) सुनाये गये और सर्वसम्मति से प्रमाणित हुए और उसी दिन से आर्यसमाज की स्थापना हो गई।

 

हम अनुमान करते हैं कि पाठक आर्यसमाज के उन 28 नियमों को अवश्य जानने को उत्सुक होंगे जो मुम्बई में स्थापना के अवसर पर स्वीकार किये गये थे। यदि इन सभी नियमों को प्रस्तुत करें तो लेख का आकार बहुत बढ़ जायेगा अतः चाहकर भी हम केवल 10 नियम ही दे रहे हैं। पाठकों से निवेदन है कि वह इन नियमों को पं. लेखराम रचित महर्षि दयानन्द के जीवन चरित में देख लें। महर्षि दयानन्द के पत्र और विज्ञान के दूसरे भाग में तृतीय परिशिष्ट के रूप में यह 28 नियम महर्षि दयानन्द कृत हिन्दी व्याख्या सहित दिये गये हैं। वहां इन्हें देख कर भी लाभ उठाया जा सकता है। 28 में से प्रथम 10 नियम हैं। 1-सब मनुष्यों के हितार्थ आर्यसमाज का होना आवश्यक है। 2-इस समाज में मुख्य स्वतःप्रमाण वेदों का ही माना जायेगा। साक्षी के लिए तथा वेदों के ज्ञान के लिए और इसी प्रकार आर्य-इतिहास के लिए, शतपथ ब्राह्मणादि 4, वेदांग 6, उपवेद 4, दर्शन 6 और 1127 शाखा (वेदों के व्याख्यान), वेदों के आर्ष सनातन संस्कृत ग्रन्थों का भी वेदानुकूल होने से गौण प्रमाण माना जायगा। 3- इस समाज में प्रति देश के मध्य (में) एक प्रधान समाज होगा और दूसरी शाखा प्रशाखाएं होंगीं। 4- प्रधान समाज के अनुकूल और सब समाजों की व्यवस्था रहेगी। 5- प्रधान समाज में वेदोक्त अनुकूल संस्कृत आर्य भाषा में नाना प्रकार के सत्योपदेश के लिए पुस्तक होंगे और एक आर्यप्रकाश पत्र यथानुकूल आठ-आठ दिन में निकलेगा। यह सब समाज में प्रवृत्त किये जायेंगे। 6-प्रत्येक समाज में एक प्रधान पुरुष, और दूसरा मंत्री तथा अन्य पुरुष और स्त्री, यह सब सभासद् होंगे। 7- प्रधान पुरुष इस समाज की यथावत् व्यवस्था का पालन करेगा और मंत्री सबके पत्र का उत्तर तथा सबके नाम व्यवस्था लेख करेगा। 8- इस समाज में सत्पुरुष सत्-नीति सत्-आचरणी मनुष्यों के हितकारक समाजस्थ (सदस्य बन सकेंगे) किये जायेंगे। 9- जो गृहस्थ गृहकृत्य से अवकाश प्राप्त होय सो जैसा घर के कामों में पुरुषार्थ करता है उससे अधिक पुरुषार्थ इस समाज की उन्नति के लिए करे और विरक्त तो नित्य इस समाज की उन्नति ही करे, अन्यथा नहीं। 10- प्रत्येक आठवें दिन प्रधान मंत्री और सभासद् समाज स्थान में एकत्रित हों और सब कामों से इस काम को मुख्य जानें।

 

28 नियमों के बाद पं. लेखराम जी लिखते हैं कि फिर अधिकारी नियत किये गए। तत्पश्चात् प्रति शनिवार सायंकाल की आर्यसमाज के अधिवेशन होने लगे, परन्तु कुछ मास के पश्चात् शनिवार का दिन सामाजिक पुरुषों के अनुकूल न होने से रविवार का दिन रखा गया जो अब तक है।

 

मुम्बई के बाद लाहौर में स्थापित आर्यसमाज का विशेष महत्व है। यहां न केवल महर्षि दयानन्द जी द्वारा आर्यसमाज की स्थापना ही की गई अपितु मुम्बई में जो 28 नियम स्वीकार किए गये थे उन्हें संक्षिप्त कर 10 नियमों में सीमित कर दिया गया और 8 सितम्बर, सन् 1877 को उन्हें विज्ञापित भी कर दिया गया। इससे सम्बन्धित विवरण पं. लेखराम रचित जीवन में मिलता है। वहां लिखा है कि ‘विदित हो कि जब स्वामी जी डाक्टर रहीम खां साहब की कोठी (जो नगर के बाहर छज्जू भगत के चैबारे से लगी हुई थी) में उतरे थे, उस समय उन्होंने लोगों को बतलाया कि आर्यधर्म की उन्नति तभी हो सकती है जब नगरनगर और ग्रामग्राम में आर्यसमाज स्थापित हो जावें। चूंकि स्वामीजी के उपदेशों से लोगों के विचार अपने धर्म पर दृढ़ हो चुके थे, सब लोगों ने इस बात को स्वीकार किया और 24 जून, सन् 1877, रविवार तदनुसार जेठ सुदि 13 संवत् 1934 वि. आषाढ़ 12, संक्रान्ति के दिन लाहौर नगर में आर्यसमाज स्थापित हुआ। चूंकि इससे पहले बम्बई और पूना में आर्यसमाज स्थापित हो चुका था और नियम भी निश्चित हो चुके थे किन्तु वे बहुत विस्तृत थे, उन विस्तृत नियमों को पंजाब में यहां के कुछ लोगों के कहने से उनकी सम्मति से स्वामीजी ने संक्षिप्त कर दिया और वे नियम 8 सितम्बर, सन् 1877 के समाचार पत्र खैरख्वाह और स्टार आफ इण्डिया खंड 12, संख्या 17, पृष्ठ 8 सियालकोट नगर में प्रकाशित हुए। यह संक्षिप्त किये गये 10 नियम वर्तमान में भी प्रचलित हैं। यह नियम हैं, 1-सब सत्यविद्या और विद्या से जो पदार्थ जाने जाते हैं उनका सबका आदिमूल परमेश्वर है। 2-ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। 3-वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ाना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। 4- सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। 5- सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें। 6-संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। 7- सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये। 8-अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। 9- प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। तथा 10-सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।

 

आर्यसमाज लाहौर की स्थापना का आर्यसमाज में उल्लेखनीय स्थान है। इस आर्यसमाज से ही आर्यसमाज को लाला साईं दास, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय और लाला जीवनदास जैसे प्रमुख विद्वान व नेता मिले। गुरुकुल कांगड़ी जैसी विश्व विख्यात राष्ट्रीय शिक्षा संस्था और डी.ए.वी. आन्दोलन में भी आर्यसमाज लाहौर व पंजाबस्थ आर्यसमाजों की ही महत्वपूर्ण भूमिका है। महर्षि दयानन्द जी का पं. लेखराम रचित विस्तृत जीवन चरित भी पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा की ही देन है। महर्षि दयानन्द की मृत्यु के बाद महर्षि के यश व गौरव को बढ़ाने और समाज सुधार व धर्म सुधार व प्रचार का जो कार्य आर्यसमाज लाहौर और पंजाब की आर्य प्रतिनिधि सभा ने किया वह इससे पूर्व स्थापित आर्यसमाजों और प्रादेशिक सभाओं से नहीं हो सका। हम आशा करते हैं कि इस लेख से पाठकों को आर्यसमाज की स्थापना और आर्यसमाज के नियमों की इतिहास व निर्णय संबंधी जानकारी मिलेगी। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2, देहरादून-248001

आर्यों का समाज कहाँ है? – सोहनलाल कटारिया

लेखक पुराने आर्य समाजी हैं। संगठन की वर्तमान समय में शिथिलता एवं समय के साथ-साथ आई कुछ न्यूनताओं पर आपने अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। ऐसा समय आर्यसमाज में कभी नहीं रहा कि जन्मना जाति को आधार बनाकर किसी को सदस्य न बनाया गया हो। समय-समय पर स्थान-स्थान पर आर्यसमाजें यह प्रयत्न करती रहीं कि इससे जुड़े लोग अपने नाम के साथ आर्य लगाये और (जन्मना) जाति-सूचक शब्द न लगायें। इस मिशन में पूर्ण सफलता नहीं मिली। व्यापक रूप में आर्यसमाज व्यक्तियों तक सबद्ध रहा, परिवारों तक (कुछ अपवादों को छोड़कर) नहीं पहुँच सका। लेखक के विचारों से सपादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है। हम श्री सोहनलाल कटारिया जी का लेख पाठकों के लाभार्थ यहाँ मूल रूप में दे रहे हैं। -सपादक

‘कुछ तड़प-कुछ झड़प’ के स्तभ लेखक ने परोपकारी जुलाई (प्रथम) 2015 के अंक में लिखा है- ‘‘गंजोटी के इस कार्यक्रम में ‘दलित आर्य परिवारों ने सोत्साह बढ़-चढ़कर प्रत्येक घर से वेद प्रकाश हुतात्मा के नाम पर बिना माँगे दान दिया।’ यह प्रसंग आज भी वहाँ चर्चित है। यह आनन्द की बात है।’’

आर्य परिवार दलित है तो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी होने ही चाहिये। मैंने पढ़ा है कि आर्यसमाज के संगठन में प्रारभिक काल में तथाकथित दलित वर्ग को सदस्य ही नहीं बनाया जाता था और जो व्यक्ति अपने नाम के साथ आर्य लिखता था, उसे ताना मारकर चिढ़ाते थे कि यह अपनी जात को छुपाता है, इससे बचने के लिये लोगों ने आर्य लिखना त्याग दिया (मनुस्मृति के उदाहरण देते थे, शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास) यह ब्राह्मण धर्म की मानसिकता की गहरी पैठ है।

वर्तमान में आर्यसमाज के संगठन में अन्य संगठनों के अनुसार प्रवेश के लिये एक आवेदन भरना पड़ता है और अपनी आय का शंताश धन भी देना अनिवार्य है, यदि वह चन्दा नहीं देता है तो सदस्यता समाप्त हो जाती है, यही नहीं, यदि सदस्य संगठन के नियमों, सिद्धान्तों के विरुद्ध कार्य करने का दोषी  पाया जाता है तो उसे संगठन से निष्कासित भी कर दिया जाता है अर्थात् इस संगठन में जबतक व्यक्ति चन्दा देता है तबतक ही सदस्य रहता है- स्वयं भी संगठन को त्याग सकता है। इस प्रकार व्यक्ति के ‘सामाजिक’ संगठन से इसकी कोई निरन्तरता नहीं रहती है। लोगों को कहते सुन लेंगे कि ‘‘मेरे दादाजी आर्यसमाजी थे।’’

‘समाज’ का अर्थ है- व्यक्तियों का वह समूह जहाँ उनका आपस में खानपान, विवाह और दुःख-सुख में समिलित होना और एक दूसरे के कल्याण में तत्पर रहना होता हो। वर्तमान आर्यसमाज संगठन इन सामाजिक व्यवहारों को लेशमात्र भी नहीं निभाता है। यह भी ‘लॉयन, रोटेरी अथवा फिलेनथ्रफिक सोसायटी’ क्लब के समान ही कार्य कर रहा है। जब किसी समूह की सामाजिक आवश्यकतायें पूरी नहीं होगी तो उसके सदस्य-परिवार इस संगठन से क्यों जुड़ेंगे? दलित परिवारों का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

मानव समाज के समूह के निर्माण में विवाह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके महत्व को समझकर सार्वदेशिक सभा के प्रयासों से आर्य विवाह एक विधान (अन्तरजातीय) पारित करवाया गया। इसका लाभ तो थोड़ा मिला परन्तु आज तो दुरुपयोग ही हो रहा है। आर्यों का सामाजिक समूह तो बना नहीं। प्रसिद्ध आर्यों की पुत्रियाँ इतर धर्मावलयिों में विवाही जा रही है और आर्यों से उनकी मूल जातीय समूह से युवतियाँ विवाही जा रही है, परिणाम आर्यों का समाज बनता ही नहीं है। एक आर्यसमाजी के देहान्त हो जाने पर उसके परिवार का कोई सदस्य आर्यसमाज के संगठन का सदस्य बने, यह अनिवार्य तो है नहीं, बाध्यता भी नहीं। मैं कितने ही प्रसिद्ध आर्यसमाजियों को जानता हूँ, जो महर्षि के जीवनकाल में, उनकी सेवा में रहे थे, आज उनके परिवार का कोई सदस्य आर्यसमाज का सदस्य नहीं है और न ही आर्यसमाज के नियमों, सिद्धान्तों का पालन करता है। अजमेर-मेरवाडा और मेवाड़ में कितने ही पौराणिकों, जैनियों को, जिन्हें स्वामी जी ने स्वयं यज्ञोपवीत धारण कराकर वैदिक धर्म आर्यसमाज में ही दीक्षित कराया, उनके वंशज अपने पूर्व धर्म समाज-जाति में ……. गये। आज से पचास-साठ वर्ष पूर्व के आर्य समाजियों (जिनका देहान्त हो गया है) के परिवार का कोई विरला ही सदस्य, वर्तमान आर्यसमाज संगठन का सदस्य है। बड़े-बड़े आर्यसमाज (अजमेर जैसे गढ़) की सभासदों की संया 15/20 भी नहीं है। साप्ताहिक सत्संग में यज्ञ पर बैठने के लिये चार व्यक्ति भी उपलध नहीं होते हैं।

आर्यसमाजी की परिभाषा, ‘आर्य विवाह एक्ट’ के अनुसार वह व्यक्ति – (क) किसी भी आर्यसमाज का सदस्य हो, (ख) खण्ड (क) में वर्णित व्यक्ति के कुटुब का सदस्य या आश्रित सबन्धी।

आर्य और आर्यसमाजी शब्द एक ही व्यक्ति के लिये प्रयुक्त होते हैं। वस्तुतः यह दोनों पर्यावाची शब्द है ‘‘आर्यसमाज’’ शब्द का शादिक अर्थ- ‘आर्यों का समाज’ है। और इस समाज वाले को आर्यसमाजी कहते हैं। भाषा और कानून दोनों ही दृष्टियों से इन दोनों शदों से एक ही व्यक्ति का बोध होता है। साधारण व्यवहार में व्यक्ति को अपना धर्म बताने के लिये किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती, केवल घोषणा पर्याप्त होती है। कोई कहे मैं हिदू हूँ, मुसलमान हूँ, आर्यसमाजी हूँ तो ऐसा ही मान लिया जाता है। बीसवीं शतादी के तीसरे दशक में आर्यसमाजी बनने और कहलाने में व्यक्ति शान गौरव समझताा था। जनगणना में भी आर्य समाजियों की अलग से गणना की गयी थी, 1931 की जनगणना के अनुसार राजपुताने में- आर्य 14073, सिक्ख 42943, जैन 320245, ईसाई 12725, हिन्दू 20606003, इनमें ब्राह्मण धर्म मानने वाले 9999142 थे परन्तु विडबना है कि काल के साथ हम अपनी संया गणना कराने से हट गये। तर्क हम ‘अल्पसंयक’ नहीं होना चाहते, हिन्दुओं के अन्तर्गत रहने में ही राष्ट्रहित होगा। यह नहीं मानते कि ‘हिन्दू’ ऐसा पौराणिक महासागर है, इसमें कितनी ही बाहर से आयी हुई जातियाँ- हूण, शक, यवन, सब इसमें डूब गये, आज उनका अस्तित्व नहीं रहा। इसी प्रकार आर्य भी इसी महासागर में बनते रहते हैं और डूबते रहते हैं– छटपटाते हुये, न इधर के न उधर के।

आर्यों के समाज के निर्माण के बारे में प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता यावर के श्री वैद्य रविदत्त जी कहा करते थे कि आर्यसमाज प्रवेश करने के पश्चात् उस व्यक्ति का, पिछला द्वार जहाँ से वह आता है, बन्द हो जाना चाहिये, तब ही आर्यसमाज बनेगा, अन्यथा पिछला द्वार खुला है, तो फिर उसे पुनः उसी द्वार से लौटने में विलब नहीं होगा। यद्यपि पं. भगवानस्वरूप जी न्यायूभूषण जैसे विद्वान् का मत सदा यही रहा कि आर्यसमाजियों केा अपने-अपने समाज-जाति में ही रहकर अपने समाज का सुधार करते रहना चाहिये। डॉ. धर्मवीर जी नेाी कितनी ही बार कहा है कि जातीय संगठन इतना मजबूत है कि इसे तोड़ना, असभव जैसा है जब महर्षि दयानन्द इसे नहीं तोड़ सके तो भविष्य में भी इसे तोड़ने वाला दिखायी नहीं देता। गुरुकुल विश्व विद्यालय में एक नरदेव को यज्ञोपवीत धारण कराया, स्नातकोत्तर भूषित करके पण्डित बनाया परन्तु सामाजिक व्यवहार में जब वह सांसारिक कर्म क्षेत्र में गृहस्थाश्रम जीवन यापन के लिये उतरता है तो उसी मूल दलित समाज में ही प्रवेश करना पड़ता है- राजनैतिक जीवन में लोकसभा की ‘दलित’ आरक्षित सीट से चुनाव लड़ता है और ललाट पर एक अमिट दलित की छाप लग जाती है। यज्ञोपवीत और स्नातक की उपाधि गौण, उसे ‘वर्तमान जाति’ से छुटकारा पाने के लिये दूसरा जन्म ही एक मात्र सपना रहता है।

परोपकारिणी सभा ने कुछ वर्ष पूर्व अन्तरजातीय विवाह के लिये ऋषि मेले के अवसर पर प्रयत्न किया था परन्तु निष्फल रहा- एक महिला ने कहा ‘‘मुझे ब्राह्मण लड़की ही चाहिये आर्यसमाज में तो नीच जाति के लोग भी आ जाते बताये जाते हैं।’’

अस्तु आर्यों को अपना सामाजिक संगठन करना होगा। अपनी अलग पहचान बनानी होगी ‘‘जातिवाद का अजगर देश को निगलने पर तुला बैठा, इसको समाप्त करना होगा।’’ पौराणिक सनातनी के अनुसार भेद नहीं होगा। तब ही हमारे स्त्संगों, उत्सवों, पर्वों के कार्यक्रमों में परिवार के सदस्य उपस्थित होंगे और महर्षि के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेंगे और आर्यसमाजी कहलाने में गौरव, शान का अनुभव कर सकेंगे। 95 वर्ष की आयु हो गयी है। आर्यसमाज में कई स्थानों में, सभासद, उपमन्त्री, मन्त्री, उपप्रधान, प्रधान और राजस्थान आर्य प्रतिनिधि सभा में उपमन्त्री रह चुका हूँ।

वर्तमान में तो आर्यों का समाज कहाँ है, ढूँढ़ता ही रहता हैं, कोई बतायेगा, कहाँ है?

– 89, पहाड़गंज, राजेन्द्र स्कूल के अजमेर, राज.

नेतृत्वहीन दिशाहीन आर्यसमाज

महर्षी दयानन्द सरस्वती ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में वेदों का भाष्य, सत्यार्थ प्रकाश जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना के साथ साथ आर्य समाज की स्थापना करके देश को एक नई दिशा दी. ऋषी के दीवानों ने ऋषी की इस वाटिका को अपने रक्त से सींच कर नई उचाईयों पर पहुँचाया. ऋषी के आकस्मिक निधन की स्तिथी में इन ऋषी भक्तों ने बलिवेदी पर अपने प्राणों को न्योंछावर कर न केवल देश की स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रिम भूमिका का निर्वाह किया अपितु सामाजिक सुधारों के लिए देश को जागृत करके  इन सामाजिक सुधारों को देशभर में लागू करने के लिए बलिदान देकर एक नई परम्परा का आगाज  किया . उस काल में प्रचलित और स्थापित हुए  और किसी संगठन में समाज सुधारों के लिए बलिदान देने के एक भी प्रमाण सामने नहीं आते चाहे वो विवेकानन्द द्वारा पोषित रामकृष्ण मिशन हो या ब्रह्म समाज.

वह समाज ऋषि दयानन्द की एक दूरगामी सोच का परिणाम था जो न केवल उस समय देश की  पराधीनता से मुक्ति व देश की संस्कृति सभ्यता को अपने पुराने गौरव प्रदान करने के लिए संघर्षरत था बल्कि देश में औद्योगीकरण व विदेशों में व्यापार करने  एवं इसके लिए विदेशी भाषाओँ को सीखने का भी पक्षधर रहा .

वह ऋषी दयानन्द की दूरगामी सोच ही थी जिसने विश्व का ध्यान ऋषी दयानन्द की तरफ खींचा और विश्व भर के अनेकों लोग ऋषी दयानन्द के मुरीद हो गए . यह हमारे लिए दुर्भाग्य का ही विषय रहा की वह नेतृत्वकारी पथ  प्रदर्शित करने वाली ज्योती अल्प समय में ही अदृश्य हो गयी. वह भी उस समय में जब संगठन अपनी शैशव अवस्था में ही था .

ऋषी दयानन्द के बाद की पीढी ने ऋषी दयानन्द की विचारधारा को न केवल पोषित किया बल्कि इसे अपने रक्त से सींचकर इसे प्रज्वलित रखने और इसको प्रभावी बनाए रखने के हरसंभव प्रयास किये . ऋषी के ये अनुयायियों ने  एक के बाद एक इसके लिए प्राणों को न्योंछावर करने की रीति की परिपाटी रख दी जो अपने आप में एक नई परंपरा का निर्माण थी

उसी आर्य समाज की स्तिथि आज कितनी दयनीय है. कोई एक सर्वमान्य नेत्रित्व नहीं है. सर्वमान्य संस्था नहीं है. एक कम्युनिस्ट भी आर्य समाज के प्रतिनिधित्व की बात करता हैं, अनैतिक आरोपों से घिरे हुए व्यक्ति भी, वैदिक सिद्धांतों के खिलाफ बोलने वाला भी समाज और संस्था कर प्रधान होता है और शराब पीने वाला भी . आइये ऐसे ही  कुछ अन्य  बिन्दुओं पर विचार करते हैं :

  • लेकिन उसी ऋषी दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज की वर्तमान स्तिथी का क्या ?उसका वर्तमान समय में देश और संस्कृति या किसी और क्षेत्र में क्या योगदान है?
  • देश और संस्कृति के उत्थान के लिए वह किस योजना पर कार्य कर रहा है यह किसे विदित है ? आर्य समाज के किस समाज सुधार को देश के मुखपत्रों पर जगह मिली ?
  • आज स्तिथी यह है कि  लोग स्वामी दयानन्द को नहीं स्वामी विवेकानन्द को अधिक जानते हैं . आर्य समाजों में ऋषी दयानन्द के साथ साथ मांस भक्षक वेद निंदक स्वामी विवेकानन्द के चित्र लगे हुए हैं . ऋषी के सच्चे भक्तों के ये वाक्य कटु लगें लेकिन सत्यता यही है.
  • आर्य समाज की अग्रिम संस्था होने का दावा करने वाली संस्थाओं के मंच से स्वामी दयानन्द के निर्वाण दिवस पर मुख्य अतिथी जनरल वी के सिंह  स्वामी विवेकानन्द  के ऊपर व्याख्यान  देकर निकल जाते हैं और श्रोता तालियाँ बजाते  हैं और मंच संचालक और अन्य समाजियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. किसी के खून में ये सुन कर उबाल नहीं आता की स्वामी दयानन्द का इस देश के लिए योगदान विवेकानन्द के बाद आता है .ऐसा प्रतीत हुआ वहां लोगों की रगों में खून नहीं पानी दौड़ रहा था . किसी में इतनी हिम्मत भी नहीं हुयी  कि वक्ता की बात का शालीनता से  प्रतिउत्तर तो दे सकें .
    आर्य समाज के कभी ऐसे भी दुर्बल प्रतिनिधि होंगे शायद ही किसी ने सोचा हो.
  • आर्य समाजों के इतिहास भी पुस्तकों में हवस के पोषक ओशो नास्तिक दलाई लामा के विचारों को स्थान मिलने लगा है और वो भी आर्य समाज के मंत्री आदि की प्रेरणा से लिखी जाती हैं और उन्हीं हो समर्पित की जाती हैं.
  • आर्य समाज के मन्दिर आज शादी कराने के अड्डे बन चुके हैं जहाँ ५००० रूपए आदि लेकर किसी की भी शादी कर दी जाती है चाहे वो आर्य समाज की विचार धारा से परिचित हो या न हो .इन्टरनेट पर आर्यसमाज खोजने पर आर्य समाज मैरिज ही लिखा सबसे पहले दिखाई देता है . मात्र २ ३ घंटे में शादी का प्रमाण पत्र देने वाले अनेकों विज्ञापन दिखाई देते हैं या यही ऋषी का सपनों का आर्य समाज है.
    बिग बॉस -९ की प्रतिभागी मंदाना करीमी की शादी कर प्रमाण पत्र ही इन ऋषी भक्त होने के दम्भ भरने वाली आर्य समाज साकेत नामक संस्था से प्रकाशित हुयी हैं. “कुछ दुष्ट लोगों द्वारा ये धंधा किये जाने का नाम लेकर” इस मुद्दे से हाथ झाड़ने वाले संस्थाओं के अधिकारी क्या यह बताएँगे की आर्य समाज साकेत जहाँ से यह सर्टिफिकेट जारी हुआ क्या उन्ही फर्जी संस्थाओं की सूची में शामिल है . यह सर्टिफिकेट पर डॉ. डबास के हस्थाक्षर हैं जिन्होंने आर्य समाज साकेत का इतिहास विनय आर्य की प्रेरणा से लिखा और उन्ही को समर्पित किया . यह वही पुस्तक है जिसमें ऋषी की सूक्तियों के स्थान पर ओशो और नास्तिक दलाई लामा की सूक्तियाँ दी गयी हैं . ये लोग जरा बताएं तो सही की आर्य समाज में की जा रही इन शादियों का आधार क्या होता है . ऋषी दयानन्द द्वारा बताये गए विवाहों के प्रकारों में से किस प्रकार के विवाह कराने में ये आर्य संस्थाएं संलग्न हैं  .
  • आर्य समाज के मंचों पर नर्तकियों द्वारा फ़िल्मी गानों पर नाच: जिस आर्य समाज के मंचों से वैदिक गान गुंजा करता था जहाँ वेद मन्त्रों की व्याख्याएँ और शाश्त्रार्थ हुआ करते थे उन्ही आर्य समाज के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आज आर्य समाज के वर्तमान विद्वानों और तथाकथित नेत्रित्व्य की उपस्तिथी में नर्तकियों द्वारा “पीतल की तोरी गागरी और श्याम रंग बोमरो आदि गानों पर थिरकना आर्य समाज के पतन के साक्षात उदाहरण हैं.
  • नैतिक पतन : किसी प्रभावशाली नेतृत्व के अभाव का ही परिणाम है की आज इस संगठन के कई लोगों पर चारित्रिक हनन के मुकदमें चल रहे हैं. किन्चित जेल की हवा खा चुके और कुछ खा रहे हैं . कहाँ गया वह ऋषी द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मचर्य का सिद्धांत और स्वामी स्वतान्त्रतानंद जी, स्वामी दर्शानानानंद जी जैसे ऋषी के परम भक्त जिन्होंने ऋषी के सिद्धांतों पर चलते ही अपनी जीवन की हवि दे दी.
  • गुरुकुलों और विद्वानों की दयनीय हालात : आजादी के इतने वर्षों बाद आज हालात ये है की ऋषी दयानन्द की पद्धिति को सरकारी माध्यम में प्रचलित करवाने के बजाय स्वयं आर्य समाज के गुरुकुलों ने सीबीएसई आदि के पाठ्यक्रमों को अपनाना आरम्भ कर दिया . ऋषी दयानन्द की शिक्षा पद्धिति से अध्यन अध्यापन करवाने वाले गुरुकुलों के संख्या २ अंकों में भी नहीं. क्या यही वो पद्धिती है जिससे हम विश्व को आर्य बनायेंगे . जिस गुरुकुल की स्थापना के लिए स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपनी संपत्ति और जीवन कुर्बान कर दिया उस गुरुकुल की हालत आज सर्व विदित है.
    आर्य समाज के विद्वान की हालत किसी पौराणिक अध् पढ़े पुजारी से भी गई गुज़री है . वह ऋषि दयानन्द का अनुयायी अपने निर्वाह के लिए दर दर की ठोकरें खाता है उसे  जीवन निर्वाह के लिए वह पौरानिकों के यहाँ पर पौराणिक कर्मकाण्ड कराने के लिए विवश है या  उस वर्ग की कृपा का पात्र बनने के लिए निर्भर होना पढता है जिसे ऋषी के सिद्धांत भी नहीं पता.
    आज देश में ऐसे गुरुकुलों का अभाव है जो क्षत्रियों का निर्माण करते हों  जो कर्मकारों का निर्माण करते हो जो व्यवसायियों का निर्माण करते हों . समाज की व्यवस्था चारों वर्णों के अधीन है क्या अन्य वर्गों का निर्माण करने के लिए कोई व्यवस्था की गयी ?
  • खाली पड़े समाज : आर्य समाज के नीरस होने के प्रत्यक्ष प्रमाण उसके खाली पढ़े भवन हैं . जिनमें रविवार के दिन कुछ वृध्द लोग दिख जाते हैं जो जीवन के अंतिम पढाव में हैं . पौराणिक पण्डित अपने मन्दिर में मूर्ति के पास बैठा मिल जाता है लेकिन आर्य समाज मन्दिर में जाने पर अधिकतर या तो ताले लगे मिलते हैं या फिर संचालक/पुरोहित मन्दिर में अपने कमरे में.
    आर्य समाज के भवनों पर ताले, उन पर किये गए कब्जे और दान के पैसे का उन मुकदमों पर खर्च सर्व विदित है . काश इन नेताओं ने विद्वानों का निर्माण किया होता जो अपने जीवन को आर्य सिद्धांतों के प्रचार प्रसार में लगाते.
  • विधर्मियों को पुरजोर जवाब देने की परम्परा: ऋषि दयानन्द के नाम पर करोड़ों का दान डकारने वाली संस्थाएं आज धर्म पर होने वाले आक्षेपों का जवाब देने तक में अपनी रूचि नहीं रखतीं. ऋषी दयानन्द के नाम पर भवनों का निर्माण और दान इकठ्ठा करना ही इनका परम ध्येय है लेकिन जिस वैदिक धर्म के लिए महर्षि दयानन्द ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया उसी ऋषी दयानन्द और उसके वैदिक धर्म पर आक्षेप होने पर ऋषी दयानन्द के नाम पर ये दान इकट्ठे करने वाले और ऋषि भक्त होने का दावा करने वाले उनके ये अनुचर पता नहीं किन बिलों में चुप जाते हैं पता नहीं कौनसा सांप इन्हें सूंघ जाता है .
    इनकी नाक के नीचे जब ऋषी दयानन्द पर आक्षेप होते हैं ऋषी दयानन्द पर आक्षेप करती हुयी पुस्तकों का प्रकाशन होता है लेकिन इन आर्य समाजी नेताओं के काना पर जूं तक नहीं रेगती .
    सम्पूर्ण आर्य जगत में केवल ऋषी दयानन्द की स्थानापन्न  परोपकारिणी सभा ही इस परंपरा को जिन्दा रखे हुए हैं . उनका यह कदम अत्यंत ही सराहनीय है . कभी भी किसी भी पुस्तक, पत्रिका या किसी भी मंच से वैदिक धर्म या ऋषी दयानन्द पर आक्षेप हो तो ऋषी द्वारा स्थापित ये संस्था जवाब देने में कभी पीछे नहीं रहती . चाहे खुशवन्त सिंह द्वारा धर्म पर आक्षेप हो या जनरल वी के सिंह द्वारा ऋषी के योगदान को कम आंकने की कोशिश या हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा ऋषी दयानन्द पर आक्षेप यही एक संस्था है जो आक्षेपों का न केवल जवाब देती है अपितु यह भी सुनिश्चित करती है कि वो जवाब आक्षेप करने वाले तक पहुंचे .
  • कुकुरमुत्ते की तरह उगते तथाकथित विद्वान और आर्य समाजी हदीसों की रचना :
    आर्य समाज में पुरोहितों/विद्वानों की दयनीय स्तिथी का एक कारण कुकुरमुत्ते की तरह उगते स्वघोषित विद्वान भी हैं. जो कार्य विद्वानों को करने चाहिए वो कार्य में ये स्वघोषित अपनी दक्षता प्रदर्शित कर न केवल पुरोहितों /विद्वानों के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं, उनकी आजीविका के माध्यम पर चोट करते हैं अपितु  वैदिक सिद्धांतों के खिलाफ भी बोलते हैं. पण्डित राम चन्द्र देहलवी ,शाश्त्रार्थ महारथी शांती प्रकाश जी ने जीवन लगा कर वह योग्यता प्राप्त की थीं लेकिन ये बिना परिश्रम किये वह चाहते हैं>

यही कारण है की विधर्मियों से वार्तालाप में इनके ईश्वर को अनुमान भी हो जाता है.
इन स्वघोषितों की पत्नी माता पौराणिक तीर्थों की यात्रा में जाती हैं और ये विश्व को आर्य बनाने और शाश्त्रार्थ महारथी बनने का दम्भ भरते हैं.
आर्य समाज में इन अध् कचरे विद्वानों की वजह से अनेक हदीसों की रचना होने लगी है जो ऋषी के भक्तों जिनको तथ्यों का ज्ञान नहीं होता है बड़ी आसानी से प्रचारित हो जाती है.
यथा मंगल पांडे का ऋषी दयानन्द का भक्त होना, खुदी राम बोस के फांसी से पहले सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन, सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर तांगे वाले के आर्य समाजी बनाना हो या लाठियां खाने  के समय लाला लाजपत राय के हाथों में सत्यार्थ प्रकाश का होना हो ये हदीसें इन तथाकथित स्वघोषित विद्वानों की ही देन हैं जो समाज की जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य कर रहे  हैं

  • अवैदिक कार्यों का आर्य समाज में प्रचलन

जिन कार्यों का आर्य समाजी विद्वान विरोध करते हुए चले आये आज उन्हीं अवैदिक कर्मों को आर्य समाज में स्थान मिलने लगा है. चाहे वह एक आर्य संस्था के प्रधान द्वारा कौशाम्बी आर्य समाज के कार्यकर्म में करवा चौथ को वैदिक सिध्ध करना हो या सर्व मनोंकामना पूर्ण करने जैसे कार्यक्रम करना या फिर समाजों में बलि प्रथा के सांकेतिक प्रचलन के तहत यज्ञ की समाप्ति पर गोले को काट कर उसमें मखाने आदि भर उसके मुहं को बंद कर हवि के रूप में डालना.
ऋषी दयानन्द और वैदिक धर्म के अनुयायियों को चाहिए की समाज की वर्तमान स्तिथी और समाज के गौरवशाली अतीत का अवलोकन करें . आवश्यकता है कि पतन की वर्तमान स्तिथी का अध्ययन कर इससे उबरने के प्रयासों का निर्धारण कर समयबद्ध तरीके से उनको पूर्ण किया जाये. उन संस्थाओं को चिन्हित किया जाये जो ऋषि के सपनों के समाज और सिध्धातों का पालन करती हैं और उनके नेत्रित्व में अपने गौरवशाली अतीत के स्तर को प्राप्त कर ऋषी के कार्य को आगे बढ़ाने के मार्ग पर प्रशस्त किया  जाये .

सद्धर्मप्रचारक उर्दू हिन्दी का जन्म-भ्रान्ति निवारण- राजेन्द्र जिज्ञासु

किसी के लेख में यह छपा बताते हैं कि महात्मा मुंशीराम जी ने रात-रात में ‘सद्धर्मप्रचारक’ उर्दू साप्ताहिक को हिन्दी में कर दिया। एक प्रबुद्ध आर्य भाई ने चलभाष पर प्रश्न किया कि ‘सद्धर्मप्रचारक’ को हिन्दी में निकालने के महात्मा जी के साहसिक क्रान्तिकारी पग पर आप प्रामाणिक तथ्यपरक प्रकाश डालें। यह प्रश्न तो उन्हीं लेखक जी से पूछा जाता तो अच्छा होता तथापि मैं किसी आर्य भाई को निराश नहीं करता। कोई चार दिन पूर्व तड़प-झड़प लिखकर भेजी तो कुछ समाधान करते हुए लिखा कि स्मृति के आधार पर बहुत कुछ लिखा है। सद्धर्मप्रचारक की अन्तिम फाईल खोज कर कोई भूल मेरे लेख में होगी तो उसे फिर सुधार कर दूँगा।

अब चैन कहाँ? वह फाईल खोज निकाली। लीजिये! ‘सद्धर्मप्रचारक’ के जन्म-पुनर्जन्म का प्रामाणिक इतिहास। सुन-सुनाकर और कुछ कहानी को चटपटा बनाने वाले इतिहास को प्रदूषित करने का अवसर हाथ से जाने नहीं देते। अनजाने में भी इस पत्रिका के बारे में कई एक ने कई भ्रान्तियाँ फैला रखी हैं। आज यथासम्भव सब भ्रामक लेखों का निराकरण हो जायेगा।

महात्मा मुंशीराम जी ने रात-रात में अथवा एकदम ‘सद्धर्मप्रचारक’ उर्दू को हिन्दी में नहीं निकाला था। हाँ! जब निश्चय कर लिया तो फिर टले नहीं। घाटा, हानि का भय दिखाया गया परन्तु उन्होंने हानि लाभ की चिन्ता नहीं की, पग दृढ़ता से आगे धरते गये। ‘प्रचारक की काया पलट का दृढ़ निश्चय’ एक लम्बा लेख पाँच अक्टूबर सन् १९०६ के अंक में दिया था। यह मेरे सामने है। इसके बाद निरन्तर पाँच मास तक प्रायः प्रत्येक अंक में प्रचारक के हिन्दी संस्करण के बारे में विज्ञापन तथा लेख छपते रहे जो सब मेरे पास हैं। सद्धर्मप्रचारक के सम्पादकीय लेख एक ग्रन्थ के रूप में भी बाद में छपे थे जो इतिहास की धरोहर है और बहुत से तथ्यों पर जिससे प्रकाश पड़ता है। वह ग्रन्थ मेरे पास भी है और बन्धुवर सत्येन्द्रसिंह आर्य के पास भी है। विस्तारपूर्वक एतद्विषयक जानकारी इतिहास प्रेमी चाहेंगे तो फिर कभी यह सेवा भी की जा सकती है।

. डॉ. जे. जार्डन्स जी ने लिखा है कि उर्दू सद्धर्म-प्रचारक सन् १८८८-१९०७ तक निकलता रहा। यह सत्य नहीं है। लेखक से भूल हुई है। किसी ने कभी इस चूक पर दो शब्द  नहीं लिखे।

. स्वामी श्रद्धानन्द जी पर हिण्डौन से छपे ग्रन्थ में लिखा है कि उर्दू सद्धर्मप्रचारक का जन्म १९ फरवरी १८८९ में हुआ, यह भी सत्य नहीं। भ्रामक कथन है।

प्रबुद्ध पाठक नोट करें कि इस समय मेरे सामने सद्धर्म-प्रचारक का प्रथम अंक है। यह १३ अप्रैल सन् १८८९ को निकला था। तब इसके आठ ही पृष्ठ होते थे। एक ही वर्ष में पृष्ठ संख्या १६ और सन् १९०७ में १८ और कभी-कभी २२ पृष्ठ भी होते थे। मैंने सब अंक देखे हैं। स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी ने भी सद्धर्मप्रचारक का जन्म वैशाखी (१३ अप्रैल) लिखा है।

. हिण्डौन वाले ग्रन्थ में इसके जन्म की एक और स्थान पर भी जन्म तिथि १९ फरवरी १८८९ छपी है जो ठीक नहीं है।

सेवा का एक अवसर मिला। भ्रम भञ्जन कर दिया। पूरी खोज करने में लगा तो पता चला कि अपने समय के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान् और पं. बाल शास्त्री काशी के शिष्य गोस्वामी घनश्याम मुलतान निवासी सद्धर्मप्रचारक उर्दू के नियमित लेखक थे। उनके कई लेख मिले हैं। इनको हिन्दी में अनूदित करके ‘परोपकारी’ में प्रकाशित करवा दिया जायेगा। वे ‘परोपकारी’ के भी तो लेखक रहे।

The sad decline of the Arya Samaj By Dr. Vidhu Mayur

It is not possible to say with certainty as to when the Arya Samaj movement began to decay.  As good a guess as any on this is 1947, the year in which Punjab was partitioned into India and Pakistan.  It is probable that this dealt a grievous blow to the Arya Samaj movement because Lahore was where its heart had beat since its inception; with one fell swoop the arteries, connecting it to other parts of its body in India, were thus severed.  Whether this decline is terminal is too painful a question to contemplate. Why has the slump occurred?

For a start, the modern practice of democracy must shoulder considerable blame.  At its birth, the Arya Samaj movement adopted a constitution informed by the colonial system in place at that time. The legacy, left by the British legal and political system to India, includes the civil law guidance that charities should have in place an electoral system where leaders are elected by members who pay an annual subscription, on a one-member-one-vote basis.  There are fatal weaknesses in this because almost anyone can become a member of an Arya Samaj through the ridiculously expedient route of paying a tiny sum of money for annual membership, and by signing a form pledging allegiance to the movement.  Svami Dayanand must have recognised this flaw because, before he died, he set up the Arya Paropkarini Sabha to manage his affairs.  Crucially, this Sabha was, in legal terms, a Trust – a body run by Trustees who were not elected but appointed by him (presumably on the basis that he fully trusted them to be Aryas in the true sense of the word). Dharma is about one’s conduct being compatible with Vedic ethics – it takes a life-time (if not more) for an Arya to acquire sanskaars that signally cannot be acquired instantly.  It is true to say, therefore, that far too many so-called Samaj members, and leaders, have obtained their ‘brand’ identity through this completely insincere approach.  Amazingly, it is even possible to purchase life membership in many Arya Samajs – this is sold on the basis that, thereby, one can pay a greatly discounted annual fee!  Tragically, such is the extent of the rot that has set in within a movement intended to spread the practice of nishkaam (selfless and unconditional) yajna (altruism).  Arya Samajs are therefore dangerously vulnerable to easy infiltration and sabotage by enemies intent on weakening it; could it be that this is mainly why it has been brought to its knees?

Even worse, however, is that this system of organisation spawns leaders who are elected, exactly, as are politicians. Instead of leaders being appointed on merit, they come to the fore via popularity contests. It would be fair to say that the vast majority of Arya Samajs worldwide are and have been led by people whose political skills are far superior to their Vedic morals; greed for office is the result. Is it any surprise therefore that the sublime principles and goals Svami Dayanand Sarasvati intended for preservation and propagation by the society he set up have lapsed into dormancy?  For, politicians the world over are, essentially, populist.  Becoming popular in order to attract votes does not mix at all well with acting in a principled manner – in fact, are these two behaviours not mutually exclusive? Almost invariably, such people are more willing to compromise key principles (to remain in power) than preserving them.  For example, they fail with Principle 9 – no one should be content to promote their own good but should instead look for their own good in promoting the good of all.

Another historically alien concept that has taken root in the Arya Samaj is secular humanism.  Atheistic humanism is ultimately antithetic to the Vedic dharma – principles 1, 2 and 3 of the Arya Samaj embrace, celebrate and eulogise God, unambiguously so. Unfortunately, those who are too ignorant or lazy to worship God as taught by the Vedas tend to become followers of the idea of moral relativism that now is in the ascendancy all over the world, and consequently fail in practising principle 5 of the Arya Samaj, that is, all acts should be performed in accordance with dharma by differentiating right conduct from wrong.  How can people succeed in this if they are expected to accept that there are no absolute rights and wrongs?  And so, we see evils such as abortion, deviant sexual behaviour and mercy killing now being promoted as examples of modern day ethics.  Other such aberrations bequeathed by the so-called Age of Enlightenment are the industrialised slaughter of animals, genetic modification of living organisms and a selfish emphasis on human rights rather than selfless responsibilities – almost all resulting from the worship of science having supplanted that of God.  This explains why Samajs are following and teaching what is not truly Vedic, but a contaminated or diluted version of Dharma.

For a creed that totally rejects the idea of a hereditary caste system, it is shocking that the Arya Samaj has actually been infected with the notion of Aryan identity being inherited; it is not uncommon for people in positions of leadership uttering with pride ‘my father was a great servant of the Samaj’ or ‘I come from a strong Arya Samaj family’.  The intention behind such statements is to offer evidence of sincerity or authenticity of their qualifications for leadership or membership of the organisation, irrespective of the merits – or demerits – of their day-to-day conduct.  Nepotism, in the form of reserving committee posts for family members, is a consequence of this.  At AGMs or elections, dissensions between factions occur frequently and are settled on the basis of voter turnout.  Egos run rampant, with elections being won by those who boast their achievements most volubly.  It is a bitter irony that these so-called Aryas are, therefore, operating exactly like the corrupt Brahmins that have been the scourge of India for so long, justifying seizure of the status of dominant and self-perpetuating elite by dint of birth-right, and not on ability or merit.

Capitalism rears up its ugly head in the form of power-seekers trying to show that they have raised the most donations, held the biggest yajnas or organised the erection of big halls or new premises. Officers attend weekly meetings infrequently, but are unfailingly present at meetings of the executive committee.  The few sincere servants in each Samaj are taken for granted or sidelined.  Devout members are mocked for being unfashionably and unhealthily faithful to God.  Hypocrisy is rife, as commonly exemplified by non-vegetarianism, alcohol use or sympathy for non-Vedic religious practices and beliefs.  Fund-raising has become an end in itself with sizeable savings being deposited in bank accounts.  Herein lies a most sinister danger; because such wealth is a magnet for the corrupt to scurrilously try to acquire power as Samaj officials in order to attempt to embezzle such funds.  It is probably true to say that litigation has done more than anything else to weaken the Arya Samaj in India into a state of paralysis.  The motive behind such law suits is, usually, pecuniary gain or megalomania.  What has been completely forgotten is that the key reason for fund-raising through donations by the public is for the funds to be immediately spent on good causes; instead of making such charitable investments funds are being kept saved in ‘war-chests’ as an end in itself.

Sadly, what has also become vanishingly rare is the spirit of daana and seva; a painful irony in light of the sixth principle of Dayanand’s mission: that the prime object of the Arya Samaj is to do good to the world, that is, to promote the physical, social and spiritual good of all.  Philanthropic works or charitable schemes are so few and far between that the Samaj can no longer claim to be meaningfully active in ongoing social reform.  By becoming to depend on government funding the DAV schools have sold their soul, for he who pays the piper calls the tune.  The Indian State is secular and has no interest whatsoever in prioritising or preserving the teaching of the Vedic Dharma to schoolchildren.  For the DAV educational wing of the Arya Samaj to have sold out in this way was a monumental error.

Another fatal mistake made by the movement early in its history was to train and employ priests to run branches of the Samaj.  The deathly blow this has delivered is twofold: firstly sustaining an apathy amongst members to study the Vedas (because svaadhyaaya for them begins and ends with listening to the occasional sermon) and secondly because many priests succumb to the evil of monetary gain – ironically one of the evils of Puranic Hinduism that Dayanand wanted to stamp out most of all. The worst consequence of this is that the weekly agnihotra has become a meaningless religious ritual not dissimilar to attending a temple to worship an idol of God (in this case the idol being a fire). This hugely important point needs further explanation.  Devayajna is an act the daily performance of which is encouraged by the Vedas; this act of sacrifice is to be carried out at home for spiritual and environmental cleansing.  Instead, the vast majority of Samajists see fit to observe yajna being conducted by a priest as their main contribution towards practising the Vedic dharma.  Priests encourage this non-performance when their duty is actually as teachers, that is, to teach and propagate the domiciliary performance of yajna in community households.  Lay members capable of conducting homa are vanishingly rare.  So, purohits trained in Arya Samaj Gurukuls, with the intention of spreading the Vedic light, actually end up working to maintain darkness in community life.  This entirely thwarts not only the third principle of the Arya Samaj, namely, that it is the duty of every Arya to read, study and teach the Vedas in order to deliver the ideal of krinvanto vishvam aryam – making all humanity noble by cleansing society of wrong beliefs about God but even more importantly, failing with the seventh principle of the Arya Samaj – instilling a sense of devotion to duty, the duty to make the world a better place by promoting justice, morality and fraternal love.

The sad conclusion is that the Arya Samaj movement has, effectively, become yet another sect.  It was Dayanand’s intention to defeat sectarianism by uniting the entire human family and even having the lofty aspiration of a world with one country and one government.  Instead, Samajs behave as do other religions, such as, having their own church or temple as well as their own tribal identity.  Although communal worship is an essential means for promoting social cohesion, it should not be an end in itself.  Samajs were intended to function as adult education colleges aimed at training congregation members to (i) practise the five mahayajnas at home and (ii) go out into the world to spread the word of the Vedas.  Instead, members retreat inwards – by seeing their role as no more than attending a communal havan as their main act of worship.  It cannot be emphasised enough that the main cause of this is having priests in situ.  The great Vedic age dating back to six thousand years ago was based on preachers acting as atithis.  These were ascetics with no fixed abode who served the world by delivering Vedic education by, selflessly and dedicatedly, visiting place to place.  Our salaried priests, indolently, do the exact opposite (other than making money by conducting weddings and funerals).

The great philosopher Aristotle judged democracy to be the worst type of government.  He argued that suffrage is a type of mob rule.  Certainly, this is true for what has happened to the Arya Samaj movement – a body once great enough to play a key role in securing independence for India but now being led into irrelevance by unprincipled politicians working in cahoots with salaried priests.  Ultimately, the grass-root ‘members’ must take the blame for this downfall because of their individual diffidence and disinclination towards either practising the Vedic Dharma with dedication and diligence or, more importantly, seeing it as a major priority that the upbringing of their children is founded upon the sixteen sanskaars.  A key failing is that very few young people attend Arya Samaj meetings regularly; ultimately this is down to how parents bring up their children from infancy and whether parents bother with the Samaj themselves. Furthermore, income received from donations is embarrassingly low – the Arya Samaj movement is, effectively, failing with fund-raising. The format of the 3-hour long satsang is anachronistic i.e. belongs to a bygone era of 125 years ago. Arya Samajs are are failing to both spread Dayanand’s teachings as well as at putting them into a 21st century context.  A measure of the extent of the decline is that the websites of most branches are either quite primitive or not regularly updated; or both.

How Dayanand’s mission can be revived and resurrected is a most forbidding challenge that needs to be addressed urgently.

अवतारवाद का अन्त होगा? रामनिवास गुणग्राहक

अवतारवाद की अनिष्टकारी कल्पना जिसने भी कभी की होगी, तब उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन कोई भी यूँ ही मुँह उठाकर स्वयं को परमात्मा का अवतार घोषित कर देगा। अवतारवाद की अवधारणा चाहे जब से चली हो, लेकिन प्रतीत होता है कि विगत ५०-६० वर्षों के कालखण्ड में इस अवतारवाद ने कुछ अधिक ही उन्नति कर ली है। एक समय था जबकि शंकराचार्य से लेकर सन्त तुलसी तक सब साधु-महात्मा भक्त बनकर ही आनन्द की अनुभूति कर लेते थे, स्वामी विवेकानन्द तक को भगवान बनने की न सूझी। आज की बात करें तो लगता है भक्त बनने में कोई अधिक सुख शेष नहीं रहा, जिसे देखो भगवान बनने में लगा हुआ है। सम्भवतः पुरानी पीढ़ी के धर्मशील लोगों को स्मरण हो कि सन् १९७० के आस-पास एक पूरा परिवार ही विभिन्न परमात्माओं का अवतार बनकर भक्त मण्डली की सर्वमनोकामनाएँ पूर्ण कर रहे थे। सन् १९५४ में एक व्यक्ति ने- ‘स्वामी हंस महाराज’ नाम रखकर स्वयं को श्री कृष्ण का अवतार घोषित कर दिया। इनकी पत्नी को ‘जगत् जननी’ की उपाधि मिल गई। इस जगत् -जननी ने चार पुत्रों को जन्म दिया और चारों ही अवतार बन गये। बड़ा पुत्र सत्यपाल- ‘बाल भगवान’ बनकर ‘सन्तलोक के स्वामी’ कहलाये। दूसरे महीपाल ‘शंकर के अवतार’ बनकर ‘भोले भण्डारी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। तीसरे धर्मपाल-प्रजापति ब्रह्म के अवतार बनकर भक्त मण्डली में चक्रवर्ती राजा के नाम से विख्यात हुए। सबसे छोटे प्रेमपाल ने स्वयं को ‘पूर्ण परमात्मा’ घोषित करके देश-विदेशों में मनमानी लीलाएँ कीं।

इनकी लीला स्थलियों में इंग्लैण्ड और अमेरिका का नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। वैसे तो ये गोरे भक्त-भक्तिनों के साथ देश-विदेश में खूब आते-जाते रहते थे, लेकिन नवम्बर १९७२ में लगभग ९०० गौरांग भक्त-भक्तिनों के साथ पालम हवाई अड्डे पर उतरे तो स्वयं तो कुछ विशेष शिष्य-शिष्याओं के साथ राल्स रॉयस कार में निकल गए। इनका निजी सचिव बिहारीसिंह कस्टम अधिकारियों से सामान लेने गया तो कस्टम वालों ने एक बक्स की चाबी माँगी। चाबी तो पूर्ण परमात्मा ले उड़े थे, जब उनसे मँगाकर बॉक्स खोला गया तो उसमें दस लाख रुपये के सोना, हीरे व डॉलर आदि निकले। परमात्मा की चोरी पकड़ी गई। इतना ही नहीं एक वर्ष पूर्व १९७१ में इनके भक्तों ने भगवान की एक पत्रकार वार्ता रखी जिसमें आपने स्वयं को ‘पूर्ण परमात्मा’ कहते हुए यह भी घोषणा की कि ‘मैं हिन्दू नहीं हूँ।’ अगले दिन समाचार पत्रों में इस वार्ता का विवरण छापा तो नवभारत टाइम्स में छपे कुछ श     दों को लेकर इनके भक्त कुपित हो गये और नवभारत टाइम्स के कार्यालय पर पथराव किया जिसमें कई घायल हुए और एक सिपाही का प्राणान्त हो गया।

हमारे अवतारवादी बन्धु तो धन्य हो गये होंगे, इतने भगवानों को एक ही समय व एक ही परिवार में पाकर। पता नहीं क्यों सनातन धर्म वालों को यह सब अच्छा नहीं लगा। मेरठ के कट्टर सनातनधर्मी भक्त श्री रामशरण दास जी लिखते हैं- ‘भारत में लगभग ढ़ाई सौ से ऊपर अवतार हैं और मैं सैकड़ों से भेंट कर चुका हूँ….. जो अपने को भगवान श्री राम का अवतार तो कोई अपने को भगवान श्री कृष्ण का, कोई अपने को भगवान श्री शंकर का, तो कोई स्वयं को भगवती श्री दुर्गा का अवतार बता-बताकर डोल रहे हैं और लूट रहे हैं स्वयं पर ब्रह्म परमात्मा बनकर।….. हाय-हाय कैसे रक्षा होगी मेरे इस देश की? इस महान् परम पवित्र हिन्दू जाति की इन महान् कालनेमि पाखण्डी नकली अवतारों से?’ सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा पंजाब के महामन्त्री और केन्द्रीय सनातन धर्म सभा के मन्त्री स्वामी चरणदास जी महामण्ड़लेश्वर ने गाँधी मैदान में एक सार्वजनिक सभा के अध्यक्षीय भाषण में अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहा था- केवल दिल्ली में पिछले ८-१० वर्षों से १४ ढ़ोंगी व्यक्ति हिन्दुओं में बड़े हो गये हैं जो अपने को अवतार कहते हैं और हिन्दू धर्म पर कुठाराघात कर रहे हैं।

भक्त रामशरण दास जी- ‘धर्म कालनेमि पाखण्डी नकली अवतारों की चर्चा करते हैं। प्रश्न होता है कि क्या कोई असली अवतार भी होता है? क्या कोई भी सनातनधर्मी विद्वान्, साधु-संन्यासी या धर्माचार्य सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् आदि गुणों से युक्त परमात्मा का असली अवतार प्रमाणित कर सकता है? जब से हमारे कथित सनातनधर्मी सच में पुराणपन्थी धर्म गुरुओं ने पूर्ण परमात्मा को भौतिक शरीरधारी बना दिया, तब से इस अवतारवाद के पाखण्ड ने संसार के विभिन्न क्षेत्रों में ईश्वर पुत्रों, पीर-पैगम्बरों की एक नई शृंखला का बीजारोपण कर दिया यही बीजारोपण आज विकृति की सीमा पार करता हुआ कथित सन्त रामपालदास पर आकर पहुँच गया। अगर अब भी हमारे सनातनधर्मी इस पाखण्ड के विरुद्ध खड़े न हुए तो आगे चलकर इसका और भी कुत्सित चेहरा हमारे सामने आकर रहेगा। भर्तृहरि ने सच कहा है-

विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः।

अर्थात् विवेक भ्रष्ट व्यक्ति व समाज का हर दिशा व हर दृष्टि से पतन ही होता है। इस संसार का एक अनुभव सिद्ध सिद्धान्त है कि कोई वस्तु हमारे लिए जितनी उपयोगी, लाभदायक व कल्याणकारी होती है, उसका दुरुपयोग उतना ही घातक व अकल्याणकारी होता है। आयुर्वेद के ऋषि लिखते हैं-

प्राणाः प्राणभृतां अन्नं तद् अयुक्त्या निहन्ति असून्।

विषं प्राणहरं तत् च, युक्तियुक्तं रसायनम्।।

अर्थात् अन्न प्राण का भरण-पोषण करने वाला है। अन्न गलत ढंग से खाया जाये तो विष बनकर प्राणघातक बन जाता है और युक्तियुक्त ढंग से खाया जाये तो रसायन का काम करता है।

अन्न हमारे जीवन का आधार है- ‘अन्नं वै प्राणिनां प्राणः’, ‘अन्नं वै ब्रह्म तद् उपासीत्’ जैसे ऋषि वचन इसकी पुष्टि करते हैं। सोचने की बात है कि ऋषियों की दृष्टि में अन्न का दुरुपयोग प्राण-पोषण के स्थान पर प्राण-घातक परिणाम देता है। हम जाने-अनजाने में अन्न का दुरुपयोग करके अनेक प्रकार की भयंकर बीमारियों का शिकार होते रहते हैं। यही स्थिति धर्म और ईश्वर के सम्बन्ध में है। सर्वव्यापक, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान् परमात्मा को देह के बन्धन में डालकर, एक देशी बनाकर पिछले तीन-चार हजार वर्षों से हमारे धर्मगुरु, धर्माचार्य ईश्वर और धर्म का जो निजी स्वार्थों के लिए जो भयंकर दुरुपयोग कर रहे थे, उसका परिणाम तो आसाराम और रामपाल के रूप में आना ही था। सारे सनातनधर्मी कहलाने वाले हिन्दू पौराणिक यह बता दें कि श्रीराम और श्रीकृष्ण परमात्मा का अवतार हो सकते हैं तो आसाराम और रामपाल क्यों नहीं हो सकते? जब पुराणपन्थी बिना सिद्धान्त, बिना तर्क और बिना वेद शास्त्रों के प्रमाण दिये, श्री राम-श्री कृष्ण को परमात्मा का अवतार मानकर पूजा कर-करा सकते हैं तो कबीरपन्थी रामपाल को परमात्मा का अवतार मानकर क्यों नहीं पूज सकते?

हम यहाँ रामपाल और आसाराम की श्रीराम और श्री कृष्ण से तुलना नहीं कर रहे। निःसन्देह मर्यादा पुरुषो      ाम श्री राम और योगेश्वर श्री कृष्ण का जीवन पूर्णतः पवित्र था, वे हर दृष्टि से महापुरुष थे, हम सबके आदर्श थे। प्रश्न यह है कि क्या कोई शरीरधारी परमात्मा हो सकता है? अगर सच में एक घड़े या लोटे में समुद्र का सम्पूर्ण जल आ सकता है तो इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि घड़ा सोने का है या लोहे का। सृष्टि में सर्वत्र नियम-सिद्धान्त ही काम करते हैं, सिद्धान्ततः मनुष्य सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् आदि गुणों से युक्त नहीं हो सकता। निष्कर्षतः हम यह कहना चाहते हैं कि रामपाल और आसाराम का परमात्मा होना निश्चित रूप से एक बहुत बड़ा पाखण्ड है, अन्धविश्वास है तो श्री राम और श्री कृष्ण को परमात्मा का अवतार कहना-मानना भी बहुत बड़ा पाखण्ड और अन्धविश्वास है। हम सबको एक बात गाँठ बाँध लेनी चाहिये कि जब तक श्री राम और श्री कृष्ण आदि महापुरुषों को परमात्मा का अवतार मानकर पूजने, भक्ति करने के पाखण्ड को जीवित रखा जाएगा, तब तक देश और दुनियाँ से बाल योगेश्वर हंस, आसाराम और रामपाल जैसे पाखण्डियों की परम्परा को मिटाया नहीं जा सकेगा। बीज रहेगा तो बेल भी उगेगी-बढ़ेगी और उस पर फूल-फल भी लगेंगे जो आगे बीज भी पैदा करेंगे।

आर्यो! तनिक आप भी अपनी अकर्मण्यता-असफलता पर विचार करना सीख लो। ‘‘हम ये कर रहे हैं, हम वो कर रहे हैं।’’ कहकर अपनी पीठ थपथपाने वालो। ‘हम क्या नहीं कर पा रहे’ का भी कभी चिन्तन कर लिया करो। ऋषि दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द के हृदय की आग की एक चिनगारी को अपने हृदय में सुलगने-धधकने का अवसर देकर देखो। वे कोई दूसरी दुनियाँ के पुरुष नहीं थे। इसी समाज और राष्ट्र की ऐसी ही परिस्थिति में पल-बढ़ कर उनका व्यक्ति  व बना था। उन्होंने जो कुछ लिया यही से लिया। समाज व राष्ट्र की लगभग ऐसी ही दुर्दशा तब थी, जिसे देखकर वे चैन की नींद तक नहीं ले पाते थे। एक हम हैं कि सब कुछ देख-सुनकर भी कबूतर की तरह आँख बन्द कर लेते हैं, शतुरमुर्ग की तरह धरती में मुँह धँसा लेते हैं- सोचते हैं संकट टल गया। आर्यो! हमारी अनदेखी से संकट टल जाता तो धरती तल पर कभी कोई समस्या, कोई संकट रहता ही नहीं। आप मानो या न मानो, सच यह है कि भारत की हर समस्या, हर संकट आर्यों के अनार्यपन की उपज हैं। ऋषि दयानन्द के अनुयायी कहलाने वाले सिद्धान्तहीन लोगों के कारण ही वेद विद्या के प्रचार-प्रसार का अभियान निष्प्राण होकर रह गया है। यह कोई छोटा अपराध नहीं है, आर्यो! अपने जीवन की उपल    िधयों का सच्चे हृदय से आंकलन करो। देखो कि हमने झूठे और खोखले मान-सम्मान के अलावा आर्यसमाज में आकर क्या पाया?

पत्थर जोड़ने (भवन बनाने) और पत्थरों पर नाम लिखाने से आगे बढ़कर जीवन-निर्माण के क्षेत्र में हमारी उपल  िध क्या रही? आर्यो! जीवन को घाटे का सौदा मत बनाओ, भवन-निर्माण से जीवन-निर्माण अधिक पुण्यप्रद कर्म है। देश में व्याप्त धार्मिक-पाखण्ड, अन्धविश्वास, भ्रष्टाचार, हिंसा, जातिगत विद्वेष और पारिवारिक बिखराव- उन सब रोगों की एक ही अमोघ औषधि है और वह है वेद विद्या का प्रचार-प्रसार। यह काम केवल और केवल आर्यसमाज ही कर सकता है। संकल्प लो कि हम स्वयं वेद पढ़ेंगे और वेद विद्या के प्रचार-प्रसार में ही अपना तन, मन, धन और समय लगायेंगे। ध्यान रखें जब तक हम स्वयं वेद पढ़ना प्रारम्भ नहीं करेंगे मनोविज्ञान का सिद्धान्त है कि तब तक हम वेद के लिए कुछ भी नहीं कर सकते। वेद प्रचार करने-कराने का दिखावा तो कोई भी कर सकता है, लेकिन सच्चे अर्थों में वेद विद्या के प्रचार-प्रसार में सक्रिय सहयोग व समर्थन देकर आर्य होने का सच्चा प्रमाण, सच्चा आदर्श वही प्रस्तुत कर सकता है जो स्वयं नित्य वेद स्वाध्याय करते हो। मित्रो! क्या आप वेद-स्वाध्याय का व्रत लेकर अपने व विश्व के कल्याण करने की दिशा में छोटा-सा दिखने वाला एक बड़ा कदम उठा रहे हो? यदि हाँ तो लेखक की हर्दिक शुभकामनाएँ सदा आपके साथ हैं, ईश्वर की कृपा, करुणा और दया सदैव आपका मार्ग प्रशस्त करें!!

– महर्षि दयानन्द स्मृति भवन, जोधपुर, राजस्थान

चलभाष– ०७५९७८९४९९१