सृष्टि की उत्पत्ति किससे, कब व क्यों? -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

हम जिस संसार में रहते हैं वह हमें बना बनाया मिला है। हमारे जन्म से पूर्व इस संसार में हमारे माता-पिता व पूर्वज रहते आयें हैं। न तो हमें हमारे माता-पिता से और न हमें अपने अध्यापकों व विद्यालीय पुस्तकों में इस बात का सत्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि यह संसार कब, किसने व क्यों बनाया है। क्या यह प्रश्न महत्वहीन है, या फिर इसका ज्ञान संसार में किसी को है ही नहीं? हमें दूसरा प्रश्न ही कुछ सीमा तक उचित प्रतीत होता है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे वैज्ञानिकों, विद्वानों वा अध्यापकों आदि के पास होते तो वह निश्चय ही इसका प्रचार करते। अध्ययन करने पर इसका मुख्य कारण ज्ञात होता है कि विगत 5 हजार वर्षों में हमारे देश के लोगों ने वेद और वैदिक साहित्य का सत्य वेदार्थ प़द्धति से अध्ययन करना छोड़ दिया जिस कारण मनुष्य न केवल इन प्रश्नों के उत्तर से ही वंचित व अनभिज्ञ हो गया अपितु ईश्वर व जीवात्मा आदि के सच्चे ज्ञान से भी दूर होकर अज्ञान, अन्धविश्वासों और कुरीतियों से ग्रसित हो गया। यही स्थिति महर्षि दयानन्द के 12 फरवरी, 1825 को गुजरात के टंकारा नामक स्थान पर जन्म के समय भी थी परन्तु उनमें इन प्रश्नों को जानने की जिज्ञासा थी और इसके लिए अपना जीवन लगाने का जज्बा भी उनमें था। उन्होंने घर के सभी सुखों का त्याग कर इस संसार के सत्य रहस्यों को जानने का निश्चय किया और विद्वानों की संगति व सेवा में जाकर जिससे जितना व जो भी ज्ञान प्राप्त हो सकता था, उसे प्राप्त किया। स्वामी दयानन्द ने किसी एक ही व्यक्ति को अपना गुरू बनाकर सन्तोष नहीं किया अपितु देश में सर्वत्र घूम कर जिससे जहां जो भी ज्ञान मिला उसे अपनी बुद्धि व स्मृति में स्थान दिया जिसका परिणाम हुआ कि अनेक विद्वानों के सम्पर्क में आकर वह शून्य से आरम्भ होकर अनन्त ज्ञान वेद व ईश्वर तक पहुंचे और सभी जिज्ञासाओं, प्रश्नों, शंकाओं व भ्रान्तियों के उत्तर प्राप्त किये और उससे सारे संसार को भी आलोकित व लाभान्वित किया। मथुरा के गुरू प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द का तीन वर्ष शिष्यत्व प्राप्त कर उनसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर वह सन्तुष्ट हुए थे।

 

सृष्टि की रचना व उत्पत्ति के प्रसंग में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि संसार में कोई भी रचना व उत्पत्ति बिना कर्त्ता के नहीं होती। इसके साथ यह भी महत्वपर्ण तथ्य है कि कर्ता को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान होने के साथ उसको सम्पादित करने के लिए पर्याप्त शक्ति वा बल भी होना चाहिये। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सृष्टि एक कर्ता जो ज्ञान व बल से युक्त है, उसी से बनी है। वह स्रष्टा कौन है? संसार में ऐसी कोई सत्ता दृष्टिगोचर नहीं होती जिसे इस सृष्टि की रचना का अधिष्ठाता, रचयिता व उत्पत्तिकर्ता कहा व माना जा सके। अतः यह सुनिश्चित होता है कि वह सत्ता है तो अवश्य परन्तु वह अदृश्य सत्ता है। क्या संसार में कोई अदृश्य सत्ता ऐसी हो सकती है जिससे यह सृष्टि बनी है? इस पर विचार करने पर हमारा ध्यान स्वयं अपनी आत्मा की ओर जाता है। हम एक ज्ञानवान चेतन तत्व वा पदार्थ है जो शक्ति वा बल से युक्त हैं। हमने स्वयं को आज तक नहीं देखा। हम जो, इस शरीर में रहते हैं व इस शरीर के द्वारा अनेक कार्यों को सम्पादित करते हैं, वह आकार, रंग व रूप में कैसा है? हम अपने को ही क्यों ले, हम अन्य असंख्य प्राणियों को भी देखते है परन्तु उनके शरीर से ही अनुमान करते हैं कि इनके शरीरों में एक जीवात्मा है जिसके कारण इनका शरीर कार्य कर रहा है। इस जीवात्मा के माता के गर्भ में शरीर से संयुक्त होने और संसार में आने पर जन्म होता है और जिस चेतन जीवात्मा के निकल जाने पर ही यह शरीर मृतक का शव कहलाता है। हम यह भी जानते हैं कि सभी प्राणियों के शरीरों में रहने वाला जीवात्मा आकार में अत्यन्त अल्प परिणाम वाला है। अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण इसका अस्तित्व होकर भी यह दिखाई नहीं देता है। अतः संसार में हमारी इस आत्मा की ही भांति जीवात्मा से सर्वथा भिन्न एक अन्य शक्ति, निराकार स्वरूप और सर्वव्यापक, चेतन पदार्थ, आनन्द व सुखों से युक्त, ज्ञान-बल-शक्ति की पराकाष्ठा से परिपूर्ण, सूक्ष्म जड़ प्रकृति की नियंत्रक सत्ता ईश्वर वा परमात्मा हो सकती है। ऐसी ईश्वर नामी सत्ता से ही सूर्य, चन्द्र, ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र, असंख्य सौर मण्डलों से युक्त यह संसार, सृष्टि, ब्रह्माण्ड व जगत अस्तित्व में आ सकता है, इसमें सन्देह का कोई कारण नहीं। यही एक मात्र विकल्प हमारे सामने हैं। अन्य कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं। अब इस अनुमान का प्रमाण प्राप्त करना है जोकि वेद व वैदिक साहित्य के गहन व गम्भीर अध्ययन तथा ईश्वरोपासना, विचार, चिन्तन, मनन, ध्यान व समाधि के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

 

अब हमें यह भी विचार करना है कि वस्तुतः वेद और वैदिक साहित्य है क्या? इसको जानने के लिए हमें इस सृष्टि के आरम्भ में जाना होगा। जब सुदूर अतीत में यह सृष्टि उत्पन्न हुई तो अन्य प्राणियों को उत्पन्न करने के बाद मनुष्यों को भी उत्पन्न किया गया होगा। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों की उत्पत्ति माता-पिता से न होकर अमैथुनी विधि से परमात्मा व सृष्टिकर्ता करता है। इसका भी अन्य कोई विकल्प नहीं है, अतः ईश्वर द्वारा अमैथुनी सृष्टि को ही मानना हमारे लिए अनिवार्य व अपरिहार्य है। सृष्टि, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि तथा पृथिवी पर अग्नि, वायु, जल व प्राणी जगत सहित मनुष्य भी उत्पन्न हो जाने पर मनुष्यों को ज्ञान की आवश्यकता होती है जिससे वह अपने दैनन्दिन कार्यों का सुगमतापूर्वक निर्वाह कर सके। यह ज्ञान भी उसे यदि मिल सकता है वा मिला है तो वह सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर से ही मिला है। इसके अनेक प्रमाण हमारे पास हैं। पहला प्रमाण तो परम्परा का है। भारत में विपुल वैदिक साहित्य है जिसमें सर्वत्र वेदों को ईश्वरीय ज्ञान अर्थात् ईश्वर से प्रदत्त ज्ञान बताया गया है। वेद संसार में सबसे प्राचीनतम होने के कारण भी ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध होता है। मनुष्य अपने सारे जीवन में ज्ञान की उत्पत्ति नहीं करता, वह तो ज्ञान की खोज करता है जो इस सृष्टि में पहले से ही सर्वत्र विद्यमान है। यह ज्ञान ईश्वर का स्वाभाविक गुण है और उसमें सदा सर्वदा व सनातन काल से है और शाश्वत व नित्य भी है। ईश्वर ने अध्ययन, ध्यान व चिन्तन आदि से ज्ञान को उत्पन्न नहीं किया अपितु यह उसमें स्वतः अनादि काल से चला आ रहा है। परिमाण की दृष्टि से पूर्ण होने के कारण इसमें न्यूनाधिक नहीं होता और यह अनादि काल से ही एकरस व एक समान बना हुआ है और आगे भी इसी प्रकार का बना रहेगा। वेदों का अध्ययन कर भी वेद ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध होते हैं क्योंकि वेदों में ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति व संसार विषयक पूर्ण मौलिक ज्ञान बीज रूप में विद्यमान है जिसका समर्थन ज्ञान व विज्ञान से भी होता है। वेदों का ज्ञान पूर्णरूपेण सृष्टि-क्रम के अनुकूल होने से विज्ञान का पोषक है। वेदों की सभी मान्यतायें ज्ञान, बुद्धि, तर्क, ऊहा व वाद-विवाद कर सत्य सिद्ध होती हैं। सृष्टि के आदि से महर्षि दयानन्द पर्यन्त कोटिशः सभी ऋषियों ने वेदों का अध्ययन कर यही निष्कर्ष निकाला है। अतः वेद ज्ञान ईश्वर प्रदत्त आदि ज्ञान सिद्ध होता है जो सभी सत्य विद्याओं सहित सभी प्रकार के आधुनिक ज्ञान व विज्ञान का भी एकमात्र व प्रमुख आधार है। यदि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से  मनुष्यों को ज्ञान न मिलता तो यह संसार आगे चल ही नहीं सकता था। वही वैदिक ज्ञान काल के प्रवाह व भौगोलिक कारणों से आज अनेक भाषाओं में न्यूनताओं को समेटे हुए हमें सर्वत्र प्राप्त होता है। सृष्टि के आरम्भ में वेदों की उत्पत्ति व ऋषियों को उसकी प्राप्ति के पश्चात समय-समय पर ऋषियों ने लोगों के हितार्थ विपुल वैदिक साहित्य की रचना की। संक्षेप में कहें तो वैदिक आर्ष व्याकरण, निरुक्त, वैदिक ज्योतिषीय ज्ञान, कल्प ग्रन्थ, 6 दर्शन, उपनिषद, प्रक्षेपों से रहित शुद्ध मनुस्मृति और वेदों की शाखायें हमारे ऋषियों ने अल्पबुद्धि वाले हम मनुष्यों के लिए बना दी जिससे मनुष्य जाति का उपकार व हित हो सके।

 

यह सिद्ध हो गया है कि सृष्टि उत्पत्ति विषयक सभी प्रश्नों का सत्य उत्तर हमें वेद और वैदिक साहित्य से ही प्राप्त होगा। सृष्टि की उत्पत्ति किससे हुई प्रश्न का उत्तर है कि यह सृष्टि ईश्वर कि जिसके ब्रह्म, परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षण युक्त है, उसी से ही यह सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। सृष्टि कब उत्पन्न हुई, का उत्तर है कि एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ पन्द्रह वर्ष पूर्व। यह काल गणना भी वैदिक परम्परा ज्योतिष आदि शास्त्रों के आधार पर है। सृष्टि की रचना क्यों हुई का उत्तर है कि जीवात्माओं को उनके जन्म जन्मान्तरों के कर्मों के सुख दुःख रूपी फलों वा भोगों को प्रदान करने के लिए परम दयालु परमेश्वर ने की। सृष्टि रचना संचालन का कारण जीवों के कर्म उनके सुखदुःख रूपी फल प्रदान करना ही है। जीवात्मा को उसके लक्षणों से जाना जाता है। उसके शास्त्रीय लक्षण हैं, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान, कर्म, अल्पज्ञता नित्यता आदि।

 

हमने अपने विगत 45 वर्षों में जो अध्ययन किया है उसके अनुसार हमें यह ज्ञान पूर्णतयः सत्य, बुद्धि संगत व विज्ञान की आवश्यकताओं के अनुरुप लगता है। हमारे वैज्ञानिक अनेक कारणों से ईश्वर व धर्म को नहीं मानते। आने वाले समय में उन्हें इस ओर कदम बढ़ाने ही होंगे अन्यथा उनकी सत्य की खोज अधूरी रहेगी। इन्हीं शब्दों के हम लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

17 thoughts on “सृष्टि की उत्पत्ति किससे, कब व क्यों? -मनमोहन कुमार आर्य”

  1. बहुत सुन्दर लेख और बहुत अच्छी जानकारी.
    आपने लिखा –
    “सृष्टि कब उत्पन्न हुई, का उत्तर है कि एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ पन्द्रह वर्ष पूर्व। यह काल गणना भी वैदिक परम्परा व ज्योतिष आदि शास्त्रों के आधार पर है। सृष्टि की रचना क्यों हुई का उत्तर है कि जीवात्माओं को उनके जन्म जन्मान्तरों के कर्मों के सुख व दुःख रूपी फलों वा भोगों को प्रदान करने के लिए परम दयालु परमेश्वर ने की।”
    प्रश्न: वेदों में यह कहा गया है कि तीन तत्व – ब्रह्म, जीव तथा माया सदा से हैं, अजन्मे, सनातन. अर्थात सृष्टि से पहले भी थे क्योंकि जीव और माया दोनों ब्रह्म की शक्तियां हैं और सदा से थीं, यदि ब्रह्म सदा से था तो.
    तो एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ पन्द्रह वर्ष से पूर्व जीवात्माएं और माया कहाँ थे?

    Read more at Aryamantavya: सृष्टि की उत्पत्ति किससे, कब व क्यों? -मनमोहन कुमार आर्य http://wp.me/p6VtLM-29d

    1. बिल्कुल सही बात कही है….शायद इसका जवाब नही है लेखक के पास और शायद ही किसी के पास होगा ।।

      1. कोई अनश्वर नही हैं & ना कोई नश्वर हैं
        बल्कि हमेशा से हमेशा के लिए
        सब के सब परीवर्तनशील हैं
        इसिलिए सब थे,सब हैं,सब रहेगे
        हॉ भुतकाल में अलग थे,
        वर्तमान काल में अलग हैं
        भविष्य काल में अलग होगें
        क्योकि परीवर्तन ही एक
        मात्र सत्य,शाश्वत हैं =कल्कि

    1. शुरुवात में सभी मनुष्य की उत्त्पति एक जैसा की गयी | फिर जैसा जैसा कर्म करते गए वैसा वैसा फल मिलता गया

  2. Vigyan ko parho
    Shrishti ki utpatti batana dharm ka kary nhi h bandhuo.
    Dharmaandh log …hmesha esi bakwason me hi uljhe rahte h…aur aise vyakhya krte h jaise prayog dwara swyam siddh kr diya ho.
    Dharm yh sab krne ka kary kar skta to fir vigyaan ki jarurat hi kyo padi.

    1. मेरे एक सवाल का जवाब देना आप मुर्गी आया पहले या अंडे ? जवाब देना आप या फिर विज्ञान ही इसकी जानकारी दे दे | फिर आगे बात की जायेगी

      1. सिद्ध:
        (1)मान लिजिए एक अण्डा पहले से हैं !
        अब इस अण्डा में क्या जन्म ले सकता हैं?
        Ans:मुर्गा या मुर्गी का जन्म हो सकता हैं
        Next step
        (2)मान लिजिए मुर्गी &मुर्गा पहले से हैं !
        अब इन दोनो के संचयीकरण से क्या जन्म ले सकता हैं?
        Ans:अण्डा का जन्म हो सकता हैं
        Next step
        (1)&(2)के सन्तुलनीकरण करने पर आप को यही मिलेगा की दोनो थे या दोनो नही
        Finaly अगर मुर्गी नजर आये तो अण्डा पेट में &अण्डा नजर आये तो मुर्गी पेट में यानि दोनो थे हमेशा से बस किसी ने मुर्गी से अण्डा पैदा होते देखा,तो किसी ने अण्डा से मुर्गी तो किसी ने दोनो को देखा परीवर्तन ही सत्य/शाश्वत हैं =कल्कि

        1. भाई साहब सवाल कुछ जवाब कुछ | मेरे सवाल को समझो जी फिर जवाब देना |
          मैं फिर से वही सवाल करता हु पहले मुर्गी आई या अंडा | कौन पहले आया | एक साथ २ कंडीशन साथ में ना रखें | जवाब कोई एक होगा या तो मुर्गी या फिर अंडा | जवाब देना जी | फिर आगे बात करेंगे

        1. पहले मनुष्य युवा अवस्था में आये इसके लिए ऋग्वेद में विस्तृत जानकारी है

  3. Vigyaan ne to saare ishwar wadi dharmo v manyataao ko hilaa kr rakh diya.
    Yuhidi logon ki manyta ka pala vigyaan se pahle pada jb saur mandal me graho ki parikarma ka sahi tathyon ka gyaan mahan vaigyanik “”Nicolas Copernicus “”diyaa. Jise Galileo ne telescope ka avishkar kr siddh bhi kar diya.

    1. Ye gyan to ishwar ne hamen pahle hee diya hai. Kisi Nicolas ne naheen.
      VIgyan kya hai . Vigyan srishti ke niyamon ko yath rup men janana hee to hai .
      jahan tak aapne grahon ke bhraman ki bat ki to vedon se uska reference aapke liye diya hua hai

      अथ पृथिव्यादिलोकभ्रमणविषयः
      अथेदं विचार्य्यते पृथिव्यादयो लोका भ्रमन्त्याहोस्विन्नेति। अत्रोच्यते – वेदादिशास्त्रोक्तरीत्या पृथिव्यादयो लोकाः सर्वे भ्रमन्त्येव। तत्र पृथिव्यादिभ्रमणविषये प्रमाणम् –

      आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्

      मातरं च पुरः पितरं च प्रयन्त्स्वः॥1॥

      -य॰ अ॰ 3। मं॰ 6॥

      भाष्यम् – अस्याभि॰ -‘ आयं गौ ‘ रित्यादिमन्त्रेषु पृथिव्यादयो हि सर्वे लोका भ्रमन्त्येवेति विज्ञेयम्।

      (आयं गौः) अयं गौः पृथिवीगोलः , सूर्यश्चन्द्रोऽन्यो लोको वा , पृश्निमन्तरिक्षमाक्रमीदाक्रमणं कुर्वन् सन् गच्छतीति तथान्येऽपि। तत्र पृथिवी मातरं समुद्रजलमसदत् समुद्रजलं प्राप्ता सती तथा (स्वः) सूर्यं पितरमग्निमयं च पुरः पूर्वं पूर्वं प्रयन्त्सन् सूर्य्यस्य परितो याति। एवमेव सूर्यो वायुं पितरमाकाशं मातरं च तथा चन्द्रोऽग्निं पितरमपो मातरं प्रति चेति योजनीयम्। अत्र प्रमाणानि –

      गौः , ग्मा , ज्मेत्याद्येकविंशतिषु पृथिवीनामसु गौरिति पठितं , यास्ककृते निघण्टौ।

      तथा च –

      स्वः , पृश्निः , नाक इति षट्सु साधारणनामसु पृश्निरित्यन्तरिक्षस्य नामोक्तम् निरुक्ते।

      गौरिति पृथिव्या नामधेयं यद् दूरं गता भवति यच्चास्यां भूतानि गच्छन्ति॥

      -निरु॰ अ॰ 2। खं॰ 5॥

      गौरादित्यो भवति गमयति रसान् गच्छत्यन्तरिक्षे अथ द्यौर्यत् पृथिव्या अधि दूरं गता भवति यच्चास्यां ज्योतींषि गच्छन्ति॥

      -निरु॰ अ॰ 2। खं॰ 14॥

      सूर्य्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्व इत्यपि निगमो भवति सोऽपि गौरुच्यते॥

      -निरु॰ अ॰ 2। खं॰ 9॥

      स्वरादित्यो भवति॥

      -निरु॰ अ॰ 2। खं॰ 14॥

      गच्छति प्रतिक्षणं भ्रमति या सा गौः पृथिवी। अद्भ्यः पृथिवीति तैत्तिरीयोपनिषदि।

      यस्माद्यज्जायते सोऽर्थस्तस्य मातापितृवद् भवति , तथा स्वःशब्देनादित्यस्य ग्रहणात् पितुर्विशेषण- त्वादादित्योऽस्याः पितृवदिति निश्चीयते। यद् दूरं गता , दूरं दूरं सूर्य्याद् गच्छतीति विज्ञेयम्।

      एवमेव सर्वे लोकाः स्वस्य स्वस्य कक्षायां वाय्वात्मनेश्वरसत्तया च धारिताः सन्तो भ्रमन्तीति सिद्धान्तो बोध्यः॥1॥

      भाषार्थ – अब सृष्टिविद्याविषय के पश्चात् पृथिवी आदि लोक घूमते हैं वा नहीं, इस विषय में लिखा जाता है। इस में यह सिद्धान्त है कि वेदशास्त्रों के प्रमाण और युक्ति से भी पृथिवी और सूर्य आदि सब लोक घूमते हैं। इस विषय में यह प्रमाण है-

      (आयं गौः॰) गौ नाम है पृथिवी, सूर्य्य, चन्द्रमादि लोकों का। वे सब अपनी अपनी परिधि में, अन्तरिक्ष के मध्य में, सदा घूमते रहते हैं। परन्तु जो जल है, सो पृथिवी की माता के समान है क्योंकि पृथिवी जल के परमाणुओं के साथ अपने परमाणुओं के संयोग से ही उत्पन्न हुई है। और मेघमण्डल के जल के बीच में गर्भ के समान सदा रहती है और सूर्य उस के पिता के समान है, इस से सूर्य के चारों ओर घूमती है। इसी प्रकार सूर्य का पिता वायु और आकाश माता तथा चन्द्रमा का अग्नि पिता और जल माता। उन के प्रति वे घूमते हैं। इसी प्रकार से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में सदा घूमते हैं।

      इस विषय का संस्कृत में निघण्टु और निरुक्त का प्रमाण लिखा है, उस को देख लेना। इसी प्रकार सूत्रात्मा जो वायु है, उस के आधार और आकर्षण से सब लोकों का धारण और भ्रमण होता है तथा परमेश्वर अपने सामर्थ्य से पृथिवी आदि सब लोकों का धारण, भ्रमण और पालन कर रहा है॥1॥

      या गौर्वर्त्तनिं पर्य्येति निष्कृतं

      पयो दुहाना व्रतनीरवारतः।

      सा प्रब्रुवाणा वरुणाय दाशुषे

      देवेभ्यो दाशद्धविषा विवस्वते॥2॥

      -ऋ॰ अ॰ 8। अ॰ 2। व॰ 10। मं॰ 1॥

      भाष्यम् – ( या गौर्वर्त्तनिं॰) या पूर्वोक्ता गौर्वर्त्तनिं स्वकीयमार्गं (अवारतः) निरन्तरं भ्रमती सती , पर्य्येति विवस्वतेऽर्थात् सूर्यस्य (टिप्पणी- ‘सुपां सुलुगिति’ सूत्रेण विवस्वत इति प्राप्ते विवस्वते चेति पदं जायते॥) परितः सर्वतः स्वस्वमार्गं गच्छति। (निष्कृतं) कथम्भूतं मार्गं ? तत्तद्गमनार्थमीश्वरेण निष्कृतं निष्पादितम्। (पयो दुहाना॰) अवारतो निरन्तरं पयो दुहानाऽनेकरसफलादिभिः प्राणिनः प्रपूरयती तथा (व्रतनीः) व्रतं स्वकीय- भ्रमणादिसत्यनियमं प्रापयन्ती (सा प्र॰) दाशुषे दानकर्त्रे वरुणाय श्रेष्ठकर्मकारिणे देवेभ्यो विद्वद्भ्यश्च हविषा हविर्दानेन सर्वाणि सुखानि दाशत् ददाति। किं कुर्वती ? प्रब्रुवाणा सर्वप्राणिनां व्यक्तवाण्या हेतुभूता सतीयं वर्त्तत इति॥2॥

      भाषार्थ – (या गौर्व॰) जिस जिस का नाम ‘गौ’ कह आये हैं, सो सो लोक अपने-अपने मार्ग में घूमता और पृथिवी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमती है। अर्थात् परमेश्वर ने जिस जिस के घूमने के लिए जो जो मार्ग निष्कृत अर्थात् निश्चय किया है, उस उस मार्ग में सब लोक घूमते हैं (पयो दुहाना॰) वह गौ अनेक प्रकार के रस, फल, फूल, तृण और अन्नादि पदार्थों से सब प्राणियों को निरन्तर पूर्ण करती है तथा अपने अपने घूमने के मार्ग में सब लोक सदा घूमते घूमते नियम ही से प्राप्त हो रहे हैं। (सा प्रब्रुवाणा॰) जो विद्यादि उत्तम गुणों का देनेवाला परमेश्वर है, उसी के जानने के लिए सब जगत् दृष्टान्त है और जो विद्वान् लोग हैं उन को उत्तम पदार्थों के दान से अनेक सुखों को भूमि देती और पृथिवी, सूर्य, वायु और चन्द्रादि गौ ही सब प्राणियों की वाणी का निमित्त भी है॥2॥

      त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु

      द्यावापृथिवी आ ततन्थ।

      तस्मै त इन्द्रो हविषा विधेम

      वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥3॥

      -ऋ॰ अ॰ 6। अ॰ 4। व॰ 13। मं॰ 13॥

      भाष्यम् – ( त्वं सोम॰) अस्याभिप्रा॰ – अस्मिन् मन्त्रे चन्द्रलोकः पृथिवीमनुभ्रमतीत्ययं विशेषोऽस्ति।

      अयं सोमश्चन्द्रलोकः पितृभिः पितृवत्पालकैर्गुणैः सह संविदानः सम्यक् ज्ञातः सन् भूमिमनुभ्रमति। कदाचित् सूर्य्यपृथिव्योर्मध्येऽपि भ्रमन् सन्नागच्छतीत्यर्थः। अस्यार्थं भाष्यकरणसमये स्पष्टतया वक्ष्यामि।

      तथा ‘ द्यावापृथिवी एजेते ‘ इति मन्त्रवर्णार्था द्यौः सूर्यः पृथिवी च भ्रमतश्चलत इत्यर्थः। अर्थात् स्वस्यां स्वस्यां कक्षायां सर्वे लोका भ्रमन्तीति सिद्धम्॥3॥

      ॥इति पृथिव्यादिलोकभ्रमणविषयः संक्षेपतः॥

      भाषार्थ – (त्वं सोम॰) इस मन्त्र में यह बात है कि चन्द्रलोक पृथिवी के चारों ओर घूमता है। कभी कभी सूर्य और पृथिवी के बीच में भी आ जाता है। इस मन्त्र का अर्थ अच्छी तरह से भाष्य में करेंगे।

      तथा (द्यावापृथिवी) यह बहुत मन्त्रों में पाठ है कि द्यौः नाम प्रकाश करने वाले सूर्य आदि लोक और जो प्रकाशरहित पृथिवी आदि लोक हैं, वे सब अपनी अपनी कक्षा में सदा घूमते हैं। इस से यह सिद्ध हुआ कि सब लोक भ्रमण करते हैं॥3॥

      ॥इति संक्षेपतः पृथिव्यादिलोकभ्रमणविषयः॥9॥

  4. Priy mitro,tark se bhagvan ko paya ja skta to abhi tk sare tark vageesh sachhidanand Param bramh me leen ho gye hote,mera jhan tk experience hai mai khta hu ki jb manushya ka iss Sansar me kisi bhi trah ka saar nhi rhta tb use srashti ke mool source ki anubhuti prapt hoti hai,asar ko hi adhyatm me detachment Kha jata hai,iska ek kram hai-satsang-vairagya-vivek-tatvgyan aur isse mool source me aatma rupi manushya ka vilay ho jana,bss abhi itna purn gyan hai,contact number-7355671954,jai sachhidanandghan vigrah bhagvan sree Krishnachand Prabhu ki Jai.

    1. Saurabh Tiwari जी
      तर्क तो सभी करते हैं मगर कोई उस बात को स्वीकार नहीं करता | यदि तर्क नहीं करते तो यह बात कोई नहीं कहता | चलो कुछ उदाहरन देकर समझाता हु आपको पौराणिक आधार पर बतलाता हु | जैसे कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत एक अंगुली में उठा लिया यह अपने गुरु और परिवार से सुन लिया और बोला हां उन्होंने ऐसा किया होगा इसे ही तर्क करना बोला जाता है | हनुमान जी ने सूर्य को अपने मुह में निगल लिया था ऐसा आपको बोला और उसे आपने बोला अच्छा हनुमान जी ने ऐसा किया था जवाब मिलता है हां | यह सब तर्क करना नहीं हुवा तो क्या हुवा भाई | तर्क सभी करते हैं मगर उसे उस बात को स्वीकार नहीं करते | कृष्ण जी ने अर्जुन को ज़िंदा कर दिया और इसे आप स्वीकार करते हो बोलते हो कृष्ण जी की कितनी क्षमता है जो अर्जुन को जिन्दा कर दिया | यह सब तर्क करना नहीं तो क्या है भाई थोडा बतलाना |

  5. जीवतात्मा को क्यों जन्मो के सुख दुख को भोगना पड़ता है???
    जीवतात्मा कहा से उतपन्न हुई है?????

    1. जीवात्मा प्रकृति और इश्वर अनादि हैं और जन्म मृत्यु से परे हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *