शारीरिक रंग का वर्णों से सबन्ध : एक भ्रान्ति: डॉ सुरेन्द्र कुमार

वर्णों की संरचना-प्रक्रिया तथा वर्णव्यवस्था के इतिहास को न जानने-समझने वाले कुछ कथित लेखकों ने जाने या अनजाने में एक भ्रान्ति फैला दी है कि वर्णों का निर्धारण शरीर के वर्ण के आधार पर किया गया था, अथवा होता था। यह भ्रान्ति जिन संदर्भों के आधार पर उत्पन्न हुई है उनको गभीरता से न तो समझा गया है और न उस पर चिन्तन किया गया है। यदि किसी संस्कृत के ग्रन्थ में भी यह बात कही गयी है तो वह भी मिथ्या चिन्तन का परिणाम है।

वस्तुतः, जहां कहीं वर्णों के संदर्भ में शारीरिक वर्णों (रंगों) की चर्चा है वह केवल प्रतीकात्मक है। यह प्रतीकात्मकता पुराकाल में भी रही है और आज भी है। जैसे, तिरंगे ध्वज में तीनों रंग एक-एक विशेषता के प्रतीक हैं। केसरिया त्याग का, सफेद शान्ति का, हरा समृद्धि का प्रतीक है। काला धन, सफेद धन, लाल झंडा, पीत पत्रकारिता, सड़कों पर लगी तीन रंगों की बत्तियां, गाड़ियों पर लगी लाल-पीली हरी बत्तियां आदि सभी प्रतीक हैं किसी भाव या गुण की। आज भी जब यह कहा जाता है कि ‘यह आदमी काले दिल का है’ या ‘बड़ा काला है’ तो उसका अभिप्राय शरीर के रंग से नहीं होता अपितु उसकी प्रकृति की विशेषता को व्यक्त करता है। इसी प्रकार चारों वर्णों की मूल प्रकृति को कभी-कभी रंगों की प्रतीकात्मकता के द्वारा व्यक्त किया जाता रहा है। वहां वर्णानुसार शरीर के रंग से अभिप्राय नहीं है।

वर्णों के साथ शरीर के रंगों का सबन्ध इतिहास-परपरा से भी गलत सिद्ध होता है। विष्णु, लक्ष्मण गौरवर्ण थे, फिर भी क्षत्रिय थे। शिव, राम, कृष्ण, काले रंग के थे, किन्तु क्षत्रिय थे। महर्षि वेदव्यास गहरे काले रंग के थे, किन्तु ब्राह्मण थे। ऐसे अनेक उदाहरण पाये जाते हैं। अतः यह बात सर्वथा गलत है कि रंग के आधार कभी वर्ण-निश्चय किया जाता था। यह संभव भी नहीं है। मनु ने सपूर्ण मनुस्मृति में रंग-आधारित वर्णव्यवस्था के निर्माण की कहीं चर्चा भी नहीं की है। उन्होंने केवल गुण-कर्म-योग्यता को वर्णनिर्धारण का आधार माना है।

महाभारत में जो श्लोक वर्णों के रंग का वर्णन कर रहा है, वह प्रतीकात्मक है। वहां यह कहा गया है कि पहले एक वर्ण ब्राह्मण वर्ण ही था। सभी ब्राह्मण थे। उनमें से रक्तवर्ण क्षत्रिय बने, पीत वैश्य बने, कृष्णवर्ण शूद्र बने। ‘वर्णों (रंगों) के आधार पर वर्ण बने,’ इसका सही अभिप्राय यह स्पष्ट हो रहा है कि स्वभावगत विशेषताओं के आधार पर उनमें से अन्य वर्ण बने। यदि उन श्लोकों का प्रतीकार्थ नहीं मानेंगे तो पहले-पिछले श्लोकों में विरोध उपस्थित होगा। पहले श्लोक में सभी ब्राह्मण-वर्णस्थों को ‘उजले’ रंग का कहा है। जब सभी उजले-गोरे रंग के थे तो उनमें से लाल, पीले, काले कहां से उत्पन्न हो गये? इस विरोध का समाधान प्रतीकार्थ द्वारा ही संभव है। वह श्लोक यह है-

ब्राह्मणानां सितो वर्णः क्षत्रियाणां च लोहितः।

वैश्यानां पीतको वर्णः शूद्राणामसितं तथा॥

(महाभारत, शान्तिपर्व 188.5 तथा आगे)

    अर्थ-‘ब्राह्मणों का उजला (गोरा) रंग है। क्षत्रियों का लाल रंग है। वैश्यों का पीला रंग है। शूद्रों का असित=काला या मैला रंग है।’ यहां सफेद या उजला रंग ज्ञान का, लाल रंग वीरता का, पीला समृद्धि का, और काला अज्ञान का प्रतीक है। आज भी इन विशेषताओं के प्रतीक यही रंग हैं। चारों वर्णों की यह प्रतीकात्मकता ही आधारभूत विशेषता है।

इसकी पुष्टि में एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण उपलध है। शाल्मलि द्वीप नामक देश में तो चारों वर्णों के नाम ही रंगों की प्रतीकात्मकता के आधार पर प्रचलित थे-

शाल्मले ये तु वर्णाश्च वसन्ति ते महामुने॥

कपिलाश्चारुणाः पीताः कृष्णाश्चैव पृथक्-पृथक्।

ब्राह्मणाः क्षत्रियाः वैश्याः शूद्राश्चैव यजन्ति ते॥

(विष्णुपुराण 2.4.12, 13)

    अर्थ-यहां ब्राह्मणों का सफेद के स्थान पर भूरा रंग बताया है। कहा है-‘शाल्मलि द्वीप में ब्राह्मणों का कपिल, क्षत्रियों का अरुण, वैश्यों का पीत और शूद्रों का कृष्ण नाम प्रचलित है। वे चारों वर्ण यज्ञानुष्ठान करते हैं।’

भागवतपुराण के निम्नलिखित श्लोक में तो कृष्ण रंग को शूद्र के पर्याय-रूप में ही प्रयुक्त किया है। जो यह सिद्ध करता है कि यह लाक्षणिक नाम है-

‘‘ब्रह्माननं क्षत्रभुजो महात्मा विडूरूरङ्घिश्रितः कृष्णवर्णः’’

(2.1.37)

    अर्थात्-‘उस महान् पुरुष के मुख में ब्राह्मण वर्ण, भुजाओं में क्षत्रिय वर्ण, जंघाओं में वैश्य और चरणों में कृष्णवर्ण अर्थात् शूद्र वर्ण का निवास है।’ यहां स्पष्ट हो रहा है कि वर्णों की मुय प्रकृति के आधार पर यह रंग-आधारित नामकरण प्रचलित हुआ। आज भी व्यक्तियों के कपिल, अरुण, कृष्ण नाम प्रायः मिलते हैं, वस्तुतः वे भूरे, लाल, काले नहीं होते। वहां लाक्षणिक प्रतीकार्थ ही अभिप्रेत हुआ करता है। अतः पाठकों को रंग-आधारित वर्णव्यवस्था की भ्रान्ति में नहीं पड़ना चाहिए। ऐसी भ्रान्ति से ग्रस्त लेखक, बुद्धिमानों में साहित्यज्ञान से रहित और विचारशून्य माने जाते हैं।

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