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शम्बूक वध का सत्य

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शम्बूक वध का सत्य 

लेखक – स्वामी विद्यानंद सरस्वती

एक दिन एक ब्राह्मण का इकलौता लड़का मर गया । उस ब्राह्मण के लड़के के शव को लाकर राजद्वार पर डाल दिया और विलाप करने लगा । उसका आरोप था कि अकाल मृत्यु का कारण राजा का कोई दुष्कृत्य है । ऋषी मुनियों की परिषद् ने इस पर विचार करके निर्णय किया कि राज्य में कहीं कोई अनधिकारी तप कर रहा है क्योंकि :-

राजा के दोष से जब प्रजा का विधिवत पालन नहीं होता तभी प्रजावर्ग को विपत्तियों का सामना करना पड़ता है ।  राजा के दुराचारी होने पर ही प्रजा में अकाल मृत्यु होती है ।  रामचन्द्र  जी ने इस विषय पर विचार करने के लिए मंत्रियों को बुलवाया ।  उनके अतिरिक्त वसिष्ठ नामदेव मार्कण्डेय गौतम नारद और उनके तीनों भाइयों को भी बुलाया । ७३/१

तब नारद ने कहा :

राजन ! द्वापर में शुद्र का तप में प्रवृत्त होना महान अधर्म है ( फिर त्रेता में तो उसके तप में प्रवृत्त होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता ) निश्चय ही आपके राज्य की सीमा पर कोई खोटी बुध्दी वाला शुद्र तपस्या कर रहा  है।  उसी के कारन बालक की मृत्यु हुयी है।  अतः आप अपने राज्य में खोज करिये और जहाँ कोई दुष्ट कर्म होता दिखाई दे वहाँ उसे रोकने का यत्न कीजिये ।  ७४/८ -२८,२९ , ३२

यह सुनते ही रामचन्द्र पुष्पक विमान पर सवार होकर ( वह तो अयोध्या लौटते ही उसके असली स्वामी कुबेर को लौटा दिया था  – युद्ध -१२७/६२ )  शम्बूक की खोज  में निकल पड़े (७५/५ ) और दक्षिण दिशा में शैवल  पर्वत के उत्तर भाग में एक सरोवर पर तपस्या करते हुए एक तपस्वी मिल गया देखकर राजा श्री रघुनाथ जी उग्र तप करते हुए उस तपस्वी के पास जाकर बोले – “उत्तम तप का पालन करने वाले तापस ! तुम धन्य हो ।  तपस्या में बड़े चढ़े  सुदृढ़ पराक्रमी परुष तुम किस जाती में उत्पन्न हुए हो ? में दशरथ कुमार राम तुम्हारा परिचय जानने के लिए ये बातें पूछ रहा हूँ ।  तुम्हें किस वस्तु के पाने की इच्छा है ? तपस्या  द्वारा संतुष्ट हुए इष्टदेव से तुम कौनसा वर पाना चाहते हो – स्वर्ग या कोई दूसरी वस्तु ? कौनसा ऐसा पदार्थ है जिसे पाने के लिए तुम ऐसी कठोर तपस्या कर रहे हो  जो दूसरों के लिए दुर्लभ है।  ७५-१४-१८

तापस ! जिस वस्तु के लिए तुम तपस्या में लगे हो उसे में सुनना चाहता हूँ ।  इसके सिवा यह भी बताओ  कि तुम ब्राह्मण हो या अजेय क्षत्रिय ? तीसरे वर्ण के वैश्य हो या शुद्र हो ?

क्लेशरहित कर्म करने वाले भगवान् राम का यह वचन सुनकर नीचे मस्तक करके लटका हुआ तपस्वी बोला – हे श्रीराम ! में झूठ नहीं बोलूंगा देव लोक को पाने की इच्छा से ही तपस्या में लगा हूँ ! मुझे शुद्र ही जानिए मेरा  नाम शम्बूक  है ७६,१-२

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि रामचंद्र जी ने तलवार निकली और उसका सर काटकर फेंक दिया ७६/४ |

शाश्त्रीय व्यवस्था है – न ही सत्यातपरो धर्म : नानृतातपातकम् परम ” एतदनुसार मौत के साये में भी असत्य भाषण न करने वाला शम्बूक धार्मिक पुरुष था।  सत्य वाक्  होने के महत्व  को दर्शाने वाली एक कथा छान्दोग्य उपनिषद में इस प्रकार लिखी है – सत्यकाम जाबाल जब गौतम गोत्री हारिद्र मुनिके पास शिक्षार्थी होकर पहुंचा तो मुनि ने उसका गोत्र पूछा । उसने कहा कि में नहीं जनता मेरा गोत्र क्या है मेने अपनी माता से पूछा था ।  उन्होंने  उत्तर दिया था कि युवावस्था में अनेक व्यक्तियों की सेवा करती रही ।  उसी समय तेरा जन्म हुआ इसलिए में नहीं जानती कि तेरा गोत्र क्या है ।  मेरा नाम सतीकाम है।  इस पर मुनि ने कहा – जो ब्राह्मण न हो वह ऐसी सत्य बात नहीं कह सकता।  वह शुद्र और इस कारण मृत्युदंड का अपराधी कैसे हो सकता था ?

शम्बूक में आचरण सम्बन्धी कोई दोष नहीं बताया गया इसलिए वह द्विज ही था।  काठक संहिता में लिखा है – ब्राह्मण के विषय में यह क्यों पूछते हो कि उसके माता पिता कौन हैं यदि उसमें ज्ञान और तदनुसार आचरण है तो वे ही उसके बाप दादा हैं। करण ने सूतपुत्र होने के कारन स्वयंवर में अयोग्य ठहराए जाने पर कहा था कि जन्म देना तो ईश्वराधीन है परन्तु पुरुषार्थ के द्वारा कुछ बन जाना मनुष्य के अपने वश में है।

आयस्तम्ब सूत्र में कहा है –

धर्माचरण से न्रिकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है जिसके वह योग्य हो।  इसी प्रकार अधर्माचरण से पूर्व अर्थात उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने से नीचे नीचे वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जाता है।  मनुस्मृति में कहा है –

जो शूद्रकुल में उप्तन्न होक ब्राह्मण के गुण कर्म स्वभाववाला हो वह ब्राह्मण बन जाता है।  इसी प्रकार ब्राह्मण कुलोत्पन्न होकर भी जिसके गुण कर्म स्वभाव शुद्र के सदृश्य हों वह शुद्र हो जाता है  मनु १०/६५

चारों वेदों का विद्वान किन्तु चरित्रहीन ब्राह्मण शुद्र से न्रिकृष्ट होता है , अग्निहोत्र करने वाला जितेन्द्रिय ही ब्राह्मण कहलाता है ।  महाभारत – अनुगीता पर्व ९१/३७ )

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शुद्र सभी तपस्या के द्वारा स्वर्ग प्राप्त करते हैं ब्राह्मण और शुद्र का लक्षण करते हुए वन पर्व में कहा है – सत्य दान क्षमा शील अनुशंसता तप और दया जिसमे हों ब्राह्मण होता है और जिसमें ये न हों शुद्र कहलाता है।  १८०/२१-२६

इन प्रमाणो से स्पष्ट है कि वर्ण व्यवस्था का आधार गुण कर्म स्वाभाव है जन्म नहीं और तपस्या करने  का अधिकार सबको प्राप्त है।

गीता में कहते हैं – ज्ञानी जन विद्या और विनय से भरपूर ब्राह्मण गौ हाथी कुत्ते और चंडाल सबको समान भाव से देखते अर्थात सबके प्रति एक जैसा व्यवहार करते हैं ।  गीता ५/१८

महर्षि वाल्मीकि को रामचन्द्र  जी का परिचय देते हुए नारद जी ने बताया – राम श्रेष्ठ सबके साथ सामान व्यवहार करने वाले और सदा प्रिय  दृष्टिवाले थे । तब वह तपस्या जैसे शुभकार्य में प्रवृत्त शम्बूक की शुद्र कुल में जन्म लेने के कारन हत्या कैसे कर सकते थे ? (बाल कांड १/१६ ) इतना ही नहीं श्री कृष्ण ने कहा ९/१२- ,मेरी शरण में आकर स्त्रियाँ  वैश्य शुद्र अन्यतः अन्त्यज आदि पापयोनि तक सभी परम गति अर्थात मोक्ष को प्राप्त करत हें ।

इस श्लोक पर टिप्पणी करते हुये लोकमान्य तिलक स्वरचित गीता रहस्य में लिखत हैं “पाप योनि ” शब्द से वह जाती विवक्षित जिसे आजकल जरायस पेशा कहते हैं । इसका अर्थ यह है कि इस जाती के लोग भी भगवद भक्ति से सिध्दि प्राप्त करते हैं ।

पौराणिक लोग शबरी को निम्न जाती की स्त्री मानते हैं ।  तुलसी दास जी ने तो अपनी रामायण में यहाँ तक लिख दिया – श्वपच शबर खल यवन जड़ पामरकोलकिरात “. उसी शबरी के प्रसंग में वाल्मीकि जी ने लिखा है  – वह शबरी सिद्ध जनों से सम्मानित तपस्विनी थी | अरण्य ७४/१०

तब राम तपस्या करने के कारण शम्बूक को पापी तथा इस कारण प्राणदण्ड का अपराधी कैसे मान सकते थे ?

राम पर यह मिथ्या आऱोप महर्षि वाल्मीकि ने नहीं उत्तरकाण्ड की रचना करके वाल्मीकि रामायण में उसका प्रक्षेप करने वाले ने लगाया है ।

शायद मर्यादा पुरुषोत्तम के तथोक्त कुकृत्य से भ्रमित होकर ही आदि शंकराचार्य ने शूद्रों के लिए वेद के अध्यन श्रवणादि का निषेध करते हुए वेद मन्त्रों को श्रवण करने वाले शूद्रों के कानो में सीसा भरने पाठ करने वालों की जिव्हा काट डालने और स्मरण करने वालों के शरीर के टुकड़े कर देने का विधान किया ।  कालांतर में शंकर का अनुकरण करने वाले रामानुचार्य निम्बाकाचार्य आदि ने इस व्यवस्था का अनुमोदन किया ।  इन्ही से प्रेरणा पाकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में आदेश दिया –

पुजिये विप्र शीलगुणहीना, शुद्र न गुण गण ज्ञान प्रवीना।  अरण्य ४०/१

ढोर गंवार शुद्र पशु नारी , ये सब ताडन के अधिकारी।  लंका ६१/३

परन्तु यह इन आचार्यों की निकृष्ट अवैदिक विचारधारा का परिचायक है ।  आर्ष साहित्य में कहीं भी इस प्रकार का उल्लेख नहीं मिलता ।  परन्तु इन अज्ञानियों के इन दुष्कृत्यों का ही यह परिणाम है कि करोड़ों आर्य स्वधर्म का परित्याग करके विधर्मियों की गोद में चले गए ।  स्वयं शंकर की जन्मभूमि कालड़ी में ही नहीं सम्पूर्ण केरल में बड़ी संख्या में हिन्दू लोग ईसाई और मुसलमान हो गये और अखिल भारतीय स्थर पर देश के विभाजन का कारन बन गए और यदि शम्बूक का तपस्या करना  पापकर्म था तो उसका फल = दण्ड  उसी को मिलना  चाहिए था ।  परन्तु यहाँ अपराध तो किया शम्बूक ने और उसके फल स्वरुप मृत्यु दण्ड  मिला ब्राह्मण पुत्र को और इकलौते बेटे की मृत्यु से उत्पन्न शोक में ग्रस्त हुआ उसका पिता।  वर्तमान में इस घटना के कारण राम पर शूद्रों पर अत्याचार करने और सीता वनवास के कारण स्त्री जाति पर ही नहीं, निर्दोषों के प्रति अन्याय करने के लांछन लगाये जा रहे हैं ।  कौन रहना चाहेगा ऐसे रामराज्य में ?

22 thoughts on “शम्बूक वध का सत्य”

  1. शीशे का आविष्कार कब हुआ ऐसे झूठे आरोप सही नहीं है
    शबरी के झूठे बैर खाना नहीं दिखाई दिया उनको
    बाल्मीकि भी उच्च कुल से नहीं थे

    1. मानवी जी क्या गलत जानकारी दी गयी है जी इसे आप बतलाना | चलो आपको पौराणिक हिसाब से ही जवाब देता हु आपने रामानंद सागर की रामायण देखि होगी जो पौराणिक हिसाब से बनायीं गयी थी आप पौराणिक हो शायद इस कारण पौराणिक हिसाब से जवाब दे रहा हु उस रामायण में यह जानकारी दी गयी थी की वाल्मीकि ब्रह्मा के पुत्र थे तो फिर निम्न कुल के कैसे हुए | ये बताना पौराणिक हिसाब से आप | फिर होगा तो बताऊंगा की वाल्मीकि निम्न कुल के नहीं थे | इसमें सबरी का कोई जिक्र नहीं फिर आप क्यों कर रहे हो | कान में सीसा डालना एक उपमा या मुहावरा है जी | थोडा मुहावरा उपमा को समझने की भी कोशिस करो जी | लेखक कई बार उपमा मुहावरा का इस्तेमाल करता है | कोई बोल देता है तेरे लिए चाँद तारे तोड़ लाऊंगा इसका मतलब यह थोड़े होता है की वह हकीकत में चाँद तारे तोड़ लाएगा | वो तो बस मुहावरा और उपमा का इस्तेमाल करता है | शायद अब आप मेरी बात को समझ गए होंगे | धन्यवाद |

      1. अमित जी आपसे एक विनती करूँगा जी
        अगर वाल्मीकि ब्रह्मा के पुत्र थे तो वो ब्राह्मण हुए तो ब्राह्मण लोग वाल्मीकि को क्यों नहीं मानते ओर क्यों नहीं वाल्मीकि की पूजा करते राम राम क्यों करते सुबह उठ कर जय वाल्मीकि क्यों नहीं कहते क्योंकि राम का अस्तित्व वाल्मीकि के कारण था ओर है ओर रहेगा तो ब्रहमनो के मन्दिर में वाल्मीकि की प्रतिमा मूर्ति क्यों नहीं उनकी पूजा अर्चना क्यों नहीं
        जय भीम जय भारत जी

        1. प्रिय मित्र करण जी,

          मूर्ति पूजा तो वेद विरुद्ध है
          जो लोग मूर्ति पूजा करते हैं वो वेद विरुद्ध कार्य कर रहे हैं चाहे हो जाने में हो या अन जाने में

          वाल्मीकि तो ऋषि थे ब्राहमण थे
          ब्राहमण ज्ञान के आधार पर होता है जन्म के आधार पर नहीं
          यदि निम्न कुल में जन्में व्यक्ति के कर्म ब्राहमण के हैं तो वह ब्राहमण कहलायेगा जैसे वाल्मीकि जाबाल ऋषि वेद व्यास इत्यादि
          और यदि उच्च कुल में उत्पन्न हुए व्यक्ति के कर्म निम्न श्रेणी के हैं तो वह शुद्र कहलायेगा जैसे रावन
          आशा है आपकी शंका का समाधान हो गया होगा
          नमस्ते

      2. किस रामायण को सही कहा जाये जिसमें राम ने सीता को वन में जाने के लिए मजबूर किया या उस रामायण को जिसमे राम ने दलित जाति के शंबुक तेली का वध किया क्योंकि वह नीच जाति का होकर तपस्या कर रहा था

        1. “स्वामी जगदीश्वरानन्द जी ki bhashy ramayan parhe…. jo aap batla rahe hain sab galat hai milawat ki gayi hai…

          1. बाल्मीकी रामायण उत्तर कांड सरग 74 शलोक 25,26,28, सरग 75 शलोक 18, सरग 76 शलोक 2,3,4, पढें़

            1. bhai ramayan mahabharat geetaa ityaadi me bahut milawat kar di gayi hai… aap jo praman de rahe ho wah parkshipt ramayan se praman de rahe ho aur yah pauranik ramayan hai arshy ramayan me aisa kuch nahi hai… jagdishwaranand ji naam hai shayad inka ramayan parhe ..dhanywaad

  2. isase siddha hota hai ki bhagawan log bhi jatiwad karate the .sita ko tyagagna ,bali ko chhopakar marana ,rawan ko bhibhishan ke adesh par marana,itis not quality of exellent person

    1. Saroj JI , Ishwar kabhee janm naheen leta
      wah sarv shaktimaan hai use janm lene ki aawashyakta kyon?
      aur rahee ishwar dwara jati bhed ki baat wo bhee galat hia . ishwar ne sabhee adhikar sabhee manushyon ko diye hein
      kabhee kisee vastu adhikar ke liye bhed bhav naheen kiya
      jo log ishwar ke nam lekar aisa karte hein to ishwar ki vyvastha ke vipreet karya karte hein

  3. Main raam ko bhagwan nahi manta kyonki agar koi bhagwan h to usake liye to sab brabar h kya shudr or kya Brahman.
    Ye sab dhong chal raha h.
    Mere hisaab se raam sirf ayodhya ke raja hi the.
    Jo adhiktr logo ki pasand the isase jyada kuchh nahi.
    Kyonki bhagwan kisi ke saath anyay nahi kar sakte.usake liye puri manushy prajati ek h jaise ki any prajati.

  4. Bahut confuse ho gyaa hoon sab padkar main bas ek choti c baat likhna chaahta hoon
    Ek baar ek aurat ne apni beti se poochha ke tumhe kaisa bhai chahiye?
    Us bacchi ne jwaab diyaa ,” mujhe Raavan jaisa bhai chahiye”.
    Uski maa ne usko daanta aur baap ne bhi bahut daanta ke Raavan jaisa nahi Ram jaisa kaho.
    Us chhoti bacchi ne kaha Ke Mujhe to Raavan jaisa hi bhai chahiye jo apni behan ke apmaan ka badla lene ke liye apna sarvasv daao par laga de jo apne poore parivaar ka balidaan kar de aur shatru ki stri ko uthakar bhi uski iccha ke virudh uske saath kuchh bhi na kare.
    Na ke raam jaisa jo apni stri ki agni pariksha lene k baad bhi usko banwaas ke liye bhej de.

    1. संदीप सहोता जी
      उलझन में पड़ने की कोई बात है ही नहीं जी | रामायण महाभारत और भी जितने ग्रन्थ हैं सभी में मिलावट की गयी है जी | आप रामायण और उसकी भ्रान्तिया शायद पुस्तक का नाम है ठीक से याद नहीं आ रहा उसे पढ़े आपको सारे शंका का समाधान हो जाएगा | और जो यह सवाल आपने रखा है इसका जवाब अब आपको दे रहा हु | आजकल समय की आभाव होने के कारण समय पर जवाब नहीं दे पाता | यह आपने पौराणिक हिसाब से सवाल उठाया है जिसका जवाब मैं आपको पौराणिक हिसाब से ही दे रहा हु | रावण का भाई था जिसका नाम कुबेर था रावण ने कुबेर की पत्नी की बलात्कार किया था ऐसा कुछ ग्रन्थ में लिखा है कुबेर की पत्नी या कुबेर ने रावण को श्राप दिया की अब यदि तुमने अब किसी भी औरत को उसकी मर्जी के बिना विवाह या जबरदस्ती बलात्कार किया तो तुम्हारे सिर के १० टुकडे हो जायेंगे इस कारण रावण ने अपनी मौत से बचने के लिए बलत्कार करना बंद कर दिया | यह रावण कैसा रावण जो अपने भाई की पत्नी का बलत्कार करे ? अब दूसरी बात हम सभी के ग्रन्थ में लिखा है की दूसरी की बहन को अपनी बहन समझो दूसरी की माता को अपनी माता समझो | फिर रावण ने इन सभी का नियम तोड़ा | रावण ने सीता का अपहरण कर अपना स्वार्थ पूर्ति के लिए किया ना की अपनी बहन के कारण | और दूसरी बात दुसरे की औरत को माता के सामान समझो ऐसा है तो फिर रावण ने वैसा क्यों अपहरण किया ? थोडा अपना अकल लगाए जी |क्या किसी की माता बहन पत्नी का अपहरण करना सही है ? और जब यह बोला गया है की दूसरी की माता बहन को अपनी माता बहन समझो और दूसरी की पत्नी को अपनी माता या बहन समझो फिर अपहरण कर क्या रावण ने सही किया ? क्या उस हिसाब से सीता रावण की माता बहन नहीं हुयी ? फिर अपहरण कैसे और क्यों किया ? यह जानकारी हमें देना जी ? यह जानकारी पौरानिक हिसाब से दिया | आप रामायण और उसकी भ्रान्तिया पढ़ें आपको सारे शंका का सामाधान मिल जाएगा | धन्यवाद |

    2. Sandeep bhai,

      Kya ek aisa bhai sahi rahega jo bahen ki galat harkat ko sahi thehrakar dusro se ladne ke liye jaye. Kahi jagah par ye bhi likha hai Ravan marte marte Ram ka naam le raha tha(Satya ki pushti nahi kee gayee). Haa ye satya hai kee Ravan ek pandit aur mahagyani tha, par ek ghamandi aur charitraheen vyakti bhi tha. Aisa bhai chalega kisi behan ko.

      Thoda vichar jarur karna.

      – Dhanyawad

  5. pehle aary aaye ki bhagwaan kyoki jatiya to aaryo ne banai he iska matlab bhagwan v unki baat se sehmat the to inki pooja karna band karo aaryo ko poojo

    1. pahle yah bataye ki aary kise bolte hain??? bhagwaan kise bolte hain…. fir is par charchaa ki jaayegi… aur yah bhi batlana aap kaun se mat ke ho ???
      dhanywaad

  6. ek baat ka jabaab chahiye ki aaryo ne jatiya kyo banayi kis karan se banai koi to wajeh hogi jaha sab ek saman the waha jatiya kis karan se bani or or kis karan se shudro ko achuta kaam karna pada
    muje iska jabab de fir me jabab duga

    1. janab pahle aary kise bolte hain use samjho fir charchaa karenge…. aur jaati kisane banayi ye sab bhi tab samajh me aayegi…. apana paksh rakhe fir charchaa ki jaayegi… aap varn vayvasthaa article parhe bahut jaankaari milegi… dhanywaad

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