सच्ची रामायण की पोल खोल-५

*सच्ची रामायण की पोल खोल-५
अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
 कार्तिक अय्यर
   ।। ओ३म।।
धर्मप्रेमी सज्जनों! सादर नमस्ते । पिछले लेख में हमने पेरियार के पांच आक्षेपों का जवाब दिया। अब आगे:-
 *प्रश्न ५राम और सीता में कोई किसी प्रकार की कोई दैवी तथा स्वर्गीय शक्ति नहीं है।आगे लिखा है कि आर्यों(गौरांगों)ने स्वतंत्रता के बाद उनके नामों से देवता गढ़ लिये।तमिलनाडु की जनता को चाहिये कि तमिल नाडु के विचारों और सम्मान को दूषित करने वाली आर्यों की सभ्यता मिटा देने की शपथ लें*
समीक्षा:- श्रीराम चंद्र और सीता में दैवीय गुण न थे-यह कहना कोरा अज्ञान है।यदि रामायण के नायक में धीरोदत्त गुण न होते तो रामायण रची ही क्यों जाती?श्रीराम में कितने सारे दिव्य गुण थे तथा वे आप्तकाम थे।यदि पक्षपातरहित होकर रामायण पढ़ते तो ७० पृष्ठों की रंगाई-पुताई नहीं करते। ये देखिये,श्रीराम के दिव्य गुणों की झलकियां:-
 ” वे श्रीराम बुद्धि मान,नीतिज्ञ,मधुरभाषी,श्रीमान,शत्रुनाशक,ज्ञाननिष्ठ,पवित्र,जितेंद्रिय और समाधि लगाने वाले कहा गया है। (बालकांड सर्ग १ श्लोक ९-१२)
 उसी प्रकार मां सीता को भी पतिव्रता, आर्या आदि कहा गया है। सार यह है कि श्रीराम व मां सीता में दिव्य गुण थे।हां,यदि स्वर्गीय शक्ति और दैवी शक्ति का तात्पर्य आप असंभव चमत्कार आदि से ले रहे हैं तो वे दोनों में नहीं थे।
देखिये प्रबुद्ध पाठकजनों!मेरे प्यारे परंतु भोलेभाले मूलनिवासी भाइयों! पेरियार साहब आर्यों को विदेशी मानते हैं पर डॉ अंबेडकर शूद्र तक को आर्य व भारत की मूल सभ्यता मानते हैं (पढ़िये ‘शूद्र कौन थे?’-लेखक डॉ अंबेडकर) ।दोनों में से आप किस नेता की बात मानेंगे?
आर्यों ने खुद को देवता नहीं कहा बल्कि दिव्य गुण धारण करने वाले विद्वान देवता कहलाते हैं,फिर वे चाहे जिस किसी मत,देश,भाषा से संबंधित हो।
 तमिल जनता को गुमराह करने का आपका उद्देश्य कभी सफल नहीं होगा।आर्यसभ्यता सत्य,विद्या,धर्म की सभ्यता है।भारत की मूल संस्कृति है।न तो तमिल की सभ्यता अलग है न आर्यों की।दोनों एक ही है।*आर्य सभ्यता को मिटाने की शपथ लेना लेखक की विक्षिप्त मनोदशा बताता है।*लेखक विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता,जो “आत्मवत् सर्वभूतेषु ,मनुर्भव,” वसुधैव कुटुंबकम्” पर आधारित है,को मिटाना चाहता है।इसका कारण या तो लेखक का मिथ्याज्ञान है या फिर स्वार्थांधता और मानसिक दिवालियापन।
पाठकजन! आप समझ गये होंगे कि लेखक का इस पुस्तक को बनाने के पीछे केवल एक ही मंशा थी-*श्रीराम और रामायण पर आक्षेप लगाने के नाम पर आर्य-द्रविड़ की राजनीति खेलना तथा सत्य को छिपाकर गलत धारणाओं व मान्यताओं का प्रचार करना।अपनी स्वार्थांधता के कारण लोगों की धार्मिक भावनाओं पर प्रहार करना किसी विवेकवान,सत्यान्वेषी तथा विद्वान व्यक्ति का काम नहीं हो सकता।
निश्चित ही पेरियार साहब के आक्षेपों का द्वेषमुक्त तथा मर्यादित रूप से खंडन किया जायेगा ताकि पाठकजन असत्य को त्यागकर सत्य को जानें।
आगे के लेख में ‘कथास्रोत’ नामक लेख का खंडन-मंडन विषय होगा
नोट : यह लेखक का अपना विचार  है |  लेख में कुछ गलत होने पर इसका जिम्मेदार  पंडित लेखराम वैदिक  मिशन  या आर्य मंतव्य टीम  नहीं  होगा

14 thoughts on “सच्ची रामायण की पोल खोल-५”

  1. KD
    JULY 25, 2017 AT 8:01 AM
    Darbari kavi raja ka yasho gaan to krega hi
    Vaise divy gun se aapka kya arth h vistar se batayen.
    उत्तर:- वाह वाह क्या कहने! आपके अनुसार महर्षि वाल्मीकि दरबारी कवि थे? श्री राम का गुणगान तो महाराज दशरथ की राज्यसभा में आए राजाओं ने भी किया यही नहीं श्रीराम के शत्रुपक्ष के मारीच में भी उनका गुणगान किया। महर्षि वाल्मीकि आप्त पुरुष थे। वे कभी भी किसी आदरणीय दुष्ट व्यक्ति का गुणगान नहीं करेंगे और नाही दरबारी कवियों जैसा काम करेंगे। इस हिसाब से तो आपने भूषण जैसे कभी-कभी शिवाजी महाराज का तोता सिद्ध कर दिया। चंदबरदाई जैसे कभी को भी पृथ्वीराज का चाटुकार बना दिया।
    श्री राम की जो गुण है अर्थात दिव्य गुण हैं12 कलाएं उनका वर्णन आपको इसी पेज में रजनीश बंसल जी की पोस्ट में मिल जाएगा। श्री राम जी जितेंद्रिय,वीर,क्षमाशील,परोपकारी,पिता की आज्ञा मानने वाले इत्यादि जितने भी गुण हैं,उनका वर्णन हम अपने लेखों में कर चुके हैं।उन्हीं को हमवे दिव्य गुण कहा। जो व्यक्ति सागर को सुखा े का दम रखता हो, १४००० राक्षसों को अकेला मार दे,रावण जैसे वीर योद्धा को निःशस्त्र करके जीवनदान दे दे वो दिव्य नहीं तो क्या है?
    पक्षपात से बाहर आकर वाल्मीकीय रामायण का स्वाध्याय कीजिये- श्रीराम के उदात्त चरित्र का ज्ञान होगा।धन्यवाद।

    1. Darbari kavi hi the .prachin kal men rishigan hi kavi v lekhak huaa krte the.unko rajy se bharpur dakshina milta tha .aur ye bhi bata dijiye ki jab balmiki ji apne ashram men rahte the aur ayodhya aate jaate the to unhe ram ji ke sampurn charitra ki puri kahani kisne batai jisaki sahayta se unhone ramayan ki rachna ki thi.Aap hi kijiye aise patron ke charitra ka adhyayan maine kar liya h. .jiska manushy matra k liye koi yogdan hi nhi.jiska aitihasik hone par hi sandeh ho .inke kisi bhi kary ka, gun ka koi praman hi nhi .jisko jaisa lga usne vaisa varnan kiya.
      Raghukul wale to vachan K itne pakke the ki use pura krne ke liye raja dashrath ne nyaay ka bhi gala ghot diya patni ko diya vachan ko pura krne k liye patni ki anuchit maange bhi maan li.aur aagyakari ram ji anyay ka virodh bhi n kr sake dhny h. Pakhandi log to ise rawan vadh k liye bhagawan ki lila bataaten h aap log to andhwishwasi nhi ho to jawab de.kya aap ise tyaag kahenge???dhyan rahe anyaay sahne wala anyaay krne wale se jyaada gunahgaar hota h.
      Kaviyon ne apne rachna ko kalpna ki pankh lagakr udaya aur akhyano ko atishnyokti alankaro se khub sajaya.itihas likhne ka gyan hamare rishi muniyo ko nhi tha.
      Sagar ko koi sukha nhi skta aur sadharan teer dhanush aur talwar se ladne wale raja ram 14000 rakshason ko mare.uphas yogy baten n kren.
      Aapka ram chandr ji ke janm ki katha batayen thoda??

  2. Darbari kavi hi the .prachin kal men rishigan hi kavi v lekhak huaa krte the
    उत्तर:-आप विचित्र प्राणी हैं। ऋषि मुनि सत्यवादी,जितेंद्रिय, निर्लोभ होते हैं। वे सत्य सत्य इतिहास लिखा करते हैं।कभी किसी की चाटुकारिता नहीं करते।महर्षि वसिष्ठ भी महलों में न रहकर नगर से दूर अपनी कुटिया में रहते थे जबकि वे मंत्री ऐर प्रधान ऋत्विक थे।इससे सिद्ध है कि ऋषियों को कभी धन ,ऐश्वर्य का लोभ नहीं होता।वाल्मीकि जी खुद अयोध्या से दूर अपने आश्रम में रहते थे।जब वे दरबार या महल में नगीं रहते थे न धनलोभी थे तो उनको दरबारी कवि कहना धूर्तता है।ताणक्य भी अपनी झोपड़ी में रहते, चंद्रगुप्त के राज्य से उनको लोभ न था।
    इस हिसाब से चंदवरदाई,भूषण कवि और समर्थ रामदास भू पृथ्वी राज चौहान और शिवाजी छत्रसाल के चाटुकार हो ग़ये।जरा होश करो!आप कदापि सिद्ध नहीं कर सकते कि ऋषि लोग चाटुकारकवि थे।
    .unko rajy se bharpur dakshina milta tha .aur ye bhi bata dijiye ki jab balmiki ji apne ashram men rahte the aur ayodhya aate jaate the to unhe ram ji ke sampurn charitra ki puri kahani kisne batai jisaki sahayta se unhone ramayan ki rachna ki thi.
    उत्तर:- आप स्वयं स्वीकार कर रहे हैं कि वाल्मीकि नगर से दूर वन में रहते थे।इससे सिद्ध है कि उनको श्रीराम के बचपन और किशेरावस्था का भली भांति ज्ञान था।जब राम जी वनवास गये,तब कई बार वाल्मीकिजी से उनका मिलना भी हुआ।तब उनको उनकी गतिविधियों का पता चला।उनको अपने सेवकों,शिष्यों से व अन्य ऋषियों से जो भ्रमण करते रहते हैं-से काफी जानकारियां मिलूं।महर्षि नारद भ्रमणकारी ऋषि थे।वे पूरी दुनिया विमान से घूमते थे।उन्होंने संक्षेप में उनको रामचरित सुना दिया।फिप वाल्मीकि जी ने समाधि में योगावस्थित होकर राम जी के समस्त जीवन वृत्तांतों को जान लिया।ऋषि मुनि योगविद्या से ऐसा कर सकते हैं।इसका विस्तृत वर्णन बालकांड के शुरुआती सर्गों में है।
    Aap hi kijiye aise patron ke charitra ka adhyayan maine kar liya h. .jiska manushy matra k liye koi yogdan hi nhi.jiska aitihasik hone par hi sandeh ho .inke kisi bhi kary ka, gun ka koi praman hi nhi .jisko jaisa lga usne vaisa varnan kiya.
    उत्तर:- आप जैसे परदोषदर्शनप्रिय लोग किसी महापुरुष के चरित्र का क्या अमुसरण करेंगे?जो बुद्ध और अंबेडकर के सिद्धांतों का गला घोंट चुके उनसे क्या आला करें?रामायण की ऐतिहासिकता पर कई प्रमाण आगे के लेखों में हमउद्धृत करेंगे।वैसे यदि रामायणादि ऐतिहासिक नहीं हैं तो मूलनिवासी लोग रावण,महिषासुर आदि को अपना पूर्वज क्यों मानते हैं?इससे सिद्ध है कि आप भी रामायण को ऐतिहासिक मानते हैं। आप सोच समझकर लिखते हैं या कच्ची के नशे में टाइप करते हैं? श्रीराम के कार्य और गुणों से ही रामायण भरी पड़ी है।
    श्रीराम का अनुदान पूछ रहे हैं।यानी दबी ज़बान में रामायण को सत्य मान लिया।बधाई हो!
    वैसे रामजी ने अपने जीवन से मानवीय मर्यादाओं का अनुकरणीय परिचय दिया है।इससे अधिक मानवता के लिये और क्या योगदान?
    राणा प्रताप,शिवाजी आदि ने देशविरोधी आकिरांताओं को नष्ट करके जो योगदान दिया,वही श्रीराम ने राक्षसों को नष्ट करके दिया।उनका योगदान पूछने वाले खुद सोचें कि आरक्षणखोरी और मफ्तखोरी के अलावा उन्होंने देश को क्या दिया?
    Raghukul wale to vachan K itne pakke the ki use pura krne ke liye raja dashrath ne nyaay ka bhi gala ghot diya patni ko diya vachan ko pura krne k liye patni ki anuchit maange bhi maan li.aur aagyakari ram ji anyay ka virodh bhi n kr sake dhny h. Pakhandi log to ise rawan vadh k liye bhagawan ki lila bataaten h aap log to andhwishwasi nhi ho to jawab de.kya aap ise tyaag kahenge???dhyan rahe anyaay sahne wala anyaay krne wale se jyaada gunahgaar hota h.

    उत्तर:- आप जैसे बिन पैंदे के लोटे वचन पालन की महिमा क्या जानें? दशरथ ने पारितोषिक रूप में कैकेयी को दो वरदान दिये पर उसने अन्यथा वरदान मांगकर राम को वनवास दे दिया।रामजी ने पिता की आज्ञा मानकर वन को गये।यदि राम वन को न जीते तो आप कहते कि दशरथ ने अपने वचन न निभाये।यदि राम वन को गये तो कह रहे हैं कि राम जी ने अन्याय सहन कर लिया!बहुत खूब! बड़ी दोगली नीति है।राम जी ने जब इसको अन्याय न माना तो आपको क्या तकलीफ है?
    भक्त लोग चाहे जो कहें,पर हमारे मत में यह नियति ही थी।ऋषिलोग राक्षसों और उनके राजा रावण के आतंकों का वर्णन करते थे। यदि राम राजा बन जाते तो वन में घुसकर उनको मारना संभव न होता जितनी आसानी उनको खुद वनवास के समय पड़ती।राम जी ने नियति मानकर इसे स्वीकार किया।परमात्मा का विधान ही था,कैकेयी का वरदान तो मात्र निमित्त था। राम जी ने वनवास में रहकर आम प्रजा के सुख दुख जाने।महलों में रहकर भला कौन धरातल की सच्चाई जान पाता है? इसलिए राम का वनवास जाना सही था।
    Kaviyon ne apne rachna ko kalpna ki pankh lagakr udaya aur akhyano ko atishnyokti alankaro se khub sajaya.itihas likhne ka gyan hamare rishi muniyo ko nhi tha.
    उत्तर:- यह ठीक है कि जिस कवि का जो मन में आया,वैसा रामचरित्र लिख मारा।परंतु वाल्मीकीय रामायण न होती तो वे कुछ न लिख पाते।अतः हमें केवल वाल्मीकीय रामायण ही प्रमाण है,अन्य पुस्तकें अप्रमाण हैं ।
    हां जी!खूब कहा!इतिहास लिखने का ज्ञान न तो कवियों को था न ऋषियों को।सारा दुनियाभर का ज्ञान आपको और आपके पेरियार को था।इतिहास लिखने का ज्ञान उन ऋषियों को था क्योंकि वे यथार्थवक्ता और सत्यशील थे। यदि वाल्मीकि जी की इतिहास लिखने की रीति पर शक है,तो समाधि के सिवा कोई भी इतिहासकार उन साधनों का प्रयेग करता है जो ऋषियों ने की।यदि इस पर भी संदेह तो संसार की कोई भी जीवनी विश्वसनीय न होगी।
    ऋषि मुनि कम से कम आपके टटपुंजिया दो टके के घासलेटी वामपंथी और अंग्रेजों के मानसपुत्रों के इतिहासों से तो बेहतर और निष्पक्ष होकर ही लिखते थे।
    Sagar ko koi sukha nhi skta aur sadharan teer dhanush aur talwar se ladne wale raja ram 14000 rakshason ko mare.uphas yogy baten n kren.
    Aapka ram chandr ji ke janm ki katha batayen thoda??
    उत्तर:- क्या परमाणु हथियारों से सागर को सुखाना असंभव है? तीर धनुष तलवार साधारण न थे,दिव्यास्त्र थे। ब्रह्मास्त्र,पशुपतास्त्र,आग्नेयास्त्र आदि अस्त्रों में १४००० क्या १४००००० लोगों को मिटाने की क्षमता थी। राम जी ने ब्रह्मचर्य के बल पर और अस्त्रविद्या से १४००० राक्षसों को नष्ट कर दिया।यह सर्वथा संभव है। बॉयोलॉजिकल हथियार और परमाणु शक्ति से यह संभव है।उन्होंने मेहनास्त्र से पूरी सेना को सम्मोहित कर दिया,जिससे पूरी सेना एक दूसरे को राम समझकर आपस में लड़ मरी।यह रामचरितमानस में है।भारत का प्राचीन ज्ञान बहुत समृद्ध था।इसके लिये यह असंभव नहीं

    क्यों जी!राम जी के जन्म पर आपको क्या आपत्ति है?राम जी दशरथ और कौसल्या के औरस पुत्र थे।पुत्रेष्टि यज्ञ की खीर खाकर दशरथ पत्नियों के गर्भ संतान उत्पन्न करने योग्य बने।फिर वे उत्तमांगनाओं को पृथक-पृथक दशरथ ने गर्भवती किया।
    आपके दिमाग में पेरियार का कीज़ा कुलबुला रहा है।उसने बकवास लिखी है कि यज्ञ के ऋत्विकों ने रानियों से समागम करके पुत्र उत्पन्न कि़े।पर इसका रामायण में उल्लेख कदापि नहीं है।यदि हिम्मत हो तो प्रमाण देना।दशरथ के पुत्रों के यत्र तत्र दाशरथि,दशरथात्मज कहा गया है।और संस्कृत साहित्य में हर जगह आत्मज अर्थ है-अपने वीर्य से उत्पन्न संतान।इससे सिद्ध है कि रामादि दशरथ के औरस पुत्र थे।
    आप वाल्मीकीय रामायण पढ़िये तब आपकी शंकायें मिटेंगी।सवाल करना आसान है पर उत्तर देना नहीं।
    मैं बौद्ध ग्रंथों ऐर अंबेडकर साहित्य से आक्षेप करने लगूं तो नानी याद आ जायेगी।

    धन्यवाद ।
    इति शम्।

    1. रावण,महिषासुर आदि को अपना पूर्वज क्यों मानते हैं?
      – Ye baatein maine bhi sun rakkhi hai. Ye kab shuru hua aur iska karan kya hai yeh abhi tak mujhe samaj mein nahi aaya. Ascharya ki baat yah hai ki Ye log brahmino ke virodh ho kar bhi Brahmin ke bete(Ravan) ko apna purvaj batate hai.

    2. “मैं बौद्ध ग्रंथों ऐर अंबेडकर साहित्य से आक्षेप करने लगूं तो नानी याद आ जायेगी।”
      Aap sahi keh rahe hai Kartikji. Maine bhi kuch bauddha granth padhe hai. Usmein bhi “Dashrath jataka” karke ek varta hai. Jisme Dashrath Benaras ka raja hai aur Ram uska beta bataya hai. Usme bhi Ram ko ek Charitravan vyakti bataya hai. Yaha par bhi Ram rajya chhod kar 12 varsho ke liye tapsya karne chale jate hai. Aur vo Ram agle janma mein buddha banta hai.
      Mujhe nahi lagta ki Ambedkarvadi logo ne Buddha ki kitabe padhi hai.

  3. “मैं बौद्ध ग्रंथों ऐर अंबेडकर साहित्य से आक्षेप करने लगूं तो नानी याद आ जायेगी।”
    Aap sahi keh rahe hai Kartikji. Maine bhi kuch bauddha granth padhe hai. Usmein bhi “Dashrath jataka” karke ek varta hai. Jisme Dashrath Benaras ka raja hai aur Ram uska beta bataya hai. Usme bhi Ram ko ek Charitravan vyakti bataya hai. Yaha par bhi Ram rajya chhod kar 12 varsho ke liye tapsya karne chale jate hai. Aur vo Ram agle janma mein buddha banta hai.
    Mujhe nahi lagta ki Ambedkarvadi log Buddha ki kitabe padhi hai.

  4. निःसंदेह ब्रावो भाई। बौद्ध साहित्य में बहुत सी वैदिक बातों के साथ गपोजे भी कई है। आपको रामा़ण विषयक बौद्ध ग्रंथों का खंडन देखना है तो करपात्री महाराज का “रामायण मीमांसा” डाउनलोड करके पढो। पूरी तरह तो इससे सहमत होना संभव नहीं पर करपात्री जी ने रामायण विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दिया है।

    1. कार्तिक जी,

      धन्यवाद्!

      मैंने “रामायण मीमांसा” डाउनलोड करके थोड़ा बहोत पढ़ा। मुझे नहीं पता की आप उसकी कितनी वस्तुओ के साथ सहमत रहेंगे क्योंकि आर्य समाज की विचार-धारा के अनुसार हर मनुष्य सामान है।

  5. ब्रावो जी,हम रामायण मीमांसा के काफी तर्कों से सहमत है। पर अवतारवादादि बातें नहीं मानते

  6. उस पुस्तक में बौद्ध और जैन रामायण की समीक्षा है

  7. कार्तिक जी,

    धन्यवाद्!

    मुझे नहीं लगता की आप २०-३०% से अधिक सहमत होंगे किर्पात्रीजी के साथ। यहाँ पर किर्पात्रीजी ने उत्तरकांड को मूल रामायण का ही अंग बताया है, पुराणों को भी वास्तविक बताया है। में अधिक बातें लिखना नहीं चाहूंगा यहाँ पर, परन्तु इतना अवश्य कहूंगा की किर्पात्रीजी महा-मुर्ख थे। क्योंकि ऋषि दयानन्द के समर्थक भी इतने बुद्धिशाली होते है की वे स्वयं ही सत्यासत्य का निर्णय कर सकते है, इसलिए कोई भी आर्य समाजी उनके विचारो से तो कभी भी सहमत नहीं होगा।

  8. हम केवल विदेशी और नास्तिक मत के रामायण के आक्षेपों के खंडन को सही कहते हैॉ। बाकी तो पोपलीला है

    1. कार्तिकजी,

      एक और प्रश्न था, क्या बुद्ध के समय से चाण्डालो समाज से अलग किया गया था? क्योंकि ये बात मैंने कई बार सुनी है।

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