क्या वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित है |

वैदिक युग के पतन के बाद कर्म व्यवहार आधारित वर्ण व्यवस्था का स्थान जन्म आधारित घृणित जाती प्रथा ने ले लिया. जन्म आधारित प्रथा का स्थापन्न होने के वजह से सामाजिक बुराइयां अपने चरम पर पहुँच गयीं और कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का पूर्णतया  लोप हो गया. महर्षी दयानंदसरस्वती ने अपने अकाट्य तर्कों के आधार पर इस व्यवस्था का पुनर्स्थापन किया। महर्षी दयानंद ने इस बात का पुरजोर आगाज किया कि शुद्र के घर पैदा हुआ बालक अपने कर्मों के आधार पर ब्राहम्ण बन सकता है और ब्राहम्मण के घर उत्पन्न बालक यदी हींन कर्मों में लींन  है तो वह शुद्र कहलाने के योग्य है ब्राहम्मण नहीं।   पौराणिक धर्म ग्रंथों में इसके अनेकों प्रमाण स्थान स्थान पर उपस्थित हैं … Continue reading क्या वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित है |

हलाल व हराम – चमूपति

क़ुरान में कुछ आयतें खाने पीने के सम्बन्ध में आई हैं –  इन्नमा हर्र्मा अलैकुमुल मैतता व इदमावलहमलखंजीरे व मा उहिल्लमा बिहीबिगैरिल्लाह – सूरते बकर आयत १७३ वास्तव में तुम्हारे मृतक शरीर का (प्रयोग ) हराम (निषिद्ध )  किया गया है. सुअर  का लहू व गोश्त भी (अवैध ) है और वह भी (निषिद्ध) है जिस पर खुद के सिवाय कोई और (नाम ) पुकारा जाये। इस्लाम के लोग ‘मैतता ‘ का अर्थ करते हैं जो स्व्यम मर जाएँ। शाब्दिक अर्थ तो यह है ‘ जो मर गया हो’ और उस पर अल्लाह मियाँ  का नाम लेने का अर्थ है वध करते हुए अल्लाहो अकबर व बिस्मिल्लाहहिर्रहमानिर्ररहीम पड़ना। इधर दयालु व कृपालु अलह का नाम लेना उधर मूक पशु के … Continue reading हलाल व हराम – चमूपति

अल्लाहमियाँ की कसमें | – चमूपति

क़ुरान में कसमें खाना निषिद्ध है. अतएव  कहा गया है – कुलला तकसमू  – सूरते नूर ५३ कह कि कसमें मत खाओ परन्तु स्वयं परमात्मा स्थान स्थान पर कसमें खाता चला जाता है. त  अल्लाह लक़द अरसलना – सूरते नहल आयत ६३ कसम है अल्लाह की भेजे हमने पैगम्बर यह कौन है ? –  इस बात को ध्यान दें कि कसम खानी  भी चाहिए कि नहीं। क्या यह वचन अल्लाह का विदित होता है ? अल्लाह तो अपने आप को हम (बहुवचन ) कह रहा है , परन्तु कसम खाते हुए कहता है कि अल्लाह मियाँ  की कसम , स्पष्ट है कि ‘ हम’ कोई और है और अल्लाह मियाँ  कोई दूसरा।   वलकुरानुल हकीम कसम है कुराने हकीम की … Continue reading अल्लाहमियाँ की कसमें | – चमूपति

क़ुरान में नारी का रूप- चमूपति

फिर मानव मात्र का अर्थ ही कुछ नहीं – संसार की जनसंख्या  की आधी स्त्रियां हिएँ और किसी मत का यह दावा कि वह मानव मात्र के लिए कल्याण करने आया है इस कसौटी पर परखा जाना आवश्यक है कि वह मानव समाज के इस अर्थ भाग को सामजिक नैतिक और आध्यात्मिक अधिकार क्या देता है. क़ुरान में कुंवारा रहना मना है. बिना विवाह के कोई मनुष्य रह नहीं सकता। अल्प व्यस्क बच्चा तो होता ही माँ  बाप के हाथ का खिलौना होता है. वयस्क होने पर मुसलमान स्त्रियों को यह आदेश है – व करना फी बयुति कन्ना – सूरते अह्जाब आयत ३२ और ठहरी रहो अपने घरों में यही वह आयत है जिसके आधार पर परदा प्रथा खड़ी … Continue reading क़ुरान में नारी का रूप- चमूपति

आर्य मंतव्य (कृण्वन्तो विश्वम आर्यम)