मानवोन्नति की अनन्या साधिका वर्णव्यवस्था शिवदेव आर्य -कार्यकारी सम्पादक,      गुरुकुल पौन्धा, देहरादून (उ.ख.)

वर्णाश्रम व्यवस्था वैदिक समाज को संगठित करने का अमूल्य रत्न है। प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने समाज को सुसंगठित, सुव्यवस्थित बनाने तथा व्यक्ति के जीवन को संयमित, नियमित एवं गतिशील बनाने के लिए चार वर्णों एवं चार आश्रमों का निर्माण किया। वर्णाश्रम विभाग मनुष्य मात्र के लिए है, और कोई भी वर्णी अनाश्रमी नहीं रह सकता। यह वर्णाश्रम का अटल नियम है। भारतीय शास्त्रों में व्यक्तिगत और सामाजिक कल्याणपरक कर्मों का अपूर्व समन्वय दृष्टिगोचर होता है। प्रत्येक वर्ण के सामाजिक कर्तव्य अलग-अलग रूप में निर्धारित किए हुए हैं। वर्णाश्रम धर्म है। प्रत्येक वर्ण के प्रत्येक आश्रम में भिन्न-भिन्न कर्तव्याकर्तव्य वर्णित किये हुए हैं। भारतीय संस्कृति का मूलाधार है अध्यात्मवाद। अध्यात्मवाद के परिपे्रक्ष्य में जीवन का चरम लक्ष्य है मोक्ष। … Continue reading मानवोन्नति की अनन्या साधिका वर्णव्यवस्था शिवदेव आर्य -कार्यकारी सम्पादक,      गुरुकुल पौन्धा, देहरादून (उ.ख.)

स्तुता मया वरदा वेदमाता-१०

मन्त्र में एक वाक्य आया है- वाचं वदतं भद्रया-वाणी सभी बोलते हैं, वाणी के प्रयोग दोनों हो सकते हैं। हानि के, लाभ के, मृदु के, कठोर के, सत्य के, असत्य के। कोयल की भाँति सभी की वाणी मीठी होती, सब एक-दूसरे के साथ मधुर वाणी का व्यवहार करते तो किसी को यह कहने की आवश्यकता ही नहीं होती कि मधुर वाणी बोलनी चाहिए। यदि ऐसा होता तो अच्छा नहीं होता, क्योंकि तब मेरा कोई अधिकार ही नहीं होता, मुझे मेरी इच्छा का प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिलता, विवेक की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। कोई दूसरे से अलग नहीं होता, कोई किसी से अच्छा तो किसी से बुरा भी नहीं होता। इस परिस्थिति में मेरे होने का अर्थ ही … Continue reading स्तुता मया वरदा वेदमाता-१०

तो क्या? ( वैदिक धर्म में गौ मांस भक्षण एक झूठ) – संजय शास्त्री, कनाडा

महाराष्ट्र में गोमांस पर राज्य सरकार द्वारा प्रतिबन्ध लगाते ही कुछ लोगों की मानवीय संवेदनाएँ आहत हो उठीं और उनको लगा, जैसे मानवाधिकारों पर कयामत टूट पड़ी हो। कुछ लोग भारतीय इतिहास की दुहाई देते हुए संस्कृत शास्त्रों से गोमांस-भक्षण के उदाहरण देते हुए हिन्दुओं को सलाह देने लगे कि अपने शास्त्रों की बात मानोगे या आधुनिक हिन्दुत्ववादियों की? (इस विषय में मुसलमानों का एक मतान्ध किन्तु अति मन्दगति वर्ग बहुत सक्रिय हो गया है, इसलिये इस लेख में मुसलमानों की चर्चा करने पर बाध्य हुआ हूँ।) कुछ लोगों के हृदय में आर्य और अनार्य का कथित शाश्वत वैर जाग उठा और वे चिल्ला उठे कि गोमांस-भक्षण अनार्यों की प्राचीन परम्परा रही है, विदेश से आए आर्यों ने ही इस … Continue reading तो क्या? ( वैदिक धर्म में गौ मांस भक्षण एक झूठ) – संजय शास्त्री, कनाडा

हमारा परम मित्र – ईश्वर – सुकामा आर्या

हम सब बचपन से एक तत्व  के विषय में बहुत कुछ सुनते आए हैं, पर आज भी ध्यान से देखें तो उस तत्व  के विषय में हमारी प्रवृत्ति  वैसी नहीं बन पाई है, जैसी की होनी चाहिए। कारण, हमारी स्थिति श्रवण तक रही- न श्रवणमात्रात् तत् सिद्धिः। सिर्फ सुनने मात्र से किसी वस्तु की सिद्धि नहीं हो जाती। मान लीजिए- हम रुग्ण हो गए। किसी मित्र ने बताया कि अमुक दवा ले लीजिए, तो क्या हम सुनने मात्र से स्वस्थ हो जाएँगे? नहीं, हमें बाजार से दवा लानी पड़ेगी, यथोचित समय पर उसका सेवन करना पड़ेगा, तब कहीं जाकर सम्भावना है कि हम स्वस्थ हो पाएँ। ठीक यही बात उस एक तत्व  के विषय में भी घटती है। उस तत्व … Continue reading हमारा परम मित्र – ईश्वर – सुकामा आर्या

नहीं बचेगा अत्याचारी – पं. नन्दलाल निर्भय भजनोपदेशक

सन्तों के लक्षण सुनों, आज लगाकर ध्यान। ईश भक्त, धर्मात्मा, वेदों के विद्वान्।। वेदों के विद्वान्, सदाचारी, गृहत्यागी। धैर्यवान्,विनम्र,परोपकारी, वैरागी।। सादा जीवन उच्च-विचारों के जो स्वामी। वेदों का उपदेश करें, वे सन्त हैं नामी।। जगत् गुरु दयानन्द थे, ईश्वर भक्त महान्। दयासिन्धु धर्मात्मा, थे वैदिक विद्वान्।। थे वैदिक विद्वान्, ब्रह्मचारी, तपधारी। दुखियों के हमदर्द, सदाचारी, उपकारी।। किया घोर विषपान, भयंकर कष्ट उठाया। किया वेद प्रचार, सकल संसार जगाया।। दयानन्द ऋषिराज का, जग पर है अहसान। दोष लगाता था उन्हें, रामपाल शैतान।। रामपाल शैतान, स्वयं बनता था ईश्वर। करता था उत्पात, रात-दिन कामी पामर।। बरवाला में किलानुमा, आश्रम बनाया। उस पापी ने बड़ा-जुल्म प्रजा पर ढाया।। उसके कुकर्म देखकर, जागे आर्य कुमार। पोल खोल दी दुष्ट की, किया वेद प्रचार।। किया … Continue reading नहीं बचेगा अत्याचारी – पं. नन्दलाल निर्भय भजनोपदेशक

अग्निहोत्र का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व – प्रो. डी.के. माहेश्वरी

पिछले अंक का शेष भाग….. मीठे पदार्थ शक्कर, सूखे अंगूर, शहद, छुआरा आदि भी यज्ञ के समय प्रयोग होते हैं। आजकल हवन सामग्री एक कच्चे पाउडर के रूप में बाजार में आसानी से उपलब्ध  है जो निम्न पदार्थों से निर्मित की जाती है- चन्दन तथा देवदार की लकड़ी का बुरादा, अगर और तगर की लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े, कपूर-कचरी, गुग्गुल, नागर मोथा, बलछार, जटामासी, सुगन्धवाला, लौंग, इलायची, दालचीनी, जायफल आदि। आजकल विभिन्न संस्थान हवन सामग्री निर्मित कर रहे हैं, जिनमें ये सभी पदार्थ एक अलग अनुपात में होते हैं। यज्ञ के चिकित्सीय पहलू प्राचीन समय से आयुर्वेदिक पौधों के धुएँ का प्रयोग मनुष्य विभिन्न प्रकार की बीमारियों से निदान पाने के लिए करते आ रहे हैं। यज्ञ से उत्पन्न धुएँ … Continue reading अग्निहोत्र का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व – प्रो. डी.के. माहेश्वरी

वह विछोना वही ओढ़ना है- – पं. संजीव आर्य

आओ साथी बनाएँ भगवान को। वही दूर करेगा अज्ञान को।। कोई उसके समान नहीं है और उससे महान नहीं है सुख देता वो हर इंसान को।। वह बिछोना वही ओढ़ना है उसका आँचल नहीं छोड़ना है ध्यान सबका है करुणा निधान को।। दूर मंजिल कठिन रास्ते हैं कोई साथी हो सब चाहते हैं चुनें उससे महाबलवान को।। सत्य श्री से सुसज्जित करेगा सारे जग में प्रतिष्ठित करेगा बस करते रहें गुणगान को।। रूप ईश्वर के हम गीत गाए दुर्व्यसन दुःख दुर्गुण मिटाएँ तभी पाएँगे सुख की खान को।। – गुधनीं, बदायुँ, उ.प्र.

आर्य मंतव्य (कृण्वन्तो विश्वम आर्यम)