जाओ, अपनी माँ से पूछकर आओ

जाओ, अपनी माँ से पूछकर आओ देश-विभाजन से बहुत पहले की बात है, देहली में आर्यसमाज का पौराणिकों से एक ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ। विषय था- ‘अस्पृश्यता धर्मविरुद्ध है-अमानवीय कर्म है।’ पौराणिकों का पक्ष स्पष्ट ही है। वे छूतछात के पक्ष पोषक थे। आर्यसमाज की ओर से पण्डित श्री रामचन्द्रजी देहलवी ने वैदिक पक्ष रखा। पौराणिकों की ओर से माधवाचार्यजी ने छूआछात के पक्ष में जो कुछ वह कह सकते थे, कहा। माधवाचार्यजी ने शास्त्रार्थ करते हुए एक विचित्र अभिनय करते हुए अपने लिंग पर लड्डू रखकर कहा, आर्यसमाज छूआछात को नहीं मानता तो इस अछूत (लिंग) पर रज़्खे इस लड्डू को उठाकर खाइए। इस पर तार्किक शिरोमणि पण्डित रामचन्द्र जी देहलवी ने कहा, ‘‘चाहे तुम इस अछूत पर लड्डू रखो … Continue reading जाओ, अपनी माँ से पूछकर आओ

HADEES : DOS AND DON�TS

DOS AND DON�TS There are many dos and don�ts.  For example, to wear shoes while praying is permissible (1129-1130), but clothes having designs and markings on them are distracting and should be avoided (1131-1133).  The Prophet commanded the believer that while praying �he should not spit in front of him, for Allah is in front of him when he is engaged in prayer� (1116).  According to another tradition, he �forbade spitting on the right side or in front, but it is permissible to spit on the left side or under the left foot� (1118). To eat onion or garlic is not harAm (forbidden), but Muhammad found their odors �repugnant� (1149) and therefore forbade coming to the mosque after eating them, … Continue reading HADEES : DOS AND DON�TS

हदीस : भोजन और वुजू

भोजन और वुजू मुहम्मद का निर्देश था-”आग से छू गई किसी भी चीज़ को खाने वाले के लिए प्रक्षालन जरूरी है“ (686)। किन्तु बाद में यह आदेश रद्द कर दिया गया। ”अल्लाह के रसूल ने बकरे के कंधे का गोश्त खाया और इबादत की तथा वुजू नहीं किया“ (689)।   शौचालय से निकलकर आप यदि इबादत करने जा रहे हों, तो वुजू जरूरी है। पर यदि खाना खाने जा रहे हों, तो जरूरी नहीं है। ”अल्लाह के पैगम्बर शौचालय से बाहर आए। उन्हें कुछ खाने को दिया गया और लोगों ने उन्हें वुजू की याद दिलाई, पर पैगम्बर ने कहा-क्या मुझे नमाज पढ़नी है, जो वुजू करूं ?“ (725) author : ram swarup  

ऋषि की राह में जवानी वार दी

ऋषि की राह में जवानी वार दी आर्यसामाज के आरज़्भिक युग में आर्यसमाज के युवक दिनरात वेद-प्रचार की ही सोचते थे। समाज के सब कार्य अपने हाथों से करते थे। आर्य मन्दिर में झाड़ू लगाना और दरियाँ बिछाना बड़ा श्रेष्ठ कार्य माना जाता था। तब खिंच-खिंचकर युवक समाज में आते थे। रायकोट जिला लुधियाना (पंजाब) में एक अध्यापक मथुरादास था। उसने अध्यापन कार्य छोड़ दिया। आर्यसमाज के प्रचार में दिन-रैन लगा रहता था। बहुत अच्छा वक्ता था। जो उसे एक बार सुन लेता बार-बार मथुरादास को सुनने के लिए उत्सुक रहता। मित्र उसे आराम करने को कहते, परन्तु वह किसी की भी न सुनता था। ग्रामों में प्रचार की उसे विशेष लगन थी। सारी-सारी रात बातचीत करते-करते आर्यसमाज का सन्देश … Continue reading ऋषि की राह में जवानी वार दी

HADEES : WOMEN AND MOSQUES

WOMEN AND MOSQUES Women can go to the mosque but they �should not apply perfume� (893), a privilege not denied to men who can afford it.  They were also told not to precede men in lifting their heads from prostration.  The translator explains that this hadIsrelates to a period when the Companions were very poor and could not afford proper clothing.  The instruction was meant to give them time to adjust their clothing before the women lifted their heads (hadIs 883 and note 665). Muhammad commanded the believers to �take out unmarried women and purdah-observing ladies for �Id prayers, and he commanded the menstruating women to remain away from the place of worship of the Muslims� (1932).  But in a … Continue reading HADEES : WOMEN AND MOSQUES

हदीस : तयम्मुम

तयम्मुम पानी मयस्सर न हो तो आप तयम्मुम कर सकते हैं, अर्थात् अपने हाथ पांव और माथे की मिट्टी से मल लें। ऐसा करना जल से प्रक्षालन की ही तरह उत्तम है। अनुवादक इसे स्पष्ट करते हैं-”प्रक्षालन एवं स्नान का प्रमुख प्रयोजन धार्मिक है। स्वास्थय-सम्बन्धी प्रयोजन गौण है।……अल्लाह ने पानी उपलब्ध न होने पर हमें तयम्मुम करने का आदेश दिया है……ताकि प्रक्षालन का आध्यात्मिक मूल्य सुरक्षित रहे और वह जीवन की ऐहिक गतिविधियों से हटाकर हमें अल्लाह की उपस्थिति के प्रति अभिमुख करें“ (टि0 579)। इस विषय पर कुरान में एक आयत है और आठ हदीस है (714-721)। ”यदि तुम बीमार हो या सफर पर हो या शौच-गृह से आए हो या तुमने औरत को छू लिया हो, और पानी … Continue reading हदीस : तयम्मुम

जिसने महर्षिकृत ग्रन्थ कई बार फाड़ डाले

जिसने महर्षिकृत ग्रन्थ कई बार फाड़ डाले आर्यसमाज के आरज़्भिक काल के निष्काम सेवकों में श्री सरदार गुरबज़्शसिंहजी का नाम उल्लेखनीय है। आप मुलतान, लाहौर तथा अमृतसर में बहुत समय तक रहे। आप नहर विभाग में कार्य करते थे। बड़े सिद्धान्तनिष्ठ, परम स्वाध्यायशील थे। वेद, शास्त्र और व्याकरण के स्वाध्यय की विशेष रुचि के कारण उनके प्रेमी उन्हें ‘‘पण्डित गुरुदज़ द्वितीय’’ कहा करते थे। आपने जब आर्यसमाज में प्रवेश किया तो आपकी धर्मपत्नी श्रीमति ठाकुर देवीजी ने आपका कड़ा विरोध किया। जब कभी ठाकुर देवीजी घर में सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका को देख लेतीं तो अत्यन्त क्रुद्ध होतीं। आपने कई बार इन ग्रन्थों को फाड़ा, परन्तु सरदार गुरबज़्शसिंह भी अपने पथ से पीछे न हटे। पति के धैर्य तथा नम्रता का … Continue reading जिसने महर्षिकृत ग्रन्थ कई बार फाड़ डाले

आर्य मंतव्य (कृण्वन्तो विश्वम आर्यम)