‘ओ३म्’ को बिषयमा संका समाधान-३

ओ३म् वेदमा ‘ओंकार’ शब्दको पाठ” ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ।। (ऋ॰ १/३/७) पदः- ओमासः चर्षणीधृतः । विश्वे । देवासः । आ । गत । दाश्वांसः । दाशुषः । सुतम् । अर्थ:- सर्वप्रथम यहाँ यो जान्नु आवश्यक छ कि ’ओमासः’ यो एक समस्त पद हो। अर्थात्, ’ओ३म्+आसः’ यिनै दुई पद हुन् । ’ओ३म्’ नाम ब्रह्मको हो ।’आस’ को अर्थ समीपमा बस्नेवाला हो । अर्थात्, ब्रह्मको समीपमा बस्नेवाला ब्रह्मज्ञानीलाई  नै ’ओमासः’ भनिन्छ। अब सम्पूर्ण मन्त्रको अर्थ यसप्रकार छ:- (विश्वे देवासः) हे सकल विद्वानहरुहो । (दाशुषः) सत्कार गर्नेवाला मेरो गृहमा (सुतम्) सोम रस युक्त विविध प्रकारका पदार्थहरु ग्रहण गर्नको लागि (आ गत) तपाईहरु कृपा गरेर आउनुस् । तपाईहरु कस्ता हुनुहुन्छ ? (ओमासः) ओ३म् =ब्रह्मको समीप आसः= बस्नेवाला अर्थात्, … Continue reading ‘ओ३म्’ को बिषयमा संका समाधान-३

ऋषि दयानन्द की कल्पना के यज्ञ – होतर्यज- स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

भारतीय स्वातन्त्र्य के अनन्तर का आर्यसमाज कई दृष्टियों से १९४९ से पूर्व के आर्यसमाज से आगे भी है और कई दृष्टियों से यह ऋषि दयानन्द के स्वप्नों से पीछे हटता जा रहा है। यह आवश्यक है कि इसमें से कतिपय बुद्धिजीवी व्यक्ति प्रति तीसरे या पाँचवें वर्ष स्वयं अपनी स्थिति का सिंहावलोकन कर लिया करें। अपने सामाजिक और व्यक्तिगत निर्देशन के लिए एक ‘ब्ल्यू-प्रिन्ट’ तैयार कर लिया करें। आर्यसमाज जीवित और उदात्त संस्था है- अनेक राजनीतिक दल पनपते रहेंगे, मरते रहेंगे, अपना कलेवर बदलते रहेंगे। अनेक बाबा-गुरु-अवतार-भगवान्-माताएँ आती रहेंगी, जाती रहेंगी, पर जो जितना ही स्वामी दयानन्द के दृष्टिकोण के निकट रहेगा, उतना ही आर्यसमाज का महत्त्व बढ़ता जावेगा। हिन्दुओं के अनेक रूप हमारे सामने आर्यमाज का विरोध करने के … Continue reading ऋषि दयानन्द की कल्पना के यज्ञ – होतर्यज- स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती

पुनरोदय: – देवनारायण भारद्वाज ‘देवातिथि’

सुन्दर नर तन मन मधुवन को। प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।। सुखकर दीर्घ आयु फिर पायें, फिर प्राणों का ओज जगायें। फिर से आत्मबोध अपनायें। मंगल दृष्टिकोण के धन को। प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।१।। होवें सक्षम श्रोत्र हमारें, तज कर जग को प्रेय पुकारें। फिर से साधन श्रेय सुधारें।। विज्ञान विमल के दर्पण को। प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।२।। दु:ख दुरित दूर उर करो मधुर, हो हृदय अहिंसक सर्व सुखर। हे जठर अनल हे वैश्वानर।। कर्मठ ललाम नव परपन को। प्रभुवर! पुन: पुन: दो हम को।।१।। स्रोत- पुनर्मन: पुनरायुर्मऽआगन्पुन: प्राण:, पुनरात्मामऽआगन्पुनश्चक्षु: पुन: श्रोत्रंमऽआगन्। वैश्वानरोऽअदब्ध स्तनूपाऽअग्निर्न: पातु दुरितादवद्यात्।। – (यजु. ४.१५)

कयामत की रात : पं॰ श्री चमूपतिजी एम॰ ए॰

  कयामत की रात   एकदम अल्लाह को क्या सूझा?—पिछले अध्याय में अल्लाताला के न्याय के रूपों को तो एक दृष्टि से देख ही लिया गया! क्या ठीक हिसाब किया जाता है। अब हम इस न्याय की कार्य पद्धति देखेंगे। इसके लिए कयामत के दिन पर एक गहरी दृष्टि डाल जाना आवश्यक है, क्योंकि न्याय का दिन वही है। मुसलमानों की मान्यता है कि सृष्टि का प्रारम्भ है। सृष्टि एक दिन प्रारम्भ हुई थी। पहले अल्लाह के अतिरिक्त सर्वथा अभाव था। एक दिन ख़ुदा ने क्या किया कि अभाव का स्थान भाव ने ले लिया। किसी के दिल में विचार आ सकता है कि इससे पूर्व अल्लाह मियाँ क्या करते थे? उनके गुण क्या करते थे? जो काम पहले कभी … Continue reading कयामत की रात : पं॰ श्री चमूपतिजी एम॰ ए॰

वह कथनी को करनी का रूप न दे सके:- राजेन्द्र जिज्ञासु

मालवीय जी ने पं. दीनदयाल से कहा, ‘‘मुझसे विधवाओं का दु:ख देखा नहीं जाता।’’ इस पर उन्होंने कहा- ‘‘परन्तु सनातनधर्मी हिन्दू तो विधवा-विवाह नहीं मानेंगे। क्या किया जाये?’’ इस पर मालवीय जी बोले, ‘‘व्याख्यान देकर एक बार रुला तो मैं दूँगा,  सम्भाल आप लें।’’ इन दोनों का वार्तालाप सुनकर स्वामी श्रद्धानन्द जी को बड़ा दु:ख हुआ। आपने कहा, ‘‘ये लोग जनता में अपना मत कहने का साहस नहीं करते। व्याख्यानों में विधवा-विवाह का विरोध करते हैं।’’ मालवीय जी शुद्धि के समर्थक थे परन्तु कभी किसी को शुद्ध करके नहीं दिखाया। हटावट मिलावट दोनों ही पाप कर्म- धर्मग्रन्थों में मिलावट भी पाप है। हटावट भी निकृष्ट कर्म है। परोपकारिणी सभा के इतिहास लेखक ने ऋषि-जीवन में, ऋषि के सामने जोधपुर में … Continue reading वह कथनी को करनी का रूप न दे सके:- राजेन्द्र जिज्ञासु

‘ओ३म्’ को बिषयमा संका समाधान-२

ओ३म्..! वेदमा ‘ओ३म्’ शब्द: उपनिषदहरुमा भनिएको छ:- अंगुष्ठमात्रः पुरुषोsन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।। (कठ उपनिष्द् ६ । १७) त्यो अन्तर्यामी परमात्मा सबको हृदयमा विराजमान छ । ’वि’ र ’अन्’´ शब्दको व्याख्या: शंका: ५- ’वि’ र ’अन्’´ शब्दबाट प्रकृति र जीव अर्थको ग्रहण कसरि हुन्छ ? समाधान:- ’अन्’ शब्दको अर्थ जीव त प्रत्यक्ष नै छ । किनकि (अनिति, प्राणिति, जीवतीति = अन्) ’अन्’ धातुको अर्थ जिउनु हो। ’जीव’ धातुको जुन अर्थ छ, त्यहि अर्थ ’अन्’ धातुको पनि छ । अतः ’जीव’ र ’अन्’ शब्द एकै अर्थको प्रकाशक हुन् । यसै ’अन्’मा ’प्र’ उपसर्ग जोड्नाले प्राण शब्द बन्दछ । यस प्रकार अप+अन् = अपान्; सम+अन् = समान, उद्+आ+अनः = उदान, वि+आ+अन = व्यान शब्द बन्दछन् । केवल भेद यत्ति छ कि … Continue reading ‘ओ३म्’ को बिषयमा संका समाधान-२

लाला लाजपतराय की मनोवेदना और उनके ये लेख:- राजेन्द्र जिज्ञासु

एक स्वाध्याय प्रेमी युवक ने लाला लाजपत राय जी के आर्यसमाज पर चोट करने वाले एक लेख की सूचना देकर उसका समाधान चाहा। दूसरे ने श्री घनश्यामदास बिड़ला के नाम उनके उस पत्र के बारे में पूछा जिसमें लाला जी ने अपने नास्तिक होने की चर्चा की है। मैंने अपने लेखों व पुस्तकों में इनका स्पष्टीकरण दे दिया है। लाला जी पर मेरी पुस्तक में सप्रमाण पढ़ा जा सकता है। जब उनके मित्रों ने, कॉलेज पार्टी ने उनसे द्रोह करके सरकार की उपासना को श्रेयस्कर मान लिया तो लाला जी के घायल हृदय का हिलना, डोलना स्वाभाविक था। उधर महात्मा मुंशीराम की शूरता, अपार प्यार और हुँकार ने उनका हृदय जीत लिया। घायल हृदय को शान्ति मिली। स्वामी जी के … Continue reading लाला लाजपतराय की मनोवेदना और उनके ये लेख:- राजेन्द्र जिज्ञासु

आर्य मंतव्य (कृण्वन्तो विश्वम आर्यम)