शौर्य की ज्वाला “पद्मावती” :गौरव आर्य

रानी पद्मावती को लेकर देश के आधुनिक गढ़रिये नई गाथा गढ़ रहे है पैसे और नाम की चकाचौंध में ये गढ़रिये अपने पूर्वजों के सम्मान को बेचने पर आमादा है

वही इन वीर वीरांगनाओं के सम्मान के लिए आज जिन युवाओं को आगे आना चाहिए वे अपने चरित्र को ही भौतिकता की बलि पर चढा रहे है

आज की राष्ट्र भक्ति जातिवाद और स्वार्थी भावनाओं से ग्रस्त होती जा रही है | किसी कवि ने ठीक ही कहा है

“जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं |

वह हृदय नहीं वो पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ||”

भंसाली आज रानी पद्मावती के इतिहास को तोड़ मरोड़कर अपनी फिल्म में प्रस्तुत करने का साहस कर चूका है और जिन राष्ट्रवादियों को इसका विरोध करना चाहिए वे इसे जातिवाद का रंग देकर शांत हो चुके है

इसका कारण कहीं न कहीं रानी पद्मावती का जीवन ज्ञात न होना है

आज के इतिहासज्ञ तो मुह्हमद जायसी की लिखी “पद्मावत” के सहारे ही जीवित है तभी इन अंधों में काणे राजाओं की पूछ बढ़ी है

जबसे भंसाली ने इस वीरांगना पर रोमांस और एक्शन की मिलावटी फिल्म बनाई है सोशल मिडिया पर लेखों की भरमार है पर दुःख उस समय होता है जब इन लेखों में शोध की भयंकर कमी दिखती है

 

हमने थोडा सा प्रयास कर रानी पद्मिनी के इतिहास पर शोध कर चुके लेखकों के कुछ अंशों को यहाँ दिखाया है

जिसमें गोरीशंकर हिराचंद ओझा और दामोदरलाल गर्ग प्रमाणिक लेखकों में से है उनके शोध का उपयोग किया है

 शौर्य की ज्वाला :पद्मावती

रानी पद्मावती मात्र इतिहास नहीं, वीरता की जीती जागती ज्वाला है

 

राजस्थान की भूमि रेत ही नहीं उगलती वह शूरमा, वीर वीरांगनाओं की जननी रही है इसका इतिहास साक्षी रहा है

ऐसे ही वीर वीरांगनाओं में एक नाम जो मात्र भारत ही नहीं विश्व प्रसिद्ध रहा है

वह है “रानी पद्मावती / पद्मिनी”

दुसरे शब्दों में रानी पद्मावती चितोड़गढ़ दुर्ग का पर्याय है, इस दुर्ग की मुख्य पहचान ही रानी पद्मावती रही है

देश और नारी के सम्मान की रक्षा में रानी पद्मावती और दुर्ग चितोड़ दोनों ने ही बलिदान दिया है इससे प्रभावित होकर किसी चारण ने क्या खूब कहा है

“गढ़ तो है चितोड़गढ़ और सब गढ़ेया है |

रानी तो पद्मावती और सब …… हैं ||

रानी पद्मिनी या पद्मावती के बारे में कहा जाता है की वह सुन्दरता की देवी थी जिस पर कोई भी मंत्रमुग्ध हो जाए इससे अधिक रानी पद्मिनी की वीरता उनकी बुद्धि का बखान बहुत कम लेखकों और इतिहासज्ञों ने किया है

 

भारतीय वीरता से परेशान मुगलों ने हमेशा से ही यहाँ के इतिहास से छेड़छाड़ और प्रक्षेपण किया है जिससे मुगलों के इतिहास को गौरव प्राप्त हो सके

 

इसी षड्यंत्र के चलते चितोड़ के जोहर की घटना के तकरीबन २५० वर्ष पश्चात “मलिक मुह्हमद जायसी” ने पद्मावत की रचना की, इससे पहले कहा जाता है की एक व्यक्ति वैन नामक चारण था जिसने रानी पद्मिनी पर लिखा था परन्तु वह प्रकाशित नहीं हो पाया

जायसी की कथा लिखने के बाद लगभग लेखको ने उसी का अनुशरण किया किसी ने इस पर शोध करने का कष्ट नहीं उठाया

 

राजस्थान की वीरता के इतिहास को ध्वस्त करने के उद्देश्य से रानी पद्मिनी पत्नी रतनसिंह को श्री लंका निवासी बताया और रतनसिंह को विलासी तक सिद्ध करने में इन इतिहास प्रदूषकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी

अतिविद्व्तजनों ने रतनसिंह के १ वर्ष के कार्यकाल में १२ वर्ष साधू का वेश भी धारण करवा दिया, श्री लंका भेज कर रानी पद्मिनी से विवाह करना भी बता दिया और उसी विद्वता का अनुशरण कई लेखकों ने भी कर लिया

रानी पद्मिनीं का शौर्य कितना जबर्दस्त रहा होगा इसका विचार इसी से किया जा सकता है की उनके पुरे इतिहास से छेड़छाड़ की गई

राजपूत द्वारा अपनी पत्नी को मुगल आक्रान्ता को दिखाने की शर्त, राजपूत को अत्यंत विलासी प्रदर्शित करना, रानी के केवल सौन्दर्य की चर्चा करना उसकी वीरता का बखान न करना, रानी को दुसरे देश की बताना, साथ ही राघव चेतन को स्वयं रानी से भीख दिलवाना आदि आदि छोटी छोटी और बड़ी से बड़ी मिलावटे इन मुगलों और भाड़े के लेखकों ने की है

 

परन्तु जो ऐतिहासिक निशानियाँ और प्रमाण रानी पद्मिनी की वीरता और राजघराने की परम्पराओं के मिलते है उनसे यह सब बाते झूठी सिद्ध होती है

रानी पद्मावती के सच्चे इतिहास और अन्य इतिहासज्ञों के मिलावटी लेखों और उनके मिलावट के प्रमाण आगामी लेखों में प्रस्तुत किये जायेंगे

अगला भाग यहाँ क्लिक करके पढ़े

http://aryamantavya.in/padmavati-2/

—गौरव आर्य

2 thoughts on “शौर्य की ज्वाला “पद्मावती” :गौरव आर्य”

  1. राणी पद्मावती का सही इतिहास राजस्थान में वंशावली लिखने वाले चंडीसा राव समाज के पास होना चाहिए, क्योंकि समदडी के पास मजल गांव में खिलजी की सेना के साथ लडते हुए एक चंडीसा राव शहिद हुए थे, इतिहासकारों ने सही प्रयत्न किया तो वह इतिहास आज भी मिल सकता है,

    जितेंद्र छेलारामजी राव
    9765203504

    1. कर्नल टॉड ने प्रयास किया होगा इस बारे में और मेने पढ़ा है भाटों की वंशावली वाली पुस्तिका में रावल रतनसिंह का नाम ही नहीं मिला

      फिर भी आपके कहे अनुसार इस तरफ ध्यान दिलवाने के प्रयास करेंगे जिससे सही इतिहास सामने आ सके

      आपका अत्यंत धन्यवाद

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