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“नव वर्ष” : शिवदेव आर्य, गुरुकुल पौन्धा

सृष्टि विवेचनम्
यहाँ पर्व मनाने की परम्परा में नववर्ष का पर्व विशेष महत्व रखता है, क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति चैत्र मास शुक्ला प्रतिपदा को स्वीकार की जाती है। किसी कवि ने कहा है कि-

चैत्रे मासि जगद् ब्रह्म ससर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति।।

सृष्टि किसे कहते हैं इस विषय में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज आर्योद्देश्यरत्नमाला में कहते हैं कि- ‘जो कर्ता की रचना से कारण द्रव्य किसी संयोग विशेष से अनेक प्रकार कार्यरूप होकर वर्तमान में व्यवहार करने योग्य होती है, वह सृष्टि कहाती है।’ इसी बात को स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में कहते हैं कि ‘सृष्टि उसको कहते हैं जो पृथक्द्रव्यों को ज्ञान, युक्तिपूर्वक मेल होकर नानारूप बनना।’
हम सभी इस सिध्दान्त से अवगत हैं कि किसी भी वस्तु का निर्माणकर्ता अवश्य होता है। निर्माणकर्ता पहले होता है और निर्मितवस्तु पश्चात् होती है। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और उसने जीवों के कल्याण के लिए यह सृष्टि बनायी। सृष्टि के सृजन से पूर्व मूल प्रकृति सत्व-रज-तम की साम्यावस्था में होती है।
सत्यार्थप्रकाश में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि – अनादि नित्य स्वरूप सत्व, रजस् और तमो गुण की एकावस्था रूप प्रकृति से उत्पन्न जो परम सूक्ष्म पृथक्-पृथक् तत्वायव विद्यमान हैं, उन्हीं का प्रथम ही जो संयोग का प्रारम्भ है, संयोग विशेषों से अवस्थान्तर दूसरी इसकी अवस्था को सूक्ष से स्थूल, स्थूल से बनते बनाते विविधरूप बनी है, इसी से संसर्ग होने से सृष्टि कहाती है।

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेदग॥

[ ऋग्वेद १०-१२९-७ ]

इस ऋग्वेदीय मन्त्र के आधार पर कहा गया है कि जिस परमेश्वर के द्वारा रचने से जो नाना प्रकार का जगत् उत्पन्न हुआ है,वही इस जगत् का धारणकर्ता, संहर्ता व स्वामी है।

अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यैरसाच्च विश्वकर्मणः समवत्रताग्रे।
अस्य त्वष्टा विदधद्रपमेति तन्मत्र्यस्य देवत्वमाजानमग्रे॥

[ यजु ३१-१७ ]

तेन पुरुषेण पृथिव्यै पृथिव्युत्त्पत्यर्थमद्भ्यो रसः सं भृतः संगृह्य तेन पृथिवी रचिता। एवमग्निरसेनाग्नेः सकाशादाप उत्पादिताः। अग्निश्च वायोः सकाशाद्वायुराकाशादुत्पादित आकाशः प्रकृतेः प्रकृतिः स्वसामथ्र्याच्च। विश्वं सर्वं कर्म क्रियमाणमस्य स विश्वकर्मा, तस्य परमेश्वरस्य सामर्थ्यमध्ये कारणाख्येग्रे सृष्टेः प्राग्जगत् समवत्र्तत वत्र्तमानमासीत्। तदानीं सर्वमिदं जगद् कारणभूतमेव नेदृशमिति। तस्य सामर्थ्यस्यांशान् गृहीत्वा त्वष्टा रचनकत्र्तेदं सकलं जगद्विदधत्।

[ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सृष्टिविद्याविषयः ]

अर्थात् परमपिता परमेश्वर ने पृथिवी की उत्पति के लिए जल से सारांश रस को ग्रहण करके, पृथिवी और अग्नि के परमाणुओं को मिला के पृथिवी रची है। इसी प्रकार अग्नि के परमाणु के साथ जल के परमाणुओं को मिलाकर जल को रचा एवं वायु के परमाणुओं के साथ अग्नि के परमाणुओं से वायु रचा है। वैसे ही अपने सामर्थ्य से आकाश को भी रचा है, जो कि सब तत्वों के ठहरने का स्थान है। इस प्रकार परमपिता परमेश्वर ने सूर्य से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् को रचा है।

सृष्टि उत्पत्ति विषय को अंगीकार कर  ऋग्वेद में इसका निरुपण इसप्रकार किया गया है कि –

ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्र्रो अणवः।।
समुद्रार्दणवादधि संवत्सरो अजायत।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।

अर्थात् प्रदीप्त आत्मिक तप के तेज से ऋत और सत्य नामक सार्वकालिक और सार्वभौमिक नियमों का प्रथम प्रादुर्भाव हुआ। तत्पश्चात् प्रलय की रात्रि हो गई। किन्हीं भाष्यकार के मत से यहां रात्रि शब्द अहोरात्र का उपलक्षण है और वे उस से प्रलय का ग्रहण न करके इसी कल्प की आदि सृष्टि के ऋतुओं सत्य के अनन्तर अहोरात्र का अविर्भाव मानते हैं। फिर मूलप्रकृति में विकृति होकर  उसके अन्तरिक्षस्थ समुद्र के प्रकट होने (उसके क्षुब्ध होने) के पश्चात् विश्व के वशीकर्ता विश्वेश्वर ने अहोरात्रों को करते हुए संवत्सर को जन्म दिया। इससे ज्ञात होता है कि – आदि सृष्टि में प्रथम सूर्योदय के समय भी संवत्सर और अहोरात्रों की कल्पना पर ब्रह्म के अनन्त ज्ञान में विद्यमान थी। उनके जन्म देने का यहां यहीं अभिप्राय प्रतीत होता है कि वेदोपदेश द्वारा इस संवत्सरारम्भ और उसके मन कल्पना का ज्ञान सर्वप्रथम मन्त्र द्रष्टा ऋषियों को हुआ वा यों कहिये कि – प्रत्येक सृष्टिकल्प के आदि में यथा निमय होता है और उन्होंने यह जान लिया कि – इतने अहोरात्रों के पश्चात् आज के दिन नवसंवत्सर के आरम्भ का नियम है और उसी के अनुसार प्रतिवर्ष संवत्सरारम्भ होकर वर्ष, मास और अहोरात्र की कालगणना संसार में प्रचलित हुई।
भारतीय संवत् के मासों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदयास्त से सम्बन्ध रखते है। यही बात तिथि अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी है। वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। विक्रम-संवत्  अपने अंग-उपागों के साथ र्पूणतः वैज्ञानिक सत्य पर स्थित है। विक्रम-संवत् विक्रमादित्य के बाद से प्रचलित हुआ। विक्रम-संवत् सूर्य सिध्दान्त पर आधारित है। वेद-वेदांगमर्मज्ञों  के अनुसार सूर्य सिध्दान्त का मान ही सदैव भ्रमहीन एवं सर्वश्रेष्ठ है। सृष्टि संवत् के प्रारम्भ से लेकर आज तक की गणनाएं की जाएं तो सूर्य-सिध्दान्त के अनुसार एक भी दिवस का अन्तर नहीं होगा। सौर मंडल को ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति एवं स्थिति पर हमारे दिन, महीने और वर्ष पर आधारित हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में कहते हैं कि-‘आदि सृष्टि मैथुनी नहीं होती, क्योंकि जब स्त्री पुरुष के शरीर परमात्मा बनाकर उनमें जीवों का संयोग कर देता है, तदनन्तर मैथुनी सृष्टि चलती है।’
सृष्टि और प्रलय को शास्त्रों में ब्रह्मदिन-ब्रह्मरात्री के नाम से जाना जाता है, ये दिन-रात के समान निरन्तर अनादि काल से चले आ रहे हैं। सृष्टि और प्रलय का समय बराबर माना है, इसमें कोई विवाद नहीं है। इसी प्रक्रिया को स्वामी जी कुछ इसप्रकार परिभाषित करते हैं कि – जैसे दिन के पूर्व रात और रात के पूर्व दिन, तथा दिन के पीछे रात और रात के पीछे दिन बराबर चला आता है, इसी प्रकार सृष्टि के पूर्व प्रलय और प्रलय के पूर्व  सृष्टि तथा सृष्टि के पीछे प्रलय और प्रलय के आगे सृष्टि अनादि काल से चक्र चला आता है। इसकी आदि वा अन्त नहीं, किन्तु जैसे दिन वा रात का आरम्भ और अन्त देखने में आता है, उसी प्रकार सृष्टि और प्रलय का आदि अन्त होता रहता है। क्योंकि जैसे परमात्मा, जीव, जगत् का कारण तीन स्वरूप से अनादि हैं, जैसे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और वर्तमान प्रवाह से अनादि हैं, जैसे नदी का प्रवाह वैसा ही दीखता है, कभी सूख जाता है, कभी नहीं दीखता फिर बरसात में दीखता और उष्ण काल में नहीं दीखता ,ऐसे व्यवहारों को प्रवाहरूप जानना चाहिए, जैसे परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव अनादि हैं, वैसे ही उसके जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करना भी अनादि है जैसे कभी ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव का आरम्भ और अन्त नहीं इसी प्रकार उसके कर्तव्य कर्मों का भी आरम्भ और अन्त नहीं।
सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय यह अनवरत चलने वाला चक्र है। ऋषिवर देव दयानन्द जी ऋग्वेदादिभाष्याभूमिका के वेदोत्पत्ति विषय में लिखते हैं कि-
सृष्टि के वर्तमान होने का नाम दिन और प्रलय होने का नाम रात्रि है। यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है इसके (१९६०८५२९७६) एक अर्ब, छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार, नव सौ, छहत्तर वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में व्यतीत हुए हैं और (२३३३२२७०२४) दो अर्ब तैंतीस करोड़, बत्तीस लाख, सत्ताइस हजार, चैबीस वर्ष इस सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं। इन में से अन्त का यह चैबीसवां वर्ष भोग रहा है। आगे आने वाले भोग के वर्षों में से एक-एक कांटाते जाना और गत वर्षों में क्रम से एक वर्ष मिलाते जाना चाहिए, जैसे आज पर्यन्त कांटाते बढ़ाते आए हैं।’
[ वेदोत्पत्ति विषय, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ]

ऋषि का अनुसरण करते हुए वर्तमान विक्रमी सम्वत् २०७४ को हम इस प्रकार से देखें-
१ सृष्टि = १४ मन्वन्तर
१ मन्वन्तर = ७१ चतुर्युग
१ चतुर्युग =  सतयुग (१७,२८,०००)
त्रेतायुग (१२,९६,०००)
द्वापरयुग (८,६४,०००)
कलियुग (४,३२,०००)
कुलयोग = ४३,२०,०००
७१ चतुर्युग (४३,२०,००० × ७१) = ३०,६७,२०,००० वर्ष
१४ मन्वन्तर (३०,६७,२०,००० × १४) = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष

(१४ मन्वन्तर – स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि तथा इन्द्रसावर्णि)

कुल सृष्टि की आयु    = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष
सृष्टि की वर्तमान आयु = १,९६,०८,५३,११८ वर्ष
इस प्रकार वर्तमान सृष्टि की आयु कुल आयु से कांटाने पर  सृष्टि की आयु  २,३३,३२,२६,८८२ अभी शेष रहती है। यह वैवस्वत् नामक सातवाएं मन्वन्तर वर्तमान में चल रहा है।    अनेक आचार्य १४ मन्वन्तरों की १५ सन्धिकाल के अवधि की गणना पृथक् करते हैं जिसके आधार पर वर्तमान सृष्टिसंवत् १,९६,०८,५३,११८ में ७ सन्धिकाल की आयु (७ × १७,२८,०००) १,२०,९६,००० मिलाकर १,९७,२९,४९,११८ सृष्टिसंवत् स्वीकारते हैं।
प्रत्येक संवत्सर अर्थात् वर्ष को २ अयन (उत्तरायण एवं दक्षाणायन), ६ ऋतु (वसन्त, गीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमन्त), १२ मास (चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन), २ पक्ष (शुक्ल एवं कृष्ण), ७ दिवस (रविवार, चन्द्रवार या सोमवार, भौमवार या मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार या गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार), १ अहोरात्र (दिन) अर्थात् ८ प्रहर में विभक्त किया गया।
परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि का निर्माण व इसको नियमित रूप से चलाये रखा है। उस परमेश्वर को जानने वाले हम लोग होवें। इसीलिए वेद हमें बार-बार उपदेश देता है कि-

हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।

[ ऋग्वेद १०/१२९/१ ]
अर्थात् हिरण्यगर्भ जो परमेश्वर है, वही एक सृष्टि के पहिले वर्तमान था, जो इस सब जगत् का स्वामी है और वहीं पृथिवी से लेके सूर्यपर्यन्त सब जगत् को रच के धारण कर रहा है। इसलिए उसी सुखस्वरूप परमेश्वर देव की ही हम लोग उपासना करें, अन्य की नहीं।

सभी सहृदय पाठकों को भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत् २०७४ एवं सृष्टिसंवत् १,९६,०८,५३,११८ तथा होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

– शिवदेव आर्य
गुरुकुल-पौन्धा, देहरादून
मो—8810005096

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