एवं यः सर्वभूतेषु पश्यत्यात्मानं आत्मना । स सर्वसमतां एत्य ब्रह्माभ्येति परं पदम्

इसी प्रकार समाधियोग से जो मनुष्य सब प्राणियों में परमेश्वर को देखता है वह सबको अपने आत्मा के समान प्रेमभाव से देखता है वही परमपद जो ब्रह्म-परमात्मा है उसको यथावत् प्राप्त होके सदा आनन्द को प्राप्त होता है ।

एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्तिभिः । जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ।

यह परमात्मा पञ्च-महाभूतों से सब प्राणियों को युक्त करके अर्थात् उनकी उत्पत्ति करके उत्पत्ति, वृद्धि और विनाश करते हुए सदा चक्र की तरह संसार को चलाता रहता है ।

एतं एके वदन्त्यग्निं मनुं अन्ये प्रजापतिम् । इन्द्रं एके परे प्राणं अपरे ब्रह्म शाश्वतम्

इस परमात्मा (12/122) को कोई ’अग्नि’, कोई प्रजापति परमात्मा को ’मनु’ कोई ’इन्द्र’, कोई ’प्राण’, दूसरे कोई शाश्वत ’ब्रह्म’ कहते हैं ।

’स्वप्रकाश होने से अग्नि’, विज्ञानस्वरूप होने से ’मनु’  , सबका पालन करने और परमैश्वर्यवान होने से इन्द्र, सबका जीवनभूत होने से प्राण और निरन्तर व्यापक होने से परमेश्वर का नाम ब्रह्म है । (स.प्र. प्रथम समु.)

महर्षि द्वारा प्रमाण रूप से अन्यत्र उद्धत- (1) प. वि. 13, (2) द. ल. भ्रा. नि. 196, (3) उपदेशमञ्जरी 52, (4) द. शा. 53 (5) द. ल. वेदांक 126 ।

प्रशासितारं सर्वेषां अणीयांसं अणोरपि । रुक्माभं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् । ।

जो सबको शिक्षा देने हारा, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाश स्वरूप, समाधिस्थ बुद्धि से जानने योग्य है, उसको परम पुरुष जानना चाहिए । (स. प्र. प्रथम समु.)

महर्षि द्वारा अपने ग्रन्थों में यह श्लोक निम्न स्थानों पर प्रमाण या पदांश के रूप में उद्धत किया गया है-

  • द. शा. 53 (2) उपदेश-मञ्जरी 52, (3) द. ल. वेदांक 126, (4) ऋ. प. वि. 13, (5) द. ल. भ्रा. नि. 196 (6) ऋ. भा. भू. 111 ।