हदीस : कुछ परिस्थितयों में उपवास अनिवार्य नहीं

कुछ परिस्थितयों में उपवास अनिवार्य नहीं

कुछ परिस्थितियों में उपवास वैकल्पिक है। मसलन, यात्रा के समय उपवास तोड़ा जा सकता है। इस विषय में किसी के पूछने पर मुहम्मद बोले-”चाहो तो रोज़ा रखो, चाहो तो तोड़ दो“ (2488)।

 

अगर आप ”अल्लाह की राह” यानी जिहाद में व्यस्त हैं, तो रोज़ा न रखने का भी पुरस्कार है। मुहम्मद मोमिनो से कहते हैं-”तुम सुबह दुश्मन से भिड़ने जा रहे हो और रोज़ा तोड़ने से ताकत मिलती है, तो रोज़ा तोड़ दो“ (2486)।

 

कई बार औरतें उपवास नहीं रखती थीं, ताकि वे अपने खाविंद के प्रति अपना फर्ज़ बेरोक निभा सकें। आयशा बतलाती हैं-”मुझे रमज़ान के कुछ रोज़े पूरे करने थे, पर मैं नहीं कर सकी ….. अल्लाह के रसूल के प्रति अपना फर्ज़ निभाने के लिए“ (2549)। मुहम्मद की दूसरी बीवियों के बारे में भी आयशा यही बतलाती हैं। ”अल्लाह के रसूल के जीवन-काल में, अगर हममें से किसी को (रमज़ान के रोज़े स्वाभाविक कारणों से यानी माहवारी के कारण) तोड़ने पड़ जाते तो फिर उन्हें पूरा करने का मौका, रसूल-अल्लाह के पास रहने के कारण, शबान (आठवें महीने) के आने तक नहीं पाती थी“ (2552)। अनुवादक व्याख्या करते हैं कि मुहम्मद की प्रत्येक बीवी ”उनके प्रति अधिक समर्पित थी कि वह रोज़े टाल जाती थी ताकि उनके प्रति बीवी का फर्ज़ निभाने में उसे रोज़े की रुकावट आड़े न आए“ (टि0 1546)।

 

फिर समर्पण के कारण ही नहीं, बल्कि मुहम्मद के आदेश के कारण भी बीवियां रोज़े नहीं रखती थीं। ”जब खाविन्द (घर पर) मौजूद हो तो उसकी इजाज़त के बिना किसी भी औरत को रोज़ा नहीं रखना चाहिए। और खविन्द की मौजूदगी में उसकी इजाज़त के बिना औरत को किसी भी महरम को घर में नहीं आने देना चाहिए“ (2238)। (महरम उस नज़दीकी रिश्तेदार को कहते हैं, जिसके साथ विवाह अवैध होता है)। औरत उसकी मौजूदगी में आज़ाद महसूस करती है और उसे पर्दा रखने की जरूरत नहीं होती।

 

अनुवादक हमें इस आदेश का औचित्य बतलाते हैं। ”इस्लाम का लोगों की प्राकृतिक प्रवृत्तियों के प्रति ऐसा सम्मान-भाव है कि वह औरतों को (स्वेच्छा से) उपवास न रखने की और अपने उन रिश्तेदारों को भी अपने कमरे में न आने देने की व्यवस्था देता है, जो उनके लिए महरम हों, जिससे कि वे (महरम) खाविन्दों द्वारा यौन-वासना की तृप्ति के रास्ते में बाधा न बने“ (टि0 1387)।

author : ram swarup

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