ईश्वर-परिचय

ईश्वर-परिचय

-प्रकाश चौधरी

यह सृष्टि अपने आप में ईश्वर-परिचय है। सूर्य, चाँद, पृथ्वी, लोक-लोकांतर और इनका संचालन किसी शक्ति का परिचय दे रहा है। जगत् का सत्ता में आना ही अपने आप में ईश्वर-परिचय है।

वह महामहिम है। उसकी महिमा के सममुख जगत् की हर सत्ता तुच्छ है। वह ‘पर’ है, ‘परम’ है सर्वोत्कृष्ट है, इसीलिए परमात्मा, परमेश्वर, परमदेव आदि नामों से स्मरण किया जाता है। वह इन्द्र है, उसके बल, विस्तार और यश का वर्णन नहीं हो सकता। कोई भी सांसारिक वस्तु उसका उपमान नहीं बन सकती। वह बेमिसाल है। ईश्वर वज्रधर है, पापी आत्माओं को दंड देने वाला है। जड़-चेतन सबका आश्रयदाता है।

वैदिक संस्कृति के अनुसार ईश्वर निराकार, अजन्मा, अगोचर, अमर, अनंत, निर्विकार, सीमा से परे है। यह जगत् जो दृश्यमान् है, वह केवल उसका एक चरण है। शेष तीन चरण तो पहुँच से, शायद कल्पना से भी परे हैं।

पौराणिक विचारधारा के अनुसार व अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार ईश्वर को कितने रूप दे दिए गये हैं और दिए जा रहे हैं। वे उसे एक मूर्ति में बाँधकर रख देना चाहते हैं। वे सत्य से दूर भागते हैं। ईश्वर बंधन रहित है। सर्वत्र एवं सर्व-व्यपाक है। वह एकदेशीय नहीं। वह कण-कण में विद्यमान है। वह उस काल्पनिक मूर्ति में भी है, परन्तु उसकी सारी शक्तियों तथा गुणों से मूर्ति परिपूर्ण नहीं। उसकी चेतन-शक्ति, उसका आनन्द-रस मूर्त्ति में विद्यमान नहीं। वह सब तो उसकी अपनी बनाई हुई मूर्तियों में ही है। आनन्द-रस तो वह स्वयं ही है। हर आत्मा को उसके  उस आनन्द-रस की तलाश है। ईश्वर ही हमारा मनभावन है। क्योंकि वही चेतन शक्ति है, ज्ञान स्वरूप है, प्रकाशमय है, ज्योतिपुञ्ज है। उसी के प्रकाश से यह जगत् प्रकाशमय है। हर कार्यशक्ति उसी की शक्ति से प्रेरित और गतिशील है। वह है तो हमारी सत्ता है। उसका नियंत्रण हट जाए तो यह जीवन निराधार होकर ढह जाए, क्योंकि वह ही सारे जगत् का आधार है।

ईश्वर ‘‘सत्पति’’ है। विलक्षण रक्षक है। वह विश्व की रक्षा अकेला ही करता है। उसे इस कार्य के लिए किसी से सहायता की आवश्यकता नहीं। वह सर्वशक्तिमान् एवं भयहीन है। प्रभु ‘अग्नि’ है। अग्नि-स्वरूप है। बाह्य जगत् में आदित्य रूप में प्रकाश प्रदान करता है। सबके  हृदय अन्तरिक्ष में भी प्रकाश उत्पन्न करता है। मार्ग-दर्शन करता है। वह ‘जातवेदा’ है। सब कुछ जानता है, क्योंकि वह सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक है।

स्वामी दयानन्द जी ने अपनी रचना ‘आर्योद्देश्यरत्नमाला’ में ईश्वर परिचय देते हुए कहा है कि ‘‘ईश्वर वह है जिसके गुण, कर्म, स्वभाव और स्वरूप सत्य ही हैं, जो केवल चेतनमात्र वस्तु है तथा जो एक अद्वितीय, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वत्र, व्यापक, अनादि और अनंत आदि सत्य गुणों वाला है। और जिसका स्वभाव अविनाशी, आनन्दी, शुद्ध, न्यायकारी और अजन्मा आदि है, जिसका कर्म जगत् की उत्त्पति, पालन और विनाश करना तथा सब जीवों को पाप पुण्य के फल ठीक-ठीक पहुँचाना है, उसको ईश्वर कहते हैं।’’

देव दयानन्द जी की इस ईश्वरीय परिभाषा के उपरान्त कुछ भी शेष नहीं बचता, जो वर्णन किया जाए। फिर भी वह अनन्त है। साधक उसका वर्णन तथा व्याखया करके भी ‘चरैवेति चरैवेति’ कहकर उठ खड़े होते हैं।

वेदों में अधिकतर मन्त्रों में उस प्रभु का परिचय, उसकी स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना का वर्णन है। कई मन्त्रों में परमेश्वर स्वयं अपना परिचय दे रहे हैं।

सामवेद में परमेश्वर कहते हैं कि ‘‘मैं ऋत का प्रथम जनक हूँ। यह दृश्यमान् जगत्, सूर्य, चंद्र, इनके ग्रहण, संवत्सर, मास, कृष्णपक्ष, शुक्ल-पक्ष, ऋतु, इनका उदय होना, अस्त होना, जितने भी सत्य नियम हैं, उनका प्रथम उत्पादक तथा व्यवस्थापक मैं ही हूँ। सूर्य, चंद्र, वायु, विद्युत, अग्नि, प्राकृतिक देव हैं। आत्मा, मन, चक्षु और शारीरिक देव या ऋषि मुनि उन सबसे मैं पहले का हूँ। साधकों को जिस अमृत की तलाश है, आनंद की खोज है, मैं ही उसका केन्द्र हूँ। यदि आनंद पाना चाहते हो तो मेरी शरण में आओ। मेरी अनुभूति करो और फिर दूसरों को मार्ग दिखाओ। दूसरों को इसका दान करो।’’

परमेश्वर ‘अन्न’ है। साधकों का भोजन है। जैसे अन्न के बिना शरीर नहीं रह सकता वैसे ही आत्मा एवं साधक ईश्वर के आनन्द-रस को पाए बिना नहीं रहते। ईश्वर ‘भोक्ता’ भी है। एक ना एक दिन यह सारा चराचर जगत् ही उदर में समेट लेता है।

ऐसे सर्वोत्कृष्ट ईश्वर को पाने के उद्देश्य से ही हमें यह मनुष्य जीवन मिला है। उसकी ही स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करें। कै से?

परमात्मा ‘त्वष्टा’ है। ऐसा शिल्पकार जिसने शरीर नगरी दे रखी है। यह देव नगरी है। हम अपनी ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों से सद्ज्ञान एवं कर्म करें, जिससे कि सारे दिव्य भाव इसी नगरी में रहना पसंद करे। ज्ञान का अधिपति आत्मा है जो दिव्य वचनों को प्रवाहित करता रहता है, हम उन्हें अनसुना ना करें। हमारा मन सदा सात्विक विचारों से पूर्ण हो और दिव्य भावनाओं को ही प्रेरित करे। हमारी वाणी सदा मधुर हो। सदा दिव्य वचन ही कहे। दिव्य भाव ही हमारा कवच है। बाह्य और आंतरिक सुरक्षा प्रदान करता है। ईश्वर का परिचय पाना ही केवल उद्देश्य न हो, उसके गुणों को धारण कर अपना तथा समाज का उत्थान  करें। चारों ओर दिव्य भावों एवं शान्ति का वातावरण हो और अपने परम-लक्ष्य उस परमपिता को पाने, उसकी अनुभूति को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हों।

 

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