डॉ अम्बेडकर के लेखन में परस्परविरोध: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

डॉ0 अम्बेडकर ने शंकराचार्य की आलोचना करते हुए उनके लेखन में परस्परविरोधी कथन माने हैं। उन्होंने उन परस्परविरोधों के आधार पर शंकराचार्य के कथनों को अप्रामाणिक कहकर अमान्य घोषित किया है और यह कटु टिप्पणी की है कि जिसके लेखन में परस्परविरोध पाये जाते हैं, उसे ‘‘पागल’’ ही कहा जायेगा। (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 8, पृ0 289)

आश्चर्य का विषय है कि स्वयं डॉ0 अम्बेडकर के ग्रन्थ परस्परविरोधी कथनों से भरे पड़े हैं और पुनरुक्तियों की तो कोई गणना ही नहीं है। यह स्वीकृत तथ्य है कि परस्परविरोध नामक दोष से युक्त कथन न तो प्रमाण-कोटि में आता है, न मान्य होता है, और न आदरणीय। न्यायालय में भी उसको प्रमाण नहीं माना जाता। बुद्धिमानों में ऐसा त्रुटिपूर्ण लेखन समानयोग्य नहीं होता। ऐसे लेखन को पढ़कर पाठक जहां दिग्भ्रमित होता है वहीं उससे उसे निश्चयात्मक ज्ञान नहीं होता। ऐसा लेखन तब होता है जब लेखक अस्थिरचित्त हो, अनिर्णय की स्थिति में हो, अथवा भावुकताग्रस्त हो। पाठक इन बातों का निर्णय अग्रिम उल्लेखों को स्वयं पढ़कर करें।

डॉ0 अम्बेडकर के लेखन को, विशेषतः इस अध्याय में उद्धृत संदर्भों को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि वे दो प्रकार की मनः- स्थिति में जीते रहे। जब उनका समीक्षात्मक मन उन पर प्रभावी होता था तो वे तर्कपूर्ण मत प्रकट करते थे, और जब प्रतिशोधात्मक मन प्रभावी होता था तो वे सारी मर्यादाओं को तोड़कर कटुतम शदों का प्रयोग करने लगते थे। उनका व्यक्तित्व बहुज्ञसपन्न किन्तु दुविधापूर्ण, समीक्षक किन्तु पूर्वाग्रहग्रस्त, चिन्तक किन्तु भावुक, सुधारक किन्तु प्रतिशोधात्मक था।

यहां परस्परिविरोधों को उद्धृत करने का मुय प्रयोजन यह भी दिखाना है कि डॉ0 अम्बेडकर ने अपने ग्रन्थों में मनुस्मृति के जिन श्लोकार्थों को प्रमाण रूप में उद्धृत किया है, उनमें परस्परविरोधी विधान हैं। एक श्लोकार्थ जो विधान कर रहा है, दूसरा उसके विपरीत विधान कर रहा है। डॉ0 अम्बेडकर ने दोनों तरह के श्लोकों को प्रमाण मानकर उद्धृत किया है। ऐसी स्थिति में ये प्रश्न उपस्थित होते हैं जिनका समाधान पाठकों को चाहिए-

  1. परस्परविरोधी श्लोकार्थ और मत, डॉ0 अम्बेडकर के लेखन में दोनों ही हैं। उनका ज्ञान डॉ0 अम्बेडकर को कैसे नहीं हुआ? उन्होंने दोनों को प्रस्तुत करते समय परस्परविरोध दोष पर ध्यान क्यों नहीं दिया? अथवा उनको स्वीकार क्यों नहीं किया?
  2. क्या कभी दोनों परस्परविरोधी वचन प्रामाणिक हो सकते हैं?
  3. क्या उनसे उनके लेखन की प्रामाणिकता नष्ट नहीं हुई है?
  4. परस्परविरोधी श्लोकार्थ मिलने पर क्या डॉ0 अम्बेडकर को मनु के किसी एक श्लोक को प्रक्षिप्त नहीं मानना चाहिए था? दोनों मौलिक कैसे माने जा सकते हैं?

यदि डॉ0 अम्बेडकर परस्परविरोध को स्वीकार कर एक को प्रक्षिप्त स्वीकार कर लेते तो उनकी मनुसबन्धी सारी आपत्तियों का निराकरण स्वतः हो जाता। न गलत निष्कर्ष प्रस्तुत होते, न उनका लेखन विद्वानों में अप्रमाणिक कोटि का माना जाता, न विरोध का बवंडर उठाना पड़ता। देखिए परस्परविरोधों के कुछ उदाहरण-

(1) क्या महर्षि मनु जन्मना जाति का जनक है?

आश्चर्य तो यह है कि इस बिन्दु पर डॉ0 अम्बेडकर के तीन प्रकार के परस्परविरोधी मत मिलते हैं। देखिए-

(अ)    मनु ने जाति का विधान नहीं बनाया अतः वह जाति का जनक नहीं

(क) ‘‘एक बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मनु ने जाति के विधान का निर्माण नहीं किया न वह ऐसा कर सकता था। जातिप्रथा मनु से पूर्व विद्यमान थी। वह तो उसका पोषक था।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 1, पृ0 29)

(ख) ‘‘कदाचित् मनु जाति के निर्माण के लिए जिमेदार न हो, परन्तु मनु ने वर्ण की पवित्रता का उपदेश दिया है।………वर्णव्यवस्था जाति की जननी है और इस अर्थ में मनु जातिव्यवस्था का जनक न भी हो परन्तु उसके पूर्वज होने का उस पर निश्चित ही आरोप लगाया जा सकता है।’’ (वही खंड 6, पृ0 43)

(आ) जाति-संरचना ब्राह्मणों ने की

(क) ‘तर्क में यह सिद्धान्त है कि ब्राह्मणों ने जाति-संरचना की।’’ (वही, खंड 1, पृ0 29)

(ख) ‘‘वर्ण-निर्धारण करने का अधिकार गुरु से छीनकर उसे पिता को सौंपकर ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया।’’ (वही, खंड 7, पृ0 172)

(इ) मनु जाति का जनक है

(क) ‘‘जाति-व्यवस्था का जनक होने के कारण विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के लिए मनु को स्पष्टीकरण देना होगा।’’ (वही, खंड 6, पृ0 57)

(ख) ‘‘मनु ने जाति का सिद्धान्त निर्धारित किया है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 228)

(ग) ‘‘वर्ण को जाति में बदलते समय मनु ने अपने उद्देश्य की कहीं व्याया नहीं की।’’ (वही, खंड 7, पृ0 168)

(2) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था प्रशंसनीय या निन्दनीय

(अ) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था प्रशंसनीय

(क) ‘‘प्राचीन चातुर्वर्ण्य पद्धति में दो अच्छाइयां थीं, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने स्वार्थ में अंधे होकर निकाल दिया। पहली, वर्णों की आपस में एक दूसरे से पृथक् स्थिति नहीं थी। एक वर्ण का दूसरे वर्ण में विवाह, और एक वर्ण का दूसरे वर्ण के साथ भोजन, दो बातें ऐसी थी जो एक-दूसरे को आपस में जोड़े रखती थीं। विभिन्न वर्णों में असामाजिक भावना के पैदा होने के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी, जो समाज के आधार को ही समाप्त कर देती है।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 218)

(ख) ‘‘यह कहना कि आर्यों में वर्ण के प्रति पूर्वाग्रह था जिसके कारण इनकी पृथक् सामाजिक स्थिति बनी, कोरी बकवास होगी। अगर कोई ऐसे लोग थे जिनमें वर्ण के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं था, तो वह आर्य थे।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 320)

(ग) ‘‘वर्ण-व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चारों वर्णों में शूद्र चौथा वर्ण है। यदि समाज केवल चार वर्णों में विभक्त मात्र रहता तो चातुर्वर्ण्यव्यवस्था में कोई आपत्ति न होती।’’ (शूद्रों की खोज, प्राक्कथन, पृ0 1)

(घ) ‘‘ब्राह्मणवाद ने समाज के आधार के रूप में वर्ण की मूल संकल्पना को किस प्रकार गलत और घातक स्वरूप दे दिया।’’ (वही, खंड 7, पृ0 169)

(ङ) ‘‘ब्राह्मणवाद ने प्रमुखतः जो कार्य किया, वह अन्तर्जातीय विवाह और सहभोज की प्रणाली को समाप्त करना था, जो प्राचीन काल में चारों वर्णों में प्रचलित थी।’’ (वही, खंड 7, पृ0 194)

(च) ‘‘बौद्ध पूर्व समय में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था एक उदार व्यवस्था थी और उसमें गुंजाइश थी। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में जहां चार विभिन्न वर्गों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था, वहां इन वर्गों में आपस में विवाह सबन्ध करने पर कोई निषेध नहीं था। किसी भी वर्ण का पुरुष विधिपूर्वक दूसरे वर्ण की स्त्री के साथ विवाह कर सकता था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 175)

(आ) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था निन्दनीय

(क) ‘‘चातुर्वर्ण्य से और अधिक नीच सामाजिक संगठन की व्यवस्था कौन-सी है, जो लोगों को किसी भी कल्याणकारी कार्य करने के लिए निर्जीव तथा विकलांग बना देती है। इस बात में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 95)

(ख) ‘‘कोई व्यक्ति जो जन्मजात जड़बुद्धि या मूर्ख नहीं है, चातुर्वर्ण्य को समाज का आदर्श रूप कैसे स्वीकार कर सकता है?’’ (वही, खंड 1, ‘रानाडे, गांधी और जिन्ना’ पृ0 263)

(ग) ‘‘चातुर्वर्ण्य के ये प्रचारक बहुत सोच-समझकर बताते हैं कि उनका चातुर्वर्ण्य जन्म के आधार पर नहीं बल्कि गुण के आधार पर है। यहां पर पहले ही मैं बता देना चाहता हूं कि भले ही यह चातुर्वर्ण्य गुण के आधार पर हो, किन्तु यह आदर्श मेरे विचारों से मेल नहीं खाता।’’ (वही, खंड 1, पृ0 81)

(3) वेदों की चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था

(अ) वेदों का चातुर्वर्ण्य उत्तम और समानजनक-

(क) ‘‘शूद्र आर्यं समुदाय के अभिन्न, जन्मजात और समानित सदस्य थे। यह बात यजुर्वेद में उल्लिखित एक स्तुति से पुष्ट होती है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 322)

(ख) ‘‘शूद्र आर्य समुदाय का सदस्य होता था और वह उसका समानित अंग था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 322)

(ग) ‘‘मैं मानता हूं कि स्वामी दयानन्द व कुछ अन्य लोगों ने वर्ण के वैदिक सिद्धान्त की जो व्याया की है, बुद्धिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है। ’’ (वही, खंड 1, पृ0 119)

(घ) ‘‘चातुर्वर्ण्य की वैदिक पद्धति जाति व्यवस्था की अपेक्षा उत्तम थी।’’ (वही, खंड 7, पृ0 218)

(ङ) ‘‘वेद में वर्ण की धारणा का सारांश यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाए, जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के लिए उपयुक्त हो।…….वह (वैदिक वर्णव्यवस्था) केवल योग्यता को मान्यता देती है। वर्ण के बारे में महात्मा (गांधी) के विचार न केवल वैदिक वर्ण को मूर्खतापूर्ण बनाते हैं, बल्कि घृणास्पदाी बनाते हैं।……वर्ण और जाति दो अलग-अलग धारणाएं हैं।’’ (वही, खंड 1, पृ0 119)

(आ)   वेदों का चातुर्वर्ण्य समाज-विभाजन और असमानता का जनक-

(क) ‘‘यह निर्विवाद है कि वेदों ने चातुर्वर्ण्य के सिद्धान्त की रचना की है, जिसे पुरुषसूक्त नाम से जाना जाता है। यह दो मूलभूत तत्त्वों को मान्यता देता है। उसने समाज के चार भागों में विभाजन को एक आदर्श योजना के रूप में मान्यता दी है। उसने इस बात को भी मान्यता प्रदान की है कि इन चारों भागों के सबन्ध असमानता के आधार पर होने चाहिएं।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ0 105)

(ख) ‘‘जातिप्रथा, वर्णव्यवस्था का नया संस्करण है, जिसे वेदों से आधार मिलता है।’’ (वही, खंड 9, पृ0 160)

(4) वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था का सबन्ध

(अ) जातिव्यवस्था, वर्णव्यवस्था का विकृत रूप है

(क) ‘‘कहा जाता है कि जाति, वर्ण-व्यवस्था का विस्तार है। बाद में मैं बताऊंगा कि यह बकवास है। जाति वर्ण का विकृत स्वरूप है। यह विपरीत दिशा में प्रसार है। जात-पात ने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह विकृत कर दिया है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 181)

(ख) ‘‘जातिप्रथा चातुर्वर्ण्य का, जो कि हिन्दू का आदर्श है, एक भ्रष्ट रूप है।’’ (वही, खंड 1, पृ0 263)

(ग) ‘‘अगर मूल वर्ण पद्धति का यह विकृतीकरण केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित रहता, तब तक तो सहन हो सकता था। लेकिन ब्राह्मण धर्म इतना कर चुकने के बाद भी संतुष्ट नहीं रहा। उसने इस चातुर्वर्ण्य पद्धति के परिवर्तित तथा विकृत रूप को कानून बना देना चाहा।’’ (वही, खंड 7, पृ0 216)

(आ) जातिव्यवस्था, वर्णव्यवस्था का विकास है

(क) ‘‘वर्णव्यवस्था जाति की जननी है।’’ (वही, खंड 6, ‘हिन्दुत्व का दर्शन’ पृ0 43)

(ख) ‘‘कुछ समय तक ये वर्ण केवल वर्ण ही रहे। कुछ समय के बाद जो केवल वर्ण ही थे, वे जातियां बन गईं और ये चार जातियां चार हजार बन गईं। इस प्रकार आधुनिक जाति-व्यवस्था प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का विकास मात्र है।’’

‘‘निस्ंसदेह यह जाति व्यवस्था का ही विकास है। लेकिन वर्ण व्यवस्था के अध्ययन द्वारा कोईाी जाति-व्यवस्था के विचार को नहीं समझ सकता है। जाति का वर्ण से पृथक् अध्ययन किया जाना चाहिए।’’ (वही, खंड 6, पृ0 176)

(5) शूद्र आर्य या अनार्य?

(अ) शूद्र मनुमतानुसार आर्य थे

(क) ‘‘धर्मसूत्रों की यह बात कि शूद्र अनार्य हैं, नहीं माननी चाहिए। यह सिद्धान्त मनु तथा कौटिल्य के विपरीत है।’’ (शूद्रों की खोज, पृ0 42)

(ख) ‘‘आर्य जातियों का अर्थ है चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। दूसरे शदों में मनु चार वर्णों को आर्यवाद का सार मानते हैं।’’….[ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः त्रयो वर्णाः’’ (मनु0 10.04)] यह श्लोक दो कारणों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। एक तो यह कि इसमें शूद्रों को दस्यु से भिन्न बताया गया है। दूसरे, इससे पता चलता है कि शूद्र आर्य हैं।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 8, पृ0 217)

(आ) शूद्र मनुमतानुसार अनार्य थे

(क) ‘‘मनु शूद्रों का निरूपण इस प्रकार करता है, जैसे वे बाहर से आने वाले अनार्य थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 319)

(6) शूद्रों का वेदाध्ययन-अधिकार

(अ) वेदों में समानपूर्वक शूद्रों का अधिकार था

(क) ‘‘वेदों का अध्ययन करने के बारे में शूद्रों के अधिकारों के प्रश्न पर ‘छान्दोग्य उपनिषद्’ उल्लेखनीय है।…….एक समय ऐसा भी था, जब अध्ययन के सबन्ध में शूद्रों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 324)

(ख) ‘‘केवल यही बात नहीं थी कि शूद्र वेदों का अध्ययन कर सकते थे। कुछ ऐसे शूद्र थी थे, जिन्हें ऋषि-पद प्राप्त था और जिन्होंने वेदमन्त्रों की रचना की। कवष एलूष नामक ऋषि की कथा बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। वह एक ऋषि था और ऋग्वेद के दसवें मंडल में उसके रचे हुए अनेक मन्त्र हैं।’’ (वही, खंड 7, पृ0 324)

(ग) ‘‘शतपथ ब्राह्मण में ऐसा प्रमाण मिलता है कि शूद्र सोम यज्ञ कर सकता था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 324)

(घ) ‘‘ऐसेाी प्रमाण हैं कि शूद्र स्त्री ने ‘अश्वमेध’ नामक यज्ञ में भाग लिया था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 325)

(ङ) ‘‘जहां तक उपनयन संस्कार और यज्ञोपवीत धारण करने का प्रश्न है, इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता कि यह शूद्रों के लिए वर्जित था। बल्कि ‘संस्कार गणपति’ में इस बात का स्पष्ट प्रावधान है और कहा गया है कि शूद्र उपनयन के अधिकारी हैं।’’ (वही, खंड 7, पृ0 325-326)

(आ) वेदों में शूद्रों का अधिकार नहीं था

(क) ‘‘वेदों के ब्राह्मणवाद में शूद्रों का प्रवेश वर्जित था, लेकिन भिक्षुओं के बौद्ध धर्म के द्वार शूद्रों के लिए खुले हुए थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 197)

(7) शूद्र का सेवाकार्य स्वेच्छापूर्वक

(अ) शूद्र सेवाकार्य में स्वतन्त्र है

(क) ‘‘ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक ही व्यवसाय नियत किया है-विनम्रता पूर्वक तीन अन्य वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना [मनु0 1.91]।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 318, 201, 231; खंड 6, पृ0 62, 142; खंड 9, पृ0 105, 109, 177, खंड 13, पृ0 30 आदि)

(ख) ‘‘यदि कोई शूद्र (जो ब्राह्मणों की सेवा से अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर पाता है) जीविका चाहता है तब वह क्षत्रिय की सेवा करे या वह किसी धनी वैश्य की सेवा कर अपना जीवन-निर्वाह करे (मनु0 10.121)।’’ (वही, खंड 9, पृ0 116, 177; खंड 6, पृ0 152;)

(आ) शूद्र को केवल ब्राह्मण की सेवा करनी है

(क) ‘‘परन्तु शूद्र को ब्राह्मण की सेवा करनी चाहिए [10.122]।’’ (वही, खंड 6, पृ0 61, 152; खंड 9, पृ0 177)

(ख) ‘‘ब्रह्मा ने ब्राह्मणों की सेवा के लिए ही शूद्रों की सृष्टि की है [मनु0 8.413]।’’ (वही, खंड 7, पृ0 200; खंड 9, पृ0 177,)

(ग) ‘‘ब्राह्मणों की सेवा करना शूद्र के लिए एकमात्र उत्तम कर्म कहा गया है क्योंकि इसके अतिरिक्त वह जो कुछ करेगा, उसका उसे कोई फल नहीं मिलेगा (मनु0 10.123)।’’ (वही, खंड 9, पृ0 113, 177; खंड 6, पृ0 98; खंड 7, पृ0 234)

(8) शूद्र वेतनभोगी सेवक या पराधीन?

(अ) शूद्र को उचित वेतन और जीविका दें

(क) ‘‘शूद्र की क्षमता, उसका कार्य तथा उसके परिवार में उस पर निर्भर लोगों की संया को ध्यान में रखते हुए वे लोग उसे अपनी पारिवारिक संपत्ति से उचित वेतन दें (मनु0 10.124)।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ0 62, 152; खंड 7, पृ0 201, 234, 318; खंड 9, पृ0 116, 178)

(ख) ‘‘वेद में वर्ण की धारणा का सारांश यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाए जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के लिए उपयुक्त हो।’’ (वही, खंड 1, पृ0 119)

(आ) शूद्र गुलाम था

(क) ‘‘मनु ने गुलामी को मान्यता प्रदान की है। परन्तु उसने उसे शूद्र तक ही सीमित रखा।’’ (वही, खंड 6, पृ0 45)

(ख) ‘‘अपने अन्न का शेष भाग और उसके साथ ही पुराने कपड़े अनावश्यक अनाज और अपने घर का साज-सामान उसे देना चाहिए (मनु0 10.125)।’’ (वही, खंड 6, पृ0 62, 152; खंड 7, पृ0 201, 234, 318; खंड 9, पृ0 116, 178)

(ग) ‘‘प्रत्येक ब्राह्मण शूद्र को दास कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है, चाहे उसने उसे खरीद लिया हो अथवा नहीं, क्योंकि शूद्रों की सृष्टि ब्राह्मणों का दास बनने के लिए ही की है [मनु0 8.413]।’’ (वही, खंड 7, पृ0 318)

(घ) ‘‘उनका (शूद्रों का) भोजन आर्यों के भोजन का उच्छिष्ट अंश होगा (मनु0 5.140)।’’ (वही, खंड 9, पृ0 113)

(9) मनु की दण्डव्यवस्था कौन-सी है?

(अ) ब्राह्मण सबसे अधिक दण्डनीय और शूद्र सबसे कम

‘‘यदि पिता, शिक्षक, मित्र, माता, पत्नी, पुत्र, घरेलू पुरोहित, अपने-अपने कर्त्तव्य का दृढ़ता व सच्चाई के साथ निष्पादन नहीं करते हैं तो इनमें से किसी को भी राजा द्वारा बिना दंड के नहीं छोड़ा जाना चाहिए।’’ (मनु0 8.335,336) (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 6, पृ0 61, 156 तथा खंड 7, 250)

(ख) ‘‘चोरी करने पर शूद्र को आठ गुना, वैश्य को सोलह गुना, और क्षत्रिय को बत्तीस गुना पाप होता है। ब्राह्मण को चौंसठ गुना या एक सौ गुना या एक सौ अठाईस गुना तक, इनमें से प्रत्येक को अपराध की प्रकृति की जानकारी होती है [मनु0 8.337, 338]।’’ (वही, खंड 7, पृ0 163)

(आ) ब्राह्मण दण्डनीय नहीं है, शूद्रादि अधिक दण्डनीय

(क) ‘‘पुरोहित वर्ग के व्यभिचारी को प्राणदंड देने की बजाए उसका अपकीर्तिकर मुंडन करा देना चाहिए तथा इसी अपराध के लिए अन्य वर्गों को मृत्युदंड तक दिया जाए (मनु0 8.379)।’’ (वही, खंड 6, पृ0 49)

(ख) ‘‘(राजा) किसी भी ब्राह्मण का वध न कराए, चाहे उस ब्राह्मण ने साी अपराध क्यों न किए हों, वह ऐसे (अपराधी को) अपने राज्य से निष्कासित कर दे और उसे (अपनी) समस्त सपत्ति और अपना (शरीर) सकुशल ले जाने दे (मनु0 8.380)। (अम्बेडकर वाङ्मय खंड 9, पृ0 115 तथा खंड 6, पृ0 49, 150 तथा खंड 7, पृ0 161)’’

(ग) ‘‘लेकिन न्यायप्रिय राजा तीन निचली जातियों (वर्णों) के व्यक्तियों को आर्थिक दंड देगा और उन्हें निष्कासित कर देगा, जिन्होंने मिथ्या साक्ष्य दिया है, लेकिन ब्राह्मण को वह केवल निष्कासित करेगा (मनु0 8.123, 124)।’’ (वही खंड 7, पृ0 161, 245)

(घ) ‘‘कोई भी ब्राह्मण जिसने चाहे तीनों लोकों के मनुष्यों की हत्याएं क्यों न की हों, उपनिषदों के साथ-साथ ऋक्, यजु या सामवेद का तीन बार पाठ कर साी पापों से मुक्त हो जाता है। (मनु0 11.261-262)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 158)

(10) शूद्र का ब्राह्मण बनना

(अ) आर्यों में शूद्र ब्राह्मण बन सकता था

(क) ‘‘इस प्रक्रिया में यह होता था कि जो लोग पिछली बार केवल शूद्र होने के योग्य बच जाते थे, ये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुन लिए जाते थे, जब कि पिछली बार जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गए होते थे, वे केवल शूद्र होने के योग्य होने के कारण रह जाते थे। इस प्रकार वर्ण के व्यक्ति बदलते रहते थे।’’ (वही, खंड 7, पृ0 170)

(ख) ‘‘अन्य समाजों के समान भारतीय समाज भी चार वर्णों में विभाजित था।…….इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा कि आरंभ में यह अनिवार्य रूप से वर्ग विभाजन के अन्तर्गत व्यक्ति दक्षता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था और इसीलिए वर्णों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी।’’ (वही, खंड 1, पृ0 31)

(ग) ‘‘जिस प्रकार कोई शूद्र ब्राह्मणत्व को और कोई ब्राह्मण शूद्रत्व को प्राप्त होता है, उसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न शूद्र भी क्षत्रियत्व और वैश्यत्व को प्राप्त होता है (मनुस्मृति 10.65)’’ (वही, खंड 13, पृ0 85)

(घ) ‘‘प्रत्येक शूद्र जो शुचिपूर्ण है, जो अपने से उत्कृष्टों का सेवक है, मृदुभाषी है, अहंकाररहित है, और सदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है, वह उच्चतर जाति प्राप्त करता है (मनु0 9.335)’’ (वही, खंड 9, पृ0 117)

(आ) आर्यों में शूद्र ब्राह्मण नहीं बन सकता था

(क) ‘‘आर्यों के समाज में शूद्र अथवा नीच जाति का मनुष्य कभी ब्राह्मण नहीं बन सकता था।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 93)

(ख) ‘‘वैदिक शासन में शूद्र ब्राह्मण बनने की कभी आकांक्षा नहीं कर सकता था।’’ (वही, खंड 7, पृ0 197)

(ग) ‘‘उच्च वर्ण में जन्मे और निम्न वर्ण में जन्मे व्यक्ति की नियति उसका जन्मजात वर्ण ही है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 146)

(11) ब्राह्मण कौन हो सकता था?

(अ) वेदों का विद्वान् ब्राह्मण होता था

(क) ‘‘स्वयंभू मनु ने ब्राह्मणों के कर्त्तव्य वेदाध्ययन, वेद की शिक्षा देना, यज्ञ करना, अन्य को यज्ञ करने में सहायता देना और अगर वह धनी है, तब दान देना और अगर निर्धन है, तब दान लेना निश्चित किए (मनु0 1.88)।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 230; खंड 6, पृ0 142; खंड 9, पृ0 104; खंड 13, पृ0 30)

(ख) ‘‘वेदों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना, अन्य को यज्ञ करने में सहायता देना, यदि पर्याप्त सपत्ति है तब निर्धनों को दान देना, यदि स्वयं निर्धन है तब पुण्यशील व्यक्तियों से दान लेना, ये छह कर्त्तव्य प्रथम उत्पन्न वर्ण (ब्राह्मणों) के हैं (मनु0 10.75)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 160, 231; खंड 6, पृ0 142; खंड 9, पृ0 113)

(ग) ‘‘वर्ण के अधीन कोई ब्राह्मण मूढ़ नहीं हो सकता। ब्राह्मण के मूढ़ होने की संभावना तभी हो सकती है, जब वर्ण जाति बन जाता है, अर्थात् जब कोई जन्म के आधार पर ब्राह्मण हो जाता है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 173)

(आ) वेदाध्ययन से रहित मूर्खाी ब्राह्मण होता था

(क) ‘‘कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है अर्थात् जिसने न तो वेदों का अध्ययन किया है और न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है, वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निर्वचन कर सकता है अर्थात् न्यायाधीश के रूप में कार्य कर सकता है, लेकिन शूद्र यह कभीाी नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही विद्वान् क्यों न हो (मनु0 8.20)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 317; खंड 9, पृ0 109, 176; खंड 13, 30)

(ख) ‘‘जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान्, दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है (मनु0 9.317)।’’ (वही, खंड 7, पृ0 230; खंड 6, पृ0 155; 101)

(12) मनुस्मृति विषयक मान्यता

(अ) मनुस्मृति धर्मग्रन्थ और नीतिशास्त्र है

(क) ‘‘इस प्रकार मनुस्मृति कानून का ग्रन्थ है…….चूंकि इसमें जाति का विवेचन है जो हिन्दू धर्म की आत्मा है, इसलिए यह धर्मग्रन्थ है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 226)

(ख) ‘‘मनुस्मृति को धर्मग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।’’ (वही, खंड 7, पृ0 228)

(ग) ‘‘अगर नैतिकता और सदाचार कर्त्तव्य है, तब निस्संदेह मनुस्मृति नीतिशास्त्र का ग्रन्थ है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 226)

(आ) मनुस्मृति धर्मग्रन्थ और नीतिशास्त्र नहीं है

(क) ‘‘यह कहना कि मनुस्मृति एक धर्मग्रन्थ है, बहुत कुछ अटपटा लगता है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 226)

(ख) ‘‘हम कह सकते हैं कि मनुस्मृति नियमों की एक संहिता है। यह कथन अन्य स्मृतियों के बारे मेंाी सच है। यह न तो नीतिशास्त्र है और न ही कोई धार्मिक ग्रन्थ है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 224)

(13) समाज में पुजारी की आवश्यकता

(अ) पुजारी आवश्यक था बौद्ध धर्म के लिए

(क) बौद्ध धर्म के समर्थन में डॉ0 अम्बेडकर लिखते हैं-‘‘धर्म की स्थापना केवल प्रचार द्वारा ही की जा सकती है। यदि प्रचार असफल हो जाए तो धर्म भी लुप्त हो जाता है। पुजारी वर्ग, वह चाहे जितना भी घृणास्पद हो, धर्म के प्रवर्तन के लिए आवश्यक होता है। धर्म, प्रचार के आधार पर ही रह सकता है। पुजारियों के बिना धर्म लुप्त हो जाता है। इस्लाम की तलवार ने (बौद्ध) पुजारियों पर भारी आघात किया। इससे वह या तो नष्ट हो गया या भारत के बाहर चला गया।’’ (वही, खंड 7, पृ0 108)

(आ) हिन्दू धर्म में पुजारी नहीं हो

हिन्दू धर्म का विरोध करते हुए वे लिखते हैं-

(क) ‘‘अच्छा होगा, यदि हिन्दुओं में पुरोहिताई समाप्त की जाए।’’ (वही, खंड 1, पृ0 101)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *