सूत्र :चोद्यन्तेचार्थकर्मसु ९
सूत्र संख्या :9
व्याख्याकार : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय
अर्थ : पाद १ सूत्र ४८ तक की व्याख्या
प्रधान कर्म क्या है और शेष कर्म क्या है। इसकी मीमांसा पिछले अध्यायों में हो चुकी। अब इस पाद में प्रयोजन की मीमांसा होगी अर्थात् अमुक काम क्यों करना चाहिये। कुछ कर्म तो मनुष्य अपने मुख्य फल की प्राप्ति के लिये करता है। कुछ कर्म ऐसे हैं जो सीधे उस फल को प्राप्त नहीं करा सकते परन्तु पहले कहे कर्मों के साधक होते हैं। जो कर्म अपने कत्र्ता को सीधे फल की प्राप्ति कराता है वह ‘पुरुषार्थ’ है, उसी पुरुषार्थ का नाम क्रतु है। जो पुरुषार्थ अर्थात् क्रतु का सहायक है वह क्रत्वर्थ है। अध्याय ४ का मुख्य विषय है प्रयोजन। परन्तु पहले २० सूत्रों में इस बात पर विचार किया गया है कि पुरुषार्थ क्या है, और क्रत्वर्थ क्या है? पहले २० सूत्र वस्तुत: अध्याय ३ के ही पूरक हैं। मुख्य विषय २०वें सूत्र के पश्चात् आरम्भ होगा।
बहुत से ऐसे कर्म हैं जो क्रत्वर्थ प्रतीत होते हैं परन्तु हैं पुरुषार्थ—जैसे—
(१) अनतिदृश्यं स्तृणाति, अनति दृश्यमेवैनं प्रजया पशुभि: करोति। (तै०सं० २.६.५.२)
=वह वेदी पर कुश इस प्रकार बिछाता है कि वेदी दीखती नहीं, इसका फल यह है कि वह स्वयं सन्तान और पशु की बहुतायत के कारण दिखाई नहीं पड़ता।
(२) आहार्य पुरीषां पशुकामस्य वेदिं कुर्यात्। वत्सजानु पशुकामस्य वेदिं कुर्यात्। गोदोहनेन पशुकामस्य प्रणयेत्। (पशु की कामना वाला वेदी को ऐसा बनावे कि कूड़ा सुगमता से निकल जाय। झाडू पतली हो जैसी बछड़े की टांग। जल दूध की दुहनी में लावे (वह पात्र जिस में दूध दुहा करते हैं)।
भाष्यकार का मत है कि यह काम यद्यपि क्रतु के उपकारक प्रतीत होते हैं परन्तु क्रत्वर्थ नहीं, पुरुषार्थ हैं। क्योंकि श्रुति में इनको क्रत्वर्थ नहीं बताया। ‘‘न च य उपकरोति स शेष:। यस्तु यदर्थ: श्रूयते स तस्य शेष इत्युक्तं शेष: परार्थत्वादिति’’ (देखो, भाष्य सू० २) अर्थात् केवल उपकार करने मात्र से कोई कर्म किसी का शेष नहीं कहलाता। श्रुति में दिया होना चाहिये कि अमुक कर्म अमुक कर्म का शेष या अङ्ग है, क्योंकि सूत्र ३.१.३ में शेष का लक्षण यह किया है ‘शेष: परार्थत्वात्’। अर्थात् श्रुति में जिसको किसी अन्य का अङ्ग बताया गया हो वह शेष है।
इसी प्रकार धनोपार्जन भी पुरुषार्थ है, क्रत्वर्थ नहीं; क्योंकि धन केवल यज्ञ के ही लिये तो कमाया नहीं जाता।१
(३) ‘नोद्यन्तमादित्यमीक्षेत नास्तंयन्तम्’। यह प्रजा-पतिव्रत कहलाता है अर्थात् न निकलते सूर्य की ओर देखे, न अस्त होते सूर्य की ओर। इसका फल दिया है ‘हैनसाऽयुक्तो भवति’ अर्थात् इससे पाप नहीं लगता। यह भी पुरुषार्थ है।२
(४) गोलक्षण व्रत में ‘कर्तरीकण्र्य: कर्तव्या:’ यह कर्तरीकर्णा कर्म भी पुरुषार्थ हैं। (सू० ४)
(५) जो कर्म दूसरे कर्मों का अंग बता दिये गये, वह क्रत्वर्थ हैं जैसे ‘समिधो यजति, तनूनपातं यजति, ‘नानृतं’ वदेत्।’ (सू० ५)
यज्ञ के १० आयुध हैं—स्फ्या (लकड़ी की खुरपी जिससे जमीन खोदते हैं)। कपाल (मिट्टी के तवे या ठीकरे जिन पर पुरोडाश पकाते हैं), हवणी (आहुति देने का पात्र), सूप (धान फटकने के लिये), कृष्णाजिन (मृगछाला जिसको उलूखल के नीचे बिछा लेते हैं), शम्या (एक खूंटी या कीली) उलूखल, मूसल, पीसने की चक्की के दो पाट नीचे का दृषद् ऊपर का उपल। (सू० ७)३
(६) प्रधान आहुतियों के पश्चात् शेष हवि से जो उत्तम-प्रयाज पशु पुरोडाश और स्विष्टकृत् आदि कर्म किये जाते हैं। वे ‘आश्रीय कर्म’ कहलाते हैं। इनका फल अदृष्ट होता है। (सू० १८-२०)
२०वें सूत्र पर अध्याय ३ का विषय समाप्त होगया अर्थात् प्रधान कर्म कौनसा है, गौण-कर्म कौनसा। इसके पश्चात् २१वें सूत्र से यह विचार चलेगा कि द्रव्यों के प्रयोजन और कर्मों के प्रयोजन कहीं एक ही हैं और कहीं भिन्न-भिन्न। (सू० २१)
(१) चातुर्मास्य इष्टियों के वैश्वदेव यज्ञ में आमिक्षा बनाते हैं। गर्म दूध में दही डालने से जम जाता है। जमे हुये भाग को आमिक्षा कहते हैं। जो पानी छूटता है उसको वाजी कहते हैं। कर्म एक था दूध और दही का मिलाना। द्रव्य को उत्पन्न हुये आमिक्षा और वाजी। प्रश्न यह है कि क्या मिलाने के काम के दो प्रयोजन थे आमिक्षा भी और वाजी भी? उत्तर यह है कि प्रयोजन केवल आमिक्षा था वाजी नहीं। यदि आमिक्षा नष्ट हो जाय तो दूसरी आमिक्षा बनानी पड़े। यदि वाजी नष्ट हो जाय तो दुबारा वाजी नहीं बनाना पड़ेगा। इसका नाम है वाजिन् न्याय।१
(२) सोम क्रय के लिये गाय लाते हैं। उसको ६ पग चलाते हैं। सातवां पग जहां पड़े वहां की धूलि उठाकर गाड़ी के पहिये में मल देते हैं। यहां गाय के लाने का प्रयोजक सोम है। धूलि नहीं।२
(३) ‘पुरोडाश’ तवों पर पकाया जाता है। पकाने से पहले उन्हीं तवों से सूप का भी काम लेकर चावल फटक लेते हैं और पीसकर पुरोडाश बनाते हैं। परन्तु कपालों का प्रयोजन है पुरोडाश पकाना न कि चावल फटकना।३
(४) दर्शपूर्णमास के प्रकरण में श्रुति है—उत्तराद्र्धात् स्वष्टिकृते समवद्यति। (तै०सं० २.६.६.५) अर्थात् पुरोडाश के अगले भाग से स्विष्टकृत् आहुति के लिये एक टुकड़ा काट लेता है। यहां पुरोडाश बनाने का प्रयोजन आग्नेय याग है, स्विष्टकृत् नहीं।
(५) वाजपेय यज्ञ का प्रधान यज्ञ है ‘ज्योतिष्टोम’। उसके सम्बन्ध में एक श्रुति है ‘प्रयाजशेषेण हवींषि अभिघारयति’ (तै०ब्रा० १.३.४.४) अर्थात् प्रयाज आहुतियों के देने के पश्चात् जो घी बचे उसे हवियों में डाल दे। चोदक नियम से यही काम वाजपेय में भी होना चाहिये। परन्तु वहां कुछ बचता ही नहीं। अत: अवधारण के पात्र की भी आवश्यकता नहीं होती।
(६) दर्श-पूर्णमास के प्रकरण में एक श्रुति है—‘अतिहायेडो बॢह: प्रति समानयति जुह्वामौपभृतम्।’ अर्थात् ‘इट्’ नामक तीसरे प्रयाज को छोडक़र ‘बर्हि’ नामक चौथे प्रयाज के लिये उपभृत मेंं जो उपस्थित घी था उसमें से जुहू में घी निकालना है। इसका नाम है ‘समानयन क्रिया’। यह मुख्य क्रिया है। उपभृत में से चार-चार भाग दो बार निकाले जाते हैं। उनको ‘चतुर्गृहीत’ कहते हैं। उनसे प्रयाज और अनुयाज दोनों की आहुतियां दी जाती हैं।