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Meemansa दर्शन-COLLECTION OF KNOWLEDGE
DARSHAN
दर्शन शास्त्र : Meemansa दर्शन
 
Language

Darshan

Adhya

Shlok

सूत्र :वचनादितरेषां स्यात् २
सूत्र संख्या :2

व्याख्याकार : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

अर्थ : पाद ८ सूत्र १ से ४४ तक की व्याख्या इस पाद में प्राय: यजमान के कर्तव्यों का वर्णन है। (१) दक्षिणा देकर ऋत्विजों की सेवाओं को क्रय करना यजमान का काम है। जैसे ज्योतिष्टोम में १२०० मुद्रा देना या दर्शपूर्ण मास में अन्वाहार्य अर्थात् पके चावल देना। परन्तु जहां विशेष विधान है वहां यह दक्षिणा दूसरे भी दे सकते हैं जैसे ‘य एतामिष्टकामुपदध्यात् स त्रीन् वरान् दद्यात्’ (तै०सं० ५.२.८.२) (जो इस ईंट को रक्खे वह तीन गाय दान दे)। यहां ईंट रखनेवाला और इसलिये दक्षिणा देनेवाला कोई और ही है। (सू० १.२) (२) ज्योतिष्टोम के सम्बन्ध में जो केश और दाढ़ी मुड़ाने, दांत धोने, नाखून कटाने और स्नान करने का विधान है वह यजमान को करना है। ‘केशश्मश्रु वपते, दतो धावते, नखानि निकृन्तते, स्नाति’ (तै०सं० ६.१.१.२) ‘तमभ्यनक्ति शरेषीकयाऽनक्ति’। (३) ‘द्व्यहं नाश्नीयात्, त्र्यहं नाश्नीयात्।’ (दिन में दो बार न खाय, तीन बार न खाय)। यह तप भी यजमान को ही करना है। (सू० ९) (४) ‘श्येन याग’ में लाल पगड़ी और लाल वस्त्र पहनने का तथा वाजपेय में सोने की माला पहनने का विधान सब ऋत्विजों के लिये है। (सू० १२) (५) ज्योतिष्टोमे—‘यदि कामयेत वर्षेत् पर्जन्य इति नीचै: सदा मिनुयात्’। यहां वर्षा की इच्छा और सदस् का नीचे की ओर बनाना यजमान का काम है। परन्तु जहां विशेष नाम दिया हो वहां अन्य भी कामना कर सकते हैं। जैसे ‘उद्गाताऽऽत्मने वा यं कामं कामयते, तमागायति’ अर्थात् उद्गाता अपने लिये या यजमान के लिये जो कामना करना चाहे उसका गान करे। यहां यह काम उद्गाता को करना है। यजमान को नहीं। (सूत्र १४) (६) ‘आयुर्दा अग्नेऽसि आयुर्मे देहि’ ‘वच्र्चोदा अग्नेऽसि वच्र्चो मे देहि।’ ये मन्त्र यजमान के पढऩे के हैं। वह यज्ञस्थल से दूर होते हुये भी यह प्रार्थना कर सकता है। क्योंकि लिखा है—‘इह एव सन्, तत्र सन्तं त्वाग्ने’ इत्यादि। अर्थ—हे अग्नि मैं यहां हूं। तू वहां है। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूं इत्यादि। (सू० १६) (७) यदि कोई मन्त्र दो बार दिया हो तो उसे यजमान भी पढ़े और अध्वर्यु भी। जैसे ‘पंचानां त्वा वातानां यन्त्राय धत्र्राय गृöामि’ (तै०सं० १.६.१.२) इस मन्त्र को पढक़र दर्शपूर्णमास में आज्य (घी) लिया जाता है। यह मन्त्र अध्वर्यु के प्रकरण में भी दिया है और यजमान के प्रकरण में भी। अत: दोनों को ही पढऩा होगा। इसी प्रकार ‘वाजस्य मा प्रसवेन’ (तै०सं० १.१.१३.१) यह मन्त्र दो स्रुचों को क्रमश: रखने में पढ़ा जाता है, यह भी दोनों प्रकरणों में आया है। अत: इसको यजमान भी पढ़े और अध्वर्यु भी। (सू० १७) (८) वाजपेय यज्ञ के सम्बन्ध में यह आदेश है। ‘क्लृप्ती-र्यजमानं१ वाचयति’, ‘उज्जितीर्यजमानं वाचयति।’=क्लृप्ती मन्त्र को यजमान से पढ़वावे, उज्जिती मन्त्र को यजमान से पढ़वावे यह दो मन्त्र उसी से पढ़वाने चाहियें जो वेद पढ़ा हो। जो कुपढ़ है उसे तो यज्ञ करने का अधिकार ही नहीं है। (सू० १८) (९) ‘दर्शपूर्णमास’ के यजमान-काण्ड में जो बारह ‘द्वन्द्व’ या ‘जोड़’ दिये हैं वे अध्वर्यु को करने होंगे। इन द्वन्द्वों का वर्णन (तै०सं० १.६९, ३.४) में इस प्रकार दिया है— (अ) बछड़े को खोले और कढ़ाई को आग पर रक्खे। (आ) अनाज छरे और सिल बट्टे को शम्या से साफ करे। (इ) आटे को गूंधे और कपालों को आग पर रक्खे। (ई) पुरोडाश पकावे और घी पिघलावे। (उ) स्तम्बयजु को लावे और ग्रहण करे और वेदी को स्पर्श करे। (ऊ) यजमान की पत्नी की कमर में रस्सी बांधे और प्रोक्षणी पात्र तथा आज्य रक्खे। (सू० १९,२०) (१०) ज्योतिष्टोम नामक प्रकृति याग की एक विकृति इष्टि है जिसका नाम है ‘कुण्डपायिनामयन’ इसमें ‘होता’ ही अध्वर्यु का काम करता है। अध्वर्यु अलग नहीं होता। ‘कुण्डपायिनामयन’ इष्टि में एक मंत्र पढ़ा जाता है जिसे ‘करण मंत्र’ कहते हैं। यह मंत्र है—‘परिवीरसि’ इत्यादि (तै०सं० १.३.६.२) ज्योतिष्टोम में यह मंत्र पढऩा अध्वर्यु का काम है। परन्तु ‘कुण्डपायिनामयन’ में यह काम होता को ही करना चाहिये इसी प्रकार अध्वर्यु का काम है कि वह आध्वर्यव कर्म कराने के लिये अग्नीध्र को आज्ञा देवे। अध्वर्यु आज्ञा देता है कि प्रोक्षणी लाओ, समिधायें और कुशा रक्खो, स्रुवों को मांजो, यजमान की पत्नी को रस्सी बांधकर लाओ।’’ ये आज्ञायें तो दूसरा ही पालेगा। अग्नीध्र को गौण रूप से अध्वर्यु भी कहेंगे क्योंकि वह आध्वर्यव कर्म का पालन करेगा। (सू० २२-२४) यद्यपि करण मंत्र का पढऩे वाला अध्वर्यु है तथापि यज्ञ का फल मिलता यजमान को है क्योंकि उसी के हित के लिये यज्ञ किया जाता है। इसलिये यद्यपि अध्वर्यु बोलता है ‘ममाग्ने वर्चो विहवेषु अस्तु’ (तै०सं० ४.७.१४.१) अर्थात् ‘हे अग्नि, सब स्पर्धा के स्थानों में मेरा तेज हो’, परन्तु यह प्रार्थना अध्वर्यु यजमान के प्रतिनिधि की हैसियत से करता है। क्योंकि स्पष्ट कहा है कि ‘यां वै कांचन ऋत्विज आशिषमा-शासते यजमानस्यैव सा।’ अर्थात् ऋत्विज् जो कुछ आशीष मांगते हैं वे सब यजमान के लिए होते हैं। (सू० २७) परन्तु कुछ ऐसी बातें भी हैं जिनका फल ऋत्विजों या अध्वर्यु को भी मिलता है। क्योंकि वह फल ऋत्विजों के द्वारा मुख्य यज्ञ का उपकारक होता है। जैसे अध्वर्यु दो ग्रहों को अग्नि और विष्णु देवताओं का स्थानापन्न समझकर प्रार्थना करता है ‘अग्नाविष्णू मा मावक्रमिषम्। विजिहाथां मा मा संताप्तम्।’ (तै०सं० १.१.१२.१) अर्थात् ‘हे अग्नि और विष्णु मैंने अपने कर्तव्य के पालने में कोई त्रुटि नहीं की, आप मुझे न त्यागें। मुझे संताप न देवें।’ यह आशीर्वाद अध्वर्यु के लिये ही है क्योंकि संताप न होने से अध्वर्यु यज्ञ का काम ठीक करेगा। एक दूसरा भी इस प्रकार का उदाहरण है। दक्षिण हविर्धान (गाड़ी) के नीचे चार छिद्र होते हैं। ऊपर खुले और नीचे मिले हुये। अध्वर्यु उनमें हाथ डालकर पूछता है इनमें क्या है? यजमान उत्तर देता है—‘भद्र’। अध्वर्यु प्रत्युत्तर में कहता है ‘हम दोनों का भद्र हो।’ यह आशीर्वाद अध्वर्यु के लिये भी है। (सू० २९, ३०) (११) द्रव्यों के जो संस्कार होते हैं वह प्रकृति याग, उनके अङ्गों और उनके विकृति-यागों में समान रीति से लागू होते हैं। परन्तु कुछ विशेष धर्म भी हैं जो प्रकृति याग में ही काम आते हैं विकृति में नहीं। विकृति यागों में द्रव्यों का अतिदेश होता है द्रव्यों के धर्मों का नहीं। जैसे अग्निषोमीय यज्ञ में जो दर्शपूर्णमास का विकृति-याग है पशु को आलभन करते समय यूप के गड्ढे पर कुश बिछाते हैं और यूप को घी से चुपड़ते हैं। दर्शपूर्णमास में पशु-आलभन नहीं होता। अत: अग्नीषोमीय के यूप और कुश वही नहीं हैं जो दर्शपूर्णमास में हैं। अत: प्रकृति याग के यूप और कुश के जो संस्कार हुये थे वे विकृति में नहीं होंगे। प्रकृति याग से विकृति याग में केवल उन्हीं द्रव्यों का अतिदेश होता है जो विकृति याग के उपकारक हों, सब का नहीं। (सू० ३१) (१२) दर्शपूर्णमास यागों में दो१ पवित्रे दो दर्भों से बनाये जाते हैं। ये दर्भ बराबर हों, ६ इंच (प्रदेश ६ इंच के लगभग होता है) लम्बे हों और उनके अग्रभाग कड़े न हों। इसी प्रकार अरत्नि अर्थात् हाथ भर लम्बे कुश से दो विधृतियां बनाते हैं इनमें वेदी के कुश नहीं लेने चाहियें। परिभोजनीय कुश का प्रयोग कर लिया जा सकता है। (१३) ‘यज्ञाथर्वणं वैकाम्या इष्टय:। ता उपांशु कर्तव्या:।’ (काम्य इष्टियां अथर्वण यज्ञ के अन्तर्गत हैं। उनको चुपके-चुपके करना चाहिये)। ये इष्टियां विशेष कामना के लिये की जाती हैं। अत: इनका धर्म ‘उपांशुत्व’ अङ्गों पर लागू नहीं होता। काम्य याग तो प्रधान याग ही हो सकते हैं। अङ्ग-यागों की अलग कामनायें होती ही नहीं। (सूत्र ३५) (१४) लौनी को ‘श्येनयाग’ में ‘आज्य’ के स्थान में प्रयुक्त करते हैं। (सू० ३९-४१)