Category Archives: रामायण

‘राम के मित्र महावीर हनुमान का आदर्श व अनुकरणीय जीवन’

ओ३म्

 ‘राम के मित्र महावीर हनुमान का आदर्श अनुकरणीय जीवन

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

आज आर्य धर्म व संस्कृति के महान आदर्श आजन्म ब्रह्मचारी महावीर हनुमान जी की जयन्ती है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी के साथ महावीर हनुमान जी का नाम भी इतिहास में अमर है व रहेगा। उनके समान  ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, स्वामी-भक्त, अपने स्वामी के कार्यों को प्राणपण से पूरा करने वाला व सभी कार्यों को सफल करने वाला, आर्य धर्म व संस्कृति का उनके समान विद्वान व आचरणीय पुरुष विश्व इतिहास में अन्यतम है। वीर हनुमान जी ने श्रेष्ठतम वैदिक धर्म व संस्कृति का वरण कर उसका हर पल व हर क्षण पालन किया। वह आजीवन ब्रह्मचारी रहे। रामायण एक प्राचीन ग्रन्थ होने के कारण उसमें अन्य ग्रन्थों की भांति बड़ी मात्रा में प्रक्षेप हुए हैं। कुछ प्रक्षेप उनके ब्रह्मचर्य जीवन को दूषित भी करते हैं जबकि हमारा अनुमान व निश्चय है कि उन्होंने जीवन भर कठोर व असम्भव ब्रह्मचर्य व्रत का पूर्ण रूप से पालन किया था। वैदिक धर्म व संस्कृति की यह विशेषता रही है कि इसमें महाभारतकाल से पूर्व काल में बड़ी संख्या में आदर्श राजा, वेदों के पारदर्शी व तलस्पर्शी गूढ़ विद्वान, ऋषि, मुनि, योगी, दर्शन-तत्ववेत्ता, आदर्श गृहस्थी, देश-धर्म-संस्कृति को गौरव प्रदान करने वाले स्त्री व पुरुष उत्पन्न हुए हैं जिनमें वीर हनुमान जी का स्थान बहुत ऊंचा एवं गौरवपूर्ण है।

 

हनुमान जी वानरराज राजा सुग्रीव के विद्वान मन्त्री थे। वानरराज बाली व सुग्रीव भाईयों के परस्पर विवाद में धर्मात्मा सुग्रीव को राजच्युत कर राजधानी से निकाल दिया गया था। वह वनों में अकेले विचरण करते थे। वहां उनका साथ यदि किसी ने दिया तो वीर हनुमान जी ने दिया था। धर्म पर आरूढ़ हनुमान जी ने सत्य व धर्म का साथ दिया व राजसुखों का त्याग कर वनों के कठोर जीवन को चुना। राम वनवास के बाद जब रावण ने महारानी सीता जी का हरण किया तो इस घटना के बाद श्री रामचन्द्र जी की भेंट पदच्युत राजा सुग्रीव के मंत्री हनुमान से होती है। राम व हनुमान जी में परस्पर संस्कृत में संवाद होता है। रामचन्द्र जी हनुमान की संस्कृत के ज्ञान व भाषा पर अधिकार व व्यवहार करने की योग्यता से प्रभावित होते हैं और अपने भ्राता लक्ष्मण को कहते हैं कि यह हनुमान वेदों का जानकार व विद्वान है। इसने जो बाते कहीं हैं, उसमें उसने व्याकरण संबंधी कोई साधारण सी भी भूल व त्रुटि नहीं की। इस घटना से हनुमान जी की बौद्धिक क्षमता व राजनैतिक कुशलता आदि का ज्ञान होता है। हनुमान जी की प्रशंसा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी ने स्वयं अपने श्रीमुख से वाल्मीकि रामायण में की है।

 

हनुमान जी का मुख्य कार्य महारानी सीता की खोज व राम रावण युद्ध में रामचन्द्र जी की सहायता व उनकी विजय में मुख्य सहायक होना भी है। उन्होंने हजारों वर्ष पूर्व लंका पहुंचने के लिए समुद्र को तैर कर पार किया था, ऐसा अनुमान होता है। साहित्यकार व कवि कई बार तैरने को भी भावना की उच्च उड़ान में घटनाओं को अलंकारिक रूप देकर उसे लाघंना कह सकते हैं। यह उनका वीरता का अपूर्व व महानतम उदाहरण है। वह लंका पहुंचे और माता सीता से मिले और उन्हें पुनः रामचन्द्र जी के दर्शन व उनसे मिलने के लिए आश्वस्त किया। उन्होंने लंका में अपने बल का परिचय भी दिया जिससे यह विदित हो जाये कि राम अविजेय हैं और लंका का बुरा समय निकट है। हनुमान जी रावण के दरबार में भी पहुंचे और वहां रामचन्द्र जी का सन्देश सुनाने के बाद अपनी वीरता व पराक्रम के उदाहरण प्रस्तुत किये। लंका के सेनापति, सैनिक व रावण के परिवार के लोग चाह कर भी उनको बन्दी बना कर दण्डित नहीं कर पाये और वह सकुशल लंका से बाहर आकर, माता सीता से मिलकर रामचन्द्र जी के पास सकुशल पहुंच गये और उन्हें माता सीता के लंका में जीवित होने का समाचार दिया। यह कितना बड़ा कार्य हनुमान ने किया था, यह रामचन्द्र जी ही भली भांति जानते थे। इस कार्य ने रामचन्द्र जी को उनका एक प्रकार से कृतज्ञ बना दिया था। इसके बाद राम-रावण युद्ध होने पर भी समुद्र पर पुल निर्माण और लक्ष्मण जी के युद्ध में घायल व मूच्र्छित होने पर उनके लिए वहां से हिमालय पर्वत जाकर संजीवनी बूटी लाना हनुमान जी जैसे वीर व विचारशील मनीषी का ही काम था। बताया जाता है कि वह उड़कर हिमालय पर्वत पर पहुंचे थे। ऐसा होना सम्भव नहीं दीखता। यह सम्भव है कि उन्होंने अवश्य किसी विमान की सहायता ली होगी अन्यथा वह हिमालय शायद न पहुंच पाते। मनुष्य का बिना किसी विमान आदि साधन के उड़कर जाना असम्भव है। साधारण भाषा में आज भी विमान में यात्रा करने वाला व्यक्ति कहता है मैं एयर से अमुक स्थान पर गया था। इसी प्रकार विमान के लिए उड़ कर जाने जैसे शब्दों का प्रयोग रामायण में किया गया है। आज ज्ञान व विज्ञान उन्नति के शिखर पर हैं परन्तु आज भी संसार के 7 अरब मनुष्यों में से किसी को उड़ने की विद्या व कला का ज्ञान नहीं है। अतः यही स्वीकार करना पड़ता है व स्वीकार करना चाहिये कि हनुमान जी किसी छोटे स्वचालित विमान से हिमालय पर आये और संजीवनी आदि इच्छित औषधियां लेकर वापिस लंका पहुंच गये थे। यह भी वर्णन कर दें कि प्राचीन साहित्य में इस बात का उल्लेख हुआ है कि उन दिनों निर्धन व्यक्तियों के पास भी अपने अपने विमान हुआ करते थे। सृष्टि के आरम्भ काल में भी लोग विमान से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे और उन्हें जहां जो स्थान अच्छा लगता था, वह वहीं जाकर अपने परिवारों व इष्ट मित्रों सहित बस जाते थे। इसी प्रकार से सारा संसार यूरोप व अरब आदि के देश बसे हंै। यह तथ्य है कि आदि सृष्टि भारत के तिब्बत में हुई थी। सृष्टि के आदि काल में नेपाल, तिब्बत व चीन आदि देश नहीं थे। तब सारा ही आर्यावर्त्त था।

 

माता सीता के प्रति हनुमान जी का माता-पुत्र की भांति अनुराग व प्रेम था। विश्व इतिहास में यह माता-पुत्र का संबंध भी विशेष महत्व रखता है। आज संसार के सभी देश व उनके नागरिक हनुमान जी के चरित्र की इस विशेषता से बहुत कुछ सीख सकते हैं। ‘‘पर दारेषु मात्रेषु अर्थात् अन्य सभी स्त्रियां माता के समान होती हैं। यह भावना वैदिक संस्कृति की देन है। यह वैदिक धर्म व संस्कृति का गौरव भी है। आदर्श को अच्छा मानने वालों को इसी स्थान पर आना होगा अर्थात् वैदिक धर्म व संस्कृति को अंगीकार करना होगा।

 

हमारे पौराणिक भाई हनुमान जी को वानर शब्द के कारण बन्दर समझते हैं जो कि उचित नहीं है। हनुमान जी हमारे जैसे ही मनुष्य थे तथा वनों में रहने के कारण वानर कहलाते थे। आजकल भारत में इसका एक प्रदेश नागालैण्ड है जिसके निवासी नागा कहलाते हैं। देश व विश्व में कोई उनकी सांप के समान आकृति नहीं बनाता। इसी प्रकार इंग्लिश, चीनी, जर्मनी, फ्रांसीसी आदि नागरिक हैं। यह सब हमारे जैसे ही हैं और हम उनके जैसे। इसी प्रकार से हनुमान व सुग्रीव आदि सभी वानर हमारे समान ही मनुष्य थे। उनमें से किसी की पूंछ नहीं थी। उनकी पूंछ मानना व चित्रों में चित्रित करना बुद्धि का मजाक व दिवालियापन है। वैदिक धर्मी मननशील व सत्यासत्य के विवेकी लोगों को कहते हैं। अतः वानर हनुमान जी बिना पूछ वाले राम, लक्ष्मण व अन्य मनुष्यों के समान ही मनुष्य थे, यह विवेकपूर्ण एवं निर्विवाद है। इस पर विचार करना चाहिये और इसी विचार व मान्यता का सभी पौराणिक भाईयों को अनुसरण भी करना चाहिये। हनुमान जी की पूंछ मानने वाले हमारे भाई इक्कीसवीं सदी में दूसरों का मजाक न बने और अपने महापुरुषों का अपमान न करायें, यह हमारी उनसे विनम्र प्रार्थना है। इसी के साथ इस संक्षिप्त लेख को विराम देते हैं और भारतीयों व विश्व के आदर्श हनुमान जी को स्मरण कर उनसे प्रेरणा ग्रहण कर उनके पथ का अनुसरण करने का प्रयास करने का व्रत लेते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

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‘श्री राम की तरह भरत जी का जीवन भी पूजनीय एवं अनुकरणीय’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

संसार के इतिहास में सबसे प्राचीन इतिहासिक ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि रामयण है। इस ग्रन्थ में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सहित भरत जी के पावन जीवन का भी चरित्र चित्रण है। राम के अनुज भरत जी ने भी भ्रातृत्व वा भ्रातृ-प्रेम की ऐसी मर्यादायें स्थापित की हैं कि उसके बाद संसार के इतिहास में अन्य कोई उसका पालन नहीं कर सका। यद्यपि महाभारत में युधिष्ठिर जी के चारों भाईयों व माता द्रोपदी ने अपने बड़े भाई के लिए अनेक कष्ट सहन किये हैं, जो कि आदर्श हैं, परन्तु भरत का आदर्श देश काल व परिस्थितियों के भिन्न होने के कारण कुछ अलग व महत्तम है। श्री राम व भरत जी से सम्बन्धित घटनायें वैदिक काल में घटी थी। यह घटनायें सहस्रों व लाखों वर्ष पुरानी हैं। आज वैदिक धर्म व संस्कृति अपने मूल व यथार्थ स्वरूप में देश व संसार में विद्यमान नहीं है। आज वेद कथित मानव मूल्यों का कितना पतन हुआ है, यह हम सभी जानते हैं। वर्तमान समय में बड़े शिक्षित लोग बड़ी सफाई के साथ झूठ बोलते हैं और प्रमाणों के अभाव में सत्य को जानते हुए भी उन्हें सहन करना पड़ता है। आज पद व प्रतिष्ठा तथा धन ही लोगों के लिए सब कुछ हो गया है। जिनसे देश की रक्षा की अपेक्षा की जाती है वह भी अपने स्वार्थों के कारण सच्ची बातों को तोड़ते मरोड़ते हैं। राष्ट्र  के हित में भी सभी एकमत नहीं हो पाते और एक दूसरे की टांग खींचना आम बात दिखाई देती है। ऐसे समय में श्री राम व श्री भरत जी की बातें करना कुछ लोगों को हो सकता है कि उचित प्रतीत न लगे। इस पर भी देश के सामान्य अल्पशिक्षित वा अशिक्षित लोग आज भी श्री राम व भरत जैसे भाई के महान व्यक्तित्व से प्रभावित व प्रेरित होकर जीवन व्यतीत करते हैं। यह सत्य की ही विजय कही जा सकती है। आज हम आर्यसमाज के उच्च कोटि के विद्वान व संन्यासी स्वामी ब्रह्ममुनि जी की पुस्तक रामायण की विशेष शिक्षाएं के आधार पर भरत जी के जीवन की कुछ महत्वपूर्ण एवं स्तुत्य चारित्रिक घटनाओं को प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

आद्यकवि महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में ‘‘भरत जी का स्थान बहुत ऊंचा है। भरत जी में मर्यादा का, धार्मिकता, राम के प्रति आदर व स्नेह और ज्येष्ठानुवृति अत्यधिक थी। जिस भरत को राज्य दिलाने के लिये कैकेयी ने राम को वनवास दिलाया, पुनः राम के वनवास-शोक में दशरथ का प्राणान्त हो जाने पर मन्त्रियों ने राजसिंहासन पर बैठाने के लिये राम के वनवास आदि वृतान्त को गुप्त रख पिता दशरथ की ओर से भरत को मातुलगृह से बुलाया, पुनः भरत के अयोध्या पहुंचने पर मंत्रियों ने उसे राम के वनवास और पिता के देहान्त को सुनाकर राजसिंहासन पर बैठने की अनुमति दी तो वह भरत राज्य-प्राप्ति में प्रसन्न नहीं होते किन्तु विलाप करते हुए अचेत हो भूमि पर गिर पड़ते हैं। महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है- अभिषेक्ष्यति रामं तु राजा यज्ञं नु यक्ष्यते। इत्यहं कृतसंकल्पो हृष्टो यात्रामयासिषम्।। अर्थात् मेरा पिता राजा दशरथ राम का राज्याभिषेक करने के हेतु राजसूय यज्ञ करेगा यह संकल्प मन में रखकर प्रसन्न हो रहा मैं चला था। हाय ! यह क्या हुआ। यह है भरत के सौजन्य का प्रथम दृश्य। राज्यश्री को प्राप्त करने के लिये आजकल लोग भ्राता का वध तक कर देते हैं, परन्तु जिसमें निरपराध भरत ऐसे राज्य प्राप्ति में भी प्रसन्नता के स्थान पर विलाप करता है, अचेत हो जाता है, पुनः चेतना प्राप्त करके अपनी माता कैकेयी को धिक्कारते हुए कहता है कि हे माता ! तूने दुःख में दुःख दिया, घाव पर नमक छिड़का, पिता को मृत्यु के मुख में पहुंचाया और राम को वनवासी बनाया। इस कुल के नाशार्थ तू कालरात्रि बनी। अब भरत केवल इतने पर ही सन्तोष करके नहीं रह जाता कि जो होना था सो हो गया, राम तो चले गये, राज्यभार तो संभालना ही पड़ेगा। परन्तु भरत तो राम की खोज में घर से बाहर निकल पड़ता है, मार्ग में एक स्थान पर गंगा के किनारे इंगुदिवृक्ष के नीचे घास पर राम के रात बिताने-सोने के सम्बन्ध में विलाप करता है जिसका वर्णन कर बाल्मीकि जी लिखते हैं कि हा ! मैं मरा। मैं हत्यारा हूं जो मेरे कारण पत्नीसहित राम अनाथ की भांति ऐसी धरती रूप शय्या पर सोता है।

 

भरत का कार्य केवल विलाप करने तक ही समाप्त नही होता किन्तु उसने राम की खोज कर उनकी सेवा में पहुंच अयोध्या लौटने का बहुत आग्रह किया, पर अति प्रयत्न करने पर भी राम नहीं लौट पाए तब भरत विवश हो क्या राज्यलक्ष्मी का उपभोग करता है? नहीं, नहीं, किन्तु राम की पादुकाएं प्रतिनिधिरूप में लेकर स्वयं वानप्रस्थी का रूप धारण कर नन्दीग्राम नाम के आश्रम में राम के लौटने की प्रतीक्षा करता हुआ 14 वर्ष बिताता है। (यहां प्रश्न उपस्थित होता है कि भरत की इस स्थिति के लिए कौन उत्तरदायी है? इसका उत्तर हमें यही प्रतीत होता है कि भरत की इस स्थिति के लिए भी उनकी अपनी सगी माता कैकेयी जो भरत को अयोध्यापति के रूप में देखना चाहतीं थी, वही उत्तरदायीं हैं। भरत की इस स्थिति का अनुमान कैकेयी ने स्वप्न में भी नहीं किया होगा। विपरीत परिस्थितियों से बचने के लिए हमें अपने जीवन में महर्षि दयानन्द के इस नियम का पालन करना ही चाहिये कि सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये।-लेखक) वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड 1/2/23-25 में कहा गया है कि भरत ने राम की चरणपादुकाएं लेकर कहा कि हे राम! चैदह वर्ष तक जटावल्कलधारी वानप्रस्थ बन कर फल, मूल खाता हुआ आपके आगमन की आकांक्षा रखता हुआ नगर से बाहर वसता हुआ रहूंगा, चैदहवें वर्ष के पूर्ण होने के दिन यदि मैं आपको देख सका तो अग्नि में जल जाऊंगा।

 

राम के आगमन की प्रतीक्षा में भरत की क्या दशा थी यह हनुमान् के मुख से भी सुनिये जब कि लंका विजय कर श्रीराम ने अयोध्या लौटते हुए हनुमान को भरत का हाल जानने के लिये भेजा था। इसका वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी युद्धकाण्ड 125/27, 29, 31 श्लोकों में कहते हैं कि अयोध्या नगरी से कोश भर की दूरी पर वल्कल और कृष्णाजिन धारण किये हुए दुःखी, कृश, जटिल, धूलिधूसरित, श्रृगारहीन, भातृशोक में व्याकुल, फलमूलाहारी, दयानीय, तपस्वी, धर्मचारी, खुले केश वाले, वृक्षछाल और अजिन पर बैठे हुए, नियतेन्द्रिय, भावुक, ब्रह्मर्षिसदृश भरत को राम के आदेश से हनुमान ने देखा।  यहां भरत का आदर्श कितना ऊंचा है?, राम ने राज्य त्यागा और वनवास लिया बलात् अर्थात् पिता की आज्ञा से परन्तु भरत ने राज्यश्री को त्यागा और वानप्रस्थी बना स्वेच्छा से, राम के प्रति ज्येष्ठानुवृत्तिधर्म एवं मर्यादा के पालनार्थ भरत का त्याग राम के त्याग से कम नहीं है किन्तु इस दृष्टि से ऊंचा ही है।

 

इतना ही नहीं, भरत के विचार तो और भी ऊंचे थे जैसे वह अपनी माता कैकेयी को सम्मुख कर कहते हैं कि हे पापे, मैं उस महाबलवान् राम को लाकर स्वयं वन में चला जाऊंगा, तूने बड़ा पाप किया है, मैं आंसूभरे प्रजाजनों के दृष्टिपथ होते हुए राम को छोड़ नहीं सकता, वह तू अग्नि में प्रविष्ट हो जा या स्वयं दण्डक वन में चली जा या कण्ठ में रज्जु बान्ध कर फांसी ले ले। भरत में राम के प्रति भक्तिप्रेम व ज्येष्ठानुवृति का परिचय इससे भी मिलता है कि जब लंकाविजय कर हनुमान् राम के आगमन का कुशल सन्देश भरत को देने आता है। इसका वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी ने लिखा है कि इस प्रकार राम के आगमन-कुशल-सन्देश को सुनकर भरत प्रसन्न एवं हर्ष से मोहित हो भूमि पर गिर पड़ा, पुनः कुछ देर में संभल कर आश्वासन के साथ प्रियवादी हनुमान् को आलिंगन कर आदर से बोला और हर्षजनक प्रीतिभरे बहुत आंसुओं से उसे सिंचित किया।

 

यहां तक तो भरत ऊंचे जीवन वाला है। यह उसके निजी जीवन वृतान्तों से स्पष्ट हुआ। अब इसके सम्बन्ध में साक्षी रूप से राम तथा दशरथ के वचन भी सुनिये। भ्रातरस्तात भवन्ति भरतोपमाः। (वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड 18/15)। राम सुग्रीव से कहते हैं कि भरत जैसे भ्राता सभी नहीं होते। कैकेयी को समझाते और मनाते हुए दशरथ  (वा.रा. अयो. 12/62 में) कहते है कि कथंचिद् ऋते रामाद् भरतो राज्यमावसेत्। रामादपि हि तं मन्ये धर्मतो बलवत्तरम्।। कैकेयी ! तू जिस भरत के लिये राज्य के निमित्त राम को वनवास दिला रही है वह विना राम के किसी प्रकार भी राजसिंहासन पर नहीं बैठ सकता क्योंकि वह राम से भी धर्म में अधिक प्रबल है, ऐसा मैं मानता हूं। इस प्रकार भरत का जीवन राम से कम आदर्श नहीं था। राम के जीवन की विशेषताएं और ही हैं। भरत जैसे भाई यदि परिवार में हों तो परिवार बहुत सुखमय बन सके और कभी भी दुःख तथा कलह का स्थान न मिले। स्वामी ब्रह्मुनि जी ने यह भी ऐतिहासिक तथ्य सूचित किया है कि भरत के दो पुत्र थे एक तक्ष दूसरा पुष्कल। तक्ष ने तक्षशिला (पंजाब में रावलपिण्डी के अन्तर्गत टैक्सिला नाम से प्रसिद्ध)  और पुष्कल ने गन्धर्व (गान्धार-कन्धार) देश में पुष्कलावत नगर को बसाया था वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड का श्लोक 101/11 प्रमाण देते हुए कहता है कि तक्षं तक्षशिलायां पुष्कलं पुष्कलावते। गन्धर्वदेशे रुचिरे गन्धारनिलये सः।।

 

भरत जी का जीवन भी श्री राम की ही तरह महान व अनुकरणीय है। वह भी सभी देशवासियों के आदर, सम्मान, पूजा, अनुकरण, व्रत व संकल्प के अधिकारी हं। हमें श्री रामचन्द्र जी को स्मरण करते हुए उनके साथ भरतजी को भी स्मरण करते हुए उनका गुणानुवाद करना चाहिये जिससे हमारा जीवन भी उन जैसा बन सके। आशा है कि पाठक लेख को पसन्द करेंगे। हम पाठको से निवेदन करेंगे कि वह स्वामी ब्रह्ममुनि जी की पुस्तक रामायण की विशेष शिक्षाएं इसके प्रकाशक मैसर्स विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, 4408 नई सड़क, दिल्ली-110006’ फोन संख्या 011-23977216, 65360255 या इमेलः ajayarya16@gmail.com से मंगाकर लाभान्वित हों। 104 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य मात्र 30.00 रूपये है।

मनमोहन कुमार आर्य

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रामायण में वर्णित लक्ष्मण रेखा का मिथक – सुलक्षण रेखा की सच्चाई

हमारे महान भारत में पहले अनेको ऋषि, महर्षि, ज्ञानी, विद्वतजन होते थे जो धर्म, ग्रन्थ और इतिहास का अतिसूक्ष्म निरिक्षण करकर सत्य असत्य से जनता को सदैव परिचित करवाते रहते थे। कालांतर में ये पद्धति मृतप्राय हो गयी और अनेको मूर्खो, लालची, लोभी, कुसंगियो द्वारा धर्म और इतिहास विषयक सामग्री में मिलावट की जाने लगी। जहाँ मिलावट संभव नहीं हो सकती थी वहां मिलावट के स्थान पर लोकोक्ति के माध्यम से मिथ्या जाल प्रपंच रचा गया।

इस आर्यावर्त में दुर्भाग्य से विद्वानो की कमी होने के कारण सत्य असत्य का निर्धारण करने के ठेका ढोंगी, कपटी, चालाक, तथाकथित स्वयंभू धर्म के ठेकेदारो ने ले लिया। फिर तो मौज बन आई। महापुरषो को बदनाम किया जाने लगा। सत्य इतिहास को बदनाम किया गया। द्रौपदी का चीरहरण, हनुमान जी बन्दर स्वरुप, ब्रह्मा जी के ४ सर आदि अनेको मिथ्या कपोलकल्पित कथाये प्रचारित की जाने लगी। भारतीय जनमानस अपने ही इतिहास से रुष्ट होकर ईसाई, मुसलमान आदि पथभ्रष्ट होना स्वेच्छा से स्वीकार करने लगे। क्योंकि वो अपनी बुद्धि से ऐसे इतिहास को अपनाना नहीं चाहते थे। ऐसे ही एक कथा रामायण में जोड़ी गयी :

लक्ष्मण रेखा

जो महानुभाव लक्ष्मण ने सीता माता की रक्षा हेतु खेंची थी। लेकिन ये पौराणिक मिथ्या ज्ञान बांटने वाले कभी ये नहीं बताते की यदि ये रेखा वाकई लक्ष्मण जी ने खेंची थी तो फिर सीता माता का अपहरण कैसे हो गया ?

आइये एक नजर वाल्मीकि रामायण पर डालते हैं और इस मिथ्या कपोलकल्पित लोकोक्ति का सत्य जानते हैं :

रामायण जैसा महाकाव्य ऋषि वाल्मीकि ने लिखा है। ये महाकाव्य इतना अनूठा है की आने वाले समय के अनेको कवियों ने भी इस महाकाव्य पर अपनी अपनी पुस्तके लिखी। लेकिन हमें ये ध्यान रखना चाहिए की रामायण विषय पर प्रमाणिकता केवल वाल्मीकि ऋषि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण की ही होती है। देखिये ऋषि वाल्मीकि क्या लिखते हैं :

श्री राम जब मृग रूप में मारीच को पकड़ने जाते हैं और मृग (मारीच) श्री लक्ष्मण को श्री राम की आवाज़ में पुकारता है तब माता सीता द्वारा मार्मिक वचन कहे जाने पर श्री लक्ष्मण अपशकुन उपस्थित देखकर माता सीता को सम्बोधित करते हुए कहते हैं –

”रक्षन्तु त्वाम…पुनरागतः ”
[श्लोक-३४,अरण्य काण्ड , पञ्च चत्वाविंशः ]

अर्थात -विशाललोचने ! वन के सम्पूर्ण देवता आपकी रक्षा करें क्योंकि इस समय मेरे सामने बड़े भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं उन्होंने मुझे संशय में डाल दिया है . क्या मैं श्री रामचंद्र जी के साथ लौटकर पुनः आपको कुशल देख सकूंगा ?”

माता सीता लक्ष्मण जी के ऐसे वचन सुनकर व्यथित हो जाती हैं और प्रतिज्ञा करती हैं कि श्रीराम से बिछड़ जाने पर वे नदी में डूबकर ,गले में फांसी लगाकर ,पर्वत-शिखर से कूदकर या तीव्र विष पान कर ,अग्नि में प्रवेश कर प्राणान्त कर लेंगी पर ‘पर-पुरुष’ का स्पर्श नहीं करेंगी .
[श्लोक-३६-३७ ,उपरोक्त]

माता सीता की प्रतिज्ञा सुन व् उन्हें आर्त होकर रोती देख लक्ष्मण जी ने मन ही मन उन्हें सांत्वना दी और झुककर प्रणाम कर बारम्बार उन्हें देखते श्रीरामचंद्र जी के पास चल दिए .[श्लोक-39-40 ] .

स्पष्ट है इस पुरे प्रकरण में कहीं भी लक्ष्मण जी ने कोई रेखा नहीं खींची। यहाँ तर्क दृष्टि से देखा जाये तो भी “लक्ष्मण रेखा” से सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता क्योंकि यदि एक लक्ष्मण रेखा से ही माता सीता की सुरक्षा हो सकती थी तो प्रभु राम लक्ष्मण को साथ क्यों नहीं ले गए ?

या फिर दूसरा तर्क ये है जो श्री राम ने लक्ष्मण जी को निर्देश दिया :

”प्रदक्षिणेनाती ….शङ्कित: ‘
[श्लोक-५१ ,अरण्य काण्ड ,त्रिचत्वा रिनश: ] –

”लक्ष्मण ! बुद्धिमान गृद्धराज जटायु बड़े ही बलवान और सामर्थ्यशाली हैं .उनके साथ ही यहाँ सदा सावधान रहना .मिथिलेशकुमारी को अपने संरक्षण में लेकर प्रतिक्षण सब दिशाओं में रहने वाले राक्षसों की और चैकन्ने रहना .”

यहाँ भी श्रीराम लक्ष्मण जी को यह निर्देश नहीं देते कि यदि किसी परिस्थिति में तुम सीता की रक्षा में अक्षम हो जाओ तो रेखा खींचकर सीता की सुरक्षा सुनिश्चित कर देना.

तीसरा तर्क भी देखे : यदि कोई रेखा खींचकर माता सीता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती थी तो लक्षमण माता सीता को मार्मिक वचन बोलने हेतु विवश ही क्यों करते .वे श्री राम पर संकट आया देख-सुन रेखा खेंचकर तुरंत श्री राम के समीप चले जाते।

अतः वाल्मीकि रामायण में तो लक्ष्मण रेखा का कोई औचित्य नहीं बनता। आइये अब जो अन्य रामायण के संस्करण मिलते हैं उन्हें देखे :

श्री वेदव्यास जी द्वारा रचित ”अध्यात्म रामायण’ में भी ‘सीता-हरण’ प्रसंग के अंतर्गत लक्ष्मण जी द्वारा किसी रेखा के खींचे जाने का कोई वर्णन नहीं है .माता सीता द्वारा लक्ष्मण जी को जब कठोर वचन कहे जाते हैं तब लक्ष्मण जी दुखी हो जाते हैं –

’इत्युक्त्वा ……….भिक्षुवेषधृक् ”

[श्लोक-३५-३७,पृष्ठ -१२७]

”ऐसा कहकर वे (सीता जी ) अपनी भुजाओं से छाती पीटती हुई रोने लगी .उनके ऐसे कठोर शब्द सुनकर लक्ष्मण अति दुखित हो अपने दोनों कान मूँद लिए और कहा -’हे चंडी ! तुम्हे धिक्कार है ,तुम मुझे ऐसी बातें कह रही हो .इससे तुम नष्ट हो जाओगी .” ऐसा कह लक्ष्मण जी सीता को वनदेवियों को सौपकर दुःख से अत्यंत खिन्न हो धीरे-धीरे राम के पास चले .इसी समय मौका समझकर रावण भिक्षु का वेश बना दंड-कमण्डलु के सहित सीता के पास आया .” यहाँ कहीं भी लक्ष्मण जी न तो रेखा खींचते हैं और न ही माता सीता को उसे न लांघने की चेतावनी देते हैं .

हालांकि ये प्रामाणिक ग्रन्थ मैं नहीं मानता। और नाही लक्षमण जी ऐसे आर्य थे जो ऐसे वचन सीता जी को बोलते न ही सीता जी ने ऐसे लक्षण दिखाए होंगे। फिर भी यहाँ लक्ष्मण रेखा का सिद्धांत नहीं पाया जाता न ही किसी लक्ष्मण रेखा से सीता जी की सुरक्षा संभव थी क्योंकि इस रामायण में लक्ष्मण जी सीता माता को वनदेवियो को सौंपकर चले जाते हैं।

अब अन्य रामायण से जुड़े ग्रंथो पर विचार करते हैं। एक मान्य ग्रन्थ आज हिन्दू समाज में वाल्मीकि रामायण से भी ज्यादा प्रचलित है वो है तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस। लेकिन खेद की इस ग्रन्थ में भी लक्षमण रेखा का विवरण प्राप्त न हो सका।

अरण्य-काण्ड में सीता -हरण के प्रसंग में सीता जी द्वारा लक्ष्मण जी को मर्म-वचन कहे जाने पर लक्ष्मण जी उन्हें वन और दिशाओं आदि को सौपकर वहाँ से चले जाते हैं –

”मरम वचन जब सीता बोला , हरी प्रेरित लछिमन मन डोला !
बन दिसि देव सौपी सब काहू ,चले जहाँ रावण ससि राहु !”

[पृष्ठ-५८७ अरण्य काण्ड ]

लक्ष्मण जी द्वारा कोई रेखा खीचे जाने और उसे न लांघने का कोई निर्देश यहाँ उल्लिखित नहीं है।

अब जब कहीं भी लक्ष्मण रेखा का उल्लेख किसी मान्य ग्रन्थ में नहीं तब क्यों और कैसे ये लक्ष्मण रेखा रामायण से जुड़ कर प्रचलित हुई ?

आइये एक विचार इसपर भी रखते हैं :

लक्ष्मण -रेखा का अर्थ कोई पंचवटी में कुटिया के द्वार पर खींची गयी रेखा नहीं बल्कि प्रत्येक नर-नारी के लिए ऋषियों द्वारा बनाये नियम और निर्धारित आदर्श लक्षणों से प्रतीत होता है। यह नारी-मात्र के लिए ही नहीं वरन सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आवश्यक है कि विपत्ति-काल में वह धैर्य बनाये रखे किन्तु माता सीता श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम के कारण मारीच द्वारा बनायीं गयी श्रीराम की आवाज से भ्रमित हो गयी। माता सीता ने न केवल श्री राम द्वारा लक्ष्मण जी को दी गयी आज्ञा के उल्लंघन हेतु लक्ष्मण को विवश किया बल्कि पुत्र भाव से माता सीता की रक्षा कर रहे लक्ष्मण जी को मर्म वचन भी बोले। माता सीता ने उस क्षण अपने स्वाभाविक व् शास्त्र सम्मत लक्षणों, धैर्य,विनम्रता के विपरीत सच्चरित्र व् श्री राम आज्ञा का पालन करने में तत्पर देवर श्री लक्ष्मण को जो क्रोध में मार्मिक वचन कहे उसे ही माता सीता द्वारा सुलक्षण की रेखा का उल्लंघन कहा जाये तो उचित होगा। माता सीता स्वयं स्वीकार करती हैं –

”हा लक्ष्मण तुम्हार नहीं दोसा ,सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा !” [पृष्ठ-५८८ ,अरण्य काण्ड ]

निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि लक्ष्मण रेखा को सीता-हरण के सन्दर्भ में उल्लिखित कर स्त्री के मर्यादित आचरण-मात्र से न जोड़कर देखा जाये। यह समस्त मानव-जाति के लिए निर्धारित सुलक्षणों की एक सीमा है जिसको पार करने पर मानव-मात्र को दण्डित होना ही पड़ता है।

तुलसीदास जी के शब्दों में –
”मोह मूल मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ ”

इस आर्यावर्त में एक ऋषि ने सत्य का ज्ञान सूर्य उदय किया। ऋषि ने सभी झूठे तथ्यों और आधारहीन घटनाओ को सिरे से ख़ारिज किया। आज आर्य समाज इसी ऋषि कार्य के सिद्धांत को आगे बढ़ा रहा है। हमें चाहिए हम सत्य को जानकार असत्य को दूर फेक देवे।

आओ लौटो सत्य की और – लौटो न्याय और ज्ञान की और

आओ लौटो वेदो की और

नमस्ते।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जन्मकाल – वेटिकन चाटुकार अज्ञानी पाश्चात्य इतिहासकारों का खंडन

नमस्ते मित्रो,

हमारे भारतवर्ष में अनेको अनेक महापुरुष, ज्ञानी, विद्वान, पराकर्मी राजा महाराजा उत्पन्न होते आये हैं, ये मिटटी कभी वीरो से खाली नहीं रही, कालांतर में भी पृथ्वी राज चौहान, महाराणा प्रताप, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद सरीखे वीर योद्धा इसी पावन पवित्र मिटटी की गोद से उत्पन्न हुए हैं।

जहाँ तक समझता हु कालांतर में उत्पन्न हुए ये वीर और इनके माता-पिता ने भी किसी न किसी महापुरुष को आदर्श मानकर – इन वीरो में उस महापुरष के संस्कार भरे होंगे। और इस देश भारत के लिए अनेको महापुरषो के आदर्श उपस्थित रहे हैं, सभी महापुरषो के समय पर विचित्र परिस्थितिया रही जिनको उन्होंने उचित रीति से हल किया। जैसे महाभारत काल में योगेश्वर कृष्ण ने शांति बहाल करने की पूर्ण कोशिश की मगर जब धर्म की हानि होते देखि तो युद्ध में पांडवो को विजय दिलवाई। महाराणा प्रताप ने चित्तोड़ की आन बान शान के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया। ऋषि दयानंद ने देखा देश की हालत बहुत विकट है, आर्य जाती अधम और पाखंड में फंस चुकी थी, भारत गुलामी से त्रस्त था ऐसे में ऋषि ने “स्वराज्य” का बिगुल बजाया। भगत सिंह, आजाद, बिस्मिल अशफ़ाक़ुल्ला खान सरीखे अनेको वीर इस स्वतंत्रता रुपी यज्ञ में अपनी आहुति देने आये।

आखिर ऐसा क्या था जो इन सभी महापुरषो को एक प्रेरणा देता था ?

वो था हमारे इतिहास में उत्पन्न हुए गौरवशाली आदर्श मानव जिन्होंने हमारे भविष्य के लिए अपना वर्त्तमान दांव पर लगाया। वो आज हमारे आदर्श हैं।

ऐसे ही एक महापुरुष के जन्मकाल के समय पर जो लाखो वर्षो से भारतीय जनमानस ही नहीं अपितु दुनिया के सभी मनुष्यो के लिए एक आदर्श रहा है, एक ऐसा मनुष्य जो पुत्र, पति, भाई, मित्र यहाँ तक की एक शत्रु के लिए भी आदर्श बन गया। आज हम ऐसे आदर्श श्री राम के जन्म काल गणना पर विचार करेंगे।

हमारे मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम। इनके जन्म काल के विषय में अनेक भ्रांतियां हैं।
कुछ अंग्रेजी इतिहासकार हमारे सच्चे इतिहास को अपनी वेटिकन चाटुकारिता हेतु नकारते हैं, झूठे तथ्य और बेबुनियाद आधार पर हमारी आस्था पर चोट करते हैं, वामपंथी भी ऐसी ही विकृत मानसिकता से युक्त हैं, वो भी नहीं चाहते की यहाँ का हिन्दू समाज (आर्य जाती) अपने सच्चे इतिहास को जाने, इसीलिए मनमाने और झूठे कुतर्को से झूठ का प्रचार कर हिन्दुओ के मन में भ्रांतियां उत्पन्न करते हैं, नतीजा हिन्दू समाज अपने सत्य इतिहास से दूर होता जाता है।
आज हम इसी विषय पर कुछ विवेचना करेंगे –

देखिये हमारे पास हमारे इतिहास से जुड़े अनेक तथ्य और ऐतिहासिक ग्रन्थ मौजूद हैं, जो हमारी इतिहास की धरोहर है, कुछ अपवाद जैसे प्रक्षेप हिस्से को छोड़ देवे, तो जो सत्य सिद्धांत हो वो मानने योग्य है चाहे किसी भी पुस्तक में मौजूद हो – जब श्री राम का जन्म काल जानने का प्रयत्न करते हैं तो सबसे पहले हम वाल्मीकि रामायण को प्रमाण मानते हैं आइये देखे वहां क्या लिखा है –

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतुनां षठ समत्ययुः।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रं नावमिके तिथौ।।
नक्षत्रोऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंच्चसु।
ग्रहेषु कर्कट लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।
कौशल्याजनमद् रामं दिव्य लक्षणं संयुतम्।
लोहिताक्षं महाबाहु रक्तोष्ठम् दुन्दुभिस्वनम्।।
प्रोद्यमाने जगन्न्ााथं सर्व लोक नमस्कृतम।
(वा. रा. – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक १-३)

यज्ञ की समाप्ति के पश्चात् 6 ऋतुएं बीत गईं, तब बारहवें मास चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र एवं कर्क लग्न में कौशल्या देवी ने दिव्य लक्षणों से युक्त श्रीराम को जन्म दिया। उस समय पांच ग्रह अपने-अपने उच्च स्थानों पर विद्यमान थे।

ऋषि वाल्मीकि ने अपनी रामायण में इस प्रकार की ग्रह स्थिति में श्री राम के जन्म का उल्लेख किया है –

सूर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति, शुक्र ग्रह मेष मकर तुला कर्क मीन में थे। चैत्र के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि श्री राम की जन्मतिथि होने से अब रामनवमी के नाम से प्रसिद्ध है।

महाभारत से प्रमाण :

महाभारत के अनुसार त्रेता और द्वापर के संधिकाल में श्री राम का जन्म हुआ था।

संध्येश समनुप्राप्ते त्रेतायां द्वापरस्य च।
अहं दशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः।।
(महाभारत शान्तिपव-339/85)

ये श्लोक मिलावटी लगता है लेकिन इतना जरूर है की जो यहाँ त्रेता और द्वापर के संधि काल की बात हो रही है – उसमे सत्यता जरूर प्रतीत होती है क्योंकि इसी संधि का ऐसा ही समय आंकलन वायु महापुराण 98/72) (हरिवंश पुराण 4/41 ब्रह्मांड महापुराण 104/11) में भी दिखाई देता है।

चतुर्विशयुगं चापि विश्वामित्रपुरः सरः।
रामो दशरथस्याथ पुत्रःपदमायतेक्षणः।।

क्योंकि यहाँ 24वि चतुर्युगी की बात हो रही है जो इस वैवस्वत मनु के काल में आती है – वो मुझे युक्तियुक्त नहीं लगता अतः हम इसी 28वि चतुर्युगी के आधार पर काल गणना करते हैं –

देखिये इस समय वैवस्वत मनु की 28वि चतुर्युगी का कलयुग 5116वा साल यानी विक्रम का 2072 संवत है – यदि यहाँ से गणना की जाए तो –

इस कलयुग के – 5116 वर्ष

बीत चुके द्वापर के – 8,64,000 वर्ष

बीत चुके त्रेता के – 12,96,000

श्री राम त्रेता और द्वापर के संधि काल में हुए – तो

8,64,000 + 12,96,000 = 21,60,000 वर्ष

इनका संधि काल =

21,60,000 / 2 = 10,80,000 वर्ष

अब इसमें संध्याओं का योग करते हैं –

86,400 + 1,29,600 = 2,16,000 / 2 = 1,08,000

(ये युग का दश्वा हिसा है जो एक युग से दूसरे युग का संधि काल होता है अतः इसका आधा पूर्व और आधा पश्चात का लेना होगा )

संधि काल + संध्याओ का योग

10,80,000 + 1,08,000 = 11,88,000 वर्ष

अब इसमें कलयुग के 5116 वर्ष और जोड़ते हैं

11,88,000 + 5116 = 11,96,116 (11 लाख, 96 हजार, 116 वर्ष) श्री राम
को उत्पन्न हुए हो गए हैं।

ये काल गणना वैवस्वत मनु की 28वि चतुर्युगी के आधार पर है। अतः इतना तो सिद्ध है, ग्यारह लाख, छियानवे हजार एक सौ सौलह वर्ष तो श्री राम के जन्म हुए कम से कम हो ही चुके हैं।

यदि 24वि चतुर्युगी के आधार पर करे तो – ये गणना करोडो वर्ष पूर्व बैठेगी जो तर्कसंगत नहीं होगा क्योंकि अभी हाल में ही अमेरिका के एक खोजी उपग्रह ने श्री रामेश्वरम से श्री लंका तक श्रीराम द्वारा बनाए गए त्रेतायुग के पुल को 17.5 लाख वर्ष पुराना माना है। जो इस 28वि चतुर्युगी के आधार पर निकाले गए श्री राम की जन्म काल गणना से मेल खाता है।

अतः हमें जानना चाहिए की हमारा इतिहास कोई काल्पनिक नहीं – युगो की गणना यदि और सटीक तरीके तथा अनेक ऐतिहासिक ग्रंथो का यदि और अधिक अनुसन्धान और विश्लेषण किया जाए तो हम प्रभु श्री राम के जन्म गणना का और अधिक विश्लेषण करके – मॉडर्न विज्ञानं के आधार पर मेल करवा सकते हैं।

धन्यवाद

आओ लौट चले वेदो की और

श्री राम द्वारा वनवास के दौरान भरत को नीतिगत उपदेश

जब भरत राम को वन से अयोध्या लौटाने के लिए वन में गए तो श्री राम ने कुशल प्रश्न के बहाने भरत को राजनीति का उपदेश दिया, वह प्रत्येक राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के लिए सदैव स्मरणीय व अनुकरणीय है।

प्रभु राम भरत से पूछते हैं –

1. क्या तुम सहस्रों मूर्खो के बदले एक विद्वान के कथन को अधिक महत्त्व देते हो ?

2. क्या तुम जो व्यक्ति जिस कार्य के योग्य है उससे वही काम लेते हो ?

3. तुम्हारे कर्मचारी बाहर भीतर पवित्र है न ? वे किसी से घूस तो नहीं लेते ?

4. यदि धनी और निर्धन में विवाद हो, और वह विवाद न्यायालय में विचाराधीन हो, तो तुम्हारे मंत्री धन के लोभ में आकर उसमे हस्तक्षेप तो नहीं करते ?

5. तुम्हारे मंत्री और राजदूत अपने ही देश के वासी अर्थात अपने देश में उत्पन्न हुए हैं न ?

6. क्या तुम अपने कर्मचारियों को उनके लिए नियत वेतन व भत्ता समय पर देते हो ? देने में विलम्ब तो नहीं करते ?

7. क्या राज्य की प्रजा कठोर दंड से उद्विग्न होकर तुम्हारे मंत्रियो का अपमान तो नहीं करती ?

8. तुम्हारा व्यय कभी आय से अधिक तो नहीं होता ?

9. कृषि और गौपालन से आजीविका चलाने वाले लोग तुम्हारे प्रीतिपात्र है न ? क्योंकि कृषि और व्यापार में संलग्न रहने पर ही राष्ट्र सुखी रह सकता है।

10. क्या तुम वेदो की आज्ञा के अनुसार काम करने में सफल रहते हो ?

11. मिथ्या अपराध के कारण दण्डित व्यक्तियों के जो आंसू गिरते हैं, वे अपने आनंद के लिए शासन करने वाले राजा के पुत्र और पशुओ का नाश कर डालते हैं।

मर्यादा पुरोषत्तम राम दिग्विजयी थे, किन्तु सम्राज्य्वादी नहीं। कालिदास ने रघुवंश में रघुकुल की परंपरा का विवेचन करते हुए लिखा है –

“आदानं हि विसर्गाय सतां वारिमुचामिव”

अर्थात जिस प्रकार मेघ पृथ्वी से जल लेकर वर्षा द्वारा उसी को लौटा देते हैं, उसी प्रकार सत्पुरुषों का लेना भी देने = लौटाने के लिए होता है।

इसी नीति का अनुसरण करते हुए बाली से किष्किन्धा का राज्य जीत कर, अपने राज्य में न मिला कर, उसके भाई सुग्रीव को दे दिया और लंका पर विजय प्राप्त करके उसका राज्य रावण के भाई विभीषण को सौंप दिया।

मित्रो इस देश में ऐसे ही महापुरष उत्पन्न होते आये हैं, महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, वीर शिवाजी आदि अनेक उदहारण अभी हाल के ही हैं,

फिर ये अकबर गौरी – जैसे चोर, डाकू, लुटेरे, कैसे इस देश में महान हो गए ?

क्या अर्जुन के रथ पर हनुमान जी विद्यमान थे ?

अर्जुन के रथ में जो पताका थी, उसमे केवल हनुमान जी ही स्थापित थे – ऐसा महाभारत नहीं कहती –

जैसे आज भी हम बहुत से अत्याधुनिक मिसाइल, फाइटर प्लेन , एयरक्राफ्ट देखते हैं, उन सबमे, कुछ प्रतीक उपयोग किये जाते हैं, मिसाल के तौर पर –

राष्ट्र का ध्वज

सेना से सम्बन्ध विभाग का लोगो

कुछ न. भी लिखे होते हैं

आदि आदि अनेक एम्ब्लोम (प्रतीक चिन्ह) भी स्थापित होते हैं।

इसी प्रकार – अर्जुन के रथ (विमान) में अनेक अनेक महापुरषो, वीरो, और पितरो आदि के मूर्ति (प्रतीक चिन्ह) लगे हुए थे।

जो लोग केवल ये कहते हैं की हनुमान जी की ही मूर्ति या ध्वजा थी – वो कृपया एक बार – महाभारत में ही उद्योगपर्वान्तर्गत यानसन्धि पर्व – अध्याय ५६ श्लोक संख्या ७-८ पढ़ लेवे

संजय ने कहा – प्रजानाथ ! विश्वकर्मा त्वष्टा तथा प्रजापति ने इंद्र के साथ मिलकर अर्जुन के रथ की ध्वजा में अनेक प्रकार के रूपों के रचना की है।। ७ ।।

उन तीनो ने देवमाया के द्वारा उस ध्वज में छोटी बड़ी अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवं दिव्य मूर्तियों का निर्माण किया है ।। ८ ।।

इन श्लोको में अर्जुन के रथ की ध्वज का वर्णन है – स्पष्ट है कहीं भी केवल हनुमान जी का वर्णन नहीं है – क्योंकि अनेक वीर, महापुरष, राजाओ आदि के चिन्ह उस ध्वज पर अंकित किये गए थे ठीक ऐसे ही हनुमान जी भी उनमे से एक थे।

मगर कुछ मूर्खो ने केवल हनुमान जी को ही ध्वज पर दिखा कर अर्जुन, कृष्ण जैसे महावीरों की विलक्षण और ज्ञानगर्भित सोच को दरकिनार करके – पक्षपाती तरीके से केवल हनुमान जी को ही ध्वज पर दिखाया –

क्या इस प्रकार के पक्षपात से अनेक वीरो और महापुरषो का अपमान नहीं होता ?

एक तरफ तो पौराणिक लोग कहते नहीं थकते की हनुमान जी प्रभु श्री राम के चरणो से हटते तक नहीं – दूसरी तरफ कृष्ण को राम का ही दूसरा रूप भी बताते हैं –

फिर मेरी शंका है – ये हनुमान जी कृष्ण यानी अपने प्रभु राम के चरणो से हटकर – उनके सर पर क्यों और कैसे सवार हो गए ?

क्या ये तर्क सही होगा ?

आशा है इस पोस्ट का सही मतलब समझा जाएगा

धन्यवाद

नोट : अर्जुन के रथ में १०० घोड़े (हार्सपावर) उपयोग था – जो एक फाइटर प्लेन था – जिसमे अनेक शस्त्र और तकनीकी थी – जिसके बारे में विस्तार से पोस्ट लिखी जायेगी।

क्या हनुमान जी उड़कर समुद्र लांघ लंका पहुंचे थे ?

सुन्दर काण्ड के पहले सर्ग में श्लोक संख्या १-९ – बाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के उड़ने जैसा कोई वर्णन कहीं प्राप्त नहीं होता है –

आखिर सच क्या है – आइये एक नजर बाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड के पहले सर्ग में श्लोक संख्या १-९ तक देखे और विचार करते हैं :

जो हनुमान जी के उड़कर समुद्र लांघ कर लंका जाने की बात है वो भी एक मिथक ही है – यदि आप बाल्मीकि रामायण को पढ़े – तो सुन्दर काण्ड के पहले सर्ग में श्लोक संख्या १-९ – कृपया ध्यान दीजिये – इस रेफ को नोट कीजिये और जाकर चेक कीजिये – वहां वाल्मीकि जी लिखते हैं –

दुष्करं निष्प्रतिद्वद्वं चिकीर्षन्कर्म वानरः।
समुदग्रशिरोग्रीवो गवां पतिरिवाबभौ ।। १ ।।

पॢवग पॢवने कृतनिश्चयः।
ववृघे रामवृद्धयर्थे समुद्र इव पर्वसु ।। २ ।।

विकर्षन्नूर्मिजालानी बृहन्ति ळवणाम्भसि।
पुप्लुवे कपिशार्दूलो विकिरन्निव रोदसी ।। ३ ।।

मेरुमंदरसंकाशानुदगतांसुमहार्णवे।
अत्यक्राम्न्महावेगस्त रंगंगान्यन्निव ।। ४ ।।

तिमिनक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा।
वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम ।। ५ ।।

येनासौ याति बलवान्वेगेन कपिकुञ्जरः।
तेन मार्गेण सहसा द्रोणिकृत इवार्णवः ।। ६ ।।

प्राप्तभूयिष्ठपारस्तु सर्वतः परिलोकयन्।
योजनानां शतस्यान्ते वनराजी ददर्श सः ।। ७ ।।

सागरं सागगनूपानसागरानूपजान्द्रुमान।
सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यापि विलोकयत ।। ८ ।।

स चारुनानाविघरूपधारी परं समासाद्य समुद्रतीरम।
निपत्य तीरे च महोदधेस्तदा ददर्श लंकाममरावतीमिव ।। ९ ।।

(सुन्दर काण्ड सर्ग १ श्लोक संख्या १-९)

अर्थ :

बड़ा, कठिन, तुलना से रहित कर्म करना चाहता हुआ, ऊँचे सिर और ग्रीवावाला वानर सांड की तरह भासने लगा ।। १ ।।

डोंगी से तैरने में निश्चय वाला, डोंगी से तैरने वालो में श्रेष्ठो से देखा हुआ वह पर्वो में समुद्र के तरह राम के अर्थवृद्धि को प्राप्त हुआ ।। २ ।।

उस खारी जल में बड़े बड़े २ लहरो के समूहों को चीरता हुआ वह वानर श्रेष्ठ मानो द्यौ पृथ्वी पर (जल के फूल) बिखेरता हुआ खेवा करने लगा ।। ३ ।।

मेरु मंदर के बराबर महासागर में उठती हुई लहरो को बड़े वेगवाला, मानो गिनता हुआ गया ।। ४ ।।

(बल से जल उछलने पर) मछलिये, मगर, मच्छ, इस तरह नंगे हुए दीखते हैं जैसे वस्त्र के खींच लेने से शरीर धारियों के शरीर ।। ५ ।।

बलवान वानर श्रेष्ठ वेग से जिस मार्ग से जा रहा था, उस मार्ग से समुद्र सहसा द्रोण की तरह होता जाता था (पानी में उसकी डोंगी के आकार बनते जाते थे) ।। ६ ।।

बहुत बड़ा भाग पार करके सब और देखता हुआ वह सौ योजन की समाप्ति पर वन समूह को देखता भया ।। ७ ।।

सागर, सागर के किनारे के देश, और उस देश में होने वाले वृक्ष और सागर की पत्नियें (नदियों) के मुहाने देखता भया ।। ८ ।।

सुन्दर नानाविधरूप धारी वानर समुद्र के परले तीर पर पहुंचकर महासागर के किनारे पर उतरकर अमरावती के तुल्य लंका को देखता भया ।। ९ ।।

इस सारे सर्ग से अधिकतर हनुमान जी का समुद्र को फांद कर पार होना पाया जाता है , जोकि असंभव है। और ये कोई मिथक अथवा लोकोक्ति बनायीं गयी लगती है – क्योंकि यहाँ सर्ग में ही स्वयं वाल्मीकि जी ने दूसरे श्लोक में हनुमान जी को डोंगी से तैर कर समुद्र पार करने का स्पष्ट इशारा किया है –

पॢव = छोटी नौका – डोंगी अथवा आज के समय पर तेज वेग से पानी में चलने वाली “वेवरनर” जैसा कोई तीव्र वाहन –

श्लोक ३ में लिखा है – “उस खारी जल में बड़े बड़े २ लहरो के समूहों को चीरता हुआ वह वानर श्रेष्ठ” – आप विचार करे – बिना जल में कोई नौका चलाये ये काम असंभव है।

श्लोक ४ में लिखा है – “मेरु मंदर के बराबर महासागर में उठती हुई लहरो को बड़े वेगवाला, मानो गिनता हुआ गया” – स्वयं विचार करे – लहरे उठती रहती हैं समुद्र में – पर जैसे कोई “सर्फिंग” करने गया मनुष्य उन उठती लहरो के ऊपर संतुलन बनाकर वेग से चलता है – ठीक वैसे ही इस श्लोक में बताया गया – उड़ना नहीं बताया।

श्लोक ४ में लिखा है – “बलवान वानर श्रेष्ठ वेग से जिस मार्ग से जा रहा था, उस मार्ग से समुद्र सहसा द्रोण की तरह होता जाता था (पानी में उसकी डोंगी के आकार बनते जाते थे) – इस श्लोक से तो सारी शंकाओ का पूर्ण समाधान ही हो गया – जब भी पानी पर डोंगी नाव कुछ भी चलेगी वो पानी को चीरकर आगे बढ़ेगी जिससे उस मार्ग में पानी का रास्ता कटता हुआ दिखेगा जो नाव अथवा डोंगी के आकार का ही होगा – अधिक विश्लेषण हेतु एक बार इस पोस्ट के साथ संलग्न चित्र को देखे –

श्लोक 9 में लिखा है – “सुन्दर नानाविधरूप धारी वानर समुद्र के परले तीर पर पहुंचकर महासागर के किनारे पर उतरकर अमरावती के तुल्य लंका को देखता भया” – अब देखिये यहाँ स्पष्ट रूप से वर्णित है हनुमान जी समुद्र के पार लंका के किसी तीर (नदी अथवा समुद्र का किनारा) पर पहुंच कर लंका को देखने लगे।

यहाँ विचारने योग्य बात यह है की यदि हनुमान जी उड़कर लंका गए होते तो किसी समुद्र किनारे उतरने की कोई आवश्यकता नहीं थी – वो सीधे ही लंका के महल पर उतरते – या फिर जहाँ माता सीता को रखा गया था उस अशोक वाटिका में उतरते –
अधिक जानकारी के लिए सुन्दर काण्ड के दुसरे सर्ग की श्लोक संख्या १-१७ भी पढ़ लेवे –

यहाँ संक्षेप में बताता हु – वहां लिखा है –

हनुमान जी नीले हरे घास के, उत्तम गंध वाले, मधु वाले और उत्तम वृक्षों वाले वनो के मध्य में से गया। (सुन्दर काण्ड सर्ग २ श्लोक ३)

अब बताओ भाई – यहाँ स्पष्ट लिखा है वनो के मध्य में से गए – फिर उड़ कर वनो के ऊपर से क्यों नहीं गए ???????

इसके आगे के श्लोको में भी हनुमान जी के उड़ने का कोई वर्णन नहीं बल्कि स्पष्ट लिखा है – वो चतुराई से कैसे लंका में दाखिल हुए – उसके लिए उन्हें शाम तक इन्तेजार करना पड़ा – यदि उड़ सकते होते तो शाम तक इन्तेजार करते क्या ????

कृपया सत्य को जाने और माने –

नमस्ते –