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चाँदापुर शास्त्रार्थ का भय-भूत: – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

चाँदापुर शास्त्रार्थ का भय-भूत:- एक आर्य भाई ने यह जानकारी दी है कि आपने ऋषि-जीवन की चर्चा करते हुए पं. लेखराम जी के अमर-ग्रन्थ के आधार पर चाँदापुर शास्त्रार्थ की यह घटना क्या दे दी कि शास्त्रार्थ से पूर्व कुछ मौलवी ऋषि के पास यह फरियाद लेकर आये कि हिन्दू-मुसलमान मिलकर शास्त्रार्थ में ईसाई पादरियों से टक्कर लें। आप द्वारा उद्धृत प्रमाण तो एक सज्जन के लिये भय का भूत बन चुका है। न जाने वह कितने पत्रों में अपनी निब घिसा चुका है। अब फिर आर्यजगत् साप्ताहिक में वही राग-अलापा है। महाशय चिरञ्जीलाल प्रेम जैसे सम्पादक अब कहाँ? कुछ भी लिख दो। सब चलता है। इन्हें कौन समझावे कि आप पं. लेखराम जी और स्वामी श्रद्धानन्द जी के सामने बौने हो। कुछ सीखो, समझो व पढ़ो।

मेरा निवेदन है कि इनको अपनी चाल चलने दो। आपके लिये एक और प्रमाण दिया जाता है। कभी बाबा छज्जूसिंह जी का ग्रन्थ ‘लाइफ एण्ड टीचिंग ऑफ स्वामी दयानन्द’ अत्यन्त लोकप्रिय था। इस पुस्तक के सन् १९७१ के संस्करण में डॉ. भवानीलाल जी भारतीय ने इसका गुणगान किया था। जो प्रमाण पं. लेखराम जी का मैंने दिया है, उसी चाँदापुर शास्त्रार्थ उर्दू को बाबा छज्जूसिंह जी ने अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। पं. लेखराम जी को झुठलाने के लिये नये कुतर्क गढक़र कोई कुछ भी लिख दे, इन्हें कौन रोक सकता है। सूर्य निकलने पर आँखें मीचकर सूर्य की सत्ता से इनकार करने वाले को क्या कह सकते हैं। अब भारतीय जी को क्या कहते हैं? यह देख लेना।

रक्तसाक्षी पंडित लेखराम “आर्य मुसाफिर”

जन्म– आठ चैत्र विक्रम संवत् १९१५ को ग्राम सैदपुर जिला झेलम पश्चिमी पंजाब |
पिता का प.तारासिंह व माता का नाम भागभरी(भरे भाग्यवाली]) था | १८५० से १८६० ई. एक एक दशाब्दि में भारत मेंकई नर नामी वीर, जननायक नेता व विद्वान पैदा हुए | यहाँ ये बताना हमारा कर्त्तव्य है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के हुतात्मा खुशीरामजी का जन्म भी सैदपुर में ही हुआ था | वे भी बड़े दृढ़ आर्यसमाजी थे | आर्यसमाज के विख्यात दानी लाला दीवानचंदजी इसी ग्राम में जन्मे थे | पण्डितजी के दादा का पं.नारायण सिंह था | आप महाराजा रणजीतसिंह की सेना के एक प्रसिद्द योध्या थे |
आर्यसमाज में पण्डितजी का स्थान बहुत ऊँचा है | धर्मरक्षा के लिए इस्लाम के नाम पर एक मिर्जाई की छूरी से वीरगति पाने वाली प्रथम विभूति पं.लेखराम ही थे | आपने मिडिल तक उर्दू फ़ारसी की शिक्षा अपने ग्राम में व पेशावर में प्राप्त की | फ़ारमुग़लकाल के बाद सी के सभी प्रमाणिक साहित्यिक ग्रन्थों को छोटी सी आयु में पढ़ डाला | अपने चाचा पं.गण्डाराम के प्रभाव में पुलिस में भर्ती हो गए | आप मत, पन्थो का अध्ययन करते रहे | प्रसिद्द सुधारक मुंशी कन्हैयालाल जी के पत्र नीतिप्रकाश से महर्षि दयानन्द की जानकारी पाकर ऋषि दर्शन के अजमेर गए | १७ मई १८८१ को अजमेर में ऋषि के प्रथम व अंतिम दर्शन किये, शंका-समाधान किया | उपदेश सुने और सदैव के लिए वैदिक-धर्म के हो गए |

सत्यनिष्ठ धर्मवीर, वीर विप्र लेखरामजी का चरित्र सब मानवों के लिए बड़ा प्रेरणादायी है | इस युग में विधर्मियों की शुद्धि के लिए सबसे अधिक उत्साह दिखाने वाले पं.लेखराम ही थे, इस कार्य के लिए उन्होंने अपना जीवन दे दिया| आज हिन्दू समाज उनके पुनीत कार्य को अपना रहा है | परन्तु खेद की बात है कि आर्यसमाज मन्दिरों के अतिरिक्त किसी हिन्दू के घर या संघठन में पण्डितजी का चित्र नही मिलता | आर्यों की संतान इन हिन्दुओं को नही भूलना चाहिए कि विदेशी शासकों के पोषक व प्रबल समर्थक इन्हीं मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने अपनी एक पुस्तक में हिन्दुओं को “सैदे करीब” लिखा था | इसका अर्थ है कि हिन्दू तो मुसलमानों की पकड़ में शीघ्र आनेवाला शिकार है |

पण्डितजी अडिग ईश्वरविश्वासी, महान मनीषी, स्पष्ट वक्ता, आदर्श धर्म-प्रचारक, त्यागी तपस्वी, लेखक, गवेषक, और बड़े पवित्र आत्मा थे | एक बार पण्डितजी ने आर्यसमाज पेशावर के मंत्री श्री बाबू सुर्जनमल के साथ अफगानिस्तान में ईसाई मत के प्रचारक पादरी जोक्स से पेशावर छावनी में भेंट की | पादरी महोदय ने कहा कि बाइबिल में ईश्वर को पिता कहा गया है | ऐसी उत्तम शिक्षा अन्यत्र किसी ग्रन्थ में नहीं है | पण्डितजी ने कहा “ऐसी बात नही है | वेद और प्राचीन आर्य ऋषियों की बात तो छोड़िये अभी कुछ सौ वर्ष पहले नानकदेव जी महाराज ने भी बाइबिल से बढ़कर शिक्षा दी है| पादरी ने पूछा कहाँ है ?? पण्डितजी ने कहा देखिये—

तुम मात पिता हम बालक तेरे |
तुमरी किरपा सुख घनेरे || “

यहाँ ईश्वर को पिता ही नही माता भी कहा गया है| ये शिक्षा तो बाइबिल की शिक्षा से भी बढ़कर है| माता का प्रेम पिता के प्रेम से कहीं अधिक होता है | इसीलिए ईसा मसीह को युसूफ पुत्र न
कहकर इबने मरियम (मरियम पुत्र) कहा जाता है | ये सुनकर पादरी महोदय ने चुप्पी साध ली | इसी प्रकार अजमेर में पादरी ग्रे(Grey) ने भी इसी प्रकार का प्रश्न उठाया तब पण्डितजी ने यजुर्वेद
मंत्र संख्या ३२/१० का प्रमाण देकर उनकी भी बोलती बंद कर दी थी |

रोपड़ के पादरी पी सी उप्पल ने एक राजपूत युवक को बहला-फुसलाकर ईसाई बना लिया, पण्डितजी को सुचना मिली तो वे रोपड़ पहुंचे, तब तक रोपड़ के दीनबंधु सोमनाथजी ने उसे शुद्ध कर लिया था | पण्डितजी ने रोपड़ पहुंचकर मंडी में लगातार कई दिन तक बाइबिल पर व्याख्यान दिए | पादरी उप्पल को लिखित व मौखिक शास्त्रार्थ के लिए निमंत्रण दिया | उप्पल महोदय ने चुप्पी साध ली | घटना अप्रैल १८९५ की है |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने ‘सत बचन’ नाम से एक पुस्तक छापी | उसमें यह सिद्ध करने का यत्न किया कि बाबा नानकदेवजी पक्के मुसलमान थे | इस पुस्तक के छपने पर सिखों मरण बड़ी हलचल
मची | तब प्रतिष्ठित सिखों ने पण्डितजी से निवेदन किया वे इसका उत्तर दें | उस समय पण्डितजी के सिवा दूसरा व्यक्ति इसका उत्तर देने वाला सूझता भी नही था | बलिदान से पूर्व इस विषय पर एक ओजस्वी व खोजपूर्णव्याख्यान देकर मिर्ज़ा साहेब की पुस्तक का युक्ति व प्रमाणों से प्रतिवाद किया| भारी संख्या में सिख उन्हें सुनने आये, सेना के सिख जवान भी बहुत बड़ी संख्या में वहां उपस्थित थे | आपके व्याख्यान के पश्चात् सेना के वीर सिख जवानों ने पण्डितजी को ऐसे उठा लिया जैसे पहलवान को विजयी होने पर उसके शिष्य उठा लेते हों |

पं.लेखरामजी धर्म रक्षा के लिए संकटों, आपत्तियों और विपत्तियों का सामना किया | उनके व्यवहार से ऐसा लगता है कि मानों बड़े से बड़े संकट को भी वो कोई महत्व नही देते थे | उनके पिताजी की मृत्यु हुई तो भी वे घर में न रुक सके | बस गए और चल पड़े | उन्हें भाई की मृत्यु की सूचना प्रचार-यात्रा में ही मिली, फिर भी प्रचार में ही लगे रहे | एक कार्यक्रम के पश्चात् दुसरे और दुसरे के पश्चात् तीसरे में| इकलौते पुत्र की मृत्यु से भी विचलित न हुए | पत्नी को परिवार में छोड़कर फिर चल पड़े | दिन रात एक ही धुन थी कि वैदिक धर्म का प्रचार सर्वत्र करूँ |

पंडित लेखराम तो जैसे साक्षात् मृत्यु को ललकारते थे| कादियां का मिर्ज़ा गुलाम अहमद स्वयं को नबी पैगम्बर घोषित कर रहा था और पण्डितजी को मौत की धमकियाँ दे रहा था | उसने श्रीराम पर
श्रीकृष्ण पर, गौ पर, माता कौशल्या पर, नामधारी गुरु रामसिंह पर, महर्षि दयानन्द, वेद और उपनिषद इत्यादि सब गन्दे-गन्दे प्रहार किये | उसने श्रीकृष्ण महाराज को तो सुअर मारने वाला लिखा |
पर यहाँ पं.लेखराम धर्म पर उसके प्रत्येक वार का उत्तर देते थे | जब पण्डितजी सामने आते तो खुद को शिकारी कहने वाला बिल में छुप जाता | अपने बलिदान से एक वर्ष पूर्व पण्डितजी लाहौर रेलवे स्टेशन के पास एक मस्जिद में पहुंचे, उन्हें पता चला कि मिर्ज़ाजी वहां आये हैं | मिर्ज़ा उनकी हत्या के षड्यंत्रों में लगा था| जाते ही मिर्ज़ा को नमस्ते करके सच और झूठ का निर्णय करने का निमंत्रण दे दिया | विचार करिए जिस व्यक्ति से मृत्यु लुकती-छिपती थी और नर नाहर लेखराम मौत को गली-गली खोजता फिरता था | मौत को ललकारता हुआ लेखराम मिर्ज़ा के घर तक पहुंचा|
कादियां भी मिर्ज़ा के इलहामी कोठे में जाकर उसे ललकारा | आत्मा की अमरता के सिद्धांत को मानकर मौत के दांत खट्टे करने लेखराम जैसे महात्मा विरले होते हैं |

पण्डितजी ने हिन्दू-जाति की रक्षा के लिए क्या नही किया ?? स्यालकोट में सेना के दो सिख जवान मुसलमान बनने लगे | जब सिख विद्वानों के समझाने पर भी वे नही टेल तप सिंघसभा वालों ने
आर्यसमाजियों से कहा पं.लेखराम को शीघ्र बुलाओ | पण्डितजी आये | उन युवकों का शंका-समाधान किया, शास्त्रार्थ हुआ और वे मुसलमान बनने से बचा लिए गए | जम्मू में कोई ठाकुरदास मुसलमान होने लगा तो पण्डितजी ने जाकर उसे बचाया | एल लाला हरजस राय मुसलमान हो गए | ये प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे थे | फारसी, अरबी, अंग्रेजी के बड़े ऊँचे विद्वान थे | हरजस राय का नाम अब मौलाना अब्दुल अज़ीज़ था | वह गुरुदासपुर में Extra Assistant Commisiner रहे थे | यह सबसे बड़ा पद था जो भारतीय तब पा सकते थे | पण्डितजी कृपा से वे शुद्ध होकर पुनः हरजस राय बन गए| एक मौलाना अब्दुल रहमान तो पण्डितजी के प्रभाव से सोमदत्त बने | हैदारबाद के एक योग्य मौलाना हैदर शरीफ पर आपके साहित्य का ऐसा रंग चढ़ा कि हृदय बदल गया | वे वैदिक धर्मी बन गए |
मौलाना शरीफ बहुत बड़े कवि थे |

एक बार पण्डितजी प्रचारयात्रा से लाहौर लौटे तो उन्हें पता चला कि मुसलमान एक अभागी हिन्दू युवती को उठाकर ले गए हैं | पण्डितजी ने कहा मुझे एक सहयोगी युवक चाहिए मैं उसे खोजकर लाऊंगा | पण्डितजी युवक को लेकर मस्जिदों में उसकी खोज में निकले | उन्होंने एक बड़ी मस्जिद में एक लड़की को देखा | भला मस्जिद में स्त्री का क्या काम ? यह आकृति में ही हिन्दू दिखाई दी | पण्डितजी ने उसकी बांह पकड़कर कहा “चलो मेरे साथ |” शूर शिरोमणि लेखराम भीड़ को चीरकर उस अबला को ले आये | आश्चर्य की बात तो यह है कि उस नर नाहर को रोकने टोकने की उन लोगों की हिम्मत ही न हुई |
इसी कारण देवतास्वरूप भाई परमानन्द जी कहा करते थे कि डर वाली नस-नाड़ी यदि मनुष्यों में कोई होती है तो पं.लेखराम में वो तो कत्तई नही थी |

पं.लेखराम जी ने ‘बुराहीने अहमदियों’ के उत्तर में ‘तकजीबे बुराहीने अहमदिया’ ग्रन्थ तीन भागों में प्रकाशित करवाया | इसके छपने के साथ ही धूम मच गयी | ईसाई पत्रिका ‘नूर अफशां’ में भी इसकी समीक्षा करते हुए पण्डितजी की भूरी-भूरी प्रशंसा की | पण्डितजी इस मामले में आर्य समाज में एक परम्परा के जनक भी हैं, विरोधी यदि कविता में आर्य-धर्म पर प्रहार करते थे तो पण्डितजी कविता में ही उत्तर देते थे | जिस छंद में प्रहारकर्ता लिखता, पण्डितजी उसी छंद में लिखते थे |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने पण्डितजी को मौत की धमकियाँ देकर वेद-पथ से विचलित करना चाहा| पण्डितजी ने सदा यही कहा मुझे जला दो, मार दो, काट दो, परन्तु मैं वेद पथ से मुख नही मोड़ सकता | इसी घोष के अनुसार एक छलिया उनके पास शुद्धि का बहाना बनाकर आया | उनका नमक खता रहा | उनका चेला बनने का नाटक किया | पण्डितजी महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र लिखते-लिखते थक गए तो अंगडाई ली | अंगड़ाई लेते हुए अपनी छाती को खोला तो वो नीच वहीँ बैठा था, उसने कम्बल में छुरा छुपा रखा था | क्रूर के सामने शूर का सीना था, पास कोई नही था | उस कायर ने पण्डितजी के पेट में छूरा उतार दिया और भाग निकला | वो तारीख थी ६ मार्च १८९७ |

उपसंहार—धर्मवीर पं.लेखराम की महानता का वर्णन करने में लेखनी असमर्थ है | स्वामी श्रद्धानंद जैसे नेता उनका अदब मानते थे | सनातन धर्म के विद्वान और नेता पं.दीनदयाल व्याख्यान वाचस्पति कहते थे कि पं.लेखराम के होते हुए कोई भी हिन्दू जाति का कुछ नही बिगाड़ सकता | ईसाई पत्रिका का सम्पादक उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध था | उनके बलिदान पर अमेरिका की एक पत्रिका ने उनपर लेख छापा था | ‘मुहम्मदिया पाकेट’ के विद्वान लेखक मौलाना अब्दुल्ला ने तो उन्हें ‘कोहे वकार’ अर्थात गौरव-गिरी लिखा है | पर पण्डितजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, वेदों को जीवन भर पानी पी पीकर कोसने वाला मिर्ज़ा भी मरते वक़्त वेदों को ईश्वरीय ज्ञान लिखकर जाता है | पण्डितजी हम और क्या लिखे ! अपनी बात को महाकवि ‘शंकर’ के शब्दों में समाप्त करते है—–

धर्म के मार्ग में अधर्मी से कभी डरना नही |
चेत कर चलना कुमारग में कदम धरना नही ||
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नही |
बोधवर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं ||

सुजीत मिश्र

पण्डित लेखराम ने कहाँ लिखा है? :राजेन्द्र जिज्ञासु

पण्डित लेखराम ने कहाँ लिखा है?

एक बन्धु ने पूछा है- क्या पुस्तक मेले में आपसे किसी ने चाँदापुर शास्त्रार्थ विषय में पण्डित लेखराम का प्रमाण माँगा? मैंने निवेदन किया कि बौद्धिक व्यायाम करके प्रसिद्धि पाना और बात है, सामने आकर शंका निवारण करवाना, गभीरता से सत्य को जानना दूसरी बात है। कोई पूछता तो मैं बता देता कि पं. लेखराम जी की ‘तकजीबे बुराहीन अहमदिया’ के आरभिक पृष्ठों पर ही मेरे कथन की पुष्टि में स्पष्ट शदों में लिखा पैरा मिलेगा। माता भगवती जब ऋषि जी से मुबई में मिली थी, तब वह 38 वर्ष की थी। यह कृपालु तो उसे ‘लड़की’ बनाये बैठे हैं। इन्होंने सनातनी विद्वान् पं. गंगाप्रसाद का ऋषि महिमा में लिखा अवतरण, हजूर जी महाराज लिाित ऋषि-जीवन, निन्दक जीयालाल लिखित ऋषि का गुणगान और मिर्जा कादियानी द्वारा महर्षि की हत्या या बलिदान के प्रमाण तो न जाने और न उनका लाभ उठाया। उनको एक काम मिला है, करने दीजिये।

हत्यारा मनुष्य था फ़रिश्ता नहीं :- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

हत्यारा मनुष्य था फ़रिश्ता नहीं :- प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु

१. मिर्ज़ा तथा मिर्जाई  पण्डित जी के हत्यारे को खुदा का भेजा फ़रिश्ता बताते व लिखते  चले आ रहे हैं .
कितना भी झूठ गढ़ते  जाओ , सच्चाई सौ पर्दे फाड़ कर बाहर  आ जाती है . मिर्जा  ने स्वयं  स्वीकार किया है . वह उसे एक शख्स ( मनुष्य ) लिखता है . उसने पण्डित लेखराम के पेट में तीखी छुरी मारी . छुरी मार कर वह मनुष्य लुप्त हो गया  पकड़ा नहीं गया

२. वह हत्यारा मनुष्य बहुत समय पण्डित लेखराम के साथ रहा . यहाँ बार बार उसे मनुष्य लिखा गया है . फ़रिश्ता नहीं . झूठ की पोल अपने आप खुल गयी
– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – २३९ प्रथम संस्करण

हत्यारा मनुष्य ही था :- मिर्जा पुनः लिखता है ” मैं उस मकान की ओर चला जा रहा हूँ . मेने एक व्यक्ति को आते हुए देखा जो कि एक सिख सरीखा प्रतीत होता था ” कुछ ऐसा दिखाई देता था जिस प्रकार मेने लेखराम के समय एक मनुष्य को स्वप्न में देखता था .
– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – ४४०  प्रथम संस्करण

यहाँ  फ़रिश्ते को सिख, अकालिया, सरीखा आदि तथा डरावना बताकर सीखो को तिरस्कृत किया साथ ही वह भी बता दिया की कादियानी अल्लाह के फ़रिश्ते शांति दूत नहीं क्रूर डरावने व हत्यारे  होते हैं . झूठ की फिर पोल खुल गयी .

अल्लाह का फ़ारसी पद्य पढ़िए :-

मिर्जा ने अपने एक लम्बी फ़ारसी कविता में पण्डित जी को हत्या की धमकी दते हुए अल्लाह मियां रचित निम्न पद्य दिया है :-

अला अय दुश्मने नादानों बेराह

बतरस अज तेगे बुर्राने मुहम्मद

– दृष्टव्य – हकीकत उल वही  पृष्ठ – २८८   तृतीय  संस्करण

अर्थात अय मुर्ख भटके हुए शत्रु तू मुहम्मद की तेज काटने वाले तलवार से डर

प्रबुद्ध, सत्यान्वेषी और निष्पक्ष पाठक ध्यान दें की अल्लाह ने तलवार से काटने की धमकी दी थी परन्तु मिर्जा ने स्वयं स्वीकार किया है की पण्डित लेखराम जी की हत्या तीखी छुरी से की गयी . मिर्ज़ा झूठा नहीं सच्चा होगा परन्तु मिर्ज़ा का कादियानी अलाल्ह जनाब मिर्ज़ा की साक्षी से झूठा सिद्ध हो गया . इसमें हमारा क्या दोष

न छुरी , न तलवार प्रत्युत नेजा ( भाला )

मिर्ज़ा लिखता है ” एक बार मेने इसी लेखराम के बारे में देखा कि एक नेजा ( भाला ) हा ई . उसका फल बड़ा चमकता है और लेखराम का सर पड़ा हुआ है उसे नेजे से पिरो दिया है और खा है की फिर यह कादियां में न आवेगा . उन दिनों लेखराम कादियां में था और उसकी हत्या से एक मॉस पहले की घटना है

 

– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – २८७   प्रथम संस्करण

 

यह इलहाम एक शुद्ध झूठ सिद्ध हुआ . पण्डित लेखराम जी का सर कभी भाले पर पिरोया गया हो इसकी पुष्टि आज तक किसी ने नहीं की .मिर्ज़ा ने स्वयं पण्डित जी के देह त्याग के समय का उनका चित्र छापा है मिर्जा के उपरोक्त कथन की पोल वह चित्र तथा मिर्जाई लेखकों के सैकड़ों लेख खोल रहे हैं

अपने बलिदान से पूर्व पण्डित जी ने कादियां पर तीसरी बार चढाई की मिर्ज़ा को  पण्डित जी का सामना करने की हिम्मत न हो सकी . मिर्जा को सपने में भी पण्डित लेखराम का भय सततता था उनकी मन स्तिथि का ज्वलंत प्रमाण उनका यह इलहामी कथन है :

झूठ ही झूठ :- मिर्जा का यह कथन भी तो एक शुध्ध झूठ है की पण्डित जी अपनी हत्या से एक मॉस पूर्व कादियां पधारे थे . यह घटना जनवरी की मास  की है जब पण्डित जी भागोवाल आये थे . स्वामी श्रद्धानन्द  जी ने तथा  इस विनीत ने अपने ग्रंथो में भागोवाल की घटना दी है . न जाने झूठ बोलने में मिर्जा को क्या स्वाद आता है .

तत्कालीन पत्रों में भी यही प्रमाणित होता है की पूज्य पण्डित जी १७-१८ जनवरी को भागोवाल पधारे सो कादियां `१९-२० जनवरी को आये होंगे . उनका बलिदान ६ मार्च को हुआ . विचारशील पाठक आप निर्णय कर लें की यह डेढ़ मास  पहले की घटना है अथवा एक मास पहले की . अल्पज्ञ जेव तो विस्मृति का शिकार हो सकता है . क्या सर्वज्ञ अल्लाह को भी विस्मृति रोग सताता है ?

अल्लाह का डाकिया कादियानी  नबी :-

मिर्जा ने मौलवियों का, पादरियों का , सिखों का , हिन्दुओं का सबका अपमान किया . सबके लिए अपशब्दों का प्रयोग किया तभी तो “खालसा ” अखबार के सम्पादक सरदार राजेन्द्र सिंह जी ने मिर्जा की पुस्तक को ” गलियों की लुगात ” ( अपशब्दों का शब्दकोष ) लिखा है . दुःख तो इस बात का है की मिर्ज़ा बात बार पर अल्लाह का निरादर व अवमूल्यन करने से नहीं चूका . मिर्जा ने लिखा है मेने एक डरावने व्यक्ति को देखा . इसको भी फ़रिश्ता ही बताया है – ” उसने मुझसे पूछा कि लेखराम कहाँ है ? और एक और व्यक्ति का नाम लिया की वह कहा है ?

– दृष्टव्य – तजकरा पृष्ठ – २२५   प्रथम संस्करण

पाठकवृन्द ! क्या  यह सर्वज्ञ अल्लाह का घोर अपमान नहीं की वह कादियां फ़रिश्ते को भेजकर अपने पोस्टमैन मिर्ज़ा गुलाम अहमद से पण्डित लेखराम तथा एक दूसरे व्यक्ति ( स्वामी श्रद्धानन्द ) का अता पता पूछता है . खुदा के पास फरिश्तों की क्या कमी पड़  गयी है ? खुदा तो मिर्ज़ा पर पूरा पूरा निर्भर हो गया . उसकी सर्वज्ञता पर मिर्जा ने प्रश्न चिन्ह लगा दिया .

एक और झूठ गढ़ा गया : – ऐसा लगता है कि कादियां में नबी ने झूठ गढ़ने की फैक्ट्री लगा दी . यह फैक्ट्री ने झूठ गढ़ गढ़ कर सप्लाई करती थी पाठक पीछे नबी के भिन्न भिन्न प्रमाणों से यह पढ़ चुके हैं कि पण्डित जी की हत्या :
१. छुरी से की गयी

२. हत्या तलवार से की गए

३. हाथ भाले से की गयी

नबी के पुत्र और दूसरे खलीफा बशीर महमूद यह लिखते हैं :-

४. घातक ने पण्डित जी पर खंजर से वर किया
देखिये – “दावतुल अमीर ” लेखक मिर्जा महमूद पृष्ठ – २२०

अब पाठक इन चरों कथनों के मिलान कर देख लें की इनमें सच कितना है और झूठ कितना . म्यू हस्पताल के सर्जन डॉ. पेरी को प्रमाण मानते ही प्रत्येक बुद्धिमानi यह कहेगा कि बाप बेटे के कथनों में ७५ % झूठ है .

 

मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी की शालीनता

मिर्ज़ा  गुलाम अहमद  कादियानी  और  उसकी उम्मत  लगातार ये कहती  आयी है कि  पण्डित लेखराम की वाणी अत्यन्त तेज  व  असभ्य थी . मिर्ज़ा  गुलाम अहमद  और  न ही उसके चेले  आज तक  इस  सन्दर्भ में कोई  प्रमाण प्रस्तुत  कर पाए हैं . इसके विपरीत मिर्ज़ा  गुलाम अहमद स्वयम कहता है कि पण्डित लेखराम  सरल  स्वाभाव  के थे :

‘ वह अत्यधिक  जोश के होते हुए भी अपने स्वभाव से सरल था ”
सन्दर्भ- हकीकुत उल वही पृष्ट  -२८९ ( धर्मवीर पण्डित लेखराम – प्र राजेन्द्र जिज्ञासु)

मिर्ज़ा गुलाम अहमद और उनके चेले तो धर्मवीर पण्डित लेखराम जी के वो शब्द तो न दिखा सके न ही दिखा सकते हैं क्योंकि झूठ के पांव नहीं होते .

आइये आपको मिर्ज़ा गुलाम अहमद की भाषा की शालीनता के कुछ नमूने उनकी ही किताबों से देते हैं :

 

रंडियों की औलाद  

” मेरी इन किताबों को हर मुसलमान  मुहब्बत  की नजर से देखता है और उसके इल्म से फायदा उठाता है और मेरी अरु मेरी दावत के हक़ होने की गवाही देता है और इसे काबुल करता है .

किन्तु रंडियों (व्यभिचारिणी औरतों ) की औलादें मेरे हक़ होने  की गवाही नहीं देती ”

– आइन इ कमालाते  इस्लाम पृष्ट -५४८ लेखक – मिर्जा गुलाम अहमद प्रकाशित सब १८९३ ई

 

हरामजादे

” जो हमारी जीत का कायल नहीं होगा , समझा जायेगा कि उसको हरामी (अवैध संतान ) बनने का शौक हिया और हलालजादा (वैध संतान ) नहीं है .”

– अनवारे इस्लाम पृष्ट -३० , लेखक – मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी प्रकाशित – सन १८९४ ई

मर्द सूअर  और औरतें  कुतियाँ

” मेरे  विरोधी जंगलों के सूअर हो गए और उनकी  औरतें  कुतियों से बढ़ गयीं ”

– जज्जुल हुदा पृष्ठ – १० लेखक  मिर्ज़ा  गुलाम अहमद  कादियानी प्रकाशित – १९०८ ई

जहन्नमी

मिर्ज़ा जी बयान करते हैं :

‘ जो व्यक्ति मेरी पैरवी नहीं करेगा और मेरी जमाअत में दाखिल नहें होगा वह खुदा और रसूल की नाफ़रमानी करने वाला है जहन्नमी है ”

– तबलीग रिसालत पृष्ट – २७ , भाग – ९

मौलाना मुहम्मद अब्दुर्रउफ़ “कादियानियत की हकीकत” में लिखते हैं कि मानो कि तमाम मुसलमान जो मिर्ज़ा गुलाम अहमद के हक़ होने की गवाही न तो वह जहन्नमी और हरामजादे , जंगल के सूअर और रण्डियों की औलादें हैं और मुसलमान औरतें हरामजादियां रंडियां (वैश्याएँ) और जंगल की कुतियाँ और जहन्नमी हैं

– पृष्ट -५४, प्रकाशन – २०१०

 

मिर्ज़ा गुलाम अहमद की भाषा शैली किस स्तर तक गिरी हुयी थी ये उसके चुनिन्दा नमूने हैं अन्यथा भाषा की स्तर इस कदर गिरा हुआ है कि हम उसे पटल पर रखना ठीक नहीं समझते .

समझदारों के लिए इशारा ही काफी है .

 

Pandit Lekhram gave Mirza Ghulam Ahmad a very hard time for a number of years. He would respond to the latter’s challenges, and would show up to meet him, and also wrote in an equally tough, though more civil tone, but nevertheless very sarcastic.  Here references are given of sarcastic & unplished tone of Mirza Ghulam Ahamd

 

 

देखें तो पण्डित लेखराम को क्या  हुआ? प्रा राजेंद्र जिज्ञासु

 

पण्डितजी के बलिदान से कुछ समय पहले की घटना है।

पण्डितजी वज़ीराबाद (पश्चिमी पंजाब) के आर्यसमाज के उत्सव

पर गये। महात्मा मुंशीराम भी वहाँ गये। उन्हीं दिनों मिर्ज़ाई मत के

मौलवी नूरुद्दीन ने भी वहाँ आर्यसमाज के विरुद्ध बहुत भड़ास

निकाली। यह मिर्ज़ाई लोगों की निश्चित नीति रही है। अब पाकिस्तान

में अपने बोये हुए बीज के फल को चख रहे हैं। यही मौलवी

साहिब मिर्ज़ाई मत के प्रथम खलीफ़ा बने थे।

पण्डित लेखरामजी ने ईश्वर के एकत्व व ईशोपासना पर एक

ऐसा प्रभावशाली व्याख्यान  दिया कि मुसलमान भी वाह-वाह कह

उठे और इस व्याख्यान को सुनकर उन्हें मिर्ज़ाइयों से घृणा हो गई।

पण्डितजी भोजन करके समाज-मन्दिर लौट रहे थे कि बाजार

में एक मिर्ज़ाई से बातचीत करने लग गये। मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद

अब तक कईं बार पण्डितजी को मौत की धमकियाँ दे चुका था।

बाज़ार में कई मुसलमान इकट्ठे हो गये। मिर्ज़ाई ने मुसलमानों को

एक बार फिर भड़ाकाने में सफलता पा ली। आर्यलोग चिन्तित

होकर महात्मा मुंशीरामजी के पास आये। वे स्वयं बाज़ार

गये, जाकर देखा कि पण्डित लेखरामजी की ज्ञान-प्रसूता, रसभरी

ओजस्वी वाणी को सुनकर सब मुसलमान भाई शान्त खड़े हैं।

पण्डितजी उन्हें ईश्वर की एकता, ईश्वर के स्वरूप और ईश की

उपासना पर विचार देकर ‘शिरक’ के गढ़े से निकाल रहे हैं।

व्यक्ति-पूजा ही तो मानव के आध्यात्मिक रोगों का एक मुख्य

कारण है।

यह घटना महात्माजी ने पण्डितजी के जीवन-चरित्र में दी है

या नहीं, यह मुझे स्मरण नहीं। इतना ध्यान है कि हमने पण्डित

लेखरामजी पर लिखी अपनी दोनों पुस्तकों में दी है।

यह घटना प्रसिद्ध कहानीकार सुदर्शनजी ने महात्माजी

के व्याख्यानों  के संग्रह ‘पुष्प-वर्षा’ में दी है।

 

पं. पद्मसिंह शर्मा जी की दृष्टि में पं. लेखराम साहित्यः- प्रा लेखराम

आर्यसमाजी पत्रों के लेखकों का एक प्रिय विषय है ‘हिन्दी भाषा और आर्यसमाज परन्तु भूलचूक से भी कभी किसी ने यह नहीं लिखा कि आर्य विचारक, दार्शनिक, समीक्षक, पं. पद्मसिंह जी शर्मा सपादक परोपकारी के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें हिन्दी का सर्वोच्च पुरस्कार मंगलाप्रसाद सबसे पहले दिया गया। आप साहित्य समेलन प्रयाग के प्रधान पद को भी सुशोभित करने का गौरव प्राप्त कर पाये। जब ‘कुल्लियाते आर्य मुसाफिर’ के नये संस्करण को सपादित करने का गौरवपूर्ण दायित्व आर्यसमाज के मनीषियों ने मुझे सौंपा तो पं. लेखराम जी विषयक असंय लेख व अनगिनत पुस्तकें मेरे मस्तिष्क में घूमने लगीं।

मन में आया कि आचार्य उदयवीर जी तथा मुंशी प्रेमचन्द जी सरीखे विद्वानों व साहित्यकारों के निर्माता पं. पद्मसिंह जी शर्मा की पं. लेखराम के पाण्डित्य तथा साहित्य पर पठनीय गभीर टिप्पणी आर्य जनता की सेवा में रखी जाये। पं. शान्तिप्रकाश जी, पं. देवप्रकाश जी, ठाकुर अमरसिंह जी तथा शरर जी आदि के पश्चात् पूज्य पं. लेखराम जी के साहित्य का तलस्पर्शी ज्ञान रखने वालों का अकाल-सा पड़ गया है।

ऋषि के अन्तिम काल की चर्चा करते हुए पं. पद्मसिंह जी लिखते हैं कि इसके कुछ समय पश्चात् मिर्जा गुलाम अहमद ने हिन्दू धर्म पर और विशेष रूप से आर्यसमाज पर नये सिरे से आक्रमण करने आरभ किये। कादियानी मियाँ के आक्रमणों का समुचित उत्तर श्रीमान् पं. लेखराम जी ने दिया और ऐसा दिया कि बायद व शायद (जैसा देना चाहिये था- अनूठे ढंग से)।

फिर लिखा है, ‘‘पं. लेखराम जी के पश्चात् इस शान की, इस कोटि की यह एक ही पुस्तक (चौदहवीं का चाँद) निकली है, जिस पर अत्यन्त गौरव किया जा सकता है।’’

यह भी क्या अनर्थ है कि आर्यसमाज के बेजोड़ साहित्यकार का अवमूल्यन करने के लिए कुछ तत्त्व समाज में घुस गये हैं। उनके ऋषि जीवन को तो ‘विवरणों का पुलिंदा’ घोषित कर अपमानित किया और सहस्रों जनों को धर्मच्युत होने से बचाने वाले उनके साहित्य को अपने पोथी-पोथों से कहीं निचले स्तर का….। अधिक क्या लिखें।

परोपकारी के ऐसे-ऐसे कृपालु पाठकः- ‘परोपकारी’ पाक्षिक की प्रसार संया कभी कुछ सौ तक सीमित थी। आज देश के प्रत्येक भाग के यशस्वी समाजसेवी, जाति रक्षक, विचारक, वैज्ञानिक, गवेषक (अन्य-अन्य मतावलबी भी) सैंकड़ों की संया में परोपकारी के नये अंक की प्रतिक्षा में पोस्टमैन की राह में पलके बिछाये रहते हैं। इसके लिए सपादक जी तथा सभा का अधिकारी वर्ग बधाई का पात्र है। आचार्य धर्मेन्द्र जी, देश के गौरव युवा वैज्ञानिक डॉ. बाबूराव जी, डॉ. हरिश्चन्द्र जी, देश के वयोवृद्ध ज्ञानवृद्ध आयुर्वेद के उपासक, उन्नायक व रक्षक 92 वर्षीय डॉ. स.ल. वसन्त जी तो इस आयु में केवल गायत्री जप, उपासना व वेद का स्वाध्याय करते हैं। आप सोमदेव जी, धर्मवीर जी, स्वामी विष्वङ् जी तथा इस सेवक को पत्र लिखते ही रहते हैं। आपने अभी-अभी एक पत्र में लिखा है, ‘‘परोपकारी में आपके स्थायी स्तभ ‘कुछ तड़प-कुछ झड़प’ पढ़े बिना आनन्द नहीं आता।’’

पाठकों को बता दें कि डॉ. वसन्त जी गुजरात, म.प्र., राजस्थान, हरियाणा में ऊँचे पदों पर रहकर आयुर्वेद की सेवा कर चुके हैं। आप यशस्वी आर्य नेता, आर्य सपादक, तपस्वी स्वाधीनता सेनानी लाला सुनामराय जी के दामाद हैं। परोपकारी को ऐसा संरक्षक मिला है। यह बहुत गौरव का विषय है।

ऋषि ने तब क्या कहा था?ः- ईसाइयों, मुसलमानों से शास्त्रार्थ के लिए हिन्दुओं ने आमन्त्रित किया था। आत्म रक्षा के लिए तब हिन्दुओं को ऋषि की शरण लेनी पड़ी थी। मुसलमानों ने ऋषि के सामने प्रस्ताव रखा कि हम और आप दोनों मिलकर गोरे पादरियों से टक्कर लें। परस्पर की बातचीत फिर हो जायेगी, पहले इनको हराया जाये। महर्षि ने कहा कि सत्य न स्वदेशी है न विदेशी होता है। हम सत्यासत्य के निर्णय के लिए यहाँ शास्त्रार्थ करने आये हैं, हार-जीत के लिए नहीं।

पाखण्ड कहीं भी हो, पाखण्ड अंधविश्वास कोई भी व्यक्ति फैलावे उसका खण्डन करना आर्यत्व है। आर्यसमाज पर बाहर वाले प्रहार करें तो ‘तड़प-झड़प’ परमोपयोगी है और कोई नामधारी आर्यसमाजी वैदिक सिद्धान्त विरुद्ध कुछ लिखे व कहे तो उसे कुछ न कहो। इससे आर्यसमाज के उस व्यक्ति की अपकीर्ति होती है। यह क्या दोहरा मापदण्ड नहीं है? आर्यसमाज के अपयश व हानि की तो चिन्ता नहीं। अमुक व्यक्ति गुरुकुल का पढ़ा हुआ है। कोई बात नहीं शिवजी की बूटी आदि का पान करने का समर्थक है। यह क्या वैदिक धर्म प्रचार है? ऋषि दयानन्द सिद्धान्तों का बट्टा-सट्टा अदला-बदली नहीं जानते थे।

– वेद सदन, अबोहर, पंजाब-152116