Category Archives: Manu Smriti

सृष्टि-प्रसंग में विरोध कहने वालों का समाधान: पण्डित भीमसेन शर्मा

सृष्टिप्रक्रिया में कोई वेदादि ग्रन्थों का परस्पर विरोध कहते हैं उसकी निवृत्ति के लिये सब वचनों का यहां संग्रह तो हो नहीं सकता। और वैसा करने से लेख भी अत्यन्त बढ़ जाना सम्भव है, ऐसा विचार के संक्षेप से लिखते हैं- वेदादिग्रन्थों में कहीं-कहीं सृष्टि आदि विषयों का वर्णन शब्दों के भेद से किया गया है अर्थात् जिस विषय के लिये एक पुस्तक में जैसे शब्द हैं उससे भिन्न द्वितीय पुस्तक में लिखे गये, तब किन्हीं को भ्रम हो जाता है कि इसमें विरोध है। और सब पुस्तकों का लेख एक प्रकार के शब्दों में हो नहीं सकता क्योंकि देश, काल, वस्तु भेद से भेद हो जाता है और अनेक कर्त्ताओं के होने से भी उन-उन की शैली अलग-अलग होती है परन्तु विचारशील लोग जब उसके मुख्य सिद्धान्त पर ध्यान देते हैं तो उस मूल सिद्धान्त में कुछ भेद नहीं जान पड़ता किन्तु अज्ञानियों की बुद्धि में परस्पर विरोध बना रहता है, उसका कारण अज्ञान है। इसमें वेदादि शास्त्रों का कुछ दोष नहीं और इस अज्ञानियों के भेद से संसार की कुछ हानि भी नहीं हो सकती।

तथा अन्य वेदादिग्रन्थों में जहां-जहां सृष्टि का प्रकरण है, वहां-वहां रचना के वर्णन से पूर्व और प्रलयदशा के अन्त में कहा है कि-‘उस ने विचार किया कि मैं अनेकरूप सृष्टि करूँ’१ तथा प्रश्नोपनिषद् में लिखा है कि- ‘संसार की रचना से पहले उसने तप किया’२ यहां तपशब्द से भी सृष्टि-रचना के        अनुसन्धान करने से तात्पर्य है, क्योंकि परमेश्वर के सम्बन्ध में तपशब्द का अर्थ ज्ञान ही लिया गया है। सो ब्राह्मणग्रन्थों में लिखा है कि- ‘जिसका तप ज्ञान है।’३ यही अंश यहां मनुस्मृति में भी लिखा है कि- ‘उसने अपने सामर्थ्य से अनेक प्रकार की प्रजा रचने की इच्छा से विचार करके प्रथम प्राण अर्थात् सूत्रात्मा वायु को रचा’४ सृष्टि विषयक इत्यादि सभी वचनों का एक ही आशय है।

तथा प्रश्नोपनिषद् में लिखा है कि५- ‘उसने तप अर्थात् सत्-असत् अच्छे बुरे की प्रमाण वा कारण के अनुसार समीक्षा करके दो वस्तुओं को अर्थात् प्रथम दो प्रकार की शक्ति को उत्पन्न किया। जिनमें एक का नाम रयि और दूसरे का प्राण नाम रक्खा।’ इन्हीं दोनों का स्त्रीशक्ति और पुरुषशक्ति शब्दों से भी व्यवहार करते हैं। कहीं इन्हीं को सूर्य-चन्द्रमा नामों से कहा है, क्योंकि चन्द्रमा में स्त्रीशक्ति की और सूर्य में पुरुषशक्ति की प्रधानता वा उत्तेजकता है। इन्हीं दोनों को भोग्य-भोक्ता वा प्रकृति-पुरुष नामों से भी कोई लोग कहते हैं। इस प्रकार इन दो शक्तियों का अनेक नामों से व्यवहार किया गया है। यही अंश मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है कि- ‘उस परमेश्वर ने प्रारम्भ में अपने सत्त्वादि गुणों की साम्यावस्थारूप प्रकृति नामक एक (जिसमें अनिर्वाच्य होने से द्वित्वादि नहीं कहा जा सकता) सामर्थ्य के दो खण्ड किये, जिसके अर्द्धभाग में पुरुष और आधे भाग में स्त्री हुई। उस स्त्री में विराट् नाम ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु को उत्पन्न किया।’१ अर्थात् प्रलय के पश्चात् स्त्री-पुरुष के संयोग के बिना भी जितना जगत्- प्राणी उत्पन्न हुए वा जो कुछ जड़ वस्तु उत्पन्न होकर दृष्टिगोचर हुए उन सबकी उत्पत्ति स्त्रीपुरुषरूप दो शक्ति के मेल से हुई है। क्योंकि सब प्राणी और भूतों की उत्पत्ति से पहले दो शक्तियों की उत्पत्ति दिखाने का यही तात्पर्य है। अनुमान होता है कि इसी आशय को लेकर किन्हीं लोगों ने प्रारम्भ में एक स्त्री वा एक पुरुष को उत्पन्न किया माना है। उसी आदि पुरुष शक्ति को ब्रह्मा, स्त्रीशक्ति को सरस्वती वा महादेव-पार्वती (आदम-हव्वा) आदि नाम रखे गये। सम्भव है कि शक्ति की सौकर्यातिशय विवक्षा में स्वतन्त्र कर्त्ता की अविवक्षा कर देने से शक्ति का प्रयोग शक्तिमान् के स्थान पर मान लिया गया जिससे अनेक असम्भव पौराणिक कथा बन गईं। यहां प्रश्रोपनिषद् और मनुस्मृति का एक ही आशय है। केवल दोनों के कथन में किसी प्रकार कुछ भेदमात्र प्रतीत होता है। लोक में भी एक आशय वाले अविरुद्ध एक विषय को व्याख्यान कर्त्ताओं के भेद से भिन्न जैसा मान लेते हैं। वैसे ही सृष्टि में शास्त्रों का वास्तविक विरोध नहीं है।

सृष्टि प्रक्रिया में वेदों का जो सिद्धान्त है, वही इस मानवधर्मशास्त्र में भी समझना चाहिये। वेदों में जहां-जहां सृष्टि का वर्णन है वहां-वहां सर्वत्र वा प्रायः प्रथम प्रलय दशा का स्वरूप दिखाया गया है। जैसे- ऋग्वेद में लिखा है कि ‘उत्पत्ति से पहले अन्धकार से आच्छादित जगत् का कारण था।’२ इत्यादि प्रकार के मूल वेदमन्त्रस्थ आशय को लेकर के ही वाक्यभेद से मनु जी ने भी लिखा है कि३- ‘यह सब जगत् अन्धकाररूप अज्ञात- किसी प्रकार के चिह्न से रहित सब ओर से सोया जैसा था।’ तथा उक्त मन्त्र के “महिना जायतैकम्…” वाक्य का आशय भी मनुस्मृति के इसी प्रथमाध्याय में “महाभूतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः…”2 वर्णन किया गया है। इत्यादि प्रकार वेदानुकूल ही यहां सृष्टि का वर्णन है।

न्याय-मीमांसा और सांख्यादि शास्त्रों में कहीं-कहीं सृष्टि का वर्णन परस्पर विरुद्ध जैसा प्रतीत होता है। वहां भी वास्तविक विरोध नहीं। उस एक-एक में अपने-अपने अभीष्ट व्याख्येय कारण की प्रधानता दिखायी है। वे सब शास्त्रों में माने हुए सब कारण सृष्टि प्रक्रिया में उपयोगी होते हैं। काल, कर्म, उपादान और निमित्त शब्द वाच्यों की ही मुख्यकर शास्त्रों में कारणबुद्धि से प्रधानता दिखायी है। इन्हीं कालादि सृष्टि के कारणों की वेद में भी मुख्यता दीखती है। सो अथर्ववेद में भी “कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्। स्वयम्भूः कश्यपः कालात्तपः कालादजायत।। कालादापः समभवन्कालाद् ब्रह्म तपो दिशः। कालेनोदेति सूर्यः काले निविशते पुनः।।3 इत्यादि अनेक मन्त्र काल को ही सृष्टि का कारण कहते हैं कि काल से ही सृष्टि हुई। इसी प्रकार के मन्त्रों का आश्रय लेकर शास्त्रकारों ने अनेक प्रकार से काल की महिमा का वर्णन किया है। और ठीक-ठीक तो यह है कि उत्पत्ति-स्थिति-प्रलयों में काल ही प्रथम कारण है क्योंकि कभी आधी रात में सूर्य का उदय नहीं हो सकता अथवा न मध्याह्न में अस्त हो सकता है। इसी प्रकार अनियत समय में सृष्टि भी उत्पन्न नहीं हो सकती, किन्तु अपने-अपने समय में सब उत्पन्न होते, समय आने पर नष्ट होते और अपने समय में सब वस्तु स्थिर रहते हैं। समय पर वृक्ष फूलते-ह्ल लते, समय पर मेघ वर्षता है। इसी प्रकार सब पदार्थ अपने-अपने समय पर उत्पन्न होते हैं। इसीलिये कहा गया कि काल प्रजाओं को उत्पन्न करता है। अर्थात् प्रलय के पश्चात् जब उत्पत्ति का समय आता है तभी परमेश्वर भी जगत् को रचता है किन्तु समय के नियम को परमेश्वर भी नहीं तोड़ता वा तोड़ सकता। तात्पर्य यह है कि प्रलय दशा के भीतर परमेश्वर भी सृष्टि रचने में असमर्थ है। इसीलिये कहा है कि काल ने ही प्रथम सृष्टि होने से पूर्व परमेश्वर को सृष्टि रचने के लिये प्रेरित किया। जैसे प्रातःकाल में सूर्य का उदय होना मनुष्यों को प्रेरणा कर निद्रा से उठाता वा उद्योग कराता है। तथा कश्यप नाम सबको दिखाने वाला, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सबकी स्थिति का हेतु, सर्वरक्षक, सर्वसाक्षी परमेश्वर किसी मनुष्य की सहायता के बिना रचना का उद्योग करता है। इसीलिये उसको स्वयम्भू कहते हैं। वह परमेश्वर ऐसा होने पर भी काल की प्रेरणा से ही स्वाभाविक शक्ति के साथ सब करता है। तप नाम सृष्टि रचना का ज्ञान भी काल से ही होता है कि काम मुझको इस प्रकार करना चाहिये। मनुष्य भी अपने शरीर से हो सकने वाली प्रत्येक रचना को काल से ही जानता है कि अमुक काम का समय आ गया, वह अब करना चाहिये। काल से ही जल वा प्राण उत्पन्न हुए। वेदज्ञान और दिशा भी काल से ही उत्पन्न होती हैं, काल से सूर्य का उदय और अस्त होता है। यह सब अथर्ववेद के मन्त्रों का आशय है। इसी प्रकार काल की प्रधानता वैशेषिकशास्त्र में भी विशेषकर कही है।

तथा वेद में कर्मादि को भी सृष्टि के कारण ठहराने वाले बहुत मन्त्र हैं, उनका संग्रह खोजने से हो सकता है। कर्म की प्रधानता मीमांसा और न्याय में कही है। सांख्यशास्त्र में जगत् के उपादान कारण का और वेदान्त ब्रह्मसूत्रों में जगत् के निमित्त कारण का विशेषकर व्याख्यान किया है। वे अपने-अपने अवसर पर सब प्रधान हैं। इसलिये सृष्टि में परस्पर किसी प्रकार का विरोध नहीं है।

विद्वानों ने परमेश्वर के जो काम स्वीकार किये हैं, उनको वह मनुष्य के तुल्य नहीं करता, किन्तु जैसे सूर्य के उदय होने के पश्चात् बहुत कार्य सूर्य के निमितमात्र वर्तमान रहने से होते हैं। सूर्य के होने पर उन कार्यों का वैसा होना और न होने पर वैसा न होना ही सूर्य का निमित्त कारण होना जताता है। वैसे ही परमेश्वर के प्रकट होने पर सृष्टि उत्पन्न होती है (जैसे कि स्वामी के उपस्थित सम्मुख रहने पर सेवक लोग अपना-अपना काम यथावत् करते हैं, स्वामी को कुछ कहने तक की आवश्यकता नहीं होती। पर वह चाहता है कि ये सेवक जन ऐसा करें और सेवक भी चाहते हैं कि हम स्वामी की इच्छानुसार करें) किन्तु वह कुम्हार के तुल्य हाथ से काम नहीं करता। इसी आशय को लेकर कोई लोग सृष्टि करने में परमेश्वर की अपेक्षा नहीं समझते उनको यह भ्रान्ति ही है। क्योंकि निमित्त कारण के बिना वे लोग सृष्टि-प्रक्रिया का प्रतिपादन नहीं कर सकते। अर्थात् जड़ वस्तुओं के संयोगमात्र से ईक्षण पूर्वक सृष्टि नहीं हो सकती। इसलिये श्रौतस्मार्त्त सिद्धान्त के अनुसार सर्वज्ञ चेतन कोई इस जगत् का कर्त्ता है, ऐसा सब शिष्ट विद्वानों का सम्मत हमको भी मान्य है।

उन अवान्तर प्रलयों में जिस प्रकार वा जो सृष्टि उत्पन्न होती है, उसका यहां वर्णन नहीं है किन्तु ब्राह्म कल्प में होने वाली सृष्टि का वर्णन है। और अवान्तर प्रलय ब्रह्म के एक ही दिन में (प्रत्येक मन्वन्तर के आदि-अन्त में जैसा कि सूर्यसिद्धान्त में विशेषकर वर्णन किया गया है) कई बार होते हैं उनमें भूतसृष्टि का सर्वथा प्रलय नहीं होता, किन्तु प्रायः प्राणियों का प्रलय होता है। किन्हीं-किन्हीं ग्रन्थों में अवान्तर प्रलय के पश्चात् सृष्टि का वर्णन है, उसके साथ इस ब्राह्मदिन की सृष्टि का कुछ विरोध हो तो वह विरोध नहीं जानना चाहिये, क्योंकि उन दोनों सृष्टियों में देशकालादि के भेद से विषय में भेद हो गया और विषय भेद में विरोध होता नहीं, किन्तु एक ही विषय में विरोध होता है। उन प्रलय और सृष्टि के भेदों के व्याख्यान का यहां अवसर नहीं, किन्तु यहां तो इस वर्त्तमान ब्राह्मदिन के प्रारम्भ में कैसे सृष्टि हुई ऐसा विचार किया जाता है।

उसमें अन्य भाष्यकारों का यह सिद्धान्त है कि प्रलय दो प्रकार का है एक महाप्रलय और द्वितीय अवान्तर प्रलय। महाप्रलय में ब्रह्मा भी नहीं रहता क्योंकि महाप्रलय का समय आने तक ब्रह्मा की आयु भी पूर्ण हो जाती है और अवान्तर प्रलयों में वही एक ब्रह्मा स्थित रहता वा सोता है। महाप्रलय के पश्चात् सृष्टि का वर्णन करने में ब्रह्मा की भी उत्पत्ति कहनी पड़ती है। सो यहां मनुस्मृति के सृष्टि-प्रकरण में ब्रह्मा की उत्पत्ति मानते हैं इससे महाप्रलय के पश्चात् सृष्टि का वर्णन मनुस्मृति में बतलाना बनता है। ऐसा माना जावे तो इन लोगों के कथनानुसार ब्राह्म महाकल्प का यह प्रथम दिन हुआ और इस हिसाब से ब्रह्मा अभी एक दिन का नहीं हुआ। परन्तु प्रचरित पञ्चाग् और सटल्प की प्रक्रिया से यह कथन विरुद्ध प्रतीत होता है। क्योंकि पञ्चागें के लेखानुसार सटल्प में भी यह पढ़ा जाता है- “समस्तजगदुत्पत्तिस्थितिलयकारणस्य कमलासनस्य स्वमानेन परमायुर्वर्षशतं तस्यार्द्धं पञ्चाशद् गतमथ ब्रह्मणो द्वितीये परार्द्धे प्रथमवर्षे प्रथममासे प्रथमपक्षे प्रथमदिवसे द्वितीययामे- इत्यादि पञ्चाग्ेषु दृश्यते।” इसका तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय करने वाले ब्रह्मा की अपने दिन आदि के परिमाण से सौ वर्ष की अवस्था है उसका आधा ५० वर्ष बीत गया अब ब्रह्मा के द्वितीय उत्तरार्द्ध के प्रथम वर्ष के प्रथम मास के प्रथम पक्ष के प्रथम दिन में यह द्वितीय प्रहर है इत्यादि। पाठकों को इससे स्पष्ट विरोध प्रतीत हो जायगा। और परस्पर विरुद्ध पक्ष कदापि ठीक नहीं होते, यह विद्वानों का सिद्धान्त है। और वह ब्रह्मा अपने वर्षों से नियत सौ वर्ष जीवता है। यही महाप्रलय के अन्त में ह्लि र उत्पन्न होकर और अवान्तर प्रलयों में जाग-जाग कर सृष्टि रचता है। इत्यादि प्रकार शरीरधारी की असम्भव आयु स्वीकार करते हैं।

इसका उत्तर यह है कि किसी शरीरधारी की इतनी अवस्था हो नहीं सकती क्योंकि अन्य प्राणियों के तुल्य उसका शरीर भी मिट्टी आदि के परमाणुओं से मिलकर बना है। वे संयोगी पदार्थ कोई ऐसे नहीं जो अर्बों वर्ष चल जावें। सौ वर्ष की अवस्था वाला पुरुष है वा ‘मैं सौ वर्ष तक देखूं’ इत्यादि प्रकार वेद में भी कहा है जिससे सिद्ध है कि मनुष्य का आयु सौ वर्ष का है। और सौ शब्द से दैव वा ब्राह्म कोई सौ वर्ष लिये जावें सो नहीं, किन्तु मानुष ही लिये जावेंगे, क्योंकि वेदसम्बन्धी सब ही नियम वा आज्ञा मनुष्य पर ही घटती हैं। कोई कहे कि वेद में तो “भूयश्च शरदः शतात्” इस प्रमाण के अनुसार अधिक भी आयु हो सकती है। तो भी कोटिगुण अधिक नहीं हो सकती। संयेाग से उत्पन्न होने वाले वस्तु की ऐसी अवधि हो यह कौन बुद्धिमान् मान लेगा ?

तथा संयोग से उत्पन्न हुआ परिच्छिन्न- जिसकी लम्बाई-चौड़ाई आदि की अवधि है, ऐसा मनुष्य अचिन्त्य शक्ति से युक्त और अनन्तशक्ति नहीं हो सकता। सर्वशक्तिमान् परमेश्वर यदि अपने तुल्य अन्य ब्रह्मा को उत्पन्न करे तो जानो यह स्वयं जगत् को नहीं बना सकता। और जब जगत् को नहीं रच सकता तो उसका सर्वशक्तिमान् होना भी सिद्ध होना दुस्तर है। और ऐसा मानने से अनेक ईश्वर माननेरूप दोष भी उनके मत में आता है। और हमको ऐसा कोई प्रयोजन भी नहीं जान पड़ता कि जो प्राणियों की रचना के लिये किसी देहधारी पुरुषविशेष ब्रह्मादि को परमेश्वर बनाये। तिससे यह पक्ष श्रेष्ठ नहीं है।

कोई मेधातिथि आदि भाष्यकार इस प्रसग् में प्रचरित सांख्य के मतानुसार सृष्टि का वर्णन करते हैं तथा इस मनुस्मृति के सृष्टि-प्रकरण में कोई कुल्लूक भट्ट आदि परमेश्वर ही जगत् का उपदानकारण है ऐसे आधुनिक वेदान्त मत को स्वीकार करके सृष्टिप्रक्रिया का वर्णन करते हैं। और वेदान्त तथा सांख्य के सिद्धान्त में परस्पर विरोध मानते हैं, वह उन लोगों का केवल भ्रममात्र है, किन्तु सांख्य-वेदान्त में सृष्टिप्रक्रिया में मतभेद नहीं है। इस कार्य जगत् का उपादानकारण जड़ कारण ही हो सकता है। कार्य-कारण की विरूपता वा विरुद्धता किसी प्रकार सिद्ध करना ठीक नहीं हो सकता। अर्थात् वेदान्त का यह सिद्धान्त नहीं है कि जगत् का उपादानकारण चेतन आत्मा है। और सांख्य में भी किसी परमात्मा के बिना स्वतन्त्र जड़ स्वरूप प्रकृति विचार पूर्वक होने वाली सृष्टि को नहीं बना सकती। इसलिये दोनों का विरोध न होना ही ठीक है। वेदान्त में निमित्त कारण का तथा सांख्य में उपादान का प्रधानता के साथ वर्णन होने से लोगों को भ्रान्ति हो गई होगी कि सांख्यवादी तो केवल प्रकृति को ही जगत् का कारण मानते हैं, और वेदान्त में भी ब्रह्म को ही कारण माना है, ऐसा अनुमान से भ्रम होना सम्भव जान पड़ता है। सृष्टि के आरम्भ में परमेश्वर सृष्टि बनाने के पूर्वकल्प सम्बन्धी प्रकार को सोचता है, इसी का नाम ईक्षण, इसी का नाम तप और यही उसका प्रादुर्भाव है, यही उसकी प्रकटता है और इसी से वह स्वयम्भू कहाता है। इन वाक्यों से अन्य किसी देहधारी की उत्पत्ति होती हो ऐसा विचार न करना चाहिये। इस सब कथन से एक ही परमेश्वर इस सृष्टि का निमित्त कारणरूप है, यह कथन सिद्ध होता है। वाद-विवाद तो बने ही रहते हैं।

सृष्टि-प्रकरण का सामान्य विचार :पण्डित भीमसेन शर्मा

अब क्रमप्राप्त छठे सृष्टि प्रकरण की आलोचना करनी चाहिये। इस प्रकरण में कई अंश विचारने योग्य हैं, जिनमें पहला अंश यह है कि इस मानवधर्मशास्त्र में सृष्टि का वर्णन क्यों होना चाहिये ? क्योंकि इसका नाम धर्मशास्त्र है, सृष्टि का वर्णन करना कोई धर्म नहीं है। और यही बात अन्य महर्षियों ने मनु जी से पूछी सो इस मनुस्मृति के आरम्भ में द्वितीय श्लोक में ही लिखा है कि- ‘हे मनु जी! आप सब ब्राह्मणादि वर्णों और वर्णसटरों के धर्म कहने योग्य वा समर्थ हैं।’१ केवल इसी एक प्रश्न के ऊपर यह सब धर्मशास्त्र बना है अर्थात् यह मनुस्मृति इसी प्रश्न का उत्तररूप है, तो इसमें सृष्टि की उत्पत्ति कहने का काई प्रश्न भी नहीं, ह्लि र इस प्रथमाध्याय में सृष्टि का वर्णन क्यों किया गया ? और किया गया तो ‘आम पूछने पर कचनार के उत्तर देने’ के तुल्य प्रमत्तदशा का कथन हो गया। इस प्रसग् में इग्लेण्ड निवासी व्यूलर साहब ने कहा है कि- ‘गौतम और वसिष्ठ आदि के धर्मशास्त्रों में तथा मानव धर्मसूत्रों में सृष्टि का वर्णन नहीं प्राप्त होता और न यह सृष्टि की प्रक्रिया का वर्णन धर्मशास्त्र के साथ सम्बन्ध रखता है तथा सृष्टि का व्याख्यान धर्म भी नहीं हो सकता और धर्मशास्त्रों की परिपाटी से भी यह विपरीत है। इससे सृष्टि का प्रकरणरूप प्रथमाध्याय इस पुस्तक में पीछे किन्हीं लोगों ने मिलाया है।’ यह उक्त गौराग् महाशय का आशय है। इसी शटा को लेकर दो श्लोक२, पीछे बनाकर किन्हीं लोगों ने द्वितीय श्लोक के आगे धरे हैं। कि- ‘मनुष्य पश्वादि, पक्षी सर्पादि, मक्खी मच्छरादि और वृक्षादि तथा पृथिवी आदि सब भूतों की उत्पत्ति और प्रलय को सबके आचरण और विवादों का निर्णय- राज्यव्यवस्था राजनीति आदि सम्पूर्ण कहो।’ ये दोनों श्लोक मुम्बई के छपे छह टीका से युक्त पुस्तक में पाठान्तर बुद्धि से छपे हैं। और इन दोनों का व्याख्यान आधुनिक अति नवीन टीकाकार नन्दन और रामचन्द्र ने किया है। इससे इन दोनों श्लोकों का प्रक्षिप्त होना स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि पूर्व से ये श्लोक होते तो पहले भाष्यकार मेधातिथि आदि भी इनका भाष्य करते वा ऐसी शटा न करते कि “क्वास्ताः क्व निपतिताः”। सो ये श्लोक वास्तव में इस पुस्तक के नहीं, इससे पीछे किसी ने मिलाये, यही निश्चय है। इस पर अधिक विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

इस प्रसग् में जो प्रश्न और उत्तर में विरोध आता है, उसको हटाने के लिये भाष्यकारों ने समाधान दिये हैं। उनमें पहले मेधातिथि भाष्यकार ने लिखा है कि- ‘इस सृष्टिप्रक्रिया के वर्णन से इस धर्मशास्त्र का महान् प्रयोजन जताया गया है क्योंकि ब्रह्मा से लेकर वृक्षादि पर्यन्त धर्म-अधर्म ही जिनके निमित्त, ऐसी संसार की दशा इस प्रकरण में कही गयी है। ‘वैसे कर्म होने में बहुत प्रकार के तमोगुण से ढपे हुए स्थावर योनि में जीव रहते हैं।’१ तथा आगे बारहवें अध्याय में भी कहा है कि- ‘अपने कर्मों के अनुसार जीवात्मा की इन पूर्वोक्त दशाओं को विचारपूर्वक देखकर धर्म-अधर्म से हटाकर केवल धर्म में मन लगावे।’२ इस प्रकार धर्म में मन के ठहराने से असीम ऐश्वर्य प्राप्ति का हेतु धर्म और इससे विपरीत असीम दरिद्रता का हेतु अधर्म है। उन दोनों का स्वरूप जानने के अर्थ महान् फल वाले इस     धर्मशास्त्र को पढ़ना चाहिये, यह इस प्रथमाध्याय का तात्पर्य है। इसके पीछे गोविन्द राज भाष्यकार ने लिखा है कि- ‘जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय धर्म-अधर्म के अधीन हैं। उसके प्रतिपादनार्थ होने से यह शास्त्र महान् प्रयोजन वा ह्ल ल वाला है, इस कारण यत्न के साथ पढ़ना चाहिये। इसलिये जगत् की उत्पत्ति का प्रकरण प्रथम आरम्भ किया है।’ इसके पीछे सर्वज्ञ नारायण ने लिखा है कि- ‘इस धर्मशास्त्र में ब्राह्मणादि वर्णों के क्रम से धर्म का कहना अभीष्ट होने से सम्पूर्ण देवताओं की उत्पत्ति रूप तत्त्वकथन का ज्ञान होता है, उससे ब्राह्मणादि वर्णों में पूर्व-पूर्व की श्रेष्ठता का प्रतिपादन इष्ट होने तथा मुखादि विशेष स्थानों से उत्पत्ति होने से वे ब्राह्मणादि श्रेष्ठ हैं, उस धर्म को कहने के लिये धर्मशास्त्रकर्त्ता ब्रह्मा की उत्पत्ति दिखाने को अपनी उत्पत्ति द्वारा जगत् की पूर्व प्रलयावस्था को प्रथम कहते हैं।’ इन सबके आशयों का खण्डन करते हुए कुल्लूक भट्ट कहते हैं कि- ‘ऋषियों के धर्मविषयक प्रश्न में जगत् के कारण होने से ब्रह्म का प्रतिपादन करना भी धर्म का ही कथन है, किन्तु प्रकरण-विरुद्ध कुछ नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान भी धर्म ही है। सो मनु ने ही धैर्य, क्षमा आदि दस प्रकार के धर्म कहने में विद्या शब्द वाच्य आत्मज्ञान को धर्म कहा है।’ इत्यादि प्रकार से कुल्लूक भट्ट ने बहुत कुछ लिखा है। राघवानन्द भाष्यकार समाधान कहते हैं कि- ‘धर्म के उपयोगी चार वर्णों की उत्पत्ति के क्रम से प्रधानता वा अप्रधानता मुखादि अवयवों से कहने के लिये ब्रह्मज्ञान होने के अर्थ सृष्टि के जानने की आवश्यकता प्रकट करते हुए श्रोतव्य कहते हैं।’ नन्दन और रामचन्द्र ने इस विषय में कुछ विशेष नहीं कहा, क्योंकि उनको उक्त दो श्लोक पुस्तक में मिलने से वैसी शटा ही न हुई। मेधातिथि और गोविन्दराज का समाधान विषय में एक ही आशय है। इन समाधानों से व्यूलर साहब का किया आक्षेप किसी प्रकार कट जाता है, सो बुद्धिमानों को विचारणीय है। और गौतमीयादि धर्मशास्त्रों में यदि सृष्टि का वर्णन नहीं, इससे अन्य धर्मशास्त्रों में भी न हो, यह अयुक्त है। क्योंकि जो विषय एक पुस्तक में न हो, वह अन्य किसी में क्यों न रखा जाये ? क्या एक-दो अज्ञानी वा अपूर्ण विचारशक्ति वाले हों तो सभी वैसे होने चाहियें ? वे गोतमादि के धर्मशास्त्र प्रधान नहीं, किन्तु गौण हैं। और यह मानवधर्मशास्त्र सर्वोपरि प्रधान है। इसलिये गम्भीर और प्रबल काम प्रधानों में ही हो सकते हैं, वैसा महत्त्व सबमें नहीं हो सकता। और यह नियम कहीं नहीं मिलता कि जो बात एक स्थल में न हो तो अन्यत्र होने से उसकी निन्दा हो जावे। इसलिये जिन धर्मशास्त्रों में सृष्टि का वर्णन नहीं है, उनमें यह भी एक प्रकार की न्यूनता है। और समस्त वेद धर्म का मूल है, यह सब आर्यों के सम्मत है। यदि सृष्टि के वर्णन का धर्म के साथ सम्बन्ध न हो तो वेद में भी सृष्टि का कथन स्पष्ट है, उसका भी धर्म के साथ सम्बन्ध न हो सकने से सब वेद का धर्ममूलक कहना न बने। और जब यह मानवधर्मशास्त्र मुख्य है तो इसकी जो परिपाटी है वही धर्म शास्त्रों की जाननी चाहिये। इससे विरुद्ध चलने वाले ही दूषित ठहर सकते हैं। अन्य धर्मशास्त्र इसी के आश्रयभूत हैं। इससे धर्मशास्त्र के प्रारम्भ में सृष्टि का वर्णन करना ठीक ही है।

मेधातिथि आदि भाष्यकारों ने अपनी-अपनी बुद्धि, विद्या के अनुसार         समाधान दिये हैं, वे किसी अंश में किसी प्रकार सम्भव हैं। इसलिये उनका खण्डन करने में प्रयत्न न करके यथाबुद्धि हम भी अपने विचार को प्रकाशित करते हैं- जिन किन्हीं शास्त्रों में जो कुछ जिस किसी कथनीय विषय का प्रस्ताव किया जाता है, वहां सभी स्थलों में उस विषय के चार भाग करके कथन करना चाहिये। वैसा करने से वह सुलभ होता है। सो योगभाष्य में व्यासदेव ने कहा भी है कि- (१.) रोग, (२.) रोग का कारण, (३.) रोगरहित होना, (४.) ओषधि करना। ये चार भेद त्याज्य पक्ष में हैं। इसी प्रकार सभी स्थलों में प्रथम उसके स्वरूप का निरूपण करना, द्वितीय उसके हेतु मूलकारण वा निदान को बताना कि जिससे वह उत्पन्न हुआ हो। तृतीय उसके प्रतिपक्षी शत्रु को जताना कि जिससे उसकी निवृत्ति वा हानि हो सकती है। चतुर्थ उसको प्राप्त होने वा छोड़ देने के परिणाम वा ह्ल ल को जान लेना। प्रथम जिसको त्यागना वा ग्रहण करना चाहते हैं, उसके वास्तविक स्वरूप को जान लेना चाहिये। स्वरूप का ज्ञान हुए बिना त्याग वा ग्रहण करना कदापि नहीं बन सकता। द्वितीय उसके हेतु मूल उपादान कारण का जानना इस कारण आवश्यक है कि जैसे धातुओं की विषमता से रोग होता है तो उस विषमता के मिटाने का उपाय करना, जब तक विषमता न मिटेगी तब तक रोग नहीं जा सकता। वा जैसे दीपक जलने का कारण स्नेह वा चिकनाई जान लिया जाय तो उस कारण से दीपक जला सकते और कारण का अभाव करके दीपक की निवृत्ति भी कर सकते हैं। तृतीय प्रतियोगी शत्रु का ज्ञान इस कारण आवश्यक है कि जैसे रोग का प्रतियोगी औषध वा पथ्य है। वहां अनेक प्रतियोगियों में कौन किसका प्रतियोगी है, ऐसा जान लेने से औषधादि प्रतियोगी के प्रयोग से रोगादि की निवृत्ति कर सकता है। चतुर्थ ह्ल ल जाने बिना निष्प्रयोजन वा निष्ह्ल ल कार्य के करने में रुचि वा प्रीति नहीं हो सकती इस कारण ह्ल ल का जानना आवश्यक है। यह सब प्रतिकूल वा त्याज्य वस्तु रोगादि में क्रम है। और अनुकूल में कारण मुख से (अर्थात् प्रथम कक्षा में धर्मादि के कारण को दिखाकर द्वितीय कक्षा में उसके स्वरूप को कहना जैसे प्रथम सृष्टि प्रक्रिया में धर्म का हेतु कहकर आगे स्वरूप कहा है) भी व्याख्यान होता है।

वैसे यहां मुख्य प्रसग् में देखो- कि मुख्य वस्तु जिसका स्वरूप जानना चाहिये वह धर्म ग्राह्य और अधर्म त्याज्य है। और उसका मूलकारण द्वितीय है कि जिससे धर्म उत्पन्न होता है, उस वेद और परमेश्वर को जानना वही धर्म का भण्डार है और परमेश्वर का वा कार्य जगत् के साथ रहने वाले धर्म का सम्बन्ध दिखाना यही उत्पत्ति प्रक्रिया है। तृतीय धर्म का अधर्म और अधर्म का धर्म प्रतियोगी है।   धर्म के ह्ल ल सुखविशेष वा अधर्म के ह्ल ल दुःखविशेष का जानना। निर्मूल वस्तु शशविषाण के तुल्य मिथ्या न हो इसलिये उसका समूल होना साध्य है और धर्म के समूल सिद्ध करने में सृष्टि का वर्णन धर्मानुकूल ही है, प्रतिकूल नहीं। प्रतिकूल की हानि हुए बिना अनुकूल की सम्यक् प्रवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा मान के शत्रुरूप अधर्म की व्याख्यान पूर्र्वक निवृत्ति करनी अवश्य चाहिये। जो कुछ मनुष्य करता है वह समूल ही करना चाहिये अर्थात् निर्मूल वस्तु वा विषय के जानने का कभी उद्योग न करे। धर्म का मूल वेद है और वेद की नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव परमेश्वर से प्रवृत्ति होती है। धर्र्म के आधार ब्राह्मणादि वर्ण हैं और उन सब वर्णों को परमेश्वर ने धर्म के साथ ही धर्म की प्रवृत्ति के लिये उत्पन्न किया है। ऐसे अनेक प्रकार होने से धर्म के साथ सृष्टि का मुख्य सम्बन्ध है। और सृष्टि के आरम्भ से ही जिस धर्म की प्रवृत्ति है यही सनातन धर्म है यह जताने को भी सृष्टि के साथ धर्म का सम्बन्ध दिखाना चाहिए। इस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय रूप तीन ही अवस्था हैं। उन तीनों दशाओं में सर्वोपरि विचारशील बुद्धिमान् उत्तरदाता मनु जी को धर्म की स्थिति कहनी चाहिये। क्योंकि प्रश्नकर्त्ता महर्षियों ने स्थिति दशा में ही धर्म नहीं पूछा, यदि प्रश्न में ऐसा कोई शब्द पड़ा होता कि संसार की वर्त्तमान दशा में धर्म कहो तो उत्पत्ति, प्रलय में धर्म का सम्बन्ध दिखाना ‘आम के पूछने में कचनार के उत्तर देने’ के समान विरुद्ध होता सो तो है नहीं, इस कारण सामान्य से किये प्रश्न का तीनों अवस्था में उत्तर देना ही ठीक है, इससे कुछ विरोध नहीं है। और धर्मशब्द भी द्रव्य वा जाति वाचकों का गुण वा स्वभाव है, तिससे किस दशा, देश, काल वा वस्तु में कैसा गुण वा स्वभाव है उसका यथार्थरूप से जान लेना ही धर्मज्ञान है, और ज्ञान के अनुकूल आचरण करना     धर्म का आचरण कहाता है। ऐसा धर्म किसी एक ही दशा में नहीं हो सकता, किन्तु सब दशाओं में स्वरूप भेद से रहता है। इसी प्रकार विपरीत ज्ञान अधर्म दुःख का हेतु है यह कह सकते हैं। इसी पूर्वोक्त आशय को लेकर के ही ‘हम इस कारण अब धर्म की व्याख्या करेंगे’१ यह वैशेषिककार की प्रतिज्ञा बन सकती है। क्योंकि मनुस्मृति आदि ग्रन्थकारों के समान उस वैशेषिक ग्रन्थ में धर्म का व्याख्यान नहीं दीख पड़ता है। इसलिये जिस गुण वा स्वभाव का नाम धर्म है, वह कार्यरूप वा कारणरूप वस्तु में उत्पत्ति, स्थिति वा प्रलय तीनों दशा में अवस्थित अवश्य रहता है। इस कारण प्रश्न के सामान्य दशापरक होने से तीनों दशा के साथ उसका व्याख्यान उचित है और जो प्रलय वा उत्पत्ति दशा में धर्म न रहे उसका सनातन होना नहीं कह सकते। इसलिये सब दशाओं के साथ धर्म मानना चाहिए।

प्रलय दशा में धर्मी के साथ धर्म भी दबा हुआ रहता है, उत्पत्ति दशा में वही धर्म धर्मी के साथ प्रकट हो जाता है। जो कारणदशा में नहीं है उसका यदि कार्यदशा में भाव माना जावे तो सूखे चिकनाहट रहित तिलों में से भी तेल निकलना चाहिये सो नहीं होता। तो धर्म को भी सब दशाओं के साथ अवस्थित मानना चाहिये, इस कारण तीनों दशाओं के साथ दशा के तुल्यरूप से ही धर्म का व्याख्यान होना भी ठीक है। कैसे गुण वाले सामर्थ्य वा कारण से किस वस्तु की उत्पत्ति हुई ? ऐसा ज्ञान हुए बिना कार्य में भी गुणरूप धर्म का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो सकता। और वैसा ज्ञान उत्पत्ति दशा का क्रमपूर्वक वर्णन हुए बिना नहीं हो सकता। इस कारण धर्म का मर्म ज्ञान होने के लिये सृष्टि का वर्णन पहले किया गया। तथा सनातन धर्म कारण से ही कार्य में आते हैं, उनका उत्पत्ति प्रकरण के साथ सुगमता से ज्ञान हो सकता है। जैसे मुख से ब्राह्मण रचा गया, इसलिये वर्णों में ब्राह्मण मुख्य है। यहां कारण से ही मुख्यता आयी है। इस कारण धर्म की व्याख्या के साथ सृष्टि की प्रक्रिया कहनी चाहिये। तथा एक उत्तर यह भी है कि जब कोई किसी वस्तु को पूछकर जानना चाहे तो उत्तरदाता को उचित होगा कि प्रश्नकर्त्ता की ठीक तृप्ति होने के लिये उस विषय वा वस्तु को मूल वा उत्पत्ति सहित समझा दे, जिससे किसी प्रकार का सन्देह शेष न रह जावे। इस कारण     धर्म प्रकरण में सृष्टि का भी वर्णन होना उचित है। इस कथन से व्यूलरसाहब का भी उत्तर आ गया।

और धर्म शब्द का अर्थ भी जो धारण, आत्मा वा अन्तःकरण से मिलित वा अनुकूल मान के आकर्षण किया जावे वह धर्म कहा गया है, वह सब उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयदशा में वर्णों से किस प्रकार धारण किया जाता है, ऐसा प्रश्न का आशय माना जावे तो प्रश्न उत्तर में कुछ भी विरोध नहीं, किन्तु मेल है। व्यूलरसाहब के कहने से राज्य की व्यवस्था करना भी धर्मशास्त्र के अनुकूल नहीं। तब ऐसी दशा में यदि कोई पूछे कि क्षत्रिय का क्या धर्म है ? तो क्या कहना चाहिए ? इससे राज्य की व्यवस्था करना क्षत्रिय का धर्म है, उसकी व्याख्या     धर्मशास्त्र में क्यों न हो ? व्यूलरसाहब का आशय कोई विद्वान् सुने तो यही निकलेगा कि जो मनुष्यजाति की उन्नति के कारण हैं अथवा जिसके सेवन से वेदमत के अनुगामीमात्र आर्य लोगों की उन्नति हो सकती है वे ही विषय इस मनुस्मृति पुस्तक में आधुनिक लोगों ने मिलाये हैं। जैसे राजधर्म को प्र्रक्षिप्त कहा इत्यादि। इस पर विचारशीलों को ध्यान देना चाहिए कि इससे क्या तत्त्व निकलता है ? सो भी बुद्धिमान् लोग विचार ही लेंगे। अर्थात् भारतवासियों की पुरानी दशा को निकृष्ट कहना। वर्त्तमान में तो प्रत्यक्ष हीन दशा में हैं। अर्थात् उनको आर्यों की उच्च दशा कदापि अभीष्ट नहीं। इससे अनेक राजनैतिक लोग गूढ़ प्रयोजनसिद्धियां मानते हैं।

धर्म के लक्षणों की परस्पर उत्तमता, मध्यमता और निकृष्टता का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब धर्मों की उत्तमता, मध्यमता और निकृष्टता का सापेक्ष होना इस पाँचवें प्रकरण में दिखाते हैं- इससे पूर्व धर्म शब्द का व्याकरण और कोष सम्बन्धी दोनों अर्थ दिखाया गया है। अब धर्म के अवान्तर भेद, उसका स्वरूप और उस धर्म के सहायकारी कहने चाहियें। इसके पीछे धर्मों के उत्तम, मध्यम, निकृष्ट होने में सापेक्षता कहेंगे।

इसी मानवधर्मशास्त्र में लिखा है कि ‘सम्पूर्ण वेद धर्म का मूल है’१ इस प्रमाण का आश्रय लेकर वृक्षरूप धर्म का मूल वेद है क्योंकि वेद से ही धर्मरूप वृक्ष उगता है यह विद्वानों का सिद्धान्त है। उस वृक्षरूप धर्म के तीन अवयव या भाग मुख्य हैं। सो ब्राह्मणों या उपनिषदों में ठीक-ठीक कहा है कि ‘धर्म के तीन कांड वा गुद्दे हैं- यज्ञ, अध्ययन और दान’२। वृक्ष में पहले निकलने वाली स्थूल शाखाओं को स्कन्ध (गुद्दा) कहते हैं। वैसे ही धर्म के मुख्य या स्थूल तीन अवयव हैं। अर्थात् धर्म तीन भागों में विभक्त है। यज्ञ शब्द से कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों का ग्रहण होता हैं। इसीलिये धर्मशास्त्र में लिखा है कि- ‘कोई विद्वान् लोग वाणी में प्राण का और कोई प्राण में वाणी का होम करते हैं’३ अर्थात् यह अध्यात्म यज्ञ है। जो लोग प्राण की क्रिया को वाणी में अर्थात् देखने-सुनने रूप क्रिया को वाणी में समाप्त करते अर्थात् वाणी से पढ़ना-पढ़ाना, धर्म   सम्बन्धी सत्य विषयों का उपदेश करना वा स्तुति-प्रार्थना की प्रवृत्ति बढ़ाना और अन्य इन्द्रियों के कार्य को शिथिल करना जानते हैं, वे ही जानो वाणी में अर्थात् कर्मेन्द्रियों में ज्ञानेन्द्रियों को शिथिल वा लीन करते हैं। और जो प्राण में वाणी का होम करते हैं, वे ज्ञानेन्द्रियों में कर्मेन्द्रियों की वृत्ति को समाप्त करते हैं। क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों की मुख्य प्रवृत्ति करने वाला प्राण है। और वाणी में प्राण का वा प्राण में वाणी का कोई लोग होम करते हैं, इस कथन का मुख्य अभिप्राय तो यही है कि सत्यभाषण और प्राणायामादि धर्म सम्बन्धी कृत्य भी एक यज्ञ ही है। वेदादि शास्त्रों वा उनके अभिप्रायों को सत्यवक्ता विद्वान् के मुख से सुनना और उस सुनने से हुए अच्छे संस्कार वा शुभ गुणों का धारण करना अध्ययनरूप धर्म कहाता है। उन वेदादि के ही सुनने से धारण किये धर्मरूप संस्कारों को परोपकार होने के लिए देना दान कहाता है, अर्थात् शास्त्र की आज्ञानुसार अन्यों को सुख पहुंचाने के लिए विद्या वा धर्म उपदेश करना वाणी का देना है। मन से अन्यों का भला चाहना मन का दान है। और शास्त्र में लिखे अनुसार सुपात्रों का धनादि से यथायोग्य सत्कार करना शरीर से दान है। अर्थात् जिन पदार्थों से अन्य प्राणियों को सुख पहुंचे तथा वे पदार्थ अपने पास हों तो दूसरों को देना मुख्यकर दान है। प्रयोजन यह है कि जिस वस्तु को हम देना चाहते हैं वह याचक के पास भी है और उसके देने से ग्रहीता को विशेष सुख नहीं पहुंचता तो वह मुख्य दान नहीं किन्तु गौण है। इससे सिद्ध हुआ कि जिस वस्तु, गुण, कर्म वा वचन के बिना किसी को दुःख मिल रहा है और वही वस्तु आदि यदि अपने निकट है तो उस मनुष्य को उस वस्तु आदि का अंश उस दुःखी आदि को देना चाहिये यही दान परमधर्म है। और जो दया, क्षमा, जितेन्द्रियतादि अन्य धर्म के अवयव दीख पड़ते हैं, वे इसी तीन प्रकार के अवान्तर भेद हैं। जैसे दान के अन्तर्गत दया घुस जाती है। क्योंकि दया का प्रयोजन है कि दुःखी पर दया करे तो उसको दुःख हटने के लिये औषध देवे कि जिससे उसका दुःख दूर हो तो जानो वह पुरुष दयालु है। दया दान में भेद केवल यही है कि दया केवल मानस धर्म है और दान मुख्यकर वाणी और शरीर से सम्बन्ध रखता है। इसी प्रकार अन्य भी भेद इन्हीं में आ जाते हैं।

मनुस्मृति के षष्ठाध्याय में लिखा है१ कि ‘धृति- धैर्य, क्षमा- सहना, दम- इन्द्रियों की भीतरी वृत्ति को वश में रखना, अस्तेय- आज्ञा के बिना किसी की वस्तु को न लेना, शौच- मन वा शरीर को भीतर-बाहर शुद्ध रखना अर्थात् मिथ्या व्यवहार न करना। इसीलिये पञ्चमाध्याय में लिखा है कि- ‘जो लेन-देनरूप व्यवहार में शुद्ध है, जो कभी मिथ्या व्यवहार वा छल प्रपञ्चादि नहीं करता है, वही शुद्ध है और उसकी अपेक्षा मिट्टी-जल से शुद्ध हुआ वैसा शुद्ध नहीं।’२ अर्थात् इसका यह अभिप्राय नहीं है कि मिट्टी-जल से शुद्धि न करनी चाहिये वा करना अच्छा नहीं, किन्तु अभिप्राय यह है कि एक तो केवल मिट्टी-जल से शरीर को शुद्ध रखता और एक पुरुष शुद्ध सत्य व्यवहार करता, भीतर से किसी प्रकार का छल-कपट नहीं रखता, इन दोनों में व्यवहार की शुद्धि रखने वाला उसकी अपेक्षा अच्छा श्रेष्ठ है। दोनों प्रकार की शुद्धि न रखने की अपेक्षा केवल शरीर को शुद्ध रखने वाला भी उत्तम है परन्तु दोनों प्रकार की भीतर-बाहर शुद्धि रखने वाला केवल व्यवहार की शुद्धि रखने वाले की अपेक्षा अत्यन्त श्रेष्ठ है। इस प्रकार ये सब सापेक्ष हैं।

विषयों पर गिरने से इन्द्रियों को रोकना इन्द्रियनिग्रह कहाता है। धी- कर्त्तव्याकर्त्तव्य को न भूलना या विचार पूर्वक परिणाम को सोचकर कार्य का प्रारम्भ करना, विद्या पढ़ना, सत्य बोलना और क्रोध को छोड़ना ये आध्यात्मिक सामान्यकर धर्म के दश चिह्न हैं।’ ये चिह्न जिसमें हों, वह पुरुष सामान्य कर धर्मात्मा कहाता है। ये सामान्य धर्म के स्वरूप हैं। इनके साथ सामान्य विशेषण इसलिये लगाया है कि ये किसी निज ब्राह्मणादि वर्ण के धर्म नहीं किन्तु सब वर्णों वा सब आश्रमियों को सेवने योग्य हैं। यद्यपि सामान्य धर्म का सेवन किये बिना विशेष का सेवन ठीक-ठीक उपकारी नहीं हो सकता, तथापि यदि दोनों का एक साथ सेवन आ पड़े और एक ही का हो सकता हो तो वहां विशेष का सेवन करना चाहिये और सामान्य को छोड़ देना चाहिये यही विशेष धर्म में विशेषता है। और इसी आशय को लेकर कहा गया है कि- ‘विशेष प्रबल होता है।’१ इसीलिये इस श्लोक से पूर्व ९१वें श्लोक में यह धर्म चारों आश्रम वालों को सेवने योग्य लिखा है।

महाभारत के वनपर्वान्तर्गत यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में लिखा है कि- ‘यशः= अच्छे-अच्छे संसारी मनुष्यों को सुख पहुंचानेरूप धर्मसम्बन्धी कार्यों के करने से संसार में कीर्त्ति होना सत्यम्= मन, वचन, कर्म से सत्य का वर्त्ताव करना दमः= इन्द्रियों के साथ लगी मन की वृत्ति को वश में करना शौचम्= विद्या, तप आदि से भीतरी मन की और मिट्टी-जलादि से बाहरी शरीर की शुद्धि करना आर्जवम्= कोमलता का वर्त्ताव करना अर्थात् गर्व, मान, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष या क्रोधादि का छोड़ना ह्रीः= बुरे निन्दित काम से लज्जित होना अचापलम्= चपलता का छोड़ना दानम्= सुपात्रों को विद्या, धनादि का यथायोग्य देना दया= चित्त में दूसरों के दुःख हटाने की इच्छा रखना वा अन्य के दुःख में दुःख मानना ब्रह्मचर्यम्= धर्मशास्त्रों में लिखे अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम के नियमों का यथावत् सेवन करना वा गृहाश्रम में भी परस्त्री के साथ व्यभिचार छोड़कर अपनी स्त्री के साथ ऋतुकालाभिगामी होना, ये सब धर्म के शरीर वा स्वरूप हैं।’२ अर्थात् इन सबका होना ही साक्षात्   धर्म का होना है। और ये लक्षण जिसमें हों वही धर्मात्मा कहाता है।

तथा महाभारत के उसी स्थल में यह भी लिखा है कि- ‘अंहिसा= सब काल में सब प्राणियों से सब प्रकार द्रोह न रखना समता= अपने तुल्य सबको समझना जैसे हम अपने लिये किसी प्रकार का दुःख वा दुःख की सामग्री नहीं चाहते वैसे जान लें कि अन्य भी कोई नहीं चाहता होगा। जैसे दुःख देने वाले को हम बुरा समझते हैं, वैसे यदि हम किसी को दुःख दें तो हमको भी वह वैसा ही समझेगा। इसका नाम समता है। इसी को आत्मौपम्यदर्शन भी कहते हैं। शान्तिः= व्याकुल न होना न घबराना तपः= भूख-प्यास, मान-अपमान आदि में हर्ष-शोक न करना शौचम्= पवित्रता रखना अमत्सरः= ईर्ष्या, मत्सरता का छोड़ना, ये सब धर्म के द्वार हैं’१ अर्थात् धर्मरूप दुर्ग में घुसना, चाहे वह इन अहिंसादि का सेवन करे। जो मनुष्य अहिंसादि की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया, वह जानो धर्म के द्वार पर पहुंच गया। परन्तु यह भी सामान्य धर्म है अर्थात् सब मनुष्यमात्र को सेवने योग्य है।

तथा महाभारत उद्योगपर्व के विदुरप्रजागर में यह लिखा है कि- ‘यज्ञ करना, वेदादि का पढ़ना और दान देना, तप- मानापमानादि का सहना, सत्य बोलना, क्षमा करना, बुराई से घृणा रखना, लाभ छोड़के सन्तोष को धारण करना यह आठ प्रकार का धर्म सम्बन्धी मार्ग है।’२ इस पर चलने वाला धर्मनिष्ठ वा     धर्मात्मा कहाता है। यह सब भी उन्हीं तीन यज्ञादि धर्मों का व्याख्यान या विस्तार है। इन पूर्वोक्त धर्म के आठ भेदों में से यज्ञ, अध्ययन, दान, तप ये चार दम्भ के लिये भी सेवन किये जाते हैं। अर्थात् अपने को धर्मात्मा प्रसिद्ध करने के लिये ढोंगलीला करने वाले लोग भी दिखाने मात्र के लिये यज्ञादि करते वा कर सकते हैं। और पिछले सत्यादि चार धर्म के लक्षण दुरात्मा वा अधर्मियों में नहीं ठहर सकते। अर्थात् पिछले चार का सेवन दम्भ से नहीं हो सकता। परन्तु धर्म का मुख्य स्वरूप तो सत्य ही है। इसी कारण शास्त्रों में सर्वोपरि सत्य की प्रशंसा लिखी है कि- ‘सत्य से परे कोई उत्तम धर्म नहीं और मिथ्या व्यवहार से परे बुरा कोई पाप नहीं।’३ तथा ‘जिसमें सत्य का लेश नहीं वह धर्म नहीं है।’४ इससे सत्य और     धर्म का समवाय सम्बन्ध समझना चाहिये कि जहां-जहां सत्य रहता है वहां-वहां धर्म वा जहां-जहां धर्म है वहां-वहां सत्य अवश्य रहता है। इससे ज्ञात होता है कि जहां-जहां छल-कपटादि का प्रवेश है वहां-वहां यज्ञादि को भी धर्म नहीं कह सकते। इसी से अपने तुल्य सबके सुख-दुःख को देखना रूप समता भी धर्म का स्वरूप है, यह सिद्ध हो जाता है। क्योंकि मेरे साथ कोई छल-कपटादि करे, ऐसा कोई नहीं चाहता तो समदर्शी होना भी सत्याचरण के अनुकूल ही बन सकता है। तात्पर्य यह है कि जैसे ‘हाथी के पांव में सबका पांव’ यह जनश्रुति- (कहावत) प्रसिद्ध है वैसे सत्य नामक धर्म के लक्षण में सब लक्षण अन्तर्गत हो जाते हैं। और कहीं आनृशंस्य को परमधर्म माना है। आनृशंस्य नाम दया वा रक्षा करने का है दोनों का तात्पर्य यह है कि दुःखी प्राणी वा मनुष्यों को दुःख से बचाना, इसकी उत्तमता भी सापेक्ष है। सब पर दया वा सबकी रक्षा करने की अपेक्षा मनुष्य की रक्षा करना वा मनुष्य जाति पर दया करना उत्तम है। पर सत्य सब धर्म के अंगों में मिला रहता है। इसी से बनावटी दया वा रक्षा को कभी धर्म नहीं कह सकते। इसलिये सत्य ही मुख्य धर्म का स्वरूप है, अन्य सब उसके सहायकारी हैं।

कहीं माता, पिता और आचार्य की सेवा को परम धर्म माना, यह भी उक्त प्रकार से सापेक्ष है और सत्य के आश्रय है। इत्यादि प्रकार से धर्म के अनेक लक्षणों की यथावसर वा यथाप्रयोजन प्रधानता दिखायी है, वह सबकी प्रधानता सापेक्ष है। निरपेक्ष वा निरतिशय (बेहद) प्रधानता केवल सत्य की है कि जिसके तुल्य धर्म के स्वरूपों में किसी की प्रधानता नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि सत्य ही धर्म का स्वरूप है। कर्म का भी धर्म नाम है यह पहले कह चुके हैं। इसी के अनुसार कह सकते हैं कि- ‘धर्म किया, धर्म करता है, धर्म करेगा, धर्म कर’ इत्यादि, इसी अंश को लेकर मन, वाणी और शरीर के भेद से धर्म वा अधर्म के तीन भेद वात्स्यायन ऋषि ने न्यायभाष्य1 में दिखाये हैं- ‘संसार में तीन दोष हैं जिनका नाम राग, द्वेष और मोह रखा है, अन्य दोष इन्हीं तीन के साथ लग जाते हैं। वैसे काम, मत्सरता, तृष्णा, स्पृहा और लोभ राग के साथी हैं। क्रोध, ईर्ष्या, निन्दा, पिशुनता (चुगली), द्रोह और अमर्ष इत्यादि द्वेष के साथी और मिथ्याज्ञान, सन्देह, अभिमान तथा प्रमाद-आलस्यादि मोह के साथी हैं। इन्हीं दोषों के वशीभूत होने से मनुष्य पाप करता है अर्थात् इन दोषों की प्रेरणा से जो कुछ चेष्टा मनुष्य करता है उसके दश भेद होने से दश नाम पड़ते हैं, जिसमें तीन प्रकार का पाप शरीर से होता है। एक तो वेद की वा धर्मशास्त्र की आज्ञा से विरुद्ध हिंसा करना (अर्थात् किन्हीं प्राणियों को किसी लोभादि के वश होकर मारना वा उनको महाकष्ट पहुंचाने का उद्योग करना। वेदादि के अनुकूल हिंसा करना वैदिकी हिंसा कहाती है, उसका करना पाप के अन्तर्गत नहीं किन्तु धर्म ही माना गया है। जैसे क्षत्रिय लोग संग्राम में एक-दूसरे को निर्भय होकर मारें वहां शत्रुओं को मारने में पाप नहीं। महा अधर्मी मनुष्य को मारने में कदापि पाप नहीं। आततायी- जो सामने शस्त्र लेकर मारने को आता हो, उसके मारने में पाप नहीं। राजा को वध योग्य के मरवा डालने में पाप नहीं। सिंह, व्याघ्र, वृश्चिकादि हिंसक जन्तुओं के मारने में पाप नहीं। इत्यादि प्रकार की हिंसा वेदानुकूल है, इसलिये इसको हिंसा नहीं कहते, किन्तु अहिंसा के तुल्य इसको भी धर्म ही मानना चाहिये)। द्वितीय चोरी- जो स्वामी की आज्ञा के बिना किसी वस्तु को ले लेना। तृतीय निषिद्ध मैथुन करना अर्थात्- माता, भगिनी, गुरुपत्नी आदि से व्यभिचार करना, ये तीन प्रकार के शारीर पाप हैं। तथा मिथ्या बोलना, हृदय में छेद करने वाला कठोर वचन बोलना। सूचना- किसी की किसी से बुराई करना, तथा असम्बद्ध व्यर्थ बहुत बोलना ये चार प्रकार के वाचिक- वाणी से होने वाले पाप हैं। दूसरों को मारने वा दुःख देने की इच्छा रखना, दूसरों के द्रव्य को ले लेने की इच्छा रखना, तथा नास्तिकता कि- जन्मान्तर वा परलोक में जो बुरे कर्र्मों का बुरा ह्ल ल शास्त्रों में लिखा है वा पण्डितों द्वारा सुना जाता है सो ठीक नहीं, यहां निरन्तर आनन्द भोगना चाहिये, परलोक किसने देखा है, आजतक लौटकर किसी ने सन्देश नहीं दिया कि वहां ऐसा नरक भोग मैंने किया, केवल भय दिखानामात्र है इत्यादि प्रकार की इच्छा वा विचार रखना नास्तिकता कहाती है। ये तीन प्रकार के मानस- मन सम्बन्धी महापाप हैं। सो यह सब पापरूप दश प्रकार का कर्म अधर्म बढ़ाने वाला है।

और पूर्वजन्म वा इस जन्मसम्बन्धी अच्छे पुण्य कर्मों से हृदय के बीच जो शुभ संस्कार संचित होते हैं, वही संचित पुण्य है। उसकी प्रेरणा से जो मनुष्य क्रिया करता है, वही दश प्रकार का पुण्य वा धर्म कहाता है, जैसे द्रव्य-धनादि का हाथ से दान देना, शरणागत वा धर्मात्मा मनुष्यों वा उपकारी गौ आदि प्राणियों की सब प्रकार रक्षा करना और माता-पिता वा गुरु आदि की सेवा-शुश्रूषा यथावत् करना, यह तीन प्रकार का शरीर से होने वाला पुण्य वा धर्म है। सत्य बोलना, सबका वा अधिक का हितकारी वचन बोलना, प्रिय बोलना और वेदादिशास्त्र पढ़ना यह चार प्रकार का वाचिक- वाणी से होने वाला पुण्य वा धर्म है। सब पर दया करना, किसी से कुछ लेने की इच्छा न रखना, किन्तु मन में सन्तोष रखना और धर्म सम्बन्धी कामों में तथा परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थनादि शुभ कर्म में श्रद्धा रखना यह तीन प्रकार का मानस धर्म है।

ये ही तीन प्रकार के अधर्म दश भेदों सहित मनुस्मृति के बारहवें अध्याय में लिखे हैं। वहां धर्म के दश भेद यद्यपि नहीं हैं, तो भी एक के कहने से द्वितीय उसका प्रतियोगी उसी में से निकल आता है। जैसे हिंसा कहा तो अहिंसा शारीरिक पुण्य होगा। अहिंसा और परित्राण दोनों का एक ही आशय है अर्थात् अहिंसा में हिंसा का निषेध मात्र कर देने से तात्पर्य नहीं किन्तु उसके प्रतियोगी का ग्रहण अर्थापत्ति से समझना चाहिये। इसी प्रकार परद्रोह रखना मानस पाप और उसके बदले में दया रखना मानस पुण्य तथा झूठ बोलना वाचिक पाप और सत्य बोलना वाणी सम्बन्धी पुण्य है। इस प्रकार एक के कहने से दूसरे अर्थापत्ति से आ सकते हैं। इसलिये मनुस्मृति में दोनों भिन्न-भिन्न नहीं गिनाये।

जितने धर्म और अधर्म के भीतरी भेद हैं, वे सब मुख्य कर दश प्रकार के ही हैं, अन्य भेद इन्हीं में आ जाते हैं। जैसे किसी की निन्दा वा मत्सरतादि का परद्रोह के बीच मेल है अथवा जैसे कृतज्ञतादि का दयादि में मेल हो जाता है। धर्म के सहकारी साधनों का प्रायः इस मानवधर्ममीमांसा भाष्य में व्याख्यान किया जाएगा। जैसे रसोई बनाने के साधन जोड़ने वाले को भी रसोई बनाता कहते हैं, वैसे धर्म के सहकारी साधनों का व्याख्यान होने से भी इसको धर्मशास्त्र ही कहेंगे।

धर्म के मुख्यकर दो ही भेद हैं। एक सामान्य, दूसरा विशेष। अपनी-अपनी कक्षा में दोनों की प्रधानता वा प्रबलता है। सामान्यधर्म वह है जिसका सब मनुष्य मात्र को सेवन करना वा स्वीकार करना योग्य है। इसमें किसी के लिये किसी प्रकार का भेदभाव नहीं। इस पर लिखा भी है कि- ‘अहिंसा, सत्य, चोरी का त्याग, शुद्धि रखना और इन्द्रियों को वश में करना यह संक्षेप से सब वर्णों का सामान्य धर्म है, यह बात मनु जी ने विशेषकर कही है।’१ इत्यादि प्रकार से अनेक स्थलों में व्याख्यान किया गया सामान्यधर्म सबको सेवने योग्य है। और जिनके लिये विशेष धर्म भिन्न-भिन्न कहा गया है, उनको भी कारण रूप सामान्य धर्म सेवने योग्य है। अर्थात् हिंसक वा मिथ्यावादी पुरुष पढ़ने-पढ़ाने और जप-तप आदि   धर्म सम्बन्धी कर्मों का सेवन नहीं कर सकता। कदाचित् दम्भ बढ़ाने को करेगा तो उसकी पोल अवश्य खुल जायेगी। तथा करने पर उसकी सह्ल लता होना दुस्तर है। इसीलिये कारणरूप सामान्यधर्म की मनु जी ने भी प्रधानता दिखायी है कि२- ‘अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन सामान्य कर्त्तव्यरूप यमों का सेवन निरन्तर करे, किन्तु केवल शौचादि नियमों का सेवन न करे, क्योंकि केवल नियमों का सेवन करने से और यमों का सेवन न करने से मनुष्य पतित हो जाता है।’ इससे सिद्ध हुआ कि अहिंसादि यमों का सेवन करता हुआ शौचादि नियमों का सेवन करे इसी में कल्याण है।

विशेषधर्म- किन्हीं निज मनुष्यों को जो कर्त्तव्य हो और जिसके करने योग्य सब न हों वह विशेष धर्म है।

इस पर कोई शटा करे कि धर्म तो सबका एक ही होना चाहिये। धर्म का भेद पड़ने से ही मनुष्यों में ह्लू ट पड़ती है, इसलिये ईश्वर के उपदेश किये धर्म में भेद न होना चाहिये जैसे कि पृथिवी-जलादि में उसने भेद नहीं रखा, सबके चलने- फिरने को एक ही पृथिवी, एक ही वायु-आकाशादि हैं। वैसे ईश्वरोपदिष्ट धर्म भी सबके लिये एकसा होना चाहिये।

इसका उत्तर यह है कि पृथिवी, जल, वायु आदि में भी भेद है। सबके लिये एकसी पृथिवी वा वायु आदि नहीं है। देखो- भंगी पुरीषालय-(पाखाने) के निकट घृणित दुर्गन्धयुक्त पृथिवी में रहता है, जहां होकर श्रीमानों का निकल जाना दुस्तर है। ऐश्वर्यवान् लोग अनेक प्रकार चित्र-विचित्रता से रमणीय स्वर्ग भूमि में रहते हैं, जहां नीचों का पहुंचना असम्भव है। किन्हीं के समीप पुष्पादि का सुगन्धित वायु चल रहा है तथा कहीं ग्रीष्म ऋतु शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह रहा है। कहीं दुर्गन्ध युक्त उष्ण लपट चलता है जिससे शरीर जला जाता है। क्या यह पृथिवी, वायु आदि का भेद नहीं है ? और यह भेद अपने-अपने कर्मानुसार ही होता है। कर्म के भेद से ही अधिकारियों का भेद मानना चाहिये। जैसे पुरीषालय के शोधक चाण्डालादि राजा के तुल्य सुख के अधिकारी वा प्रतिष्ठा के अधिकारी नहीं हो सकते। वैसे ही सब मनुष्य सब प्रकार के धर्म का सेवन करने योग्य नहीं हो सकते। सबको सब काम कर सकने की योग्यता हो जावे, ऐसा कभी न हुआ और न होगा। यही कारण अधिकारी और अधिकारों में भेद होने का है। इसी मूल पर वर्र्र्र्णव्यवस्था ठहरती वा माननी पड़ती है और सबको माननी भी चाहिए। संसार में कोई ऐसा समुदाय नहीं जो वर्णव्यवस्था को न मानता हो। हां, केवल मानने में अवान्तर भेद अवश्य हो जाते हैं। यदि कोई कहे कि हम वर्णाश्रम भेद को नहीं मानते तो हम यही उत्तर देंगे कि जैसे सूर्य के प्रकाश बिना कोई मनुष्य नेत्र से कुछ नहीं देख सकता तो भी कोई न माने कि मुझे सूर्य के प्रकाश की कुछ आवश्यकता नहीं, मैं अपने नेत्रों से देखता हूँ। ह्लि र ऐसे हठी मनुष्य से क्या कहा जावे। और उसको कोई पूछे कि यदि तुम नेत्र से ही देखते हो तो अन्धेरी रात में भी बिना दीपकादि के नेत्र से क्यों नहीं देख लेते ? उस समय भी तुम्हारे नेत्र तो बने ही हैं, केवल सहायकारी सूर्यादि का प्रकाश नहीं है, तो क्या उत्तर देगा ? अर्थात् कुछ भी नहीं। इसलिये धर्म में भेद अवश्य मानना चाहिए। और सामान्य धर्म सब मनुष्यों का एक है यही सबमें साधर्म्य है। धर्म के भेद से मनुष्यों में फूट नहीं पड़ती और जिससे फूट पड़ती है, उस पौराणिक मतवाद का नाम धर्म नहीं। यहां शास्त्रीय व्यवस्थानुसार अन्तःकरण से धारण करने योग्य दृढ विचार का नाम धर्म है। सो सबका विचार एकसा नहीं हो सकता। यह धर्मभेद को न मानना एक नास्तिक मत है कि जिनका सिद्धान्त वर्णाश्रम धर्म भेद के न रखने पर है। इसलिये यहां थोड़ा सा लिख दिया है। इसका विशेष विचार वर्णव्यवस्था प्रकरण में किया जायेगा। यहां केवल आशय यही था कि विशेष धर्म ब्राह्मणादि वर्णों का भिन्न-भिन्न है, इसी से उसको विशेष कहते हैं। एक स्थल से विशेषता को हटाया जावे और वह हटाना ठीक हो तो अन्यत्र भी विशेषता के न ठहर सकने से विशेष की अपेक्षा रखने वाला सामान्य भी बिगड़ जायेगा। इसीलिये विशेष धर्म भी मानना चाहिये।

सामान्य और विशेष का भेद अधिकार के भेद से होता है। जैसे सब मनुष्य राजा वा अधिकारी नहीं हो सकते। इससे मेरा यह प्रयोजन नहीं है कि उत्तम   अधिकार मिलने का सब किसी को उपाय ही न करना चाहिये। किन्तु यही मुख्य कर्त्तव्य है कि सब लोग पूर्ण प्रयत्न करें, कर्मानुकूल ही वर्त्तमान अधिकारियों को भी जब अधिकार मिला है तो हमको भी कर्म से अधिकार मिल सकता है। इसलिये उपाय सबको अवश्य करना चाहिए। मनुष्य जैसे शुभ-अशुभ कर्म करता है, वैसी ही वासना और वैसे ही उसके हृदय में संस्कार उत्पन्न होते हैं। वे संस्कार देश-काल और वस्तुओं के भेद से भिन्न-भिन्न हैं। इसी कारण बुद्धि की विचित्रता होने से अधिकारियों का भेद होता है। जैसे यदि युद्ध हो तो क्षत्रियपन की परीक्षा हो सकती है। यदि संग्राम से विमुख हो जावे तो क्षत्रिय समुदाय में गिना जाने पर भी वह क्षत्रिय नहीं, यही मानना पड़ेगा। किन्तु जो निर्भय होकर सम्मुख युद्ध करता-करता शरीर छोड़ दे वा शत्रुओं को जीत ले, वही क्षत्रिय है। यद्यपि क्षत्रिय के अन्य भी विशेष धर्म हैं, तो भी उन सबमें यह और भी अधिक विशेष है। जो दुःख से बचाये अर्थात् प्रबल प्राणियों से निर्बल वा दीनों को दुःख न पहुंचने देवे, वही क्षत्रिय है यह क्षत्रियशब्द के अर्थ से उसका धर्म वा तत्त्व प्रतीत होता है। इस अर्थ से भी यही ज्ञात होता है कि जो युद्ध में मरणभय से न डरे वही क्षत्रिय है, क्योंकि जो आप मारे जाने से डरेगा वह अन्य प्रजा की रक्षा क्या कर सकता है? जो स्वयं डर गया वह अन्य को भय से क्योंकर बचा सकता है ? इसलिये दोनों प्रकार बलवानों से बचाना ही क्षत्रियों का क्षत्रियपन है। यह ब्राह्मणादि वर्णों का   धर्म जन्म से वा कर्म से जिस प्रकार मान सकते हैं, सो ब्राह्मणादि वर्णविचार प्रकरण में कहेंगे।

इस प्रकरण में धर्मों की सापेक्षता का मुख्य विचार करना चाहिये ऐसा प्रस्ताव हो चुका है। किसी लक्षण की अपेक्षा से ही अन्य किसी की उत्तमता वा नीचता हो सकती है। यह ऊंच-नीच का व्यवहार सब वस्तुओं में सापेक्ष होता ही है। जैसे कहा जावे कि देवदत्त उत्तम पण्डित और यज्ञदत्त नीचबुद्धि है। यहां दोनों की ऊंचता वा नीचता सापेक्ष है, क्योंकि देवदत्त से उत्तम और यज्ञदत्त से नीच कोई मनुष्य पृथिवी पर न हो ऐसा हो नहीं सकता वा कह नहीं सकते। और जैसे कौड़ी की अपेक्षा पैसा और पैसा की अपेक्षा चांदी के रुपये, उसकी अपेक्षा सुवर्ण की मुद्रा- मोहर (अशरह्ल ी) की प्रशंसा है, इत्यादि प्रकार से ही सब धन वाचकों में नीचता भी किसी की अपेक्षा से ही होती है। वैसे ही प्रकृत धर्म के लक्षणों के प्रस्तार में भी जहां-जहां किसी की ऊंचता वा नीचता कही जाती है वहां-वहां सापेक्ष ही जानना चाहिये। जैसे माता, पिता और गुरु की सेवा करना वा उनकी आज्ञा का पालन परमधर्म कहा है। पर उसकी प्रशंसा सत्याचरण की अपेक्षा नहीं, किन्तु अन्य सम्बन्धी वा विद्वान् लोगों की सेवा करने की अपेक्षा से प्रशंसा है। सबकी अपेक्षा लेकर योनि-सम्बन्ध में माता-पिता की और विद्यासम्बन्ध में गुरु की आज्ञा का पालन और उनके साथ प्रियाचरण करना ही श्रेष्ठ है। इसीलिये सबके साथ यथायोग्य बर्तना सामान्य धर्म है। माता आदि की सेवा उसकी अपेक्षा विशेष है। तथा सब शास्त्रों का पढ़ना सामान्य से धर्म है उसकी अपेक्षा वेद का पढ़ना विशेष प्रशस्त धर्म कहाता है। किसी को कहीं किसी की अपेक्षा से नीचता कही गयी। उनमें किसी प्रकार अपने-अपने प्रसग् में दोनों का धर्म होना सम्भव हो तो भी जिसकी निकृष्टता वा अकर्त्तव्य होना कहते हैं। जिसका करना उस समय भी किसी की अपेक्षा से हानिकारक है, उसको अधर्म होना कहते हैं और उसको न करने के लिये भयानक वाक्य भी कहे जाते हैं। और जिसके विशेष प्रबल ह्ल ल देने वाले होने से उसका होना कर्त्तव्य इष्ट है। उसका धर्म होना कहा जाता है, उसमें अर्थवादरूप रोचक वचन भी कहे जाते हैं। जिससे उस कृत्य में यह पुरुष प्रवृत्त हो जावे। इस प्रकार रोचक भयानक वचन भी धर्मशास्त्रों में वर्त्तमान हैं, और वे सब सार्थक हैं।

इस पूर्वोक्त कथनानुसार धर्मों की सापेक्ष उत्तमता, मध्यमता वा निकृष्टता को जानकर जिस समय जिसका करना कल्याणकारी हो वा जिसकी अपेक्षा से जिसका करना अधिक सुख-मग्लकारी हो, उस काम को प्रयत्न के साथ करना ही चाहिये। जैसे सब मान्य पुरुषों की सेवा-शुश्रूषा यथायोग्य ठीक-ठीक किसी कारण न हो सके, तो माता, पिता और गुरु की सेवा तो अवश्य करनी चाहिये। यदि सबकी कर सके तो मातादि की विशेष प्रयत्न के साथ वा प्रथम करनी चाहिये। अर्थात् मातादि की सेवा की अपेक्षा अन्य की सेवा दुःखदायी है। माता, पिता वा गुरु की सेवा को छोड़के अन्य की सेवा करने वाला धर्मात्मा नहीं कहावेगा।

विधि, निषेध, सिद्धानुवाद और अर्थवाद का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब विधि, निषेध, अनुवाद वा सिद्धानुवाद और अर्थवाद, जिनका उद्देश्य चतुर्थ संख्या में लिख चुके हैं, उनका विचार किया जाता है। इनमें विधि नाम आज्ञा (हुक्म) का है कि ऐसा करो, और ऐसा मत करो, यह निषेध है, सो भी विधि के साथ ही लग जाता है। अनुवाद- कही बात वा विषय को ह्लि र से कहना। सिद्धानुवाद- एक अनुवाद का ही भेद है। जो वस्तु वा कार्य लोक की वर्त्तमान परिपाटी के अनुसार वा स्वभाव से संसार में होता है, उसका कहना सिद्धानुवाद कहाता है। वेद और वेदानुकूल शास्त्रों में जिसके लिये कहा गया कि यह इस प्रकार कर्त्तव्य कहा है, वह कर्म और उस कर्म के सेवन से संचित हुए शुभ संस्कार भी धर्मसंज्ञक हैं, यह पूर्व भी कह चुके हैं, तिससे सिद्ध हुआ कि जिसके करने वा न करने की आज्ञा दी गयी, उसका वैसा ही करना वा न करना धर्म कहाता है। शुभ की विधानपूर्वक निषिद्ध की निषेधपूर्वक करने, न करने की आज्ञा देना ही धर्म है। जैसे जिससे दुःखी हो उससे भी मर्मच्छेदन करने वाले, कठोर वाक्य न बोले, यहां मर्मच्छेदन न करना भी धर्म ही है। अथवा ‘कठोर मर्मच्छेदक वाक्य न बोले चाहे दुःखी भी हो’ यह वाक्य अधर्म को हटाने वाला होने से     धर्मशास्त्र वा धर्मशासक है। ऐसा होने से विधिवाक्य ही धर्म को जताने वाले हो सकते हैं, अन्य नहीं, यह सिद्ध हुआ।

श्रेष्ठ लोगों के माने हुए वा बनाये हुए गद्य-पद्यक्रम वाक्य समुदायों से बने वेदादि सम्पूर्ण शास्त्रों में मुख्यकर तीन प्रकार के ही वाक्य प्राप्त होते हैं। सो न्यायदर्शन वात्स्यायनभाष्य1 में लिखा है कि एक जो प्ररेणा करने वाले वाक्य हैं, उन्हीं को नियामक वा आज्ञा भी कहते हैं। जैसे ‘स्वर्ग- सुखविशेष की कामना रखने वाला पुरुष अग्निहोत्र करे’ यह विधिवाक्य है।

द्वितीय प्रकार के अर्थवाद वाक्य कहाते हैं। विधि वा आज्ञा के अर्थ नाम प्रयोजन को कहने वाले होने से उनका नाम अर्थवाद है। इस अर्थवाद के अवान्तर भेद चार हैं। स्तुति, निन्दा, परकृति और पुराकल्प। विधि के ह्ल ल को दिखाने वाली प्रशंसा स्तुति कहाती है। विधि के ह्ल ल को दिखाने से कर्त्ता को प्रतीति या विश्वास हो सकता है कि इसको करना चाहिये, निष्ह्ल ल नहीं है। अच्छा ह्ल ल दिखा देने से कर्ता की श्रद्धा भी होती है, इसी कारण स्तुति ही उस कार्य में प्रवृत्ति कराती है, क्योंकि अच्छा ह्ल ल सुनकर कार्य में मनुष्य प्रवृत्त होता है। अनिष्ट ह्ल ल कहना निन्दा कहाती है, उस दुष्ट काम से होने वाले निकृष्ट ह्ल ल के दिखाने से कर्त्ता की अरुचि हो जावे, जिससे निन्दित बुरे काम को न करे। जैसे कि ‘गौ को नहीं मारना चाहिए’ यह विधि है, गौ के मारने से जो बुरा ह्ल ल होगा उसका दिखाना और ‘गौ रक्षणीय है’ इस विधिवाक्य पर गौ की रक्षा से जो अच्छा ह्ल ल होगा उसका दिखाना निन्दा-स्तुतिरूप अर्थवाद कहाता है। अन्य किसी ने अच्छा वा बुरा किया उसको वैसा ह्ल ल मिला, यह दृष्टान्त दिखाना परकृति है। जैसे ‘सत्य बोलना चाहिये और मिथ्या बोलना नहीं चाहिये’। ये दोनों विधिवाक्य हैं, सत्य बोलने में यह-यह लाभ और मिथ्या बोलने में ऐसी-ऐसी हानि वा बुराई है। देखो युधिष्ठिर सत्य बोलने से ऐसे प्रतिष्ठित धर्मात्मा कहाये और एक बार मिथ्या बोलने से उनको अमुक बुरा ह्ल ल मिला, यह परकृति है। और इतिहास सम्बन्धी विधि पुराकल्प कहाता है। अर्थात् परम्परा से अनेक शुभ कर्म होते आते हैं, उनको परम्परा के प्रमाण से कर्त्तव्य ठहराना पुराकल्प कहाता है। ये चारों प्रकार के अर्थवाद विधि की पुष्टि करते हैं वा सेवक के तुल्य हैं। परन्तु विधिवाक्य ही मुख्य प्रधान हैं। जिस कर्त्तव्य की विधि- आज्ञा वेद में नहीं उनके अर्थवाद भी नहीं आते। क्योंकि अर्थवाद विधि के आश्रय चलते हैं।

अब तीसरे प्रकार के अनुवाद वाक्य हैं। अनुवाद दो प्रकार का होता है। एक तो शब्द को द्वितीय बार बोलना शब्दानुवाद और अर्थ नाम वाच्य को द्वितीय बार कहना अर्थानुवाद कहाता है। अनुवाद शब्द का मुख्य अर्थ यही है कि कहे को फिर से कहना। अब यह शटा है कि जिसको एक बार विधान कर चुके वा एक शब्द बोलकर जिसकी आज्ञा दे चुके उसको ह्लि र क्यों कहते हैं ? इसका     समाधान यह है कि जिसको द्वितीय बार कहा जाता है वह अति प्रशस्त वा अवश्य कर्त्तव्य कार्य माना जाता है अर्थात् द्वितीय बार कहने से विधि की प्रशंसा होती है। जिसका अनुवाद किया जाय उस कर्म को निस्सन्देह उत्तम वा कल्याण का मार्ग समझ कर करना चाहिये। जैसे शास्त्रों में तीन प्रकार के वाक्य आते हैं वैसे ही लोक के व्यवहार में सर्वसाधारण (जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़ा) भी इन्हीं तीन प्रकार के वाक्यों से व्यवहार करते हैं। यथा- ‘भात पकाओ वा रोटी बनाओ’ इत्यादि विधि वाक्य कहाते हैं। क्योंकि आयु, तेज, बल, सुख और स्मरणशक्ति की वृद्धि तत्काल पकाये अन्न के भोजन से होती है यह अर्थवाद। ‘पकाईये-पकाईये वा जाओ-जाओ, बैठो-बैठो, वा शीघ्र-शीघ्र पकाईये’ इत्यादि अनुवाद कहाता है। यह सब न्यायदर्शन के वात्स्यायनभाष्य का आशय लिखा है। इन तीनों सूत्रों (२.२.६२-६४) पर जितना भाष्य था वह सब हमने यहां नहीं लिखा, किन्तु प्रसग् के अनुसार जितना प्रयोजन था उतना लिखा है, शेष छोड़ दिया है। उक्त तीन प्रकार के वाक्य प्रायः ब्राह्मणादि वेद सम्बन्धी पुस्तकों में आते और संघटित होते हैं। तथा परकृति और पुराकल्प नामक दोनों अर्थवाद ब्राह्मण पुस्तकों में ही घटते हैं। किन्तु अपौरुषेय सनातन वेद में नहीं घटते। अनुवाद शब्द का अर्थ जैसा वात्स्यायन ऋषि भाष्यकार ने दिखाया है वैसा वेद सम्बन्धी ब्राह्मण ग्रन्थों में प्रायः आता है।

और सिद्धानुवाद वा भूतानुवाद यह भी एक प्रकार का अनुवाद है। यह लोक में भी प्रसिद्ध है और शास्त्रों में भी इसका प्रचार दीखता है। जब तीन वा चार प्रकार के वाक्य हैं तो एक विधिवाक्यों के सार्थक होने से अन्यों का व्यर्थ होना प्राप्त हुआ और यही बात पूर्वमीमांसा1 में भी कही है कि वेद के आज्ञारूप वाक्यों से कर्त्तव्य का उपदेश होने से जिसमें कर्त्तव्य का उपदेश नहीं उन अक्रियार्थ वाक्यों की अनर्थकता होगी। इस कारण विधिवाक्यों को अनित्य समझना चाहिये। ऐसा पूर्व पक्ष करके वहीं उत्तर दिया है कि विधिवाक्यों के साथ अर्थवाद वाक्यों का एक कार्य में योगरूप सम्बन्ध रहने से अर्थवादादि व्यर्थ नहीं किन्तु सार्थक हैं क्योंकि कोई सुखभोग चाहने वाला पुरुष अर्थवाद के बिना आज्ञा का सेवन वा निषिद्ध का त्याग नहीं कर सकता। और ह्ल लभोग से विरक्त पुरुष को भी अर्थवाद अवश्य जानना चाहिये क्योंकि विहित का सेवन करे अन्य का नहीं, यह भी अर्थवाद से ही जताया जाता है, इससे वहां भी अर्थवाद सार्थक हैं।

अब इस मानवधर्मशास्त्र में ‘वेद सम्बन्धी पुण्य के उत्पन्न कराने वाले कर्मों से ब्राह्मणादि तीनों वर्णों के शरीरों के संस्कार करने चाहियें जिससे इस जन्म और जन्मान्तर में पवित्रता होती है।’२ यह विधि तथा सामान्य से किसी कार्य का     विधान कर पीछे उसकी प्रशंसा वा ह्ल ल दिखाना अर्थवाद है। जैसे- ‘गर्भाधानादि संस्कारों में होने वाले होम और मन्त्रपूर्वक धारण किये चिह्नों से द्विजों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के बीज सम्बन्धी वा गर्भ सम्बन्धी मलिनता के सब दोष छूट जाते हैं।’३ अर्थात् संस्कारों में ओषधियों का भी कहीं-कहीं प्रयोग किया है, उससे तथा अन्य पवित्रता के उपाय संस्कारों में होने से अपवित्रता दूर होती है। यह पूर्वोक्त विधि पर अर्थवाद तथा ‘कल्याण चाहने वाले पिता आदि पुरुषों को श्रेष्ठ धर्मज्ञा स्त्रियों का सत्कार और उनको भूषित करना चाहिये’१ यह विधि वा आज्ञा है। इसी पर ‘जिन घरों में सती स्त्रियों की पूजा होती है वहां श्रेष्ठ सज्जन लोग निवास कर प्रसन्न होते हैं। और जिन घरों में स्त्रियों का सत्कार नहीं वहां श्रेष्ठ लोग दुःखी होकर नहीं ठहरते अर्थात् विरक्तादि हो जाते हैं’२। तथा ‘अति भोजन न करे, झूठे कहीं न जावे। दुःख प्राप्ति में भी मर्मभेदी वचन न कहे, दूसरों से वैर विरोध करने में बुद्धि न लगावे।’३ इत्यादि कथन बुराई से बचने की आज्ञारूप विधि है तथा ‘आलस्य निद्रा को छोड़कर धर्म के मूल श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का सेवन करे।’४ इत्यादि सीधा कर्तव्य का विधान है। इस उक्त प्रकार से अर्थवाद वाक्य विधिवाक्य की ही रक्षा और पुष्टि करतें है। सिद्धानुवाद रूप वचन जो अनुवाद सम्बन्धी वाक्यों के अन्तर्गत हैं, उनका प्रयोग मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों और वेदों में मिलता है। वेद में लिखा है कि- ‘सूर्य एक बिना किसी का सहाय लेकर अपनी कक्षा में डोलता और चन्द्रमा बार-बार घटता-बढ़ता अग्नि पाले का औषध और भूमि सब से बड़ा खेत है।’५ इत्यादि सिद्ध बातों का कथन है किन्तु कुछ नवीनता नहीं, इससे इसका नाम सिद्धानुवाद है। धर्मशास्त्रों में सृष्टि का वर्णन सिद्धानुवाद वा भूतानुवाद है। स्वाभाविक वर्तमान द्रव्य, गुण, कर्मों का विभाग पूर्वक दिखाना भी सिद्धानुवाद का विषय है। और जब सिद्ध को ही जानने के विचार से कहते हैं तब वहां भी विधि ही जानना चाहिये। तथा- ‘चेतन का अन्न- भक्ष्य, जड़, दांत वाले प्राणियों के बिना दांत वाले, हाथ वालों के बिना हाथ वाले और शूरवीर सिंहादि प्राणियों का भक्ष्य- अन्न डरपोक प्राणी हैं।६ ‘सत्त्वगुण को   धारण करने वाले देवता, रजोगुण को धारण करने वाले मनुष्य और तमोगुणधारी जीव-जन्तु-पशु-पक्षी आदि योनि को प्राप्त होते हैं।’७ इस प्रकार तीन गुणों के भेद से मुख्य कर तीन भेद वाले सब प्राणी हैं। गुणों के अवान्तर भेद एक-एक में अनेक होने से योनियों में अवान्तर भेद पड़ते हैं। इत्यादि अनेक वचन सिद्धानुवादपरक आते हैं। स्वाभाविक सिद्धानुवाद इसलिये कहा जाता है कि उसमें विधि-निषेध की उदासीनता समझी जावे, क्योंकि जो गुणादि स्वाभाविक अच्छा बुरा है उसमें कुछ हेर-ह्ले र न हो सकने से विधि-निषेधरूप प्रयत्न करना कदापि सह्ल ल नहीं हो सकता। स्वाभाविक गुणादि उस वस्तु की पूर्ण आयु तक रहता है और कहीं-कहीं शुभ-अशुभ लोक के वर्त्ताव को जताकर [कि ऐसा-ऐसा करने वाले ऐसा-ऐसा फल भोगते हैं) विधि-निषेध की ओर मनुष्यों को झुकाने के लिए सिद्धानुवाद कहे जाते हैं, वैसे शीत वा पाले की ओषधि जो जानता है वही शीत सम्बन्धी दुःख से बच सकता है। सब सिद्ध वस्तु को सब कोई नहीं जानता। इसलिये शास्त्रकार उनको जताने के अर्थ सिद्धानुवाद कहते हैं कि जिससे सृष्टि के क्रमानुकूल गुणकर्मों का बोध हो जावे, जिससे उसके अनुसार वर्त्ताव करके मनुष्यों को सुख प्राप्त हो और दुःखों से बचें, यही सिद्धानुवाद का प्रयोजन है। अब यह सिद्ध हो गया कि वाक्य समुदायरूप सब मान्यशास्त्रों में चार ही प्रकार के वाक्य हैं।

ये तीन वा चार प्रकार के वाक्य जो दिखाये गये, इससे शास्त्रों के अभिप्राय अच्छे प्रकार और शीघ्र बुद्धि में जम जाते हैं। इस प्रकार वाक्यविभाग न दिखाया जाय तो ठीक-ठीक सिद्धान्त का बोध नहीं हो सकता, इसलिये वाक्यविभाग दिखाना आवश्यक है। जहां-जहां इस पुस्तक में जो-जो वाक्य आवेंगे वहां भाष्य में विधि आदि करके लिख दिया जायगा कि यह विधि, अर्थवाद वा अनुवाद अथवा सिद्धानुवाद है। जिससे सर्वसाधारण लोगों को ज्ञात हो जायगा कि धर्मशास्त्र बनाने वाले ने हमको अमुक-अमुक आज्ञा दी है तथा अमुक-अमुक अर्थवाद आदि से उसको सार्थक ठहराया है। इस विषय पर अधिक लेख बढ़ सकता था परन्तु प्रयोजनमात्र समझाना उचित समझ कर अधिक नहीं बढ़ाया गया।

धर्म शब्द के अर्थ का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब सामान्य धर्म शब्द पर कुछ विचार करना आवश्यक इसलिये समझा गया कि हमको धर्मशास्त्र की मीमांसा करना है तो प्रथम जान लेना चाहिए कि धर्म किस वस्तु का नाम है ? वस्तु शब्द से यहाँ वाच्यमात्र का विचार है किन्तु द्रव्य का पर्यायवाचक वस्तु शब्द नहीं लेना है। प्रयोजन यह है कि धर्मशब्द का शाब्दिक वा लाक्षणिक अर्थ क्या है ? अर्थात् व्याकरण के नियमानुसार मनुष्य जिसको     धारण करें, वह धर्म है। ऐसा होने पर वेदादि शास्त्रों में जिसका निषेध किया गया, ऐसे चोरी आदि दुष्कर्म को भी कोई धारण करता वा कर सकता है तो क्या उसको भी धर्म कहना ठीक हो सकता है ? ऐसा विरुद्ध निश्चय वा सन्देह हो सकने से इसका यह समाधान कहा जाता है- धृञ् धारणे1 इस धातु से कर्म कारक वा भाव में उणादि मन् प्रत्यय2 हुआ है। सामान्य वा विशेष मनुष्य अथवा चराचर सब वस्तुमात्र जिसको धारण करते, जिसके आधार होते अथवा मनुष्य वा प्राणी-अप्राणियों से जो धारण किया जाता अर्थात् उनको धारण करने पड़ता है, वह धर्म कहाता है। यह धर्म का शाब्दिक अर्थ है। कदाचित् किसी प्रकार अन्य कारकों में भी मन् प्रत्यय हो सके, परन्तु प्रधानता से भाव और कर्म का ही अर्थ मिल सकता है। भाव अर्थ में प्रत्यय करने से धृति- धैर्य, क्षमा आदि धारणरूप हैं। इस कारण इनका भी नाम धर्म हो सकेगा।

और कर्म का अर्थ आगे स्वयमेव लिखा गया है। सब शास्त्रों में जातिशब्द, गुणशब्द और क्रियाशब्द ये तीन ही प्रकार के शब्द माने गये हैं। नैयायिक लोग इन्हीं को द्रव्य, गुण, कर्म शब्दों से व्यवहार में लाते हैं। इसमें धर्मशब्द द्रव्य, गुण और कर्म तीनों का नाम जिस किसी प्रकार व्यवहार में आया दीख पड़ता है। परन्तु प्रधानता से धर्मशब्द गुण और कर्म का वाचक है, अधिक कर इसी दो प्रकार का व्यवहार आता है। इसी कारण व्याकरण अष्टाध्यायी के अर्द्धर्चादिगण3 में     धर्मशब्द का पाठ करने से विद्वान् लोग पुंस्, नपुंसक दोनों लिग् होना मानते हैं। और जहाँ कर्म का वाचक धर्मशब्द है, वहीं प्रायः इसका नपुंसकपन प्रतीत होता है। जैसे यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में ‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्॰’ यहाँ धर्मशब्द कर्म का पर्याय वाचक है। नपुंसकलिग् में धर्मशब्द का प्रयोग बहुत न्यून आता है, किन्तु प्रायः पुल्ँिलग् में ही लोक-वेद में प्रयोग किया वा लिखा जाता है, वह गुणवाचक वा स्वभाववाचक धर्मशब्द है। सब प्रकार का धर्मशब्द सुखहेतु गुण, कर्म वा द्रव्य का वाचक अभीष्ट है, किन्तु दुःखहेतु गुणादि का वाचक नहीं। जहाँ दुःख का हेतु धर्मशब्द आता है, वहाँ उसमें नञ् अव्यय संयुक्त करके अधर्म कहते हैं। वहाँ सुख से विरुद्ध दुःख का हेतु गुण, स्वभाव, द्रव्य वा कर्म अधर्मशब्द का वाच्यार्थ यथासम्भव जानना चाहिये। और जहाँ पर्युदासार्थ वाचक नञ् अव्यय होता है, वहाँ धर्म से भिन्न धर्म के तुल्य वस्तु का वाचक अधर्मशब्द जानना चाहिये। उसी को विचारशील लोग धर्माभास भी कहते हैं कि जो ऊपर से धर्म के तुल्य प्रतीत हो, परन्तु वास्तव में धर्म न हो।

संसार में मनुष्य से लेकर चींटी पर्यन्त सब प्राणी सुख की ही इच्छा रखते हैं। कोई कदापि दुःख को नहीं चाहता। इसी कारण शास्त्र की आज्ञा से विरुद्ध दुष्ट कर्म का धारण कोई नहीं करता, क्योंकि स्वभाव से ही इसका विरोध है। इसलिये धर्म वही है जिसका धारण, स्वीकार वा स्वभाव से मिलाप हो जावे। जैसे प्रकृति के अनुकूल सुख देने वाले वस्तु का भोजन किया जाय तो वह उदर में जाकर ठहरता वा धारण किया जाता और वहां के धातु उस आहार को अपने तुल्य बनाने का यत्न करते हैं, अर्थात् ठहराते हैं। जैसे मित्र को मित्र प्राप्त होकर प्रसन्नता का कारण होता है, वैसे ही अपने प्रिय सुखप्रद को पाकर धर्मात्मा सुखी वा आनन्दित होता है। यही धारण का लक्षण है। और जैसे भोजनादि के साथ वा अकस्मात् प्रमादादि से पेट में मक्खी आदि विरुद्ध वस्तु चला जाये तो नहीं धारण होता- नहीं ठहरता वा पचता किन्तु वमन का कारण हो जाता है, क्योंकि पक्वाशय उसका   धारण नहीं करता। यदि उसका धारण हो और वमनादिक न हो वा चित्त न बिगड़े, ग्लानि न हो अर्थात् कदाचिद् विरुद्ध खाया मक्खी आदि वमन का हेतु न हो और किसी प्रकार पच भी जावे, तो दुःख के हेतु रोगादि विकारों को अवश्य उत्पन्न करता है। कदाचित् अज्ञान से खाया मक्खी आदि किसी विशेष रोग का कारण न हो तो भी ग्लानि अवश्य उत्पन्न होती है। प्रयोजन यह है कि अनुकूल हितकारी भोजन के तुल्य मक्खी आदि पेट में कदापि न ठहरेगा। तथा जैसे मनुष्य अपने अनुकूल भार को अपनी इच्छा से उठाता है, वह उसको छोड़ता नहीं भले ही उसमें क्लेश हो और जिस भार का उठाना भार नहीं जान पड़ता वही धारण करना है और जहां भार वा दुःख जान पड़े और किसी की लज्जा, शटा, भय वा लोभादि के कारण उठाना पड़े, वह धारण न होने से धर्म नहीं किन्तु अधर्म है। और अन्तरात्मा सदा सत्य को धारण करता है, किन्तु बनावटी मिथ्या को वाणी द्वारा कहते हुए संकुचित होता वा लज्जा, शटा करता है, इस कारण जहां ऐसा होता है, वह     धर्म नहीं और सत्य ही धर्म है। इसी प्रकार निषिद्ध चोरी, व्याभिचारादि दुष्ट कर्म को कोई पुरुष धारण नहीं करता, किन्तु सुख के हेतु अनुकूल को प्रसन्नता से     धारण करता है। निषिद्ध कर्म का सेवन काम, क्रोधाादि के वशीभूत होकर किया जाता है, किन्तु विरुद्ध दुष्ट कर्म बुद्धि से कोई नहीं सेवता अर्थात् चोरी आदि पाप का करने वाला भी उसको पुण्य नहीं मान सकता। चोर निर्भय होकर चोरी आदि कदापि नहीं करता। यदि चोर किसी प्रकार परोपकार में लगे धर्मात्मा के तुल्य चोरी करने में लज्जा-शटा-भयों को छोड़कर प्रवृत्त हो तो विरुद्ध कर्म का भी धारण हो सकने से धर्म कहना प्राप्त हो, सो तो कदापि सम्भव नहीं। तिस से धर्म है धारण किया वा कराया जाता है और जो धारण किया जाता है वही धर्म है इससे व्याकरणानुकूल अर्थ करना ही ठीक है।

इससे यह सिद्ध हुआ कि अनुकूल हितकारी का ही धारण होता है किन्तु प्रतिकूल का नहीं। इस कारण हितकारी गुण-कर्मों को ही धर्म कहना वा मानना सिद्धान्त है। क्योंकि अपने-अपने हितकारी को ही सब लोग स्वीकार करते हैं, किन्तु अपने विरोधी दुःखदायी को कोई नहीं चाहता। और स्वभाव का नाम भी   धर्म है। सो अपनी-अपनी सत्ता को सब चराचर वस्तु धारण करते ही हैं। इस सत्ता को ही भाव भी बोलते हैं कि जिस भाव अर्थ के बोधक व्याकरण में त्व-तल् प्रत्यय१ नियत किये जाते हैं। जैसे ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व वा मनुष्यत्व, पशुत्व, पक्षित्व, एकता इत्यादि शब्दों में ब्राह्मणादि के मुख्य धर्म में त्व आदि प्रत्यय हुआ है। इस अंश में महाभाष्यकार पतञ्जलि ऋषि ने लिखा है कि- ‘यस्य गुणस्य भावाद् द्रव्ये शब्दनिवेशस्तदभिधाने, तस्मिन् गुणे वक्तव्ये प्रत्ययेन भवितव्यम्।’2 अर्थात् ब्राह्मणपदवाच्य व्यक्ति वा जाति में जिस प्रधान गुण की विद्यमानता होने से ब्राह्मणादि पद का प्रयोग वा व्यवहार किया जाता है, उस गुण वा शक्ति का नाम धर्म समझना चाहिये। जिन-जिन शास्त्रों में अर्थात् छह दर्शनों में धर्म-धर्मी के प्रसग् का वर्णन आता है, उन-उन में शक्ति-शक्तिमान् वा गुण-गुणी का व्याख्यान समझा जाता है। और योगशास्त्र के विभूति पाद में भी लिखा है कि- शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी।।14।। भाष्यम्- योग्यतावच्छिन्ना धर्मिणः शक्तिरेव धर्मः।। इत्यादि।। इस योगसूत्र का अभिप्राय यह है कि भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान धर्म वा गुणों के साथ रहने वाला धर्मी वा शक्तिमान् वा गुणी कहाता है। धर्म तीन प्रकार के कालभेद से माने जाते हैं। जो अपनी तरुणावस्था को व्यतीत कर शान्त, तिरोभूत, अप्रकट वा नष्ट हो गया वह भूतधर्म शान्त कहाता है। तथा विरोधी के तिरोहित (दब) जाने वा नष्ट हो जाने से और अपने उत्तेजक हेतुओं से उत्तेजित हुआ धर्म वा गुण वर्त्तमान उदित धर्म कहाता है। तथा भविष्य काल में प्रकट होने वाला गुण अव्यपदेश्य है क्योंकि उसका अनुभव किये बिना वर्णन नहीं किया जा सकता कि इस वर्त्तमान अवस्था के लौटने पर ऐसा होगा। इसीलिये उसका नाम अव्यपदेश्य माना गया है। प्रत्येक वस्तु में इसी तीन प्रकार की दशा के साथ गुण वा धर्म ठहरता है। अपनी योग्यता के साथ अन्य गुण वा धर्मों से पृथक् हुई धर्मी पदार्थ की शक्ति का ही नाम धर्म है, यह व्यासभाष्य का तात्पर्य है। सब वस्तु में सब प्रकार की योग्यता नहीं रहती, इसलिये योग्यता ही सब     धर्म वा शक्तियों की अवच्छेदक- भेदक मानी जाती है। और जिसका जिसके साथ मेल होना वा करना उपयोगी है, उसके साथ उसकी योग्यता समझी जाती है यही योग्यता शब्द का अर्थ है। ऊपर लिखे महाभाष्य और योगसूत्र का एक ही आशय धर्मशब्द पर है, जैसा कि पूर्व से लिखा गया।

पूर्व जो तीन काल के भेद से गुण, धर्म वा शक्ति के तीन भेद कहे गये हैं, उनको लौकिक वा शास्त्रसम्बधी व्यवहार में फैलाकर देखा जाय तो ठीक-ठीक ऐसा ही प्रतीत होता है, जैसे जो पहले से मित्र रहा वह शत्रु और जिसके साथ कुछ सम्बन्ध नहीं रहा वह पुरुष वा स्त्री मित्र बन जाती है। यह धर्मों का परिणाम सदा होता रहता है। अर्थात् सब पदार्थ, सब देश, काल और अवस्थाओं में सबके सर्वथा अनुकूल वा सर्वथा प्रतिकूल नहीं रहते किन्तु जो किसी देश, काल वा वस्तु, अवस्था के सम्बन्ध से अनुकूल हो गया, वही देशादि के लौट-फेर से प्रतिकूल हो जाता है। इसी प्रकार प्रतिकूल हुआ वस्तु कभी अनुकूल भी हो जाता है, यह सब धर्मों का परिणाम है। अभिप्राय यह है कि जिसका परिणाम लौट-पौट होता रहता है, उस गुण का नाम धर्म है। इस पर एक शटा यह रह सकती है कि यदि लौटता रहता है तो उसका नाम स्वभाव क्यों रखा गया, अर्थात् स्वभाव उसी को मानते हैं जिसमें भेद न पड़े। और सनातन धर्म क्या माना जावेगा कि जब धर्मों का सदा परिणाम होता रहता है तो सनातन धर्म कोई क्यों ठहर सकता है ? यद्यपि ये दोनों प्रश्न ऐसे हैं जिन पर कितना ही लिखा जाय पार मिलना दुस्तर है तथापि अतिसूक्ष्मता से इनका समाधान लिखा जाता है-

स्वभाव शब्द का अर्थ यह है कि अपना भाव अर्थात् अपना कारण। अपने कारण से जो गुण कार्य में यथार्थ रूप से चला आता है उसको स्वाभाविक कहते हैं। जैसे दूध का श्वेत गुण दही, मट्ठा आदि सब में यथावत् बना रहता है वा जैसे कपास की श्वेतता रूई, सूत, वस्त्र आदि सब उत्तर-उत्तर कार्य में चली आती है। तो यहां श्वेतता गुण स्वाभाविक माना जाता है, परन्तु दूध, दही, मठा आदि में कोई काला वा अन्य ऐसा रंग डाल सकते हैं कि जिससे उसकी श्वेतता मिट जाय वा जैसे कपड़े को नील आदि से रंग देना, इससे स्वाभाविक को भी कोई लोग अनित्य मानते हैं, परन्तु यह पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वह स्वाभाविक रंग नष्ट नहीं होता किन्तु तिरोभूत (दब) हो जाता है। इसका दृष्टान्त धोबी है कि यदि शिल्पक्रिया प्रवीण धोबी हो तो बनावटी- ऊपर से चढाये पक्के रंग को भी छुड़ा कर ह्लि र उसी श्वेत स्वाभाविक गुण को निकाल देता है। इससे अनुमान होता है कि स्वाभाविक गुण नष्ट नहीं होता, किन्तु तिरोहित (दब) हो जाता है और धोबी के दृष्टान्त को धर्मसम्बन्ध में भी ठीक लगा सकते हैं कि यदि अच्छा धर्मात्मा उपदेशक गुरु मिल जावे जो सब प्रकार से शुद्ध और प्रवीण हो वह काम-   क्रोधादि से लगे दुर्गुणों को छुड़ाकर चेतन आत्मा के स्वाभाविक शुद्ध भावों को प्रकाशित कर देता है। और कदाचित् शिल्पकुशल धोबी न मिले कि जो वस्त्र पर हुए नीलादि रंग को छुड़ा सके तो भी स्वाभाविक को अनित्य न मानना चाहिए। क्योंकि सूर्य का तेज वा प्रकाश स्वाभाविक है, उसके आवरक अन्तरिक्षस्थ मेघ वा धूलि को हम नहीं हटा सकते, तो भी वह अनित्य नहीं। इसी प्रकार यहां भी जानो कि मनुष्यादि में कारण के सम्बन्ध से जो गुण आता है, वही स्वाभाविक है, और उसके कभी तिरोभूत हो जाने वा अन्तर्धान हो जाने वा किसी अज्ञानी के अनित्य मान लेने पर भी वह अनित्य नहीं होता। पर नित्य-अनित्य का विचार लोक में सापेक्ष चलता है। किसी की अपेक्षा कोई नित्य माना जाता है, जिसके स्वरूप में कभी भेद न पड़े किन्तु अनादि, अनन्त काल तक एकरस रहे, ऐसा तो एक परमेश्वर है। और नित्य सन्ध्या वा अग्निहोत्र करता है, ऐसा कहना सापेक्ष अर्थात् जो एक-दो दिन करके छोड़ दे, उसकी अपेक्षा यहां नित्य शब्द का प्रयोग है। किन्तु यह तो सभी जानते हैं कि अति बाल्यावस्था में काई भी सन्ध्याग्निहोत्रादि नहीं करता उत्पत्ति से पहले भी नहीं करता था मरने के पश्चात् भी न करेगा। बीच-बीच में भी कभी-कभी छोड़ने पड़ता है, तो वैसा नित्य अर्थ नहीं तो भी नित्य माना वा कहा जाता है। इसी प्रकार सापेक्ष नित्य वस्तुओं में एक साथ अनित्यता-नित्यता दोनों रहती हैं। परन्तु ठीक नित्य मानने में प्रवाह से किन्हीं को नित्य ठहरा सकते हैं। इसलिये स्वभाव का लौट जाना- तिरोभूत हो जाना मात्र है। और जिसका वस्तुतः लौट जाना होता है, वह स्वभाव नहीं है। किन्तु संयोगी गुण है।

अब रहा सनातन धर्म, सो उसमें भी यही विचार है। उसके तिरोहित हो जाने वा अन्य विरोधी के प्रबल हो जाने से उसका सनातनपन नहीं बिगड़ता। वह सदा कर्त्तव्य उपयोगी ह्ल ल दाता है, इसलिये सनातन कहाता है। यद्यपि अपवाद विषय में उत्सर्ग का प्रवेश नहीं होता१, तो भी वह बहुव्यापी होने से उत्सर्ग वा सामान्य ही कहाता है। जैसे भारतवर्ष का एक राजा हो वह दस-पांच ग्राम का सब     अधिकार किसी को दे देवे, तो भारतवर्ष का राजा कहाना उसका बिगड़ नहीं सकता। इसी प्रकार आपत्काल में सनातन धर्म के किसी अंश का पूरा उपयोग न रहे तो उसका सनातन होना खण्डित नहीं हो सकता। इस अंश का विशेष विचार उत्तम-मध्यम धर्मों में किया जायगा।

यह सब लेख स्वभाव वा गुण को धर्म मानने पर लिखा गया यद्यपि संस्कृत में ऐसा विचार नहीं है तो भी भाषा में समझने वाले अधिक जानकर बढ़ाया गया।

अब प्रकृत यह है कि जब कहा जावे कि यह सज्जन मनुष्य धर्मात्मा है, वहां जिसके चेतनतायुक्त अन्तःकरण में दया कोमलता, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियों का वश में करना आदि रूप से धर्म कर्त्तव्य वृत्ति के साथ अवस्थित हैं ऐसा अर्थ करना चाहिये। अथवा शास्त्रों में कहे शुभ कर्र्मों के अनुष्ठान से उत्पन्न होने वाले पुण्यरूप संचित शुभ संस्कार जिसके मन में अवस्थित हैं, वह धर्मात्मा कहाता है। ‘श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानव॰’2 [श्रुति-स्मृति में कहा   धर्म…..] ऐसे प्रसग् में श्रौत, स्मार्त्त कर्म ही धर्म कहाता है। कहीं केवल सत्य का ही नाम धर्म है ‘अथातो धर्मजिज्ञासा3 इस मीमांसासूत्र के अनुसार वेदस्थ परमेश्वर की आज्ञा ही धर्म है अर्थात् वेद में जो विधिवाक्य हैं, वे साक्षात् धर्म के बोधक हैं।४ अर्थवाद और अनुवाद वाक्यों की विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता होने से सार्थक होते हैं। अतः ये सहकारी कारण हैं। ‘अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः’5 इस वैशेषिक सूत्र में विधि-आज्ञा रूप वेदोक्त धर्म का ही ग्रहण है। इस उक्त प्रकार से पूर्वमीमांसादि षट्शास्त्रों वा षड्दर्शनों में धर्म की शिक्षा वा उपदेश प्रत्यक्ष है। इस कारण उनको धर्मशास्त्र मानना वा कहना सार्थक हुआ।

कहीं लिखा है कि ‘विहितक्रियया साध्यो धर्मः’ अर्थात् विधान किये कर्म के सेवन से सिद्ध होने वाला धर्म है, इत्यादि स्थल में आत्मा भी धर्मशब्द का अर्थ हो सकता है। क्योंकि आत्मा भी विहितानुकूल कर्म करने से ही प्राप्त हो सकता है। मरने पर ‘धर्मस्तमनुगच्छति, धर्मं शनैः सञ्चिनुयात्’ अर्थात् धर्म ही उसके साथ जाता है, धर्म का धीरे-धीरे संचय करें, इत्यादि स्थलों में शुभ कर्मों के सेवन से उपार्जन किया वासनारूप में बंधा पुण्यरूप संचित शुभ कर्म ही धर्म कहाता है। कहीं ‘ज्ञेयस्य ज्ञानं ध्येयस्य ध्यानम्’ अर्थात् ज्ञेय वस्तु का ज्ञान और ध्येय वस्तु का ध्यान करना भी धर्म ही कहाता है। यह उक्त सब धर्म दो प्रकार का है एक संसारी और द्वितीय परमार्थसम्बन्धी। जगत् में सुखभोग के अर्थ जिसका सेवन किया जाता है ऐसा शुभ आचरणरूप वेदोक्त कर्म लौकिक धर्म है। और ह्ल लभोग की अपेक्षा छोड़कर उदासीन वृत्ति से सर्वशक्तिमान् सबके उपास्य ईश्वर की आज्ञा का पालनमात्र अपना कर्त्तव्य वा प्रयोजन मानकर सेवन किया ज्ञान, ध्यानादि परमार्थसम्बन्धी धर्म कहाता है। यह दोनों प्रकार का धर्म श्रौत, स्मार्त्त भेद से और दो प्रकार का होता है। अर्थात् लौकिक श्रौत, स्मार्त्त और वैदिक श्रौत, स्मार्त्त। यद्यपि सब शास्त्रों का धर्म ही मुख्य कर विषय है, क्योंकि जहां कहीं अधर्म को हटाने के उपाय कहे हैं, वह भी धर्म के प्रचार में उपयोगी होने से धर्म है। तथा जो कुछ कर्त्तव्य मानकर उपदेश किया गया वह सब धर्म है, क्योंकि जो सदा कर्त्तव्य वा ग्राह्य हो अर्थात् सुख का कारण हो वह धर्म और जो त्यागने योग्य दुःख का कारण निषिद्ध है उसका त्याग भी धर्म है। इस प्रकार वेद, उपवेद, ब्राह्मण, उपनिषद्, छह वेदाग्, छह शास्त्र और स्मृति आदि सब सत् शास्त्रों में कर्त्तव्य का विधान और निषिद्ध का त्याग ही मुख्य कर दिखाया गया है। तो भी इस मानवधर्मशास्त्र का मुख्य कर यही विषय है। इससे सामान्य कर उक्त लक्षण वाला धर्म ही इस मानवधर्मशास्त्र में कहा गया है, यह सिद्ध हुआ। इस धर्म विषय का इतना लेख बहुत सूक्ष्म है, सो कुछ तो आगे शेष होगा और कुछ उपयागी समझ कर लिखा गया, वैसे इस महान् विषय का समाप्त होना दुस्तर था।

सामान्यकर शास्त्र के विषय का विचार : पण्डित भीमसेन शर्मा

तीसरी कोटि में सामान्यकर शास्त्र के विषय को विचारना चाहिए यह लिख चुके हैं। वात्स्यायन ऋषि ने न्यायसूत्र के भाष्य में लिखा है कि ‘परस्पर सम्बद्ध प्रयोजनीय सुख के हेतु साधनों का जिसमें उपदेश किया जाय, वह शास्त्र है।’ इसी के अनुसार शास्त्र के विषय का विचार किया जाता है। प्रथम तो जानना अति आवश्यक है कि सब शास्त्र सुख तथा सुख के साधनों को प्राप्त करने की इच्छा और दुःख तथा दुःख के कारणों को छोड़ने की इच्छा को आगे कर बनाये गये, बनाये जाते और बनाये जावेंगे। इसमें सुख, सुख के कारण; दुःख, दुःख के कारण और इनकी प्राप्ति वा त्याग के भिन्न-भिन्न होने वा नाना प्रकार होने और कर्त्ताओं के भेद से शास्त्र अनेक होते हैं। और नीच प्रकृति वालों ने जो वेदविरुद्ध पुस्तक बनाये जिनमें प्रायः तमोगुण सम्बन्धी विषयों का वर्णन है। वे भी दुःख और दुःख के साधनों को प्राप्त होने की इच्छा से बनाये गये ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि सब कोई पुरुष अपने वा अन्य के लिये दुःख तथा दुःख के साधनों को नहीं चाहता। यद्यपि कोई दुष्ट नीच प्रकृति वाला मनुष्य अपने से प्रतिकूल अन्य के लिये दुःख वा दुःख के कारणों का सञ्चय करते हैं तो भी उसके लिये संसारी व्यवहार के लिये यत्न करते हैं किन्तु वैसी द्वेषबुद्धि रखकर शास्त्र बनाने से वह प्रयोजन सिद्ध होना सुगम नहीं प्रतीत होता। और जो दूसरे के मत खण्डन करना रूप उद्देश वा प्रयोजन को लेकर शास्त्र बनाया जाता है वहाँ भी अपने मत में दोष देने वाले हेतुओं के खण्डन से अपने दुःख का निवारण तथा अपने मत के गुणों के प्रकाशित करने से अपने को सुख पहुँचाना ही मुख्य प्रयोजन है। अर्थात् सब स्थलों में विचार कर देखा जाय तो अविद्याग्रस्त पुस्तक भी केवल किसी को दुःख मात्र पहुँचाने के लिये नहीं बनाये जा सकते। हां किसी समुदाय वा निज को उससे भले ही दुःख हो इसके अनेक कारण हो सकते हैं। अर्थात् सब शास्त्रों के बनाने वालों का मुख्य प्रयोजन वा विषय यही होता है कि कारणों के सहित दुःख को हटाकर सुख और सुख के साधन धनादि वस्तु प्राप्त हों। परन्तु अपना दुःख हटाकर सुख प्राप्ति का उपाय रचना सर्वत्र प्रधान रहता है, और जहाँ केवल परोकार दृष्टि से शास्त्र बनाया जाता है किन्तु उसमें किसी प्रकार के स्वार्थ का उद्देश नहीं रखा जाता वहाँ भी उस कर्म के द्वारा ईश्वर की व्यवस्था से शुभ फल की प्राप्ति होना ही स्वार्थ सिद्धि प्रयोजन है। यदि कहीं साधनों सहित सुख की प्राप्ति और दुःख को निर्मूल हटाने के लिये भी बनाया शास्त्र उस अंश में बनाने वाले के अविद्वान् होने से दुराचार का प्रवृत्त करने वाला ग्रन्थ हो जावे तो भी दुःख वा दुःख के साधनों को लेकर ग्रन्थ बनाया ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि ऐसा मन में रखकर कोई पुरुष बनाने के लिये प्रवृत्त नहीं होता इसलिये उक्त सिद्धान्त ही श्रेष्ठ है। और अज्ञानी लोगों के बनाये ग्रन्थों को शास्त्र भी इसलिये नहीं कह सकते कि वेदमूलक शिक्षा उनमें नहीं पायी जाती। और जहाँ-जहाँ वेदमूलक शिक्षा प्राप्त होती है, वहाँ-वहाँ सुखों की प्राप्ति और दुःखों के हटाने की इच्छा प्रकट दीख पड़ती है। इसलिये सब शास्त्रों का सामान्य कर सुखों की प्राप्ति और दुःखों के हटाने का कारण ही विषय वा प्रयोजन है। उसमें अवान्तर- भीतरी- अन्तरग् भेद बहुत हैं। सबके तुल्य इस मानव धर्मशास्त्र का भी सामान्य कर वही विषय है।

यद्यपि प्राणी और सुख-दुःखादि के साधनों के नाना प्रकार होने से विषयों के भी अनेक भेद होना सुगमता से ही कहा जा सकता है, तो भी सब शास्त्रों के तीन भागों में विभक्त होने से मुख्य विषय तीन ही हैं। सो न्यायसूत्र के भाष्य में वात्स्यायन ऋषि ने लिखा है कि “मन्त्र और ब्राह्मण का विषय यज्ञ, लोक के व्यवहार की व्यवस्था करना धर्मशास्त्र का विषय और संसारी मनुष्यों के वर्त्ताव वा चरित्रों का वर्णन करना वा इस जगत् की उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय का वर्णन करना इतिहास-पुराणों का विषय है।”१ इसका तात्पर्य यह है कि कर्म, उपासना और ज्ञान यही मुख्य कर वेद का विषय है। यज्ञ शब्द प्रत्येक कर्मादि के साथ सम्बन्ध रखता है। जैसे- विधियज्ञ, योगयज्ञ वा ज्ञानयज्ञ इत्यादि। योग और उपासना शब्द वास्तव में एकार्थ ही हैं। कर्म दो प्रकार का है- एक धर्म के लिये किया धर्मसम्बन्धी, द्वितीय शिल्प की सिद्धि के लिये धनसम्बन्धी कर्म है। यद्यपि इससे भिन्न अन्य कर्म भी कामादि के लिये होते हैं, तो भी मुख्य ये ही दो हैं। सब कर्म मन, वाणी और शरीर इन तीनों से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये उनके तीन भेद हैं। और सुख का हेतु शुभ कर्म तथा दुःख का हेतु अशुभ कर्म ये अन्य दो प्रकार हैं। वेदोक्त कर्म प्रायः सबका उपयोगी और स्मार्त्त कर्म वैदिक की अपेक्षा स्वार्थ साधक है। कर्म, उपासना और ज्ञान में सब विषय अन्तर्गत हैं। कोई इससे भिन्न विषय नहीं जिसका अन्य शास्त्र में विलक्षण वर्णन हो और इन तीनों का मूल वेद से है। इसलिये वेद सब विद्या और धर्मों का भण्डार है यह कहना सत्य है। ऐसा होने पर भी यदि कोई कहे कि फिर वेद से भिन्न धर्मशास्त्र का कौन विषय है ? तो उत्तर यह देना चाहिए कि वेद से भिन्न धर्मशास्त्र का विषय हमको इष्ट भी नहीं, किन्तु वेद से भिन्न उचित उपदेश का नाम धर्मशास्त्र है। जैसे मूल रूप व्याख्येय से व्याख्यान सदैव भिन्न और मिला रहता है, वैसे ही धर्मशास्त्र का विषय वेद से भिन्न-अभिन्न दोनों है। कर्म-उपासना-ज्ञानों से भिन्न कोई विषय धर्मशास्त्रों में नहीं है। इस कारण वेद से भिन्न विषय न हुआ। और कर्मादि के अवान्तर भेद होने से भिन्न है। इसी से यह व्यवहार करना बनता है कि यह श्रौत वा वैदिक तथा यह स्मार्त्त कर्म है। वेद में जो साक्षात् कहा गया वह वैदिक और वेद में जिसका मूल रूप से संकेत मात्र सूचना से उपदेश किया और स्मृतियों में जिसको कर्त्तव्य मानकर स्पष्ट विस्तार पूर्वक उपदेश किया वह स्मार्त्त कर्म कहा गया।

संसार में मनुष्य वेद की आज्ञा से विरुद्ध और उसके अनुकूल दोनों प्रकार से जगत् का प्रबन्ध चलाने के अर्थ कर्म कर सकता है। उसमें वेद की आज्ञा के पुष्ट करने वाले व्यवहार को करे, किन्तु किसी दशा में वेद से विरुद्ध आचरण न करे, यह धर्मशास्त्र का अभिप्राय है। क्योंकि यद्यपि वेद से विरुद्ध और अनुकूल दोनों प्रकार का व्यवहार हो सकता है, तो भी वेद के अनुकूल करने में कल्याण और विरुद्ध करने में अकल्याण वा दुःख प्राप्त होना सम्भव है। इसी विषय पर व्याकरण-महाभाष्यकार पतञ्जलि ऋषि ने भी लिखा है कि- एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति।1 अर्थात् वेद की आज्ञा के अनुकूल करना कल्याण का हेतु होता है। और इस प्रकार किया हुआ व्यवहार वेद के अनुकूल तथा इस प्रकार वेद से विपरीत होगा, यही विषय मुख्यकर धर्मशास्त्रों में वर्णन किया गया है। वेद के अनुकूल किया व्यवहार ही सुख का देने और दुःख का नाश करने वाला होता है।

अब एक शटा लोगों को और भी उपस्थित हो सकती है कि जब सब शास्त्र तीनों ही प्रकारों में हैं। जैसा कि पूर्व [श्रुति, स्मृति, इतिहासादि नाम से] लिखे गये, तो छह दर्शन२ और उपवेद३ आदि ग्रन्थों की क्या दशा होगी ? अर्थात् क्या षड्दर्शनादि शास्त्र नहीं, और हैं तो इनका विषय क्या है ? आजकल सामान्यकर शास्त्र शब्द के व्यवहार करने से मुख्य तो ये ही समझे जाते हैं, वेद तथा स्मृतियाँ वैसे शास्त्र नहीं समझे जाते ? इसका उत्तर यह है कि वेदार्थ का विशेष प्रचार करने के लिये वा वैदिक सिद्धान्त में पड़ने वाले विघ्नों को हटाने के लिये ऋषि-महर्षि- महात्मा लोगों ने जो-जो शास्त्र वेद का आशय लेकर परोपकारार्थ बनाये वे सब   धर्मशास्त्र वा स्मृति शब्द करके लोक में वा शास्त्रकारों की मार्यादा में प्रचरित हैं किन्तु मनुस्मृति आदि [कि जिनको आजकल लोग १८ वा २८ स्मृति कहते हैं] पद्य ग्रन्थों में स्मृति शब्द रूढि रूप से बंधा नहीं है, किन्तु कपिल की स्मृति सांख्य शास्त्र, योगस्मृति- पातञ्जल योगशास्त्र इत्यादि शब्दों से शटर स्वामी ने भी शारीरक मीमांसा में व्यवहार किया है। और वैसे ही अन्य सूत्रकार वा भाष्यकार स्मृति शब्द से व्यवहार करते ही हैं, यह बात विद्वानों को छिपी नहीं है। और मुख्य कर तो शास्त्र एक वेद है पर उसके व्याख्यान रूप भी ग्रन्थ स्मृति नामक शास्त्र है। इसलिये दो प्रकार के शास्त्र मुख्य कहे जाते हैं। एक श्रुति- वेद, द्वितीय स्मृति धर्मशास्त्र हैं। किन्तु इतिहास-पुराण वास्तविक शास्त्र नहीं हैं। किसी समयविशेष में उत्पन्न हुए मुख्य शिष्ट सज्जन पुरुषों का चरित्र वर्णन करने से इतिहास-पुराण किसी प्रकार साधारण बुद्धि वाले मनुष्यों को बोधित करते हैं। इससे वे सर्वथा व्यर्थ नहीं हैं। परन्तु उन इतिहासादि में जो धर्मसम्बन्धी उपदेश हैं वे यदि वेदमूलक हैं तो वे अंश धर्मशास्त्रों में अन्तर्गत हो जायेंगे। और यदि वेद से विपरीत हों तो वे अंश त्यागने योग्य हैं। यह सब विद्वानों वा शास्त्रकारों के सम्मत है।     धर्म का सेवन और अधर्म का त्याग करने वालों के लिये इतिहास-पुराण एक दृष्टान्त रूप हैं। अर्थात् सप्रयोजन होना हम खण्डित नहीं करते। अब इस सब कथन से सिद्ध हो चुका कि कर्म-उपासना-ज्ञान ही सामान्य कर सब शास्त्रों का विषय है। उन कर्मादि के उपदेश का मूल वेद है और ऋषियों के बनाये स्मृति नामक ग्रन्थ व्याख्यान रूप हैं। और इन कर्म-उपासना-ज्ञान को ही धर्म कहते हैं।

कब और किसने इस मनुस्मृति को पुस्तकाकार में बनाया ? पण्डित भीमसेन शर्मा

मनु कौन है इसका प्रतिपादन करके अब द्वितीय प्रकरण का विचार किया जाता है कि किस समय, किसलिये, किस पुरुष ने यह धर्मशास्त्र बनाया ? लोक में मनुस्मृति वा मानव धर्मशास्त्र नाम से यह पुस्तक प्रचरित है। इसका अभिप्राय यह है कि मनु अर्थात् ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में सब वेदों का अनुसन्धान- पूर्वापर विचार करके संसार के व्यवहार की व्यवस्था करने और अच्छे आचरणों का प्रचार करने के लिये सूत्रादि रूप वाक्यों में धर्म का उपदेश किया, किन्तु उस समय कुछ भी विषय पुस्तकाकार से लिखा नहीं गया था। उस उपदेश को शास्त्र करके मानना वा कहना विरुद्ध इसलिये नहीं है कि शास्त्रशब्द का व्यवहार लेखनक्रिया की अपेक्षा नहीं रखता। महर्षि वात्स्यायन जी ने न्याय सूत्र के भाष्य में शास्त्र का लक्षण भी यही किया है कि ‘परस्पर सम्बन्ध रखने वाले अर्थसमूह का उपदेश शास्त्र है।’१ इससे लिखे वा छपे पुस्तक का नाम शास्त्र नहीं आता। मनु नाम ब्रह्मा जी ने वेद के अर्थ का अनुसन्धान करके वेद को मूल मानकर व्यवहार की व्यवस्था करने के लिये जो विचार किया वह मनुस्मृति कहाती है। और मनु नाम ब्रह्मा जी ने सृष्टि के आरम्भ में कहा मानव धर्म उसका उपदेश जिसमें है, वह पद और वाक्यादि रूप मानवधर्म शास्त्र कहाता है। अथवा मनु जी के अनुभव से सिद्ध हुआ मानवधर्म, वह जिसमें कहा गया, वह मानवधर्मशास्त्र कहाता है। प्रोक्तार्थ में प्रत्यय करने से प्रतीत होता है कि मानवधर्म का मूल वेद है। क्योंकि किसी सनातन धर्मशास्त्र का आश्रय लेकर शास्त्र बनाया जाय, उसी में प्रोक्त प्रत्यय होता है। इसी कारण प्रोक्ताधिकार२ के पीछे ‘कृते ग्रन्थे3 प्रकरण पाणिनि ने रखा है। और प्र उपसर्ग पूर्वक वचधातु४ से सिद्ध हुए प्रयोगों की पढ़ाने, प्रचार करने, विशेष लुप्त हुए शास्त्रों को निकाल कर चलाने और प्रकारान्तर से व्याख्यान कर सबको जताने, अर्थ में यथासम्भव प्रवृत्ति होती है। यह महाभाष्यकार पतञ्जलि महर्षि का आशय५ प्रोक्ताधिकार के व्याख्यान से प्रतीत होता है। ऐसा मानने से ही वेदों की संहिता के माध्यन्दिनीय और वाजसनेयी आदि नाम निर्दोष बन सकते हैं। अर्थात् माध्यन्दिन, वाजसनेय आदि ऋषियों के नाम से वेद की संहिताएं प्रसिद्ध हैं। इसका अभिप्राय यही है कि जिन-जिन ऋषि जनों ने उन-उन संहिताओं का विशेषकर अध्यापन वा उपदेश आदि द्वारा प्रचार कराया उन-उन के नाम से वे-वे पुस्तक प्रचरित हो गये। किन्तु उन पुस्तकों को ऋषियों ने बनाया नहीं। यदि प्रोक्त अधिकार को नवीन कृत्य माना जावे तो ‘कृते ग्रन्थे’ प्रकरण पुनरुक्त होने से व्यर्थ हो जावे, इस कारण प्रोक्त का वही अर्थ ठीक है कि जो ऊपर लिखा गया है।

पहले सृष्टि के आरम्भ में गुरु-शिष्य की निरन्तर चलने वाली परम्परा के साथ वाक्य, पद और मन्त्ररूप से ही वेदों के उपदेश का प्रचार चलता था। एक ने अपने गुरु से यथावत् सुनकर अन्य अपने शिष्यों को किया। इस प्रकार वेद और धर्मशास्त्र सम्बन्धी सूत्रादि रूप वाक्य सब पढ़ने-पढ़ाने वालों को कण्ठस्थ रहते थे। और शास्त्र के कण्ठस्थ होने से पढ़ने-पढ़ाने वालों को विद्या का जैसा ह्ल ल होना सम्भव है वैसा पुस्तकस्थ पाठ से नहीं हो सकता। इस पर किसी विचारशील पुरुष ने कहा है कि- ‘पुस्तक में पड़ी विद्या और पराये हाथ में गया धन, ये दोनों ही समय पर उपयोगी नहीं होते।’1 इससे विचारशीलों को जान लेना चाहिये कि कण्ठस्थ करना सर्वोत्तम है। ऐसा विचार के ही उस समय के लोगों ने लिखने की प्रवृत्ति नहीं चलाई थी। क्योंकि यदि पुस्तकें लिखी जावें तो विद्यार्थी ‘पुस्तकस्थ अपने पाठ को यथावकाश हम देख सकते हैं’, ऐसा मानकर शास्त्र को कण्ठस्थ न करेंगे, ऐसा विचार के लेखन प्रक्रिया का चलाना हानिकारक समझते थे। और यह कदापि कहना ठीक नहीं बनता कि उस समय के लोगों को लिखने का सामान नहीं मिला अथवा उनको लेखन क्रिया ज्ञात नहीं थी। क्योंकि वेद द्वारा परमेश्वर ने सब क्रियाओं का उपदेश पहले ही किया है।२ जैसी लिखने की परिपाटी इस समय है वैसी पहले न हो, यह हो सकता है, तो भी अभाव नहीं कह सकते। क्योंकि अभाव से भाव नहीं होता। किन्तु संसार के कार्यों का प्रकार बदलता रहता है। इसी के अनुसार पूर्वकाल में अन्य प्रकार का लिखना था। अर्थात् पुस्तकें नहीं लिखी जाती थीं, तो भी भित्ति आदि पर प्रतिबिम्ब रखना, वस्त्रों पर अनेक चित्र काढ़ना या छापना वा किसी में मोहर लगाना वा किसी को अटित करना इत्यादि सब काम लिखने के अन्तर्गत ही समझे जाते हैं। और जब पूर्वकाल सृष्टि के आरम्भ में ही अकारादि वर्णों की आकृति विद्वान् लोगों ने बनाई, तो ह्लि र लेखन- क्रिया नहीं थी, यह कहना ठीक नहीं, किन्तु अपने ही कथन को काटना है। अब यह प्रकरणान्तर है इसलिये इस पर विशेष न लिखकर मुख्य प्रकरण की बात करनी चाहिये। अर्थात् पहले सृष्टि के आरम्भ में शास्त्रों को पुस्तकाकार में लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी, यह बहुत कारणों से प्रतीत होता है।

सृष्टि के आरम्भ में शास्त्र भी बहुत नहीं थे, किन्तु वेद से भिन्न कोई ही शास्त्र बना था, उन थोड़ों का कण्ठस्थ करना भी सहज ही था। और जो वेद से भिन्न धर्मसूत्रादि रूप से शास्त्र बने थे, वे छोटे-छोटे थे, इस कारण उनका कण्ठस्थ करना सुलभ था। पीछे जब धीरे-धीरे समय के अनुसार व्यवहार चलाने और वेद के आशय का विशेष प्रचार कराने के लिए आवश्यकता के अनुसार विद्वान् लोगों ने अन्य शास्त्र बनाये तब अनेक शास्त्रों के बढ़ जाने से कण्ठस्थ करना दुस्तर था, इस कारण क्रमशः विद्याधर्मादि का न्यून सेवन हो सकने की शटा से आगे होने वाले शक्तिहीन पुरुषों के उपकार के लिए बने हुए शास्त्र पुस्तकाकार किये गये।१ पहले समय में सत्त्व गुण के प्रचार की अधिकता से रजोगुणी पुरुष बहुत नहीं थे।२ और सत्त्वगुणी पुरुषों का यह स्वाभाविक धर्म है कि वे अपना नाम प्रसिद्ध करने के लिए विशेष प्रयत्न न करके अन्य प्रथमोपदेष्टा पुरुषों के नाम से ही अपने निमित्तमात्र कामों को भी प्रचरित करते थे। वैसे ही यह मनुस्मृति सृष्टि के आरम्भ में सूत्रादिस्थ वाक्यरूपों से मनु जी ने उपदेश की, उसके पीछे भृग जी ने अपने शिष्यों को उपदिष्ट की और भृगु जी ने ही पद्यरूप से क्रमबद्ध आकार में बनायी।

कोई लोग कहते हैं कि भृगु के किसी शिष्य ने यह पुस्तक बनाया और ऐसा मानने पर ही ‘स्वयम्भुवे0’ [अमित तेज वाले स्यम्भू ब्रह्मा जी को नमस्कार करके, मनु के द्वारा प्रणीत विविध शाश्वत धर्मों को कहूँगा।] यह प्रारम्भ में धरा गया किन्हीं-किन्हीं पुस्तकों में प्राप्त होने वाला श्लोक सार्थक हो सकता है। सो यदि इस पक्ष को सत्य माना जावे कि भृगु के किसी शिष्य का बनाया यह मनुस्मृति पुस्तक है, तो जिनका मत है कि भृगुप्रोक्त यह संहिता है, वह विरुद्ध पड़ेगा। और यह श्लोक भी सब पुस्तकों में नहीं मिलता। इससे इसका एकदेशी होना सिद्ध ही है। तथा व्यूलर ने भी यही कहा है कि कहीं-कहीं मिलने वाला यह श्लोक पीछे किन्हीं लोगों ने मिलाया है। यदि यह श्लोक पहले से होता तो सब पुस्तकों में मिलना चाहिए था। इससे अधिकांश सम्मति के अनुसार मेरी भी सम्मति यही है कि यह पुस्तक भृगु का बनाया है और ‘स्वयम्भुवे0’ यह श्लोक किन्हीं का पीछे से मिलाया हुआ है। भृगु के द्वारा बनाया होने पर भी सृष्टि के आरम्भ में मनु ही इस धर्म के आशय के प्रवर्त्तक हैं, कि जिसको मैंने श्लोकबद्ध किया। मेरा कुछ इनमें नवीन कृत्य नहीं, ऐसा मन में विचार के उन्होंने मनु के नाम से ही प्रचरित की, और यह बात सत्य भी है। क्योंकि ऐसा होने पर ही वेदों को ईश्वर का वाक्य कह सकते हैं अर्थात् ईश्वर का ज्ञान मात्र वेद हैं, उसने पुस्तकाकार वेद नहीं बनाये। किन्तु महर्षि लोगों ने पुस्तकाकार किये हैं। तो भी परमात्मा से वेद उत्पन्न हुए, ऐसा कहा वा माना जाता है। किन्तु किसी महर्षि ने वेद बनाये, ऐसा प्रसिद्ध नहीं। इसी प्रकार मनु नामक ब्रह्मा ने इसका स्मरण किया और भृगु ने विशेषदशा में पद्यरूपाकार से बनाया। तो भी जैसा मनु ने स्मरण किया था, वही आशय पुस्तकाकार में लाया गया, इसलिये इस पुस्तक को मनुस्मृति कहना वा मानना ठीक ही है, किन्तु निरर्थक नहीं। तथा अन्य स्मृतियों का पीछे बनना, आधुनिक होना, उन-उन के आशयों और उनमें इसी का अनुवाद दीख पड़ने से प्रतीत होता है। और यह मनुस्मृति पुरानी है, तो भी जहां-तहां बीच-बीच में इतिहासादि सम्बन्धी अनेक श्लोक किन्हीं मतवादियों ने मिला दिये हैं, इससे अत्यन्त नवीन प्रतीत होती है। ऐसी ही बातों को देखकर व्यूलर साहब को भी भ्रान्ति हो गई, जिससे उन्होंने इसको अतिनवीन ठहराया है। उनको भ्रान्ति होने में अनुमान से यह भी कारण जान पड़ता है कि जैसे ईसाई मत अतिनवीन है, इससे थोड़ा इधर-उधर तक का समाचार उन्होंने लगा पाया है। जैसे दो-तीन सहस्र वर्ष से पूर्व हमारे मत या कुटुम्ब के नाम तक का पता नहीं, वैसे ही अन्य भी कोई मत पहले नहीं था। इन लोगों के मत वा सिद्धान्त से चार, पांच वा छह सहस्र वर्षों के पूर्व सृष्टि भी नहीं थी और न कोई शास्त्र था। परन्तु यह उन लोगों का विचार ठीक नहीं, क्योंकि इस आर्यावर्त्त देश में सूर्यसिद्धान्त नामक एक पुस्तक है जो वर्तमान इस चतुर्युगी के त्रेतायुग में बनाया गया। उसमें स्पष्ट लिखा है कि इस अट्ठाईसवीं चतुर्युगी में से अब तक केवल सद्युग बीत गया। उस पुस्तक को बने कई लाख वर्ष बीत गये। इसी प्रकार उससे भी अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें इस देश में हैं। तथा काल का परिमाण, काल के अवयवों का वर्णन और कल्प तथा प्रलयादि का वर्णन सूर्यसिद्धान्तादि आर्यों के पुस्तकों में मिलता है। उससे सिद्ध है कि इस सृष्टि को उत्पन्न हुए अरब से ऊपर-ऊपर वर्ष बीत चुके हैं। तब से लेकर क्या मनुष्य विद्या, धर्म आदि से रहित ही थे, और ऐसा कथन कोई बुद्धिमान् मान सकता है ? कदापि नहीं। यदि कोई सनातन ईश्वर माना जावे, तो उसने सृष्टि के आरम्भ में ही मनुष्यों को कुछ ज्ञान दिया, ऐसा मानना चाहिये। अन्यथा परमेश्वर में दोष आवेगा। और परमेश्वर के किसी काम में भूल है नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि मनुस्मृति भी सृष्टि के आरम्भ से ही रूपान्तर में थी, वह कुछ काल पीछे भृगु ने पद्यरूप में बनायी। तब मनु जी के अभिप्रायानुकूल होने से मनुस्मृति नाम रखा गया। इस आर्यावर्त्त देश में पहले श्लोक बनाने की परिपाटी वा ज्ञान नहीं था यह भी किसी का मानना वा कहना सम्भव नहीं। क्योंकि वेद में सब प्रकार की छन्दरचना प्रत्यक्ष दीखती है। जब वेद में परमेश्वर ने श्लोक बनाने की प्रक्रिया पहले ही दिखा दी है, तो उन्हीं वेदों के पढ़ने-पढ़ाने-जानने और प्रचार करने वाले ब्रह्मादि लोग श्लोक-रचना की रीति न जानते हों, यह कदापि सम्भव नहीं। परन्तु यह सत्य है कि प्रायः उस समय के लोग आजकल के तुल्य श्लोक-रचना नहीं करते थे। उसका अभिप्राय यह था कि बहुत अर्थ जिसमें से निकले ऐसा छोटा शास्त्र बने, ऐसी लाघवबुद्वि से थोड़े अक्षरों तथा गम्भीर वा बहुत अर्थ वाले सूत्ररूप ग्रन्थों को प्रायः रचते थे। जिससे विद्यार्थी लोग ब्रह्मचर्य आश्रम के समय में ही सब शास्त्रों को पढ़ सकें। पर तो भी सर्वथा पद्यरचना का अभाव नहीं था, अर्थात् कोई-कोई श्लोकबद्ध भी शास्त्र बनाते थे। जैसे भृगु जी ने यह स्मृति बनायी वा जैसे त्रेतायुग में सूर्यसिद्धान्त पद्यरूप से बनाया गया। अब यह सिद्ध हो गया कि सृष्टि के आरम्भ में वेद के आश्रय से सांसारिक व्यवहार को ठीक व्यवस्था चलाने के लिये सूत्रादि वाक्यरूपों से मनु जी ने इस स्मृति का उपदेश किया, उसके पीछे भृगु ने श्लोकरूप से बनाया। जैसे इस समय बनने वाले पुस्तकों में संवत्सर का नाम रखा जाता है कि अमुक संवत् में अमुक पुरुष ने यह पुस्तक बनाया, वैसी परिपाटी पहले नहीं थी और कदापि हो तो भी किन्हीं लोगों ने पीछे नष्ट कर दी। इसी से किस संवत् में यह पुस्तक बना, यह कहना नहीं बन सकता। तो भी अनुमान से हम जान सकते हैं कि इस कल्प में संसार की उत्पत्ति होने के पश्चात् परमेश्वर से वेद का उपदेश पाकर अन्य शास्त्र बनने से पूर्व ही मनु जी ने पहले इस धर्मशास्त्र का उपदेश किया। उस समय यह धर्मशास्त्र पुस्तकाकार से नहीं लिखा था। पीछे अनुमान से दो सौ वर्ष के भीतर भृगु जी ने श्लोक रूप से बनाया। उसके पीछे कुछ काल बीतने पर किन्हीं अन्य ऋषि लोगों ने पुस्तकाकार किया। उससे पूर्व श्लोकरूप का ही निरन्तर चलने वाली गुरु-शिष्य की पठन-पाठन प्रणाली से प्रचार था। और प्रचार के अनुसार ही पहले लिखी गयी। पीछे कहीं-कहीं बीच में किन्हीं लोगों ने कुछ-कुछ मिला दिया यही इस प्रसग् में मुख्य और दृढ़ सिद्धान्त है।

और यदि किसी प्रकार व्यूलर साहब आदि के कहने के अनुसार किसी ने दो सहस्र वर्ष के भीतर ही इस धर्मशास्त्र को बनाया, ऐसा सिद्धान्त ठीक हो तो भी हमारा मत यह है कि यदि इस पुस्तक में अन्य स्मृतियों की अपेक्षा गम्भीराशय के साथ पक्षपात को छोड़ के वेदानुकूल वर्णाश्रमादि धर्म का वर्णन किया गया है और अन्य-अन्य प्राप्त होने वाली स्मृतियों में वैसा धर्म का उपदेश नहीं प्राप्त होता है तो वेद के अनुकूल होना ही इस मानवधर्मशास्त्र की उत्तमता में हेतु होगा। यह सब सज्जनों का मत है कि जो वेदानुकूल है, वही श्रेष्ठ है। और यदि किसी प्रकार इसका नवीन बनना सिद्ध हो जावे, तो भी मनुस्मृति नाम रखना विरुद्ध नहीं है। क्योंकि कारण के बिना जब कोई कार्य नहीं होता तो मनु जी ने उपदेश किया सूत्रादि वाक्याकार पुरातन धर्म गुरु-शिष्य की परम्परा से प्रचरित चला आता था, उसी के आश्रय से किसी विद्वान् ने श्लोकरूप से बनाया उसमें भी आदि कर्त्ता मनु की प्रधानता से मनुस्मृति कहना सम्भव है। और इसको आधुनिक मानना हमारा पक्ष नहीं है किन्तु अन्य लोगों के समयानुसार किसी प्रकार कोई इसको आधुनिक मान लें तो भी समूलक वा वेदमूलक होने से प्रशंसा के योग्य अवश्य माननी चाहिये, यह अभिप्राय है। और मैंने तो अपनी सम्मति पूर्व ही लिख दी है।