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डॉ अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति एवं आर्य (हिन्दू) साहित्य के विरोध के कारण और उनकी समीक्षा: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

डॉ. अम्बेडकर के समग्र वाङ्मय को पढ़ने के उपरान्त यह निष्कर्ष सामने आता है कि डॉ0 अम्बेडकर आरभ में प्राचीन भारतीय साहित्य के शोधात्मक और समीक्षात्मक ध्येय को लेकर चले थे और वे प्राचीन समाजव्यवस्था की मौलिकता को, विशेषतः उस अवस्था में शूद्रों की वास्तविक स्थिति को पाठकों के समक्ष रखकर जातिवादी समाज में विचार-परिवर्तन करना चाहते थे। यह उनका पहला चरण था। फिर दूसरा चरण शुरू हुआ जिसमें अकस्मात् उनका ध्येय घोर विरोधी स्वर में परिवर्तित हो गया और वे उसी को अपना पक्ष मानकर केवल खण्डनात्मक व प्रतिशोधात्मक लेखन करने लगे। इसके कुछ मनोवैज्ञानिक एवं परिस्थितिजन्य कारण रहे हैं।

डॉ0 भीमराव रामजी अम्बेडकर का जब जन्म हुआ, उस समय पौराणिक हिन्दू समुदाय जन्मना जाति-पांति, ऊंच-नीच, छूआछूत, सामाजिक भेदभाव जैसी कुप्रथाओं से ग्रस्त था। उसके कारण उन्होंने अपने जीवन में अनेक भेदभावपूर्ण असमानताओं, अन्यायों, उपेक्षाओं और यातनाओं को भोगा। यह स्वाभाविक ही है कि प्रत्येक जागरूक एवं स्वाभिमानी व्यक्ति के मन में ऐसे व्यवहार के प्रति आक्र ोश जन्म लेता है। डॉ0 अम्बेडकर के मन में ऐसे व्यवहार की प्रतिक्रिया में आक्रोश का एक स्थायी भाव बन गया था। उन्होंने जिन-जिन कारणों को इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था का उत्तरदायी समझा, उनके प्रति उनका आक्रोश विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ। उनका यह आक्रोश जीवनभर बना रहा और अवसर पाकर प्रकट होता रहा। दलितों के साथ गत दो-तीन सहस्रादियों में जो व्यवहार हुआ वह सर्वथा अमानवीय और निन्दनीय था। अब उसमें कठोरता से सुधार किया जाना चाहिए। किन्तु विगत व्यवहार के प्रति प्रतिशोधात्मक भावना रखकर वैसा व्यवहार करना भी उतना ही अनुचित है। प्रतिशोधात्मक भावना से सुधार की आशा रखना व्यर्थ है जबकि वर्गविद्वेष की आशंका का पनपना निश्चित है। यदि यह स्थिति बनेगी तो वह निश्चित रूप से समाज और राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होगी। अतीत के व्यवहार का प्रतिशोध लेना वर्तमान में कभी संभव नहीं हो सकता, हाँ, स्थिति में सुधार अवश्य संभव हो सकता है।

डॉ0 अम्बेडकर जैसे सुशिक्षित लेखकाी आक्रोश के इतने वशीभूत हो गये कि वे प्रतिशोधात्मक प्रतिक्रिया से बच नहीं सके। आगे उन्हीं कारणों पर विचार किया जा रहा है।

  1. सत्य के शोध का दावा : केवल दिाावा

डॉ0 अम्बेडकर के आरभिक लेखन में यह दावा प्राप्त होता है कि वे प्राचीन भारतीय साहित्य का अध्ययन-मनन-अन्वेषण करके उसमें वर्णित समाजव्यवस्था के मौलिक स्वरूप को और शूद्रों की प्राचीन स्थिति को पाठकों के सामने रखकर यह बताना चाहते हैं कि वर्तमान में जो व्यवस्था और व्यवहार प्रचलित है यह एक विकृत रूप है और उसको सुधारा जाना जरूरी है। डॉ0 अम्बेडकर अपने ध्येय को इस प्रकार स्पष्ट करते हैं-

(क) ‘‘मैंने एक इतिहासवेत्ता की हैसियत से अनुसन्धान किया है। इतिहासवेत्ता धार्मिक पुस्तकों और अन्य पुस्तकों में कोई भेद नहीं मानते। उनका काम तो सत्य की खोज है।’’

‘‘इतिहासवेत्ता का तरीका दूसरा है। इतिहासवेत्ता को सही, निष्पक्ष, निष्काम, बेधड़क और सत्य का प्रेमी होना चाहिए। उसको निष्पक्षभाव से छोटी से छोटी चीज की जांच करनी चाहिए। अपने अनुसन्धान में मैंने अपने को निष्पक्ष रखा है।’’(शूद्रों की खोज, प्राक्क्थन, पृ0 5-6, समता प्रकाशन नागपुर)

(ख) ‘‘इस आलेख का प्राथमिक उद्देश्य यह बताना है कि अनुसन्धान का सही मार्ग कौन-सा है, ताकि एक सत्य उजागर हो। हमें इस विषय के विश्लेषण में पक्षपातरहित रहना है। भावनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, बल्कि इस विषय पर वैज्ञानिक और निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 1, भारत में जातिप्रथा, पृ0 36)

    समीक्षा-सत्य के अनुसन्धान का यह दावा कुछ सीमा तक ‘हू वर द शूद्राज्?’ (शूद्रों की खोज) नामक पुस्तक में सही माना जा सकता है। उसके बाद रचे गये साहित्य में यह दावा कहीं सत्य नहीं दिखायी पड़ता। पाठक देख रहे हैं कि डॉ0 अम्बेडकर का प्रायः सारा लेखन भावनात्मक विरोध पर टिका हुआ है। वह भी निष्पक्ष न होकर एकपक्षीय है। उसमें ‘विरोध के लिए विरोध’ का लक्ष्य स्पष्ट झलकता है। डॉ0 साहब सत्य-अनुसन्धान और निष्पक्ष विचार की प्रतिज्ञा को नहीं निभा सके। सत्य-अनुसन्धान का लक्ष्य राह में ही कहीं भटक गया? इसकी आड़ में उन्होंने केवल विरोध ही विरोध किया है। यह दावा केवल दिखावा बन कर रह गया है।

  1. दलित राजनीति के लिए मनु और मनुस्मृति का अन्धविरोध

ऐसा प्रतीत होता है कि डॉ0 अम्बेडकर के आक्रोशपूर्ण मानस को केवल शोधात्मक समालोचना से सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने स्वयं को दलितों के संरक्षक और सामाजिक नेता के रूप में स्थापित करना आरभ किया। तब वे शोधात्मक समीक्षा को छोड़कर विरोधात्मक आलोचना पर उतर आये। इस दूसरे स्तर पराी वे वैदिक साहित्य तथा वैदिक वर्णव्यवस्था को अपेक्षाकृत उपयोगी एवं तर्कसमत मानते रहे। जातिवाद और उसके उतरदायी घटकों का, विशेषतः मनु और मनुस्मृति का उन्होंने एकपक्षीय विरोध करना आरभ कर दिया। ब्राह्मणवाद पर उन्होंने तीखे प्रहार करने शुरू किये और ब्राह्मणवाद को ही जातिवाद का जनक एवं उत्तरदायी माना। मनुस्मृति को डॉ. अम्बेडकर ने केवल इसी पहलू से देखा और समझा था, इस कारण मनु और मनुस्मृति के अन्धविरोध को उन्होंने अपना लक्ष्य बना लिया। वे स्वयं अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

(क) ‘‘मुझ पर मनु का भूत सवार है और मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि मैं उसे उतार सकूं। वह शैतान की तरह जिन्दा है।’’ (डॉ0 अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड 1, पृ0 29)

(ख) ‘‘भारत के विधिनिर्माता के रूप में यदि मनु का कोई अस्तित्व रहा है, तो वह एक ढीठ व्यक्ति रहा होगा।……..यदि वह क्रूर न होता, जिसने सारी प्रजा को दास बना डाला, तो ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि वह अपना आधिपत्य जमाने के लिए इतने अन्यायपूर्ण विधान की संरचना करता, जो उसकी ‘व्यवस्था’ में साफ झलकता है।’’ (अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय, खंड 1, पृ0 29)

(ग) ‘‘सामाजिक अधिकारों के सबन्ध में मनु के कानून से ज्यादा बदनाम और कोई विधि-संहिता नहीं है।’’ (वही खंड 1, पृ0 85 तथा वही, खंड 6, पृ0 93)

(घ) ‘‘मनु एक ऐसा भाड़े का दलाल था, जो एक विशेष समुदाय में जन्मे लोगों के स्वार्थ की रक्षा करने के लिए रखा गया था।’’ (वही, खंड 6, पृ0 100)

(ङ) ‘‘नीत्शे की तुलना में मनु के महामानव का दर्शन अधिक नीच तथा भ्रष्ट है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 101)

पाठक अब इन कथनों को ध्यान से पढें

(च) ‘‘एक बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मनु ने जाति के विधान का निर्माण नहीं किया और न वह ऐसा कर सकता था। जातिप्रथा मनु से पूर्व विद्यमान थी। वह तो उसका पोषक था।’’ (वही, खंड 1, पृ0 29)

(छ) ‘‘कदाचित् मनु जाति के निर्माण के लिए जिमेदार न हो, परन्तु मनु ने वर्ण की पवित्रता का उपदेश दिया है।…….वर्णव्यवस्था जाति की जननी है और इस अर्थ में मनु जातिव्यवस्था का जनक न भी हो परन्तु उसके पूर्वज होने का उस पर निश्चित ही आरोप लागया जा सकता है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 43)

(ज) ‘‘तर्क में यह सिद्धान्त है कि ब्राह्मणों ने जाति-संरचना की।’’ (वही, खंड 1, पृ0 29)

(झ) ‘‘जातिव्यवस्था का जनक होने के कारण विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के लिए मनु को स्पष्टीकरण देना होगा।’’ (वही, खंड 7, पृ0 57)

(ञ) ‘‘मनु ने जाति का सिद्धान्त निर्धारित किया है।’’ (वही, खंड 7, पृ0 228)

    समीक्षा-उक्त वाक्यों में हृदय का सच फूट पड़ा है। वस्तुतः डॉ0 अम्बेडकर पर मनु का भूत सवार हो चुका था। भूत सवार होने पर मनुष्य की असामान्य मनःस्थिति, असंतुलित विचार, अनिश्चयात्मक समीक्षा और अस्थिर चित्त हो जाते हैं। उपर्युक्त उद्धरणों में तीन-तीन परस्पर-विरोध हैं और मनु के लिए अपशदों की बौछार है। कोई भी कथन निश्चयात्मक नहीं, जिसको प्रामाणिक माना जा सके। यह केवल अविचारित और अन्धविरोध मात्र है। विडबना देखिए, एक ही मुंह से तीन-तीन बातें कही गयी हैं-1. मनु जातिनिर्माता नहीं, 2. मनु जातिनिर्माता है, 3. जातिनिर्माता ब्राह्मण हैं।

प्रश्न यह है कि यदि मनु जातिनिर्माता नहीं हैं और ब्राह्मण जातिनिर्माता हैं तो मनु का अन्धविरोध और अपमान क्यों किया गया है? यह ऐतिहासिक तथ्य है कि सभी चौदह मनु क्षत्रिय थे, ब्राह्मण नहीं; अतः उन पर ब्राह्मण या ब्राह्मणवादी होने का मिथ्या आरोप कैसे लग सकता है? स्वायंभुव मनु एक चक्रवर्ती सम्राट् था, अतः किसी का ‘भाड़े का दलाल’ भी नहीं हो सकता। यदि यह कथन मनु सुमति भार्गव (185 ई0 पूर्व) के लिए है तो उस बात को स्पष्ट करना चाहिए था। वह मनुस्मृति का रचयिता है ही नहीं। उसके कारण प्राचीन आदरणीय मनुपरपरा का अपमान करना एक साहित्यिक अपराध है। पाठक देख सकते हैं कि उपर्युक्त वाक्यों में कितनी आक्रोशपूर्ण और प्रतिशोधात्मक भावना भरी है। यह किसी सत्यानुसन्धाता या साहित्यिक समीक्षक का लेखन-स्तर नहीं कहा जा सकता।

पूर्व अध्यायों के उद्धरणों में डॉ. अम्बेडकर ने स्पष्ट शदों में स्वीकार किया है कि वर्णव्यवस्था की रचना वेदों से हुई। मनु इसके निर्माता नहीं, केवल प्रसारक हैं। वेदों की वर्णव्यवस्था गुण-कर्म-योग्यता पर आधारित है, जो बुद्धिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है। वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था परस्परविरोधी हैं। मनु जातिव्यवस्था के निर्माता भी नहीं हैं। इस प्रकार मनु वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था, दोनों के निर्माता के आरोप से मुक्त हो जाते हैं। वर्णव्यवस्था के पोषक होने के कारण उन पर यह भी आरोप नहीं बनता कि उन्होंने जन्मना जातिवाद का पोषण किया। यदि वर्णव्यवस्था बुद्धिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है, तो अव्यवस्था के समय में व्यवस्था का पोषण करके उन्होंने उत्तम कार्य ही किया है, अपराध नहीं किया। मनु वैदिक धर्मावलबी होने से वेदों को परमप्रमाण मानते हैं। अपने धर्मग्रन्थों के आदेशों का पालन करते हुए उन्होंने उसकी अच्छी व्यवस्थाओं का प्रचार-प्रसार किया तो यह कोई दोष नहीं। सभी धर्मावलबी ऐसा करते हैं। बौद्ध बनने के बाद डॉ. अम्बेडकर ने भी बौद्ध विचारों का प्रचार-प्रसार किया है। यदि उनका यह कार्य उचित है, तो मनु का भी उचित था। इतनी स्वीकारोक्तियां होने के उपरान्त भी, आश्चर्य है, कि अपने ही कथनों के विरुद्ध जाकर डॉ. अम्बेडकर मनु को स्थान-स्थान पर जातिवाद का जिमेदार ठहरा कर उनकी निन्दा करते हैं। परवर्ती सामाजिक व्यवस्थाओं को मनु पर थोपकर उन्हें कटु वचन कहना कहां का न्याय है?

संविधान में पचास वर्षों में छियासी के लगभग संशोधन किये जा चुके हैं, जिनमें कुछ संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल हैं, जैसे-अंग्रेजी की अवधि बढ़ाना, आरक्षण की अवधि बढ़ाना, मुसलमानों में गुजाराभत्ता की शर्त हटाना आदि। क्या इन परवर्ती संशोधनों का, और भावी संशोधनों का जिमेदार डॉ. अम्बेडकर को ठहराया जा सकता है? यदि नहीं, तो हजारों वर्ष परवर्ती विकृत-व्यवस्थाओं के लिए मनु को जिमेदार कैसे ठहराया जा सकता है?

जो यह कहा गया है कि ‘अकेला मनु न तो जातिव्यवस्था को बना सकता था और न लागू कर सकता था।’ यह तो स्वयं ही डॉ. अम्बेडकर ने मान लिया कि इन दोनों बातों के लिए मनु जिमेदार नहीं है। डॉ0 अम्बेडकर के अनुसार, इसका अर्थ यह निकला कि पहले से ही समाज में वर्णव्यवस्था प्रचलित थी और समाज ने उसे स्वयं स्वीकृत किया हुआ था। वह लोगों के दिल-दिमाग में रची-बसी व्यवस्था थी, लोगों द्वारा उत्तम मानी हुई व्यवस्था थी, और सर्वस्वीकृत थी। मनु द्वारा थोपी नहीं गयी थी। जब समाज द्वारा स्वीकृत व्यवस्था थी, तो उसमें मनु का क्या दोष? आपने जनता द्वारा स्वीकृत वर्तमान व्यवस्था का पोषण किया है, मनु ने समाज द्वारा स्वीकृत अपने समय की वर्णव्यवस्था का पोषण किया था। इसमें दोष या अपने-अपने समय में दोनों के दोषी होने का अवसर ही कहां है?

डॉ. अम्बेडकर का एक कथन में (दूसरे एक में नहीं) मानना है कि वर्णव्यवस्था जातिव्यवस्था की जननी है, क्योंकि वर्णव्यवस्था का मनु ने पोषण किया था, इसलिए मनु दोष के पात्र हैं। कितना अटपटा और लचीला तर्क है यह! ठीक जातिवाद जैसा! जैसे-किसी ने श्राद्ध नहीं किया तो वह पिछली छह पीढ़ियों के पूर्वजों सहित नरक में जायेगा, क्योंकि वे उसके जनक और पोषक थे। किसी ने श्राद्ध किया तो उसकी पिछली छह-पीढ़ियां तर जायेंगी, क्योंकि वे उसके जनक थे। ऐसे ही डॉ0 साहब कहते हैं कि जातिव्यवस्था दोषपूर्ण है, अतः उसकी पूर्वव्यवस्था और उसके पोषक मनु भी दोषी हैं। आश्चर्य तो यह है कि एक कानूनवेत्ता एक काूननदाता के लिए ऐसे आरोपों का प्रयोग कर रहा है! संविधान में तो डॉ. अम्बेडकर ने ऐसा कानून नहीं बनाया कि किसी अपराधी क ो दण्ड देने के साथ-साथ उसके माता-पिता, दादा, परदादा आदि को भी अपराधी घोषित कर दिया जाये, इसलिए कि वे उसके ‘जनक’ हैं।

विगत को अपराधी घोषित करके उन्हें दण्डित और नष्ट-भ्रष्ट करने के इस सिद्धान्त को यदि कुछ राष्ट्रीय मामलों के लिए भी संविधान में लागू कर देते तो उससे उन राष्ट्रवादियों को सन्तोष होता, जिनकी यह विचारधारा रही है कि देश स्वतन्त्र होने के बाद उन लोगों को अपराधी घोषित करके दण्डित किया जाना चाहिए, जिन्होंने विगत में राष्ट्रदोह और स्वतन्त्रताप्राप्ति का विरोध किया था; जिन्होंने विदेशी शासकों का सहयोग किया, गुप्तचरी की, देशभक्तों को फांसी दिलवायी। वे लोग जमीन, पद-पैसे पाकर तब भी सपन्न-सुखी थे, आज भी हैं; और स्वतन्त्रतासेनानी और उनके परिजन दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं! शायद ही ऐसी छूट किसी व्यवस्था-परिवर्तन ने दी हो! यदि वैसा होता तो गद्दारों को सबक मिलता और भावी राष्ट्रीय एकता-अखण्डता और स्वतन्त्रता के हित में होता।

वर्ण को जाति का जनक मानकर मनु को इस तरह दोषी ठहराया जा रहा है, जैसे मनु पहले ही जानते थे कि भविष्य में वर्ण से जाति का जन्म होगा, और इस आशा में वे जानबूझकर वर्ण का पोषण कर रहे थे। डॉ. अम्बेडकर ने वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था का पोषण किया है। क्या वे जानते थे कि इससे भविष्य में कौन-सी व्यवस्था का जन्म होगा? बिल्कुल नहीं। इसी प्रकार मनु को भी नहीं पता था कि वर्णव्यवस्था का भविष्य में अच्छा या बुरा क्या रूप होगा।

डॉ. अम्बेडकर वर्तमान जाति-पांति रहित संविधान के लेखक एवं पोषक हैं। दुर्भाग्य से, सैकड़ों वर्षों के बाद यदि यह जातिवादी रूप ले जाये तो क्या डॉ. अम्बेडकर उस के जनक होने के जिमेदार बनेंगे? सभी कहेंगे-नहीं, वे तो जातिवाद के विरोधी हैं, उन्हें जनक क्यों कहा जाये? इसी प्रकार जातिव्यवस्था भी वर्णव्यवस्था की विरोधी व्यवस्था है। मनु को अपनी वर्णव्यवस्था की विरोधी जातिव्यवस्था का जनक कैसे कहा जा सकता है? इस प्रकार उन पर जातिव्यवस्था का जनक होने का आरोप सरासर गलत है। सच यह है कि बाद के समाज ने मनु की वर्णव्यवस्था को विकृत कर दिया और उसे जातिव्यवस्था में बदल दिया; अतः वही परवर्ती समाज इसका जनक भी है, दोषी भी।

  1. दलित नेतृत्व और धर्मपरिवर्तन की आड़ में प्रतिशोधात्मक भावना

    उनके विरोध का तीसरा चरण तब शुरू होता है जब उन्होंने स्वयं को सामाजिक नेता से राजनेता स्थापित करने की ओर कदम बढ़ाये। राजनेताओं की प्रायः यह नीति होती है कि अपने समर्थकों और अनुयायियों का संयाबल बढ़ाने के लिए, उनकी प्रिय और हितकर बातों को बार-बार तथा तीव्र स्वर में उठाते हैं, और केवल उन्हीं एकपक्षीय बातों को कहते रहते हैं। डॉ0 अम्बेडकर भी ऐसा ही कहने और करने लगे। उन्होंने साहित्यिक-ऐतिहासिक तथ्यों और तर्कों-प्रमाणों पर तटस्थ विचार करना छोड़ दिया।

यह चरण कई कदम आगे तब बढ़ा जब उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्धधर्म को ग्रहण करने का मन बनाया। जैसी कि पन्थों की रीति होती है, जब व्यक्ति अपने अभीष्ट पन्थ को स्थापित, सुदृढ़ एवं विकसित करना चाहता है और प्रतिपक्षी पन्थ को निर्बल देखना चाहता है तब वह अपने अभीष्ट पन्थ की प्रशंसा करता नहीं अघाता और प्रतिपक्षी पन्थ की निन्दा करते-करते संतुष्ट नहीं होता। उसी प्रकार डॉ0 अम्बेडकर ने भी वैदिक धर्म सहित हिन्दू धर्म पर उग्र प्रहार करने प्रारभ कर दिये जबकि बौद्ध पन्थ की महिमा का गुणगान शुरू कर दिया। तब उन्होंने एक धार्मिक प्रतिपक्षी के समान वेदों, वैदिक साहित्य एवं वैदिक व्यवस्था सहित समस्त हिन्दू व्यवस्था का घोर एवं अविचारित विरोध करना अपना लक्ष्य बना लिया। इस चरण में उन्हें हिन्दुत्व और मनुस्मृति की प्रत्येक अच्छाई भी बुराई नजर आने लगी। वे एक-एक छिद्र को ढूंढ-ढूंढ कर ऐसे विरोध करने लगे जैसे केवल विरोध से ही उन्हें संतुष्टि मिलती हो। अब वे समीक्षक-आलोचक से कहीं दूर हटकर, केवल राजनीतिक और घोर धार्मिक विरोधी की भूमिका में आ गये। अपनी घोर धार्मिकविरोधी की भूमिका के बारे में वे स्वयं लिखते हैं। पाठक उन्हीं के शदों में पढ़ें-

(क) ‘‘वेद बेकार की रचनाएं हैं। उन्हें पवित्र या सन्देह से परे बताने में कोई तुक नहीं है।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 13, पृ0 111)

(ख) ‘‘ऐसे वेदशास्त्रों के धर्म को निर्मूल करना अनिवार्य है।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 1, पृ0 95)

(ग) ‘‘यदि आप जातिप्रथा में दरार डालना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हर हालत में वेदों और शास्त्रों में डायनामाइट लगाना होगा। …..आपको श्रुति और स्मृति के धर्म को नष्ट करना ही चाहिए।’’ (वही खंड 1, पृ0 99)

(घ) ‘‘जहां तक नैतिकता का प्रश्न है, ऋग्वेद में प्रायः कुछ है ही नहीं, न ऋग्वेद नैतिकता का ही आदर्श प्रस्तुत करता है।’’ (वही, खंड त्त्, पृ0 47, 51)

(ङ) ‘‘यह (ऋग्वेद) आदिम जीवन की प्रतिच्छाया है, जिनमें जिज्ञासा आधिक है, भविष्य की कल्पना नहीं है। इनमें दुराचार अधिक, गुण मुट्ठी-भर हैं।’’ (वही, खंड 8, पृ0 51)

(च) ‘‘अथर्ववेद मात्र जादू-टोनों, इन्द्रजाल और जड़ी-बूटियों की विद्या है। इसका चौथाई जादू-टोनों और इन्द्रजाल से युक्त है।’’ (वही, खंड 8, पृ0 60)

(छ) ‘‘वेदों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे आध्यात्मिक अथवा नैतिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता हो।’’ (वही,ांड 8, पृ0 62)

(ज) ‘‘ब्राह्मणों ने नियोजित अर्थ-व्यवस्था के उद्देश्य से आश्रम प्रणाली बनाई। यह इतनी बड़ी मूर्खता है कि उसका कारण और उद्देश्य समझ पाना एक बहुत बड़ी पहेली है।’’ (वही खंड 8, ‘परिशिष्ट-1’, पृ0 265)

(झ) ‘‘हिन्दूधर्म अपवित्रता के भय से व्याकुल है।……उसे धर्म कहना ही गलत है।’’ (वही, खंड 6, पृ0 120)

(ञ) ‘‘इसीलिए डंके की चोट पर मैं यह कहा करता हूं कि ऐसे धर्म (हिन्दूधर्म) को निर्मूल करना अनिवार्य है और इस कार्य में कोई अधर्म नहीं है।’’ (वही, खंड 1, पृ0 98)

(ट)  ‘‘मेरे जैसे व्यक्ति को जो हिन्दूधर्म का इतना विरोधी और अन्त्यज है।’’ (वही, खंड 1, पृ0 24)

यहां डॉ0 अम्बेडकर के वे वचन और निष्कर्ष उद्धृत नहीं किये जा रहे हैं जो उन्होंने वैदिक संस्कृति और ऋषि-मुनियों के बारे में लिखे हैं। वे इतने घृणित, असय और कुत्सित हैं कि उन्हें सय पाठकों के समक्ष नहीं रखा जा सकता।

    समीक्षा- उपर्युक्त कथन और भाषा, उस लेखक की है जो अपने बारे में सत्य-अनुसन्धाता, पक्षपातरहित, निष्काम तथा तटस्थ इतिहासकार होने का दावा करता है। डॉ0 अम्बेडकर को अपनी भावनाओं के आहत होने का कष्ट है किन्तु वैदिक और हिन्दू धर्मियों की आस्था पर क्रूरता से कुठाराघात करने का कोई दुःख नहीं है। स्वयं को वेद और वैदिक एवं हिन्दू धर्मविरोधी घोषित करने में जिसको गर्व का अनुभव हो रहा है, उस लेखक से पक्षपातरहित विवेचन की आशा करना मृगतृष्णा मात्र है।

वैदिक धर्म के विषय में जो सबसे अधिक आपत्तिपूर्ण दुर्भावयुक्त और खतरनाक बात डॉ0 अम्बेडकर ने कही है, वह है- ‘‘यदि आप जातिप्रथा में दरार डालना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हर हालत में वेदों और शाों में डायनामाइट लगाना होगा।’’ (अम्बेडकर वाङ्मय, खंड 1, पृ0 99)। एक ओर वे मानते हैं कि वेदों में जातिव्यवस्था न होकर वर्णव्यवस्था है और वर्णव्यवस्था गुण-कर्म पर आधारित होने से बुद्धिमत्तापूर्ण है, घृणास्पद नहीं, फिर भी धर्मग्रन्थ वेदों में डयनामाइट लगाने की अनुचित और उत्तेजक बात कहते हैं!! कितना अनुचित और परस्परविरोधी वक्तव्य है उनका! वेद, धर्मशा, रामायण, महाभारत, पुराण, गीता सभी को नष्ट-भ्रष्ट करने और उनसे नाता तोड़ने की बात कही है उन्होंने! धर्मशास्त्र धर्मजिज्ञासा, साहित्य, संस्कृति, सयता, आचार-व्यवहार, जीवनमूल्य सभी के आश्रय और प्रेरणा स्रोत होते हैं। उनको नष्ट करने का अभिप्राय है आर्य (वैदिक) संस्कृति-सयता, धर्म, इतिहास साहित्य आदि सब कुछ को नष्ट करना। क्या डॉ0 अम्बेडकर यही चाहते थे? यदि डॉ0 अम्बेडकर हिन्दू धर्म में रहकर पीड़ित थे और उन्हें वह छोड़ना था, तो वे उसे छोड़कर केवल ‘मनुष्य’ के नाते भी रह सकते थे, किन्तु धर्म के आश्रय के बिना वे नहीं रह सके। उन्होंने बौद्ध मत का आश्रय लिया और बौद्ध-शाों को प्रमाण माना, जबकि हिन्दुओं को वे धर्म और धर्मशाों का त्याग करने के लिए कहते हैं।

डॉ0 अम्बेडकर और दलितवर्ग द्वारा झेली गयी पीड़ाएं अन्यायपूर्ण थीं, किन्तु किसी सपूर्ण समुदाय के धर्म और धर्मशास्त्रों को अपमानपूर्वक नष्ट करने की बात कहना, क्या अन्यायपूर्ण और पीड़ाजनक नहीं है? प्रतिशोध-भावना से इस प्रकार की अनुचित और आघातकारक बातें कहना बहुत ही आपत्तिजनक है। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि यह बात संभव भी है या नहीं?

डॉ0 अम्बेडकर की उक्त सोच ठीक वैसी ही है जैसे किसी के हाथ-पैर में फोड़ा हो जाये तो उसका आप्रेशन कर उसको निकाल देने के बजाय उस आदमी को जान से ही मार दिया जाये! यहां मैं महात्मा गांधी द्वारा उस समय दिये गये उत्तर को उद्धृत करना चाहूंगा- ‘‘जैसे कोई कुरान को अस्वीकार कर मुसलमान कैसे बना रह सकता है और बाइबल को अस्वीकार कर कोई ईसाई कैसे बना रह सकता है। (अंबेडकर वाङ्मय खंड 1, पृ0 110) वैसे वेदों-शाों को अस्वीकार कर कोई हिन्दू कैसे हो सकता है?’’

वेदों में जातिव्यवस्था का नामोनिशान तक नहीं है। फिर भी डॉ0 अम्बेडकर ने वेदों की अकारण आलोचना की, उनको नष्ट करने की बात कही, उनके महत्त्व को अंगीकार नहीं किया। बौद्ध होकर भी उन्होंने ऐसा ही किया है। उन्होंने बौद्ध-शाों की और अपने गुरु की अवज्ञा की है, क्योंकि बौद्ध शाों में महात्मा बुद्ध ने वेदों और वेदज्ञों की प्रशंसा करते हुए धर्म में वेदों के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। कुछ प्रमाण देखिए-

(अ) ‘‘विद्वा च वेदेहि समेच्च धमम्।

         न उच्चावचं गच्छति भूरिपज्जो।’’      (सुत्तनिपात 292)

    अर्थात्-महात्मा बुद्ध कहते हैं-‘जो विद्वान् वेदों से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है, वह कभी विचलित नहीं होता।’

(आ) ‘‘विद्वा च सो वेदगू नरो इध, भवाभवे संगं इमं विसज्जा।

    सो वीतवण्हो अनिघो निरासो, अतारि सेा जाति जरांति ब्रूमीति॥’’                               (सुत्तनिपात 1060)

    अर्थात्-‘वेद को जानने वाला विद्वान् इस संसार में जन्म और मृत्यु की आसक्ति का त्याग करके और इच्छा, तृष्णा तथा पाप से रहित होकर जन्म-मृत्यु से छूट जाता है।’ सुतनिपात के वेदप्रशंसा विषयक अन्य श्लोक द्रष्टव्य हैं- 322, 458, 503, 846,1059 आदि।

डॉ0 अम्बेडकर की मनु-विरोध परपरा में डॉ0 भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ के नाम से किया गया मनुस्मृति-विरोध केवल ‘विरोध’ के लिए ही है, जो अत्यन्त सतही है। उसमें न तर्क है, न सयक् विश्लेषण। अपव्याया और अपप्रस्तुति का आश्रय लेकर अच्छे को भी बुरा सिद्ध करने का प्रयास है। उन्हें जहां इस बात पर आक्रोश है कि मनु ने नारियों की निन्दा की है, तो इस बात पर भी दुःख है कि उन्हें ‘‘पूजार्हा=समानयोग्य’’ क्यों कहा गया? इसी को कहते हैं ‘चित भी मेरी पट भी मेरी।’ उनकी स्थिति विरोधाभासी है। महात्मा गांधी के प्रशंसक हैं, किन्तु उनके निष्कर्षों को नहीं मानते। बौद्ध हैं, किन्तु बौद्ध साहित्य में वर्णित वेद-वेदज्ञ आदि के महत्त्व को स्वीकार नहीं करते। स्वयं को गर्व से अवैदिक = अहिन्दू घोषित करते रहे, किन्तु हिन्दुओं के शाों के तथाकथित उद्धार में और हिन्दुओं में पूज्य महापुरुषों मनु, राम आदि की निन्दा-आलोचना में आजीवन लगे रहे।

  1. संस्कृत भाषा एवं शैली के ज्ञान का अभाव

मनु, मनुस्मृति तथा वैदिक साहित्य सबन्धी गभीर, व्यापक एवं तथ्यात्मक जानकारी न होने का एक कारण डॉ0 अम्बेडकर का संस्कृत भाषा के ज्ञान का अभाव रहा है। यद्यपि उन्होंने एक गर्वोक्ति में इस कारण को अस्वीकार किया है तथापि परोक्ष शैली में उन्होंने इस वास्तविकता को स्वीकार भी कर लिया है। यह सत्य है कि वे संस्कृत भाषा के गभीर ज्ञाता नहीं थे। उन्होंने प्राचीन भारतीय साहित्य एवं व्यवस्था सबन्धी जो कुछ पढ़ा, समझा और लिखा, वह अंग्रेजी रूपान्तरणों और समीक्षाओं के माध्यम से ही समझा है। डॉ0 अम्बेडकर इस तथ्य को स्वयं स्वीकार करते हुए लिखते हैं-

(क) ‘‘यदि यह कहा जाय कि मैं संस्कृत का पंडित नहीं तो मैं मानने को तैयार हूं।’’

‘‘परन्तु संस्कृत का पंडित न होने से मैं इस विषय पर लिख क्यों नहीं सकता? संस्कृत का बहुत-थोड़ा अंश है जो अंग्रेजी भाषा में उपलध नहीं है। इसलिए संस्कृत न जानना मुझे इस विषय पर लिखने का अनधिकारी नहीं ठहरा सकता। अंग्रेजी अनुवादों का पन्द्रह साल अध्ययन करने के बाद यह अधिकार मुझे अवश्य प्राप्त है।’’ (शूद्रों की खोज, प्राक्कथन पृ0 2, समता प्रकाशन नागपुर)

    समीक्षा-आलोच्य ग्रन्थों की भाषा एवं शैली तथा परपरा का गभीर ज्ञान न होने के कारण कोई भी लेखक उस भाषा की प्रकृति, शैली, अर्थपरपरा, वक्ता का अभिप्राय, अन्तर्विरोध आदि को नहीं समझ पाता। डॉ0 अम्बेडकर द्वारा उद्धृत सभी सन्दर्भ दूसरे लेखकों के हैं, अतः यह मानना पड़ेगा कि मूलतः निष्कर्ष भी उन्हीं के हैं। वे स्वयं मनुस्मृति आदि ग्रन्थों के श्लोकों पर विचार नहीं कर सके। यदि वे संस्कृत भाषा के ज्ञाता होते तो निश्चय ही स्थिति कुछ अलग होती।

संस्कृत ज्ञान के अभाव में डॉ0 अम्बेडकर न तो मनु के श्लोकों के सही अर्थ का निर्णय कर सके, न परस्परविरोध का और न मनुस्मृति की प्रक्षिप्तता एवं मौलिक स्थिति का। जहां तक प्रक्षिप्तों के अस्तित्व का प्रश्न है, अब इसमें कोई मतभेद नहीं रह गया है कि उपलध मनुस्मृति में मौलिक व प्रक्षिप्त, दोनों प्रकार के श्लोक प्राप्त हैं। अनेक श्लोकों में परस्परविरोध और प्रसंगविरोध आदि हैं। डॉ0 अम्बेडकर के समय तक इस विषय पर शोध नहीं हुआ था, अतः उन्हें यह निर्णय उपलध नहीं हुआ और संस्कृत भाषा का ज्ञान न होने से वे स्वयं इनका निर्णय कर नहीं सके। उनके जितने विरोध और आपत्तियां हैं वे या तो प्रक्षिप्त श्लोकों पर केन्द्रित हैं, या फिर अर्थभेद या अशुद्ध अर्थ पर आधारित हैं। आपत्तिपूर्ण श्लोकों अर्थात् प्रक्षिप्तों पर आलोचना प्रस्तुत करते हुए उन्होंने इस तथ्य का उत्तर नहीं दिया कि आलोचित श्लोक का विरोधी जो श्लोक मनुस्मृति में उपलध है, जो कि आपत्तिरहित, उत्तम मान्यता का वर्णन करने वाला है, उसको वे क्यों नहीं स्वीकार करते? या एक साथ दो विरोधी श्लोक एक ग्रन्थ में क्यों है? यदि वे इस तथ्य पर चिन्तन कर लेते तो उन्हें मनुस्मृति का अन्धविरोध करने का विचार ही छोड़ देना पड़ता।

डॉ0 अम्बेडकर ने मनुस्मृति की मौलिक और प्रक्षिप्त स्थिति पर पृथक् से विचार नहीं किया। न मौलिक श्लोकों को पृथक् विचारा, न प्रक्षिप्तों को, उन्होंने सारी मनुस्मृति की अलोचना की है; जो केवल प्रक्षिप्तों पर आधारित है। इस प्रकार डॉ0 अम्बेडकर ने अच्छे श्लोकों के साथ सारी मनुस्मृति की निन्दा कर डाली, जो ऐतिहासिक तथ्य के विपरीत मत है। यह रहस्यपूर्ण बात है कि डॉ0 अम्बेडकर ने वेदों, रामायण, गीता, महाभारत, पुराण, सूत्रग्रन्थ सभी में प्रक्षेपों का अस्तित्व घोषित किया है, किन्तु मनुस्मृति में स्वीकार नहीं किया। ऐसा क्यों? स्पष्ट है कि यदि वे मनुस्मृति में भी मौलिक व प्रक्षेप के अस्तित्व को ईमानदारी से स्वीकार कर लेते तो उनका ‘विरोध के लिए विरोध’ का अभियान चल ही नहीं पाता। (प्रमाणों के लिए द्रष्टव्य है अध्याय संया छह)

  1. वर्णव्यवस्था की उत्पत्ति-प्रक्रिया तथा व्यावहा-रिकता को न समझ पाना

वर्णव्यवस्था की उत्पत्ति-प्रक्रिया एवं व्यावहारिकता के वास्तविक स्वरूप को न समझना अथवा समझे हुए सही स्वरूप पर स्थिर न रहना, विरोध का एक अन्य कारण है।

समीक्षा-डॉ0 अम्बेडकर ने जब-जब चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को सही समझा है, तब-तक उन्होंने उसकी प्रशंसा की है। जब ठीक नहीं समझा, तब निन्दा की है। कभी-कभी ठीक समझकर भी वे अपने मत पर स्थिर नहीं रहे। यदि स्थिर रहते तो महर्षि मनु के उग्र और अविचारित विरोध के सारे अवसर समाप्त हो जाते अर्थात् डॉ0 साहब को मनु का विरोध करने का अवसर ही नहीं मिलता।

वर्णव्यवस्था को समझने में भूल तब होती है जब हम वर्ण को जाति के समान जन्म से मान लेते हैं। वर्ण जन्म से निर्धारित नहीं होता था जबकि जाति जन्म से निर्धारित होती थी और होती है। वर्ण का अभिप्राय यह था कि किसी भी कुल में उत्पन्न होने के उपरान्त व्यक्ति अपने गुण, कर्म, योग्यता के अनुसार किसी भी वर्ण का चयन करके उस वर्ण को धारण कर सकता था। यह व्यवस्था ठीक ऐसी ही थी जैसे आज किसी भी कुल का व्यक्ति किसी भी नौकरी का कार्य कर सकता है। जब डॉ0 अम्बेडकर वर्ण के इस मौलिक और सही स्वरूप को त्यागकर उसको जन्म पर आधारित मान लेते हैं तब वे चातुर्वर्ण्य का विरोध करते हैं और चातुर्वर्ण्य-विधायक वेदमन्त्रों की तथा मनुस्मृति के श्लोकों की जन्माधारित व्याया प्रस्तुत करते हैं। यह निर्विवाद है कि वे भलीभांति जानते थे, और जैसा कि उन्होंने अनेक बार लिखा भी है कि वैदिक चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में वर्ण गुण-कर्म-योग्यता से निर्धारित होते थे। उनके द्वारा किये गये बारंबार विरोध को पढ़कर यह संदेह होता है कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के सही स्वरूप की जानकारी रखते हुए भी डॉ0 अम्बेडकर द्वारा जो उसका विरोध किया जाता रहा है, वह जानबूझकर और योजनाबद्ध है। शायद वे राजनीति से प्रेरित स्थिति में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के सही स्वरूप को जानबूझकर मानना नहीं चाहते थे क्योंकि फिर वे ‘विरोध के लिए विरोध’ नहीं कर सकते थे। तब तर्क उन्हें विरोध के मार्ग पर नहीं बढ़ने देता। इसलिए उन्होंने वर्णव्यवस्था के सही स्वरूप को अनेक स्थलों पर प्रस्तुत करने के बावजूद चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को जन्म से जोड़कर भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया है और उसकी आड़ लेकर मनु, मनुस्मृति तथा आर्य (हिन्दू) शास्त्रों का खुलकर विरोध किया है। (इसके उदाहरण द्रष्टव्य हैं-‘डॉ0 अम्बेडकर के ग्रन्थों में परस्परविरोध’ शीर्षक आगामी अध्याय आठ में)

डॉ0 अम्बेडकर सहित वर्णव्यवस्था के समीक्षकों को एक भ्रान्ति यह है कि वे मुख, बाहु, जंघा, पैर से सीधे वर्णस्थ व्यक्तियों की उत्पत्ति मानते हैं जबकि उन प्रसंगों में वर्णों की आलंकारिक उत्पत्ति है, व्यक्तियों की नहीं। पहले वर्ण बने हैं फिर उनमें कर्मानुसार व्यक्ति दीक्षित हुए हैं (द्रष्टव्य – ‘वर्णव्यवस्था का यथार्थ स्वरूप’ शीर्षक अध्याय तीन)। पहले व्यवस्था बनती है, पुनः व्यक्तियों पर लागू होती है। अतः पैर से शूद्रवर्ण की आलंकारिक उत्पत्ति दर्शाई है, शूद्रों की नहीं। इस सही प्रक्रिया को समझ लेने पर यह आक्रोश स्वतः समाप्त हो जाता है कि शूद्रों की उत्पत्ति पैर से क्यों कही गयी है? क्योंकि चारों वर्णों में से अयोग्यता के कारण किसी भी कुल का व्यक्ति शूद्र होकर शूद्रवर्ण में समाविष्ट हो सकता था।

संसार की सभी व्यवस्थाएं शतप्रतिशत मान्य और खरी नहीं होती। अतः कुछ कमियों के आधार पर परवर्ती जातिव्यवस्था (हिन्दू व्यवस्था) की निन्दा और अपमान करना कदापि उचित नहीं माना जा सकता। हाँ, उसमें निहित कुप्रथाओं पर प्रहार होना ही चाहिए। आज की संवैधानिक व्यवस्था, जिसका न्याय, समानता आदि का दावा है, क्या सपूर्ण है? अभी ही वह न जाने कितने विवादों से घिरी है। सामयिक आवश्यकता के आधार पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है, फिर भी आज उस पर उग्र विवाद है। आज के सैकड़ों वर्ष पश्चात् जब ये परिस्थितियां विस्मृत हो जायेंगी, तब जो इस व्यवस्था का इतिहास लिखा जायेगा, शायद वह आरक्षित जातियों के लिए भी वैसा ही लिखा जायेगा, जो ब्राह्मणों के सन्दर्भ में आज प्राचीन धर्मशाों का लिखा जा रहा है।

वर्तमान संवैधानिक व्यवस्थाओं में, उच्चतम अधिकारी से लेकर निनतम कर्मचारी तक के लिए परीक्षाओं-उपाधियों के अनुसार नियुक्ति का प्रावधान है। कुछ स्थान मनोनयन से भरे जाते हैं। थोड़े से वर्षों में ही स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक पदों के मनोनयन में, सत्ता में बैठे नेताओं, अधिकारियों के सबन्धी या सिफारिशी ही अधिकांशतः ले लिये जाते हैं; योग्यता का पैमाना भुला दिया गया है। योग्यता की जांच के लिए साक्षात्कार आयोजित होते हैं, किन्तु तब भी हजारों नौकरियां सिफारिश और पैसे के आधार पर दी जा रही हैं। न्यायालयों द्वारा रद्द अनेक चयनसूचियां इसके सत्यापित प्रमाण हैं। राजनीतिक स्तर पर होने वाले ‘राज्यपाल’ आदि पदों के मनोनयन में योग्यता नाम की कोई वस्तु दिखायी नहीं पड़ती। वहां अपने-पराये का नग्न रूप है। कल्पना कीजिए, जिसकी कि संभावनाएं प्रबल दिखायी पड़ रही हैं, सैकड़ों वर्ष बाद ये व्यवस्थाएं और अधिक विकृत होकर यदि जन्माधारित रूप ले गयीं तो क्या उसकी जिमेदारी डॉ0 अम्बेडकर और संविधान-सभा की मानी जायेगी? क्या उन द्वारा प्रदत्त व्यवस्था उस भावी विकृत व्यवस्था की जननी मानी-जानी जायेगी? यदि नहीं, तो मनु को भी जाति-व्यवस्था का जनक और जिमेदार नहीं कहा जा सकता।

  1. प्राचीन धर्मशास्त्रों एवं मान्यताओं के ज्ञान का अभाव

आर्य (हिन्दू)-शास्त्रों की मौलिक परपराओं और मान्यताओं को भी डॉ0 अम्बेडकर भारतीय परपरा के अनुसार नहीं समझ सके। अंग्रेजी अनुवादों पर निर्भर होने के कारण उन्होंने शास्त्रों का स्वरूप और काल वही समझा, जो पाश्चात्य लेखकों ने कपोलकल्पना से स्थापित किया था। परिणामस्वरूप डॉ0 अम्बेडकर का आर्य (हिन्दू) शास्त्रों का विवेचन एकपक्षीय रहा। इस स्थिति को वे अनुभव भी करते थे। उन्होंने इस विवशता को इन शदों में स्वीकार किया हैं-

(क) ‘‘हिन्दू धर्मशास्त्र का मैं अधिकारी ज्ञाता नहीं हूं।’’ (जातिभेद का उच्छेद, पृ0 101, बहुजन कल्याण प्रकाशन, लखनऊ)

(ख) ‘‘महात्मा जी (गांधी जी) की पहली आपत्ति यह है कि मैंने जो श्लोक चुने हैं, वे अप्रमाणिक हैं। मैं यह मान सकता हूं कि मेरा इस विषय पर पूर्ण अधिकार नहीं है।’’ (वही, पृ0 120)

    समीक्षा-डॉ0 अम्बेडकर ने वैदिक मान्यताओं, स्थापनाओं एवं परपराओं को प्राचीन भारतीय मतानुसार नहीं समझा, या समझकर स्वीकार नहीं किया। उनके प्रायः सभी निष्कर्ष अंग्रेजी अनुवादों और समीक्षाओं पर निर्भर हैं। इस कारण उन द्वारा प्रस्तुत मान्यताएं गड्ड-मड्ढ हो गयी हैं। जैसे, डॉ0 अम्बेडकर ने लिखा है कि मनुस्मृति का रचयिता मनु नामधारी सुमति भार्गव है जो ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र शुङ्ग (185 ईस्वी पूर्व) का समकालीन है। इससे स्पष्ट हुआ कि वे उसी की आलोचना कर रहे हैं, प्राचीनतम मनुओं की नहीं। किन्तु उन्होंने इस तथ्य को स्पष्ट नहीं किया। विरोध में सभी मनुओं को घसीटा है।

भारतीय प्राचीन मतानुसार ‘मनुस्मृति’ मूलतः मनु स्वायंभुव की रचना है, जो ब्रह्मा के पुत्र थे। उसी मनुस्मृति का उल्लेख सपूर्ण प्राचीन वैदिक एवं लौकिक संस्कृत वाङ्मय में है। वही प्राचीन काल से भारतीय समाज में प्रचलित है। उस मनुस्मृति में मूलतः गुण-कर्म-योग्यता पर आधारित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था विहित है। यह संभव है कि उस मनुस्मृति में प्रक्षेप के रूप में जो जातिव्यवस्था के श्लोक मिलाये हैं वे मनु सुमति भार्गव ने मिलाये हो। इस तथ्य का स्पष्टीकरण न किये जाने से प्राचीन मनु भी अनावश्यक रूप से निन्दा के शिकार हो रहे हैं।

मनु का काल मनुष्यों की सृष्टि का प्रारभिक काल है (देखिए आरभ में वंशावली)। उस समय कर्मणा वैदिक व्यवस्था ही थी। स्वयं डॉ0 अम्बेडकर का भी मत है कि जन्मना जाति व्यवस्था तो महाभारत के बाद और बौद्धकाल से पूर्व प्रारभ हुई और ईसापूर्व की शतादियों में ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र शुङ्ग के काल में सुदृढ़ हुई। मनु के काल में जन्मना जातिव्यवस्था थी ही नहीं तो उसका मनु द्वारा वर्णन कैसे संभव है? स्पष्ट है कि मनुस्मृति में ऐसे श्लोकों का प्रक्षेप जन्मना जातिवाद के उद्भव के बाद हुआ है। उनका जिमेदार प्राचीनतम महर्षि मनु स्वायभुव को कैसे माना जा सकता है? इस तथ्य पर न तो पाश्चात्य लेखकों ने ईमानदारी से विचार किया और न डॉ0 अम्बेडकर ने किया। यदि डॉ0 अम्बेडकर ऐसा करने का अवसर पाते तो आज स्थिति भिन्न और सुखद होती। अब, डॉ0 अम्बेडकर के अनुयायियों को इस तथ्य पर अवश्य ही विचार करना चाहिये कि जो आदिपुरुष एवं राजर्षि मनु जब निर्दोष एवं आरोपरहित हैं तो उनको दोषी और आरोपी कहने का अन्याय क्यों किया जाये? यदि वे विरोध करना ही चाहते हैं तो डॉ0 अम्बेडकर द्वारा कथित ईसापूर्व द्वितीय शती के ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र शुङ्गकालीन ‘मनु सुमति भार्गव’ का विरोध करें, जो अनुमानतः मनुस्मृति में ब्राह्मणवादी विचारधारा का प्रक्षेपकर्त्ता है, आदिपुरुष मनु का विरोध नहीं करें।

क्या मनुस्मृति में प्रक्षेप हैं?: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

प्राचीन भारतीय साहित्य की यह एक प्रमाणित ऐतिहासिक सच्चाई है कि उसमें समय-समय पर प्रक्षेप होते रहे हैं। इस विषयक प्रमाण पांडुलिपियों पर आधारित पाठान्तर और लिखित साक्ष्य के रूप में उपलध हैं। अतः अब यह विषय विवाद का नहीं रह गया है। मनुस्मृति के प्रक्षेपों पर विचार करने से पूर्व अन्य संस्कृत साहित्य के प्रक्ष्ेाप-विषयक इतिहास पर एक दृष्टिपात किया जाता है जिससे पाठकों को प्रक्षिप्तता की अनवरत प्रवृत्ति का ज्ञान हो सके।

(अ) वाल्मीकीय रामायण-वाल्मीकीय रामायण के आज तीन संस्करण मिलते हैं-1. दाक्षिणात्य, 2. पश्चिमोत्तरीय, 3. गौडीय या पूर्वीय। इन तीनोंसंस्करणों में अनेक सर्गों और श्लोकों का अन्तर है। गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित दाक्षिणात्य संस्करण में अभी भी अनेक ऐसे सर्ग समाविष्ट हैं, जो मूलपाठ के साथ घुल-मिल नहीं पाये, अतः अभी तक उन पर ‘‘प्रक्षिप्त सर्ग’’ लिखा मिलता है (उदाहरणार्थ द्रष्टव्य, उत्तरकाण्ड के 59 सर्ग के पश्चात् दो सर्ग)।

नेपाल में, काठमांडू स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में नेवारी लिपि में वाल्मीकीय रामायण की एक पांडुलिपि सुरक्षित है जो लगभग एक हजार वर्ष पुरानी है। उसमें वर्तमान संस्करणों से सैकड़ों श्लोक कम हैं। स्पष्टतः वे एक हजार वर्ष की अवधि में मिलाये गये हैं। समीक्षकों का मत है कि वर्तमान रामायण में प्राप्त बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के अधिकांश भाग प्रक्षिप्त हैं। आज भी रामायण के आरभ में तीन अनुक्रमणिकाएं प्राप्त हैं, जो समयानुसार परिवर्धन का प्रमाण हैं। उनमें से एक में तो स्पष्टतः ‘षट्काण्डानि’ कहा है (5.2)। अवतारविषयक श्लोकअवतार की धारणा पनपने के उपरान्त प्रक्षिप्त हुए।

इस संदर्भ में एक बौद्ध ग्रन्थका प्रमाण उल्लेखनीय है। बौद्ध साहित्य में एक ‘अभिधर्म महाविभाषा’ग्रन्थ मिलता था। इसका तीसरी शतादी का चीनी अनुवाद उपलध है। उसमें एक स्थान पर उल्लेख है कि ‘‘रामायण में बारह हजार श्लोक हैं’’(डॉ0 फादर कामिल बुल्के, ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’’, पृ0 94)। आज उसमें पच्चीस हजार श्लोक पाये जाते हैं। यह एक संक्षिप्त जानकारी है कि प्राचीन ग्रन्थों में किस प्रकार प्रक्षेप होते रहे हैं।

(आ) महाभारत

अब मैं महााारत के संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण उद्घृत करने जा रहा हूँ। यह इस तथ्य की जानकारी दे रहा है कि लगभग दो हजार वर्ष पूर्व महाभारत में होने वाले प्रक्षेपों के विरुद्ध तत्कालीन साहित्य में आवाज उठी थी। यह प्रमाण इस बात का भी ज्वलन्त प्राचीन साक्ष्य है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रक्षेप बहुत पहले से होते आ रहे हैं। गरुड़ पुराण (तीसरी शती) का निनलिखित श्लोक अमूल्य प्रमाण है जो यह बताता है कि दूसरी संस्कृति के जो लोग वैदिक संस्कृति में समिलित हुए, उन्होंने अपने स्वार्थ-साधन के लिए भारतीय ग्रन्थों में प्रक्षेप किये हैं-

दैत्याः सर्वे विप्रकुलेषु भूत्वा,

कलौ युगे भारते षट्सहस्र्याम्।

निष्कास्य कांश्चित्, नवनिर्मितानां

निवेशनं तत्र कुर्वन्ति नित्यम्॥

(ब्रह्मकाण्ड 1.59)

    अर्थात्-‘कलियुग के इस समय में महाभारत में परिवर्तन-परिवर्धन किया जा रहा है। दैत्यवंशी लोग स्वयं को ब्राह्मणकुल का बताकर कुछ श्लोकों को निकाल रहे हैं और उनके स्थान पर नये-नये श्लोक स्वयं रचकर निरन्तर डाल रहे हैं।’

इसी प्रकार की एक जानकारी महाभारत में दी गयी है कि स्वार्थी लोगों ने वैदिक-परपराओं को विकृत कर दिया है और उसके लिए उन्होंने ग्रन्थों से छेड़छाड़ की है। महाभारतकार की पीड़ा देखिए –

सुरा मत्स्याः पशोर्मांसम्, आसवं कृशरौदनम्।

धूर्तैः प्रवर्तितं यज्ञे नैतद् वेदेषु विद्यते॥

अव्यवस्थितमर्यादैः विमूढैर्नास्तिकैः नरैः।

संशयात्मभिरव्यक्तैः हिंसा समनुवर्णिता॥

(शान्तिपर्व 265.9,4)

    अर्थात्-‘मदिरा-सेवन, मत्स्य-भोजन, पशुमांस-भक्षण और उसकी आहुति, आसव-सेवन, लवणान्न की आहुति, इनका विधान वेदों में (वैदिक संस्कृति में) नहीं है। यह सब धूर्त लोगों ने प्रचलित किया है। मर्यादाहीन, मद्य-मांसादिलोलुप, नास्तिक, आत्मा-परमात्मा के प्रति संशयग्रस्त लोगों ने गुपचुप तरीके से वैदिक ग्रन्थों में हिंसा-सबन्धी वर्णन मिला दिये हैं।’

महाभारत-महाकाव्य की कलेवर-वृद्धि का इतिहास स्वयं वर्तमान महाभारत में भी दिया गया है। महाभारत युद्ध के बाद महर्षि व्यास ने जो काव्य लिखा उसका नाम ‘जयकाव्य’ था ‘‘जयो नामेतिहासोऽयम्’’ (आदि0 1.1; 62.20) और उसमें छह या आठ हजार श्लोक थे-‘‘अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च’’

व्यासशिष्य वैशपायन ने उसको बढ़ाकर 24000 श्लोक का काव्य बना दिया और उसका नाम ‘भारत संहिता’ रख दिया-‘‘चतुर्विंशती साहस्रीं चक्रे भारतसंहिताम्’’ (आदि0 1.102)। सौति ने इसमें परिवर्धन करके इसे एक लाख श्लोकों का बना दिया और इसका नाम ‘महाभारत’ रखा- ‘‘शतसाहस्रमिदं काव्यं मयोक्तं श्रूयतां हि वः’’ (आदि0 1.109 )। यह ‘जय’ से महाभारत बनने की महाभारत में वर्णित कथा है। लोग अपना पृथक् काव्य बनाने के बजाय उसी में वृद्धि करते गये। इससे उसकी प्रामणिकता का ह्रास हुआ, और ऐतिहासिकता विनष्ट हो गयी।

    (इ) गीता-गीता महाभारत का ही अंश है। उसकी वर्तमान विशालता व्यावहारिक नहीं है। युद्धभूमि में कुछ मिनटों के लिए दिया गया उपदेश न तो इतना विस्तृत हो सकता है और न प्रकरण के अनुकूल। यदि उसको ‘संक्षेप का विस्तार’ कहा जायेगा तो वह व्यास या कृष्णप्रोक्त नहीं रह जायेगा। प्रत्येक दृष्टि से वह परिवर्धित अर्थात् प्रक्षिप्त रूप है।

    (ई) निरुक्त-आचार्य यास्ककृत निरुक्त के 13-14 अध्यायों के विषय में समीक्षकों का यह मत है कि वे अभाव की पूर्ति के लिए बाद में जोड़े गये हैं। उन सहित निरुक्त परिवर्धित संस्करण है।

    (उ) चरकसंहिता – महर्षि अग्निवेश प्रणीत चरकसंहिता में भी उनके शिष्यों ने अन्तिम अध्यायों का कुछ भाग अभाव की पूर्ति की दृष्टि से संयुक्त किया है। किन्तु वहां यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यह भाग अमुक का है। फिर भी उससे परिवर्धन की प्रवृत्ति और इतिहास की जानकारी मिलती है।

    (ऊ) मनुस्मृति-इसी प्रकार मनुस्मृति में भी समय-समय पर प्रक्षेप हुए हैं। अपितु, मनुस्मृति में अधिक प्रक्षेप हुए हैं क्योंकि उसका सबन्ध हमारी दैनंदिन जीवनचर्या से था और उससे जीवन व समाज सीधा प्रभावित होता था, अतः उसमें परिवर्तन भी किया जाना स्वाभाविक था। जैसे भारत के संविधान में छियासी के लगभग संशोधन आवश्यकता के नाम पर आधी शती में हो चुके हैं। इसी प्रकार मनुस्मृति में निनलिखित प्रमुख कारणों के आधार पर परिवर्तन-परिवर्धन किये जाते रहे-

  1. अभाव की पूर्ति के लिए
  2. स्वार्थ की पूर्ति के लिए
  3. गौरव-वृद्धि के लिए
  4. विकृति उत्पन्न करने के लिए

ये प्रक्षेप (परिवर्तन या परिवर्धन) अधिकांश में स्पष्ट दीख जाते हैं। महर्षि मनु सदृश धर्मज्ञ और विधिप्रदाता की रचना में रचनादोष नहीं हो सकते, किन्तु प्रक्षिप्तों के कारण आ गये हैं। वे प्रक्षिप्त कहीं विषयविरुद्ध, कहीं प्रसंगविरुद्ध, कहीं परस्परविरुद्ध, कहीं शैलीविरुद्ध रूप में दीख रहे हैं। आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, खारी बावली, दिल्ली-6 से प्रकाशित मेरे शोध और भाष्ययुक्त ‘सपूर्ण मनुस्मृति’ संस्करण में मैंने उनकी पहचान निनलिखित सात साहित्यिक मानदण्डों के आधार पर की है। वे हैं-

  1. विषयविरोध
  2. प्रसंगविरोध
  3. अवान्तरविरोध
  4. पुनरुक्ति
  5. शैलीविरोध
  6. वैदविरोध

प्रक्षिप्तानुसन्धान के इन साहित्यिक मानदण्डों के आधार पर मनुस्मृति के उपलध 2685 श्लोकों में से 1471 प्रक्षिप्त सिद्ध हुए हैं और 1214 मौलिक। विस्तृत समीक्षा के लिए मनुस्मृति का उक्त संस्करण पठनीय है। उसमें प्रत्येक प्रक्षिप्त-सिद्ध श्लोक पर समीक्षा में उपर्युक्त तटस्थ मानदण्डों के आधार पर प्रक्षेप का कारण दर्शाया गया है।

मनुस्मृति में प्रक्षेप होने की पुष्टि अधोलिखित प्रमाण भी करते हैं और प्रायः सभी वर्गों के विद्वान् भी करते हैं-

(क) मनुस्मृति-भाष्यकार मेधातिथि (9वीं शतादी) की तुलना में कूल्लूक भट्ट (12वीं शतादी) के संस्करण में एक सौ सत्तर श्लोक अधिक उपलध हैं। वे तब तक मूल पाठ के साथ घुल-मिल नहीं पाये थे, अतः उनको बृहत् कोष्ठक में दर्शाया गया है। अन्य टीकाओें में भी कुछ-कुछ श्लोकों का अन्तर है।

(ख) मेधातिथि के भाष्य के अन्त में एक श्लोक मिलता है, जिससे यह जानकारी मिलती है कि मनुस्मृति और उसका मेधातिथि भाष्य लुप्तप्रायः था। उसको विभिन्न संस्करणों की सहायता से सहारण राजा के पुत्र राजा मदन ने पुनः संकलित कराया। ऐसी स्थिति में श्लोकों में क्रमविरोध, स्वल्प-आधिक्य होना सामान्य बात है-

मान्या कापि मनुस्मृतिस्तदुचिता व्यायापि मेघातिथेः।

सा लुप्तैव विधेर्वशात् क्वचिदपि प्राप्यं न तत्पुस्तकम्।

क्षोणीन्द्रो मदनः सहारणसुतो देशान्तरादाहृतैः,

जीर्णोद्धारमचीकरत्तत इतस्तत्पुस्तकैः लेखितैः॥

(उपोद्घात, मेघातिथिभाष्य, गंगानाथ झा खण्ड 3, पृ0 1)

    अर्थात्-‘समाज में मान्य कोई मनुस्मृति थी, उस पर मेघातिथि काााष्य भी था किन्तु वह दुर्भाग्य से लुप्त हो गयी। वह कहीं उपलध नहीं हुई। सहारण के पुत्र राजा मदन ने विभिन्न देशों से उसके संस्करण मंगाकर उसका जीर्णोद्धार कराया और विभिन्न पुस्तकों से मिलान कराके यहााष्य तैयार कराया।

मनुस्मृति के स्वरूप में परिवर्तन का यह बहुत महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

(ग) आर्यसमाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में गत शती में सर्वप्रथम यह सुस्पष्ट घोषणा की थी कि मनुस्मृति में अनेक प्रक्षेप ऐसे किये गये हैं, जैसे कि ग्वाले दूध में पानी की मिलावट करते हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थों में कुछ प्रक्षिप्त श्लोकों का कारणपूर्वक दिग्दर्शन भी कराया है। उन्होंने घोषणा की थी कि मैं प्रक्षेपरहित मनुस्मृति को ही प्रमाण मानता हूं (ऋग्वेदादिााष्याूमिका, ग्रन्थप्रामाण्य विषय)

(घ) सपूर्ण भारतीय प्राचीन साहित्य में प्रक्षिप्तों के होने के यथार्थ को सुप्रसिद्ध सनातनी आचार्य स्वामी आनन्दतीर्थ ‘महाभारत तात्पयार्थ-निर्णय’ में स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं-

क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि,

कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा।

अनुत्सन्नाः अपि ग्रन्थाः व्याकुलाः सन्ति सर्वशः,

उत्सन्नाः प्रायशः सर्वे, कोट्यंशोऽपि न वर्तते॥ (अ02)

    अर्थ-‘कहीं ग्रन्थों में प्रक्षेप किया जा रहा है, कहीं मूल पाठों को बदला जा रहा है, कहीं आगे-पीछे किया जा रहा है, कहीं प्रमादवश अन्यथा लेखन किया जा रहा है, जो ग्रन्थ नष्ट होने से बच गये हैं वे इन पीड़ाओें से व्याकुल हैं (=क्षत-विक्षत हैं)। अधिकांश ग्रन्थों को नष्ट किया जा चुका है। अब तो साहित्य का करोड़वां भाग भी विशुद्ध नहीं बचा है।’

यही क्षत-विक्षत स्थिति मनुस्मृति की हुई है।

(ङ) प्रथम अध्याय में पृ0 12 पर चीन की दीवार से प्राप्त जिस चीनी भाषा के ग्रन्थ की जानकारी दी गयी है। उसमें कहा गया है कि मनुस्मृति में 680 श्लोक हैं। यह अत्यन्त प्राचीन सूचना है। यदि इसको सही मानें तो अभी मनुस्मृति के प्रक्षेपानुसन्धान की और आवश्यकता है।

(च) पाश्चात्य शोधकर्त्ता वूलर, जे. जौली, कीथ, मैकडानल आदि ने मनुस्मृति-सहित प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रक्षेपों का होना सिद्धान्ततः स्वीकार किया है। जे. जौली ने कुछ प्रक्षेप दर्शाये भी हैं।

(छ) मनुस्मृति के कुछ भाष्यकारों एवं समीक्षकों ने प्रक्षिप्त श्लोकों की संया इस प्रकार मानी है-

विश्वनाथ नारायण माण्डलीक      148

हरगोविन्द शास्त्री               153

जगन्नाथ रघुनाथ धारपुरे          100

जयन्त्तकृष्ण हरिकृष्णदेव          59

(ज) मनुस्मृति के प्रथम पाश्चात्त्य समीक्षक न्यायाधीश सर विलियम जोन्स उपलध 2685 श्लोकों में से 2005 श्लोकों को प्रक्षिप्त घोषित करते हैं। उनके मतानुसार 680 श्लोक ही मूल मनुस्मृति में थे।

(झ) महात्मा गांधी ने अपनी ‘वर्णव्यवस्था’ नामक पुस्तक में स्वीकार किया है कि वर्तमान मनुस्मृति में पायी जाने वाली आपत्तिजनक बातें बाद में की गयी मिलावटें हैं।

(झ) भारत के पूर्व राष्ट्रपति और दार्शनिक विद्वान् डॉ0 राधाकृष्णन्, श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि भी मनुस्मृति में प्रक्षेपों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं।

(ए) डॉ0 अबेडकर और प्रक्षेप

मैंने पहले दिखाया है कि डॉ0 अबेडकर ने अपने ग्रन्थों में मनुस्मृति के श्लोकार्थ प्रमाण रूप में उद्घृत किये हैं उनमें बहुत सारे परस्परविरोधी विधान वाले हैं (द्रष्टव्य ‘डॉ0 अबेडकर के लेखन में परस्परविरोध’ शीर्षक अध्याय 9)। आश्चर्य है कि फिर भी उन्होंने मनुस्मृति में परस्परविरोध नहीं माना। यदि वे मनुस्मृति में परस्पर -विरोध मान लेते तो उन्हें दो में से किसी एक श्लोक को प्रक्षिप्त मानना पड़ता। उस स्थिति में मनुस्मृति में प्रक्षेपों का अस्त्तित्व स्वीकार करना पड़ता। प्रक्षेपों की स्वीकृति से मनुस्मृति की विशुद्ध प्राचीन मान्यताएं स्पष्ट हो जातीं। तब न उग्र विरोध का अवसर आता और न विरोध का बवंडर उठता। किन्तु विडबना तो यह है कि डॉ0 अबेडकर ने प्रक्षेपों के अस्त्तित्व की चर्चा भी नहीं की। प्रश्न उठता है कि क्या उन्हें प्रक्षेपों की पहचान नहीं हो पायी?

यह विश्वसनीय नहीं है कि उन्हें परस्परविरोधी प्रक्षेपों का ज्ञान न हो, क्योंकि उन्होंने तो वेद से लेकर पुराणों तक प्रायः सभी ग्रन्थों में प्रक्षेप के अस्त्तित्व को स्वीकार किया है और उन पर दीर्घ चर्चा की है। देखिए-

(क) वेदों में प्रक्षेप मानना

‘‘पुरुष सूक्त के विश्लेषण से क्या निष्कर्ष निकलता है? पुरुष सूक्त ऋग्वेद में एक क्षेपक है।’’ (अबेडकर वाङ्मय, खंड ़13, पृ0 112)

‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि वे दो मन्त्र (11 और 12) बाद में सूक्त के बीच जोड़ दिए गए। अतएव केवल पुरुष सूक्त ही बाद में नहीं जोड़ा गया, उसमें समय-समय पर और मन्त्र भी जुड़ते रहे। कुछ विद्वानों का तो यह भी मत है कि पुरुषसूक्त तो क्षेपक है ही, उसके कुछ मन्त्र और भी बाद में इसमें जोड़े गए।’’ (वही, खंड 13, पृ0111)

वेदों में प्रक्षेप मानने की अवधारणा इस कारण गलत है क्योंकि बहुत प्राचीन काल से वेदव्याया ग्रन्थों में वेदों के एक-एक सूक्त, अनुवाक, पद और अक्षर की गणना की हुई है, जो लिपिबद्ध है। कुछ भी छेड़छाड़ होते ही उससे पता चल जायेगा। इसी प्रकार जटापाठ, घनपाठ आदि अनेक पाठों की पद्धति आविष्कृत है जिनसे वेदमन्त्रों का स्वरूप सुरक्षित बना हुआ है।

(ख) वाल्मीकीय रामायण में क्षेपक मानना

‘‘महाभारत की तरह रामायण की कथा वस्तु में भी कालान्तर में क्षेपक जुड़ते गए।’’ (अंबेडकर वाङ्मय, खंड 7, पृ0 120 तथा पृ0 130)

(ग) महाभारत में क्षेपक मानना

    ‘‘व्यास के ‘जय’ नामक लघु काव्यग्रन्थ में 8,800 से अधिक

श्लोक नहीं थे। वैशपायन के ‘भारत’ में यह संया बढ़कर 24000 हो गई। सौति ने श्लोकों की संया में विस्तार किया और इस तरह महाभारत में श्लोकों की संया बढ़कर 96,836 हो गई।’’

(वही, खंड 7, पृ0 127)

(घ) गीता में क्षेपक मानना

‘‘मूल भगवद्गीता में प्रथम क्षेपक उसी अंश का एक भाग है जिसमें कृष्ण को ईश्वर कहा गया है। ….. दूसरा क्षेपक वह भाग है जहां उसमें पूर्व मीमांसा के सिद्धान्तों की पुष्टि के रूप में सांय और वेदान्तदर्शन का वर्णन है, जो उनमें पहले नहीं था।………..तीसरे क्षेपक में वे श्लोक आते हैं, जिनमें कृष्ण को ईश्वर के स्तर से परमेश्वर के स्तर पर पहुंचा दिया गया है।’’(वही,खंड 7, पृ0275)

(ङ) पुराणों में क्षेपक मानना

‘‘ब्राह्मणों ने परपरा से प्राप्त पुराणों में अनेक नए अध्याय जोड़ दिए, पुराने अध्यायों को बदलकर नए अध्याय लिख दिए और पुराने नामों से ही अध्याय रच दिये। इस तरह इस प्रक्रिया से कुछ पुराणों की पहले वाली सामग्री ज्यों की त्यों रही, कुछ की पहले वाली सामग्री लुप्त हो गई, कुछ में नई सामग्री जुड़ गई तो कुछ नई रचनाओं में ही परिवर्तित हो गए।’’ (वही खंड 7, पृ0 133)

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि डॉ0 अबेडकर प्राचीन भारतीय साहित्य में प्रक्षेपों की स्थिति को समझते थे। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि उन्होंने जानबूझकर मनुस्मृति में प्रक्षेप नहीं माने।

अब यह नया प्रश्न उत्पन्न होता है कि उन्होंने जानबूझकर प्रक्षेप क्यों नहीं माने? उसमें क्या रहस्य हो सकता है?

इसका उत्तर कठोर अवश्य है, किन्तु है सत्य। उन्होंने मनुस्मृति में प्रक्षेप इस कारण स्वीकार नहीं किये क्योंकि उसके स्वीकार करने पर उनका ‘विरोध के लिए विरोध’ का आन्दोलन समाप्त हो जाता। वे दलितों के सामाजिक और राजनीतिक नेता के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे थे। इसके लिए मनु और मनुस्मृति-विरोध का अस्त्र सफलता की गारंटी था। वे इसका किसीाी कीमत पर त्याग नहीं करना चाहते थे। मनु, मनुस्मृति और आर्य (हिन्दू) धर्म का विरोध दलितों का प्रिय विषय बन गया था क्योंकि दलित जन पौराणिक हिन्दू समुदाय के पक्षपातों और अत्याचारों से पीड़ित और क्रोधित थे। इसको सीढ़ी बनाकर डॉ0 अबेडकर भविष्य की उचाइयों पर चढ़ते गये।

कुछ लोग यहां यह कह सकते हैं कि दलितों के हित के लिए ऐसा करना आवश्यक था। किन्तु यह कथन दूरदर्शितापूर्ण नहीं है। डॉ0 अबेडकर का विरोध सकारात्मक कम, प्रतिशोधात्मक अधिक था। वह विरोध दलितों को उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में ले गया जिससे भारत में एक नये वर्गसंघर्ष की परिस्थिति की आशंका उत्पन्न हो गयी है। डॉ0 अबेडकर अपने मन में हिन्दुओं के प्रति गहरी घृणा पाल चुके थे, हिन्दू धर्म को त्यागने का निश्चय कर चुके थे; अतः उन्होंने हिन्दू-दलित सौहार्द को बनाये रखने की चिन्ता की ही नहीं। यह स्थिति भारतीय समाज और राष्ट्र के लिए हितकर न थी, न रहेगी।

अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए डॉ0 अबेडकर ने मनुस्मृति की यथार्थ साहित्यिक स्थिति को, तर्क को, प्रमाण को, परपरा को, तथ्यों को, तटस्थ समीक्षा को, सत्य के अनुसन्धान के दावे को तिलांजलि दे डाली। उन्होंने विरोध करने के अतिरिक्त, सभी आपत्तियों-आरोपों के उत्तर देने के दायित्व से भी चुप्पी साध ली। उनके अनुयायियों ने उनका अनुकरण किया। आज भी स्थिति यह है कि उनके समर्थक या अनुयायी मनु और मनुस्मृति का विरोध तो करते हैं किन्तु किसी भी शंका का तर्क और प्रमाण से उत्तर नहीं देते। प्रक्षिप्त और मौलिक श्लोकों के अन्तर को वे समझना और मानना नहीं चाहते। सत्य-परिस्थिति से मुंह मोड़कर आज भी वे केवल ‘विरोध के लिए विरोध’ को अपना लक्ष्य मानकर चल रहे हैं।

सच्चाई यह है कि डॉ0 अबेडकर सहित मनुस्मृति-विरोधी साी लेखकों में कुछ एकांगी और पूर्वाग्रहयुक्त बातें समानरूप से पायी जाती हैं। उन्होंने कर्मणा वर्णव्यवस्था को सिद्ध करने वाले आपत्तिरहित श्लोकों, जिनमें स्त्री-शूद्रों के लिए हितकर और सदावपूर्ण बाते हैं, जिन्हें कि पूर्वापर प्रसंग से सबद्ध होने के कारण मौलिक माना जाता है, को मान्य ही नहीं किया । केवल आपत्तिपूर्ण श्लोकों, जो कि प्रक्षिप्त सिद्ध होते हैं, को मान्य करके निन्दा-आलोचना की है। उन्होंने इस शंका का समाधान नहीं किया है कि एक ही लेखक की पुस्तक में, एक ही प्रसंग में, स्पष्टतः परस्परविरोधी कथन क्यों पाये जाते हैं? और आपने दो कथनों में से केवल आपत्तिपूर्ण कथन को ही क्यों ग्रहण किया? दूसरों की उपेक्षा क्यों की? यदि वे लेखक इस प्रश्न पर चर्चा करते तो उनकी आपत्तियों का उत्तर उन्हें स्वतः मिल जाता। न आक्रोश में आने का अवसर आता, न विरोध का, अपितु बहुत-सी भ्रान्तियों से बच जाते।

(च) निष्कर्ष

मनुस्मृति में समय-समय पर कांट-छांट, परिवर्तन-परिवर्धन के प्रयास हुए हैं। फिर भी मनु की मूल भावना के द्योतक श्लोक यत्र-तत्र संदर्भों में मिल जाते हैं। उनसे उनकी मौलिकता का ज्ञान हो जाता है।

संक्षेप में, प्रस्तुत विषय के मौलिक और प्रक्षिप्त श्लोकों का निर्णय इस प्रकार है-

  1. मनु की व्यवस्था ‘वैदिक वर्णव्यवस्था’ है (डॉ. अबेडकर ने भी पूर्व उद्धृत उद्धरणों में इसे स्वीकार किया है), अतः गुण-कर्म-योग्यता के सिद्धान्त पर अधारित जो श्लोक हैं वे मौलिक हैं। उनके विरुद्ध जन्मना जातिविधायक और जन्म के आधार पर पक्षपात का विधान करने वाले श्लोक प्रक्षिप्त हैं क्योंकि वह सारा प्रसंग परवर्ती है।

मनु के समय जातियां नहीं बनी थीं। यही कारण है कि मनु ने वर्णों की उत्पत्ति के प्रसंग में जातियों की गणना नहीं की है। इस शैली और सिद्धान्त के आधार पर वर्णसंकरों से सबन्धित सभी श्लोक प्रक्षिप्त हैं और उनके आधार पर वर्णित जातियों का वर्णन भी प्रक्षिप्त है क्योंकि वह सारा प्रसंग परवर्ती है।

  1. इस पुस्तक में उद्धृत मनु की यथायोग्य दण्डव्यवस्था, जो कि उनका ‘सामान्य कानून’ है, मौलिक है; उसके विरुद्ध पक्षपातपूर्णदण्डव्यवस्था-विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं।
  2. इस पुस्तक में उद्धृत शूद्र की परिभाषा, शूद्रों के प्रति सद्भाव, शूद्रों के धर्मपालन, वर्णपरिवर्तन आदि के विधायक श्लोक मौलिक हैं; उनके विपरीत जन्मना शूद्रनिर्धारक, स्पृश्यापृश्य, ऊंच-नीच, अधिकारों के शोषण आदि के विधायक श्लोक प्रक्षिप्त हैं।
  3. इस लेख में उद्धृत नारियों के समान, स्वतंत्रता, समानता, शिक्षा के विधायक श्लोक मौलिक हैं, इसके विपरीत प्रक्षिप्त हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि मनु एवं मनुस्मृति को मौलिक रूप में पढ़ा और समझा जाये और प्रक्षिप्त श्लोकों के आधार पर किये जाने विरोध का परित्याग किया जाये। आदिविधिदाता राजर्षि मनु एवं आदि संविधान ‘मनुस्मृति’ गर्व करने योग्य हैं, निन्दा करने योग्य नहीं। भ्रान्तिवश हमें अपनी अमूल्य एवं महत्त्वपूर्ण आदितम धरोहर को निहित स्वार्थमयी राजनीति में घसीटकर उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिये।

मनुस्मृति में स्त्रियों के शैक्षिक एवं धार्मिक अधिकार: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

अपनी स्मृति में वेद को परम प्रमाण मानने वाले महर्षि मनु का मन्तव्य वेदोक्त ही है। विश्व के सभी धर्मों में से केवल वैदिक धर्म में और सभी देशों में से भारतवर्ष में यिों को पुरुष के कार्यों में जो सहभागिता प्राप्त है वह अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। यहां का कोई भी धार्मिक, सामाजिक या पारिवारिक आयोजन-अनुष्ठान ी को साथ लिए बिना सपन्न नहीं होता। यही मनु की मान्यता है। इसलिए उन्होंने प्रत्येक गृह-आयोजन और धर्मानुष्ठान के प्रबन्ध का दायित्व ी को सौंपा है और उसकी सहभागिता से ही प्रत्येक अनुष्ठान करने का निर्देश दिया है। वैदिक -काल में यिों को वेदाध्ययन, यज्ञोपवीत, यज्ञ आदि के सभी अधिकार प्राप्त थे। वे ब्रह्मा के पद को सुशोभित करती थीं। उच्च शिक्षा प्राप्त करके मन्त्रद्रष्ट्री ऋषिकाएं बनती थीं। वेदों को धर्म में परम-प्रमाण मानने वाले महर्षि मनु वेदानुसार यिों के सभी धार्मिक तथा उच्च शिक्षा के अधिकारों के समर्थक थे। तभी उन्होंने यिों के अनुष्ठान मन्त्रपूर्वक करना और धर्मकार्यों का अनुष्ठान यिों के अधीन रखना, घोषित किया है। प्रमाण द्रष्टव्य हैं-

(अ) वेदों में स्त्रियों के धार्मिक अधिकार

वेदों के मन्त्रों पर लगभग 26 महिलाओं के नाम का उल्लेा ऋषिका के रूप में मिलता है जो इस तथ्य की जानकारी देता है कि अपनी विद्वत्ता से उन ऋषिकाओं ने उन-उन मन्त्रों का भाष्य अथवा प्रवचन किया था, अतः उनका नाम वहां उल्लिखित है। वे हैं-

घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू) अगस्त्यभगिनी, अदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा, नदी, यमी, शाश्वती, श्री, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्रि, सूर्या, सावित्री, अदिति (बृहद्देवता 2.82-84)। इनके अतिरिक्त ब्राह्मणग्रन्थों, उपनिषदों और महाभारत में दर्जनों वेदविदुषियों का वर्णन है। वेद तो स्पष्ट आदेश देता है –

‘‘ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्’’ (अथर्ववेद 3.5.18)

    अर्थात्-‘कन्या ब्रह्मचर्यपूर्वक वेद-शास्त्रों का अध्ययन कर, विदुषी बनकर अपने सदृश पति का वरण करती है, अर्थात् करे।’ वह परिवार फिर विद्वानों का, सुशिक्षितों का परिवार बनता है। फिर उस परिवार में शिक्षित, सय, उन्नत सन्तान होती है।

(आ) मनुस्मृति में स्त्रियों के धार्मिक अधिकार

मनु भी वैदिक परपरा के प्रवर्तक एवं संवाहक हैं। वैदिक परपरा के अनुसार, मनु ने भी स्त्रियों को धर्मानुष्ठान का अधिकार सौंपा है। घर में आयोजित होने वाले सभी धर्मानुष्ठानों का मुय दायित्व पत्नी को ही दिया है। स्पष्ट है कि उन दायित्वों को विदुषी पत्नी ही सपन्न कर सकती है, अशिक्षित पत्नी नहीं। अतः नारियों का शैक्षिक एवं धार्मिक अधिकार स्वतः सिद्ध है। मनु का विधान है-

(क) ‘‘अपत्यं धर्मकार्याणि………दाराधीनः’’ (9.28)

अर्थ-‘सन्तानोत्पत्ति और धर्मकार्यों का अनुष्ठान पत्नी के दायित्व के अन्तर्गत आता है। वही इन कार्यों की स्वामिनी है।’

(ख) ‘‘शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां परिणाह्यस्य वेक्षणे।’’  (9.11)

अर्थ-‘घर की सजावट-स्वच्छता, धर्मानुष्ठानों का आयोजन, भोजन-पाक, घर की संभाल-निरीक्षण, इन कार्यों को पत्नी के अधिकार में रखे।’

(ग) ‘‘तस्मात् साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः’’ (9.96)

अर्थ-‘वेदशास्त्रों में साधारण से साधारण कर्त्तव्य और धर्मपालन पत्नी को सहभागी बनाकर करने का आदेश दिया है। पत्नी के बिना धर्मानुष्ठान अधूरा है।’

मनु यहां वेद को प्रमाण रूप में घोषित कर रहे हैं और वेद में स्त्रियों के लिए शिक्षा व धर्म का अधिकार विहित है, अतः वेद का विधान ही मनु द्वारा स्वीकृत विधान है।

(घ) इसी प्रकार स्त्रियों की विवाहविधि बिना यज्ञानुष्ठान के सपन्न नहीं मानी जाती। यज्ञ में वेदमन्त्रोच्चारण पूर्वक भागीदारी का होना उनके यज्ञाधिकार का साधक है। दैवविवाह तो होता ही यज्ञ-क्रिया-पूर्वक है (3.28)। एक अन्य स्थान पर मनु कहते हैं कि बिना यज्ञ और वेदमन्त्र-पाठ के विवाहविधि सपन्न ही नहीं होती। उसके बिना पत्नी पर पति का ‘पतित्व’ अधिकार नहीं बनता-

मंगलार्थं स्वस्त्ययनं यज्ञश्चासां प्रजापतेः।      

प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदानं स्वायकारणम्॥    (5.152)

    अर्थ-‘विवाह काल में स्वस्ति-परक मन्त्रों का पाठ और वैवाहिक यज्ञ का अनुष्ठान इन स्त्रियों के मंगल के लिए ही किया जाता है। उस यज्ञ में कन्यादान करने पर ही स्त्रियों पर पति का अधिकार बनता है, अन्यथा नहीं।’

(इ) स्त्रियों की शिक्षा तथा धार्मिक अनुष्ठान की वैदिक परपरा

(क) मनु वैदिक काल और परपरा के राजर्षि हैं। स्त्रियों के लिए शिक्षा तथा धार्मिक अनुष्ठानों का निषेध उस काल में नहीं था। अतः स्त्रियों के शिक्षा-निषेधपरक विधान मनुस्मृति के मौलिक विधान नहीं हो सकते। ये प्रक्षेप पौराणिक काल के हैं।

स्त्रियों की शिक्षा और धार्मिक अधिकारों की परपरा महाभारत काल के भी बहुत बाद तक मिलती है। आचार्य पाणिनि ने अष्टाध्यायी में ‘‘पत्युर्नो यज्ञ संयोगे’’ (4.1.33) सूत्र के द्वारा बतलाया है कि यज्ञानुष्ठान के द्वारा विवाह होने पर ही कोई स्त्री पत्नी कहलाती है। स्पष्ट है कि वह वैवाहिक यज्ञ के अनुष्ठान में भागीदारी करती है।

(ख) ब्राह्मण ग्रन्थों में बहुत ही स्पष्ट शदों में निर्देश दिया है कि गृहस्थ को पत्नी के साथ मिलकर ही यज्ञ करना चाहिए, अकेले नहीं। गृहस्थ होने के उपरान्त व्यक्ति अकेला यज्ञ करता है तो वह यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता –

    ‘‘अयज्ञियो वैष योऽपत्नीकः’’ (तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.3.3.1)

अर्थ-‘पत्नी के बिना यज्ञ करने वाला गृहस्थ यज्ञ के अयोग्य है।’            ‘‘यद्वै पत्नी यज्ञे करोति तत् मिथुनम्’’

(तैत्तिरीय संहिता 6.2.1.1)

अर्थ-‘पत्नी यज्ञ में जो अनुष्ठान करती है वह दोनों के

(पति-पत्नी के) लिए है।’ इससे बढ़कर पत्नी द्वारा यज्ञ करने का स्पष्ट वर्णन क्या हो सकता है?

(ग) इसका कारण यह है कि विवाह होने के बाद पति-पत्नी एक इकाई बन जाते हैं, उन्हें कोई भी कार्य मिलकर करना चाहिए। एक-दूसरे की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। तैत्तिरीय ब्राह्मण इसलिए घोषणा करता है –

             ‘‘अर्धो वा एष आत्मनः यत्पत्नी’’  (3.3.3.5)

अर्थपत्नी पति का आधा भाग है।जैसे शरीर के आधे भाग की उपेक्षा नहीं की जाती, उसी प्रकार पत्नी की भी सर्वत्र बराबर भागीदारी होती है।

(घ) इसी आधार पर वैदिक परपरा में अकेला पति यजमानाी नहीं हो सकता। पत्नी के साथ मिलकर ही गृहस्थ यजमान की पूर्णता होती है-

   ‘‘अर्धात्मा वा एष यजमानस्य यत् पत्नी’’ (जैमिनीय ब्रा0 1.86)

अर्थपत्नी, यजमान पति का आधा भाग है। पूर्ण यजमान पति-पत्नी के संयुक्त रूप में कहाता है।इसी प्रकार पत्नी के बिना गृहस्थ का कोई भी धर्मानुष्ठान पूर्ण नहीं होता।

(ङ) यज्ञ में पत्नी का महत्त्व इतना अधिक है कि शास्त्र पत्नी को ही यज्ञ का आधा भाग घोषित करते हैं-

‘‘पूर्वार्धो वै यज्ञस्याध्वर्युः, जघनार्धः पत्नी’’ (शतपथ0 1.9.2.3)

‘‘जघनार्धो वा एष यज्ञस्य यत्पत्नी’’ (शतपथ 1.3.1.12)

अर्थ-दोनों वाक्यों का एक ही भाव है कि ‘यज्ञ का पूर्व भाग पति है तो उत्तर भाग पत्नी है।’ यज्ञ न केवल पति-पत्नी का संयुक्त कर्त्तव्य है अपितु वह दोनों के ऐक्य का प्रतीक है।

(ग) इस प्रसंग में एक ऐतिहासिक सन्दर्भ का उल्लेख बहुत महत्त्वपूर्ण है, जो मनुपत्नी द्वारा वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान और यज्ञ में सस्वर वेदपाठ करने का प्रमाण देता है। सातवें मनु राजर्षि मनु वैवस्वत (मनु श्रद्धादेव) एक बार अपने महल में पहुंचे तो देखते हैं कि उनकी पत्नी यज्ञानुष्ठान कर रही है और उसमें उच्च स्वर से यजुर्वेद के मन्त्रों का पाठ कर रही है। काठक ब्राह्मण इस घटना का उल्लेख इस प्रकार करता है-

‘‘तत् पत्नीं यजुर्वदन्तीं प्रत्यपद्यत। तस्याः वाग् द्यां आतिष्ठत्।’’

(3.30.1)

    अर्थात्-‘मनु जब महल में पहुंचे तो उनकी पत्नी यज्ञ में यजुर्वेद के मन्त्रों का उच्च स्वर से पाठ कर रही थी। उसकी वाणी आकाश में व्याप्त हो रही थी।’

यह मनुओं की परपरा थी। जो सातवें मनु तक स्पष्ट शदों में प्राप्त है। प्रथम मनु स्वायंभुव के समय तो ऐसी वैदिक परपराएं और भी सुदृढ़ रूप में रही होंगी। ऐसी परपरा का प्रारभकर्त्ता राजर्षि मनु स्त्रियों के लिए शिक्षा तथा धार्मिक अधिकारों का निषेध विहित नहीं कर सकता, जो स्वयं वेदानुयायी हो और यज्ञप्रवर्तक हो।

(घ) बृहदारण्यक उपनिषद् में ब्रह्मविद्या की ज्ञाता गार्गी वाचक्नवी नामक विदुषी का उल्लेख है। उसने ब्रह्मविद्या के सर्वोच्च ज्ञाता ऋषि याज्ञवल्क्य से संवाद किया था (3.6.2;3.8.1)। याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी भी ब्रह्मवादिनी थी (2.4.2; 4.5.2)।

(ङ) महाभारत में गार्गी सहित एक दर्जन से अधिक विदुषियों का वर्णन आता है। उनमें सुलभा का विशेष महत्त्व है। अन्य विदुषियां थीं शिवा, सिद्धा, श्रुतावली, विदुला आदि (शान्ति 320.82; उद्योग0 109.18; शल्य0 54.6; उद्योग0 133 आदि)

(च) आचार्य पाणिनि ने विदुषियों की अनेक उपाधियों का उल्लेख अष्टाध्यायी में किया है जो यह जानकारी उपलध कराता है कि तब तक उस स्तर की विदुषियां होती थीं। मीमांसा दर्शन की काशकृत्स्नि व्याया की विशेषज्ञा महिलाओं को ‘काशकृत्स्ना’ कहा जाता था। गुरुकुलों में ‘आचार्या’ और ‘उपाध्याया’ पदवीधारी अध्यापिकाएं हुआ करती थीं (4.1.49)। वेदों की शाखा-विशेष का अध्ययन करने के अनुसार कोई ‘कठी’ तो कोई ‘बह्वृची’ कहलाती थी (4.1.63)। युद्ध विद्या में पारंगत क्षत्रिया विदुषियों का उल्लेख भी पाणिनि ने किया है। ‘शक्ति’ नामक अस्त्र में प्रवीण ‘शाक्तिकी’ और लाठी चलाने में प्रवीण स्त्री को ‘याष्टिकी’ कहा गया है। गुरुकुलों के छात्रावास में रहकर अध्ययन करनेवाली छात्राओं के निवास को ‘छात्रिशाला’ कहा जाता था (6.2.86)।

(छ) यम स्मृति में कन्याओं के उपनयन और वेदाध्ययन का उल्लेख है-

‘‘पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते।

अध्यापनं च वेदानां सावित्रीवाचनं तथा॥’’

(ज) हारीत स्मृति में विदुषी महिलाओं के ‘ब्रह्मवादिनी’ वर्ग का वर्णन आता है (21.23)। वे वेदादिशास्त्रों का गभीर अध्ययन करके ही ब्रह्मवादिनी बनती थीं।

(झ) स्त्रियों के अध्ययन की परपरा तो बहुत अर्वाचीन काल तक चली है। शंकराचार्य प्रथम (लगभग 2500 वर्ष पूर्व) के समय मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने शंकराचार्य से शास्त्रार्थ किया था। राजशेखर की पत्नी अवंतीसुन्दरी प्रसिद्ध विदुषी हुई है। कर्नाटक प्रदेश की राजकुमारी बिज्जिका वैदर्भी काव्यरीति की प्रसिद्ध विदुषी मानी गयी है, जिसका ‘कौमुदी महोत्सव’ नाटक सुवियात है। पांचाली काव्यरीति की विदुषी भट्टारिका का नाम तथा लाटी काव्यरीति के लिए देवी नामक विदुषी का नाम प्रसिद्ध है।

स्त्रियों के प्रति मनु के दृष्टिकोण की समीक्षा: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

यहां प्रसंगवश यह स्पष्ट कर देना उपयोगी रहेगा कि मनु गुणों के प्रशंसक हैं और अवगुणों के निन्दक। गुणियों को समानदाता हैं, अवगुणियों को दण्डदाता। यदि उन्होंने गुणवती यिों को पर्याप्त समान दिया है, तो अवगुणवती यिों की निन्दा की है और दण्ड का विधान किया है। मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं, और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकार हैं। इसीलिए उन्होंने यिों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की बदनामी होने की आशंका रहती है (5.149; 9.5-6)। देखिए एक प्रमाण-

पित्रा भर्त्रा सुतैर्वापि नेच्छेद् विरहमात्मनः।    

एषां हि विरहेण स्त्री गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले॥ (5.149)

    अर्थ-‘किसी भी स्त्री को अपने पिता, पति या पुत्र के संरक्षण से रहित अपने आपको एकाकी रखने की इच्छा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इनसे पृथक् एकाकी रहने से दो कुलों के (अपने और पति के) अपयश की आशंका बनी रहती है।’ कारण यह है कि एकाकी रूप में रहते हुए स्त्री अपराधियों से अपनी रक्षा नहीं कर सकती। किसी स्त्री को पुरुष-संरक्षण के बिना एकाकी रहते देखकर अपराधी उसकी ओर कुदृष्टि रखने लगते हैं।

इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु यिों की स्वतन्त्रता के विरोधी हैं। इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता सुरक्षा की है। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य। भोगवादी आपराधिक प्रवृत्तियां उसके स्वयं के सामर्थ्य को सफल नहीं होने देतीं। उदाहरणों से पता चलता है और यह व्यावहारिक सच्चाई है कि शधारिणी डाकू यिों तक को भी पुरुष-सुरक्षा की आवश्यकता रहती है। मनु के उक्त कथन को आज की राजनीतिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में देखना सही नहीं है। आज देश में एक शासन है और कानून उसका रक्षक है। फिर भी हजारों नारियां अपराधों की शिकार होकर जीवन की बर्बादी की राह पर चलने को विवश हैं। प्रतिदिन बलात्कार, अपहरण, नारी-हत्या जैसे जघन्य अपराधों की अनेक घटनाएं होती हैं। जब राजतन्त्र में उथल-पुथल होती है, कानून शिथिल पड़ जाते हैं, तब क्या परिणाम होगा, उस स्थिति में मनु के वचनों का मूल्यांकन करके देखना चाहिये। तब यह मानना पड़ेगा कि वे शतप्रतिशत सही हैं।

मनुस्मृति में पति-पत्नी को त्यागने की परिस्थितियों का वर्णन: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

(अ) मुयतः मनु का यही आदेश है कि विवाह सोच-विचार कर तथा पारस्परिक प्रसन्नता से समान, योग्य युवक और युवती से करें। विवाह के पश्चात् यह आदेश है कि पति पत्नी को और पत्नी पति को संतुष्ट और प्रसन्न रखे। इस प्रकार रहते हुए उन्हें निर्देश है कि वे सदा यह प्रयास रखें कि आजीवन एक-दूसरे से बिछुड़ने का अवसर न आये। मनु का यह प्रथम सिद्धान्त है-

(क) अन्योन्यस्याव्यभिचारो भवेदामरणान्तिकः।

       एषः धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्रीपुंसयोः परः॥ (9.101)

(ख)    तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ।

       यथा नाभिचरेतां तौ वियुक्तौ इतरेतरम्॥ (102)

    अर्थ-‘पति और पत्नी का संक्षेप में सबसे प्रमुख धर्म यह है कि दोनों सदा यह प्रयत्न करें कि मृत्युपर्यन्त दोनों का मर्यादा-अतिक्रमण और पार्थक्य (तलाक) न हो।’

‘विवाह करने के बाद स्त्री और पुरुष सदा ऐसा यत्न करें जिससे वे एक-दूसरे से पृथक् न हों और ऐसे कार्य तथा व्यवहार करें जिससे घर में पृथकता का वातावरण ही न बने।’

(आ) किन्तु इन्हीं श्लोकों की भाषा से यह ध्वनित होता है कि किन्हीं विशेष कारणों से अलग होने का अवसराी अपवाद रूप में होता था। कुछ स्थितियां मनुस्मृति में वर्णित भी हैं जब पति या पत्नी एक दूसरे को छोड़ सकते हैं-

(क) पत्नी को निम्न स्थितियों में छोड़ा जा सकता है-

वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्यादे दशमे तु मृतप्रजा।        

एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥   (9.81)

    अर्थात्-‘स्त्री वन्ध्या हो तो आठ वर्ष पश्चात्, स्त्री को सन्तान होकर मर जाती हों तो दश वर्ष पश्चात्, और पत्नी कटुवचन बोलने वाली हो तो उसको शीघ्र ही छोड़ा जा सकता है।’

(ख) पति को निन स्थितियों में छोड़ा जा सकता है

       प्रोषितो धर्मकार्यार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः।

       विद्यार्थं षट् यशोऽर्र्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान्॥ (9.76)

    अर्थात्-‘यदि पति परदेस जाकर निनलिखित अवधि तक न लौटे तो पत्नी को दूसरा पति करने का अधिकार है-धर्मकार्य के लिए आठ वर्ष तक, विद्याप्राप्ति अथवा प्रसिद्धि प्राप्ति के लिए छह वर्ष तक, धन प्राप्ति के लिए तीन वर्ष तक।’

(इ) किन्तु निर्दोष अवस्था में एक-दूसरे को त्यागने पर दोषी व्यक्ति राजा द्वारा दण्डनीय है-

न माता न पिता न स्त्री न पुत्रस्त्यागमर्हति।      

त्यजन्नपतितानेतान्, राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥       (8.389)

    अर्थ-‘बिना गभीर अपराध के माता, पिता, पत्नी, पुत्र का त्याग नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर राजा द्वारा त्यागकर्त्ता को छह सौ पण दण्ड देना चाहिए और त्यक्त परिजनों को साथ रखने का आदेश देना चाहिये।’

स्त्रियों की सुरक्षा के विशेष नियम: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

(अ) स्त्रियों के धन की सुरक्षा के विशेष निर्देश

    स्त्रियों को अबला समझकर कोई भी, चाहे वह बन्धु-बान्धव ही क्यों न हों, यदि यिों के धन पर अधिकार कर लें, तो मनु नेउन्हें चोर सदृश दण्ड से दण्डित करने का आदेश दिया है

(9.212; 3.52; 8.28; 8.29)। कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं-

वन्ध्याऽपुत्रासु चैवं स्याद् रक्षणं निष्कुलासु च।

पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च॥ (8.28)

जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः।

तान् शिष्यात् चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः॥ (8.29)

    अर्थ-‘सन्तानहीन, पुत्रहीन, जिसके कुल में कोई पुरुष न बचा हो, पतिव्रत धर्म पर स्थिर, विधवा और रोगिणी, इन स्त्रियों के धन की रक्षा करना राजा का कर्त्तव्य है।’

‘यदि जीते-जी इनके धन को इनके परिजन या सगे-सबन्धी ले लें तो उनको धार्मिक राजा चोर के समान मानकर उसी दण्ड से दण्डित करे और उक्त स्त्रियों का धन दिलवाये।’

(आ) नारियों के प्रति किये अपराधों में कठोर दण्ड

    यिों की सुरक्षा के दृष्टिगत नारियों की हत्या और उनका अपहरण करने वालों के लिए मृत्युदण्ड का विधान करके तथा बलात्कारियों के लिए यातनापूर्ण दण्ड देने के बाद देश-निकाला का आदेश देकर मनु ने नारियों की सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने का यत्न किया है। नारियों के जीवन में आने वाली प्रत्येक छोटी-बड़ी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये हैं। पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगड़ा न करें (4.180)। नारियों पर मिथ्या दोषारोपण करने वालों, नारियों को निर्दोष होते हुए त्यागने वालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभाने वालों के लिए दण्ड का विधान है।

(क) स्त्रियों के अपहरण पर दण्ड-

पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः।  

मुयानां चैव रत्नानां   हरणे वधमर्हति॥      (8.323)

    अर्थ-‘स्त्रियों का विशेष रूप से तथा कुलीन पुरुषों का अपहरण करने पर अपराधी को मृत्युदण्ड देना चाहिए। इसी प्रकार रत्न आदि प्रमुख पदार्थों की चोरी-डकैती के अपराध में भी मृत्युदण्ड होना चाहिए।’

(ख) स्त्रियों से बलात्कार करने पर यातनापूर्ण दण्ड-

परदाराभिमर्शेषु प्रवृत्तान् नृन् महीपतिः।      

उद्वेजनकरैः दण्डैः छिन्नयित्वा प्रवासयेत्॥  (8.352)

    अर्थ-‘राजा, स्त्रियों से बलात्कार और व्याभिचार में संलग्न लोगों के हाथ, पैर काटना आदि यातनापूर्ण दण्ड देकर उन्हें अपने देश से निकाल दे।’

(ग) स्त्रियों की हत्या करने पर दण्ड-

    ‘‘स्त्रीबालब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा।’’ (9.232)

    अर्थ-‘स्त्रियों, बालकों, सदाचारी ब्राह्मणविद्वानों की हत्या करने वालों और शत्रुओं के सहयोगी लोगों को राजा मृत्युदण्ड से दण्डित करे।’

दायभाग में पुत्र-पुत्री का समान अधिकार: डॉ. सुरेन्द्र कुमार

संसार के प्रथम विधिनिर्माता महर्षि मनु ने पैतृक सपत्ति में पुत्र-पुत्री को समान अधिकारी माना है। उनका यह मत मनुस्मृति के 9.130, 192 में वर्णित है। मनु के उस मत को प्रमाण मानकर आचार्य यास्क ने निरुक्त में इस प्रकार उद्धृत किया गया है-

(क) अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः।

       मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायभुवोऽब्रवीत्॥   (3.4)

    अर्थात्-‘सृष्टि के प्रारभ में स्वायभुव मनु ने यह विधान किया है कि धर्म अर्थात् कानून के अनुसार दायभाग = पैतृक सपत्ति में पुत्र-पुत्री का समान अधिकार होता है।’ इसी प्रकार मातृधन में केवल कन्याओं का अधिकार विहित करके मनु ने परिवार में कन्याओं के महत्त्व में अभिवृद्धि की है (9.131)। इस विषय में महर्षि मनु का स्पष्ट मत यह है-

(ख)    यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा।

       तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत्॥   (9.129)

    अर्थ-‘पुत्र अपने आत्मा का ही एक रूप होता है, उस पुत्र के समान ही पुत्री भी आत्मारूप होती है, उनमें कोई भेद नहीं। जब तक आत्मारूप पुत्र और पुत्री जीवित हैं तब तक माता-पिता का धन उन्हें ही मिलेगा, अन्य कोई उसका अधिकारी नहीं है।’

(ग) एक अन्य धन-विभाजन में माता और भाई के धन में क्रमशः पुत्र-पुत्रियों और भाई-बहनों का समान भाग वर्णित किया है –

जनन्यां संस्थितायां तु समं सर्वे सहोदराः।      

भजेरन् मातृकं रिक्थं भगिन्यश्च सनाभयः॥    (9.192)

सोदर्या विभजेरन् तं समेत्य सहिता समम्।      

भ्रातरो ये च संसृष्टा भगिन्यश्च सनाभयः॥     (9.212)

    अर्थ-‘माता के देहान्त के पश्चात् सभी सगे भाई और सगी बहनें मातृधन को बराबर बांट लें।’

‘इसी प्रकार किसी अविवाहित भाई के मर जाने पर सभी सगे भाई व बहनें मिलकर उसके धन को बराबर बांट लें।’

इन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि मनु ऐसे पहले संविधान-निर्माता हैं जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के पुत्र-पुत्री को समान माना है और बराबर दायभाग प्रदान किया है।