Category Archives: Islam

मस्जिद का मौलाना बोला – “इस्लाम कबूल कर लो अमित नहीं तो पूरे परिवार का करवा देंगे कत्लेआम”

मस्जिद का मौलाना बोला – “इस्लाम कबूल कर लो अमित नहीं तो पूरे परिवार का करवा देंगे कत्लेआम”

गौ रक्षकों पर तरफ तरफ के उलटे सीधे आरोप लगाने वालों के लिए ये खबर निश्चित रूप से उपयोगी और महत्वपूर्ण है क्योंकि वो खांसी का इलाज़ कर रहे हैं जबकि कहीं कैंसर पनप रहा है जिसे वो नजरअंदाज कर रहे हैं .  मामला कहीं किसी इस्लमिक या खाड़ी देश का नहीं है बल्कि ये मामला है योगी आदित्यनाथ द्वारा शासित उत्तर प्रदेश का. पश्चिम उत्तर प्रदेश के मेरठ का रहने वाला अमित हुआ है इस बार इस अत्याचार और जबरन धर्मांतरण के दबाव का शिकार . पीड़ित माधवपुरम का रहने वाला अमित भरद्वाज है जिसने १० साल पहले घंटाघर की शबनम ने प्रेम विवाह किया था . तब से वो कट्टरपंथियों के निशाने पर आ चुका था . उस पर तमाम दबाव बनाने के साथ हमले भी हुए पर उसने कभी भी शबनम को खुद से अलग नहीं होने दिया . अमित का आरोप है कि खरखौदा का रियाजुद्दीन एक मस्जिद में मौलाना है जो खुद को उस इलाके का दबंग बताता है . पिछली सरकार में उसकी पुलिस आदि में अच्छी पकड़ थी . उसकी के चलते उसने एक दिन अमित का जबरदस्ती अपने साथियों के साथ खतना कर डाला और मुँह बंद रखने की धमकी दी. अमित के मुताबिक अब वही मौलाना रियाजुद्दीन अमित के ऊपर दबाव बना रहा है इस्लाम कबूल कर के हर इस्लामिक कायदों को मानने का दबाव बनाने लगा है . अमित के अनुसार रियाजुद्दीन बार बार अपनी ऊंची पकड़ होने का हवाला दे कर कहता है कि यदि उसने उसकी बात नहीं मानी या कहीं मुँह खोला तो उसका , उसकी पत्नी और उसके दोनों बच्चो का सामूहिक नरसंहार कर दिया जाएगा

source : http://www.sudarshannews.com/category/state/categorystatemaulana-threat-to-hindu-family-for-mass-murder–1685

हदीस : नैतिक निष्ठाएं

नैतिक निष्ठाएं

मुहम्मद का मजहब प्रधानतः मीमांसात्मक है। तथापि उसमें नैतिक निष्ठाओं की पूरी तरह उपेक्षा नहीं की गई है। इस्लाम-पूर्व काल में अरब लोग उन अनेक नैतिक निष्ठाओं में आस्था रखते थे, जो समस्त मानव-जात में समान रूप से मान्य रही है। मुहम्मद ने इन निष्ठाओं को कायम रहने दिया, परन्तु उन्हें एक साम्प्रदायिक मोड़ दे दिया। मुसलमान सभी मामलों में स्वयं को मिल्लत का ऋणी मानता है, दूसरों के प्रति आभार-भाव उसमें नगण्य होता है। मानव जाति के अंगभूत गैर-मुसलमानों के प्रति वह किसी भी नैतिक या आध्यात्मिक दायित्व की भावना नहीं रखता। उनके प्रति तो उसका भाव यही रहता है कि तलवार से, तथा लूट कर और जजिया लगाकर उनका मतान्तरण किया जाए। मसलन, सद्भाव एक सार्वभौम मानवीय निष्ठा है और हमें इसका व्यवहार करना ही चाहिए-सम्बन्धित व्यक्ति की राष्ट्रीयता अथवा उसके उपासना-पंथ का विचार किए बिना। किन्तु इस्लाम में, सद्भाव केवल मुसलमानों तक सीमित रहता है। एक जगह मुहम्मद ’अल-दीन‘ (’मजहब‘ यानी इस्लाम) की व्याख्या ”सद्भाव एवं शुभेच्छा“ के रूप में करते हैं जोकि किसी भी मजहब की एक सम्यक् परिभाषा होनी चाहिए। पर जब उनसे पूछा गया कि ”किसके प्रति सद्भाव एवं शुभेच्छा ?“ तब उन्होंने उत्तर दिया-”अल्लाह के प्रति, आस्मानी किताब के प्रति, अल्लाह के रसूल के प्रति, इस्लामी नेताओं-नायकों तथा सर्वसाधारण मुसलमान के प्रति“ (98)। जरीर बिन अब्दुल्ला बतलाते हैं कि उन्होंने ”प्रत्येक मुसलमान के प्रति सद्भाव एवं शुभेच्छा पर ही अल्लाह के पैगम्बर के प्रति निष्ठा प्रतिष्ठित की है“ (122)।

 

इसी तरह का मोड़ अन्य नैतिक निष्ठाओं में भी उभारा गया है और सार्वभौम को साम्प्रदायिक बना डाला गया है। मुहम्मद अपने अनुयायियों से कहते हैं-”किसी मुसलमान को अपशब्द कहना अपराध है और किसी मुसलमान से लड़ना कुफ्र है“ (122)।

लेखक : रामस्वरूप

hadees: ABLUTION (WuzU)

ABLUTION (WuzU)

Muhammad emphasizes the need for bodily cleanliness.  He tells his followers that �cleanliness is half of faith� (432) and that their prayer will not be accepted in a state of impurity till they �perform ablution� (435).  But impurity here has a strictly ritualistic meaning.

Muhammad was a Unitarian in his theology but a Trinitarian in his ablution.  He performed his ablution like this: �He washed his hands thrice.  He then rinsed his mouth and cleaned his nose three times.  He then washed his face three times, then washed his right arm up to the elbow three times, then washed his left arm like that, then wiped his head, then washed his right foot up to the ankle three times, then washed his left foot,� and so on.  Muhammad said that �he who performs ablution like this ablution of mine . . . and offered two rak�ahs [sections] of prayer . . . all his previous sins are expiated� (436).  This became the standard ablution.  According to Muslim canon scholars, this is the most complete of the ablutions performed for prayer.  There are twenty-one ahAdIs repeating Muhammad�s practice and thought on the subject as given above (436-457).

author : ram swarup

हदीस : सत्कर्म और दुष्कर्म

सत्कर्म और दुष्कर्म

सत्कर्म क्या है ? और दुष्कर्म क्या ? विभिन्न धर्मपंथों, विभिन्न दर्शनधाराओं तथा विभिन्न गुरूओं ने इन प्रश्नों पर मनन किया है। इस्लाम ने भी इनके विशिष्ट उत्तर प्रस्तुत किये हैं। वह बतलाता है कि सत्कर्मों को स्वतन्त्र रूप में नहीं देखना चाहिए, उनके साथ सही मजहब का चुनाव भी जरूरी है। सही मुस्लिम के अनुवादक अब्दुल हमीद सिद्दीकी इस्लामी दृष्टि को यूं रखते हैं-”अज्ञान की दशा में (इस्लाम के दायरे से बाहर रहने पर) किये गये अच्छे काम इस तथ्य के सूचक हैं कि व्यक्ति सदाचार की ओर उन्मुख है। किन्तु सच्चे अर्थों में सदाचारी तथा धर्मात्मा होने के लिए अल्लाह की इच्छा की सही-सही समझ अतयावश्यक है। ऐसी समझ इस्लाम में मूर्त है और सिर्फ पैगम्बर के माध्यम से ही विश्वस्त रूप में जानी जा सकती है। इस तरह, इस्लाम पर ईमान लाये बिना हम अपने स्वामी और प्रभु की सेवा इसकी इच्छानुसार नहीं कर सकते……….. सत्कर्म अपने-आप में अच्छे हो सकते हैं, पर इस्लाम कबूत करने पर ही ये सत्कर्म अल्लाताला की नजर में महत्वपूर्ण और सार्थक हो पाते हैं।“ (टी0 218)।

 

मुहम्मद की नजर में, गलत मजहब अनैतिक कर्मों से भी अधिक बदतर है। जब उनसे पूछा गया-”अल्लाह की नजर में कौन सा पाप विकटतम है ?“ तो उन्होंने उत्तर दिया-”यह कि तुम अल्लाह की जात में किसी और को शरीक करो।“ अपने बच्चे का कत्ल और पड़ौसी की बीबी से व्यभिचार मुहम्मद के अनुसार दूसरे और तीसरे नंबर के पाप हैं (156)।

 

दरअसल सिर्फ गलत मजहब ही किसी मुसलमान को जन्नत के बाहर रख सकता है। अन्यथा कोई भी अनैतिक दुष्कृत्य जन्नत में उनके प्रवेश में बाधक नहीं बनता-व्यभिचार और चोरी तक नहीं। मुहम्मद हमें बतलाते हैं-”जिब्रैल मेरे पास आये और संवाद किया कि वस्तुतः तुम्हारी उम्मा (संप्रदाय, कौम, समुदाय) में जो लोग अल्लाह को किसी और के साथ जोड़े बिना जिन्दगी पूरी कर गये, वे जन्नत में दाखिल होंगे।“ इस स्पष्ट करने के लिए इस हदीस का वर्णन करने वाला अबू जर्र मुहम्मद से पूछता है कि क्या यह उस शख्स के वास्ते भी सच है जिसने व्यभिचार व चोरी की हो। मुहम्मद उत्तर देते हैं-”हाँ, उसके वास्ते भी, जिसने व्यभिचार व चोरी की हो“ (171)। अनुवादक इस मुद्दे को आगे स्पष्ट करते हैं-”व्यभिचार और चोरी, दोनों इस्लाम में संगीन जुर्म करार दिए गए हैं, किन्तु ये जुर्म मुजरिम को अनन्त नरक की सजा नहीं देते।“ किन्तु बहुदेववाद अथवा किसी और देवता को ”अल्लाह के साथ जोड़ने की कोशिश एक अक्षम्य अपराध है, और अपराधकत्र्ता को अनन्त नरकवास करना पड़ेगा“ (टी0 168 एवं 170)।

 

जिस परिमाण में बहुदेववाद विकटतम अपराध है, उसी में ममेश्वरवाद सर्वोत्तम सत्कर्म है। जब मुहम्मद से ”सर्वोत्तम कर्मों“ के बारे में सवाल होता है तो वे जवाब देते हैं-”अल्लाह पर विश्वास ही सर्वोत्तम कर्म है।“ उनसे पूछा जाता है-”उसके बाद बाद ?“ वे बतलाते हैं-”जिहाद (148)। मुस्लिम पंथमीमांसा में निश्चय ही ”अल्लाह पर विश्वास“ का मतलब है ”अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास“ जब एक बार कोई अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास कर लेता है, तब उसके अतीत के सब अपराध धुल जाते हैं और भविष्य का भय नहीं रह जाता है। यह आश्वासन मुहम्मद ने उन बहुदेववादियों को दिया ”जिन्होंने बड़ी संख्या में हत्याएँ की थीं और जो व्यापक व्यभिचार में लिप्त रहे थे“ किन्तु जो मुहम्मद के साथ आने को तैयार थे। एक अन्य व्यक्ति से भी अपने अतीत के पापों के प्रति अपराध-भावना का अनुभव कर रहा था, मुहम्मद ने कहा-”क्या तुम्हें यह असलियत मालूम नहीं है कि इस्लाम पहले के सब बुरे कर्मों को धो-पोंछ डालता है ?“ (220)।

लेखक : रामस्वरूप

HADEES : Purification (TahArah)

Purification (TahArah)

The next book is the �Book of Purification.� It deals with such matters as ablution, defecation, and abstersion.  It relates not to inner purity but to certain acts of cleanliness, physical and ritualistic, that must be performed before reciting the statutory daily prayers.  The main topics discussed in Muslim fiqh (canon law) under this heading are: (1) wuzU, minor ablution of the limbs of the body, prescribed before each of the five daily prayers and omitted only if the worshipper is sure that he has not been polluted in any way since the last ablution; (2) ghusl, the major, total ablution of the whole body after the following acts which make a person junub, or impure: coitus (jimA), nocturnal pollution (ihtilAm), menses (hayz), and childbirth (nifAs); (3) tayammum, the minor purification with dust in the place of water; (4) fitra, literally �nature,� but interpreted as customs of the previous prophets, including acts like the use of the toothpick (miswAk), cleansing the nose and mouth with water (istinshAq), and abstersion (istinjA) with water or dry earth or a piece of stone after evacuation and urination; (5) tathIr, the purification of objects which have become ritualistically unclean.

Some broad injunctions on the subject of purification are given in the QurAn (e.g., verses 4:43 and 5:6), but they acquire fullness from the practice of the Prophet.

author:  ram swaroop