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Irfan Pathan’s ‘un-Islamic’ post: Muslim cleric Maulana Sajid Rashidi hits out at all-rounder’s ‘shameful act’ Maulana Sajid Rashidi said that people on social media are merely telling him that doing this is wrong and asked why does Irfan Pathan needs to post pictures of his wife.

Irfan Pathan’s ‘un-Islamic’ post: Muslim cleric Maulana Sajid Rashidi hits out at all-rounder’s ‘shameful act’

Maulana Sajid Rashidi said that people on social media are merely telling him that doing this is wrong and asked why does Irfan Pathan needs to post pictures of his wife.

Irfan Pathan's 'un-Islamic' post: Muslim cleric Maulana Sajid Rashidi hits out at all-rounder's 'shameful act'
Image Courtesy: ANI/Twitter

New Delhi: Indian speedster Irfan Pathan was at the receiving end on social media after he posted a photograph with wife Safa Baig. (Sara Baig – All you need to know about Irfan Pathan’s wife)

The all-rounder faced severe backlash with people from different religious communities calling the post ‘un-Islamic’.

Calling it ‘un-Islamic’, Maulana Sajid Rashidi said that Irfan Pathan’s background is very religious as his father was a muezzin, and so posting his wife’s picture on social media is a shameful act.

“A woman can show her face only to her husband and in cases involving law related things such as aadhaar or pan card, only then can she show her face,” he added.

He also said that it is due to his religious background that people started “reminding” him about his religion, and that this was not a troll.

Calling the act shameful, Sajid Rashidi said, “His wife isn’t an actor that she somehow comes in front of the camera, she is a home maker and hence uploading her pictures like that is a shameful act.”

He further advised the cricketer to not do anything that is not allowed in Islam.

“Right to freedom is only according to the Indian constitution, what I am telling is the Islamic law and Islamic law doesn’t allow this,” he added.

He said that people on social media are merely telling him that doing this is wrong and asked why does Irfan Pathan needs to post pictures of his wife.

“There are so many people who are watching his wife’s picture and also nail-polish is visible in the picture, and if nail-polish has been applied, one can’t read namaz and if one does not read namaz, what kind of Muslim are they?,” he added.

Irfan tied nuptial knots with Safa Baig at Haram Shareef, in the holy city of Mecca in February 2016.

The duo had been dating for two years before they decided to take their relationship to the next level.

There were no grand celebrations as the Pathan family conducted a low-key affair.

There were no high-profile guests at the function with only family members of the couple present during the ‘nikaah’.

A dinner party was held by the Pathan family at a luxury hotel at Al-Hindaweeyah.

(With ANI inputs)

source : http://zeenews.india.com/cricket/irfan-pathans-un-islamic-post-muslim-cleric-maulana-sajid-rashidi-hits-out-at-all-rounders-shameful-act-2024974.html

मुस्लिम महिला ने लिखी किताब, ‘हलाल गाइड टू माइंड ब्लोइंग सेक्स’

 मुस्लिम महिला ने लिखी किताब, ‘हलाल गाइड टू माइंड ब्लोइंग सेक्स’

लंदन
अब मुस्लिम महिलाओं के लिए भी सेक्स गाइड आ गई है। खास बात यह कि यह ‘हलाल सेक्स’ गाइड है। कम से कम मुस्लिम लेखिका का दावा तो यही है। पिछले हफ्ते आई इस किताब ने खासतौर पर मुस्लिम समाज में सेक्स को लेकर एक बहस छेड़ दी है। किताब ‘द मुस्लिमा सेक्स मैन्युअल: अ हलाल गाइड टू माइंड ब्लोइंग सेक्स’ टाइटल से ऐमजॉन पर उपलब्ध है।

इस किताब की लेखिका ने फिलहाल अपनी पहचान छिपा रखी है। उन्होंने एक दूसरी पहचान ‘उम मुलाधत’ के नाम से इस किताब को लिखा है। कहा जा रहा है कि ‘हलाल सेक्स’ और शादीशुदा मुस्लिम महिलाओं को सेक्स सिखाने वाली यह अपनी तरह की पहली किताब है।

सवाल यह है कि आखिर लेखिका को ‘हलाल सेक्स’ गाइड लिखने की जरूरत ही क्यों पड़ी? इसका जवाब मुस्लिम समाज में सेक्स को लेकर टैबू से जुड़ा हुआ है। लेखिका ने इस किताब के बारे में अपनी वेबसाइट पर लिखा है। उन्होंने अपनी एक मुस्लिम महिला मित्र की शादी का जिक्र किया है, जो अपनी सगाई के दौरान काफी खुश नजर आ रही थी।

शादी के कुछ दिनों बाद जब लेखिका अपनी मित्र से मिली तो उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी। बातचीत के दौरान दोस्त ने स्वीकार किया कि उसकी सेक्स लाइफ नहीं के बराबर है। ऐसा तब था जब लेखिका की मित्र मेडिकल फील्ड से आती थी और उसे स्त्री-पुरुष शरीर का पूरा ज्ञान था। लेखिका के मुताबिक, उसे सेक्स के बारे में नहीं पता था।
अपनी वेबसाइट पर इसके बारे में लेखिका ने लिखा, ‘ओह, वह मकैनिक्स (सेक्स प्रकिया) जानती थी। पेनिस को वजाइना में डालना। क्लाइमेक्स। विद्ड्रॉ। लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि कैसे अपने पति को बिस्तर पर खुद के लिए तरसाए। वह नहीं जानती थी कि पति को क्या पसंद है। उसे खुद की भी पसंद पता नहीं थी।’

इसके बाद लेखिका ने अपनी शादीशुदा जिंदगी के दौरान हासिल सेक्स अनुभवों को उसे बताया। लेखिका ने सेक्स को लेकर तमाम जानकारियां अपनी दोस्त के साथ शेयर कीं। लेखिका के मुताबिक एक महीने बाद जब उसकी दोस्त फिर मिली तो इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान थी। दोस्त ने तब लेखिका से कहा कि इन सारी बातों को लिखो और मुस्लिम लड़कियों के साथ शेयर करो।

लेखिका ने सबकुछ लिखकर एक वर्ड डॉक्युमेंट बनाया और अपनी दोस्त को भेजा। दोस्त ने उस डॉक्युमेंट को दूसरी नई शादीशुदा दोस्तों के साथ शेयर किया। इसके बाद लेखिका से किताब लिखने को कहा गया। इस तरह से किताब की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

किताब में लेखिका ने सेक्स को लेकर बेहद बोल्ड माने जानी वाली चीजों का भी जिक्र किया है। ऐमजॉन पर इस ‘हलाल सेक्स’ गाइड के कॉन्टेंट्स काफी बोल्ड नजर आ रहे हैं। इनमें डर्टी टॉक, फ्लर्टिंग विद अदर मेन, फर्स्ट टाइम, किसिंग, हैंड जॉब्स, हाउ टू गीव अ ब्लो जॉब, मसाज, स्ट्रिपिंग, पोजिशंस, रफ सेक्स, फोर्स्ड सेक्स, BDSM, पब्लिक सेक्स, एनल प्ले और थ्रीसम जैसे टॉपिक्स शामिल हैं।

द इंडिपेंडेंड से बात करते हुए लेखिका ने कहा कि उसे इस किताब को लेकर पॉजिटिव फीडबैक मिले हैं। पुरुषों ने भी उनसे संपर्क साध यह जानने की कोशिश की है कि अपनी पत्नियों को संतुष्ट कैसे करें। इसके बाद वह इस किताब के फॉलोअप पर भी विचार कर रही हैं। इस किताब में उन्होंने अपने एक्स्पीरियंस, दोस्तों से मिले टिप्स का इस्तेमाल किया है।

source : http://navbharattimes.indiatimes.com/world/britain/muslim-woman-writes-halal-guide-to-mind-blowing-sex/articleshow/59650010.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral&utm_campaign=muslim180717

हदीस : अन्य उपवास

अन्य उपवास

कई-एक अन्य उपवासों का भी उल्लेख है। एक ही अशुर उपवास, जो मुहर्रम के दसवें दिन रखा जाता है। अशुर के दिन का ”यहूदी सम्मान करते थे और वे उसे ईद मानते थे“ (2522) और इस्लाम से पहले के युग में ”कुरैश लोग उस दिन उपवास रखते थे“ (2499)। पर जब मुहम्मद ने मदीना की ओर प्रवास किया, तब उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए उसे वैकल्पिक बना दिया। अन्य स्वैच्छिक उपवासों का भी उल्लेख है, किन्तु उन पर विचार करने की यहां आवश्यकता नहीं।

 

इन उपवासों के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि कोई व्यक्ति सुबह उपवास करने का संकल्प सुना सकता है। और शाम को बिना किसी वजह के उसे भंग कर सकता है। एक दिन मुहम्मद ने आयशा से कुछ खाने को मांगा, पर कुछ उपलब्ध नहीं था। तब मुहम्मद ने कहा-”मैं उपवास रख रहा हूँ।“ कुछ वक्त बाद, उपहार में कुछ भोजन-सामग्री आई और आयशा ने उसे मुहम्मद के सामने रख दिया। मुहम्मद ने पूछा-”यह क्या है ?“ आयशा बोली-”यह हैस (खजूर और घी की बनी एक मिठाई) है।“ वे बोले-”इसे लाओ।“ आयशा आगे बतलाती हैं-”इस पर मैने उन्हें वह दिया और उन्होंने खा लिया।“ और तब वे बोले-”यह स्वेच्छा से उपवास रखना ऐसा है, जैसे कोई अपनी जायदाद में सदका निकाल कर रख दे। वह चाहे तो उसे खर्च कर सकता है, या फिर चाहे तो उसे रखा रहने दे सकता है“ (2573)।

author : ram swarup

HADEES : SHAVING: MUHAMMAD�S HAIR

SHAVING: MUHAMMAD�S HAIR

After the sacrifice, the ceremony of pilgrimage concludes, and the hAjji has himself shaved and his nails pared and his pilgrim garment removed.  Shaving should begin from the right side.  Anas reports that Allah�s Messenger �went to Jamra and threw pebbles at it, after which he went to his lodging in Mind, and sacrificed the animal.  He then called for a barber and, turning his right side to him, let him shave him; after which he turned his left side.  He then gave these hairs to the people� (2991); the hairs became important Islamic relics.

Now the pilgrimage is over, but the pilgrim should spend another three days in Mecca to rest after the hectic four days of ceremony.  Before leaving Mecca, he should again go round the Ka�ba seven times and throw stones at the satanic pillars at MinA seven times.  Before returning home, he should go to Medina to pay his homage at the tomb of Muhammad.

author : ram swarup

हदीस : कुछ परिस्थितयों में उपवास अनिवार्य नहीं

कुछ परिस्थितयों में उपवास अनिवार्य नहीं

कुछ परिस्थितियों में उपवास वैकल्पिक है। मसलन, यात्रा के समय उपवास तोड़ा जा सकता है। इस विषय में किसी के पूछने पर मुहम्मद बोले-”चाहो तो रोज़ा रखो, चाहो तो तोड़ दो“ (2488)।

 

अगर आप ”अल्लाह की राह” यानी जिहाद में व्यस्त हैं, तो रोज़ा न रखने का भी पुरस्कार है। मुहम्मद मोमिनो से कहते हैं-”तुम सुबह दुश्मन से भिड़ने जा रहे हो और रोज़ा तोड़ने से ताकत मिलती है, तो रोज़ा तोड़ दो“ (2486)।

 

कई बार औरतें उपवास नहीं रखती थीं, ताकि वे अपने खाविंद के प्रति अपना फर्ज़ बेरोक निभा सकें। आयशा बतलाती हैं-”मुझे रमज़ान के कुछ रोज़े पूरे करने थे, पर मैं नहीं कर सकी ….. अल्लाह के रसूल के प्रति अपना फर्ज़ निभाने के लिए“ (2549)। मुहम्मद की दूसरी बीवियों के बारे में भी आयशा यही बतलाती हैं। ”अल्लाह के रसूल के जीवन-काल में, अगर हममें से किसी को (रमज़ान के रोज़े स्वाभाविक कारणों से यानी माहवारी के कारण) तोड़ने पड़ जाते तो फिर उन्हें पूरा करने का मौका, रसूल-अल्लाह के पास रहने के कारण, शबान (आठवें महीने) के आने तक नहीं पाती थी“ (2552)। अनुवादक व्याख्या करते हैं कि मुहम्मद की प्रत्येक बीवी ”उनके प्रति अधिक समर्पित थी कि वह रोज़े टाल जाती थी ताकि उनके प्रति बीवी का फर्ज़ निभाने में उसे रोज़े की रुकावट आड़े न आए“ (टि0 1546)।

 

फिर समर्पण के कारण ही नहीं, बल्कि मुहम्मद के आदेश के कारण भी बीवियां रोज़े नहीं रखती थीं। ”जब खाविन्द (घर पर) मौजूद हो तो उसकी इजाज़त के बिना किसी भी औरत को रोज़ा नहीं रखना चाहिए। और खविन्द की मौजूदगी में उसकी इजाज़त के बिना औरत को किसी भी महरम को घर में नहीं आने देना चाहिए“ (2238)। (महरम उस नज़दीकी रिश्तेदार को कहते हैं, जिसके साथ विवाह अवैध होता है)। औरत उसकी मौजूदगी में आज़ाद महसूस करती है और उसे पर्दा रखने की जरूरत नहीं होती।

 

अनुवादक हमें इस आदेश का औचित्य बतलाते हैं। ”इस्लाम का लोगों की प्राकृतिक प्रवृत्तियों के प्रति ऐसा सम्मान-भाव है कि वह औरतों को (स्वेच्छा से) उपवास न रखने की और अपने उन रिश्तेदारों को भी अपने कमरे में न आने देने की व्यवस्था देता है, जो उनके लिए महरम हों, जिससे कि वे (महरम) खाविन्दों द्वारा यौन-वासना की तृप्ति के रास्ते में बाधा न बने“ (टि0 1387)।

author : ram swarup

HADEES : DRINK

DRINK

Muhammad also drank water from the well of Zamzam as part of the ritual.  Coming to the tribe of �Abd al-Muttalib (also his own tribe), he said: �Draw water, O BanI  �Abd al-Muttalib; were it not that people would usurp this right of supplying water from you, I would have drawn it along with you.  So they handed him a basket and he drank from it� (2803).  KAtib al-WAqidI, the Prophet�s biographer, gives us one further detail which would be considered unhygienic by the impious.  Muhammad took part of the content, then rinsed his mouth in the pitcher and directed that the water remaining in it should be thrown back into the well.  That was his way of invoking a blessing on a well-by spitting into it.  Many such wells are mentioned in the traditions (TabaqAt, vol. II, pp. 241-244).

He also did not forgo his favorite beverage, nabIz, a soft drink.  Though the nabIz offered him had been fouled by many hands, he took it, declining the offer of a cleaner and purer one.  The orthodox pilgrims of every generation have continued the practice.

author : ram swarup

हदीस : रमज़ान के दौरान मैथुन की अनुमति

रमज़ान के दौरान मैथुन की अनुमति

उपवास की कठोरता को पैगम्बर इस घोषणा द्वारा बहुत-कुछ सौम्य बना देते हैं कि ”भूल से खा-पी लेने पर उपवास नहीं टूटता“ (2475)। चुम्बन और आलिंगन की भी अनुमति है (2436-2450)। मुहम्मद की बीवियां-आयशा, हफ्सा और सलमा, सभी बतलाती हैं कि पैगम्बर उपवास के दौरान उन्हें चूमते थे और आलिंगन में बांध लेते थे। आयशा बतलाती हैं-”रोजे के दौरान अल्लाह की रसूल ने अपनी बीवियों में से एक को चूम लिया और तब वे (आयशा) मुस्कुरा उठी“ (2436)।

 

अनुवादक व्याख्या करते हैं-”मानवजाति पर अल्लाह की यह बहुत बड़ी मेहरबानी है कि उसने अपने पैगम्बर मुहम्मद के जरिए हमारे जीवन के हर क्षेत्र में हमारा पथ-प्रदर्शन किया। इस्लाम से पहले लोग उपवास की अवधि में अपनी बीवियों से पूरी तरह परहेज़ करते थे। इस्लाम ने इस रीति का अनुमोदन नहीं किया“ (टि0 1502)।

 

उपवास वाली रात में मैथुन की भी अनुमति है। उसको दैवी स्वीकृति दी गई है। कुरान का कहना है-”रोजों की रातों में तुम्हारे लिए अपनी औरतों के पास जाना जायज़ कर दिया गया है“ (2/187)। यहां तक कि यदि कोई वीर्य-स्राव की दशा में सोकर उठता है और वह, विधिविहित स्नान कर पाए, इसके पहले ही सूर्योदय हो जाता है, तब भी उसे उपवास जारी रखना चाहिए। जनवह की दशा में भी (जिसमें व्यक्ति ”अस्वच्छ“ होता है और कोई मज़हबी काम नहीं कर सकता अथवा मज़हबी सभाओं में नहीं जा सकता) रोज़ा टूटता नहीं।

 

मुहम्मद की बीवियां, आयशा और सलमा बतलाती हैं-”अल्लाह के रसूल रमज़ान के महीने में कई बार मैथुन, के उपरान्त, जुनुब की दशा में सुबह उठते थे और रोज़ा रखते थे“ (2454)। इसी विषय पर अन्य अहादीस भी हैं (2451-2456)।

 

रमज़ान के महीने में दिन में मैथुन किया जाए तो उसके प्रायश्चित का विधान है-या तो एक गुलाम को आजाद कर देना, या ऐसा न हो जाए तो दो महीने रोज़ा रखना, या वह भी न हो जाए तो साठ गरीब लोगों को खाना खिला देना। पर पैगम्बर की जिन्दगी में ही इस निषेध का उल्लंघन करने वाले एक गरीब का प्रायश्चित मुफ्त में हो गया। मुहम्मद ने उसे खजूर की एक डलिया दी और कहा-”जाओ और इसे अपने घर वालों को खिलाओ“ (2457)।

 

जो रोज़े छूट जायें, वे बाद में साल के भीतर कभी भी पूरे किए जा सकते हैं। औरतें माहवारी के दिनों में रोज़े नहीं रखतीं, पर अगले साल का रमज़ान आने के पहले (शावान के महीने में) कभी भी वे उतने दिन के उपवास पूरा कर लें।

author : ram swarup