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स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती

Swami Rameshwaranand Saraswati

स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती 

-डा. अशोक आर्य

स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्ती जी आर्य समाज के तेजस्वी संन्यसी थे । आप उच्चकोटि के वक्ता थे तथा उतम विद्वान व विचारक थे । सन १८९० मे आप का जन्म एक क्रष्क परिवार में हुआ । आप आरम्भ से ही मेधावी होने के साथ ही साथ विरक्त व्रति के थे । आप उच्च शिक्शा न पा सके गांव में ही पाट्शाला की साधारण सी शिक्शा प्राप्त की ।

आरम्भ से ही विरक्ति की धुन के कारण आप शीघ्र ही घर छोड कर चल दिए तथा काशी जा पहुंचे । यहां पर आप ने स्वामी क्रष्णानन्द जी से संन्यास की दीक्शा  ली  । संन्यासी होने पर भी आप कुछ समय पौराणिक विचारों में रहते हुए इस का ही अनुगमन करते रहे किन्तु कुछ समय पश्चात ही आपका झुकाव आर्य समाज की ओर हुआ । आर्य समाज में प्रवेश के साथ ही आप को विद्या उपार्जन की धुन सवार हुई तथा आप गुरुकुल ज्वाला पुर जा पहुंचे तथा आचार्य स्वामी शुद्ध बोध तीर्थ जी से संस्क्रत व्याकरण पटा ।

यहां से आप खुर्जा आए तथा यहां के निवास काल में दर्शन शास्त्र का अध्ययन किया । इसके पस्चात आप काशी चले गए । काशी में रहते हुए आप ने की शास्त्रों का गहन व विस्त्रत अध्ययन किया । इस प्रकार आपका अधययन का कार्य २१ वर्ष का रहा , जो सन १९३५ इस्वी में पूर्ण किया ।

स्वामी जी ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी खूब भाग लिया । सन १९३९ मे जब हैदराबाद सत्याग्रह का शंखनाद हुआ तो आप इस में भी कूद पडे । इस मध्य आप को ओरंगाबाद की जेल को अपना निवास बनाना पडा । १७ अप्रैल १९३९ को आपने जिला करनाल , हरियाणा के गांव घरौण्डा में गुरुकुल की स्थापना की । आप ने आर्य समाज के अन्य आन्दोलनों में भी बट चट कर भाग लिया । जब पंजाब की कांग्रेस की सर्कार के मुखिया सरदार प्रताप सिंह कैरो ने पंजाब से हिन्दी को समाप्त करने के लिए कार्य आरम्भ कर दिया तो आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब को हिन्दी रक्शा के लिए एक बहुत विशाल आन्दोलन करना पडा । आप ने इस आन्दोलन में भी खूब भाग लिया तथा पंजाबी सूबा विरूध आन्दोलन में भी आपने बलिदानी कार्य किया ।

आप की देश व धर्म की सेवाओं को देखते हुए लोगों ने आप को सांसद चुन लिया तथा आप लोक सभा के सदस्य भी बने । आप ने अनेक पुस्तकें भी लिखीं , यथा महर्षि दयनन्द ओर राजनीति , महर्षि दयानन्द का योग , संध्या भाष्यम , नमस्ते प्रदीप , महर्षि दयानन्द ओर आर्य समाजी पण्डित , विवाह पद्ध्ति , भ्रमोच्छेदन आदि । देश के इस नि:स्वार्थी तथा निर्भीक वक्ता का ८ मई १९९० इस्वी को निधन हो गया ।

पण्डित प्रकाश वीर शास्त्री

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-डा. अशोक आर्य

आर्य समाज के जो प्रमुख वक्ता हुए, कुशल राजनेता हुए उनमें पं. प्रकाश वीर शास्त्री जी का नाम प्रमुख रुप से लिया जाता है । आप का नाम प्रकाशचन्द्र रखा गया । आप का जन्म गांव रहरा जिला मुरादाबाद , उतर प्रदेश मे हुआ । आप के पिता का नाम श्री दिलीपसिंह त्यागी था , जो आर्य विचारों के थे ।

उस काल का प्रत्येक आर्य परिवार अपनी सन्तान को गुरुकुल की शिक्शा देना चाहता था । इस कारण आप का प्रवेश भी पिता जी ने गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर में किया ।  इस गुरुकुल में एक अन्य विद्यार्थी भी आप ही के नाम का होने से आप का नाम बदल कर प्रकाशवीर कर दिया गया । इस गुरुकुल में अपने पुरुषार्थ से आपने विद्याभास्कर तथा शास्त्री की प्रीक्शाएं उतीर्ण कीं । तत्पश्चात आप ने संस्क्रत विषय में आगरा विश्व विद्यालय से एम ए की परीक्शा प्रथम श्रेणी से पास की ।

पण्डित जी स्वामी दयानन्द जी तथा आर्य समाज के सिद्धान्तों में पूरी आस्था रखते थे । इस कारण ही आर्य समाज की अस्मिता को बनाए रखने के लिए आपने १९३९ में मात्र १६ वर्ष की आयु में ही हैदराबद के धर्म युद्ध में भाग लेते हुए सत्याग्रह किया तथा जेल गये ।

आप की आर्य समाज के प्रति अगाध आस्था थी , इस कारण आप अपनी शिक्शा पूर्ण करने पर आर्य प्रतिनिधि सभा उतर प्रदेश के माध्यम से उपदेशक स्वरुप कार्य करने लगे । आप इतना ओजस्वी व्याख्यान देते थे कि कुछ ही समय में आप का नाम देश के दूरस्थ भागों में चला गया तथा सब स्थानोण से आपके व्याख्य्तान के लिए आप की मांग देश के विभिन्न भागों से होने लगी ।

पंजाब में सरदार प्रताप सिंह कैरो के नेत्रत्व में कार्य कर रही कांग्रेस सरकार ने हिन्दी का विनाश करने की योजना बनाई । आर्य समाज ने पूरा यत्न हिन्दी को बचाने का किया किन्तु जब कुछ बात न बनी तो यहां हिन्दी रक्शा समिति ने सत्याग्रह आन्दोलन करने का निर्णय लिया तथा शीघ्र ही सत्याग्रह का शंखनाद १९५८ इस्वी में हो गया । आप ने भी इस समय अपनी आर्य समाज के प्रति निष्टा व कर्तव्य दिखाते हुए सत्याग्रह में भाग लिया । इस आन्दोलन ने आप को आर्य समाज का सर्व मान्य नेता बना दिया ।

इस समय आर्य समाज के उपदेशकों की स्थिति कुछ अच्छी न थी । इन की स्थिति को सुधारने के लिए आप ने अखिल भारतीय आर्य उपदेशक सम्मेलन स्थापित किया तथा लखनउ तथा हैदराबद में इस के दो सम्मेलन भी आयोजित किये । इससे स्पष्ट होता है कि आप अर्योपदेशकों कितने हितैषी थे ।

आप की कीर्ति ने इतना परिवर्तन लिया कि १९५८ इस्वी को आप को लोक सभा का गुड्गम्व्से सदस्य चुन लिया गया । इस प्रकार अब आप न केवल आर्य नेता ही बल्कि देश के नेता बन कर रजनीति में उभरे । १९६२ तथा फ़िर १९६७ में फ़िर दो बार आप स्वतन्त्र प्रत्याशी स्वरूप लोक सभा के लिए चुने गए । एक सांसद के रूप में आप ने आर्य समाज के बहुत से कार्य निकलवाये ।

१९७५ में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन, जो नागपुर में सम्पान्न हुआ , में भी आप ने खूब कार्य किया तथा आर्य प्रतिनिधि सभा मंगलवारी नागपुर के सभागार में , सम्मेलन मे पधारे आर्यों की एक सबा का आयोजन भी किया । इस सभा में( हिन्दी सम्मेलन में पंजाब के प्रतिनिधि स्वरुप भाग लेने के कारण) मैं भी उपस्थित था , आप के भाव प्रवाह व्याख्यान से जन जन भाव विभोर हो गया ।

आप ने अनेक देशों में भ्रमण किया तथा जहां भी गए, वहां आर्य समाज का सन्देश साथ लेकर गये तथा सर्वत्र आर्य समज के गौरव को बटाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहे । जिस आर्य प्रतिनिधि सभा उतर प्रदेश के उपदेशक बनकर आपने कार्य क्शेत्र में कदम बटाया था , उस आर्य प्रतिनिधि सभा उतर प्रदेश के आप अनेक वर्ष तक प्रधान रहे । आप के ही पुरुषार्थ से मेरट, कानपुर तथा वाराणसी में आर्य समाज स्थापना शताब्दी सम्बन्धी सम्मेलनों को सफ़लता मिली । इतना ही नहीं आप की योग्यता के कारण सन १९७४ इस्वी में आप को परोपकारिणी सभा का सदस्य मनोनीत किया गया ।

आप का जीवन यात्राओं में ही बीता तथा अन्त समय तक यात्राएं ही करते रहे । अन्त में जयपुर से दिल्ली की ओर आते हुए एक रेल दुघटना हुई । इस रेल गाडी में आप भी यात्रा कर रहे थे । इस दुर्घटना के कारण २३ नवम्बर १९७७ इस्वी को आप की जीवन यात्रा भी पूर्ण हो गई तथा आर्य समाज का यह महान योद्धा हमें सदा के लिए छोड कर चला गया ।

पं. राजाराम शास्त्री

Pandit Rajaram Shastri

पं. राजाराम शास्त्री       

-डा. अशोक आर्य

पंण्डित राजाराम शास्स्त्री जी अपने काल में अनेक शास्त्रों के अति मर्मग्य तथा इन के टीका कार के रुप में सुप्रसिद्ध विद्वान के रुप में जाने गये । आप का जन्म अखण्ड भारत के अविभाजित पंजाब क्शेत्र के गांव किला मिहां सिंह जिला गुजरांवाला मे हुआ , जो अब पाकिसतान में है ।  आप के पिता का नाम पं. सुबा मल था । इन्हीं सुबामल जी के सान्निध्य में ही आपने अपनी आरम्भिक शिक्शा आरम्भ की ।

आप अति मेधावी थे तथा शीघ्र ही प्राथमीक शिक्शा पूर्ण की ओर छात्रव्रति प्राप्त करने का गौरव पाया किन्तु इन दिनों एक आकस्मिक घटना ने आप के मन में अंग्रेजी शिक्शा प्रणाली के प्रति घ्रणा पैदा कर दी तथा संस्क्रत के प्रति आक्रष्ट किया । यह घटना एक शिक्शित युवक को ईसाई बनाने की थी । जब आप ने देखा कि एक अंग्रेजी पटे लिखे नौजवान को ईसाई बनाया जा रहा है तो आप के अन्दर के धर्म ने करवट ली । आप जान गये कि यह अंग्रेजी शिक्शा प्रणाली हमारे देश व धर्म का नाश करने वाली है । इस के दूरगामी विनाश को आप की द्रष्टी ने देख लिया तथा आप ने इस शिक्शा प्रणाली के विरोध में आवाज उटाते हुए इस प्रणाली में शिक्शा पाने से इन्कार कर दिया तथा संस्क्रत के विद्यार्थी बन गए ।

जब आप ने संस्क्रत पटने का संकल्प लिया उन्हीं दिनों ही आप के हाथ कहीं से स्त्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ आ लगा । स्वामी दयानन्द सरस्वती क्रत यह ग्रन्थ आप के लिए क्रान्तिकारी परिवर्तन का कारण बना तथा इस ग्रन्थ के अध्ययन मात्र से आप में संस्क्रत आदि शास्त्रों के गहनता पूर्वक अध्ययन करने की रुचि आप में उदय हुई । इस ग्रन्थ के विचारणीय प्रश्नों पर चिन्तन करने के मध्य ही आप में इस का दूर्गामी प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया तथा आपने तत्काल व्याकरण , काव्य तथा न्याय दर्शन आदि का विधिवत टंग से अध्ययन करना आरम्भ कर दिया । इतना ही नहीं इस काल में आपने शंकरभाष्य तथा उपनिषदों का , पटन , स्वाध्याय तथा खूब लगन से अनुशीलन किया ओर फ़िर महाभाष्य पटने का निर्णय लिया । अपने इस निर्णय को कार्य रुप देते हुए आपने जम्मू की ओर प्रस्थान किया ।

आपने १८८९ में अपना अध्ययन का कार्य पूर्ण किया तथा अपने घर लौट आए । यहां आ कर आप ने एक हिन्दी पाट्शाला का संचालन किया । कुछ ही समय पश्चात आपने अम्रतसर आकर आर्य समाज द्वारा संचालित एक विद्यालय में नियुक्ति पा कर अध्यापन का कार्य करते हुए वेद के सिद्धान्तों का ग्यान भी विद्यार्थियों को देना आरम्भ किया । किन्तु उत्साही व लगन शील व्यक्ति को सब लोग अपनी ओर ही खैंचने का प्रयास करते हैं । इस लगन का ही परिणाम था कि डी ए वी कालेज के प्रिन्सिपल महात्मा हंसराज जी ने इन्हें १८९२ में लाहौर बुला लिया । यहां आप को डी ए वी स्कूल में संस्क्रत अध्यापक स्वरुप नियुक्त किया गया ।

विद्वान की विद्वता के लोहे को मानते हुए शास्त्री जी को १८९४ मे डी ए वी कालेज लाहौर में संस्क्रत के प्राध्यापक स्वरुप नियुक्त किया गया । कालेज ने आप की योग्यता का सदुपयोग करते हुए आप की इच्छाशक्ति का भी ध्यान रखा तथा कालेज की मात्र लगभग पांच वर्ष की सेवा के पश्चात अगस्त १८९९ में आप को साट रुपए मासिक की छात्र व्रति आरम्भ की इस छात्र व्रति से आपने काशी जा कर मीमांसा आदि दर्शनों का अध्ययन करने के लिए काशी की ओर प्रस्थान किया ।

काशी रहते हुए आपने पण्डित शिवकुमार शास्त्री जी से मीमान्सा एवं वेद का अध्ययन किया । यहां ही रहते हुए आपने पण्डित सोमनाथ सोमयाजी से यग्य प्रक्रिया का बिधिवत परिचय प्राप्त करते हुए इसका अध्ययन किया । आप का काशी में अध्ययन कार्य १९०१ में समाप्त हुआ तथा इसी वर्ष आप काशी से लौट कर लाहौर आ गये ओर काले ज मेम फ़िर से कार्य आरम्भ कर दिया किन्तु कालेज प्रबन्ध समिति ने आप का कार्य बदल कर एक अत्यन्त ही जिम्मेदारी का कार्य सौंपा । यह कार्य था विभिन्न शास्त्रीय ग्रन्थों के भाषान्तर का । इस कार्य का भी आपने व्बखूबी निर्वहन किया । इसके साथ ही आप ने रजा राम शस्त्री पर भाषय तथा टीका लिखने का कार्य भी आरम्भ कर दिया ।

वर्ष १९०४ म३ं शस्त्री जी ने पत्रकारिता में प्रवेश किया । आप ने अधिशाषी अभियन्ता अहिताग्नि राय शिवनाथ के सहयोग से आर्ष ग्रथावलीनाम से एक मासिक पत्र का प्रकाशन आरम्भ कर दिया । यह ही वह पत्र था जिसके माध्यम से आपने जो भी शास्त्र ग्रन्थों के भाष्य किये थे , उनका प्रकाशन हुआ । इस प्रकार आपके प्रकाशित भाष्यों का अब जन जन्को लाभ मिलने लगा । आर्य सामाजिक संस्थाओं मं कार्य रत रहते हुए आपने अनेक प्रकार का साहित्य भी दिया किन्तु आप के कार्यों से एसा लगता है कि आप के विचार आर्य समाज व रिषि दयानन्द के दार्शणिक सिद्धान्तों से पूरी तरह से मेल न खा सके तथा यह अन्तर बटते बटते विकराल होता चला गया ।

इस सब का यह परिणाम हुआ कि १९३१ में  पं. विश्वबन्धु जी के सहयोग से आर्य समाज के कई विद्वानों से शास्त्रार्थ किया । शास्त्रार्थ का विषय रहा निरुक्त कार यास्क वेद में इतिहास मानते थे , या नहीं । इस विषय पर पं भगवद्दत जी, पं. ब्रह्मदत जिग्यासु, प. प्रियरत्न आर्ष , टाकुर अमर सिंह जी आदि से १८ मई से २२ मई १९३१ तक यह शास्त्रार्थ महत्मा हंसराज जी की अध्यक्शता में लाहौर में ही हुए ।

इस प्रकार समाज के इस सेवक ने समाज की सेवा करते हुए १८ अगस्त १९४८ को इस संसार से सदा सदा के लिए विदा ली । आपने अपने जीवन काल में अनेक ग्रन्थ लिखे जिनमें अथर्ववेद भाष्य चार भाग (सायण शैली में ),वेद व्याख्यात्मक ग्रन्थ, वेद ओर महाभारत के उपदेश, वेद ओर रामायण के उपदेश, वेद , मनु ओर गीता के उपदेश, वेदांग , दर्शन शास्त्र , उपनिषद आदि शास्त्रों तथा इतिहास व जीवन चरित हिन्दी तथा संस्कत भाषा व्याकरण आदि सहित अनेक स्फ़ुट विष्यों पर अनेक ग्रन्थ लिखे ।

पण्डित कालीचरण शर्मा

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पण्डित कालीचरण शर्मा

-डा. अशोक आर्य

वैसे तो विश्व की विभिन्न भाषाओं का प्रचलन इस देश में बहुत पहले से ही रहा है किन्तु आर्य समाज के जन्म के साथ ही इस देश में विदेशी भाषाओं को सीखने के अभिलाषी , जानने के इच्छुक लोगों की संख्या में अत्यधिक व्रद्धि देखी गई । इस का कारण था विदेशी मत पन्थों की कमियां खोजना । इस समय आर्य समाज भारत की वह मजबूत सामाजिक संस्था बन चुकी थी , जो सामाजिक बुराईयों तथा कुरीतियों और अन्ध विश्वासों  को दूर करने का बीडा उटा चुकी थी । इस का लाभ विधर्मी , विदेशी उटाने का यत्न कर रहे थे । इस कारण इन के मतों को भी जनना आवश्यक हो गया था किन्तु यह ग्रन्थ अरबी , फ़ार्सी और हिब्रू आदि विदेशी भाषाओं में होने के कारण इन भाषाओं का सीखना आर्यों के लिए अति आवश्यक हो गया था । विदेशी भाषा सीख कर उसमें पारंगत होने वाले एसे आर्य विद्वानों में पं. कालीचरण शर्मा भी एक थे ।

पं कालीचरण जी का जन्म आर्य समाज की स्थापना के मात्र तीन वर्ष पश्चात सन १८७८ इस्वी में बदायूं  जिला के अन्तर्गत एक गांव में हुआ । आप ने आगरा के सुविख्यात विद्यालय “मुसाफ़िर विद्यालय” से शिक्शा प्राप्त की । इस विद्यालय की स्थापना पं. भोजदत शर्मा ने की था । यह विद्यालय आर्य समाज के शहीद पं. लेखराम के स्मारक स्वरुप स्थापित किया गया था । इस कारण यहां से आर्य समाज सम्बन्धी शिक्शा तथा वेद सम्बन्धी ग्यान का मिलना अनिवार्य ही था । इस विद्यालय के विद्यार्थी प्रतिदिन संध्या – हवन आदि करते थे तथा आर्य समाज के सिद्धान्तों का ग्यान भी इन्हें दिया जाता था । अत: इस विद्यालय से पटने वाले विद्यार्थियों पर आर्य समाज  का प्रभाव स्पष्ट रुप में देखा जा सकता था ।

पण्डित जी ने प्रयत्न पूर्वक फ़ारसी और अरबी का खूब अध्ययन किया और वह इस भाषा का अच्छा ग्यान पाने में सफ़ल हुए । इस ग्यान के कारण ही आप अपने समय के इस्लाम मत के उत्तम मर्मग्य बन गए थे । आप ने इस्लाम तथा इसाई मत का गहन अध्ययन किया । इस्लाम व ईसाई मत के इस गहन अध्ययन के परिणाम स्वरूप आप ने मुसलमानों तथा इसाईयों से सैंकडों शास्त्रार्थ किये तथा सदा विजयी रहे । परिस्थितियां एसी बन गयी कि इसाई और मुसलमान शास्त्रर्थ के लिए आप के सामने आने से डरने लगे ।

आप ने अध्यापन के लिए भी धर्म को ही चुना तथा निरन्तर अटारह वर्ष तक डी. ए. वी कालेज कानपुर में धर्म शिक्शा के अध्यापक के रुप में कार्य करते रहे । इस काल में ही आपने कानपुर में ” आर्य तर्क मण्डल” नाम से एक संस्था को स्थापित किया । इस सभा के सद्स्यों को दूसरे मतों द्वारा आर्य समाज पर किये जा रहे आक्शेपों का उत्तर देने के लिए तैयार किया गया तथा इस  के सदस्यों ने बडी सूझ से विधर्मियों के इन आक्रमणों का उत्तर दे कर उनके मुंह बन्द करने का कार्य किया ।

जब आप का कालेज सेवा से अवकाश हो गया तो आप ने राजस्थान को अपना कार्य क्शेत्र बना लिया । यहां आ कर भी आपने आर्य समाज का खूब कार्य किया तथा शास्त्रार्थ किये । आप ने “कुराने मजीद” के प्रथम भाग का हिन्दी अनुवाद कर इसे प्रकाशित करवाया, इस के अतिरिक्त आप ने विचित्र “जीवन चरित” नाम से पैगम्बर मोहम्मद की जीवनी भी प्रकाशित करवाई । इन पुस्तकों का आर्यों ने खूब लाभ उटाया । इस प्रकार जीवन भर आर्य समाज करने वाले इस शात्रार्थ महारथी का ९० वर्ष की आयु में राजस्थान के ही नगर बांदीकुईं में दिनांक १३ सितम्बर १९६८ इस्वी को देहान्त हो गया ।

स्वामी आत्मानन्द सरस्वती

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स्वामी आत्मानन्द सरस्वती

-डा. अशोक आर्य

स्वामी आत्मानन्द जी सरस्वती आर्य समाज के महान विचारक तथा प्रचारक थे । आप का जन्म गांव अंछाड जिला मेरट उतर प्रदेश में संवत १९३६ विक्रमी तदानुसार सन १८७९ इस्वी को हुआ । आअपका नाम मुक्ति राम रखा गया । आपके पिता जी का नाम पं. दीनदयालु जी था । आपकी आरम्भिक शिक्शा मेरट में हुई तत्पश्चात उतम व उच्च शिक्शा के लिए आप को काशी भेजा गया ।

आप बडे ही मेहनती प्रव्रति के थे । अत: आप ने काशी में बडी लग्न , बडी श्रद्धा व पुरुषार्थ से विद्याध्ययन किया । यहां रहते हुए आप ने व्याकरण व साहित्य के अध्ययन के साथ ही साथ वेदान्तिक दर्शनों का भी अध्ययन किया । यहां शिक्शा काल में ही आप आर्य समाज के सम्पर्क में आये । आप ने आर्य समाज के सम्पर्क में आने के पश्चात आर्य समाज के सिद्धान्तों का बडी बारिकी से चिन्तन मनन व अनुशीलन कर , इन सिद्दन्तों को आत्मसात किया ।

काशी से अपनी शिक्शा पूर्ण कर आप रावल पिण्डी ( अब पाकिस्तान में ) आ गये तथा रावलपिण्डी के गांव चोहा भक्तां में उन दिनों जो गुरुकुल चल रहा था , उस में अध्यापन का कार्य करने लगे । इस गुरुकुल की आपने लम,बेर समय तक सेवा की तथा यहाम पर सन १९१६ से४ सन १९४७ अर्थात देश के विभाजन काल तक आप इस गुरुकुल के आचार्यत्व को सुशोभित करते रहे ।

आप को सब लोग पण्डित मुक्ति राम के नाम से ही अब तक जानते थे किन्तु शीघ्र ही आप ने संन्यास लेने का मन बनाया तथा इसे कार्य रुप देते हुए संन्यास ले कर अपना नाम स्वामी आत्मा राम रख लिया ।

देश के विभाजन के पश्चात जब पाकिस्तान का हिन्दु , सिक्ख तथा आर्य समुदाय भारत आने लगा तो आप भी रावलपिण्डी से भारत आ गये तथा यमुनानगर (हरियाणा) को आपने अपना केन्द्र बना लिया । आप आरम्भ से ही पुरुषार्थी व मेहनती थे । यह आप के पुरुषार्थ का ही परिणाम था कि रावल पिण्डी का गुरुकुल बडे ही उतम व्यवस्था के साथ चलता रहा तथा भारत आने पर भी आप के मन में एक उतम गुरुकुल चलाने की उत्कट इच्छा शक्ति बनी हुई थी । अत: इस विचार पर कार्य करते हुए आप ने यमुना नगर में वैदिक साधना आश्रम की स्थापना की  तथा इस आश्रम के अन्तर्गत उपदेशक विद्यालय आरम्भ किया ।

आप के अथक प्रयत्न का ही परिणम था कि यमुना नगर का उपदेशक विद्यालय कुछ काल में ही आर्य समाज की श्रोमणी संस्थाओं में गिना जाने लगा तथा इससे पटकर निकलने वाले उच्चकोटि के विद्वानों की एक लम्बी पंक्ति दिखाई देने लगी । गुरुकुल कांगडी महाविद्यालय के वेद विभाग के पूर्व अध्यक्श आचार्य स्वर्गीय सत्यव्रत जी राजेश भी इस विद्यालय की ही देन थे ।

आप की लगन , आपके रिषि मिशन से लगाव को तथा आप की आर्य समाज के प्रचार व प्रसार की लगन को देखते हुए आप को आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का प्रधान भी नियुक्त किया गय । आप ने अपने पुरुषार्थ से आर्य समाज्के कार्य को भर पूर प्रगति दी । इन्हीं दिनों पंजाब में हिन्दी आन्दोलन का भी निर्नय हुआ । आपको इस आन्दोलन की बागदॊर सौंपी गयी तथा यह पूरा व सफ़ल आन्दोलन आप ही के नेत्रत्व में लडा गया ।

यह रीषि का सच्चा भक्त जीवन प्रयन्त आर्य समाज के प्रचार व प्रसार में लगा रहा तथा अन्त में जब वह किसी कार्य वश गुरुकुल झज्जर गये हुए थे , अक्स्मात दिनांक १८ दिसम्बर १९६० इस्वी को उनका देहान्त हो गया ।

 

वीतराग स्वामी सर्वदानन्द

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वीतराग स्वामी सर्वदानन्द

-डा. अशोक आर्य

आर्य समाज ने अनेक त्यागी तपस्वी साधू सन्त पैदा किये हैं । एसे ही संन्यासियों में वीतराग स्वामी सर्वदानन्द सरस्वती जी भी एक थे । आप का जन्म भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से मात्र दो वर्ष पूर्व विक्रमी सम्वत १९१२ या यूं कहें कि १८५५ इस्वी को हुआअ । आप का जन्म स्थान कस्बा बस्सी कलां जिला होशियारपुर पंजाब था । आप के पिता का नाम गंगा विष्णु था, जो अपने समय के सुप्रसिद्ध वैद्य थे । यही उनकी जीविकोपार्जन का साधन भी था ।

स्वामी जी का आरम्भिक नाम चन्दूलाल रखा गया । यह शैव वंशीय परम्परा से थे । इस कारण वह शैव परम्पराओं का पालन करते थे तथा प्रतिदिन पुष्पों से प्रतिमा के साज संवार में कोई कसर न आने देते थे किन्तु जब एक दिन देखा कि एक कत्ता शिव मूर्ति पर मूत्र कर रहा है तो इन के ह्रदय में भी वैसे ही एक भावना पैदा हुई , जैसे कभी स्वामी दयानन्द के अन्दर  शिव पिण्डी पर चूहों को देख कर पैदा हुई थी । अत; प्रतिमा अर्थात मूर्ति पूजन से मन के अन्दर की श्रद्धा समाप्त हो गई । इस कारण वह वेदान्त की ओर बटे । इसके साथ ही साथ फ़ारसी के मौलाना रूम तथा एसे ही अन्य सूफ़ि कवियों की क्रतियों व कार्यों का अधययन किया । यह सब करते हुए भी मूर्ति पर कुते के मुत्र त्याग का द्रश्य वह भुला न पाए तथा धीरे धीरे उनके मन में वैराग्य की भावना उटने लगी तथा शीघ्र ही उन्होंने घर को सदा के लिए त्याग दिया ओर मात्र ३२ वर्ष की अयु में संन्यास लेकर समाज के उत्थान के संकल्प के साथ स्वामी सर्वदानन्द नाम से कार्य क्शेत्र में आए ।

अब आप ने चार वर्ष तक निरन्तर भ्र्मण , देशाट्न व तिर्थ करते हुए देश की अवस्था को समझने आ यत्न किया । इस काल में आप सत्संग के द्वारा लोगों को सुपथ दिखाने का प्रयास भी करते रहे ।

स्वामी जी का आर्य समाज में प्रवेश भी न केवल रोचकता ही दिखाता है बल्कि एक उत्तम शिक्शा भी देने वाला है । प्रसंग इस प्रकार है कि एक बार स्वामी जी अत्यन्त रुग्ण हो गए किन्तु साधु के पास कौन सा परिवार है , जो उसकी सेवा सुश्रुषा करता । इस समय एक आर्य समाजी सज्जन आए तथा उसने स्वामी जी की खूब सेवा की तथा उनकी चिकित्सा भी करवाई । पूर्ण स्वस्थ होने पर स्वामी जी जब यहां से चलने लगे तो उनके तात्कालिक सेवक ( आर्य समाजी सज्जन ) ने एक सुन्दर रेशमी वस्त्र में लपेट कर सत्यार्थ प्रकाश उन्हें भेंट किया । इस सज्जन ने यह प्रार्थना भी की कि यदि वह उसकी सेवा से प्रसन्न हैं तो इस पुस्तक को , इस भेंट को अवश्य पटें ।

स्वामी जी इस भक्त के सेवाभा से पहले ही गद गद थे फ़िर उसके आग्रह को कैसे टाल सकते थे । उन्होंने भक्त की इस भेंट को सहर्ष स्वीकार करते हुऎ पुस्तक से वस्त्र को हटाया तो पाया कि यह तो स्वामी दयानन्द क्रत स्त्यार्थ प्रकाश था । पौराणिक होने के कारण इस ग्रन्थ के प्रति अश्रद्धा थी किन्तु वह अपने सेवक को वचन दे चुके थे इस कारण पुस्तक को बडे चाव से आदि से अन्त तक पटा । बस फ़िर क्या था ग्रन्थ पटते ही विचारों में आमूल परिवर्तन हो गया । परिणाम स्वरूप शंकर व वेदान्त के प्रति उनकी निष्था समाप्त हो गई । वेद , उपनिषद, दर्श्न आदि आर्ष ग्रन्थों का अध्ययन किया तथा आर्य समाज के प्रचार व प्रसार मे जुट गये । आर्य समाज का प्रचार करते हुए आप ने अनेक पुस्तके भी लिखीं यथा जीवन सुधा, आनन्द संग्रह, सन्मार्ग दर्शन, ईश्वर भक्ति, कल्याण मार्ग, सर्वदानन्द वचनाम्रत , सत्य की महिमा, प्रणव परिचय , परमात्मा के दर्शन आदि ।

जब वह प्रचार में जुटे थे तो उनके मन में गुरुकुल की स्थापना की इच्छा हुई । अत: अलीगट से पच्चीस किलोमीटर की दूरी पर काली नदी के किनारे (जिस के मुख्य द्वार के पास कभी स्वामी दयानन्द सरस्वती विश्राम किया करते थे ) तथा स्वामी जी के सेवक व सहयोगी मुकुन्द सिंह जी के गांव से मात्र पांच किलोमीटर दूर साधु आश्रम की स्थापना की तथा यहां पर आर्ष पद्धति से शास्त्राध्ययन की व्यवस्था की ( यह गुरुकुल मैने देखा है तथा इस गुरुकुल के दो छात्र आज आर्य समाज वाशी , मुम्बई में पुरोहित हैं ) । आप के सुप्रयास से अजमेर के आनासागर के तट पर स्थित साधु आश्रम में संस्क्रत पाट्शाला की भी स्थापना की ।  आप को वेद प्रचार की एसी लगन लगी थी कि इस निमित्त आप देश के सुदूर वर्ती क्शेत्रों तक भी जाने को तत्पर रहते थे । आप तप , त्याग ,सहिष्णुता की साक्शात मूर्ति थे । इन तत्वों का आप मे बाहुल्य था । आप का निधन १० मार्च १९४१ इस्वी को ग्वालियर में हुआ ।

स्वामी आनन्दबोध

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स्वामी आनन्दबोध    

-डा. अशोक आर्य

           सन १९०९ में काशमीर के अनन्तनाग क्शेत्र में एक बालक का जन्म हुआ , जिसका नाम रामगोपाल रखा गया । इनके पिता का नाम लाला नन्द लाल था । आप मूलत: अम्रतसर के रहने वाले थे । यह बालक ही उन्नति व व्रद्धि करता हुआ आगे चल कर राम गोपाल शालवाले के नाम से विख्यात हुआ ।

            आप काशमीर से चलकर सन १९२७ में दिल्ली आ गए । दिल्ली आकर आप आर्य सम,आज के नियमित सदस्य बने । आप को पं.रमचन्द्र देहलवी की कार्य्शैली बहुत पसन्द आयी तथा आप ने उन्हें अपनी प्रेरणा का स्रोत बना लिया ।

          आप के आर्य समाज के प्रति समर्पण भाव तथा मेहनत व लगन के परिणाम स्वरूप आपको आर्य समाज दीवान हाल का मन्त्री बनाया गया । बाद में आप इस समाज के प्रधान बने । इन पदों को आपने लम्बे समय तक निभाया । इस आर्य समाज के पदाधिकारी रहते हुए ही आपने सामाजिक कार्यों का बडे ही सुन्दर टंग से निर्वहन किया ।

        आप की प्रतिभा का ही यह परिणाम था कि आप आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के अनेक वर्ष तक अन्तरंग सद्स्य रहे । अनेक वर्ष तक आप आर्य समाज की सर्वोच्च सभा सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के उपमन्त्री, उप प्रधान तथा प्रधान रहे । उच्चकोटि के व्याख्यान करता, उच्चकोटि के संगटन करता तथा आर्य समाज के उच्चकोटि के कार्य कर्ता लाला रामगोपाल जी  ने सदा आर्य समाज की उन्नति मेम ही अपनी उन्नति समझी तथा इस के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते थे । देश के उच्च अधिकारियों से आप का निकट का सम्पर्क था तथा बडे बडे काम भी आप सरलता से निकलवा लेते थे ।

        जब अबोहर के डी ए वी कालेज में सिक्ख विद्यार्थियों ने उत्पात मचाया तथा यग्यशाला को हानि पहुंचाई तो कालेज के प्रिन्सिपल नारायणदास ग्रोवर जी ने मुझे आप से सम्पर्क कर यथा स्थिति आप के सामने रखने के लिए भेजा । आप ने मुझ किंचित से युवक की बात को ध्यान से सुना , समझा व कुछ करने के आदेश दिये ।

        जब १९७१ में अलवर में सम्पन्न सार्वदेशिक के अधिवेशन में स्वामी अग्निवेश के साथियों ने उत्पात मचाया तो आप की बात मंच द्वारा न मानने पर आप जब यहां से पलायण करने लगे तो मेरे तथा प्रा. राजेन्द्र जिग्यासु जी की प्रार्थना पर आप ने अपना निर्णय बदला तथा फ़िर से सम्मेलन को सुचारु रुप से चलाया ।

        आप ही के प्रयास से हैदराबाद सत्याग्रह को राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम स्वीकार किया गया । जिसका लभ आर्य समाज को मिला । आपके नेत्रत्व में अनेक आन्दोलन व अनेक सम्मेलन किए गय । कालान्तर में आपने संन्यास की दीक्शा स्वामी स्रर्वानन्द जी से ली तथा रामगोपाल शालवाले से स्वामी आनन्द बोध हुए ।

        आप ने पूजा किसकी , ब्रह्मकुमारी संस्था आदि पुस्तकें भी लिखीं । १९७८ इस्वी में आप की सेवाओं को सामने रखते हुए आप का अभिनन्दन भी किया गया तथा इस अवसर पर एक अभिनन्दन ग्रन्थ भी प्रकाशित किया गया । अन्त में आप का  अक्टूबर १९९४ देहान्त हो गया ।