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स्वतंत्रता-परतंत्रता

 

slavery

 

स्वंत्रता-परतंत्रता 

लेखक- स्वामी विष्वअंग् जी  , ऋषि उद्यान – अजयमेरू नगरी  

व्यक्तियों के अनेको सम्बन्ध होते है,जैसे माता-पिता के साथ, पति-पत्नी के साथ, सांस-बहु के साथ, श्वशुर-बहु के साथ, भाई-बहन के साथ, गुरु-शिष्य के साथ, पडोसी के साथ, व्यापारी-सेवक के साथ, समाज के साथ………….इस प्रकार अलग-अलग अन्रको सम्बन्ध है | इन संबंधो के साथ रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति चाहते या न चाहते हुए अनेको कार्य करता है | ऐसा प्रतीत होता है की सारा जीवन पराधीनता से युक्त है | फिर भी यह कहा जाता है की मनुष्य स्वतंत्र है अर्थात करने, न करने या अन्यथा करने में स्वतंत्र है | क्या हम पराधीन है या स्वाधीन है ? अर्थात परतंत्र है या स्वतंत्र है ? यद्यपि  नासमझ व्यक्ति को लगता है की हम तो परतंत्र है, परन्तु ऐसा नहीं है, क्यों की पराधीन होता है तो स्वाधीन भी तो होता है | सर्व प्रथम यह समझना चाइये की स्वाधीनता-स्वतंत्रता किसे कहते है, और पराधीनता-परतंत्रता किसे कहते है ?

जैसा की स्वतंत्रता के विषय में कहा जाता है की करने, न करने या अन्यथा करने में मनुष्य स्वतंत्र है | ठीक इसके विपरीत करने, न करने या अन्यथा करने में परतंत्र है अर्थात मनुष्य अपनी इच्छा से कुछ भी नहीं कर सकता | परन्तु ऐसा बिलकुल नहीं है, क्यों की मनुष्य अपनी इच्छा से बहोत कुछ करता है | जब वह बहोत कुछ अपनी इच्छा से कर रहा होता है तब स्वतंत्र होकर ही कर रहा होता है | इससे यह पता लगता है की मनुष्य स्वतंत्र है और जब-जब वह अन्यों के आश्रित होकर करता है तब-तब वह परतंत्र होता है | परन्तु यह परतंत्र किसे व्यवस्था के लिए होता है | व्यवस्थाए अलग-अलग होती है | जिस प्रकार हमारे अलग-अलग सम्बन्ध है, तो हमारी व्यवस्थाए भी अलग-अलग होंगी | व्यवस्था को बनाये रखने के लिए मनुष्य को परतंत्र बनाना पड़ता है | इसका यह अभिप्राय नहीं है की मनुष्य परतंत्र हो गया | केवल उस व्यवस्था को व्यवस्थित बनाये रखने के लिए परतंत्र हुआ है, उससे मनुष्य स्वाभाव से परतंत्र नहीं हुआ | वह व्यवस्था के लिए परतंत्र होता हुआ भी स्वतन्त्र ही रहता है | क्यों की मनुष्य का स्वभाव ही स्वतंत्र रहना है | यहाँ यह समझना चाइये की मनुष्य अपने यथार्थ ज्ञान, विवेक से व्यवस्था को इसलिए स्वीकार करता है की जिससे, उसे सुख विशेष मिलता है | उस सुख-विशेष को समझ कर जानकर अपनी इच्छा से, अपनी स्वतंत्रता से, उस व्यवास्स्था के लिए परतंत्रता को स्वीकार करता है |

यदि मनुष्य यथार्थ ज्ञान-विवेक नहीं रखता अर्थात मूर्खता-अज्ञान रूपी अविद्या से ग्रस्त रहता है, तो उसे व्यवस्था से सुख-विशेष मिलेंगा, यह बोध ही नहीं रहता, इसलिए वह व्यवस्था चाहे माता-पिता, गुरु-आचार्य, पुलिस, समझ या राष्ट्र की व्यवस्था हो, उसको भंग करता है, और दुःख विशेष को प्राप्त करता है | ऐसे-ऐसे स्थानों में मनुष्य अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करता है | यहाँ स्वतंत्रता का उपयोग तो कर रहे है, परन्तु उस स्वतंत्रता से मनुष्य को दुःख-विशेष प्राप्त हो रहा है | ऐसी स्वतंत्रता से दुःख ही मिलेंगा | इसलिए मनुष्य को समझना चाइये की स्वंत्रता और परतंत्रता क्या है ? अर्थात स्वतंत्रता से सुख और परतंत्रता से दुःख मिलता है ? क्या यही स्वतंत्रता या परतंत्रता है ? यदि ऐसा माना जाए तो स्वतंत्रता से सुख और दुःख दोनों मिलते है और परतंत्रता से भी सुख और दुःख दोनों मिलते है | इसलिए मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता को समझकर-जानकार उसका सदुपयोग करना चाइये |

मनुष्य स्वतंत्रता का दुरूपयोग तब कर सकता है जब उसके पास यथार्थ ज्ञान-विवेक होंगा | यथार्थ ज्ञान वेद आदि सत्य शास्त्रों के अध्यन करने से या उनको पढ़े हुए विद्वानों के माध्यम से या और किसी भी माध्यम से जानकारी प्राप्त करने से मनुष्य को हो जाता है | यथार्थ ज्ञान से मनुष्य अपने स्वतंत्रता का सदुपयोग करता है | कहा, कब, किस परिस्थिति में स्वतंत्र रहकर सुख लिया जायेंगा और कहा, कब, किस परिस्थिति में अन्यों के आधीन परतंत्र रहकर भी सुख लिया जायेंगा, यही मनुष्य की बुद्धिमता है | यदि मनुष्य के पास बुद्धि-ज्ञान नहीं है अर्थात मूर्खता-अविद्या है, तो स्वतंत्र होता हुआ भी अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग करता हुआ सर्वत्र दुःख सागर में गोता लगाता रहेंगा | इसका यह भी अर्थ नहीं लेना चाइये की परतंत्र रहता हुआ सुख ही लेता रहेंगा हाँ ! यदि अविद्या से ग्रस्त रहकर परतंत्रता को स्वीकार करता है, तो दुःख सागर में गोता लगाता रहेंगा | परन्तु यथार्थ-ज्ञान-विद्या से युक्त रहेंगा, तो चाहे स्वतंत्र रहे चाहे परतंत्र रहे, दोनों की स्तिथियो में सदा सुखी ही रहेंगा | इसलिए विद्या-युक्त स्वतंत्रता और परतंत्रता दोनों ही लाभकारी है | परन्तु ध्यान रहे मनुष्य स्वभाव से स्वतंत्र है, परतंत्र नहीं |

मुसलमान बड़े मूर्तिपूजक

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मुसलमान बड़े मूर्तिपूजक

-निश्चय हम तेरे मुख को आसमान में फिरता देखते हैं अवश्य हम तुझे उस कि़बले को फेरेंगे कि पसन्द करे उसको, बस अपना मुख मस्जि दुल्हराम की ओर फेर, जहाँ कहीं तुम हो अपना मुख उसकी ओर फेर लो।। मं0 1। सि0 2। सू02। आ0 1443

समी0 -क्या यह छोटी बुत्परस्ती है? नहीं, बड़ी।

पूर्वपक्षी-हम मुसलमान लोग बुत्परस्त नहीं हैं।किन्तु,बुत्शिकन अर्थात् मुर्तों को तोड़नेहारे है, क्योंकि हम कि़बले को खुदा नहीं समझते।

उत्तरपक्षी-जिनको तुम बुत्परस्त समझते हो,वे भी उन उनमुर्तों को ईश्वर नहीं समझते किन्तु उनके सामने परमेश्वर की भक्ति करते हैं। यदि बुतों के तोड़ने हारे हो तो उस मस्जिद कि़बले बड़े बुत को क्यों न तोड़ा?

पूर्वपक्षी-वाह जी! हमारे तो कि़बले की ओर मुख फेरने का कुरान में हुक्म है और इनको वेद में नहीं है फिर वे बुत्परस्त क्यों नहीं ? और हम क्यों ? क्योंकि हमको खुदा का हुक्म बजाना अवश्य है।

उत्तरपक्षी- जैसे तुम्हारे लिये क़ुरान में हुक्म है, वैसे इनके लिये पुराण में आज्ञा है। जैसे तुम क़ुरान को खुदा का कलाम समझते हो, वैसे पुराणी भी पुराणों को खुदा के अवतार व्यासजी का वचन समझते हैं। तुममें और इनमें बुत्परस्ती का कुछ भिन्न भाव नहीं है | प्रत्युत,तुम बड़े बुत्परस्त और ये छोटे हैं | क्योंकि, जब तक कोई मनुष्य अपने घर में से प्रविष्ट हुई बिल्ली को निकालने लगे तब तक उसके घर में ऊंट प्रविष्ट हो जाय,वैसे ही मुहम्मद साहेब ने छोटे बुत् को मुसलमानों के मत से निकाला,परन्तु बड़ा बुत् जो कि पहाड़ के सदृश मक्के की मस्जिद है, वह सब मुसलमानों के मत में प्रविष्ट करा दी, क्या यह छोटी बुत्परस्ती है ? हाँ, जो हम लोग वैदिक हैं, वैसे ही तुम लोग भी वैदिक हो जाओ तो बुत्परस्ती आदि बुराइयोंसे बच सको, अन्यथा नहीं | तुमको, जब तक अपनी बड़ी बुत्परस्ती को न निकाल दो, तब तक दूसरे छोटे बुत्परस्तों के खण्डन से लज्जित हो के निवृत रहना चाहिये और अपने को बुत्परस्ती से पृथक् करके पवित्र करना चाहिये |

-जब हमने लोगों के लिये काबे को पवित्र स्थान सुख देने वाला बनाया तुम नमाज़ के लिये इबराहीम के स्थान को पकड़ो।। मं0 1। सि0 1। सू0 2। आ0 1251

समी0 -क्या काबे के पहिले पवित्र स्थान खुदा ने कोई भी न बनाया था ? जो बनाया था तो काबे के बनाने की कुछ आवश्यकता न थी, जो नहीं बनाया था तो विचारे पूर्वोत्पन्नों को पवित्र स्थान के बिना ही रक्खा था ? पहिले ईश्वर को पवित्र स्थान बनाने का स्मरण न हुआ होगा |

-वो कौन मनुष्य है जो इबराहीम के दीन से फिर जावे परन्तु जिसने अपनी जान को मूर्ख बनाया और निश्चय हमने दुनियां में उसी को पसन्द किया और निश्चय आख़रत में वो ही नेक है।। मं0 1। सि0 1। सू0 2। आ0 1302

समी0 -यह कैसे सम्भव है कि इबराहीम के दीन को नहीं मानते वे सब मूर्ख हैं ? इबराहीम को ही खुदा ने पसन्द किया, इसका क्या कारण है ? यदि धर्मात्मा होने के कारण से किया तो धर्मात्मा और भी बहुत हो सकते हैं ? यदि बिना धर्मात्मा होने के ही पसन्द किया तो अन्याय हुआ। हां, यह तो ठीक है कि जो धर्मात्मा है,वही ईश्वर को प्रिय होता है, अधर्मी नहीं |

खुदा या शैतान

khuda ya shaitan

 खुदा या शैतान 

 – और काटें जड़ काफि़रों की।। मैं तुमको सहाय दूंगा साथ सहस्र फरिश्तों के पीछे2 आने वाले।। अवश्य मैं काफि़रों के दिलों में भय डालूंगा, बस मारो ऊपर  गर्दनों के मारो उनमें से प्रत्येक पोरी (संधि) पर।। मं0 2। सि0 9। सू0 8। आ0 7। 9। 12

समी0-वाह जी वाह ! कैसा खुदा और कैसे पैग़म्बर दयाहीन। जो मुसलमानीमत से भिन्न काफि़रों की जड़ कटवा वे। और खुदा आज्ञा देवे उनको गर्दन पर मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्मति देवे ऐसा खुदा शैतान से क्या कुछ कम है ? यह सब प्रपञ्च कुरान के कर्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हम से दूर और हम उस से दूर रहें |

-अल्लाह मुसलमानों के साथ है। ऐ लोगो जो ईमान लाये हो पुकारना स्वीकार करो वास्ते अल्लाह के और वास्ते रसूल के।। ऐ लोगो जो ईमान लाये हो,मत चोरी करो अल्लाह की रसूल की और मत चोरी करो अमानत अपनी को।। और मकर करता था अल्लाह और अल्लाह भला मकर करने वालों का है।। मं0 2। सि0 9। सू0 8। आ0 19। 24। 27। 30

समी0-क्या अल्लाह मुसलमानों का पक्षपाती है ? जो ऐसा है तो अधर्म करता है। नहीं तो ईश्वर सब सृष्टि भर का है। क्या ख़ुदा विना पुकारे नहीं सुन सकता ? बधिर है ? और उसके साथ रसूल को शरीक करना बहुत बुरी बात नहीं है ? अल्लाह का कौन सा खज़ाना भरा है जो चोरी करेगा ? क्या रसूल और अपने अमानत की चोरी छोड़कर अन्य सब की चोरी किया करे ? ऐसा उपदेश अविद्वान् और अधर्मियों का हो सकता है | भला ! जो मकर करता और जो मकर करने वालों का संगी है वह खुदा कपटी छली और अधर्मी क्यों नहीं ? इसलिये यह कुरान खुदा का बनाया हुआ नहीं है| किसी कपटी छली का बनाया होगा, नहीं तो ऐसी अन्यथा बातें लिखित क्यों होतीं ? |

-और लड़ो उनसे यहाँ तक कि न रहे फितना अर्थात् बल काफि़रों का और होवे दीन तमाम वास्ते अल्लाह के।। और जानो तुम यह कि जो कुछ तुम लूटो किसी वस्तु से निश्चय वास्ते अल्लाह के है, पाँचवा हिस्सा उसका और वास्ते रसूल के।। मं0 2। सि0 9। सू0 8। आ0 39।41

समी0-ऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शांति भंग कर्ता दूसरा कौन होगा ? अब देखिये यह मज़हब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत् को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है ? और लूटके माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्टा लगाता है| बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैग़म्बर संसार में ऐसी उपाधि और शांति भंग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिये कहा  से आया ? जो ऐसे 2 मत जगत् में प्रचलित न होते तो सब जगत् आनन्द में बना रहता |

-और कभी देखे जब काफि़रों को फ़रिश्ते कब्ज करते हैं मारते हैं मुख उनके और पीठें उनकी और कहते चखो अ़ज़ाब जलने का।। हमने उनके पाप से उनको मारा और हमने फि़राओन की क़ौम को डुबा दिया।। और तैयारी करो वास्ते उनके जो कुछ तुम कर सको।। मं0 2। सि0 9। सू0 8। आ0 50।54।601

समी0-क्यों जी! आजकल रूस ने रूम आदि और इंग्लैड ने मिश्र की दुर्दशा कर डाली, फ़रिश्ते कहाँ सो गये ? और अपने सेवकों के शत्रुओं को खुदा पूर्व मारता डुबाता था, यह बात सच्ची हो तो आजकल भी ऐसा करे| जिससे ऐसा नहीं होता, इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं है | अब देखिये! यह कैसी बुरी आज्ञा है कि जो कुछ तुम कर सको वह भिन्न मतवालों के लिये दुःखदायक कर्मकरो, ऐसी आज्ञा विद्वान् और धार्मिक दयालु की नहीं हो सकती| फिर लिखते हैं कि खुदा दयालु और न्यायकारी है| ऐसी बातों से मुसलमानों के खुदा से न्याय और दयादि सद्गुण दूर बसते हैं |

-ऐ नबी किफ़ायत है तुझको अल्लाह और उनको जिन्होंने मुसलमानों से तेरा पक्ष किया।। ऐ नबी रग़बत अर्थात् चाह चस्का दे मुसलमानों को ऊपर लड़ाईके, जो हों तुममें से 20 आदमी सन्तोष करने वाले तो पराजय करें दो सौ का।। बस खाओ उस वस्तु से कि लूटा है तुमने हलाल पवित्र और डरो अल्लाह से वह क्षमा करने वाला दयालु है।। मं0 2। सि0 10। सू0 8। आ0 64। 65। 692

समी0-भला! यह कौनसी न्याय,विद्वता और धर्म की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहे अन्याय भी करे, उसी का पक्ष और लाभ पहुंचावे? और जो प्रजा में शांतिभंग करके लड़ाई करे करावे और लूटमार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी का नाम क्षमावान् दयालु लिखे यह बात खुदाकी तो क्या ?किन्तु,किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी2 बातों से कुरान ईश्वर वाक्य कभी नहीं हो सकता |

विज्ञान से अनभिज्ञ खुदा

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 विज्ञान से अनभिज्ञ खुदा

-निश्चय परवरदिगार तुम्हारा अल्लाह है जिसने पैदा किया आसमानों और पृथिवी को बीच छः दिन के फिर क़रार पकड़ा ऊपर अर्श के तदबीर करताहै काम की।। मं0 3। सि0 11। सू0 10। आ0

समी0-आसमान आकाश एक और बिना बना अनादि है। उसका बनाना लिखने से निश्चय हुआ कि वह कुरान का अल्लाह पदार्थ  विद्या को नहीं जानता था ? क्या परमेश्वर के सामने छः दिन तक बनाना पड़ता है? तो जो ‘‘हो मेरे हुक्म से और हो गया’’ जब कुरान में ऐसा लिखा है फिर छः दिन कभी नहीं लग सकते, इससे छः दिन लगना झूठ है। जो वह व्यापक होता तो फिर अर्श को  क्यों ठहरता ? और जब काम की तदबीर करता है तो ठीक तुम्हारा खुदा मनुष्य के समान है क्योंकि जो सर्वज्ञ है वह बैठा2 क्या तदबीर करेगा? इससे विदित होता है कि ईश्वर को न जानने वाले जंगली लोगों ने यह पुस्तक बनाया होगा |

-शिक्षा और दया वास्ते मुसलमानों के।। मं0 3। सि0 11। सू0 11। आ0 571

समी0-क्या यह खुदा मुसलमानों ही का है ? दूसरों का नहीं ? और पक्षपातीहै ?जो मुसलमानों ही पर दया करे,अन्य मनुष्यों पर नही। यदि मुसलमान ईमानदारों को कहते हैं तो उनके लिये शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं, और मुसलमानों से भिन्नों को उपदेश नहीं करता तो खुदा की विद्या ही व्यर्थ है |

-परीक्षा लेवे तुमको, कौन तुममें से अच्छा है कर्मों में, जो कहे तू, अवश्य उठाये जाओगे तुम पीछे मृत्यु के।। मं0 3। सि0 12। सू0 11। आ0 72

समी0-जब कर्मों की परीक्षा करता है तो सर्वज्ञ ही नहीं। और जो मृत्यु पीछे उठाता है तो दौड़ा सुपुर्द रखता है और अपने नियम जो कि मरे हुए न जीवें उसको तोड़ता है, यह खुदा को बट्टा लगना है |

-और कहा गया ऐ पृथिवी अपना पानी निगल जा और ऐ आसमान बसकर और पानी सूख गया।। और ऐ क़ौम मेरे’, यह है निशानी ऊंटनी अल्लाह की वास्ते तुम्हारे, बस छोड़ दो उसको बीच पृथिवी अल्लाह के खाती फिरे।। मं0 3।सि0 11। सू0 11। आ0 44।643

समी0-क्या लड़केपन की बात है ! पृथिवी और आकाश कभी बात सुनसकते हैं ? वाहजी वाह! खुदा के ऊंटनी भी है तो ऊंट भी होगा ? तो हाथी, घोड़े, गधे आदि भी होंगे ? और खुदा का ऊंटनी से खेत खिलाना क्या अच्छी बात है? क्या ऊंटनी पर चढ़ता भी है ? जो ऐसी बातें हैं तो नवाबी की सी घसड़-पसड़ खुदा के घर में भी हुई |

-और सदैव रहने वाले बीच उसके जब तक कि रहें आसमान और पृथिवी और जो लोग सुभागी हुए बस बहिश्त के सदा रहने वाले हैं जब तक रहें आसमान और पृथिवी।। मं0 3। सि0 12। सू0 11। आ0 108। 109

समी0-जब दोज़ख और बहिश्त में कयामत के पश्चात  सब लोग जायंगे फिर आसमान और पृथिवी किसलिये रहेगी ? और तब दोज़ख और बहिश्त के रहनेकी आसमान पृथिवी के रहने तक अवधि हुई तो सदा रहेंगे बहिश्त वा दोज़ख में, यह बात झूठी हुई। ऐसा कथन अविद्वानों का होता है, ईश्वर वा विद्वानों का नहीं |

-जब यूसुफ़ ने अपने बाप से कहा कि ऐ बाप मेरे, मैंने एक स्वप्न में देखा।। मं0 3। सि0 12। 13। सू0 12। 13। आ0 4 से 101तक2

समी0-इस प्रकरण में पिता पुत्र का संवाद रूप किस्सा कहानी भरी है इसलिये कुरान ईश्वर का बनाया नहीं। किसी मनुष्य ने मनुष्यों का इतिहास लिख दिया है |

-अल्लाह वह है कि जिसने खड़ा किया आसमानों को बिना खंभे के देखते हो तुम उसको, फिर ठहरा ऊपर अर्श के, आज्ञा वर्तने वाला किया सूरज और चांद को और वही है जिसने बिछाया पृथिवी को | उतारा आसमान से पानी बस बहे नाले साथ अन्दाज अपने के अल्लाह खोलता है भोजन को वास्ते जिसको चाहै और तंग करता है।। मं0 3। सि0 13। सू0 13। आ0 2। 3।17।26

समी0-मुसलमानों का खुदा पदार्थ विद्या कुछ भी नहीं जानता था। जो जानता तो गुरुत्व न होने से आसमान को खंभे लगाने की कथा कहानी कुछ भी न लिखता। यदि खुदाअर्शरूप एक स्थान में रहता है तो वह सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक नहीं हो सकता | और जो खुदा मेघ विद्या जानता तो आकाश से पानी उतारा लिखा,पुनः,यह क्यों न लिखा कि पृथिवी से पानी ऊपर चढ़ाया| इससे निश्चय हुआ कि कुरान का बनाने वाला मेघ की विद्या को भी नहीं जानता था|और जो बिना अच्छे बुरे कामों के सुख दुःख देता है तो पक्षपाती, अन्यायकारी, निरक्षर भट्ट है।।94।।

क्या कुरान खुदा की बनाई हुयी है ?

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क्या कुरान खुदा की बनाई हुयी है ?

जो परमेश्वर ही मनुष्यादि प्राणियों को खिलाता-पिलाता है तो किसी को रोग होना न चाहिये और सबको तुल्य भोजन देना चाहिये। पक्षपात से एक को उत्तम और दूसरे को निकृष्ट जैसा कि राजा और कंगले को श्रेष्ठ-निकृष्ट भोजन मिलता है,न होना चाहिये। जब परमेश्वर ही खिलाने-पिलाने और पथ्य कराने वाला है तो रोग ही न होना चाहिये। परन्तु मुसलमान आदि को भी रोग होते हैं। यदि खुदा ही रोग छुड़ाकर आराम करनेवाला है तो मुसलमानों के शरीरों में रोग न रहना चाहिये। यदि रहता है तो खुदा पूरा वैद्य नहीं है। यदि पूरा वैद्य है तो मुसलमानों के शरीर में रोग क्यों रहते हैं?यदि वही मारता और जिलाता है तो उसी खुदा को पाप-पुण्य लगता होगा। यदि जन्म-जमान्तर के कर्मानुसार व्यवस्था करता है तो उसको कुछ भी अपराध नहीं।यदि वह पाप क्षमा और न्याय क़यामत की रात में करता है तो खुदा पाप बढ़ानेवाला होकर पाप युक्त होगा। यदि क्षमा नहीं करता तो यह कुरान की बात झूठी होने से बच नहीं सकती है।

-नहीं तू परन्तु आदमी मानिन्द हमारी, बस ले आ कुछ निशानी जो हैतू सच्चों से।। कहा यह ऊंटनी है वास्ते उसके पानी पाना है एक बार।। मं0 5। सि019। सू0 26। आ0 154। 155

समी0 – यह खुदा को शंका और अभिमान क्यों हुआ कि तू हमारे तुल्य नहीं है और’व् भला इस बात को कोई मान सकता है कि पत्थर से ऊंटनी निकले! वे लोग जंगली थे कि जिन्होंने इस बात को मान लिया और ऊंटनी की निशानी देनी केवल जंगली व्यवहार है, ईश्वरकृत नहीं! यदि यह किताब ईश्वरकृत होती तो ऐसी व्यर्थ बातें इसमें न होतीं।

-ऐ मूसा बात यह है कि निश्चय मैं अल्लाह हूं ग़ालिब।। और डाल देअसा अपना, बस जब कि देखा उसको हिलता था मानो कि वह सांप है,…ऐ मूसा मत डर, निश्चय नहीं डरते समीप मेरे पैग़म्बर।। अल्लाह नहीं कोई माबूद परन्तु वह मालिक अर्श बड़े का।। यह कि मत सरकशी करो ऊपर मेरे और चले आओ मेरे पास मुसलमान होकर।। मं0 5। सि0 19। सू0 27। आ0 9। 10। 26।31

समी0 -और भी देखिये अपने मुख आप अल्लाह बड़ा ज़बरदस्त बनता है।अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना श्रेष्ठ पुरुष का भी काम नहीं, खुदा का क्यों कर हो सकता है? तभी तो इन्द्रजाल का लटका दिखला जंगली मनुष्यों को वश करआप जंगलस्थ खुदा बन बैठा। ऐसी बात ईश्वर के पुस्तक में कभी नहीं हो सकती। यदि वह बड़े अर्श अर्थात् सातवें आसमान का मालिक है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर नहीं हो सकता है। यदि सरकशी करना बुरा है तो खुदा और मुहम्मद साहेब ने अपनी स्तुति से पुस्तक क्यों भर दिये? मुहम्मद साहेब ने अनेकों को मारे इससे सरकशी हुई वा नहीं? यह कुरान पुनरुक्त और पूर्वापर विरुद्ध बातों से भराहुआ है।

-और देखेगा तू पहाड़ों को अनुमान करता है तू उनको जमे हुए औरवे चले जाते हैं मानिन्द चलने बादलों की, कारीगरी अल्लाह की जिसने दृढ़ किया हर वस्तु को, निश्चय वह खबरदार है उस वस्तु के कि करते हो।। मं05। सि0 20।मू0 27। आ0 881

समी0 –बद्दलोंके समान पहाड़ का चलना कुरान बनानेवालोंके देश में होताहोगा, अन्यत्र नहीं। और खुदा की खबरदारी, शैतान बागी को न पकड़ने और न दंड देने से ही विदित होती है कि जिसने एक बाग़ी को भी अब तक न पकड़ पाया, न दंड दिया। इससे अधिक असावधानी क्या होगी ?

-बस मुष्ट मारा उसको मूसा ने, बस पूरी की आयु उसकी।। कहा ऐ रब मेरे, निश्चय मैंने अन्याय किया जान अपनी को, बस क्षमा कर मुझको, बसक्षमा कर दिया उसको, निश्चय वह क्षमा करने वाला दयालु है।। और मालिक तेरा उत्पन्न करता है, जो कुछ चाहता है और पसन्द करता है।। मं0 5। सि0 20। सू0 28। आ0 15। 16। 682

समी0 -अब अन्य भी देखिये! मुसलमान और ईसाइयों के पैग़म्बर और खुदा कि मूसा पैग़म्बर मनुष्य की हत्या किया करे और खुदा क्षमा किया करे, ये दोनों अन्यायकारी हैं वा नहीं? क्या अपनी इच्छा ही से जैसा चाहता है वैसी उत्पत्तिकरता है ? क्या उसने अपनी इच्छा ही से एक को राजा दूसरे को कंगाल और एक को विद्वान् और दूसरे को मूर्खादि किया है ? यदि ऐसा है तो न कुरान सत्य और न अन्यायकारी होने से यह खुदा ही हो सकता है।।121।।

-और आज्ञा दी हमने मनुष्य को साथ मां-बाप के भलाई करना  जो झगड़ा करें तुझसे दोनों यह कि शरीक लावे तू साथ मेरे उस वस्तु को, कि नहीं वास्ते तेरे साथ उसके ज्ञान, बस मत कहा मान उन दोनों का, तर्फ़ मेरी है।। औरअवश्य भेजा हमने नूह को तर्फ क़ौम उसके कि बस रहा बीच उनके हजार वर्ष परन्तु पचास वर्ष कम।। मं0 5। सि0 20-21। सू0 29। आ0 7। 13

समी0 -माता-पिता की सेवा करना तो अच्छा ही है जो खुदा के साथ शरीककरने के लिये कहे तो उनका कहा न मानना तो यह भी ठीक है।परन्तु,यदि मातापिता मिथ्याभाषणादि करने की आज्ञा देवें तो क्या मान लेना चाहिये ? इसलिये यह बात आधी अच्छी और आधी बुरी है। क्या नूह आदि पैग़म्बरों ही को खुदा संसार में भेजता है तो अन्य जीवों को कौन भेजता है ? यदि सब को वही भेजताहै तो सभी पैग़म्बर क्यों नहीं ? और प्रथम मनुष्यों की हजार वर्ष की आयु होती थी तो अब क्यों नहीं होती ? इसलिये यह बात ठीक नहीं |

-अल्लाह पहिली बार करता है उत्पत्ति फिर दूसरी बार करेगा उसको,फिर उसी की ओर फेरे जाओगे।। और जिस दिन बर्पा अर्थात् खड़ी होगी क़यामत निराश होंगे पापी।। बस जो लोग कि ईमान लाये और काम किये अच्छे बस वे बीच बाग़ के सिंगार किये जावेंगे।। और जो भेज दें हम एबाब बस देखें उस खेती को पीली हुई। इसी प्रकार मोहर रखता है अल्लाह पिंर दिलों उन लोगों के कि नहीं जानते।। मं0 5। सि0 21। सू0 30। आ0 11। 12।15।51।591

समी0 -यदि अल्लाह दो बार उत्पत्ति करता है,तीसरी बार नहीं,तो उत्पत्ति की आदि और दूसरी बार के अन्त में निकम्मा बैठा रहता होगा ? और एक तथा दो बार उत्पत्ति के पश्चात् उसका सामर्थ्य निकम्मा और व्यर्थ हो जायगा। यदि न्याय करने के दिन पापी लोग निराश हों तो अच्छी बात है,परन्तु इसका प्रयोजन यह तो कहीं नहीं है कि मुसलमानों के सिवाय सब पापी समझ कर निराश किये जायें क्योंकि कुरान में कई स्थानों में पापियों से औरों का ही प्रयोजन है। यदि बगीचे में रखना और “श्रृंगारपहिराना ही मुसलमानों का स्वर्ग है तो इस संसार के तुल्य हुआ और वहाँ माली और सुनार भी होंगे अथवा खुदा ही माली और सुनार आदि का काम करता होगा। यदि किसी को कम गहना मिलता होगा तो चोरी भी होती होगी और बहिश्त से चोरी करने वालों को देाज़ख में भी डालता होगा। यदि ऐसा होता होगा तो सदा बहिश्त में रहेंगे यह बात झूठ हो जायगी। जो किसानों की खेती पर भी खुदा की दृष्टि है सो यह विद्या खेती करने के अनुभव ही से होती है और यदि माना जाय कि खुदा ने अपनी विद्या से सब बात जान ली है तो ऐसा भय देनाअपना घमण्ड प्रसिद्ध करना है। यदि अल्लाह ने जीवों के दिलों पर मोहर लगा पाप कराया तो उस पाप का भागी वही होवे, जीव नहीं हो सकते। जैसे जय पराजय सेनाधीश का होता है वैसे यह सब पाप खुदा ही को प्राप्त होवें |

-ये आयतें हैं किताब हिक्मत वाले की। उत्पन्न किया आसमानों को विना सुतून अर्थात् खम्भे के देखते हो तुम उसको और डाले बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे।। क्या नहीं देखा तूने यह कि अल्लाह प्रवेश कराता है रात को बीच दिन के और प्रवेश कराता है दिन को बीच रात के।। क्या नहीं देखाकि किश्तियां चलती हैं बीच दर्या के साथ निआमतों अल्लाह के, तो किदिखलावे तुमको निशानियां अपनी।। मं0 5। सि0 21। सू0 31। आ0 2। 10। 29।311

समी0 -वाह जी वाह! हिक्मतवाली किताब! कि जिसमें सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उसमें खम्भे लगाने की शंका और पृथिवी को स्थिररखने के लिये पहाड़ रखना ! थोड़ी सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता और हिक्मत देखो कि जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं और जहाँ रात हैवहाँ दिन नहीं, उसको एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है। यह बड़े अविद्वानोंकी बात है, इसलिये यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्या विरुद्ध बात नहीं है कि नौका, मनुष्य और क्रिया कौशलादि से चलती हैं वा खुदा की कृपा से ? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बनाकर समुद्र में चलावें तो खुदा की निशानी डूब जायवा नहीं? इसलिये यह पुस्तक न विद्वान् और न ईश्वरका बनाया हुआ हो सकता है |

कुरानी जन्नत, दोजक और विज्ञान

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कुरानी जन्नत, दोजक और विज्ञान 

-जब कि हिलाई जावेगीपृथिवी हिलाये जाने कर।। और उड़ाए जावेंगेपहाड़ उड़ाये जाने कर।। बस हो जावंगेभुनुगेटकुड़े-2 ।। बस साहब दाहनी ओर वालेक्या हैं  साहब दाहनी ओर के।। और र्बाइं  ओर वाले क्या हैं र्बांइ  ओर के।। ऊपर पलंघसोने  के तारों से बुने हएु हैं तकिये किए हुए हैं ऊपर उनके आमने सामने ।और फिरेंगे ऊपर उनके लड़के सदा रहने वाले । साथ आबखारेां के और आफ़ताबोंके और प्यालां के शराब साफ़ से । नहीं माथा दुखाये जावेंगे उससे और न विरुद्ध बोलंगे। और मेवे उस कि़स्म से कि पसन्दकरें । और गोश्त जानवर पक्षियों केउस कि़स्म से कि पसन्द करें । और वास्ते उनके औरतें हैं अच्छी आँखों वाली।।मानिन्द मोतियों छिपाये हुओं की।। और बिछानै बड़े।। निश्चय हमने उत्पन्न किया है औरतों को एक प्रकार का उत्पन्न करना है।। बस किया है हमने उनको कुमारी।।सुहागवालियां बराबर अवस्था बालियां।। बस भरने वाले हो उससे पेटों को।। बसकस़म खाता हॅूं में साथ गिरने तारों के । म07। सि0 27। सू0 56। आ0 4- 6। 8। 9।15-23। 34-37। 53।751

समी0 -अब देखिये कुरान बनाने वाले की लीला को! भला पृथिवी तो हिलती ही रहती है उस समय भी हिलती रहेगी। इससे यह सिद्ध होता है कि कुरानबनाने वाला पृथिवी को स्थिर जानता था। भला पहाड़ों को क्या पक्षीवत् उड़ा देगा? यदि भुनुगे हो जावेंगे तो भी सूक्ष्म शरीरधारी रहेंगे तो फिर उनका दूसरा जन्म क्यों नहीं? वाहजी! जो खुदा शरीरधारी न होता तो उसके दाहिनी ओर और बांई ओर कैसे खड़े हो सकते? जब वहाँ पलंग सोने के तारों से बुने हुए हैं तो बढ़ई सुनार भी वहाँ रहते होंगे और खटमल काटते होंगे, जो उनको रात्रि में सोने भी नहीं देते होंगे। क्या वे तकिये लगाकर निकम्मे बहिश्त में बैठे ही रहते हैं? वा कुछ काम किया करते हैं ? यदि बैठे ही रहते होंगे तो उनको अन्न पचन न होने से वे रोगी होकर शीघ्र मर भी जाते होंगे ? और जो काम किया करते होंगे तो जैसे मेहनत मज़दूरी यहाँ करते हैं वैसे ही वहाँ परिश्रम करके निर्वाह करते होंगे फिर यहाँ से वहाँ बहिश्त में विशेष क्या है? कुछ भी नहीं। यदि वहाँ लड़के सदा रहते हैं तो उनके मां-बाप भी रहते होंगे और सासू श्वसुर भी रहते होंगे,तब तो बड़ा भारी शहर बसता होगा फिर मल-मूत्रादि के बढ़ने से रोग भी बहुत से होते होंगे। क्योंकि,जबमेवे खावेंगे गिलासों में पानी पीवेंगे और प्यालों से मद्य पीवेंगे,न उनका सिर दूखेगाऔर न कोई विरुद्ध बोलेगा,यथेष्ट मेवा खावेंगे और जानवरों तथा पक्षियों के मांस भी खावेंगे तो अनेक प्रकार के दुःख, पक्षी, जानवर वहाँ होंगे, हत्या होगी और हाड़ जहाँ तहाँबिखरे रहेंगे और कसाइयों की दुकानें भी होंगी। वाह क्या कहना इनके बहिश्त की प्रशंसा कि वह अरब देश से भी बढ़कर दीखती है!!! और जो मद्य-मांस पी-खा के उन्मत्त होते हैं,इसीलिये अच्छी2 स्त्रियां और लौंडे भी वहाँ अवश्य रहने चाहिये नहीं तो ऐसे नशेबाजों के शिर में गरमी चढ़ के प्रमादी हो जावें। अवश्य बहुत स्त्री पुरुषों के बैठने सोने के लिये बिछौने बड़े2 चाहिये। जब खुदा कुमारियों को बहिश्त में उत्पन्न करता है तभी तो कुमारे लड़कों कोभी उत्पन्न करता है। भला! कुमारियों का तो विवाह जो यहाँ से उम्मेदवार होकर गये हैं,उनके साथ खुदा ने लिखा,पर उन सदा रहने वाले लड़कों का किन्हीं कुमारियों के साथ विवाह न लिखा,तो क्या वे भी उन्हीं उम्मेदवारों के साथ कुमारीवत् दे दिये जायेंगे? इसकी व्यवस्था कुछ भी न लिखी। यह खुदा में बड़ी भूल क्यों हुई? यदि बराबर अवस्था वाली सुहागिन स्त्रियां पतियों को पा के बहिश्त में रहती हैं तो ठीक नहीं हुआ,क्योंकि स्त्रियों से पुरुष का आयु दूना,ढाई गुना चाहिये,यह तो मुसलमानों के बहिश्त की कथा है।और नरक वाले सिंहोड़ अर्थात् थोर के वृक्षों को खा के पेट भरेंगे तो कण्टक वृक्ष भी दोज़ख में होंगे तो कांटे भी लगते होंगे और गर्म पानी पियेंगे इत्यादि दुःखदोज़ख में पावेंगे। क़सम का खाना प्रायः झूठे का काम है, सच्चों का नहीं। यदिखुदा ही कसम खाता है तो वह भी झूठ से अलग नहीं हो सकता।

क्या मुहम्मद का नाम अथर्ववेद में है

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क्या मुहम्मद का नाम अथर्ववेद में है ?

बहुत से मुसलमान ऐसा कहा करते और लिखा व छपवाया करते है कि हमारे मजहब की बात अथर्ववेद में लिखी है. इस का या उत्तर है कि अथर्ववेद में इस बात का नाम निशान भी नहीं है.

प्रश्न : क्या तुम ने सब अथर्ववेद देखा है ? यदि देखा है तो अल्लोपनिषद देखो।  यह साक्षात उसमें लिखी है।  फिर क्यों कहते हो कि अथर्ववेद में मुसलमानों का नाम निशान भी नहीं है। जो इस में प्रत्यक्ष मुहम्मद  साहब रसूल लिखा है इस से सिध्द होता है कि मुसलामानों का मतवेदमूलक है।

उत्तर : यदि तुम ने अथर्ववेद न देखो तो तो हमारे पास आओ आदि से पूर्ति तक देखो अथवा जिस किसी अथर्ववेदी के पास बीस कांडयुक्त मंत्र संहिता अथर्ववेद को देख लो. कहीं तुम्हारे पैगम्बर साहब का नाम व मत का निशान न देखोगे और जो यह अल्लोपनिषद है वह न अथर्ववेद में न उसके गोपथब्राहम्मण व किसी  शाखा में है  यह तो अकबरशाह के समय में अनुमान है कि किसी ने बनाई है।  इस का बनाने वाला कुछ अरबी और कुछ संस्कृत भी पढ़ा  हुआ दीखता है क्योंकि इस में अरबी और संस्कृत के पद लिखे हुए दीखते हैं।  देखो ! (अस्माल्लामइल्लेमित्रावरुणादिव्यानिधत्ते ) इत्यादि में जो कि दश अंक में लिखा है जैसे – इस में अस्माल्लाम और इल्ले ) अरबी और ( मित्रावरुणादिव्यानिधत्ते ) यह संस्कृत पद लिखे हैं वैसे ही सर्वत्र देखने में आने से किसी संस्कृत और अरबी के पढे हुए ने बनाई है. यदि इस का अर्थ देखा जाता है तो यह कृत्रिम आयुक्त वेद और व्याकरण रीति से विरुद्ध है।  जैसी यह उपनिषद बनाई है वैसी बहुत सी उपनिषदेंमतमतान्तर वाले पक्षपातियों ने बना ली हैं।  जैसी कि स्वरोपनिषदनृसिंहतापानि  राम तापनी गोपालतापनी बहुत सी बना ली हैं

प्रश्न -आज तक किसी ने ऐसा नहीं कहा अब तुम कहते हो हैम तुम्हारी बात कैसे माने ?

उत्तर -तुम्हारे मानने व न मानने से हमारी बात झूठ नहीं हो सकती है।  जिस प्रकार से मीन इस को आयुक्त ठहरेई है उसी प्रकार से जब तुम अथर्वेदगोपथ व इस की शाखाओं से प्राचीन लिखित पुस्तकों में जैसे का तैसा लेख दिखलाओ और अर्थसंगति से भी शुद्ध करो तब तो सप्रमाण हो सकता है.

प्रश्न – देखो ! हमारा मत कैसा अच्छा है कि जिसमें  सब प्रकार का सुख और अंत में मुक्ति होती है

उत्तर – ऐसे ही अपने अपनेमत वाले सब कहते हैं कि हमारा मत अच्छा है बाकी सब बुरे।  बिना हमारे मत में मुक्ति नहीं हो सकती।  अब हम तुम्हारी बात को सच्ची माने  व उनकी ? हम तो यही मानते हैं कि सत्यभाषण, अहिंसा, दया आदि शुभ गुण सब मतों  में  वाद विवाद ईर्ष्या, द्वेष, मिथ्याभाषणादि कर्म सब मतों में बुरे हैं।  यदि तुम को सत्य मत ग्रहण की इच्छा हो तो वैदिक मत को ग्रहण करो।