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Sai baba was a muslim, a orthodox muslim, exposed in Sai satcharitra,

मित्रो आज हम उन प्रशनो के उत्तर दे रहे है जिनके विषय में बहुत से साईं भक्त इधर उधर भटकते रहते है, उन्हें उत्तर कुछ सूझता नहीं और वे साईं के विषय में काफी भ्रमित भी रहते है,
आज हम लाये है साईं के मुस्लिम होने के कुछ प्रमाण जो की शिर्डी साईं संस्थान, शिर्डी महाराष्ट्र में स्थित है के द्वारा प्रकाशित व् प्रमाणित पुस्तक साईं सत्चरित्र से लिए गये है ,

Friends today we are giving some facts which proved that sai baba was a muslim. Devotees of sai are confused and they dont know what was the real character of Sai but today we are giving evidence on the basis of Sai Satcharitra Officially published by Shirdi Sai Sansthaan, Shirdi Maharashtra.

Sources: http://shirdisaiexpose.wordpress.com/2014/01/31/sai-baba-was-a-muslim-a-orthodox-muslim-exposed-in-sai-satcharitra

सबसे पहले अध्याय 4 से प्रमाण :

वे निर्भय होकर सम्भाषण करते, भाँति-भाँति के लोंगो से मिलजुलकर रहते, नर्त्तिकियों का अभिनय तथा नृत्य देखते औरगजन-कव्वालियाँ भी सुनते थे । इतना सब करते हुए भी उनकी समाधि किंचितमात्र भी भंग न होती थी । अल्लाह का नाम सदा उलके ओठों पर था । जब दुनिया जागती तो वे सोते और जब दुनिया सोती तो वे जागते थे । उनका अन्तःकरण प्रशान्त महासागर की तरह शांत था । न उनके आश्रम का कोई निश्चय कर सकता था और न उनकी कार्यप्रणाली का अन्त पा सकता था । कहने के लिये तो वे एक स्थान पर निवास करते थे, परंतु विश्व के समस्त व्यवहारों व व्यापारों का उन्हें भली-भाँति ज्ञान था । उनके दरबार का रंग ही निराला था । वे प्रतिदिन अनेक किवदंतियाँ कहते थे, परंतु उनकी अखंड शांति किंचितमात्र भी विचलित न होती थी । वे सदा मसजिद की दीवार के सहारे बैठे रहते थे तथा प्रातः, मध्याहृ और सायंकील लेंडी और चावड़ी की ओर वायु-सोवन करने जाते तो भी सदा आत्मस्थ्ति ही रहते थे ।

He had no love for perishable things, and was always engrossed in self-realization, which was His sole concern. He felt no pleasure in the things of this world or of the world beyond. His Antarang (heart) was as clear as a mirror, and His speech always rained nectar. The rich or poor people were the same to Him. He did not know or care for honour or dishonour. He was the Lord of all beings. He spoke freely and mixed with all people, saw the actings and dances of Nautchgirls and heard Gajjal songs. Still, He swerved not an inch from Samadhi (mental equilibrium). The name of Allah was always on His lips. While the world awoke, He slept; and while the world slept, He was vigilant. His abdomen (Inside) was as calm as the deep sea. His Ashram could not be determined, nor His actions could be definitely determined, and though He sat (lived) in one place, He knew all the transactions of the world. His Darbar was imposing. He told daily hundreds of stories, still He swerved not an inch from His vow of silence. He always leaned against the wall in the Masjid or walked morning, noon and evening towards Lendi (Nala) and Chavadi; still He at all times abided in the Self.

sai baba was a muslim proved by sai satcharitra
sai baba was a muslim proved by sai satcharitra

अब अध्याय 5 से प्रमाण :

बाबा दिनभर अपने भक्तों से घिरे रहते और रात्रि में जीर्ण-शीर्ण मसजिद में शयन करते थे । इस समय बाबा के पास कुल सामग्री – चिलम, तम्बाखू, एक टमरेल, एक लम्बी कफनी, सिर के चारों और लपेटने का कपड़ा और एक सटका था, जिसे वे सदा अपने पास रखते थे । सिर पर सफेद कपडे़ का एक टुकड़ा वे सदा इस प्रकार बाँधते थे कि उसका एक छोर बायें कान पर से पीठ पर गिरता हुआ ऐसा प्रतीत होता था, मानो बालों का जूड़ा हो । हफ्तों तक वे इन्हें स्वच्छ नहीं करते थे । पैर में कोई जूता या चप्पल भी नहीं पहिनते थे । केवल एक टाट का टुकड़ा ही अधिकांश दिन में उनके आसन का काम देता था । वे एक कौपीन धारण करते और सर्दी से बचने के लिये दक्षिण मुख हो धूनी से तपते थे । वे धूनी में लकड़ी के टुकड़े डाला करते थे तथा अपना अहंकार, समस्त इच्छायें और समस्च कुविचारों की उसमें आहुति दिया करते थे । वे अल्लाह मालिक का सदा जिहृा से उच्चारण किया करते थे । जिस मसजिद में वे पधारे थे, उसमें केवल दो कमरों के बराबर लम्बी जगह थी और यहीं सब भक्त उनके दर्शन करते थे । सन् 1912 के पश्चात् कुछ परिवर्तन हुआ । पुरानी मसजिद का जीर्णोद्धार हो गया और उसमें एक फर्श भी बनाया गया । मसजिद में निवास करने के पूर्व बाबा दीर्घ काल तक तकिया में रहे । वे पैरों में घुँघरु बाँधकर प्रेमविहृल होकर सुन्दर नृत्य व गायन भी करते थे ।

Baba was surrounded by His devotees during day; and slept at night in an old and dilapidated Masjid. Baba’s paraphernalia at this time consisted of a Chilim, tobacco, a “Tumrel” (tin pot), long flowing Kafni, a piece of cloth round His head, and a Satka (short stick), which He always kept with Him. The piece of white cloth on the head was twisted like matted hair, and flowed down from the left ear on the back. This was not washed for weeks. He wore no shoes, no sandals. A piece of sack-cloth was His seat for most of the day. He wore a coupin (waist-cloth-band) and for warding off cold he always sat in front of a Dhuni (sacred fire) facing south with His left hand resting on the wooden railing. In that Dhuni, He offered as oblation; egoism, desires and all thoughts and always uttered Allah Malik (God is the sole owner). The Masjid in which He sat was only of two room dimensions, where all devotees came and saw Him. After 1912 A.D., there was a change. The old Masjid was repaired and a pavement was constructed. Before Baba came to live in this Masjid, He lived for a long time in a place Takia, where with GHUNGUR (small bells) on His legs, Baba danced beautifully sang with tender love.

अध्याय – 7

ईद के दिन वे मुसलमानों को मसजिद में नमाज पढ़ने के लिये आमंत्रित किया करते थे । एक समय मुहर्रम के अवसर पर मुसलमानों ने मसजिद में ताजिये बनाने तथा कुछ दिन वहाँ रखकर फिर जुलूस बनाकर गाँव से निकालने का कार्यक्रम रचा । श्री साईबाबा ने केवल चार दिन ताजियों को वहाँ रखने दिया और बिना किसी राग-देष के पाँचवे दिन वहाँ से हटवा दिया ।

He allowed Mahomedans to say their prayers (Namaj) in His Masjid. Once in the Moharum festival, some Mahomedans proposed to contruct a Tajiya or Tabut in the Masjid, keep it there for some days and afterwards take it in procession through the village. Sai Baba allowed the keeping of the Tabut for four days, and on the fifth day removed it out of the Masjid without the least compunction.

अल्लाह मालिक सदैव उनके होठों पर था ।

He always walked, talked and laughed with them and always uttered with His tongue ‘Allah Malik’ (God is the sole owner).

हाथ जल जाने के पश्चात एक कुष्ठ-पीडित भक्त भागोजी सिंदिया उनके हाथ पर सदैव पट्टी बाँधते थे । उनका कार्य था प्रतिदिन जले हुए स्थान पर घी मलना और उसके ऊपर एक पत्ता रखकर पट्टियों से उसे पुनः पूर्ववत् कस कर बाँध देना । घाव शीघ्र भर जाये, इसके लिये नानासाहेब चाँदोरकर ने पट्टी छोड़ने तथा डाँ. परमानन्द से जाँच व चिकित्सा कराने का बाबा से बारंबार अनुरोध किया । यहाँ तक कि डाँ. परमानन्द ने भी अनेक बार प्रर्थना की, परन्तु बाबा ने यह कहते हुए टाल दिया कि केवल अल्लाह ही मेरा डाँक्टर है । उन्होंने हाथ की परीक्षा करवाना अस्वीकार कर दिया ।

Mr. Nanasaheb Chandorkar solicited Baba many a time to unfasten the Pattis and get the wound examined and dressed and treated by Dr. Parmanand, with the object that it may be speedily healed. Dr. Parmanand himself made similar requests, but Baba postponed saying that Allah was His Doctor; and did not allow His arm to be examined. Dr. Paramanand’s medicines were not exposed to their air of Shirdi, as they remained intact, but he had the good fortune of getting a darshana of Baba.

दिए गये प्रमाणों को आप साईं सत्चरित्र से मिलान कर सकते है,  इसके लिए आप शिर्डी की प्रमाणित साईट से इसका मिलान कर सकते है जिसका लिंक नीचे दिया है, मिलान करके आप स्वयं सोचे की क्या ऐसे व्यक्ति को पूजन सही है,

http://www.shrisaibabasansthan.org/shri%20saisatcharitra/Hindi%20SaiSatcharit%20PDF/hindi.html

इस्लाम का भविष्य क्या होगा ?

the future of islam

इस्लाम का भविष्य क्या होगा ?

लेखक – सत्यवादी 

मुसलमान अक्सर अपनी बढ़ती जनसंख्या की डींगें मारते रहते है .और घमंड से कहते हैं कि आज तो हमारे 53 देश हैं .आगे चलकर इनकी संख्या और बढ़ेगी .इस्लाम दुनिया भर में फ़ैल जायेगा .विश्व ने जितने भी धर्म स्थापक हुए हैं ,सभी ने अपने मत के बढ़ने की कामना की है .लेकिन मुहम्मद एकमात्र व्यक्ति था जिसने इस्लाम के विभाजन ,तुकडे हो जाने और सिमट जाने की पहिले से ही भविष्यवाणी कर दी थी .यह बात सभी प्रमाणिक हदीसों में मौजूद है .

यदि कोई इन हदीसों को झूठ कहता है ,तो उसे मुहम्मद को झूठ साबित करना पड़ेगा .क्योंकि यह इस्लाम के भविष्य के बारे में है .सभी जानते हैं कि किसी आदर्श ,या नैतिकता के आधार पर नहीं बल्कि तलवार के जोर पर और आतंक से फैला है .इस्लाम कि बुनियाद खून से भरी है .और कमजोर है .मुहम्मद यह जानता था .कुरान में साफ लिखा है –

1-इस्लाम की बुनियाद कमजोर है
कुछ ऐसे मुसलमान हैं ,जिन्होंने मस्जिदें इस लिए बनायीं है ,कि लोगों को नुकसान पहुंचाएं ,और मस्जिदों को कुफ्र करने वालों के लिए घात लगाने और छुपाने का स्थान बनाएं .यह ऐसे लोग हैं ,जिन्होंने अपनी ईमारत (इस्लाम )की बुनियाद किसी खाई के खोखले कगार पर बनायीं है ,जो जल्द ही गिरने के करीब है .फिर जल्द ही यह लोग जहन्नम की आग में गिर जायेंगे “सूरा -अत तौबा 9 :108 और 109

2 –इस्लाम से पहिले विश्व में शांति थी .यद्यपि इस्लाम से पूर्व भी अरब आपस में मारकाट किया करते थे ,लेकिन जब वह मुसलमान बन गए तो और भी हिंसक और उग्र बन गए .जैसे जैसे उनकी संख्या बढ़ती गयी उनका आपसी मनमुटाव और विवाद भी बढ़ाते गए .वे सिर्फ जिहाद में मिलने वाले माल के लिए एकजुट हो जाते थे .फिर किसी न किसी बात पर फिर लड़ने लगते थे ,शिया सुनी विवाद इसका प्रमाण है .
इसके बारे में मुहमद के दामाद हजरत अली ने अपने एक पत्र में मुआविया को जो लिखा है उसका अरबी के साथ हिंदी और अंगरेजी अनुवाद दिया जा रहा है –

3 –हजरत अली का मुआविया को पत्र
हजरत अली का यह पत्र संख्या 64 है उनकी किताब” नहजुल बलाग “में मौजूद है .
http://www.imamalinet.net/EN/nahj/nahj.htm

यह बात बिलकुल सत्य है कि,इस्लाम से पहिले हम सब एक थे .और अरब में सबके साथ मिल कर शांति से रह रहे थे .तुमने (मुआविया )महसूस किया होगा कि ,जैसे ही इस्लाम का उदय हुआ ,लोगों में फूट और मनमुटाव बढ़ाते गए .इसका कारण यह है ,कि एक तरफ हम लोगों को शांति का सन्देश देते रहे ,और दूसरी तरफ तुम मुनाफिक(Hypocryt )ही बने रहे ,और इस्लाम के नाम पर पाखंड और मनमर्जी चलाते रहे.तुमने अपने पत्र में मुझे तल्हा और जुबैर की हत्या का आरोपी कहा है .मुझे उस पर कोई सफ़ाई देने की जरुरत नहीं है .लेकिन तुमने आयशा के साथ मिलकर मुझे मदीना से कूफा और बसरा जाने पर विवश कर दिया ,तुमने जो भी आरोप लगाये हैं ,निराधार है ,और मैं किसी से भी माफ़ी नहीं मांगूंगा “
मुआविया के पत्र का हजरत अली का मुआविया को जवाब -नहजुल बलाग -पत्र संख्या 64

ومن كتاب له عليه السلام
كتبه إلى معاوية، جواباً عن كتاب منه
أَمَّا بَعْدُ، فَإِنَّا كُنَّا نَحْنُ وَأَنْتُمْ عَلَى مَا ذَكَرْتَ مِنَ الاَُْلْفَةِ وَالْجَمَاعَةِ، فَفَرَّقَ بيْنَنَا وَبَيْنَكُمْ أَمْسِ أَنَّا آمَنَّا وَكَفَرْتُمْ، وَالْيَوْمَ أَنَّا اسْتَقَمْنَا وَفُتِنْتُمْ، وَمَا أَسْلَمَ مُسْلِمُكُمْ إِلاَّ كَرْهاً وَبَعْدَ أَنْ كَانَ أَنْفُ الاِِْسْلاَمِكُلُّهُ لِرَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وآله حرباً
وَذَكَرْتَ أَنِّي قَتَلْتُ طَلْحَةَ وَالزُّبَيْرَ، وَشَرَّدْتُ بِعَائِشَةَ وَنَزَلْتُ بَيْنَ الْمِصْرَيْنِ وَذلِكَ أَمْرٌ غِبْتَ عَنْهُ، فَلاَ عَلَيْكَ، وَلاَ الْعُذْرُ فِيهِ إِلَيْكَ
[ A reply to Mu’awiya’s letter. ]
It is correct as you say that in pre-Islamic days we were united and at peace with each other. But have you realized that dissensions and disunity between us started with the dawn of Islam. The reason was that we accepted and preached Islam and you remained heathen. The condition now is that we are faithful and staunch followers of Islam and you have revolted against it. Even your original acceptance was not sincere, it was simple hypocrisy. When you saw that all the big people of Arabia had embraced Islam and had gathered under the banner of the Holy Prophet (s) you also walked in (after the Fall of Makkah.)
In your letter you have falsely accused me of killing Talha and Zubayr, driving Ummul Mu’minin Aisha from her home at Madina and choosing Kufa and Basra as my residence. Even if all that you say against me is correct you have nothing to do with them, you are not harmed by these incidents and I have not to apologize to you for any of them.
4 –इस्लाम का विभाजन
इस्लाम के पूर्व से ही अरब के लोग दूसरों को लूटने और आपसी शत्रुता के कारण लड़ते रहते थे .लेकिन मुसलमान बन जाने पर उनको लड़ने और हत्याएं करने के लिए धार्मिक आधार मिल गया .वह अक्सर अपने विरोधियों को मुशरिक ,मुनाफिक और काफ़िर तक कहने लगे और खुद को सच्चा मुसलमान बताने लगे .और अपने हरेक कुकर्मों को कुरान की किसी भी आयत या किसी भी हदीस का हवाला देकर जायज बताने लगे .धीमे धीमे सत्ता का विवाद धार्मिक रूप धारण करता गया .मुहम्मद की मौत के बाद ही यह विवाद इतना उग्र हो गया की मुसलमानों ने ही मुहम्मद के दामाद अली ,और उनके पुत्र हसन हुसैन को परिवार सहित क़त्ल कर दिया .उसके बाद ही इस्लाम के टुकडे होना शुरू हो गए .जिसके बारे में खुद मुहम्मद ने भविष्यवाणी की थी .-
अबू हुरैरा ने कहा कि,रसूल ने कहा था कि यहूदी और ईसाई तो 72 फिरकों में बँट जायेंगे ,लेकिन मेरी उम्मत 73 फिरकों में बँट जाएगी ,और सब आपस में युद्ध करेंगे “अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4579
अबू अमीर हौजानी ने कहा कि ,रसूल ने मुआविया बिन अबू सुफ़यान के सामने कहा कि ,अहले किताब (यहूदी ,ईसाई ) के 72 फिरके हो जायेंगे ,और मेरी उम्मत के 73 फिरके हो जायेंगे ..और उन में से 72 फिरके बर्बाद हो जायेंगे और जहन्नम में चले जायेंगे .सिर्फ एक ही फिरका बाकी रहेगा ,जो जन्नत में जायेगा “अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4580 .
अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,ईमान के 72 से अधिक टुकडे हो जायेंगे ,और मुसलमानों में ऐसी फूट पड़ जाएगी कि वे एक दुसरे कीहत्याएं करेंगे .”
अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4744 .
अरफजः ने कहा कि मैं ने रसूल से सुना है ,कि इस्लाम में इतना बिगाड़ हो जायेगा कि ,मुसलमान एक दुसरे के दुश्मन बन जायेंगे ,और तलवार लेकर एक दुसरे को क़त्ल करेंगे “अबू दाऊद -जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4153 .
सईदुल खुदरी और अनस बिन मालिक ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,पाहिले तो मुसलमान इकट्ठे हो जायेंगे ,लेकिन जल्द ही उनमें फूट पड़ जाएगी .जो इतनी उग्र हो जाएगी कि वे जानवरों से बदतर बन जायेगे .फिर केवल वही कौम सुख से जिन्दा रह सकेगी जो इनको इन को ( नकली मुसलमानों )को क़त्ल कर देगी .फिर अनस ने रसूल से उस कौम की निशानी पूछी जो कामयाब होगी .तो रसुलने बताया कि,उस कौम के लोगों के सर मुंडे हुए होंगे .और वे पूरब से आयेंगे “अबू दाऊद-जिल्द 3 किताब 40 हदीस 4747 .
5 –इस्लाम के प्रमुख फिरके
आमतौर पर लोग मुसलमानों के दो ही फिरकों शिया और सुन्नी के बारे में ही सुनते रहते है ,लेकिन इनमे भी कई फिरके है .इसके आलावा कुछ ऐसे भी फिरके है ,जो इन दौनों से अलग है .इन सभी के विचारों और मान्यताओं में इतना विरोध है की यह एक दूसरे को काफ़िर तक कह देते हैं .और इनकी मस्जिदें जला देते है .और लोगों को क़त्ल कर देते है .शिया लोग तो मुहर्रम के समय सुन्नियों के खलीफाओं ,सहबियों ,और मुहम्मद की पत्नियों आयशा और हफ्शा को खुले आम गलियां देते है .इसे तबर्रा कहा जाता है .इसके बारे में अलग से बताया जायेगा .
सुन्नियों के फिरके -हनफी ,शाफई,मलिकी ,हम्बली ,सूफी ,वहाबी ,देवबंदी ,बरेलवी ,सलफी,अहले हदीस .आदि –
शियाओं के फिरके -इशना अशरी ,जाफरी ,जैदी ,इस्माइली ,बोहरा ,दाऊदी ,खोजा ,द्रुज आदि
अन्य फिरके -अहमदिया ,कादियानी ,खारजी ,कुर्द ,और बहाई अदि
इन सब में इतना अंतर है की ,यह एक दुसरे की मस्जिदों में नमाज नहीं पढ़ते .और एक दुसरे की हदीसों को मानते है .सबके नमाज पढ़ने का तरीका ,अजान ,सब अलग है .इनमे एकता असंभव है .संख्या कम होने के से यह शांत रहते हैं ,लेकिन इन्हें जब भी मौका मिलाता है यह उत्पात जरुर करते हैं .
6 –इस्लाम अपने बिल में घुस जायेगा
मुहम्मद ने खुद ही इस्लाम की तुलना एक विषैले नाग से की है .इसमे कोई दो राय नहीं है .सब जानते हैं कि यह इस्लामी जहरीला नाग कितने देशों को डस चुका है .और भारत कि तरफ भी अपना फन फैलाकर फुसकार रहा है .लेकिन हम हिन्दू इतने मुर्ख हैं कि सेकुलरिज्म ,के नामपर ,और झूठे भाईचारे के बहाने इस इस्लामी नाग को दूध पिला रहे हैं .और तुष्टिकरण की नीतियों को अपना कर आराम से सो रहे है .आज इस बात की जरुरत है की ,हम सब मिल कर मुहम्मद की इस भविष्यवाणी को सच्चा साबित करदें ,जो उसने इन हदीसों में की थीं .-
अबू हुरैरा ने कहा की ,रसूल ने कहा कि,निश्चय ही एक दिन इस्लाम सारे विश्व से निकल कर कर मदीना में में सिमट जायेगा .जैसे एक सांप घूमफिर कर वापिस अपने बिल में घुस जाता है बुखारी -जिल्द 3 किताब 30 हदीस 100 .
अब्दुल्ला बिन अम्र बिन यासर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ,जल्द ही एक ऐसा समत आयेगा कि जब लोग कुरान तो पढेंगे ,लेकिन कुरान उनके गले से आगे कंधे से निचे नहीं उतरेगी.और इस्लाम का कहीं कोई निशान नहीं दिखाई देगा “
बुखारी -जिल्द 9 किताब 84 हदीस 65
अबू हुरैरा ने कहा कि ,रसूल ने कहा है कि ,इस्लाम सिर्फ दो मस्जिदों (मक्का और मदीना )के बीच इस तरह से रेंगता रहेगा जैसे कोई सांप इधर उधर दो बिलों के बीच में रेंगता है “
सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 270 .
इब्ने उमर ने कहा कि ,रसूल ने कहा कि ऐसा निकट भविष्य में होना निश्चय है ,कि इस्लाम और ईमान दुनिया से निकलकर वापस मदीने में इस तरह से घुस जायेगा ,जैसे कोई विषैला सांप मुड़कर अपने ही बिल में घुस जाता है “
सही मुस्लिम -किताब 1 हदीस 271 और 272 .
अब हम देखते हैं कि मुसलमान इन हदीसों को झूठ कैसे साबित करते है . आज लीबिया ,यमन और दूसरे इस्लामी देशों में जो कुछ हो रहा है ,उसे देखते हुए यही प्रतीत होता है कि मुहम्मद साहिब की यह हदीसें एक दिन सच हो जायेगीं ,जिनमे इस्लाम के पतन और विखंडन की भविष्यवाणी की गयी है .!

http://www.faithfreedom.org/oped/AbulKasen50920.htm

 

ऋषि दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित विवाह विधि वैदिक, युक्तिसंगत है

swayamvar

ऋषि दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित  विवाह विधि वैदिक, युक्तिसंगत है –

सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में स्वामी जी ने कहा –

“जब तक इसी प्रकार सब ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा आर्य लोग ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़ ही के स्वयंवर विवाह करते थे तब तक इस देश की सदा उन्नति होती थी | जब से ब्रह्मचर्य से विद्या का न पढना, बाल्यावस्था में पराधीन, अर्थात माता-पिता के अधीन विवाह होने लगा; तब से क्रमश: आर्यावर्त देश की हानी होती चली आई है |इससे इस दृष्ट काम को छोड़ के सज्जन लोग पूर्वोक्त प्रकार से स्वयंवर विवाह किया करे |

“ जब स्त्री-पुरुष विवाह करना चाहे तब विद्या, विनय, शील, रूप, आयु, बल, कुल, शरीर का परिमाण आदि यथा योग्य होना चाइये | जब तक इनका मेल नहीं होता तब तक विवाह में कुछ भी सुख नहीं होता | न बाल्यावस्था में विवाह करने में सुख होता है |

“कन्या और वर का विवाह के पूर्व एकांत में मेल ने होना चाइये, क्यों की युवावस्था में स्त्री-पुरुष का एकांत वास दूषण कारक है |

“परन्तु जब कन्या व वर के विवाह का समय हो, अर्थात जब एक वर्ष व छह महीने ब्रह्मचर्य आश्रम और विद्या पूरी होने में शेष रहे तब कन्या और कुमारो का प्रतिबिम्ब, अर्थात जिसको ‘फोटोग्राफ’ कहते है अथवा प्रतिकृति उतारके कन्याओ की अध्यापिकाओ के पास कुमारो की और कुमारों के अध्यापको के पास कन्याओ की प्रतिकृति भेज देवे |

“ जिस-जिस का रूप मिल जाए, उस-उसका इतिहास अर्थात जन्म से लेके उस दिन पर्यंत जन्म-चरित्र का जो पुस्तक हो, उसको अध्यापक लोग मंगवा के देखे | जब दोनों के गुण-कर्म-स्वाभाव सदृश हों तब- जिस-जिसके साथ जिसका विवाह होना योग्य समझे उस-उस पुरुष व कन्या का प्रतिबिम्ब और इतिहास कन्या और वर के हाथ में देवे और कहे कि इसमें जो तुम्हारा अभिप्राय हो सो हम को विदित कर देना |

“ जब उन दोनों का निश्चय परस्पर विवाह करने का हो जाए तब उन दोनों का समावर्तन एक ही समय में होवे | जो वे दोनों अध्यापकों के सामने विवाह करना चाहें तो वहा, नहीं तो कन्या के माता-पिता के घर में विवाह होना योग्य है | जब वे समक्ष हों तब अध्यापकों व कन्या के माता-पिता आदि भद्र पुरषों के सामने उन दोनों की आपस में बात-चित, शास्त्रार्थ करना औरजो कुछ गुप्त व्यवहार पूछे सो भी सभा में लिखके एक दुसरे के हाथ में देकर प्रश्नोत्तर कर लेवे इत्यादि |

प्रश्न :- अब यहाँ विधर्मी शंका यह करते है “ स्वामी दयानन्दजी ने विवाह संस्कार में जो यह लिखा है कि विवाह स्वयंवर रीती से होना चाइये, कन्या और वर की इच्छा ही विवाह में प्रधान है | कन्या और वर सबके समक्ष वार्तालाप व शास्त्रार्थ करे इत्यादि |यह सब बातें वेद शास्त्र के विरुद्ध है | आर्य समाजियों का यह दावा है कि स्वामी दयानंद की शिक्षा वैदिक है, अत: वे इन सब बातों को सिद्ध करने के लिए वेद, शास्त्रों के प्रमाण देवे |

समाधान :- ऋषि दयानंद जी ने विवाह के सम्बन्ध में सत्यार्थ प्रकाश आदि ग्रंथो में लिखी है वे सब वेद, शास्त्रों और इतिहास के अनुकूल तथा युक्ति संगत है | इस बात को सिद्ध करने के लिए प्रमाण नीचे दिए जाते है |

प्रमाण संख्या १

तमस्मेरा युवतयो युवानं ……………यन्त्याप: | ऋग्वेद २/३५/४

भावार्थ : जवान स्त्रिया उत्तम ब्रह्मचर्य से युक्त होकर जवान ब्रह्मचारी पुरषों को जैसे जल वा नदी स्वयं समुद्र को प्राप्त होती है वैसे स्वयमेव प्राप्त होती है |

प्रमाण संख्या २

कियती योषा मर्यतो ……………………………….वार्येण |

भद्रा वधुभर्वति ……………………………………..जने चित || ऋग्वेद १०/२७/१२

भावार्थ : १. प्रथम, स्त्री-पुरुष का परिमाण यानी लम्बाई, चौड़ाई, बल, दृढ़ता आदि गुणों को देखना चाइये | २. स्त्री, पुरुष ऐसे हो जो एक दुसरे के गुणों को देककर परस्पर प्रीटी व अनुराग करनेवाले हो | ३. वधू कल्याण करनेवाली हो, भद्र देखनेवाली, भद्रा चरण करनेवाली, सुन्दर दृढ हो | ४. विवाह सब जनों के समक्ष होना चाइये और कन्या स्वयमेव उस जन समूह में से गुण-कर्म-स्वभाव देखकर वर को पसंद कर लेवे |

प्रमाण संख्या ३

१.      अपश्यं त्वा मनसा चेकितानम……………………..तपसो विभुतम |

इह प्रजमिह रयिं…………………………..प्रजया पुत्रकाम ||

२.      अपश्यं त्वा  मनसा दिध्यानाम ………………….ऋतव्ये नाधमानाम |

उप मामुच्चा युवति………………………………..प्रजया पुत्रकामे || ऋग्वेद १०/१८४/१-२

भावार्थ : कन्या कहती है कि हे वर ! मैंने तुमको परीक्षा पूर्वक अच्छी प्रकार देख लिया है कि तुम मुझसे विवाह के योग्य हो और मैंने यह भी जान लिया है की तुमने तपश्चर्या से विद्या, ज्ञान को प्राप्त किया है तथा रूप, लावण्य, बल, पराक्रम को बढाया है | इस संसार में प्रजा व धन की इच्छा करते हुए, हे पुत्र की कामना करने वाले ! विवाह करके मेरे साथ गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करो |

इन उपयुक्त दो मंत्रो से ये बाते स्पष्ट होती है —

१.      कन्या-वर-एक दुसरे की सबके समक्ष परीक्षा करे | जब उन दोनों को निश्चय हो कि हम दोनों के गुण-कर्म-स्वभाव परस्पर मिलते है तब वे परस्पर मिलते है तब वे परस्पर एक-दूसरे को जतलाकर वार्तालाप करके विवाह करे |

२.      विवाह से प्रथम कन्या तथा वर तपश्चर्या पूर्वक विद्याध्यन करनेवाले तथा बल, पराक्रम, रूप लावण्य को बढ़ानेवाले हो |

३.      कन्या-वर अत्यंत जवान हों | इससे बाल्यावस्था के विवाह का सर्वथा निषेध हो जाता है और उन दोनों का परस्पर ज्ञान हो किदोनों पुत्र की कामना करनेवाले और संतान-विज्ञानं के पंडित है |

प्रमाण संख्या ४

वांछ में तन्वं पादौ ……………………………..वांछ सकथ्यौ |

अक्षौ वृषन्यन्त्या केशा:…………………………..कामेन शुश्यन्तु || अथर्व वेद ६/९/१

भावार्थ : वर कहता है कि तू मेरे शरीर, पैरो, और आँखों को पसंद कर | मै तुम्हारे रूप-लावण्यादी बातों को पसंद करता हु |

इस मंत्र में यह बात स्पष्ट है कि वर-कन्या के अंग-प्रत्यंग की भी परीक्षा करनी चाइये | जब दोनों के अंग-प्रत्यंग निर्दोष हो तब उनका परस्पर विवाह होना चाइये |

इस मंत्र अनुसार कन्या-वर का एक दुसरे को परस्पर देखना, एक-दुसरे के पास एक-दुसरे का फोटो भेजना, अध्यापक व अध्यापिकाओ द्वारा परीक्षा करना आदि सब बाते आ जाती है | इन मंत्रो पर मनु का ने निम्नलिखित श्लोक में कहा है –

“जिसके सरल-सुधे अंग हो, विरुद्ध न हो, जिसका नाम सुन्दर अर्थात यशोदा, सुखदा, आदि हो, हंस और हथिनी के तुल्य जिसकी चाल हो, सुक्ष्म लोम केश और दन्त युक्त हो, सब अंग कोमल हो. ऐसी स्त्री के साथ विवाह होना चाइये | मनुस्मृति ३/१०

प्रमाण संख्या ६

एतैरेव गुनैर्युक्त: ……………………वर: |

यत्नात परीक्षित: …………………….धीमान जनप्रिय: || याज्ञवल्क स्मृति १/५५

भावार्थ : इन गुणों से युक्त, सवर्ण, वेद के जाननेवाला, बुध्दिमान, सब जनों से प्यार करनेवाला, जिसको पुरुषत्व की यत्न से परीक्षा की है वह वर विवाह के योग्य है |

कहो, विधर्मियो ! तुम जो ऋषि दयानंद की विवाह परीक्षा पर आक्षेप करते हो | उपहास करते हो, क्या कोई वर-वधु परीक्षा विधि पर आचरण करने को तयार है ? क्या कोई इस परीक्षा के अनुसार ब्रह्मचारी रहने को तयार है ? यह परीक्षा वेदों और अन्य शास्त्रों में रहते हुए ऋषि दयानंद पर शंका करते हो | इस पर इन्हें लज्जित होना चाइये |

प्रमाण संख्या ७

कुलं च शीलं च वपुर्वयश्च विद्याम…………………….च सनाथतं च |

एतान गुनान सप्त ……………………………………….शेषमचिन्तनीयम || – प० सं० आ० का० ३/२/१९

भावार्थ – कुल, शील, शरीर अवस्था. आयु, विद्या,धन, सनाथता – इन सात गुणों की परीक्षा करके फिर कन्या देवे |

इस स्मृति-वचन में विवाह के लिए जो बातें ऋषि दयानंद जी महाराज ने बतलाई है प्राय: वे सब आ गई है | यदि इन बातों को देककर विवाह किया जाये तो संसार के बहोत से दुःख स्वयमेव नष्ट हो जाये |

उपयुक्त लेख में हमने वेद-शास्त्र, स्मृति आदि प्रमाण देकर यह सिद्ध कर दिया है की ऋषि दयानंद महाराज ने विवाह सम्बन्ध में जो बातें लिखी है वे सब वैदिक, युक्तिसंगत तथा संसार के कष्ट को मिटानेवाली है |

पाठ्य ग्रन्थ :- मीरपुरी सर्वस्व – पंडित बुद्धदेव मीरपुरी 

कुरआन की शिक्षाएं

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कुरआन की शिक्षाएं

यह लेख किसी की धार्मिक भावना को आहत करने के लिए नहीं लिखा गया है केवल सत्य का प्रकाश करने के लिये लिखा गया है | मुस्लिम मित्रो का दावा है की कुरआन ने इन्सान को हर वो शिक्षा दी जो इन्सान के लिए जरुरी है | चाहे वो ज्ञान हो या विज्ञानं हर चीज की तालीम कुरआन ने दी है | इस लेख के माध्यम से हम कुरआन की शिक्षाओं प्रकाश डालेंगे |

शिक्षा :-

१.)  माता पिता की सेवा की शिक्षा

किसी  मनुष्य के जीवन में सबसे जरुरी चीज है उसकी शिक्षा जो उसे उसके माता पिता या फिर धार्मिक पुस्तकों से मिलती है | अच्छे शिक्षा ही मानव को मानव बनाते है वरना मनुष्य और जानवर में कोई ज्यादा अंतर नहीं है |

कुरान सूरह तौबा आयत २३ – ऐ ईमान वालो अपने बाप दादा को और अपने भाइयो को अपना मित्र न बनाओ अगर वे ईमान न लाये और कुफ्र को पसंद करे जो मित्र बनाएगा ऐसे वो अत्याचारी होगा |

अगली ही आयत में कुरान कहती है की कह दे अगर तुम्हे तुम्हारे बाप दादा भाई अल्लाह , अल्लाह के रसूल और उसकी राह में जिहाद से प्यारे है तो इन्तजार करो यहाँ तक की अल्लाह का हुकुम आ जाये |

यदि किसी व्यक्ति को जिहाद करते समय माता पिता या भाइयो पर रहम आ जाए और उनको वह व्यक्ति न मारे और उनको मित्र बनाने ले तो अल्लाह ने तुरंत आयत उतारी की ईमान न लाने वाले माता,पिता या भाइयो से मित्रता न रख अर्थात उन पर दया न कर और दूसरी आयत में कहा की अगर तुझे माता पिता भाई आदि अल्लाह के मार्ग में जिहाद से प्यारे है तो वो व्यक्ति अत्याचारी है और अल्लाह ऐसे नाफरमान लोगो को हिदायत नहीं देता |

जिन माता पिता ने कष्ट सह कर पाल पोश कर बड़ा किया हो उनसे केवल इस बात पर रिश्ता तोड़ लेना की वे ईमान नहीं लाते क्या यह अच्छी शिक्षा है ? यदि माँ बाप बुरा काम करने को कहते तब उनका कहा न मानना तो सही है पर केवल माता पिता भाइयो के ईमान ना लाने से उनसे रिश्ता ही खत्म कर लेना नहीं बल्कि उनको जान से मार देना कहाँ की मानवता है ?

२.) ईमानदारी की शिक्षा

मुहम्मद साहब के जीवन परिचय से स्पष्ट है की मुहम्मद साहब बिना अल्लाह की आज्ञा के कोई भी कार्य नहीं करते थे | अधिकतर आज्ञा कुरआन में ही मोजूद है | ऐसी ही एक आज्ञा है

सूरह अनफ़ाल आयत १ – प्रश्न करते है तुझ से लूटो के बारे में तो कह दे लूटे अल्लाह और रसूल के लिए है |

सूरह अनफ़ाल आयत ६९ – उस में से खाओ जो तुम्हे लूट में हलाल मिला |

जहाँ तक की लूट की बात है मुहम्मद साहब बिना अल्लाह की आज्ञा के कुछ नहीं करते थे भले ही कुरान में अल्लाह ने व्यस्तता के कारण लूट की आज्ञा न दी हो पर यह आज्ञा अल्लाह ही की थी जी की इन दो आयतों से स्पष्ट है |

यहाँ एक और जानकारी का विषय है की इन लूट में अल्लाह का बराबर का हिस्सा है क्योंकि इसी सूरह की आयत ९ के अनुसार अल्लाह ने इस लूट में मदद के लिए लगातार आने वाले एक हजार फरिश्तो की फोज भेजी थी | अर्थात अल्लाह भी कोई कार्य बिना कमिशन के नहीं करता |

पाठक गण यह भी अल्लाह की शिक्षा है लूटपाट करने की |

३)  भाईचारे की शिक्षा

जैसा की कुरआन से विदित है अल्लाह भाईचारे को बहुत पसंद करते थे | इसी भाईचारे के लिए अल्लाह ने कुरआन में जगह जगह मोमिनो अर्थात मुसलमानों को सन्देश भी दिए है | आइये उन संदेशो पर भी एक नजर डाल लेते है |

सूरह इमरान आयत २८ – मुसलमान को उचित है की वे मुसलमान को छोड़कर किसी काफिर को मित्र न बनाये और जो ऐसा करे उसका अल्लाह से कोई रिश्ता नहीं |

पाठको इस से बढ़कर भाईचारे की शिक्षा क्या हो सकती है ?

४) अहिंसा परमोधर्म की शिक्षा

कुरआन को पढने से पता चलता है की अल्लाह को अहिंसा से कितना प्रेम था | लेकिन अल्लाह ने यह अहिंसा का सन्देश केवल शांतिप्रिय कौम को ही दिया | जिसकी शांतिप्रियता से आज पूरा विश्व त्रस्त है | कुरआन की अहिंसावादी सोच के कुछ नमूने देखिये –

सूरह बकर आयत १९१ – उन्हें मार डालो जहाँ पाओ और उन्हें निकाल दो जहां से उन्होंने तुम्हे निकाला |

कुछ मुसलमान मित्र यहाँ कहेंगे की अल्लाह ने उन लोगो को मारने को कहा है जिन्होंने खुद लड़ाई की और ईमान वालो को घर से निकाला | लेकिन अगली आयत से सत्य का पता चलता है कि उन्हें मारने का उद्देश्य क्या है |

सूरह बकर आयत १९३ – तुम उन से लड़ो की कुफ्र न रहे और दीन अल्लाह का हो जाए अगर वह बाज आ जाए तो उस पर जयादती न करो |

मित्रो इस आयत से स्पष्ट है की लड़ने का उद्देश्य क्या है | लड़ने का उद्देश्य केवल दीन को फैलाना है |

ऐसी ही एक अहिंसावादी सोच को दर्शाती शिक्षा आपके समक्ष है –

कुरान सूरह तौबा आयत ५ – फिर जब प्रतिष्ठित महीने बीत जाए काफ़िरो को जहां पाओ क़त्ल करो , उन्हें पकड़ लो उन्हें घेर लो , फिर अगर वो तौबा कर ले और नमाज कायम कर ले तथा जकात अदा करे तो उनका रास्ता छोड़ दो |

इस आयत से भी स्पष्ट है क़त्ल करने का कारण क्या है | केवल मुसलमान न होना और यदि वो मुसलमान हो जाए तो उसे छोड़ दो | इन आयतों से पता चलता है की अल्लाह को अहिंसा से कितना प्रेम है |

५.) सदाचार की शिक्षा

मुहम्मद साहब के जीवन से पता चलता है की वे बहुत ही सदाचारी व्यक्तित्व वाले थे और हो भी क्यों न ? कुरआन ने जो उनको शिक्षा दी थी | मुहम्मद साहब ने जो भी सदाचार के कार्य किये उन सबकी प्रेरणा अल्लाह ने ही उन्हें दी थी | सदाचारी की प्रेरणा देती कुछ आयते निम्नलिखित है |

सुरह निसा आयत २४ – विवाहित स्त्रियाँ तुम्हारे लिए वर्जित है सिवाय लोंडियो के जो तुम्हारी है, इनके अतिरिक्त शेष स्त्रियाँ तुम्हारे लिए वैध है तुम अपने माल के द्वारा उन्हें प्राप्त करो उनसे दाम्पत्य जीवन अर्थात सम्भोग का मजा लो और बदले में उन्हें निश्चित की हुई रकम अदा कर दो |

इस आयत से कुरआन की सदाचार की शिक्षा साफ़ साफ़ झलकती है | लेकिन कुछ और भी आयते है जो सदाचार को प्रोत्साहन देती है | इसी प्रोत्साहन का नतीजा था की मुहम्मद साहब ने ९ वर्ष की अबोध बालिका और पुत्र वधु से भी सम्बन्ध बनाने में कोई हिचकिचाहट महसूस न हुई |

कुरान सूरह अजहाब आयत ३७ -फिर जब जैद ने जैनब से अपनी आवश्यकता पूरी कर ली तो हम ने उसे आप को निकाह में दे दिया ताकि मोमिनो को कोई तंगी न रहे अपने गोद लिए की बीवियों से निकाह करने में |

यदि कोई व्यक्ति किसी औरत को माँ मान ले और बाद में उसका दिल उसके ऊपर आ जाये तो अल्लाह ने इसके लिए भी एक शिक्षा दी है आयत के जरिये | देखिये

सूरह अह्जाब आयत ४- तुम्हारी उन बीवियों को जिन्हें तुम माँ कह बैठते हो नहीं बनाया तुम्हारी माँ |

सूरह अह्जाब आयत ५०- हम ने तुम्हारे लिए हलाल कर दी लूट में मिली बीवियां, तुम्हारे चाचाओ की बेटिया , तुम्हारे फुफियो की बेटियाँ, तुम्हारे मामुओ की बेटियाँ और तुम्हारे खालाओ की बेटिया |और मोमिन औरत जो अपने आप को नबी के हवाले कर दे |

पाठको के लिए ये आयते काफी होगी कुरआन की सदाचारी की शिक्षा दिखाने के लिए |

६.) एकेश्वरवाद की शिक्षा

जैसा की कुरआन के पढने से पता चलता है की अल्लाह को सबसे ज्यादा नफरत उस आदमी से है जो एक अल्लाह को नहीं मानता | वैसे अल्लाह भी अपनी जगह बिलकुल सही है उस अकेले ईश्वर की उपासना में कोई दूसरा शामिल नहीं होना चाहिए चाहे वो कोई भी हो | कुरआन ने अनेक जगह पर एकेश्वरवाद की शिक्षाए दी है | जैसे –

सूरह इमरान आयत १७४- अल्लाह व उसके रसूलो पर ईमान लाओ |

सूरह बकर आयत ३४- सजदा करो आदम को |

हमारे मुसलमान भाई नमस्ते नहीं बोलते क्योंकि उनके अनुसार नमस्ते कहने से शिर्क हो जाता है जो की एकेश्वरवाद के खिलाफ है | लेकिन शायद भूल जाते है अल्लाह के सिवा किसी दुसरे पर ईमान लाना और अल्लाह को छोड़ किसी दुसरे को सिजदा करवाना भी शिर्क ही है | सबसे बड़ी एकेश्वरवाद की शिक्षा तो कलमे में ही है की नमाज में भी मुहम्मद साहब का नाम बोलना जरुरी है जैसे ला इलल्लाह मुहम्मद रसुल्लुलाह | अब बिना कलमा बोले नमाज अर्थात उपासना नहीं होती और बिना रसूल का नाम लिया कलमा पूरा नहीं होता | यह है अल्लाह की एकेश्वरवाद की शिक्षा |

७.) रहमदिली की शिक्षा

कुरआन में शायद ३०० से ज्यादा बार अल्लाह को रहम करने वाला बताया गया है | रहम का अर्थ है दया | कुरआन ने भी कई बार इंसान को दयालु होने की शिक्षा दी है | कुछ आयते कुरआन की इस दयालुता को दर्शाती है |

कुरान सूरह हज्ज आयत २८ – और जानवरों को कुर्बान करते समय अल्लाह का नाम ले |

कुरान सूरह हज्ज आयत ३६ – कुर्बानी के ऊंट हमने तुम्हारे लिए मुकर्रर किये और जब कुर्बान हो जाए तो खुद भी खाओ और खिलाओ |

कुरआन किस रहमदिली की शिक्षा देता है वो इन आयतों में स्पष्ट है |

८.) पत्नी के प्रति व्यवहार की शिक्षा

मुस्लिम मित्रो का मानना है की अल्लाह ने मुहम्मद साहब की शादी ज्यादा उम्र और कम उम्र की ओरतो से इसलिए कराई थी ताकि दुनियो वालो को एक मिशाल पेश की जा सके कि जब ज्यादा उम्र की पत्नी हो या कम उम्र की पत्नी हो तो कैसे से प्रेम से रहा जाए | मुहम्मद साहब ने स्वंय न्यूनतम नौ शादियाँ की और दुसरे ईमान वालो को एक से अधिक शादी करने की आज्ञा भी कठोर शर्तो पर दी क्योंकि मुहम्मद साहब को लगता था की एक से अधिक शादी करके वे अपनी पत्नियों को प्रेम नहीं दे पायेंगे | परन्तु जब स्वंय मुहम्मद साहब ने ऐसा नहीं किया तो कुरआन ने उन्हें इस प्रेम और समानता के व्यवहार से बी छुट दे दी |

कुरआन सूरह अजहाब आयत ५१ – आप ( स ) जिसको चाहे दूर रक्खे और जिसको चाहे पास रक्खे और जिसको आपने दूर कर दिया उसे फिर पास रक्खे तो कोई तंगी नहीं |

इस आयत का आशय स्पष्ट है नबी जो चाहे वो पत्नी के साथ करे जब जी चाहे उसे पास रख लो और जब दिल न करे उसे दूर कर दो | यह है कुरआन की पति को पत्नी के प्रति व्यवहार की शिक्षा |

सूरह बकर आयत २२३ – तुम्हारी बीवियां तुम्हारी खेती है जैसे चाहो वैसे अपने खेत में जाओ |

वाकई कुरआन पत्नी के प्रति प्रेम की शिक्षा देती है | ये सब कुरआन की मुलभुत शिक्षाये है जिनका मुस्लिम मित्र दिलो जान से अनुसरण करते है |