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सृष्टि की उत्पत्ति किससे, कब व क्यों? -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

हम जिस संसार में रहते हैं वह हमें बना बनाया मिला है। हमारे जन्म से पूर्व इस संसार में हमारे माता-पिता व पूर्वज रहते आयें हैं। न तो हमें हमारे माता-पिता से और न हमें अपने अध्यापकों व विद्यालीय पुस्तकों में इस बात का सत्य ज्ञान प्राप्त हुआ कि यह संसार कब, किसने व क्यों बनाया है। क्या यह प्रश्न महत्वहीन है, या फिर इसका ज्ञान संसार में किसी को है ही नहीं? हमें दूसरा प्रश्न ही कुछ सीमा तक उचित प्रतीत होता है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे वैज्ञानिकों, विद्वानों वा अध्यापकों आदि के पास होते तो वह निश्चय ही इसका प्रचार करते। अध्ययन करने पर इसका मुख्य कारण ज्ञात होता है कि विगत 5 हजार वर्षों में हमारे देश के लोगों ने वेद और वैदिक साहित्य का सत्य वेदार्थ प़द्धति से अध्ययन करना छोड़ दिया जिस कारण मनुष्य न केवल इन प्रश्नों के उत्तर से ही वंचित व अनभिज्ञ हो गया अपितु ईश्वर व जीवात्मा आदि के सच्चे ज्ञान से भी दूर होकर अज्ञान, अन्धविश्वासों और कुरीतियों से ग्रसित हो गया। यही स्थिति महर्षि दयानन्द के 12 फरवरी, 1825 को गुजरात के टंकारा नामक स्थान पर जन्म के समय भी थी परन्तु उनमें इन प्रश्नों को जानने की जिज्ञासा थी और इसके लिए अपना जीवन लगाने का जज्बा भी उनमें था। उन्होंने घर के सभी सुखों का त्याग कर इस संसार के सत्य रहस्यों को जानने का निश्चय किया और विद्वानों की संगति व सेवा में जाकर जिससे जितना व जो भी ज्ञान प्राप्त हो सकता था, उसे प्राप्त किया। स्वामी दयानन्द ने किसी एक ही व्यक्ति को अपना गुरू बनाकर सन्तोष नहीं किया अपितु देश में सर्वत्र घूम कर जिससे जहां जो भी ज्ञान मिला उसे अपनी बुद्धि व स्मृति में स्थान दिया जिसका परिणाम हुआ कि अनेक विद्वानों के सम्पर्क में आकर वह शून्य से आरम्भ होकर अनन्त ज्ञान वेद व ईश्वर तक पहुंचे और सभी जिज्ञासाओं, प्रश्नों, शंकाओं व भ्रान्तियों के उत्तर प्राप्त किये और उससे सारे संसार को भी आलोकित व लाभान्वित किया। मथुरा के गुरू प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द का तीन वर्ष शिष्यत्व प्राप्त कर उनसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर वह सन्तुष्ट हुए थे।

 

सृष्टि की रचना व उत्पत्ति के प्रसंग में यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि संसार में कोई भी रचना व उत्पत्ति बिना कर्त्ता के नहीं होती। इसके साथ यह भी महत्वपर्ण तथ्य है कि कर्ता को अपने कार्य का पूर्ण ज्ञान होने के साथ उसको सम्पादित करने के लिए पर्याप्त शक्ति वा बल भी होना चाहिये। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह सृष्टि एक कर्ता जो ज्ञान व बल से युक्त है, उसी से बनी है। वह स्रष्टा कौन है? संसार में ऐसी कोई सत्ता दृष्टिगोचर नहीं होती जिसे इस सृष्टि की रचना का अधिष्ठाता, रचयिता व उत्पत्तिकर्ता कहा व माना जा सके। अतः यह सुनिश्चित होता है कि वह सत्ता है तो अवश्य परन्तु वह अदृश्य सत्ता है। क्या संसार में कोई अदृश्य सत्ता ऐसी हो सकती है जिससे यह सृष्टि बनी है? इस पर विचार करने पर हमारा ध्यान स्वयं अपनी आत्मा की ओर जाता है। हम एक ज्ञानवान चेतन तत्व वा पदार्थ है जो शक्ति वा बल से युक्त हैं। हमने स्वयं को आज तक नहीं देखा। हम जो, इस शरीर में रहते हैं व इस शरीर के द्वारा अनेक कार्यों को सम्पादित करते हैं, वह आकार, रंग व रूप में कैसा है? हम अपने को ही क्यों ले, हम अन्य असंख्य प्राणियों को भी देखते है परन्तु उनके शरीर से ही अनुमान करते हैं कि इनके शरीरों में एक जीवात्मा है जिसके कारण इनका शरीर कार्य कर रहा है। इस जीवात्मा के माता के गर्भ में शरीर से संयुक्त होने और संसार में आने पर जन्म होता है और जिस चेतन जीवात्मा के निकल जाने पर ही यह शरीर मृतक का शव कहलाता है। हम यह भी जानते हैं कि सभी प्राणियों के शरीरों में रहने वाला जीवात्मा आकार में अत्यन्त अल्प परिणाम वाला है। अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण इसका अस्तित्व होकर भी यह दिखाई नहीं देता है। अतः संसार में हमारी इस आत्मा की ही भांति जीवात्मा से सर्वथा भिन्न एक अन्य शक्ति, निराकार स्वरूप और सर्वव्यापक, चेतन पदार्थ, आनन्द व सुखों से युक्त, ज्ञान-बल-शक्ति की पराकाष्ठा से परिपूर्ण, सूक्ष्म जड़ प्रकृति की नियंत्रक सत्ता ईश्वर वा परमात्मा हो सकती है। ऐसी ईश्वर नामी सत्ता से ही सूर्य, चन्द्र, ग्रह-उपग्रह, नक्षत्र, असंख्य सौर मण्डलों से युक्त यह संसार, सृष्टि, ब्रह्माण्ड व जगत अस्तित्व में आ सकता है, इसमें सन्देह का कोई कारण नहीं। यही एक मात्र विकल्प हमारे सामने हैं। अन्य कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं। अब इस अनुमान का प्रमाण प्राप्त करना है जोकि वेद व वैदिक साहित्य के गहन व गम्भीर अध्ययन तथा ईश्वरोपासना, विचार, चिन्तन, मनन, ध्यान व समाधि के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

 

अब हमें यह भी विचार करना है कि वस्तुतः वेद और वैदिक साहित्य है क्या? इसको जानने के लिए हमें इस सृष्टि के आरम्भ में जाना होगा। जब सुदूर अतीत में यह सृष्टि उत्पन्न हुई तो अन्य प्राणियों को उत्पन्न करने के बाद मनुष्यों को भी उत्पन्न किया गया होगा। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों की उत्पत्ति माता-पिता से न होकर अमैथुनी विधि से परमात्मा व सृष्टिकर्ता करता है। इसका भी अन्य कोई विकल्प नहीं है, अतः ईश्वर द्वारा अमैथुनी सृष्टि को ही मानना हमारे लिए अनिवार्य व अपरिहार्य है। सृष्टि, सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि तथा पृथिवी पर अग्नि, वायु, जल व प्राणी जगत सहित मनुष्य भी उत्पन्न हो जाने पर मनुष्यों को ज्ञान की आवश्यकता होती है जिससे वह अपने दैनन्दिन कार्यों का सुगमतापूर्वक निर्वाह कर सके। यह ज्ञान भी उसे यदि मिल सकता है वा मिला है तो वह सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर से ही मिला है। इसके अनेक प्रमाण हमारे पास हैं। पहला प्रमाण तो परम्परा का है। भारत में विपुल वैदिक साहित्य है जिसमें सर्वत्र वेदों को ईश्वरीय ज्ञान अर्थात् ईश्वर से प्रदत्त ज्ञान बताया गया है। वेद संसार में सबसे प्राचीनतम होने के कारण भी ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध होता है। मनुष्य अपने सारे जीवन में ज्ञान की उत्पत्ति नहीं करता, वह तो ज्ञान की खोज करता है जो इस सृष्टि में पहले से ही सर्वत्र विद्यमान है। यह ज्ञान ईश्वर का स्वाभाविक गुण है और उसमें सदा सर्वदा व सनातन काल से है और शाश्वत व नित्य भी है। ईश्वर ने अध्ययन, ध्यान व चिन्तन आदि से ज्ञान को उत्पन्न नहीं किया अपितु यह उसमें स्वतः अनादि काल से चला आ रहा है। परिमाण की दृष्टि से पूर्ण होने के कारण इसमें न्यूनाधिक नहीं होता और यह अनादि काल से ही एकरस व एक समान बना हुआ है और आगे भी इसी प्रकार का बना रहेगा। वेदों का अध्ययन कर भी वेद ईश्वरीय ज्ञान सिद्ध होते हैं क्योंकि वेदों में ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति व संसार विषयक पूर्ण मौलिक ज्ञान बीज रूप में विद्यमान है जिसका समर्थन ज्ञान व विज्ञान से भी होता है। वेदों का ज्ञान पूर्णरूपेण सृष्टि-क्रम के अनुकूल होने से विज्ञान का पोषक है। वेदों की सभी मान्यतायें ज्ञान, बुद्धि, तर्क, ऊहा व वाद-विवाद कर सत्य सिद्ध होती हैं। सृष्टि के आदि से महर्षि दयानन्द पर्यन्त कोटिशः सभी ऋषियों ने वेदों का अध्ययन कर यही निष्कर्ष निकाला है। अतः वेद ज्ञान ईश्वर प्रदत्त आदि ज्ञान सिद्ध होता है जो सभी सत्य विद्याओं सहित सभी प्रकार के आधुनिक ज्ञान व विज्ञान का भी एकमात्र व प्रमुख आधार है। यदि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से  मनुष्यों को ज्ञान न मिलता तो यह संसार आगे चल ही नहीं सकता था। वही वैदिक ज्ञान काल के प्रवाह व भौगोलिक कारणों से आज अनेक भाषाओं में न्यूनताओं को समेटे हुए हमें सर्वत्र प्राप्त होता है। सृष्टि के आरम्भ में वेदों की उत्पत्ति व ऋषियों को उसकी प्राप्ति के पश्चात समय-समय पर ऋषियों ने लोगों के हितार्थ विपुल वैदिक साहित्य की रचना की। संक्षेप में कहें तो वैदिक आर्ष व्याकरण, निरुक्त, वैदिक ज्योतिषीय ज्ञान, कल्प ग्रन्थ, 6 दर्शन, उपनिषद, प्रक्षेपों से रहित शुद्ध मनुस्मृति और वेदों की शाखायें हमारे ऋषियों ने अल्पबुद्धि वाले हम मनुष्यों के लिए बना दी जिससे मनुष्य जाति का उपकार व हित हो सके।

 

यह सिद्ध हो गया है कि सृष्टि उत्पत्ति विषयक सभी प्रश्नों का सत्य उत्तर हमें वेद और वैदिक साहित्य से ही प्राप्त होगा। सृष्टि की उत्पत्ति किससे हुई प्रश्न का उत्तर है कि यह सृष्टि ईश्वर कि जिसके ब्रह्म, परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षण युक्त है, उसी से ही यह सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। सृष्टि कब उत्पन्न हुई, का उत्तर है कि एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ पन्द्रह वर्ष पूर्व। यह काल गणना भी वैदिक परम्परा ज्योतिष आदि शास्त्रों के आधार पर है। सृष्टि की रचना क्यों हुई का उत्तर है कि जीवात्माओं को उनके जन्म जन्मान्तरों के कर्मों के सुख दुःख रूपी फलों वा भोगों को प्रदान करने के लिए परम दयालु परमेश्वर ने की। सृष्टि रचना संचालन का कारण जीवों के कर्म उनके सुखदुःख रूपी फल प्रदान करना ही है। जीवात्मा को उसके लक्षणों से जाना जाता है। उसके शास्त्रीय लक्षण हैं, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, ज्ञान, कर्म, अल्पज्ञता नित्यता आदि।

 

हमने अपने विगत 45 वर्षों में जो अध्ययन किया है उसके अनुसार हमें यह ज्ञान पूर्णतयः सत्य, बुद्धि संगत व विज्ञान की आवश्यकताओं के अनुरुप लगता है। हमारे वैज्ञानिक अनेक कारणों से ईश्वर व धर्म को नहीं मानते। आने वाले समय में उन्हें इस ओर कदम बढ़ाने ही होंगे अन्यथा उनकी सत्य की खोज अधूरी रहेगी। इन्हीं शब्दों के हम लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

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‘सब सत्य विद्याओं एवं उससे उत्पन्न किए व हुए संसार व पदार्थों का मूल कारण ईश्वर’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

हम कोई भी काम करते हैं तो उसमें विद्या अथवा ज्ञान का प्रयोग करना अनिवार्य होता है। अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान के अभाव व कमी के कारण किसी सरल कार्य को भी भली प्रकार से नहीं कर सकता। जब हम अपने शरीर का ध्यान व अवलोकन करते हैं तो हमें इसके आंख, नाक, कान, श्रोत्र, बुद्धि, मन व मस्तिष्क आदि सभी अवयव किसी महत् विद्या के भण्डार व सर्वशक्तिमान सत्ता रूपी कर्ता का ही कार्य अनुभव होतें हैं। बिना विद्या के कोई भी कर्ता कुछ कार्य नहीं कर सकता और बिना कर्ता के भी कोई कार्य नहीं होता। इससे यह सिद्ध है कि हमारे शरीर व इस सृष्टि के सभी पदार्थों का कर्ता व रचयिता एक निराकार, सर्वविद्या व ज्ञान से पूर्ण सूक्ष्मातिसूक्ष्म अदृश्य सत्ता व उसका अस्तित्व है। उस सत्ता के आंखों से न दिखने के अनेक कारण हो सकते हैं जिनमें से एक कारण उसका अति सूक्ष्म होना भी व ही है। यह सारा ब्रह्माण्ड उस ईश्वर की रचना है और इस रचना से ही इसके कर्त्ता ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। संसार में आज तक ऐसी रचना देखने को नहीं मिली जो स्वमेव, बिना किसी बुद्धिमान-ज्ञानी-चेतनसत्ता के उत्पन्न हुई हो और जो मनुष्यों व प्राणियों के उपयोगी वा बहुपयागी हो जैसी कि हमारी यह सृष्टि व इसके पदार्थ सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, अग्नि, जल, वायु, हमारे व अन्य प्राणियों के शरीर, वनस्पति जगत आदि हैं।

इससे यह निर्विवाद रुप से सिद्ध होता है कि यह संसार एक निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, अनादि, नित्य, अमर सत्ता की रचना है। रचना को देखकर इसमें प्रयुक्त ज्ञान से ईश्वर का सर्वज्ञ अर्थात् सर्वज्ञान व विद्याओं का भण्डार होना भी सिद्ध होता है। इस निष्कर्ष पर पहुंच कर हमें सभी विद्याओं की प्राप्ति के लिए ईश्वर की शरण में ही जाना आवश्यक हो जाता है। ईश्वर की शरण में कैसे जा सकते हैं? इसका उपाय सद्ग्रन्थों का अध्ययन वा स्वाध्याय, ज्ञानीनिर्लोभीनिरभिमानीअनुभवी गुरूओं का शिष्यत्व सहित बुद्धि को शुद्ध, पवित्र सात्विक बनाकर उससे ईश्वर के स्वरुप का चिन्तन मनन करना है। किसी विषय का गहन चिन्तन व मनन करना ही ध्यान कहलाता है। जब एक ही विषय यथा ईश्वर के स्वरुप का नियमित रूप से निश्चित समय पर लम्बी अवधि तक मनुष्य चिन्तन व मनन करते हैं तो वह ध्यान की अवस्था ही कालान्तर में समाधि का रूप ले लेती है। इस अवस्था में एक समय वा दिवस ऐसा आता है कि जब ध्याता को ध्येय ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है। यह साक्षात्कार मनुष्य वा योगी में यह योग्यता उत्पन्न करता है कि जिससे वह जब जिस विषय का अध्ययन व चिन्तन करता है, कुछ ही समय में उसका उसको साक्षात ज्ञान हो जाता है। यह सफलता ईश्वर द्वारा प्रदान की जाती है। इसी लिए हमारे देश में जितने भी ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न ऋषि व मुनि हुए हैं, वह सभी योगी ही हुआ करते थे। यदि हम आजकल के वैज्ञानिकों व उच्च श्रेणी के ज्ञानियों की स्थिति पर विचार करें तो हमें ज्ञात होता है कि यह सभी भी विचारक, चिन्तक, इष्ट वा अभीष्ट विषय का निरन्तर ध्यान करने वाले व समाधि की स्थिति व उससे कुछ पूर्व की स्थिति तक पहुंचे हुए व्यक्ति ही प्रायः होते हैं। अतः ज्ञान की प्राप्ति विचार, चिन्तन व ध्यान से ही होती है। यह भी स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया को अपनाकर बुद्धि में प्राप्त ज्ञान ईश्वर से ही प्रेरित वा प्राप्त होता है। हम यह भी अनुभव करते हैं कि हमारे आज के वैज्ञानिक व इंजीनियर बन्धुओं को जो उच्च ज्ञान विज्ञान की उपलब्धि हुई है वह, कोई माने या न माने, ध्यान व किंचित समाधि की अवस्था आने पर ईश्वर के द्वारा ही सुलभ हुई है।

 

संसार को समझने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है और ज्ञान के रूप में सृष्टि के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेद हमें उपलब्ध है। प्रमाण, परम्परा, तर्क व विवेचन से यह सिद्ध होता है कि चारों वेदों का ज्ञान सृष्टि की आदि में चार ऋषियों को ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान है। इस बारे में गहन स्वाध्याय व अध्ययन न करने वालों को अनेक प्रकार की भ्रान्तियां हैं जिसका कारण उनका इस विषय का अध्ययन न करना ही मुख्य है।  यदि वह इसका अध्ययन करें तो उनकी सभी शंकाओं व भ्रान्तियों का निवारण हो सकता है जिस प्रकार से सृष्टि के आदि काल से महाभारत काल पर्यन्त ऋषियों सहित महर्षि दयानन्द सरस्वती और पं. गुरुदत्त विद्यार्थी जी आदि का हुआ था। महर्षि दयानन्द जी और उनके अनुवर्ती आर्य विद्वानों का वेदभाष्य इस बात का प्रमाण है कि वेद परा और अपरा विद्या का आदि स्रोत व भण्डार होने के साथ पूर्णतया सत्य ज्ञान है। महर्षि दयानन्द की यह घोषणा भी हमें ध्यान में रखनी चाहिये कि ‘‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इस लिए वेदों का सभी आर्यों वा मनुष्यों को पढ़ना व पढ़ाना परम धर्म है। इससे यह सिद्ध हो रहा है कि मनुष्य धर्म वेदों अर्थात् सत्य ज्ञान का अध्ययन आचरण करना ही है। हमारे वैज्ञानिकों ने बहुत सी अपरा विद्याओं को खोज कर अपूर्व कार्य किया है। वह विश्व मानव समुदाय की ओर से अभिनन्दन के पात्र हैं। परन्तु यह भी सत्य है कि हमारे वैज्ञानिक बन्धु परा विद्या वा ईश्वर-जीवात्मा के सत्य ज्ञान से बहुत दूर हैं। इसकी पूर्ति वैज्ञानिक विधि से रिसर्च व अनुसंधान से नहीं होगी। इसका उपाय तो वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन, योगाभ्यास, ध्यान व समाधि को सिद्ध कर ही प्राप्त होगा। जिस दिन हमारे वैज्ञानिक विज्ञान के शोध व उपयोग के साथ वेद व वैदिक साहित्य के अध्ययन सहित योगाभ्यास में अग्रसर होंगे, तभी उनका अपना जीवन भी पूर्णता को प्राप्त होगा और इससे मानवता का भी अपूर्व हित व कल्याण होगा। हमें लगता है कि महर्षि दयानन्द सहित सभी प्राचीन ऋषियों में ईश्वर विषयक ज्ञान व आधुनिक वा भौतिक विज्ञान दोनों का ही समन्वय था जिससे संसार में सुख अधिक और दुःख कम थे और आज की परिस्थितियों में स्थिति सर्वथा विपरीत है। अध्यात्मिक ज्ञान से ही मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियों बुरे आचरण पर नियन्त्रण किया जा सकता है।

 

इस लेख में हमने यह समझने का प्रयास किया है कि संसार की विद्याओं व ज्ञान की उत्पत्ति का आदि स्रोत ईश्वर है और उसी से सभी विद्यायें इस सृष्टि की रचना, इसके पालन व वेदों के माध्यम से प्रकट हुई है। हमें चिन्तन, मनन व ध्यान आदि की क्रियाओं से उसे और अधिक उन्नत करना होता है। यदि ईश्वर यह संसार न बनाता और वेदों का ज्ञान न देता तो हम और हमारे विचारकों, चिन्तकों व वैज्ञानिकों को करने के लिए कुछ न होता। अतः सबको कल्पित ईश्वर नहीं अपितु सच्चे ईश्वर की शरण में जाना आवश्यक है जिससे जीवन के उद्देश्य वा लक्ष्य धर्म-अर्थ-काम व मोक्ष की प्राप्ति हो सके। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं।

 

मनमोहन कुमार आर्य

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महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की कुछ प्रमुख मान्यतायें’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

 

वेदों पर आधारित महर्षि दयानन्द जी की कुछ प्रमुख मान्यताओं को पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं:

ईश्वर विषयक

ईश्वर कि जिसके ब्रह्म, परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षण युक्त है, उसी को परमेश्वर मानता हूं।

वेद विषयक

विद्या धर्मयुक्त ईश्वरप्रणीत संहिता मन्त्रभाग को निर्भ्रांत स्वतः प्रमाण मानता हूं। वे स्वयं प्रमाणरूप हैं कि जिनका प्रमाण होने में किसी अन्य ग्रन्थ की अपेक्षा नहीं। जैसे सूर्य वा प्रदीप अपने स्वरूप के स्वतः प्रकाशक और पृथिव्यादि के भी प्रकाशक होते हैं, वैसे चारों वेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद हैं, और चारों वेदों के ब्राह्मण, 6 अंग, 6 उपांग, 4 उपवेद और 1127 वेदों की शाखा जो कि वेदों के व्याख्यानरूप ब्रह्मा आदि महर्षियों के बनाये ग्रन्थ हैं, उन को परतः प्रमाण अर्थात् वेदों के अनुकूल होने से प्रमाण और जो इन में वेदविरुद्ध वचन है, उनका अप्रमाण मानता हूं।

धर्म अधर्म

जो पक्षपात रहित, न्यायाचरण, सत्यभाषणादियुक्त ईश्वराज्ञा वेदों से अविरुद्ध है, उसको धर्म और जो पक्षपातसहित अन्यायाचरण, मिथ्याभाषणादि ईश्वराज्ञाभंग वेदविरुद्ध है, उसको अधर्म मानता हूं।

जीव, जीवात्मा अर्थात् मनुष्य का आत्मा

जो इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और ज्ञानादि गुणयुक्त, अल्पज्ञ, नित्य है, उसी को जीव मानता हूं।

देव

विद्वानों को देव और अविद्वानों को असुर, पापियों को राक्षस, अनाचारियों को पिशाच मानता हूं।

देवपूजा

उन्हीं विद्वानों, माता, पिता, आचार्य, अतिथि, न्यायकारी राजा और धर्मात्मा जन, पतिव्रता स्त्री और स्त्रीव्रत पति का सत्कार करना देवपूजा कहाती है। इस से विपरीत अदेवपूजा होती है। इन मूर्तियों को पूज्य और इतर पाषाणादि जड़़ मूर्तियों को सर्वथा अपूज्य समझता हूं।

यज्ञ

उसको कहते हैं कि जिस में विद्वानों का सत्कार, यथायोग्य शिल्प अर्थात् रसायन जो कि पदार्थ विद्या उससे उपयोग और विद्यादि शुभगुणों का दान, अग्निहोत्रादि जिन से वायु, वृष्टि, जल, ओषधी की पवित्रता करके सब जीवों को सुख पहुंचाना है, उसको उत्तम समझता हूं।

आर्य और दस्यु

आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं। मैं भी वैसे ही मानता हूं।

स्तुति

गुणकीर्तन श्रवण और ज्ञान होना, इस का फल प्रीति आदि होते हैं।

प्रार्थना

अपने सामथ्र्य के उपरान्त ईश्वर के सम्बन्ध से जो विज्ञान आदि प्राप्त होते हैं, उनके लिये ईश्वर से याचना करना और इसका फल निरभिमान आदि होता है।

 

उपासना

 

जैसे ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, वैसे अपने करना, ईश्वर को सर्वव्यापक, अपने को व्याप्य जान के ईश्वर के समीप हम और हमारे समीप ईश्वर है, योगाभ्यास से ऐसा निश्चय व साक्षात् करना उपासना कहाती है, इस का फल ज्ञान की उन्नति आदि है।

 

सगुणनिर्गुणस्तुतिप्रार्थनोपासना

 

जो-जो गुण परमेश्वर में हैं उन से युक्त और जो-जो गुण नहीं हैं, उन से पृथक मानकर प्रशंसा करना सगुण-निर्गुण स्तुति, शुभ गुणों के ग्रहण की ईश्वर से इच्छा और दोष छुड़ाने के लिये परमात्मा का सहाय चाहना सगुण-निर्गुण प्रार्थना और सब गुणों से सहित सब दोषों से रहित परमेश्वर को मान कर अपने आत्मा को उसके और उसकी आज्ञा के अर्पण कर देना सगुणनिर्गुणोपासना कहाती है।

 

हम आशा करते हैं कि पाठक उपर्युक्त वैदिक सत्य सिद्वान्तों को अपने ज्ञान व आचरण हेतु उपयोगी पायेंगे।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः 09412985121

 

‘गोवर्धन पूजा गो के उपकारों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पर्व है’ -मनमोहन कुमार आर्य,

ओ३म्

आज गोवर्धन का पर्व है। गोवर्धन का अर्थ है कि गायों की रक्षा व उनकी संवृद्धि करें। गाय की संवृद्धि गोरक्षा और गोसंवर्धन के अनेक कार्यों को करके ही हो सकती है। गोरक्षा की प्रथम आवश्यकता है कि गो के  प्रति कोई किसी प्रकार का अपराध व उसका असम्मान न करे। यदि अज्ञानतावश करता हो तो उसे गाय के महत्व को समझाना गोरक्षकों व गोभक्तों का कर्तव्य है। जिस प्रकार की स्थिति देश में गोरक्षा की है उसके लिए एक सीमा तक गो को माता मानने वाले गोरक्षक भी उत्तरदायी हैं। केवल गोरक्षक होना ही पर्याप्त नहीं है। गोरक्षकों का आज की परिस्थितियों में एक राष्ट्र स्तरीय प्रभावशाली संगठन होना चाहिये। महर्षि दयानन्द ने गोकरूणानिधि लिख कर इसकी आधारशिला रखी थी और एक ‘‘गोकृषिरक्षिणी सभा के गठन के लिए नियम, उपनियम व इसके संविधान को भी तैयार किया था। उनके असामयिक निधन के कारण उनके अनुयायियों का ध्यान इस ओर नहीं जा सका क्योंकि उन्हें अनेक मोर्चों पर काम करना था। देश में विस्तृत अज्ञानता से लड़ना था जिसके लिए उन्होंने गुरूकुल व दयानन्द ऐग्लो वैदिक कालेज अर्थात् डी.ए.वी स्कूलों का सारे देश में एक जाल बिछाया जिसने देश से अज्ञानता वा असाक्षरता दूर करने में बहुत योगदान किया। इसके साथ ही विधर्मियों के जो आक्रमण वैदिक सनातन धर्म के लोगों पर होते थे, उनसे रक्षा करने के लिए भी आर्यसमाज को देश भर में स्थापित कर इनके द्वारा वेद वा वैदिक धर्म का प्रचार व प्रसार करना था जिससे कि लोभ, लालच, छल व कपट तथा आर्थिक प्रलोभन से देशवासियों का धर्मान्तरण न हो जो कि सदियों से देश में चल रहा था और आज भी अनेक प्रकार से गुपचुप रूप से होता है। अनाथ बच्चों की रक्षा का भी प्रश्न था और इसके साथ वैदिक धर्म को संसार का सर्वाधिक बौद्धिक आधार पर स्थापित सत्य वैज्ञानिक धर्म भी सिद्ध करना था जिसमें आर्यसमाज व इसके विद्वानों को पूर्ण सफलता मिली है। स्त्रियों व दलित को उनके उचित अधिकार दिलाने व जन्मना जातिवाद को दूर करने एवं उसके प्रभाव को कम करने में भी आर्यसमाज ने महत्वपूर्ण योगदान किया है।

 

गाय संसार में मनुष्य के लिए सर्वाधिक हितकारी पशु है। गाय का दूध व इससे बने पदार्थ दही, छाछ, मक्खन, क्रीम, मलाई, घृत, पंचगव्य आदि अमृत के समान हैं। इन पदार्थों का अन्य खाद्य पदार्थों से कोई मुकाबला नहीं है अर्थात् वह इनकी तुलना में हेय व गोदुग्धादि मुख्य हैं। इनसे मनुष्य को आरोग्य, स्वास्थ्य और बल मिलता है। गाय का गोमूत्र व गोबर भी मनुष्यों के लिए वरदान है। यह भी आरोग्यकारक व स्वास्थ्य सहित दीर्घ जीवन का आधार है। गोबर से बनी खाद आज भी सर्वोत्तम है। इसका प्रयोग करने से भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। अन्न भी उत्तम किस्म का उत्पन्न होता है। इससे गोसंवर्धन को बढ़ावा मिलता है। गाय से प्राप्त होने वाले बछड़े बड़े होकर बैल बनते हैं, वह सृष्टि के आरम्भ से ही हमारे ट्रैक्टरों आदि का विकल्प बने हुए हैं। ट्रैक्टरों के लिए चैड़ी सड़के, पूंजी व नौकर चाहिये तथा इनके होने पर भी वायु प्रदूषण से किसान व मनुष्यों को हानि उठानी पड़ती है। वहीं दूसरी ओर बैल के लिए हमें गांवों में व सर्वत्र उपलब्ध घास व खेतों में उत्पन्न भूसा आदि के द्वारा ही काम चल जाता है। उनको खेतों तक ले जाने के लिए किसी चैड़ी सड़क की भी आवश्यकता नहीं होती। बैलों से खेतों की जुताई करते हुए जो गोबर व मूत्र खेत में गिरता है, वह उत्तम कोटि की खाद का काम करता है। गाय के दुग्ध से प्राप्त होने वाला घी यज्ञ का मुख्य द्रव्य होता है जिससे वायुमण्डल सहित समस्त पर्यावरण शुद्ध होने से शुद्ध अन्न की प्राप्ति, रोग निवारण व स्वास्थ्य लाभ सहित धर्म लाभ भी होता है जिससे मनुष्य का वर्तमान व भविष्य अर्थात पुनर्जन्म सुधरता व लाभान्वित होता है। इस प्रकार से गो मनुष्यों का सर्वोंत्तम हितकारी प्राणी व पशु है। इतने उपकार करने के बाद गो व बैल आदि सभी प्राणी अहन्तव्य वा अवध्य निश्चित होते व सिद्ध होते हैं। परन्तु गोमांस-भक्षक इन प्रश्नों पर बिना विचार किये आंखे व बुद्धि के दरवाजे बन्द कर गोमांस का सेवन करते हैं जो पूरी तरह से अमानवीय व अप्राकृतिक कर्म होने से अधर्म है। महर्षि दयानन्द ने एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न गोमांस भक्षकों से किया है कि जब संसार में सभी गाय आदि पशु समाप्त हो जायेंगे तो तब क्या वह मनुष्यों का वध कर उनके मांस का सेवन करेंगे? यदि वर्तमान की तरह से गोवध व गोमांसाहार जारी रहा और यदि, ईश्वर न करे, सभी गोमांस का सेवन करने लगें तो यह स्थिति शीघ्र आ सकती है। हम आशा करते हैं कि भविष्य में ऐसा कभी नहीं होगा और आज के गोमांसाहारी बन्धु भी ज्ञान व विवेक प्राप्त कर गोमांसाहार का अवश्य ही त्याग कर देंगे।

 

महर्षि दयानन्द ने अर्थ शास्त्र के आधार पर गणना कर लिखा है कि एक गाय की एक पीढ़ी से लगभग 4 लाख 18 हजार मनुष्यों का एक समय का भोजन सिद्ध होता है जबकि एक गाय को मारकर खाने से मात्र 80 लोगों की एक समय की क्षुधा निवृति होती है। यह सिद्ध करता है कि गोमांस के सेवन से विश्व का अहित व अन्य लोगों के अन्न, भोजन व स्वास्थ्य की हानि होती है। अतः कोई भी बुद्धिमान मनुष्य गोमांस का सेवन कदापि नहीं कर सकता। इसका प्रचलन अज्ञान के आधार पर हुआ है और अज्ञान के कारण ही यह जारी है। जब किसी मनुष्य को सभी पक्षों का ज्ञान हो जाता है तो वह इसका सेवन करना छोड़ देता है। आज कल के वैज्ञानिक व चिकित्सक भी अनेक रोगों में गोमांस व अन्य पशुओं के मांस का भक्षण करने वालों को मांसाहार न करने की सलाह देते हैं। इसके विपरीत गोमाता का दूध व इससे बने पदार्थों के सेवन से किसी भी रोग में अपवाद स्वरूप कोई हानि नहीं होती। वेदों का अध्ययन करने पर भी यही निष्कर्ष निकलता है कि वेदों में कहीं भी गोहत्या व गोमांस सेवन का विधान नहीं है। भारतीय सनातन वैदिक धर्म में वेदों को ही धर्म ग्रन्थ की संज्ञा प्राप्त है। अतः वैदिक काल जो महाभारत काल तक रहा, इसमें किसी भी व्यक्ति द्वारा गोहत्या करने वा गोमांसाहार करने का प्रश्न ही नहीं है। महाभारत काल के बाद महर्षि दयानन्द जी वेदों के महान विद्वान व व्याख्याकार हुए हैं। वह ज्ञान व विज्ञान के भी जानकार एवं उत्कृष्ट विद्वान थे। उनका मानना था कि गोहत्या व गोमांसाहार महापाप है। इसका अर्थ यह है कि गोमांसाहार करने वालों को मृत्यु के बाद अपने इस महापाप का महादुःख रूपी फल ईश्वर की व्यवस्था से भोगना पड़ेगा।

 

आज गोवर्धन पूजा का महान पर्व है। आज के दिन जहां हमें इस पर्व को धार्मिक भावना से मनाना है वहीं हमें गो के उपकारों को स्मरण कर इनकी रक्षा व संवृद्धि करने का संकल्प लेने की भी आवश्यकता है। इसके लिए आज के दिन सभी मन्दिरों व घरों में महर्षि दयानन्द लिखित गोकरूणानिधि पुस्तक का आंशिक व पूर्ण पाठ भी करना चाहिये। यह पाठ करते समय इसके एक-एक शब्द पर मनन होना चाहिये और विवेक से अपने कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिये। हमें यह भी उचित लगता है आर्यसमाज व हिन्दुओं के मन्दिरों में दीवारों आदि पर गोरक्षा के लाभों व मनुष्य के गाय के प्रति कर्तव्यों के सूचक वाक्य लिखकर लोगों में जागृति उत्पन्न करनी चाहिये। गोरक्षा के लिए एक पृथक राष्ट्रीय स्तर का संगठन भी बनना चाहिये जो तर्क, बुद्धि, विज्ञान के द्वारा गोहत्या को रोकने का प्रभावी कार्य करे। ऐसा होने पर ही देश में यथार्थ गोपूजा हो सकती है और गोवर्धन पूजा पर्व मनाना सार्थक हो सकता है।

 

 –मनमोहन कुमार आर्य

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‘स्वामी दयानन्द अपूर्व सिद्ध योगी व पूर्ण वैदिक ज्ञान से संपन्न महापुरुष थे’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

 

महर्षि दयानन्द जी के समग्र जीवन पर दृष्टि डालने पर यह तथ्य सामने आता है कि वह एक सिद्ध योगी तथा आध्यात्मिक ज्ञान से सम्पन्न वेदज्ञ महात्मा और महापुरुष थे। अन्य अनेक गुण और विशेषातायें भी उनके जीवन में थी जो महाभारतकाल के बाद उत्पन्न हुए संसार के अन्य मनुष्यों में नहीं पायी जाती। वस्तुतः यह दोनों उपलब्धियां ही उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य बनी थीं। आरम्भ में तो उन्हें पता नहीं था कि जिस उद्देश्य के लिए वह अपना घर व माता-पिता का त्याग कर रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा? उन्होंने सच्चे शिव संबंधी ज्ञान की प्राप्ति और मृत्यु पर विजय पाने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था। उन्हें इस बात का आभास था कि सच्चे योगियों से उनके मनोरथ पूर्ण हो सकते हैं। इसलिए हम पाते हैं कि घर से चलकर वह विद्या प्राप्ति में निपुणता प्राप्त होने तक ज्ञानियों व योगियों की ही संगति में देश भर में सभी सम्भावित स्थानों पर खोज करते रहे। उनका यह गुण था कि अपने लक्ष्यों की प्राप्ति से सम्बन्धित उन्हें जहां जिससे जितना भी ज्ञान मिलता था, उसे वह प्राप्त कर लेते थे और उससे आगे के लिए वह अन्य सम्भावित स्थानों की ओर चल पड़ते थे।

 

स्वामी दयानन्द जी ने अपने जीवन के लक्ष्य की पूर्ति में सहायता के लिए शीघ्र की ब्रह्मचर्य की दीक्षा व उसके बाद संन्यास ले लिया था। उन्होंने अपने जीवन का पर्याप्त समय गुजरात के प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थों, मध्यप्रदेश के नर्मदा तट व नर्मदा के स्रोत अमरकण्टक, राजस्थान के आबू पर्वत सहित उत्तराखण्ड के वन व पर्वतों पर जाकर सिद्ध योगियों व ज्ञानियों की खोज में लगाया था। गुजरात की चाणोदकन्याली में उन्हें योगी ज्वालापुरी और शिवानन्द गिरी मिले जिनसे उन्हें योग के अनेक सू़क्ष्म रहस्यों का ज्ञान हुआ। उन्होंने इन योग प्रवीण गुरुओं के निर्देशन में योग का सफल अभ्यास भी किया था। इसके बाद अहमदाबाद व आबूपर्वत जाकर भी उन्होंने योगाभ्यास किया और यहां भी उन्हें योग शिक्षा के अनेक गुप्त स सूक्ष्म महत्वपूर्ण रहस्यों का ज्ञान हुआ। स्वामी दयानन्द जी ने अपने गृह पर रहकर 21 वर्ष की अवस्था तक अनेक संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन किया था। अतः यात्रा में जहां कहीं उन्हें कोई ग्रन्थ मिलता था तो वह उसको प्राप्त कर उसका अध्ययन करते थे। ज्ञान के अनुसंधान के लिए योगियों व महात्माओं से मिलना और साहित्यिक शोध के प्रति उनकी बुद्धि बड़ी प्रबल थी। पुस्तकों में जो लिखा है वह सत्य और प्रमाणित है या नहीं, इसकी वह परीक्षा किया करते थे। उनके पास कुछ तन्त्र ग्रन्थ थे। उनमें शरीर के भीतर जिन चक्रों का वर्णन था, एक बार अवसर मिलने पर नदी में बह रहे शव को बाहर निकाल कर तथा अपने चाकू से उसे चीरकर, उसका पुस्तक के वर्णन से उन्होंने मिलान किया था। जब वह वर्णन सही नहीं पाया तो उन ग्रन्थों को भी उन्होंने उस शव के साथ बांध कर नदी में बहा दिया था। इससे सत्य की खोज के प्रति उनके दृण संकल्प के दर्शन होते हैं। इस पूरे वर्णन से स्वामी दयानन्द जी का योग में प्रवीण हो जाने और उसके प्रायः सभी रहस्यों को जीवन में प्राप्त कर लेने का तो अनुभव होता है परन्तु ज्ञान प्राप्ती की उनकी आगे की यात्रा करनी अभी बाकी थी। यहां हमें इस तथ्य के भी दर्शन हो रहे हैं कि कोई भी सफल योगी सांसारिक ज्ञान, विज्ञान व वेदों के ज्ञान से सम्पन्न नहीं हो जाता जैसा कि कई लोग दावा करते है कि योग में निष्णात हो जाने पर सभी ज्ञान योगी को स्वतः सुलभ हो जाते हैं और उसे ज्ञान प्राप्ति करना शेष नहीं रहता।

 

स्वामी दयानन्द जी में ज्ञान प्राप्ति की भी तीव्र अभिलाषा व इच्छा थी। इसकी प्राप्ति का स्थान भी वह बड़े ज्ञानी योगियों को ही मानते हैं। अतः योग में पूर्णता प्राप्त कर लेने पर भी उनकी ज्ञान की पिपासा को शान्त करने के प्रयत्न जारी रहे। इसके लिए वह गुजरात के धार्मिक वा तीर्थस्थलों, नर्मदा तट व उसके उद्गम तथा राजस्थान के आबू पर्वत की तो पूर्णता से छानबीन कर चुके थे, अब उन्हें अभीष्ट की प्राप्ति के लिए उत्तराखण्ड के हरिद्वार, ऋषिकेश और वन पर्वतों के शिखरों सहित कन्दराओं व तीर्थ स्थानों में ज्ञानी योगियों के मिलने की सम्भावना थी। वह इस ओर बढ़े और अभीष्ट का अनुसंधान करने लगे। अनुसंधान करने पर यहां उन्हें भीषण कष्ट हुए परन्तु कोई विशेष उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। इसके कुछ काल बाद सन् 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम से सारा देश किसी न किसी रूप में संघर्षरत रहा। इसके बात स्थिति कुछ सामान्य होने पर सन् 1860 में स्वामी दयानन्द जी मथुरा में प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की पाठशाला में ज्ञान की प्राप्ति हेतु पहुंचते हैं। यहां स्वामी जी को अपने निवास, पुस्तकों के क्रयण एवं भोजन आदि की समस्याओं के निवारण में कुछ समय लगता है। इसके बाद उनका अध्ययन आरम्भ होकर 3 वर्ष तक चलता है। स्वामीजी गुरु विरजानन्द जी की शिक्षा से उस ज्ञान को प्राप्त करते हैं जिसकी उन्हें तीव्र अभिलाषा थी और जिसके लिए उन्होंने अपने माता-पिता व घर का त्याग किया था। गुरु दक्षिणा का अवसर आता है। स्वामी जी गुरु जी को प्रिय कुछ लौंग लेकर पहुंचते हैं। दोनों के बीच बातचीत होती है। गुरुजी स्वामी जी को मिथ्या अज्ञान व अन्धविश्वास दूर कर वैदिक ज्ञान का प्रकाश करने का आग्रह करते हैं। स्वामी दयानन्द जी भी अपने लिए इस कार्य को सर्वोत्तम व उचित पाते हैं। अतः गुरु विरजानन्द जी की प्रेरणा, परामर्श वा आज्ञा को स्वीकार कर उन्हें इस कार्य को करने का वचन देते हैं। हमें लगता है कि स्वामी जी यदि यह कार्य न करते तो उनकी योग्यता के अनुरुप उनके पास करने के लिए दूसरा कोई कार्य भी नहीं था। अभी तक स्वामी दयानन्द जी ने योग तथा आर्ष विद्या के क्षेत्र में जो ज्ञान की उपलब्धि की व अनुभव प्राप्त किये, उससे सारा संसार अपरिचित था। सन् 1863 में वह कार्य क्षेत्र में आते हैं और धीरे धीरे वह अन्धविश्वासों का निवारण और वेदों के प्रचार प्रसार करने में सफलताओं को प्राप्त करना आरम्भ कर देते हैं। इन कार्यों में पूर्णता तब दृष्टिगोचर होती है जब वह नवम्बर, 1869 में काशी में पूरी पौराणिक विद्वतमण्डली को मूर्तिपूजा को वेद शास्त्रानुकूल सिद्ध करने के लिए शास्त्रार्थ करते हैं और अपने सिद्धान्त कि मूर्तिपूजा वेद व शास्त्र सम्मत नहीं है, सफल व विजयी होते हैं।

 

स्वामी दयानन्द जी और उनके गुरु स्वामी विरजानन्द जी दोनों ही देश की धार्मिक व सामाजिक पतनावस्था से चिन्तित थे। दोनों ने ही इसके कारणों व समाधान पर विचार किया था। इसका कारण यह था कि अवैदिक, पौराणिक व मिथ्या ज्ञान तथा आपस की फूट के कारण देश की यह दुर्दशा हुई है। इस समस्या पर विजय पाने का एक ही उपाय था कि सत्य और असत्य के यथार्थ स्वरूप का प्रचार कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग कराया जाये। स्वामी जी ने गुरु विरजानन्द जी से ईश्वर, जीवात्मा, प्रकृति, धर्म व जीवन शैली के सम्बन्ध में वेदों में निहित सत्य ज्ञान को ही प्राप्त किया था। उन्होंने मथुरा में गुरूजी से विदा लेने के बाद अपने आपको इस महत्कार्य के लिए तैयार किया था। उनके पास सभी विषयों के सभी प्रकार के प्रश्नों के सत्य उत्तर थे। उनका अपना जीवन भी सत्य के ग्रहण साक्षात उदाहरण था। उन्होंने मनुस्मृति जैसे प्रमुख ग्रन्थ में विद्यमान लाभकारी सत्यासत्य की कसौटी पर कस कर वेदानुकूल भाग को भी प्राप्त किया था जिसका इससे पूर्व किसी ने इस प्रकार से अध्ययन नहीं किया था। उनके समय तक के विद्वान पूरी मनुस्मृति को या तो स्वीकार करने वाले थे या अस्वीकार करने वाले। परन्तु इसके सत्य व लोकहितकारी ज्ञान को स्वीकार व उसमें प्रक्षिप्त वेद विरुद्ध, असत्य व मिथ्या ज्ञान वाले अंश को त्यागने की दृष्टि रखने वाले विद्वान नहीं थे। इस दृष्टि को रखने वाले स्वामी दयानन्द पहले विद्वान थे। स्वामी दयानन्द जी ने अपने समग्र ज्ञान के आधार पर देश का भ्रमण आरम्भ कर दिया। पूना पहुंच कर उन्होंने प्रवचनों से वहां के प्रबुद्ध समाज को अपनी बातों का लोहा मनवाया। मुम्बई में उनके प्रवचनों से लोग प्रभावित हुए। उन्हें सन् 1874 में वैदिक विचारों का वर्तमान व भविष्य काल में तथा उनके सम्पर्क में न आने लोगों तक उनकी सभी बातें पहुंच जायें वा पहुंचती रहे, इसका एक ग्रन्थ तैयार करने का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होंने विश्व का अनूठा ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश लिख कर पूरा किया। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुम्बई के प्रबुद्ध लोगों ने उन्हें एक संगठन बनाने का सुझाव दिया। उसी का परिणाम 10 अप्रैल, 1875 को आर्यसमाज की स्थापना था। इसके बाद व कुछ पूर्व उन्होंने पंचमहायज्ञ विधि, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, संस्कार विधि, आर्याभिविनय, वेद भाष्य सहित अनेक ग्रन्थों का प्रणयन भी किया जिसका उद्देश्य सत्य का प्रचार करना व मिथ्या ज्ञान वा अन्धविश्वासों को समाप्त करना था। स्वामी जी को अपने इस कार्य में निरन्तर सफलतायें प्राप्त होती आ रही थी। अब उनका प्रभाव व सम्पर्क वर्तमान के महाराष्ट्र, पश्चिमी बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश आदि अनेक स्थानों में हो चुका था। इन सभी स्थानों पर आर्यसमाज स्थापित हो रहे थे। मुख्यतः पौराणिक लोग आर्यमत को स्वीकार कर रहे थे और अन्य मतों के प्रमुख लोग भी वैदिक धर्म से प्रभावित हुए थे। स्वामी जी ने आर्य वैदिक मत के सिद्धान्तों के प्रचार व प्रसार के लिए उपदेश व प्रवचनों सहित वार्तालाप व शास्त्रार्थों का भी सहारा लिया था। वह शास्त्रार्थों के अपराजेय व विजित योद्धा थे। महर्षि दयानन्द ने अपने कार्यों व प्रयासों से वैदिक धर्म को संसार का प्रथम व उत्कृष्ट सत्य, तर्क व विज्ञान की कसौटी पर खरा एकमात्र धर्म बना दिया था जिससे सभी मतों के आचार्यों में अपने निजी स्वार्थों के कारण असुखद स्थिति अनुभव की जाने लगी थी और वह उनके शत्रु बन रहे थे।

 

महर्षि दयानन्द ने वेदों के मन्त्रों में छिपे रहस्यों को खोला जिस कारण उन्हें महर्षि के नाम वा पदवी से सम्बोधित किया जाता है। उन्होंने अवतारवाद, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, जन्मना जातिवाद, बाल विवाह, सामाजिक असमानता, स्त्री व शूद्रों का वैदिक शिक्षा के अनाधिकार सहित सभी धार्मिक व सामाजिक अन्धविश्वासों का खण्डन किया और सच्चिदानन्द निराकार सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी ईश्वर की वैदिक रीति से सन्ध्योपासना, गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था, खगोल ज्योतिष, गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार पूर्ण युवावस्था में विवाह, अनिवार्य व निःशुल्क गुरुकुलीय शिक्षा व्यवस्था व वैदिक सुरीतियों का समर्थन किया। देश की आजादी में उनका व उनके आर्यसमाज का सर्वोपरि योगदान है। वह अपूर्व देशभक्त व मानवता के सच्चे पुजारी थे। संसार के सभी मनुष्यों की सांसारिक व आध्यात्मिक उन्नति ही उनको अभीष्ट थी। उन्होंने अपना कोई नया मत व सम्प्रदाय नहीं चलाया अपितु ईश्वर द्वारा सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को दिये गये वेद ज्ञान का ही प्रचार कर संसार से अज्ञानता, असमानता व भेदभावों को दूर करने का प्रयास किया। वह वेदाज्ञा कृण्वन्तो विश्वमार्यम् में विश्वास रखते थे और वैदिक धर्म से बिछुड़े हुए भाई-बहिनों को निष्पक्ष भाव से वैदिक धर्म के वट वृक्ष के नीचे लाने के समर्थक थे। वस्तुतः उन्होंने एक ऐसे विश्व का स्वप्न संजोया था जिसमें किसी के प्रति किसी प्रकार का अन्याय, भेदभाव और शोषण न हो और सब वैदिक ज्ञान से युक्त शिक्षित, विद्वान, विदुषी, निरोगी, स्वस्थ व बलवान हों। वह संसार से अशान्ति व दुःखों को समूल मिटाना चाहते थे। उनके शिष्यों पर उनके स्वप्नों को पूरा करने का भार है परन्तु उन सभी को कर्तव्यबोध भी है?, कहा नहीं जा सकता। आत्म चिन्तन और आर्यसमाज के नियम कि मनुष्य को सार्वजनिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में सब स्वतन्त्र रहें, यह और सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग ही आर्यसमाज का उन्नति का मार्ग है। हम सबको अपना आत्मनिरीक्षण करते हुए इसी मार्ग पर चलना चाहिये।

 

महर्षि दयानन्द जी की दो विशेषताओं, उनके सिद्ध योगी और वेद ज्ञान सम्पन्न होने तथा इन विशेषताओं का उपयोग कर संसार के कल्याण की भावना से वेद प्रचार करने का हमने लेख में वर्णन किया है। उनरके बाद उनके समान योगी और वेदों का विद्वान उत्पन्न नहीं हुआ। यदि होता तो विश्व को आशातीत लाभ होता। आशा है कि पाठक इस लेख को पसन्द करेंगे।

 

मनमोहन कुमार आर्य

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‘देश के लिए मर मिटने वाले देशभक्त मृत्युंजय भाई परमानन्द’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

4 नवम्बर 140 वीं जयन्ती पर

स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में भाई परमानन्द जी का त्याग, बलिदान व योगदान अविस्मरणीय है। लाहौर षड्यन्त्र केस में आपको फांसी की सजा दी गई थी। आर्यसमाज के  अन्तर्गत आपने विदेशों में वैदिक धर्म का प्रचार किया। इतिहास के आप प्रोफैसर रहे एवं भारत, यूरोप, महाराष्ट्र तथा पंजाब के इतिहास लिखे जिन्हें सरकार ने राजद्रोह की प्रेरणा देने वाली पुस्तकें माना। देशभक्ति के लिए आपको मृत्युदण्ड की सजा सुनाई गई जो बाद में कालापानी की सजा में बदल दी गई। श्री एण्ड्रयूज एवं गांधी जी के प्रयासों से आप कालापानी अर्थात् सेलुलर जेल, पोर्ट ब्लेयर से रिहा हुए और सन् 1947 में देश विभाजन से आहत होकर संसार छोड़ गये। भारत माता के इस वीर पुत्र का जन्म पश्चिमी पंजाब के जेहलम जिले के करयाला ग्राम में 4 नवम्बर 1876 को मोहयाल कुल में भाई ताराचन्द्र जी के यहां हुआ था। महर्षि दयानन्द जी के बाद वैदिक धर्म के प्रथम शहीद पं. लेखराम, स्वतन्त्रता सेनानी खुशीराम जी जो 7 गोलियां खाकर शहीद हुए तथा लार्ड हार्डिंग बम केस के हुतात्मा भाई बालमुकन्द जी की जन्म भूमि भी पश्चिमी पंजाब, वर्तमान पाकिस्तान की यही झेलम नगरी थी। भाई बालमुकन्द और भाई परमानन्द जी के परदादा सगे भाई थे। भाई मतिदास भी भाई परमानन्द के पूर्वज थे जिन्हें मुस्लिम क्रूर शासक औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चैक में आरे से चिरवाया था। उनके वंशजों को भाई की उपाधि सिक्खों के गुरु श्री गुरु गोविन्द सिंह जी ने देते हुए कहा था कि दिल्ली में हमारे पूर्वजों का खून मतिदास जी के खून के साथ मिलकर बहा है इसलिए आप हमारे भाई हैं।

 

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द ने सन् 1877 में पंजाब में वैदिक धर्म का व्यापक प्रचार किया था। उनके भक्त अमीचन्द की पंक्तियां – दयानन्द देश हितकारी, तेरी हिम्मत पे बलिहारी पंजाब के गांव-गांव में गूंज रही थी। ऐसे वातावरण में आप बड़े हुए। प्राइमरी तक की भाई परमानन्द की शिक्षा करयाला गांव में हुई। इसके बाद चकवाल के स्कूल में आपका अध्ययन हुआ। कुशाग्र बुद्धि भाई परमानन्द यहां अपने शिक्षकों के प्रिय छात्र बनकर रहे। लगभग 14 वर्ष की आयु में आपकी माता मथुरादेवी जी का देहान्त हो गया। पौराणिक पण्डित के अन्धविश्वासपूर्ण कर्मकाण्ड को देख व अनुभव कर आपने पौराणिकता छोड़ कर आर्यसमाज को अपनाया। प्रसिद्ध दयानन्दभक्त गीतकार अमीचन्द तथा रक्तसाक्षी पं. लेखराम जी पश्चिमी पंजाब में आपके निकटवर्ती थे। इन दोनों आर्य प्रचारकों का आप पर विशेष प्रभाव था। चकवाल में आपने आर्यसमाज की स्थापना भी की।

 

सन् 1891 में आप लाहौर आये तथा सन् 1901 में एम.ए. करके आपने मैडिकल कालेज में प्रवेश लेकर चिकित्सक बनने का विचार किया। दयानन्द ऐंग्लो-वैदिक स्कूल व कालेज के मुख्य संस्थापक महात्मा हंसराज की प्रेरणा से आपने अपना यह विचार बदल कर दयानन्द कालेज, लाहौर का प्राध्यापक का पद ग्रहण कर लिया। इस कालेज का आजीवन सदस्य बनकर आपने 75 रुपये मासिक के नाममात्र के वेतन पर अपनी सेवायें डी.ए.वी. कालेज को प्रदान की जबकि आपको अन्यत्र कार्य करके अधिक वेतन मिल सकता था। युवावस्था में तपस्या का कठोर व्रत लेकर आपने जीवन भर उसका पालन किया। राजनीति में प्रवृत्त नेतागण हिन्दुओं के उचित हितों की बात करने वाले को साम्प्रदायिक मानते हैं। ऐसे लोगों से आपकी तालमेल नहीं बैठी। उचित अनुचित बातों को आप यथातथ्य प्रकट करते थे। हिन्दू हितों के विरोधियों को आप कहा करते थे‘‘अमर हमदर्दी निशानी कुफ्र की ठहरी। मेरा इमान लेता जा, मुझे सब कुफ्र देता जा।

 

आपका निवास लाहौर में भारत माता मन्दिर की तीसरी मंजिल पर था। सरकार को आपकी गतिविधियों पर शुरू से ही शक था। इस कारण पुलिस ने एक बार आपके निवास की तलाशी ली। आपके सन्दूक से शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह द्वारा लिखी हुई स्वतन्त्र भारत के संविधान की प्रति तथा बम बनाने के फार्मूले का विवरण बरामद हुआ। इस कारण आपको बन्दी बना लिया गया। श्री रघुनाथ सहायक जी वकील के प्रयास से आप 15 हजार रुपये की जमानत पर रिहा हुए। अभियोग में आप पर देश-विदेश में विदेशी शासन के विरुद्ध प्रचार का आरोप लगाया गया था। 22 फरवरी 1915 को लाहौर षड्यन्त्र केस में आप पुनः बन्दी बनाये गये थे। 30 सितम्बर, 1915 को विशेष ट्रिब्यूनल ने आपको फांसी का दण्ड सुनाया। आपकी पत्नी माता भाग सुधि, श्री रघुनाथ सहाय वकील तथा महामना मदनमोहन मालवीय जी के प्रयासों से 15 नवम्बर 1915 को फांसी का दण्ड दिये गये 24 में 17 अभियुक्तों की सजा को आजीवन कालापानी की सजा में बदल दिया गया। कालापानी में आपको अनेक यातनाओं से त्रस्त होना पड़ा। आपने यहां जेल में आमरण अनशन किया। लम्बी भूख हड़ताल से आप मृत्यु की सी स्थिति में पहुंच गये। सुहृद मित्रों के आग्रह पर आपने भोजन ग्रहण कर अनशन समाप्त कर दिया। बाद में श्री ऐण्ड्रयूज एवं गांधी जी के प्रयासो से आप कालापानी से रिहा किए गये।

 

सन् 1901 में आपने एम.ए. किया था। उन दिनों देश में एम.ए. शिक्षित युवकों की संख्या उंग्लियों पर गिनी जा सकती थी। इस पर भी सादगी एवं मितव्ययता आपके जीवन में अनूठी थी। सन् 1931 में आपने आर्यसमाज नयाबांस, दिल्ली की स्थापना की थी। एक बार जब आप इस समाज में आमन्त्रित किए गये और आपके मित्र श्री पन्नालाल आर्य रेलवे स्टेशन से आपको तांगे में समाज मन्दिर लाना चाहते थे तो आपने पैदल चलने की इच्छा व्यक्त कर तांगे को दिये जाने वाले चार आने बचा लिये। इस व्यय को आपने अपव्यय की संज्ञा दी थी। देश-विदेश में प्रसिद्ध एवं केन्द्रीय असेम्बली (संसद) के सदस्य भाई परमानन्द जी का यह व्यवहार आदर्श एवं पे्ररणादायक व्यवहार था।

 

भाई परमानन्द जी इतिहासवेत्ता भी थे। बीसवीं सदी के आरम्भ में आप इंग्लैण्ड गये। वहां से इंग्लैण्ड के लोगों की अपने इतिहास के प्रति प्रेम व उसकी रक्षा की प्रवृत्ति की प्रशंसा करते हुए तथा भारतीयों की अपने इतिहास की उपेक्षा के उदाहरण देते हुए आपने एक विस्तृत पत्र में स्वामी श्रद्धानन्द जी को लिखा था–‘‘हम कहते हैं कि राजस्थान का कणकण रक्तरंजित है। क्या विदेशियों से जूझते हुए बलिदान देने वाले राजस्थानी वीरों वीरांगनाओं का इतिहास सुरक्षित करने की हमें चिन्ता है?’’ यह प्रश्न स्वामी जी ने अपने पत्र ‘‘सद्धर्म प्रचारक में प्रकाशित किया था। उनके एक जीवनी लेखक प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु ने इस पर व्यंग करते हुए लिखा है कि “दिल्ली में जहां लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने वालों को फांसी का दण्ड दिया गया था, उसी स्थान पर आज मौलाना आजाद के नाम पर मैडीकल कालेज है। यह है हमारी इतिहास की रूचि।

 

सन् 1928 में लाला लाजपतराय के बलिदान के बाद पंजाब में कांग्रेस के पास उनकी जैसी छवि वाला कोई नेता नहीं था। कांग्रेस के एक शिष्ट मण्डल ने भाई परमानन्द जी से पंजाब में कांग्रेस की बागडोर सम्भालने का अनुरोध किया। भाई जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेस की नीति के कारण अपनी असमर्थता व्यक्त की। शिष्ट मण्डल ने लाला लाजपतराय जी की अर्थी में शामिल भारी भीड़ और उन्हें मिले सम्मान का जिक्र किया और कहा कि आप तो देश की आजादी के लिए कालापानी की सजा काट चुके हैं। देश की जनता में आपके लिए बहुत आदर है, इसलिए आप नेतृत्व करें। इस पर भाई जी ने अपनी स्वाभाविक स्पष्टवादिता की शैली में कहा–‘‘भले ही मेरी अर्थी को कंधा देने वाले चार व्यक्ति भी आयें, मेरे मरने पर कोई एक आंसू भी टपकाये, परन्तु मैं अपने सिद्धान्त छोड़कर कांग्रेस में नहीं सकता।

 

मई, 1906 में भाई परमानन्द मुम्बई से जलमार्ग से अफ्रीका महाद्वीप में वैदिकधर्म प्रचारार्थ गये। मार्ग में आपको अनेक कष्ट हुए। एक दिन अफ्रीका में भ्रमण करते हुए आप हब्शियों की बस्ती में जा पहुंचें। वहां एक पुत्री के घर से शहद चुराने के कारण क्रोधित एक मां ने उस चोर कन्या को पेड़ से बांध कर जलाने का प्रयास किया परन्तु अन्तिम क्षणों में कुछ सोच कर उसे वहां छोड़ कर जाना पड़ा। परमानन्द जी जब वहां पहुंचे तो उस कन्या की दशा को देखकर द्रवित हो गये और उसकी सहायता से स्वयं को वहां बांध कर कन्या को वहां से दूर भेज दिया और स्वयं जलने के लिए तैयार हो गये। बस्ती के एक हब्शी ने बाहर आकर जब यह देखा तो अपने साथियों को बुलाया। कन्या की मां ने आकर घटना का सारा वर्णन कह सुनाया। इस घटना से वहां के सभी हब्शी भाई परमानन्द जी के व्यवहार से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्हें उच्च आसन पर बैठा कर उनका सम्मान किया और स्मृति चिन्ह के रूप में उन्हें हाथी दांत से बनी वस्तु देकर विदा किया। उनके एक भक्त श्री विलियम उन्हें ढूंढ़ते हुए वहां आ पहुंचे तो यह दृश्य देखकर हतप्रभ रह गये। बाद में भाई जी को कालापानी भेजे जाने से श्री विलियम बहुत दुःखी हुए थे और भाईजी के मानवोपकार के कार्यो से प्रभावित होकर उन्होंने आर्यघर्म की दीक्षा ली। अफ्रीका में भाई परमानन्द ने मोम्बासा, डर्बन, जोहन्सबर्ग तथा नैरोबी आदि अनेक स्थानों पर प्रचार किया।

 

डर्बन में एक अवसर पर गांधी जी और भाई परमानन्द जी परस्पर मिले। एक सभा जिसमें भाई परमानन्द जी का व्याख्यान हुआ, उसकी अध्यक्षता गांधी जी ने की थी। भाई जी के जोहन्सबर्ग पहुंचने पर गांधी जी उन्हें अपने निवास पर ले गये थे और श्रद्धावश उनका बिस्तर अपने कंधों पर उठा लिया था। गांधी जी के निवास पर भाई जी एक माह तक रहे भी थे। 

 

डी.ए.वी. कालेज कमेटी की ओर से भाई जी को अध्ययन के लिए लन्दन भेजा गया था परन्तु वह वहां भारत की आजादी के दीवानों से ही मिलते रहे। आपने वहां सन् 1857 की भारत की आजादी की प्रथम लड़ाई के इतिहास पर पुस्तकें एकत्र की और बिना कोई डिग्री लिए पुस्तकें लेकर भारत लौंटे। आपने सारी पुस्तकें डी.ए.वी. कालेज के संस्थापक महात्मा हंसराज जी को सौंप दी जिन्हें महात्मा जी ने अपनी अलमारियों में रख लिया। आर्यसमाज के महान नेता रक्त साक्षी पं. लेखराम के अनुसार भाई परमानन्द जी ऐसे निर्भीक एवं साहसी पुरुष थे जिनमें भय वाली रग थी ही नहीं। वे प्राणों के निर्मोही थे। लाहौर में एक बार बड़ा भारी साम्प्रदायिक दंगा हुआ। भाई जी तथा आर्य समाज के उच्चकोटि के विद्वान पं. चमूपति का घर वहां असुरक्षित था परन्तु इन दोनों आर्य महापुरूषों को अपनी व अपने परिवारों की कोई चिन्ता नहीं थी। स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी ने वहां आर्य विद्वान व नेता पं. जगदेव सिंह सिद्धान्ती को दो युवकों के साथ भेजकर उनके समाचार मंगाये थे।

 

भाई जी ने जोधपुर में महाराजा जसवन्त सिंह के अनुज महाराज कुंवर प्रताप सिंह के निमन्त्रण पर राजकुमारों की शिक्षा के लिए स्थापित स्कूल में एक वर्ष एक पढ़ाने का कार्य किया। श्री प्रतापसिंह की अंग्रेजों की भक्ति एवं राजदरबार में दलबन्दी के कारण खिन्न होकर रातों-राज वह वहां से चल पड़े थे। जब लाहौर में आर्य साहित्य के प्रकाशक महाशय राजपाल जी की कुछ विधर्मियों ने हत्या कराई तो सरकार ने उनके शव की मांग करने वालों को बेरहमी से पीटा।  आप भी पुलिस की लाठियों के प्रहारों का शिकार बने। यदि वहां कुछ आर्ययुवक आपको न बचाते तो कोई अनहोनी हो जाती। भाईजी एक सिद्ध हस्त लेखक भी थे। इतिहास आपका प्रिय विषय था। भारत का इतिहास आपके द्वारा लिखी गई एक पुस्तक है जिसे न्यायालय में आपके विरुद्ध प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर अंग्रेज सरकार के सरकारी वकील ने कहा था कि यह पुस्तक विद्रोह की प्रेरणा देती है। यूरोप का इतिहास, महाराष्ट्र  का इतिहास, पंजाब का इतिहास, आपबीती एवं वीर बन्दा बैरागी आपकी कुछ अन्य प्रमुख कृतियां हैं। आपकी सभी पुस्तकों में देश को स्वतन्त्र कराने की प्रेरणा निहित है।

 

भाई परमानन्द अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के प्रधान रहे। सन् 1927 के प्रथम आर्य महासम्मेलन के अध्यक्ष पद पर आप मनोनीत किए गये थे परन्तु किसी कारण आप यह प्रस्ताव स्वीकार न कर सके। कालापानी के कारावास से रिहा होने पर एक पत्र के प्रकाशक की ओर से जब आपको 10 हजार की राशि भेंट कर सम्मान किए जाने का प्रस्ताव किया गया तो निर्लोभी स्वभाव एवं विनयशीता के कारण आपने धन्यवादपूर्वक प्रस्ताव ठुकरा दिया था। देश की आजादी के लिए समर्पित देशभक्तों की पत्नियों ने भी अपने पतियों की तरह त्याग, तपस्या व बलिदान का ही जीवन व्यतीत किया। भाई परमानन्द जी की पत्नी माता भागसुधि रावलपिण्डी के सम्पन्न किसान रायजादा किशन दयाल की पुत्री थी। विवाह के समय आप अनपढ़ थी परन्तु भाई जी ने आपको प्रयत्नपूर्वक शिक्षित किया। आप कुशाग्रबुद्धि, हंसमुख, विनोदी स्वभाव वाली तथा गृह कार्यों में दक्ष महिला थी। भाई जी के जेल के दिनों में आपने स्कूल में काम करके तथा कपड़े सिलकर अपना तथा बच्चों का जीवन निर्वाह किया। क्रूर अंग्रेजों ने आपके घर का सारा सामान यहां तक की घर के सभी बर्तन तक छीन लिए थे। लाहौर की एक बस्ती में किराये के एक ऐसे कमरे में आप रहीं जहां धूप की एक किरण तक प्रवेश नहीं कर सकती थी और न ही शुद्ध वायु भी। दीनबन्धु ऐण्ड्रयूज जब आपकी सुध लेने आये तो यह जानकारी प्राप्त कर द्रवित हो गये कि 6 महीने पहले आपकी बड़ी पुत्री तपेदिक से मर चुकी थी।

 

आपकी   पत्नी माता भागसुधि जी को अपने पति भाई परमानन्द जी के आजादी का सिपाही होने के कारण टीचर ट्रेनिगं स्कूल में प्रवेश नहीं दिया गया था। मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत अपने निर्दोष पति को फांसी से छुड़ाने के लिए आपने कहां-कहां, कैसे भागदौड़ की होगी तथा धन जुटाया होगा, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। ऐसे बुरे समय में अंधविश्वासी ससुर ने भी आपको आश्रय नहीं दिया। अपने कड़े परिश्रम से माता भागसुधि जी ने दो कमरे, रसोई एवं बरामदा बनवाया। जेल में अपने पति की तरह आपने चारपाई त्याग दी एवं भोजन वर्तनों में करना छोड़ कर मिट्टी के बर्तनों में किया। 1 जुलाई 1932 तपेदिक के रोग की तीव्रता के कारण माता भागसुधि जी को संसार छोड़ कर जाना पड़ा और वह अपने पति से हमेशा के लिए दूर चली गयी। भाई परमानन्द जी पर इसका क्या प्रभाव हुआ होगा? फिर भी वह 15 वर्षों तक जीवित रहे और देश हित के कार्य करते रहे। प्रो. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने माता भागसुधि जी पर अपने भावों को एक कविता में निम्न रूप में प्रकट किया है।

 

धन्य तुम्हारी सतत साधना, धन्य तुम्हारा जीवन दान।

धन्य तुम्हारा धीरज साहस, धन्य तुम्हारा मां बलिदान।

धन्य धरा तव जन्मदायिनी, धन्य तपस्या का वरदान।

धन्य तुम्हारा शील सुहागिन, धन्य तुम्हारा देश अभिमान।

 

देश विभाजन से भारत माता के लाखों सपूतों के नरसंहार तथा स्त्रियों के सतीत्व-हरण की घटनाओं से आहत भाई जी ने विभाजन एवं इसके परिणाम स्वरूप घटी अमानवीय घटनाओं को राष्ट्रीय अपमान की संज्ञान दी। आपने अन्न त्याग दिया था, फिर बोलना भी छोड़ दिया था। 8 दिसम्बर, 1947 को देश की आजादी के लिए तिल-तिल कर जलने वाले इस महान् देशभक्त ने अपने प्राण त्याग दिये। आज भाई परमानन्द जी के जन्म दिवस पर हम उन्हें, माता भागसुधि व उनके परिवार को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

‘गाय के प्रति माता की भावना रखना और उसकी रक्षा करना मनुष्य का धर्म’ -मनमोहन कुमार आर्य

ओ३म्

 

जब हम संसार की उत्पत्ति, मनुष्य जीवन और प्राणी जगत पर विचार करते हैं तो हम जहां संसार के रचयिता सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति नतमस्तक होते हैं वहीं मनुष्य जीवन के सुखपूर्वक संचालन के लिए गाय को मनुष्यों के एक वरदान एवं सर्वोपरि हितकारी व उपयोगी पाते हैं। यदि ईश्वर ने संसार में गाय को उत्पन्न न किया होता तो यह संसार आगे चल ही नहीं सकता था। संसार के आरम्भ में जो मनुष्य उत्पन्न हुए थे, उनका भोजन या तो वृक्षों से प्राप्त होने वाले फल थे अथवा गोदुग्ध ही था। इन दोनों पदार्थों का भक्षण कर क्षुधा की निवृत्ति करने की प्रेरणा भी परमात्मा द्वारा ही आदि सृष्टि के मनुष्यों को की गई होगी, ऐसा हमारा अनुमान है। यदि गोदुग्ध, जो कि मनुष्य के लिए सम्पूर्ण आहार है, न होता तो फलाहार कर मनुष्य का आंशिक पोषण ही हो पाता। हम यह जानते हैं कि सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात मनुष्यों की जो अमैथुनी सृष्टि ईश्वर ने की थी, उसमें उसने मनुष्यों को युवावस्था में उत्पन्न किया था। हम यह भी अनुमान करते हैं कि ईश्वर ने इन मनुष्यों को स्वाभाविक ज्ञान के साथ क्षुधा की निवृत्ति हेतु भोजन व पिपासा के शमन हेतु जल का पान करने का ज्ञान भी इन सभी मनुष्यों को दिया था। शतपथ ब्राह्मण के लिखित प्रमाण के अनुसार परमात्मा ने ही आदि मनुष्यों में से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को चार वेदों का ज्ञान दिया था। इस ज्ञान से सम्पन्न होने पर इन ऋषियों ने सभी मनुष्यों को एकत्रित कर उन्हें भाषा व बोली तथा कर्तव्य वा अकर्तव्यों का ज्ञान कराया। यह इन ऋषियों का कर्तव्य भी था और अन्य मनुष्यों की प्रमुख आवश्यकता भी। इस प्रकार सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य जीवन का आरम्भ हुआ।

 

गाय का हमारे वर्तमान जीवन में क्या महत्व और उपयेागिता है? इसका उत्तर है कि गाय एक पालतू पशु होने से हमारे परिवार का सदस्य बन जाता है। गाय को हम भोजन में घास आदि वनस्पतियों का चारा और जल का ही सेवन व पान कराते हैं जो हमें प्रकृति में सर्वत्र ईश्वर द्वारा निर्मित होकर सरलता से उपलब्ध होता है। हमें इसके लिए केवल परिश्रम करना होता है। इसके प्रत्युत्तर में गाय प्रातः व सायं दो बार हमें अमृततुल्य दुग्ध देती है। बीच में आवश्यकता पड़ने पर भी दुग्ध निकाला जा सकता है। गोदुग्ध पूर्ण आहार है और माता के बाद गोदुग्ध का स्थान अन्य प्राणियों की तुलना में दूसरे स्थान पर होता है। दुग्ध से दही, मक्खन, क्रीम, घृत, छाछ, पनीर, मावा आदि अनेक पदार्थ बनते हैं जिनसे भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक स्वादों से युक्त आहार व भोजन के अनेक व्यंजन तैयार होते हैं जो सभी स्वास्थ्यवर्धक भी होते हैं। आयुर्वेद ने घृत को आयु का आधार बताया गया है जो कि वस्तुतः है। गोघृत स्वास्थ्यवर्धक होने के साथ आयुवर्धक व रोग कृमिनाशक भी होता है। मनुष्य को ईश्वर का धन्यवाद करने व पर्यावरण को शुद्ध व पवित्र रखने के श्रेष्ठतम कर्मयज्ञ को करने के लिए मुख्य अवयव गोघृत की ही आवश्यकता होती है। यज्ञ से हमें इहलोक एवं परलोक दोनों में लाभ होता है तथा हमारा अगला जीवन भी बनता सुधरता है। यज्ञ करना वेदानुसार ईश्वराज्ञा है जो संसार के सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से पालनीय है। इसका पालन करने वाले ईश्वर से पुरस्कार के अधिकारी बनते हैं और पालन न करने वाले ईश्वर की आज्ञा भंग करने से दोषी व दण्डनीय। इस यज्ञ को करने के लिए भी गोपालन द्वारा गोदुग्ध की प्राप्ति आवश्यक है।

 

गाय से हमें बच्चों के रूप में बछिया और बछड़े मिलते हैं। बछियां कुछ समय बाद पुनः गाय बनकर हमारे लिए गोदुग्ध द्वारा उपयोगी बन जाती हैं और बछड़े कुछ ही महीनों में बड़े होकर हमारी खेती के काम आते हैं। प्राचीन काल में यदि बछड़े न होते तो खेती न हो पाती और हमारे पूर्वजों को पर्याप्त अन्न न मिलने से उनका जीवन निर्वाह कठिन होता जिससे उनके बाद की पीढि़यों अर्थात् हमारा अस्तित्व होता, या न होता कह नहीं सकते। अतः हमारे आज के अस्तित्व में गोमाता व उसके बछड़ों का सृष्टि के आदि काल से ही महत्व रहा है। गाय हमारी जीवन रेखा व प्राणदायिनी रही है। गाय के बछड़ों के द्वारा खेती करने से जो लाभ हैं, वह ट्रैक्टर आदि से नहीं होते। ट्रैक्टर पर भारी भरकम धन व्यय करने के साथ उसके रखरखाव व डीजल आदि पर नियमित व्यय करना होता है और साथ ही हम अपने वायुमण्डल को प्रदूषित कर श्वांस में प्रदूषित वायु लेते हैं जिससे अनेक रोगों से ग्रस्त होकर क्षीणकाय बनते और अल्पायु में मृत्यु का ग्रास बनते हैं। बैलों द्वारा खेती करने से हमारा बहुत धन बचने के साथ पर्यावरण सुरक्षा का लाभ मिलता है। हम बैलों की हत्या के महापाप से भी बचते हैं, वायुमण्डल शुद्ध रहता है और साथ हि बैल जो पुरीश-मल व मूत्र खेतों में विसर्जित करते हैं वह बहुमूल्य खाद का काम करता है। इससे भूमि की उर्वरा सकती बढ़ती है वा सुरक्षित रहती है। यह भी तथ्य है कि ट्रैक्टर के लिए खेतों तक जाने के लिए चैड़ी सड़क की आवश्यकता होती है जबकि बैलों के लिए किसी प्रकार की सड़कों की आवश्यकता नहीं होती। इससे सड़क की भूमि का उपयेाग भी कृषि में सम्मिलित होकर अन्न के उत्पादन में वृद्धि होती है। बैल एक चेतन प्राणी है, उससे खेती करने से एक प्राणी को जीवन देने व उसकी रक्षा व सेवा करने से किसान को जो पुण्य होता है वह ट्रैक्टर आदि किसी भी जड़ पदार्थ से सेवा करने से नहीं होता।

 

गाय का गोबर व गोमूत्र न केवल बहुमूल्य खाद व कीटनाशक का काम करता है अपितु भूमि की उर्वरा शक्ति को सुरक्षित रखते हुए उसमें वृद्धि भी करता है। गाय का गोबर व गोमूत्र पंचगव्य नामक ओषधि बनाने के काम आता है, जो गोरक्षा व गोहत्या को समाप्त किये बिना सम्भव नहीं है। गाय के घृत से एक ऐसी भी ओषधि तैयार होती है जिससे बांझ स्त्रियों को सन्तान लाभ होता है। गोघृ्त से महात्रिफलाघृत भी बनाया जाता है जो नेत्रों की अनेक रोगों से चिकित्सा में काम आता है। इन ओषधियों का विकल्प न तो एलोपैथी में है और न अन्य किसी पैथी में। गोदुग्ध के अनेक ओषधीय गुणों में आंखों व शरीर के सभी अंगों को लाभ सहित क्षय रोग व कैंसर जैसे जान लेवा रोग में भी अनेक प्रकार से लाभ होता है। गोमूत्र तो कैंसर के उपचार में प्रयोग में लाया जाता है जिससे अनेक रोगियों को प्रत्यक्ष लाभ देखा गया है। आज ऐलोपैथी की महंगी दवायें व अनेक प्रकार की कष्टकारी चिकित्सा होने पर भी रोगी स्वस्थ नहीं हो पाते वहीं गोमूत्र का सेवन बिना मूल्य की रोगियों में जीवन की आशा जगाने वाली सच्ची व यथार्थ ओषधि है और निर्धनों के लिए ईश्वर का वरदान है। गाय का गोबर जहां खाद का काम करता है वहीं यह गांवों में चूल्हे व चैके में भी प्रयोग में लाया जाता है। गाय के गोबर के उपले ईधन का काम करते हैं वहीं कच्चे घरों, झोपडि़यों व कुटियाओं में गोबर का भूमि व फर्श पर लेपन करने से वह स्वच्छ व किटाणु रहित हो जाता है। एक वैज्ञानिक रिसर्च में यह तथ्य सामने आया है कि गाय के गोबर से लीपी गई दीवारों के अन्दर रेडियोधर्मिता प्रवेश नहीं करती जिससे उसमें अध्यासित लोगों की आणविक विकिरण से रक्षा होती है। गोघृत को जलाने से वायुमण्डल पर इसका चमत्कारी प्रभाव पड़ता है। भोपाल काण्ड में गोघृत से यज्ञ करने वाले एक गृहस्थी, उसके परिवार व पालतू पशुओं की इस गोघृत के यज्ञ ने ही रक्षा की थी जबकि सहस्रों की संख्या में अन्य लोग अपने जीवन से हाथ धो बैठे थे। इसके साथ गाय का घी सर्पविष की चिकित्सा में भी एक महत्वपूर्ण ओषधि है। यदि सर्पदंश से ग्रसित मनुष्य को गोघृत का सेवन व पान कराया जाये तो विष का शरीर पर प्रभाव समाप्त हो जाता है। भारत का प्राचीन मोहनभोग स्वादिष्ट आहार गोदुग्ध से ही बनाया जाता था। गोदुग्ध से मिट्टी की हाण्डी में बनी खीर का अपना ही स्वाद व स्वास्थ्यवर्धक गुण होता है जो कि शहरों के लोगों की पहुंच से बहुत दूर हो गया है। गाय के इन सभी गुणों, महत्व, लाभों व उपयोगिताओं के कारण ही हमारे आस्तिक विचारों वाले पूर्वज गो को अवध्य, गोहत्या को महापाप, अमानवीय, गो मांसाहार को त्याज्य व निन्दनीय मानते आये हैं जो कि पूर्णतया उचित ही है। वेद गोहत्यारे को सीसे की गोलियों से बींधने का आदेश देता है।

 

गाय का देश की अर्थव्यवस्था में भी प्रमुख योगदान है। गोदुग्ध एक मधुर स्वास्थ्यवर्धक पेय होने के साथ गोदुग्ध से बने अन्य सभी पदार्थ अन्न का एक सीमा तक विकल्प भी है। गाय के बछडों से की जाने वाली खेती से जो अन्न उत्पादन होता है वह भी यदि आर्थिक दृष्टि से गणना की जाये तो देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा अंश होता है। महर्षि दयानन्द ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक गोकरुणानिधि में एक गाय की एक पीढ़ी से होने वाले दुग्ध और उसके बैलों से मिलने वाले अन्न की एक कुशल अर्थशास्त्री की भांति गणना की है और बताया है कि गाय की एक पीढ़ी से दूध और अन्न को मिला कर देखने से निश्चय है कि 4,10,440 चार लाख दश हजार चार सौ चालीस मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है। मांस से उनके अनुमान के अनुसार केवल अस्सी मांसाहारी मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते हैं। वह लिखते हैं कि ‘‘देखों, तुच्छ लाभ के लिए लाखों प्राणियों को मारकर असंख्य मनुष्यों की हानि करना महापाप क्यों नहीं?’’ गो के दुग्ध, इससे निर्मित अन्य पदार्थों व गोबर सहित गोमूत्र के ओषधीय लाभों को इसमें सम्मिलित नहीं किया गया है। इससे गोरक्षा के आर्थिक लाभ का अनुमान लगाया जा सकता है जो कि किसी अर्थशास्त्री की आशाओं से कहीं अधिक होता है। गोहत्या को बन्द करने के लिए महर्षि दयानन्द ने अपने समय में अपने प्रकार का एक अपूर्व आन्दोलन चलाया था। उन्होंने गोहत्या रोकने के मुद्दे पर 2 करोड़ भारतीयों के हस्ताक्षर कराकर इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरियां को प्रेषित करने की यायेजना बनाई थी जिस पर तीव्रता से कार्य चल रहा था और नित नई सफलातायें मिल रहीं थी। महारानी विक्टोरिया को भेजी जाने वाली गोहत्या को रोकने की मांग के इस ज्ञापन में गोरक्षा से लाभ व गोहत्या से हानि तथा मानवीय पहलुओं का उल्लेख कर कहा गया था कि इसलिए हम सब लोग प्रजा की हितैषिणी श्रीमतिराजराजेश्वरी क्वीन महारानी विक्टोरिया की न्यायप्रणाली में जो यह अन्याय रुप बड़े बड़े उपकारक गाय आदि पशुओं की हत्या होती है, उसको इनके राज्य में से छुड़वाके अति प्रसन्न होना चाहते हैं। यह हम को पूरा विश्वास है कि विद्या, धर्म, प्रजाहित प्रिय श्रीमती राजराजेश्वरी क्वीन महारानी विक्टोरिया पार्लियामेन्ट सभा तथा सर्वोपरि प्रधान आर्यावर्तस्थ श्रीमान् गवर्नर जनरल साहब बहादुर सम्प्रति इस बड़ी हानिकारक गाय, बैल तथा भैंस की हत्या को उत्साह तथा प्रसन्नतापूर्वक शीघ्र बन्द करके हम सब को परम आनन्दित करें।

 

संसार के सभी प्राणियों में केवल गोमाता का गोबर ही रोगाणुनाशक होता है। इस बारे में कहा जाता है कि चैरासी लाख योनियों के प्राणियों में गाय ही एक ऐसा प्राणी है जिसका पुरीष (गोबर) मल नहीं है, उत्कृष्ट कोटि का मलशोधक है, रोगाणु एवं विषाणुनाशक है तथा जीवाणुओं का पोषक है। इतना होने पर भी हम अनुभव करते हैं कि हमारे अंग्रेजी व अन्य शिक्षा पद्धतियों से पढ़े हुए वैदिक संस्कारविहीन लोगों को यह बातें समझ में नहीं आयेंगी क्योंकि उनका जैसी देश वैसा भेस, जैसी शिक्षा वैसी सोच के अनुसार विचारान्तरण हो चुका है। उनका यह कार्य स्वयं उनके लिए ही आत्मघाती है। इसका फल अवश्य उन्हें भोगना ही होगा। ईश्वर का कर्मफल सिद्धांत सारे संसार पर लागू है। सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग करना धर्म है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121