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ओ३म् ‘क्या देश ने महर्षि दयानन्द को उनके योगदान के अनुरूप स्थान दिया?’ -मनमोहन कुमार आर्य

महर्षि दयानन्द (1825-1883) ने भारत से अज्ञान, अन्धविश्वास आदि दूर कर इनसे पूर्णतया रहित सत्य सनातन वैदिक धर्म की पुनस्र्थापना की थी और इसे मूर्तरूप देने के लिए आर्यसमाज स्थापित किया था। वैदिक धर्म की यह पुनस्र्थापना इस प्रकार से है कि सत्य, सनातन, ज्ञान व विज्ञान सम्मत वैदिक धर्म महाभारत काल के बाद विलुप्त होकर उसके स्थान पर नाना प्रकार के अन्धविश्वास, कुरीतियां, सामाजिक असमानतायें व पाखण्डों से युक्त पौराणिक मत ही प्रायः देश में प्रचलित था जिससे देश का प्रत्येक नागरिक दुःख पा रहा था। अज्ञान व अन्धविश्वास ऐसी चीजें हैं कि यदि परिवार में एक दो सदस्य भी इनके अनुगामी हों, तो पूरा परिवार अशान्ति व तनाव का अनुभव करता है। देश की जब बहुत बड़ी जनता अन्धविश्वासों में जकड़ी हुई हो, तो फिर सारे देश पर उसका दुष्प्रभाव पड़ता ही है और ऐसा ही महर्षि दयानन्द जी के समय में हो रहा था। उनके आगमन से पूर्व वैदिक धर्म के अज्ञान व अन्धविश्वास के कारण तथा विश्व में सत्य धर्म का प्रचार न होने के कारण अविद्यायुक्त मत उत्पन्न हो गये थे जो हमारे सनातन वैदिक धर्म की तुलना में सत्यासत्य की दृष्टि से निम्नतर थे। महर्षि दयानन्द ने सत्य धर्म का अनुसंधान किया और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सृष्टि की आदि में ईश्वर से ऋषियों को प्राप्त ज्ञान ‘‘चार वेद ही वास्तविक धर्म की शिक्षायें हैं जिनका संसार के प्रत्येक व्यक्ति को आचरण करना चाहिये तभी वसुधैव कुटुम्बकम् का स्वप्न साकार होने के साथ विश्व में सुख व शान्ति स्थापित हो सकती है। स्वामी दयानन्द जी को सद्ज्ञान प्रदान कराने वाले गुरू प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा थे। उन्होंने गुरू दक्षिणा में उनसे देश से अज्ञान व अन्धविश्वास मिटाकर देश में वैदिक सूर्य को पूरी शक्ति के साथ प्रकाशित करने का दायित्व सौंपा था जिसे अपूर्व शिष्य महर्षि दयानन्द ने स्वीकार किया और उसका प्राणपण से पालन किया। इतिहास में स्वामी विरजानन्द सरस्वती जैसे गुरू और स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे शिष्य देखने को नहीं मिलते। ऐसा भी कोई महापुरूष इस देश विश्व में नहीं हुआ जिसे इतनी अधिक समस्याओं के साथ एक साथ जूझना पड़ा हो जितना की स्वामी दयानन्द जी को जूझना पड़ा।

 

स्वामी दयानन्द के समय देश धार्मिक व सामाजिक अन्धविश्वासों से गम्भीर रूप से ग्रसित था। राजनैतिक दृष्टि से भी यह स्वतन्त्र न होकर पहले मुगलों तथा बाद में अंग्रेजों का गुलाम बना। यह परतन्त्रता ईसा की आठवीं शताब्दी से आरम्भ हुई थी। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर से चार ऋषियों को आध्यात्मिक व भौतिक अर्थात् परा व अपरा विद्याओं का ज्ञान ‘‘वेद’’ प्राप्त हुआ था। सृष्टि के आरम्भ से बाद के समय में उत्पन्न सभी ऋषियों व राजाओं ने इसी वैदिक धर्म का प्रचार कर सारे संसार को अन्धविश्वासों से मुक्त किया हुआ था। लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व महाभारत काल के बाद वेदों का प्रचार प्रसार बाधित हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत में सर्वत्र अज्ञान व अन्धविश्वास फैल गया और इसका प्रभाव शेष विश्व पर भी समान रूप से हुआ। अज्ञानता व अन्धविश्वासों के परिणाम से देश में सर्वत्र मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, बाल विवाह, पुनर्विवाह न होना, सतीप्रथा, विधवाओं की दयनीय दशा, जन्मना जातिवाद, स्त्रियों व शूद्रों को वेद आदि की शिक्षा का अनाधिकार आदि के उत्पन्न होने से देश व समाज का घोर पतन हुआ। यह समय ऐसा था कि लोग धर्म के सत्यस्वरूप को तो भूले ही थे, ईश्वर व आत्मा के स्वरूप सहित अपने कर्तव्यों को भी भूल गये थे। विधर्मी हमारे बन्धुओं का जोर-जबरस्ती, प्रलोभन व नाना प्रकार के छल द्वारा धर्मान्तरित करते थे। हिन्दू समाज के धर्म गुरूओं को इसकी किंचित भी चिन्ता नहीं थी। ऐसे समय में महर्षि दयानन्द का आगमन हुआ जैसे कि रात्रि के बीतने के बाद सूर्योदय होता है।

 

महर्षि दयानन्द ने वेदों का उद्घोष कर कहा कि वेद ईश्वरीय ज्ञान सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों में कोई बात अज्ञानयुक्त असत्य नहीं है। वेद ज्ञान का उद्देश्य मनुष्यों को धर्म अधर्म तथा सत्य असत्य की शिक्षा देकर कर्तव्य अकर्तव्य का बोध कराना है। वेद विहित कर्तव्य ही धर्म तथा वेद निषिद्ध कार्य ही अधर्म कहलाते हैं। मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, अवतारवाद, बाल विवाह, अनमेल विवाह को उन्होंने वेद विरूद्ध कार्य बताया। उन्होंने पूर्ण युवावस्था में समान गुण, कर्म व स्वभाव वाले युवक युवती के विवाह को वेद सम्मत बताया। वह सबको वेद आदि शास्त्रों सहित ज्ञान व विज्ञान से पूर्ण एक समान, अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा के पक्षधर थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र वर्णो को वह गुण, कर्म व स्वभावानुसार मानते थे तथा जन्मना जाति वा जन्मा मिथ्या वर्ण व्यवस्था के प्रथम व सबसे बड़े विरोधी थे। उन्होंने देश व जाति के पतन के कारणों पर विचार व अनुसंधान किया और इसकी जड़ में उन्होंने वेद विद्या का अनभ्यास, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, बाल व अनमेल विवाह सहित बहु विवाह एवं व्यभिचार, जन्मना जाति व्यवस्था, सामाजिक असमानता आदि को कारण बताया। उन्होंने पूरे देश में एक जन आन्दोलन चलाया व अनेक कुप्रथाओं का उन्मूलन भी किया। वह आर्य भाषा हिन्दी के प्रबल समर्थक और गोहत्या सहित सभी पशुओं के प्रति हिंसा वा मांसाहार के प्रबल विरोधी थे। उन्होंने एक निराकार व सर्वव्यापक ईश्वर की उपासना का सन्देश दिया। वह त्रैतवाद के उद्घोषक थे व उन्होंने उसे तर्क, युक्ति व न्याय की कसौटी पर सत्य सिद्ध किया। ईश्वर की उपासना की सही विधि उन्होंने देश वा विश्व को दी। ईश्वर, जीव व प्रकृति के सत्य स्वरूप का भी उन्होंने अनुसंधान कर प्रचार किया। उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन कर पाया कि संसार के सभी मनुष्यों का एक ही धर्म है और वह है सत्याचरण। सत्य वह है जो वेद प्रतिपादित कर्तव्य हैं। उन्होंने वायु शुद्धि, स्वास्थ्य रक्षा और प्राणि मात्र के सुख तथा परजन्म के सुधार के लिए अग्निहोत्र यज्ञों का भी प्रचलन किया।

 

विधवा विवाह का उनके विचारों से समर्थन होता है, जो कि उन दिनों एक प्रकार से आपद धर्म था। उनकी एक मुख्य देन धार्मिक जगत में मतभेद व भ्रान्ति होने पर उसके निदान हेतु शास्त्रार्थ की प्राचीन पद्धति को पुनर्जीवित करना था। सभी मतों के विद्वानों से उन्होंने अनेक विषयों पर शास्त्रार्थ किये और वैदिक मान्तयाओं की सत्यता को देश व संसार के समक्ष सिद्ध किया। उनकी एक अन्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन शुद्धि की परम्परा को स्थापित करना था। उनके व उनके अनुयायियों के वेद प्रचार से अनेक स्वजाति व अन्य मतस्थ बन्धु प्रभावित हुए और उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक वैदिक धर्म स्वीकार किया। आजकल इस परम्परा को हमारे अनेक पौराणिक बन्धु भी अपना रहे हैं जो कि उचित ही है। शुद्धि का अर्थ है श्रेष्ठ मत व धर्म को ग्रहण करना और निम्नतर व हेय को छोड़ना। हम स्वयं पौराणिक परिवार के थे और हमने आर्यसमाज द्वारा प्रचारित वैदिक धर्म को अपनाया है। शास्त्रार्थ व शुद्धि, यह दो कार्य, महर्षि दयानन्द के हिन्दू जाति के लिए वरदान स्वरूप कार्य हैं। उनकी एक प्रमुख देन सत्यार्थ प्रकाश व इतर वैदिक साहित्य का प्रणयन है। सत्यार्थ प्रकाश तो आज का सर्वोत्तम धर्म ग्रन्थ है। जो इसको जितना अपनायेगा, उसकी उतनी ही आध्यात्मिक भौतिक उन्नति होगी। महर्षि दयानन्द व उनके अनुयायियों के प्रयत्नों के बाद भी मूर्तिपूजा जारी है जिसका बुद्धि संगत समाधान व वेदों में विधान आज तक कोई मूर्तिपूजा का समर्थक दिखा नहीं सका। अतीत में इसी मूर्तिपूजा व इन्हीं अन्धविश्वासों के कारणों से हमारा सार्वत्रिक पतन हुआ था। अन्य सभी अन्धविश्वास काफी कम हुए हैं जिससे देश में भौतिक सामाजिक उन्नति हुई है। इस सब देश समाज की उन्नति का श्रेय यदि सबसे अधिक किसी एक व्यक्ति को है तो वह हैं महर्षि दयानन्द सरस्वती। हम महर्षि दयानन्द की सभी सेवाओं के लिए उनको कृतज्ञता पूर्वक नमन करते हैं। महर्षि दयानन्द ने वेदों के आधार पर जिन कार्यों को करणीय बताया और जिन अज्ञानपूर्ण कार्यों का विरोध किया, उसे संसार का सारा बुद्धिजीवी समाज स्वीकार कर चुका है जिससे दयानन्द जी के सभी कार्यों का महत्व निर्विवाद रूप से सिद्ध है।

 

एक काल्पनिक प्रश्न मन में यह भी उठता है कि यदि महर्षि दयानन्द भारत में न आते तो हमारे समाज व देश की क्या स्थिति होती। हमने जो अध्ययन किया है उसके आधार पर यदि महर्षि दयानन्द न आते तो हमारे समाज से अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां, मिथ्याचार, व्यभिचार, जन्मना जातिवाद, सामाजिक असमानता कम होने के स्थान पर कहीं अधिक वृद्धि को प्राप्त होती। विधर्मी हमारे अधिकांश भाईयों को अपने अपने मत वा धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास करते और उसमें वह सफल भी होते, ऐसा पुराने अनुभवों से अनुमान कर सकते हैं। हिन्दू समाज में उस समय धर्मान्तरण को रोकने वाला तो कोई नेता व विद्वान था ही नहीं। इससे देश का सामाजिक वातावरण भयंकर रूप से विकृत हो सकता था। देश में स्वाधीनता के प्रति वह जागृति उत्पन्न न होती जो आर्य समाज की देन है। आर्य समाज ने आजादी में जो सर्वाधिक योगदान दिया है उसके न होने से देश के आजाद होने में भी सन्देह था। कुल मिलाकर देश की वर्तमान में जो स्थिति है उससे कहीं अधिक खराब स्थिति देश व समाज की होती। यदि महर्षि न आते तो वेद तो पूर्णतया लुप्त ही हो गये होते। योग व आयुर्वेद भी विलुप्त हो जाते या मरणासन्न होते। सच्ची ईश्वरोपासना से सारा संसार वंचित रहता। लोगों को सत्य धर्म व मत-मजहब-सम्प्रदाय का अन्तर पता न चलता। कुल मिलाकर स्थिति आज की तुलना में भयावह होती, यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है।

 

हमारे इस विवेचन से यह निष्कर्ष भी निकलता है कि महर्षि दयानन्द देश में सबसे अधिक मान-सम्मान व आदर पाने के अधिकारी हैं। इस पर भी देश के प्रभावशाली लोगों ने अपने-अपने मत, अपने अपने हितों के साधक व राजनैतिक समीकरण में फिट होने वाले इच्छित व्यक्तियों को गुण-दोष को भूलकर मुख्य माना। आर्य समाज जिसने देश को ज्ञान विज्ञान सम्मत बनाने, देश को आजादी का मन्त्र देने व अंग्रेजों से प्रताड़ना मिलने पर भी देश की स्वतन्त्रता के लिए तिल तिल कर जलने का कार्य किया व समाज से असमानता दूर करने का महनीय व महानतम कार्य किया, उसकी देश की आजादी के बाद घोर उपेक्षा की गई है। आज का समय सत्य व यथार्थवाद का न होकर समन्वयवाद व स्वार्थवाद का अधिक दिखायी देता है। सब अपने अपने विचारों व विचारधाराओं के लोगों को ही श्रेष्ठ व ज्येष्ठ मानते हैं जबकि सत्य दो नहीं केवल एक ही होता है। हम निष्पक्ष भाव से विचार करने पर भी महर्षि दयानन्द को ही देश का महानतम महापुरूष पाते हैं। स्वार्थ, अज्ञानता तथा अपने व पराये में पक्षपात करने का यह युग इस देश में कभी समाप्त होगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। यह ईश्वर का संसार और ब्रह्माण्ड है। महर्षि दयानन्द तो अपना बलिदान देकर अपना एक एक श्वास इस देश को अर्पित कर चले गये हैं। अब तक भी देश में सत्य आध्यात्मिक ज्ञान की प्रतिष्ठा न होकर हमारे हृदयों में सर्वव्यापक सच्चिदानन्द परमात्मा के स्थान पर पाषाण देवता ही विराजमान हैं। यह स्थिति भी अप्रिय है कि आज आर्य समाज संगठनात्मक दृष्टि से शिथिल पड़ गया है। यहां भी वेद विरोधी व ऋषि द्रोही स्वार्थी व्यक्तियों की कमी नहीं है जो येन केन प्रकारेण अपना प्रभुत्व कायम रखना चाहते हैं।

 

यदि हमारे सभी देशवासी महर्षि दयानन्द के दिखाये मार्ग को सर्वात्मा स्वीकार कर लेते और उस पर चलते तो आज हम संसार में आध्यात्मिक व भौतिक प्रगति में प्रथम स्थान पर होते। कोई देश हमें आंखे दिखाने की कुचेष्टा नहीं कर सकता था। परन्तु नियति ऐसी नहीं थी। आज भी देशवासी एक मत, एक भाव, एक भाषा, एक सुख दुख के मानने वाले नहीं है। यहां तक कि ईश्वर द्वारा सृष्टि के आरम्भ में दी गई संस्कृत भाषा व ईश्वरीय ज्ञान वेद भी देश व विश्व में राजनीति व हानि लाभ की दृष्टि से देखे जाते हैं। इसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। इससे समाज बलवान होने के स्थान पर कमजोर हुआ है। महर्षि दयानन्द देश को आदर्श देश व विश्व गुरू बनाना चाहते थे, उनका वह स्वप्न अधूरा है। अनुभव होता है कि इसमें अनेक शताब्दियां लग सकती है। यह सत्य है कि देश व विश्व को सुखी, सम्पन्न, समृद्ध, एक भाव व विश्व गुरू बनाने में जो मार्ग महर्षि दयानन्द ने बताया है, वही एक मात्र सही मार्ग है और उसी पर चल कर ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ का लक्ष्य प्राप्त होगा। नान्यः पन्था विद्यते अयनाय।

मनमोहन कुमार आर्य

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1965 के भारत-पाक युद्ध की पृष्ठ भूमि तथा मेरे संस्मरण -मेजर रतनसिंह यादव

  1. 1. युद्ध की पृष्ठभूमि-विशाल भारत का विखण्डन आरभ हुआ तो बर्मा, श्रीलंका आदि स्वतन्त्र राष्ट्र बनते चले गये। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति, भारत विभाजन का दुर्भाग्य पूर्ण तथा रक्त रंजित अध्याय भी 1947 के आते-आते लिख दिया गया। इसकेपश्चात् कई नवोदित राष्ट्रों में प्रजातन्त्रीय व्यवस्था से चुनी गयी सरकारों का सैनिक तानाशाहों ने तता पलट दिया। बर्मा, श्री लंका तथा विशेषकर पाकिस्तान में तो प्रधानमन्त्री की हत्या तक कर दी गयी। ऐसे में प्रधानमन्त्री पद के लालच में भारत विभाजन तक का पाप करने वाले, महात्मा गाँधी के प्रिय जवाहरलाल नेहरु को लगा कि यह चारों ओर के पड़ोसियों के घर में लगी आग कहीं मेरी कुर्सी तक न आ पहुँचे। इससे भयभीत नेहरु जी ने भारतीय सेना को वर्ष प्रति वर्ष कमजोर करने का सिलसिला आरभ कर दिया। सेनाध्यक्ष जिसका स्थान वरीष्ठता क्रम में राष्ट्राध्यक्ष गवर्नर जनरल के बाद होता था, घटाकर मन्त्रीमण्डल के सदस्यों के भी नीेचे गिरा दिया गया। रक्षा-बजट प्रतिवर्ष कम से कमतर होता गया। इसका दुष्परिणाम 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में हमारी शर्मनाक पराजय के रूप में राष्ट्र ने झेला। हमारे सैनिकों के पास द्वितीय विश्वयुद्ध कीपुरानी तकनीक की थ्री नॉट थ्री राइफलें एयूरेशन की घोर कमी, बर्फानी प्रदेश की हाड़कँपा देने वाली सर्दी से बचाव के कपड़ों का नितान्त अभाव यहाँ तक कि जूते तक न थे। ऐसे हालात में भी हमारी सेना की 13 कुमाऊँ रेजिमेंट की एक कपनी ने वीरता का जो इतिहास रचा, उसका उदाहरण विश्व के सैनिक इतिहास में दुर्लभ है। हमें गर्व है कि इस रेजांगला का स्वर्णिम इतिहास लिखने वाले हरियाणा के अहीरवाल क्षेत्र के वीर अहीर ही थे।
  2. चीनी आक्रमण के तुरन्त पश्चात् आपातकाल घोषित कर दिया अब सेना की ओर कुछ-कुछ ध्यान दिया जाने लगा। पर तीन वर्ष से भी कम समय में रक्षा बजट पर कंजूसी बरतने वाली परपरा की अयस्त सरकार अधिक कुछ न कर पायी। तब तक चीन के चेले पाकिस्तान ने सोचा, चीन की तरह हम भी भारत को पीट लेंगे, काश्मीर छीन लेंगे। पर पाकिस्तान के इरादे इसलिए सफल नही हो सके कि हमने 1962 के युद्ध से थोड़ा-बहुत सीख कर सेना को पहले से अधिक मजबूत कर लिया था। 1965 के युद्ध में हम अपनी विजय पर कितना भी गर्व करें, पर यह कोई पूरी तरह निर्णायक युद्ध न था। काश्मीर में हम भले ही लाभ की स्थिति में थे, पर सीमा के अन्य क्षेत्रों में हमें हानि भी उठानी पड़ी थी।
  3. पर काश्मीर में सेना के लहू ने जो क्षेत्र जीता लिया, उसे ताशकन्द में लिखे कागज की स्याही ने छीन लिया। जिस काश्मीर को हम भारत का अभिन्न अंग कह कर वर्षों से चिल्ला रहे थे, उस अभिन्न अंग को हमारे भीरु, दबू तथा समझौतावादी राजनैतिक नेतृत्व ने रूस के दबाव में वापिस शत्रु का अभिन्न अंग बना दिया। सेना के मनोबल पर इसका जो दुष्प्रभाव हुआ, उसे मेरे अग्रज कैप्टन नौरंग सिंह के शदों में जो उस युद्ध में सक्रिय भागीदार थे कहूँ ‘‘हम सब रोते हुए वापिस आ गये’’ अच्छा हुआ जो श्री लालबहादुर शास्त्री इस समझौते के आघात को न सह सके और अपने प्राण तक दे बैठे, वरना ताशकन्द से लौटने पर उनकी बहुत किरकिरी होती।
  4. हमारी यह अदूरदर्शी, आत्मघाती समझौतावादी परपरा सन् 1971 के शिमला समझौते में भी बनी रही। हमने तो पाकिस्तान के एक लाख के लगभग सैनिक कैदी लौटा दिये, पर अपने लगाग 50 सैनिक कैदियों को पाकिस्तान से छुड़ाना भूल गये। न जाने उनका क्या हुआ होगा। जो जुल्फिकार अलि भुट्टो शिमला में गिड़गिड़ा रहा था, वही अपनी गली में जाते ही शेर बनकर दहाड़ने लगा। ‘‘हम घास खायेंगे, पर एटमबब बनायेंगे। हिन्दुस्तान के हजार टुकड़े करेंगे, हजार वर्ष तक लड़ेंगे।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारे विदेशमन्त्री सरदार स्वर्ण सिंह को ‘इण्डियन डॉग’ तक कहकर अपने पुरखों को भी अप्रत्यक्ष रूप से गाली दी। एटम बब तो भारत से ज्यादा नहीं तो बराबर के तो बना ही लिए। और भी बनाने में लगे हुए हैं। हजार वर्ष तक लड़ने का सिलसिला चालू ही है।
  5. मेरे सेना में आने का कारण- मेरे अग्रज सूबेदार नौरंगसिंह भारत विभाजन से पूर्व की मियाँमीर की छावनी लाहौर में सेना में भरती हो चुके थे। मेरी पूज्य भाभी जी सरती देवी को फिरोजपुर, मेरठ, अबाला आदि सैनिक छावनियों में काी-कभी उनके साथ रहने का अवसर मिला। गर्मियों में स्कूल की लबी छुट्टियाँ होने पर मैं भी उनके पास चला जाया करता। फौज का जीवन मुझे काफी पसन्द आता था। शिक्षा पूर्ण कर 1961 में अपने गाँव के निकट स्थायी रूप से शिक्षक नियुक्त हो गया। 1962 में चीन ने भारत पर धोखे से अचानक आक्रमण कर दिया। देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया।ााई नौरंगसिंह अपनी बटालियन 16 पंजाब के साथ मोर्चे पर चले गये। भाभीजी घर लौट आई। मुझ से कहने लगी, ‘‘रतन! जो तू ये मास्टरी वास्टरी की नौकरी कर रहा है, ये तो जिनानियों का काम है। देश पर आपत्ति आई है। तेरा भाई कम पढ़ा लिखा है, सूबेदार बन गया। तू तो बीस वर्ष का पढ़ा लिखा जवान है। फौज में ऑफिसराी बन सकता है।’’

तत्कालीन पंजाब सरकार ने (तब हरियाणा न बना था) अपने समस्त विभागों को सर्कू लर जारी कर सेना के लिए वालिण्टियर माँगे। मैंने अपने हैडमास्टर श्री सोमदत्त जी कौशिक को प्रार्थनापत्र देकर सेना के लिए मेरा नाम भेजने का अनुरोध किया। उनका उत्तर था ‘‘इतनी ही तनखा फौज में मिलेगी (तब एक सौ रूपये थी) घर के पास की आराम की नौकरी छोड़कर क्यों मरने के लिए फौज में जाना चाहता है?’’ मुझे मध्यकालीन वीर काव्य (आल्हा-उदल) के रचियता कवि जगनिक की पंक्तियाँ याद आ गई । मैंने कहा-

‘‘बारह बरस तक कुकर जिये, और तेरह तक जिये सियार।

बरस अठारह छत्री जिये, आगे जिये को धिक्कार।।’’

हम तो मरने के लिए ही बने हैं। मेरा नाम भर्ती कार्यालय महेन्द्रगढ़ में भेज दिया। मेरी योग्यतानुसार मुझे सेना-शिक्षा कोर में हवलदार के पद पर सीधे नियुक्ति मिली।

  1. युद्ध के संस्मरण– 1965 के युद्ध के समय मुझे जालन्धर कैण्ट स्थित सप्लाई डिपो केरियर की सुरक्षा तथा युद्ध के मोर्चे से घायल होकर आने वाले सैनिकों को सैनिक अस्पताल में भर्ती कराने की जिमेदारी सौंपी गयी। मेरी सहायता के लिए पाँच नये-नये सैनिक भी थे।

अमृतसर से लाहौर जाने वाले मार्ग पर पाकिस्तान की सीमा में इच्छोगिल नहर है। इस नहर पर पाकिस्तानी सेना पक्के सीमेण्टेड बैंकरों में अमेरीकी आधुनिकतम हथियारों से सुसज्जित हमारे मुकाबले के लिए पहले से ही तैयार थी। हमारे सेना की थर्ड जाट युनिट को नहर के पार पाकिस्तानी इलाके पर कजा करने का अत्यन्त दुस्साहसपूर्ण खतरे से भरपूर चुनौती पूर्ण टास्क सौंपा गया। बहादुर जाटों ने जान हथेली पर रखकर न जाने कितना रक्त बहाकर इच्छोगिल नहर के पानी को लाल कर दिया। सफलता मिली, पर मूल्य बहुत चुकाया। रात को घायलों से भरी ट्रेन अमृतसर से जालन्धर पहुँची। मैं एबुलेंस की अस्पताल की गाड़ी, स्टेचर तथा अपने साथी सैनिकों को लेकर घायल सैनिकों को स्टेचर पर रखने लगा तो एक बहादुर जाट सैनिक को अन्धेरे में ध्यान से देखा। उसके चेहरे में गोली धँसी हुई थी। सूजन से एक आँख बन्द हो चुकी थी। उसने हाथ उठाकर मुझे राम-राम कहने का प्रयास किया। मेरी आँखों में आँसू आ टपके। धन्य है वह वीर जवान, धन्य है वह सैनिक परपरा जिसने ऐसी शोचनीय शारीरिक स्थिति में भी अभिवादन की सैनिक परपरा को स्मरण रखा। वह मार्मिक दृश्य आज भी मेरी आँखों में सजीव है।

  1. जालन्धर कैण्ट में रामामण्डी के निकट जी.टी. रोड से जाते हुए सैनिकों की गाड़ियों को आग्रहपूर्वक रोककर भोजन सामग्री, फल-फ्रूट तथा मालाओं से लादकर सिक्ख भाईयों ने राष्ट्रभक्ति का जो जोश दिखाया, वह अभूतपूर्व था। इण्डियनआर्मी जिन्दाबाद भारत माता की जय से आसमान गूंजता था। आज भले ही कुछ गिने-चुने, पाकिस्तान द्वारा बरगलाये सिक्ख युवक तथा राष्ट्र प्रेमी सिक्ख जनता द्वारा बहिष्कृत, थके माँदे, नेतृत्व तथा पद लोलुप तथाकथित नेता भारत के विरुद्ध विषवमन करें पर पंजाब तथा देश के विभिन्न भागों में सिक्खों की देशभक्ति में किसी को शक नहीं होना चाहिए। ऐसे गुमराह सिक्ख युवकों को सिक्ख जाति केगौरवपूर्ण इतिहास को स्मरण करते हुए गुरु अर्जुन देव तथा जहाँगीर, गुरु तेगबहादुर तथा औरंगजेब, गुरु गोविन्द सिंह और उनके चारों साहिबजादों तथा औरंगजेब के साथ बन्दा बहादुर और फर्रुखशयर के नाम न भूलने चाहिए। दूर इतिहास की गहराई में न जायें तो देश विभाजन के समय पाकिस्तान से विस्थापित सिक्खों के साथ जो भयानक जुल्म किये गये, उनका आँखों देखा हाल बताने वाले कितने ही आज भी जिन्दा है। कितने ही राठौर, चौहान सिक्ख राजपूत, कितने ही सेठी, बाजवा, घुमन इस्लाम कीाूनी तलवार का या तो शिकार हो गये या फिर सनम सेठी या जफर इकबाल राठौर बन गये । कोई उदाहरण है क्या जब किसी इस्लाम के अनुयायी ने विभाजन के समय अपना महजब भयभीत होकर बदला हो।

वास्तविकता यह है कि पाकिस्तान 1971 के युद्ध की पराजय का बदला, बंग्लादेश का बदला लेकर खालिस्तान का दिवास्वप्न दिखाकर सिक्ख-हितैषी होने का राजनैतिक पाखण्ड कर रहा है। अरे ये तो वही पाकिस्तानी हैं जिन्होने साझे भारत के साझे शहीदेआजम भगतसिंह के नाम पर लाहौर के चौराहे का नाम तक नहीं करने दिया। तर्क है पाकिस्तान की भूमि पर किसी गैरमुस्लिम के नाम पर कोई सड़क या स्मारक नहीं होगा।

  1. सूर्यास्त होने को था। जालन्धर कैण्ट से कुछ दूरी पहले सतलुज नदी पर रेलवे पुल है। इसी रेल मार्ग से अमृतसर तक हमारी सेनाओं को रसद पहुँचायी जाती थी। पाकिस्तान के तीन छाताधारी सैनिक पास के गन्ने के खेतों में उतर गये। योजना रेल पुल को उड़ाने की थी। गाँववालों ने कैण्ट के हैडक्वाटर को सूचना दी। रियर में तो नाम चारे के सैनिक रहते हैं। उन्हें लेकर हमने गन्ने के खेतों को घेर लिया। पाकिस्तानी छाताधारियों को चेतावनी दी गयी कि जान बचाना चाहते हो तो हथियारों से मैगजीन अलगकर, गले में डालकर, हाथ ऊपर कर आत्म समर्पण कर दें। पहले दो चेतावनियाँ निष्फल रही। अन्त में तीसरी बार मशीनगनों से गन्ने के खेतों के छलनी करने का आर्डर सुनते ही एक लबा-चौड़ा पाकिस्तानी ऑफिसर निर्देश का पालन करते हुए बाहर आ गया। हमारे ऑफिसर ने उसके हथियार लेकर आँखों पर पट्टी तथा दोनों हाथ पीछे की ओर बाँध कर सड़क पर खड़ी जीप की ओर ले चले। कुछ तो मार्ग उबड़-खाबड़ था, कुछ आँखें बन्धी थी, तो कुछ बेचारा घबराया हुआ, धीरे-धीरे चल रहा था। हमारे मिलट्री-पुलिस के एक जवान ने उसे आगे धकेलते हुए पीठ पर एक घूंसा मार दिया। हमारे ऑफिसर ने उस मिलेट्री-पुलिस के जवान को बुरी तरह डाँटा कहा कि कैदी के साथ भी इन्सानियत का बर्ताव करना चाहिए। यह है हमारी संस्कृति और मानवता। दूसरी ओर हमारे कारगिल में कैद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के साथ जिस दरिन्दगी और पाशविकता का बर्ताव किया, उसकी गूँज अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय तक गूँज रही है। कैप्टन कालिया का मृत शरीर जब लौटाया तो उसकी अगुंलियों के नाखून तक न थे। उस वीर के कान में गोली मारी गयी थी। जुल्म करने के निकृष्टतम तरीके तो शायद पाकिस्तानी सेना को ट्रेनिंग में सिखाये जाते हैं।
  2. युद्ध के कारण अचानक सेना को बहुत बड़ी संया में सीमा पर आना पड़ा था। सप्लाई डिपो जालन्धर से स्थान्तरित कर सीमा के कुछ निकट यास आ चुका था। खाद्य सामग्री भण्डारण के लिए फील्ड टैण्ट भी पर्याप्त न थे। ऐसे में हमारे कमाण्डिग ऑफिसर लेटिनेन्ट कर्नल ए.के.गुहा ने बाबा राधास्वामी जी से प्रार्थना की। बाबा जी ने कहा-‘‘सारा डेरा आपके आधीन है। डेरा देश से बड़ा नहीं है।’’ हमने डेरा के कमरों में फौज का राशन भर दिया। युद्ध की समाप्ति पर वापिस जालन्धर लौटने से पहले बाबा जी का आभार व्यक्त करने सभी आँफिसर तथा जवान गये। बाबा ने आशीर्वाद दिया।
  3. सितबर मास आ गया है। सरकार गर्व से 1965 के युद्ध के पचास वर्ष पूरे होने पर विजय समारोह आयोजन करने जा रही है। पूर्व सैनिकों ने इस आयोजन के बहिष्कार की घोषणा पहले ही कर दी है, तो आयोजन हमारे वीर शिरोमणि मन्त्री करेंगे। दूसरी ओर इतने वर्षों में उस युद्ध में प्राण गँवाने वाले कितने ही सैनिकों की वीरागनाएँ तो अपने शहीद पतियों के पास कभी की जा चुकी है। बची-खुची भी इस बहरी सरकार के कानों तक आवाज पहुँचने तक जानी ही है। वे आज के पेंशन प्राप्त कर्त्ताओं की तुलना में एक चौथाई पेंशन पर अपनी वृद्धावस्था ढो रही हैं। हमारे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और खजाना मन्त्री श्री जेटली के पास जमू काश्मीर सरकार के लिए विशेष पैके ज के लिए एक लाख करोड़ रूपये तो हैं पर पूर्व सैनिकों तथा उनकी विरांगनाओं के लिए मात्र 9100 करोड़ ही हैं। हमारे आदरणीय प्रधान मन्त्री को जब भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमन्त्री पद का उमीदवार घोषित किया तो उनकी पहली रैली रेवाड़ी में पूर्व-सैनिकों तथा अर्द्धसैनिक बलों ने आयोजित की थी। ऐसी रैली न भूतो नाविष्यति। मोदी जी ने वचन दिया ‘एक रैंक एक पेंशन’ मिलेगी। हमारे आदरणीय जनरल वी.के.सिंह भी मंच पर विराजमान थे। आज डेढ वर्ष होने को आया- न तो मोदी जी को अपने वचन याद रहे, न जनरल वी.के.सिंह को उन्हें याद दिलाने की फुर्सत है- मन्त्री जो बन गये। इसका नाम तो है-राजनीति पर है यह राज कुनीति-कुरीति।

हमारे माननीय सांसद पाँच वर्ष में कितने दिन संसद में उपस्थित रहे? संसद में आये तो क्या राष्ट्र हित के बिलों पर बहस में कितनों ने भाग लिया? क्या कभी प्रश्न पूछा? अपने इलाके क ी भलाई की कितनों ने माँग उठाई् कई तो दूरदर्शन पर निद्रा लाभ लेते हुए दिखाये जाते हैं। संसद का कोई कर्तव्य पूरा किये बिना अच्छा भला वेतन, पेंशन तथा अन्य सुख-सुविधाऐं लेना न भूले। बात बिना बात संसद ठप्प करने वाले हमारे सांसद के वल एक बात को सर्वसमति से हाथ उठाकर एक मिनट में पास कर देते हैं- वह बिल है-सांसदों की वेतन वृद्धि तथा पेंशन वृद्धि।

सेना तो बहुत दूर की बात है संसद के दरवाजे पर प्राण देने वाले जवानों तक को कितना महत्व दिया, सब जानते हैं।

इंग्लैण्ड की महारानी का बेटा अफगानिस्तान के मोर्चे पर वर्षों से अपने देश के समान के लिए लड़ रहा है। है कोई हमारे 68 वर्ष के इतिहास में ऐसा उदाहरण जब किसी प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति, राज्यपाल, या मन्त्री का बेटा भारत माता की रक्षा हेतु युद्ध क्षेत्र में गया हो। सभाओं में नारा लगायेंगे-जय जवान जय किसान। पर काम होगा- मर जवान – मर किसान।

वैसे भी सेना का एक जवान सरहद पर मरता है तो अप्रत्यक्ष रूप से एक किसान भी मरता है, क्योंकि मरने वाला एक किसान का बेटा है किसी राजनेता का नहीं।

अन्त में मैं हमारे देश के सभी नेताओं को नीति शास्त्र के प्रकाण्ड पंडित चाणक्य के शब्दों  को याद दिलाना चाहता हॅूँ जिसकी नीति ने एक साधारण बालक चन्द्रगुप्त को भारत का सम्राट बनाया था।

‘‘चन्द्रगुप्त! जिस दिन सेना तुम से अपने अधिकारों की माँग करने लग जाये, उस दिन तुहारे साम्राज्य का पतन आरभ हो जायेगा।’’

कोई सुन रहा है क्या?

शिक्षा – योगेन्द्र दमाणी

जब से मैंने क, ख, ग, घ, सीखा है तब से मैं यह सुनता आया हूँ कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह शायद ठीक ही  है। शायद शब्द का व्यवहार इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरा यह सौभाग्य कम हो पाया कि उस प्रधानता को मैं देख सकूँ। इतने बड़े देश में सब तरह के कार्य होते हैं और किसी एक को कम या अधिक रूप में देखना उचित भी नहीं। हर एक से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। जैसे कृषि को ही लें। खेतालिहानों में हम पाते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता के साथ कृषि का कार्य करते हुए बड़े होते हैं उन्हें कृषि सिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। बहुत कम अक्षरी शिक्षा में भी ये लोग अपना जीवन-निर्वाह कर लेते थे, अब भी कर लेते हैं। कुछ ऐसा माहौल बनाया या बिगाड़ा गया कि अक्षरी शिक्षा का भूत इन पर भी सवार कराया जाने लगा और अब वो आत्महत्या करते हुए पाए जा रहे हैं। (कारण कुछ और भी हो सकते हैं।) हमारे यहाँ शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षरी शिक्षा के ज्ञान को ही माना जाने लगा। शिक्षा का मतलब ए, बी, सी, डी, ही हो गया। लोहार के बेटे को यह बताने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी कि लोहे को पीटा कैसे जाता है, यह तो वह परिवार के साथ काम करते हुए स्वयं ही सीख जाता था। इसी तरह बुनकर, बढ़ई या और कोई भी अन्य हाथ से काम करने वाले के लिए भी यही बात लागू थी। भारत सोने का देश था क्योंकि सामान्य ज्ञान और शिल्पकला की वजह से लोग अपने सीमित दायरे में रहते हुए संचय क रते थे और जीवन खुशी से व्यतीत करते थे। आज सब तरफ त्राहि-त्राहि हो रही है। शिल्पविद्या की शिक्षा पर फिर से बल दिया जा रहा है। क्योंकि हम पहले गलत दिशा में चलते हैं और फिर सुधार के कार्यक्रम लागू करते हैं। जब बच्चे अपने या अपने आसपास के लोगों के साथ जीविकोपार्जन की शिक्षा लेते थे तब उनक ो हमारे तथा कथित सय समाज ने बाल मजदूरी का नाम दे दिया। इस दिशा में कार्य करने वालों की भावना अच्छी थी  कि नहीं, उनके पास ऐसे कार्यों को करने या करवाने के  पीछे किनका-किनका या किसका हाथ था, है यह तो इतिहास बतायेगा परन्तु यह सत्य है इसी एक मुद्दे ने इस देश से शिल्पकला रूपी स्वर्णिम भारत को हमसे छीन लिया। अक्षरी शिक्षा के नाम पर हजारों स्कूल और कॉलेज खोले गये। हर चीज से कुछ न कुछ लाभ होता ही होगा लेकिन इनकी हानि भी अब नजर आने लगी है और इस इन्टरनेट के जमाने में जब सब कुछ आन-लॉइन है तब तो अब के अध-पढ़े युवक-युवतियाँ तो अधर में ही है। सारा काम अब प्लास्टिक मनी कर देगी । किसी को किसी की आवश्यकता नहीं। सारे बाजार बन्द। घर से निकलना बन्द। यह आधुनिकता की हद है सुना है कि जापान का बच्चा, बचपन से ही छोटी-मोटी मोटर या अन्य यन्त्र बना लेता है क्योंकि वह बचपन से इन चीजों को करता है। (जिसे हम चाइल्ड-लेबर कहते हैं।) उसे अंग्रेजी सीखने के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता वह तो अपना समय शिल्पविद्या विकसित करने में लगाता है। चीनी आज किसी का मुहताज नहीं क्योंकि हर आदमी की चाहत कम है हर हाथ शिल्पकला का हाथ है और इस कारण उन्हें कम लागत पर सामान विकसित करना आ गया और इसलिए वे पूरे विश्व में छाते जा रहे हैं।

मैं अभी कुछ दिन पहले अमेरिका में था। वहाँ के मूल लोगों को अपनी भाषा के अलावा कोई और भाषा आती ही नहीं। वह चाहे अंग्रेजी हो या स्पेनिश। वहाँ भी बचपन से बच्चे काम करते देखे जा सकते हैं। चाइल्ड-लेबर का वहाँ कोई ऐतराज नहीं। क्योंकि अल्प शिक्षा पर भी वो अपना जीवन बड़े आराम से व्यतीत कर लेते हैं। दुनिया के किसी अन्य कोने में क्या हो रहा है या नहीं यह जानकारी उन्हें हो या न हों किन्तु अपने कार्य में  वे दक्ष हैं और इसका एकमात्र कारण है कि बचपन से खेलते-खेलते हुए वे पा लेते हैं अपने जीवन यापन की जानकारी में प्रगाढ़ता। यह नहीं है कि भारत पहले ऐसा ही था। हमारा अध्यात्म तो उनसे कई गुना आगे है किन्तु ‘जब अपने ही घर को आग लग गई अपने चिराग से’ तो कोई क्या क रे । हमने आध्यात्म की शिक्षा बिल्कुल छोड़ दी। चार आश्रमों के  आधार पर 25 वर्षों तक शिक्षा तत्पश्चात् गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर संन्यास। यहाँ शिक्षा का गूढ़ अर्थ था (शिक्षा, जिससे विद्या, सयता, धर्मात्मता, जितेन्द्रियता आदि की बढ़ती होवे और उनसे अविद्या आदि दोष छूटें। उसी को शिक्षा कहते हैं- महर्षि दयानन्द सरस्वती) अक्षरी शिक्षा के साथ-साथ जिनका जो कार्य था वह माता-पिता अपने बच्चों को वही ज्ञान, या उसके लगाव वाला ज्ञान देते-देते उसे इतना दक्ष  बना देते थे कि वह गृहस्थ का भार बड़े आराम से उठा सकता था। यदि इस 25 वर्ष की अवधि को सब अपनाते तो कोई बेरोजगारी नहीं होती। पचास वर्ष का होने पर व्यक्ति समाज सेवा में लगते और अन्तिम पच्चीस पूरे विश्व के साथ-साथ अध्यात्म के लिए समर्पित होता। गृहस्थ इसका (समस्त आश्रमियों का) पूरा भार उठाता था। आज रिटायर करना पड़ता है, होते नहीं हैं। यह नहीं सोचते कि अगर आप रिटायर नहीं होंगे तो एक युवक का भाग्य आप छीन रहे हैं और इसका प्रतिफल या तो रोगों में या अवसाद आदि में आखिर तो मिलेगा ही। यह पहला या आखिरी जीवन नहीं, इसका कारण ये अक्षरी शिक्षा का तांडव है जो कि जानबूझकर हमारे समाज को विघटित करने एवं कराने के उद्देश्य से विदेशी षडयन्त्रों के रूप में हमारे अपनों द्वारा कराया जाता है। आप कोई भी इस तरह के  कार्य में जिससे आपकी संस्कृति बिखरती है लग जाइए आप को कोई न कोई विदेशी पुरस्कार तो पुकार ही लेगा।

शिक्षा पद्धति को सही दिशा में ले जाना है तो इस मानसिकता से हमें हटना होगा कि चाइल्ड लेबर कुछ होता है। हम अगर लेबर से मुंह मोड़ने लगे तो सिर्फ  और सिर्फ बेरोजगार ही दिखेगा। हर अक्षरी शिक्षा के पण्डित को भी हाथ के  हुनर जानने वाले की आवश्यकता अवश्य पड़ती है। तो उसकी कीमत ज्यादा और हुनर वाले की कीमत कम क्यों? यदि इस कीमत के  फासले को कम कर दिया जाय तो फिर से लोग हस्तकला सीखने के लिए प्रेरित हो जाएंगे। शिक्षा वह भी है और यह भी -यह मूलमन्त्र है। सिर्फ स्कूलों, कॉलेजों की डिग्री काम करने का ठप्पा का ही महत्व तो नहीं होना चाहिए। इन डिग्री देने वालों को पहले तो किसी बिना डिग्री वाले ने ही दी होगी। इसमें जब कोई सन्देह नहीं तो फिर उसी से हम बैर क्यों कर बैठे। अंग्रेजी शिक्षा ने क्लर्क  तो बहुत उत्पन्न कर दिये जो नौकरिया करने के लिए तत्पर हैं। महीने का मेहनताना मिल जाय बस। कोई यह भी नहीं सोचता कि हम उतना नौकरी देने वाले को दे या पा रहे हैं कि नहीं। किसी क्लर्क को आप रख कर देखिए। वह काम ठीक से करे या न करे। तन्खाह तो उसे सही समय पर चाहिए ही। हमने भी ऐसे अनगिनत कानून बना डाले कि नौकरी देने वाला ही व्यावहारिक रूप में मानो सबसे बड़ा गुनाहगार हो। इस मानसिकता से हटे बिना हम विदेशी शिकन्जे में फँसे रहेंगे। हम कमजोर रहें, अपनी संस्कृति से दूर रहें-यही उनकी नीति रही है। आज व्यवसाय वाले के सामने अनगिनत व्यवधान डाले जाते हैं। जहाँ अक्षरी शिक्षा नीति के कारण हजारों लोग बेरोजगार हैं, (जिसमें उनका दोष नहीं) वहाँ इतने कानून कि कुछ शुरुआत के पहले आप उन कानूनों को कैसे पालन करेंगे यही दिमाग खराब कर देता है। इस शिक्षा नीति ने हमें या तो सिर्फ राईट या सिर्फ लेट कर दिया है। समन्वय का इसमें अवसर ही नहीं है। कारोबार करने वाले और उसमें काम करने वाले दोनों का सही समन्वय भी तो आवश्यक है। किसी कारखाने के बन्द होने में दोनों पक्ष कहीं न कहीं उत्तरदायी होते हैं। बंगाल तो इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यहाँ काम करने वाला समय के बाद पहुँचता है और जल्दी जाने की चेष्टा करता है। पैसे देने वाला भी जितना देर से व जितना कम दे सके यही सोचता है। वह भी क्या करे उधार ने जीवन तबाह कर रखा है। सब कुछ इतना उलट-पुलट क्यों हो रहा है इसे विचारने की आवश्यकता है। गूढ़ता में खोजने पर गलत शिक्षा, आध्यात्म रहित शिक्षा, हस्तकला रहित शिक्षा, अत्यधिक भौतिकता, कानून की गलत धाराएँ चारों ओर यही सब नजर आएँगे। हुनर की शिक्षा के स्कूल खोलिए, प्रेक्टिकल काम करने का मौका विकसित कराइये बचपन से ही। बच्चों को बढ़ई, लोहार, कुहार राजमिस्त्री, वैद्य, मैकनिक, कृषि आदि की डिग्री भी दीजिए। जो अक्षर ज्ञान चाहे उनके लिए वो और जो ये सब चाहें उनको ये। बच्चे सही शिक्षा प्राप्त कर सकें इसके उपाय करने की नितान्त आवश्यकता है। सिर्फ हमारी आज की कथित अक्षरी शिक्षा से समन्वय नहीं होगा। अति सर्वत्र वर्जयेत।

 

ईश्वर को प्राप्त करने की सरल विधि क्या है’ -मनमोहन कुमार आर्य

प्रत्येक व्यक्ति सरलतम रूप में ईश्वर को जानना व  उसे प्राप्त करना चाहता है। हिन्दू समाज में अनेकों को मूर्ति पूजा सरलतम लगती है क्योंकि यहां स्वाध्याय, ज्ञान व जटिल अनुष्ठानों आदि की आवश्यकता नहीं पड़ती। अन्य मतों की भी कुछ कुछ यही स्थिति है। अनेक मत वालों ने तो यहां तक कह दिया कि बस आप हमारे मत पर विश्वास ले आओ, तो आपको ईश्वर व अन्य सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। बहुत से भोले-भाले लोग ऐसे मायाजाल में फंस जाते हैं परन्तु विवेकी पुरूष जानते हैं कि यह सब मृगमरीचिका के समान है। जब रेगिस्तान की भूमि में जल है ही नहीं तो वह वहां प्राप्त नहीं हो सकता। अतः धार्मिक लोगों द्वारा अपने भोले-भाले अनुयायियों को बहकाना एक धार्मिक अपराध ही कहा जा सकता है। दोष केवल बहकाने वाले का ही नहीं, अपितु बहकने वाले का भी है क्योंकि वह संसार की सर्वोत्तम वस्तु ईश्वर की प्राप्ति के लिए कुछ भी प्रयास करना नहीं चाहते और सोचते हैं कि कोई उसके स्थान पर तप व परिश्रम करे और उसे उसका पूरा व अधिकतम लाभ मिल जाये। ऐसा पहले कभी न हुआ है और न भविष्य में कभी होगा। यदि किसी को ईश्वर को प्राप्त करना है तो पहले उसे उसको उसके यथार्थ रूप में जानना होगा। उस ईश्वर  व जीवात्मा के यथार्थ स्वरूप को जानकर या फिर किसी सच्चे विद्वान अनुभवी वेदज्ञ गुरू का शिष्य बनकर उससे ईश्वर को प्राप्त करने की सरलतम विधि जानी जा सकती है। इस कार्य में हम आपकी कुछ सहायता कर सकते हैं।

 

ईश्वर व जीवात्मा को जानने व ईश्वर को प्राप्त करने की सरलतम विधि कौन सी है और उसकी उपलब्घि किस प्रकार होगी? इसका प्रथम उत्तर है कि इसके लिए आपको महर्षि दयानन्द व आर्यसमाज की शरण में आना होगा। महर्षि दयानन्द ने वेदों के आधार पर अपने ग्रन्थों में ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के सत्य व यथार्थ स्वरूप का वर्णन किया है जिसे स्वयं पढ़कर जानना व समझना है। यदि यह करने पर जिज्ञासु को कहीं किंचित भ्रान्ति होती है तब उसे किसी विद्वान से उसे जानना व समझना है। उपासक को महर्षि दयानन्द की उपासना विषयक मान्यताओं व निर्देशों को अच्छी तरह से समझ कर पढ़ना व अध्ययन करना चाहिये। इस कार्य में महर्षि दयानन्द के सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका, आर्याभिविनय, पंच महायज्ञ विधि, आर्योद्देश्यरत्नमाला, व्यवहारभानु आदि पुस्तकें सहायक हो सकती हैं। आईये, इसी क्रम में ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति के यथार्थ स्वरूप को जानने का प्रयास करते हैं।

 

जीवात्मा को ईश्वर के उपकारों से उऋण होने तथा जन्म मरण से मुक्ति के लिए ईश्वर की उपासना करनी है अतः इन दोनों सत्ताओं के सत्य स्वरूप उपासक को विदित होने चाहिये नहीं तो भ्रान्तियों में पड़कर उपासक सत्य मार्ग का चयन नहीं कर सकता। पहले ईश्वर का वेद वर्णित स्वरूप जान लेते हैं। सत्यार्थ प्रकाश के स्वमन्तव्यअमन्तव्य प्रकाश में महर्षि दयानन्द ने ईश्वर के स्वरूप वा गुण, कर्म व स्वभाव को संक्षेप में बताते हुए लिखा है कि जिसके ब्रह्म परमात्मा आदि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिस के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं। जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त है, उसी को परमेश्वर मानता हूं। ईश्वर के इस स्वरूप का उपासक को बार बार विचार करना चाहिये और एक एक गुण, कर्म, स्वभाव व लक्षण को तर्क वितर्क कर अपने मन व मस्तिष्क में अच्छी तरह से स्थिर कर देना चाहिये। जब इन गुणों का बार बार विचार, चिन्तन व ध्यान करते हैं तो इसी को उपासना कहा जाता है। उपासना की योग निर्दिष्ट विधि के लिए महर्षि पंतजलि का योग दर्शन भी पूर्ण सावधानी, तल्लीनता व ध्यान से पढ़ना चाहिये जिससे उसमें वर्णित सभी विषय व बातें बुद्धि में स्थित हो जायें। ऐसा होने पर उपासना व उपासना की विधि दोनों का ज्ञान हो जाता है। ईश्वर के स्वरूप व उपासना विधि के ज्ञान सहित जीवात्मा को अपने स्वरूप के बारे में भी भली प्रकार से ज्ञान होना चाहिये। जीव का स्वरूप कैसा है? आईये इसे ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव के आधार पर निश्चित कर लेते हैं। ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप है तो जीव भी सत्य व चेतन स्वरूप वाला है। ईश्वर में सदैव आनन्द का होना उसका नित्य, शाश्वत् व अनादि गुण है परन्तु जीव में आनन्द नहीं है। यह आनन्द जीव को ईश्वर की उपासना, ध्यान व चिन्तन से ही उपलब्ध होता है। उपासना का प्रयोजन भी यही सिद्ध होता है कि ईश्वरीय आनन्द की प्राप्ति व उसकी उपलब्धि करना। ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव पवित्र हैं परन्तु जीव को ज्ञान के लिए माता-पिता व आचार्य के साथ वैदिक साहित्य के अध्ययन की आवश्यकता होती है, तब यह कुछ कुछ पवित्र बनता है। वह मनुष्य भाग्यवान है कि जिसके माता-पिता व आचार्य धार्मिक हों व वैदिक विद्या से अलंकृत हों। धार्मिक माता-पिता व आचार्य के सान्निध्य व उनसे शिक्षा ग्रहण कर ही कोई मनुष्य पवित्र जीवन वाला बन सकता है, अन्यथा नहीं। हमारा आजकल का समाज इसका उदाहरण है जिसमें माता-पिता व आचार्य धार्मिक व वैदिक विद्वान नहीं है, और इसी कारण समाज में भ्रष्टाचार, अनाचार व दुराचार आदि देखें जाते हैं। आजकल के माता-पिता व आचार्य स्वयं सत्य व आध्यात्मिक ज्ञान से हीन है, अतः उनकी सन्तानों व शिष्यों में भी सत्य वैदिक आध्यात्मिक ज्ञान नहीं आ पा रहा है। इसका हमें एक ही उपाय व साधन अनुभव होता है और वह महर्षि दयानन्द व वेद सहित प्राचीन ऋषि-मुनियों के ग्रन्थों एवं वेदांगों, उपांगों अर्थात् 6 दर्शन तथा 11 उपनिषदों सहित प्रक्षेप रहित मनुस्मृति आदि का अध्ययन है। इन्हें पढ़कर मनुष्य ईश्वर, जीवात्मा व संसार से संबंधित सत्य ज्ञान को प्राप्त हो जाता है। महर्षि दयानन्द ने ईश्वर को वेद के आधार पर सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त बताया है। इस पर विचार करने से जीवात्मा अल्पज्ञ, सूक्ष्म एकदेशी बिन्दूवत आकार वाला, सर्वव्यापक ईश्वर से व्याप्य, अनुत्पन्न, अल्पशक्तिमान, दया-न्याय गुणों से युक्त व मुक्त दोनों प्रकार के स्वभाव वाला, ईश्वरकृत सृष्टि का भोक्ता और ज्ञान व विज्ञान से युक्त होकर अपनी सामर्थ्य से सृष्टि के पदार्थों से नाना प्रकार के उपयोगी पदार्थों की रचना करने वाला, कर्म करने में स्वतन्त्र परन्तु उनके फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था के अधीन आदि लक्षणों वाला जीवात्मा है। इस प्रकार से विचार करते हुए हम जीवात्मा के अन्य गुणों को भी जान सकते हैं क्योंकि हमारे सामने कसौटी वेद, आप्त वचन व ईश्वर का स्वरूप आदि हैं तथा विचार व चिन्तन करने की वैदिक चिन्तन पद्धति है। सृष्टि में तीसरा महत्वपूर्ण पदार्थ प्रकृति है जो कारणावस्था में अत्यन्त सूक्ष्म तथा सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था है। ईश्वर इसी प्रकृति को अपनी सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता से पूर्व कल्पों की भांति रचकर स्थूलाकार सृष्टि करता है जिसमें सभी सूर्य, ग्रह व पृथिवी तथा पृथिवीस्थ सभी भौतिक पदार्थ सम्मिलित हैं।

 

अब ईश्वर को प्राप्त करने की विधि पर विचार करते हैं। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए जीवात्मा को स्तुति, प्रार्थना सहित सन्ध्या-उपासना कर्मों व साधनों को करना है। महर्षि दयानन्द ने दो सन्ध्या कालों, रात्रि व दिन तथा दिन व रात्रि की सन्धि के कालों में सन्ध्या-उपासना को करने के लिए सन्ध्यायेपासना की विधि भी लिखी है जिसको जानकर सन्ध्या करने से लाभ होता है। इस पुस्तक की उन्होंने संक्षिप्त भूमिका दी है। सन्ध्या के मन्त्र व उनके अर्थ देकर उन्होंने जो सन्ध्या करने का विधान लिखा है, उसे सभी मनुष्यों को नियतकाल में यथावत करना चाहिये। सन्ध्या अन्य नित्य कर्मों, दैनिक अग्निहोत्र, पितृ यज्ञ, अतिथि यज्ञ एवं बलिवैश्वदेव यज्ञ को करने का फल यह है कि ज्ञान प्राप्ति से आत्मा की उन्नति और आरोग्यता होने से शरीर के सुख से व्यवहार और परमार्थ कार्यों की सिद्धि का होना। इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं। इनको प्राप्त होकर मनुष्यों का सुखी होना उचित है। सन्ध्या के समापन से पूर्व समर्पण का विधान करते हुए उपासक को ईश्वर को सम्बोधित कर सच्चे हृदय से कहना होता है कि हे ईश्वर दयानिधे ! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः। इसका अर्थ कर वह कहते हैं कि सन्ध्या के मन्त्रों व उनके अर्थों से  परमेश्वर की सम्यक् उपासना करके आगे समर्पण करें कि हे ईश्वर दयानिधे ! आपकी कृपा से जो जो उत्तम काम हम लोग करते हैं, वह सब आपके समर्पण हैं। हम लोग आपको प्राप्त होके धर्म अर्थात् सत्य व न्याय का आचरण, अर्थ अर्थात् धर्म से पदार्थों की प्राप्ति, काम अर्थात् धर्म और अर्थ से इष्ट भोगों का सेवन तथा मोक्ष अर्थात् सब दुःखों से छूटकर सदा आनन्द में रहना, इन चार पदार्थों की सिद्धि हमको शीध्र प्राप्त हो। मोक्ष जन्म व मरण के चक्र से छूटने को कहते हैं। मोक्ष की पहली शर्त है कि उपासना व सत्कर्मों को करके ईश्वर का साक्षात्कार करना व जीवनमुक्त जीवन व्यतीत करना। बिना ईश्वर का साक्षात्कार किये मोक्ष वा जन्म मरण से मुक्ति प्राप्त नहीं होती। अतः गौण रूप से समर्पण में यह भी कहा गया है कि ईश्वर हमें अपना दर्शन वा साक्षात्कार कराये और हम जन्म-मरण से मुक्त भी हों। ईश्वर का साक्षात्कार होने पर मनुष्य जीवनमुक्त का जीवन व्यतीत करता है और मृत्यु आने पर जन्म-मरण से छूट जाता है।

 

वेद ईश्वरीय ज्ञान है जो ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को दिया था। ईश्वरीय ज्ञान वेद के हम 3 मन्त्र पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनों मन्त्र ऋग्वेद के दसवें मण्डल के हैं। मन्त्र हैं- अहम्भुवं वसु नः पूव्र्यस्पतिरहं धनानि संजयामि शश्वतः। मां हवन्ते पितरं जन्तवोऽहं दाशुषे विभजामि भोजनम्।1, दूसरा मन्त्रअहमिन्द्रो पराजिग्य इद्धनं मृत्यवेऽवतस्थे कदाचन। सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु मे पूरवः सख्ये रिषाथन।2 तीसरा मन्त्रअहं दां गृणते पूव्र्य वरवहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम्। अहं भुवं यामानस्य चोदितायज्वनः साक्षि विश्वरिमन्भरे।3 इन तीनों मन्त्रों के अर्थ हैं प्रथम मन्त्र- ईश्वर सब को उपदेश करता है कि हे मनुष्यों ! मैं ईश्वर सब के पूर्व विद्यमान सब जगत् का पति हूं। मैं सनातन जगत्कारण और सब धनों का विजय करनेवाला और दाता हूं। मुझ ही को सब जीव, जैसे पिता को सन्तान पुकारते हैं, वैसे पुकारें। मैं सब को सुख देनेहारे जगत् के लिये नानाप्रकार के भोजनों का विभाग पालन क लिये करता हूं।1। मैं परमैश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाशक हूं। कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं। मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं। सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो। हे जीवो ! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझ से मांगो और तुम लोग मेरी मित्रता से पृथक मत होओ।2। हे मनुष्यों ! मैं सत्यभाषणरूप स्तुति करनेवाले मनुष्य को सनातन ज्ञानादि धन को देता हूं। मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करनेहारा और मुझको वह वेद यथावत् कहता, उससे सब के ज्ञान को मैं बढ़ाता, मैं सत्पुरुष का प्रेरक, यज्ञ करने हारे को फल प्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है, उस सब कार्य का बनाने और धारण करनेवाला हूं। इसलिये तुम लोग मुझ को छोड़ कर किसी दूसरे को मेरे स्थान में मत पूजो, मत मानो और मत जानो।3 इन मन्त्रों को प्रस्तुत करने का हमारा अभिप्रायः पाठको को कुछ वेद मन्त्रों व उनके अर्थों से परिचित कराना है। सृष्टि की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु ईश्वरीय ज्ञान वेद का सभी को प्रतिज्ञापूर्वक नित्य प्रति स्वाध्याय करना चाहिये।

 

मनुष्य जब ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व ध्यान-उपासना करते हुए ईश्वर में मग्न हो जाता है तो समाधि के निकट होता है। कालान्तर में ईश्वर की कृपा होती है और जीवात्मा को ईश्वर का प्रत्यक्ष वा साक्षात्कार होता है। इसका वर्णन करते हुए उपनिषद में कहा गया है कि जिस पुरुष के समाधियोग से अविद्यादि मल नष्ट हो गये हैं, जिसने आत्मस्थ होकर परमात्मा में चित्त को लगाया है, उसको जो परमात्मा के योग का सुख होता है, वह वाणी से कहा नहीं जा सकता। क्योंकि उस आनन्द को जीवात्मा अपने अन्तःकरण से ग्रहण करता है। उपासना शब्द का अर्थ समीस्थ होना है। अष्टांग योग से परमात्मा के समीपस्थ होने और उस को सर्वव्यापी, सर्वान्तर्यामीरूप से प्रत्यक्ष करने के लिये जो जो काम करना होता है, वह वह करना चाहिये। यहां हम पुनः दोहराना चाहते हैं कि उपासना में सफलता के लिए महर्षि दयानन्द के सभी ग्रन्थों में स्तुति-प्रार्थना-ध्यान-उपासना के सभी प्रसंगों को ध्यान से देखकर उसे अपनी स्मृति में स्थापित करना चाहिये और तदवत् आचरण करना चाहिये।

 

उपासक वा योगियों को ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उपासना करते समय कण्ठ के नीचे, दोनों स्तनों के बीच में और उदर से ऊपर जो हृदय देश है, जिसको ब्रह्मपुर अर्थात् परमेश्वर का नगर कहते हैं, उसके बीच में जो गर्त है, उसमें कमल के आकार का वेश्म अर्थात् अवकाशरूप एक स्थान है और इसके बीच में जो सर्वशक्तिमान् परमात्मा बाहर भीतर एकरस होकर भर रहा है, यह आनन्दस्वरूप परमेश्वर उसी प्रकाशित स्थान के बीच में खोज करने से मिल जाता है। दूसरा उसके मिलने का कोई उत्तम स्थान वा मार्ग नहीं है। यह शब्द महर्षि दयानन्द ने स्वानुभूति के आधार पर लिखे हैं। तर्क से भी यह सत्य सिद्ध हैं। अतः उपासक को इस प्रकार से उपासना करनी चाहिये जिसका परिणाम शुभ होगा और सफलता भी अवश्य मिलेगी।

 

यह भी विचारणीय है कि सभी मत मतान्तरों के अनुयायी भिन्न भिन्न प्रकार से उपासना व पूजा आदि करते हैं। क्या उन्हें उन्हें ईश्वर की प्राप्ति होती है वा नहीं? विचार करने पर हमें लगता है कि उससे लाभ नहीं होता, जो लाभ होता है वह उनके पुरूषार्थ तथा प्रारब्घ से होता है। ईश्वर के यथार्थ ज्ञान तथा योग दर्शन की विधि से उपासना किये बिना किसी को ईश्वर की प्राप्ति व धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की सिद्धि प्राप्त नहीं होती, यह स्वाध्याय व चिन्तन से स्पष्ट होता है। अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए सभी को वैदिक धर्म व वैदिक उपासना पद्धति का ही आश्रय लेना उचित है। यही ईश्वर प्राप्ती की एकमात्र सरल विधि है। अन्य प्रकार से उपासना से ईश्वर प्राप्ति सम्भव नहीं है।

मनमोहन कुमार आर्य

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यह दोहरा मापदण्ड क्यों?– – राजेन्द्र जिज्ञासु

‘आर्य सन्देश’ दिल्ली के 13 जुलाई के अंक में श्रीमान् भावेश मेरजा जी ने मेरी नई पुस्तक ‘इतिहास प्रदूषण’ की समीक्षा में अपने मनोभाव व्यक्त किये हैं। मैंने अनेक बार लिखा है कि मैं अपने पाठक के असहमति के अधिकार को स्वीकार करता हूँ। आवश्यक नहीं कि पाठक मुझसे हर बात में सहमत हो। समीक्षक जी ने डॉ. अशोक आर्य जी के एक लेख में मुंशी कन्हैयालाल आर्य विषयक एक चूक पर आपत्ति करते हुए उन्हें जो कहना था कहा और मुझे भी उनके लेख के बारे में लिखा। मैंने भावेश जी को लिखा मैं लेख देखकर उनसे बात करूँगा। अशोक जी को उनकी चूक सुझाई। उन्होंने कहा , मैंने पं. देवप्रकाश जी की पुस्तक में ऐसा पढ़कर लिख दिया। मैंने फिर भी कहा स्रोत का नाम देना चाहिये था और बहुत पढ़कर किसी विषय पर लेखनी चलानी चाहिये।

मैं गत 30-35 वर्ष से आर्यसमाज में इतिहास प्रदूषण के महारोग पर लिखता चला आ रहा हूँ परन्तु

‘रोग बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की।’

वाली उक्ति के अनुसार यह तो ऊपर से नीचे तक फैल चुका है। भावेश जी ने अशोक जी की चूक पर तो झट से अपना निर्णय दे दिया कि यह भ्रामक कथन है। मैंने कई लेखकों की कई पुस्तकों व लेखों की भयङ्कर भूलों नाम की, सन् की, सवत् की, स्थान की, हटावट की मिलावट की बनावट की मनगढ़न्त हदीसें मिलाने की निराधार मिथ्या बातों के अनेक प्रमाण दिये तीस वर्ष से झकझोर रहा हूँ। मेरे एक भी प्रमाण व एक भी टिप्पणी को कोई आगे आकर झुठलाकर तो दिखावे। अशोक जी के एक लेख पर एक कथन पर भावेश जी ने झट से उसका प्रतिवाद कर दिया। अब भी वह ऐसा करते तो अच्छा होता अथवा मेरे दिये प्रमाणों को झुठलाते। यह तो वही बात हुई ‘चित भी मेरी और पट भी मेरी’

तड़प-झड़प वाली शैली पर जो आपत्ति समीक्षक ने की है, वही ऋषि दयानन्द, पं. लेखराम, पं. चमूपति, देहलवी जी, पं. शान्तिप्रकाश जी, पं. धर्मभिक्षु, पं. नरेन्द्र जी पर विरोधी कोर्टों व पुस्तकों में करते चले आ रहे हैं परन्तु कोई असंसदीय शद तो किसी कोर्ट में सिद्ध न हो सका। एक व्यक्ति ने गत तीस-पैंतीस वर्ष से प्रदूषण का आन्दोलन छेड़ा है तो उसी पर अधिक लिखा जावेगा। वेश्या व जोधपुर के राज परिवार के लिए आर्यसमाज के इतिहास को ही प्रदूषित करना क्या उचित है?

तड़प-झड़प वाले का लेख ईसाई पत्रिका पवित्र हृदय ने आदर से प्रकाशित किया। जब-जब किसी ने प्रहार किया, चाहे सत्यार्थप्रकाश पर दिल्ली में अभियोग चला, हर बार तड़प-झड़प वाले को ही उत्तर देने व रक्षा के लिए समाज पुकारता है। इसका कारण आप ही बता दें। गुरु नानकदेव विश्वविद्यालय अमृतसर का Sikh Theology विभाग सारा ही तड़प-झड़प वाले के पास पहुँचा तो क्या इससे आर्यसमाज का गौरव बढ़ा या नहीं? किसी और से वह काम ले लेते। महोदय! मुसलमानों ने आचार्य बलदेव जी से कहलवाकर तड़प-झड़प वाले की एक पुस्तक दो बार छापने की अनुमति ली। शहदयार शीराजी एक विदेशी मुस्लिम स्कॉलर ने पं. रामचन्द्र जी देहलवी व दो अन्य महापुरुषों पर तड़प-झड़प वाले से ग्रन्थ लिखवा कर समाज की शोभा शान बढ़ाई या नहीं? ये कार्य आप अपनी विभूति से करवा लेते तो संसार जान जाता। ‘इतिहास प्रदूषण’ में दिया गया एक प्रमाण, एक टिप्पणी तो झुठलाओ।

परोपकारी पर वार हो तो संगठन भूल जाता है। प्रदूषणकार, हटावट, मिलावट, बनावट करने वाले पर लेखनी उठाई जावे तब संगठन की दुहाई देने का क्या अर्थ? तड़प-झड़प वाला अर्थार्थी, स्वार्थी नहीं परमार्थी पुरुषार्थी है। यह क्यों भूल गये? न कभी किसी से पुरस्कार माँगा है, न समान व पेंशन माँगी है। कई बार अस्वीकार तो करता आया है। तन दिया है, मन दिया है, लहू से ऋषि की वाटिका, सींची है। धन को धूलि जानकर समाज पर वारा है। न तो कभी साहित्य तस्करी की है और न पुस्तकों की तस्करी का पाप कभी किया है। सच को सच तो स्वीकार करो। इसे झुठलाना आपके बस में नहीं है।

इससे हमने क्या सीखा?ः- राजेन्द्र जिज्ञासु

पूर्वजों के तर्क व युक्तियाँ सुरक्षित की जायेंः आज हम लोग एक बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं। हम कुछ हल्के दृष्टान्त, हंसाने वाले चुटकले सुनाकर अपने व्यायानों को रोचक बनाने की होड़ में लगे रहते हैं। इससे हमारा स्तर गिरता जा रहा है। यह चिन्ता का विषय है। पं. रामचन्द्र जी देहलवी हैदराबाद गये तो आपने हिन्दुओं के लिए मुसलमानों के लिए व्यायान के पश्चात् शंका करने के दिन निश्चित कर रखे थे। निजाम ने प्रतिबन्ध लगा दिया कि मुसलमान पण्डित जी से शंका समाधन कर ही नहीं सकता। वह जानता था कि पण्डित रामचन्द्र जी का उत्तर सुनकर मुसलमान का ईमान डोल जायेगा। उसके भीतर वैदिक धर्म घुस जायेगा। देहलवी जी से प्रश्न करने पर लगाई गई यह पाबन्दी एक ऐतिहासिक घटना है।

इससे हमने क्या सीखा?ः- हमें बड़ों के मनन-चिन्तन की सुरक्षा को मुयता देकर नये सिरे से उनके विचारों पर गहन चिन्तन करना होगा।

होना तो यह चाहिये था कि पं. लेखराम, स्वामी दर्शनानन्द, पं. गणपति शर्मा, स्वामी नित्यानन्द, पं. धर्मभिक्षु, श्री महाशय चिरञ्जीलाल प्रेम, पं. चमूपति, पं. शान्तिप्रकाश और पं. अमरसिंह आर्य पथिक आदि सबके मौलिक चिन्तन व युक्तियों को संग्रहीत करके उनका नाम ले लेकर लेखों व व्यायानों में उन्हें प्रचारित करके अगली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाये।

मैंने इस दिशा में अत्यधिक कार्य किया है। इन महापुरुषों के साहित्य, व्यायानों व लेखों से इनकी ज्ञान राशि को खोज-खोज कर सुरक्षित तो किया है परन्तु वक्ता या तो उनका नाम नहीं लेते हैं और नाम लेते भी हों तो तर्क, युक्ति प्रसंग को बिगाड़ करके रख देते हैं। इसके बीसियों उदाहरण दिये जा सकते हैं। यह बहुत दुःखदायक है।

दुःखी हृदय से ऐसे दो प्रसंग यहाँ दिये जाते हैं। श्रद्धेय पं. सत्यानन्द जी वेदवागीश, पं. ओम् प्रकाश जी वर्मा दोनों पं. शान्तिप्रकाश जी के पुनर्जन्म विषय पर एक शास्त्रार्थ का प्रेरक प्रसंग सुनाया करते हैं। पण्डित जी के मुख से स्वपक्ष में कुरान की आयतें सुनकर प्रतिपक्षी मौलाना ने अपनी बारी पर पण्डित जी के आयतों के उच्चारण व कुरान पर अधिकार के लिए कहा था, ‘‘कमबख्त  पिछले जन्म का कोई हाफिजे कुरान है।’’

इस पर पण्डित जी ने कहा- बस पुनर्जन्म का सिद्धान्त सिद्ध हो गया। आपने इसे स्वीकार कर ही लिया है। मैं भी यह घटना सुनाया करता हूँ। शास्त्रार्थ के अध्यक्ष स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज थे। यह शास्त्रार्थ लाहौर में हुआ था। वर्मा जी भी यह बताया करते हैं।

अभी पिछले दिनों पं. शान्ति प्रकाश जी के पुत्र श्री वेदप्रकाश जी ने मेरे मुख से यह घटना सुनने की इच्छा प्रकट की। आपने पिताश्री के मुख से कभी इसे सुना था। मैंने उसको पूरा-पूरा प्रसंग सुना दिया। अब हो क्या रहा है। गत दिनों एक भद्रपुरुष ने इस घटना को बिगाड़ कर पं. रामचन्द्र जी देहलवी के नाम से जोड़ दिया। श्री देहलवी जी के पुनर्जन्म विषयक किसी लेख, व्यायान और शास्त्रार्थ में इसका कहीं भी संकेत नहीं मिलता।

न जाने लोगों को गड़बड़ करने में क्या स्वाद आता है। एक ने मुझे कहा कि मैंने राधा व श्री कृष्ण पर लेख देना है। कहाँ से सामग्री मिलेगी? मैंने उसे पं. मनसाराम जी की दो पुस्तकें देखने को कहा। उसने झट से लेख तो छपवा दिया परन्तु पं. मनसाराम जी के ग्रन्थ का उल्लेख नहीं किया। क्या ऐसा करके वह ठाकुर अमरसिंह की कोटि का विद्वान् बन गया? बड़ों ने वर्षों श्रम किया, तप किया, दुःख कष्ट झेले तब जाकर वे पूज्य बने। तस्करी करके या बड़ों का नाम न लेकर, उनकी उपेक्षा करके हम यश नहीं प्राप्त कर सकते।

आचार्य प्रियव्रत जी ने मुझे आज्ञा दीः आचार्य प्रियव्रत जी ने एक बार मुझे एक भावपूर्ण पत्र लिखकर एक महत्त्वपूर्ण कार्य सौंपा था। आपने मेरे ग्रन्थ में स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी के द्वारा सुनाये जाने वाले कई दृष्टान्त पढ़कर यह आज्ञा दी कि मैं स्वामी जी महाराज के सब दृष्टान्तों की खोज करके उनका दृष्टान्त सागर तैयार कर दूँ। वे सत्य कथाओं का अटूट भण्डार थे। यदि स्वामी सर्वानन्द जी, स्वामी विज्ञानानन्द जी, पं. शान्तिप्रकाश जी, पं. नरेन्द्र जी और आचार्य प्रियव्रत मेरे पर निरन्तर दबाव बनाते तो यह कार्य तब हो सकता था। अब इसे करना अति कठिन है। कोई युवक इस कार्य के लिए आगे निकले तो मैं उसको पूरा-पूरा सहयोग करूँगा। यह एक करणीय कार्य है।

बड़ों को समझो, उन्हें बड़ा मानो तोः- कोई 20-22 वर्ष पुरानी बात होगी। आर्यसमाज नया बांस देहली में एक दर्शनाचार्य युवक से भेंट हो गई। वह रोजड़ से दो दर्शनों का आचार्य बनकर आया था। उससे मिलकर बड़ा आनन्द हुआ। तब पं. चमूपति जी के पुत्र श्री डॉ. लाजपतराय भी वहीं बैठे थे। मैंने दर्शनाचार्य जी से पूछा, किस-किस आर्य दार्शनिक के दार्शनिक साहित्य को आपने पढ़ा है? उसने कहा, जो वहाँ पढ़ाये जाते थे, वही ग्रन्थ पढ़े हैं।

अब मैंने उसे कहा- हम त्रैतवाद को मानते हैं। जीव और प्रकृति को भी अनादि व नित्य मानते हैं। मुसलमान जीव की उत्पत्ति तो मानते हैं परन्तु नाश नहीं मानते। हमारे विद्वान् यह प्रश्न पूछते रहे कि क्या एक किनारे वाले भी कोई नदी होती है? जिसका अन्त नहीं उसका आदि भी नहीं होगा और जिसका आदि नहीं उसी का अन्त नहीं होगा। यह नहीं हो सकता कि कहीं एक किनारे की नदी हो।

उसे बताया गया कि झुंझलाकर एक मौलाना ने लिखा कि फिर ऐसी भी तो किनारा न हो अर्थात् जिसका न आदि हो और न अन्त हो।

मैंने कहा- दर्शनाचार्य जी! आप इसका क्या उत्तर देंगे। वह लगे सूत्र पर सूत्र सुनाने परन्तु मियाँ के तर्क को काट न सके। लाजपत जी ने उसे संकेत दिया- भाई किनारे को काटो तब उत्तर बनेगा परन्तु उसे कुछ न सूझा। तब मैंने उसे बताया कि पं. चमूपति जी ने इसका उत्तर दिया, ‘‘हाँ, मौलाना एक ऐसी नदी भी है- अल्लाह मियाँ, जिसका न आदि आप मानते हैं और न अन्त आप मानते हैं।’’ कैसा बेजोड़ मौलिक सबकी समझ में आने वाला उत्तर है। मैं किसी को निरुत्साहित करना पाप मानता हूँ। मेरी इच्छा है कि परोपकारिणी सभा पं. लेखराम जी, स्वामी दर्शनानन्द जी, पं. चमूपति जी, पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय के दार्शनिक चिन्तन पर उच्च स्तरीय शिविर लगाये। इस प्रकार के शिविरों से इन विचारकों का वंश बढ़ेगा। फूलेगा, फलेगा।

बिस्मिल्लाह के चमत्कार

अधिकतर कार्यों को आरम्भ करने से पहले मुसलमान  बिस्मिल्लाह का पढ़ना आवश्यक समझते हैं  कुरान के अधिकतर अध्यायों की शुरुआत भी बिस्मिल्लाह से ही हुयी है आइये जानते हैं बिस्मिल्लाह के कुछ चमत्कारों के बारे में

तफसीर ए जलालैन ने इसके बारे में जो दिया है वो पढ़िए :

बिस्मिल्लाह के गुण :

  • मुस्लिम की रिवायत है कि जिस खाने पर बिस्मिल्लाह नहीं पढी जाती उसमें शैतान का हिस्सा होता है .
  • अबू दाऊद की रिवायत है कि आप की मजलिस मै किसी सहाबी ने बगैर बिस्मिल्लाह खाना शुरू कर दिया आखिर में जब याद आया तो बिस्मिल्लाह कहा तो आं हजरत को यह देख कर हंसी आ गयी और फरमाया कि शैतान ने जो कुछ खाया था इनके बिस्मिल्लाह पढ़ते ही खड़े हो कर सब उल्टी कर दिया . अल बल्गाह में अपना वाकया फरमाया है कि एक दोस्त खाना खाने लगे तो उन के हाथ से रोटी का टुकडा छूट कर दूर तक लटकता चला गया जिससे सभी को ताज्जुब हुआ और अगले रोज़ मोहल्ले में किसी के सर पर खबीस आकर बोला कि कल हमने फलां सख्स से एक टुकड़ा छीना था मगर आखिरकार इसने हमसे ले ही लिया .
  • तिर्मज़ी की रिवायत हजरत अली से है कि शौचालय में जाने के वक्त बिस्मिल्लाह पढने से जिन्नात व शैतान की नज़र इसके आवरण (गुप्तांगों ) तक नहीं पहुँचती है .

इमाम राजी ने तफसीर कबीर में लिखा है कि हजरत दुश्मन के मुकाबले जंग में पर जमाए खड़े हैं और जहर हलाहल  की एक शीशी पीस करके …….  दीन की सराकत का इम्तिहान लेना चाहते हैं आपने पूरी शीशी बिस्मिल्लाह पढ़ कर पी ली लेकिन इसकी बरकत से आप पर जहर का मामूली असर भी नहीं हुआ .

लेकिन आप कहेंगे कि इस तरह के ताशीर (प्रभावोत्पादकता) आपका मशाहरा (the act of disagreeing angrily) चूँकि हमको नहीं होता इसलिये यह वाकयात गलत बे बुनियाद खुशफहमी पर बनी मालूम होते  है .सुबात यह है कि किसी चीज की ताशीर के लिए इस बात  व शरायत का मुहैया होना और मुआना व रुकावटों का दूर होना दोनों बातें जरुरी होती हैं .
अजलह मर्ज़ और हसूल सेहत के लिए सिर्फ दो दुआ कारगर  नहीं हो सकतीं ताव कतीकाह नुकसानदेह  चीजों और बद परहेजों से बिलकुल नहीं बचा जाए यहाँ भी साफ़ नीयत ईमान का मिल अगर शरायत ताशीर हैं  तो रयाकारी बद्फह्मी तोहमत व खयालात बद आत्कादी गैर मुआयना भी है दोनों ही मकर मज्मुई तोर पर अगर मौशर होते हों तो भी क्या  इश्काल (संदेह ) रह जाता है (हक्कानी )

  • इब्ने अहमद बन मुसी अपनी तफसीर में जाबर बन से रिवायत करते हैं कि बिस्मिल्लाह जब नाजिल हुयी तो बादल पूर्वी दिशा में दौड़ने लगे हवा रुक गयी समन्दरों में जोश हुआ जानवर कान खड़े करके सुनने लगे और अल्लाह ने अपनी महानता की कसम खायी कि बिस्मिल्लाह जिस चीज पर पढी जायेगी मैं इस में जरुर बरकत दूंगा .
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  • पण्डित देवप्रकाश जी ने जो लिखा जो लिखते हैं :
    पाठकों के मनोरंजन के लिए इस आयत के साथ जोड़े चमत्कार लिख देते हैं :
    इब्ने कसीर ने लिखा हजरत दाउद फरमाते हैं कि जब ये आयत बिस्मिल्लाह उतरी बादल पूर्व की और छंट गए हवा रुक गयी समुद्र ठहर गया ,जानवरों ने कान लगा लिया शिअतान पर आकाश से आग के शोले गिर इत्यादि (इब्ने कसीर जिल्द १ पृष्ट २४)
    अबू दाउद से उद्धृत किया है की नबी (मुहम्मद) के सामने एक व्यक्ति ने बिना बिस्मिल्लाह पढ़े खाना खाया . जब भोजन का एक ग्रास शेष रहा तो उसने बिस्मिल्लाह पढी तो शैतान ने जो कुछ खाया था खड़े होकर उल्टी कर दी .सहीह मुस्लिम से उद्धृत किया है कि जिस भोजन पर बिस्मिल्ल्लाह नहीं पढ़ा जाता उसमें शैतान भागीदार हो जाता है .
    तिरमिजी ने हजरत अली से उद्धृत किया है कि जब कोई व्यक्ति शौचायल में जाकर बिस्मिल्लाह पढता है तो इससे उसके गुप्तांगों व जिन्नों की आँखों के मध्य यह कलाम पर्दा बंद जाता है . तफसीर हक्कानी जिल्द १ पृष्ठ १७ न जाने ये जिन्न पखाने में मुसलामानों के पीछे क्यों जाते हैं .

इस तरह की बातों पर कोई भी विवेकशील व्यक्ति यकीन नहीं कर सकता . इन सब बातें वास्तविकता से परे हैं और अंधविश्वासों को बढ़ाने वाली हैं . पहले भी लोग बिस्मिल्लाह बिना पढ़े खाते थे और आज भी  बिना बिस्मिल्लाह पढ़े खाते हैं लेकिन आज तक तो किसी की रोटी को किसी शैतान ने नहीं छीना  न ही किसी को शौचालय में शैतान के होने का आभास हुआ है . इन सब तत्थ्यों के होते हुए इन सब बातों पर पढ़े लिखे और विवेकशील मुसलामानों का भी विश्वास करना शायद कठिन होता होगा गैर मुस्लिम के बारे में तो क्या कहें .

विवेकशील और बुद्धिमान मौलवियों आलिम फज़िलों को चाहीये की इस तरह की हदीसों के बारे में जो इस्लाम को वास्तविकता से परे रखने का कार्य करती हैं पर अपना मत स्पष्ट करना चाहिए