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वेदानुसार बहुकुन्डीय यज्ञ उचित है अथवा अनुचित?

वेदानुसार बहुकुन्डीय यज्ञ उचित है अथवा अनुचित?

समाधान-

(ख)बहुत सारे कुण्ड एक स्थान पर रखकर हवन करने का पढ़ने को तो नहीं मिला, किन्तु यदि निर्लोभ होकर यथार्थ विधि पूर्वक कहीं ऐसे यज्ञों का आयोजन होता है तो इसमें हमें हानि प्रतीत नहीं हो रही। हानि वहाँ है, जहाँ बहुकुण्डिय यज्ञ करने का उद्देश्य व्यापार हो। यजमान से दक्षिणा की बोली लगवाई जा रही हो अथवा एक कुण्ड पर दक्षिणा को निश्चित करके बैठाया जाता हो। यज्ञ करवाने वाले ब्रह्मा की दृष्टि मिलने वाली दक्षिणा पर अधिक और यज्ञ क्रियाओं, विधि पर न्यून हो ऐसे बहुकुण्डिय यज्ञों से तो हानि ही है, क्योंकि यह यज्ञ परोपकार के लिए कम और स्वार्थपूर्ति रूप व्यापार के लिए अधिक हो जाता है।

प्रशिक्षण की दृष्टि से ऐसे यज्ञों का आयोजन किया जा सकता है। जिस आयोजन से अनेकों नर-नारी यज्ञ करना सीख लेते हैं और यज्ञ के लाभ से भी  अवगत होते हैं।

वेदानुसार यज्ञोपरान्त ब्रह्मा केमहिलाओं द्वारा स्वयमेव अथवा ब्रह्मा के आदेशानुसार चरण-स्पर्श क्या वैध है?

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासामहोदय,

वेदानुसार यज्ञोपरान्त ब्रह्मा केमहिलाओं द्वारा स्वयमेव अथवा ब्रह्मा के आदेशानुसार चरण-स्पर्श क्या वैध है?

समाधानयज्ञ कर्म वैदिक कर्म है, श्रेष्ठ कर्म है। यज्ञ को ऋषियों ने हमारी दैनिकचर्या से जोड़ दिया है। यज्ञ करने से जो हमारे शरीर से मल निकलता और उससे जो वातावरण दूषित होता है, उसकी निवृत्ति होती है अर्थात् वातावरण शुद्ध होता है। महर्षि दयानन्द ने यज्ञ की बहुत बढ़ाई की है, महर्षि यज्ञ को लोकोपकार का बहुत बड़ा साधन मानते हैं।

महर्षि दयानन्द से पहले यज्ञ रूपी कर्मकाण्ड में बहुत बड़ा विकार स्वार्थी लोगों ने कर रखा था। यज्ञ को अपने स्वार्थ व उदरपूर्ति का साधन बना डाला था। इसलिए उन स्वार्थी लोगों ने यज्ञ में अनेक अवैदिक क्रियाएँ जोड़ दी थीं। जैसे यज्ञों में पशुबलि अथवा पशुओं का मांस डालना आदि। इन अवैदिक कर्मों को यज्ञों में होते देख बहुत लोग यज्ञों से दूर होते चले गये, यज्ञ जैसे श्रेष्ठ-कर्म को हीन-कर्म मानने लग गये। जिससे लोगों की वेद व ईश्वर के प्रति श्रद्धा भी न्यून होती चली गई।

महर्षि दयानन्द ने यज्ञ में किये गये विकारों को दूर कर हमें विशुद्ध यज्ञ-पद्धति दी। जिस यज्ञ-पद्धति में पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। यदि हम आर्यजन महर्षि की बताई पद्धति का अनुसरण करें तो यज्ञ में एकरूपता आ जावे और पाखण्ड रहित हो जावे। जब-जब हम मनुष्य ऋषियों के अनुसरण को छोड़ अपनी मान्यता को वैदिक कर्मों में करने लगते हैं तो धीरे-धीरे स्वार्थी लोगों की भाँति हम भी पाखण्ड की ओर चले जाते हैं व अन्यों को भी ले जाते हैं।

आजकल बड़े कार्यक्रम करते हुए यज्ञ के ब्रह्मा की नियुक्ति करते हैं, इसलिए कि यज्ञ का संचालन ठीक से हो जाये, लोगों को यज्ञ के लाभ व ठीक-ठीक क्रियाओं का ज्ञान हो जाये। यज्ञ में बने ब्रह्मा का उचित समान करना चाहिए, यह यजमान व आयोजकों का कर्त्तव्य बनता है। वह समान अभिवादन आदि से कर सकते हैं। पुरुष वर्ग ब्रह्मा के पैर छूकर अभिवादन करना चाहें तो कर सकते हैं, किन्तु स्त्री वर्ग सामने आ, कुछ दूर खड़े हो, हाथ जोड़, कुछ मस्तक झुकाकर अभिवादन करें तो अधिक श्रेष्ठ होगा। स्त्रियों द्वारा ब्रह्मा के पैर छूकर अभिवादन करने की परपमरा उचित नहीं, न ही कहीं ग्रन्थों में पढ़ने को मिला। ब्रह्मा को भी योग्य है कि वह स्वयं भी स्त्रियों से पैर न छूवावें, इससे मर्यादा बनी रहती है और एक आदर्श प्रस्तुत होता है। आजकल जो ये परमपरा देखने को मिल रही है, वह पौराणिकों से प्रभावित होकर देखने को मिल रही है, अपने को उनकी भाँति गुरु रूप में प्रस्तुत करने की भावना कहीं न कहीं मन के एक कोने में काम कर रही होती है। जिस गलत बात को महर्षि दूर करना चाहते थे, उसी को ऐसी भावना रखने वाले पोषित करते हैं।

हमारे आदर्श महापुरुष, ऋषि होने चाहिएँ। जैसा आचारण, व्यवहार वे करते आये वैसा करने में ही हमारा कल्याण है। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन काल में किसी स्त्री को पैर नहीं छूने दिये, महर्षि के इस व्यवहार से भी हम सीख सकते हैं। महर्षि ने ऐसा इसलिए किया कि वे अपने को गुरु (गुरुडम वाले गुरु) के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहते थे और एक आदर्श प्रस्तुत कर रहे थे। क्योंकि महापुरुष जानते हैं कि जैसा आचरण वे करेंगे, वैसा ही उनके अनुयायी भी करेंगे इसलिए महापुरुष ऐसा आचरण कदापि नहीं करते कि जिससे उनके अनुयायी विपरीत पथगामी हो जायें। इसलिए आर्य-विद्वानों को महिलाओं से पैर छूवाने से बचना चाहिए, बचने में अधिक लाभ है।

 

’ विषय में शिवलिंग वस्तुतः यज्ञ वेदी से उठती हुई अग्नि-शिखा का द्योतक है। स्वयं ऋग्वेद में तेईस देवियों के नाम मिलते हैं। अतः शिव और देवी को अवैदिक कहना झूँठ और बेईमानी है। जिज्ञासा यह है कि शिव, शिवलिंग और देवी शबद के यहाँ कहने का क्या तात्पर्य है एवं ऋग्वेद में देवी शबद का प्रयोग किस तात्पर्य या प्रयोजन को सिद्ध करता है। यह पौराणिक मान्यताओं के देवी शबद का प्रयोजन तो नहीं है। कष्ट के लिये क्षमा।

जिज्ञासा –

  1. इसी माह की पत्रिका के पेज 22 पर ‘‘आर्य अनार्य की बात’’ विषय में शिवलिंग वस्तुतः यज्ञ वेदी से उठती हुई अग्नि-शिखा का द्योतक है। स्वयं ऋग्वेद में तेईस देवियों के नाम मिलते हैं। अतः शिव और देवी को अवैदिक कहना झूँठ और बेईमानी है।

जिज्ञासा यह है कि शिव, शिवलिंग और देवी शबद के यहाँ कहने का क्या तात्पर्य है एवं ऋग्वेद में देवी शबद का प्रयोग किस तात्पर्य या प्रयोजन को सिद्ध करता है। यह पौराणिक मान्यताओं के देवी शबद का प्रयोजन तो नहीं है। कष्ट के लिये क्षमा।

– मुकुट बिहारी आर्य, 13/772 मालवीय नगर, जयपुर (राज.)

समाधान-

(ख) शिव और देवी के अर्थ महर्षि दयानन्द ने किये हैं। शिव का अर्थ जगत्पिता परमात्मा परक करते हुए लिखते हैं- ‘‘शिवु कल्याणे- इस धातु से शिव शबद सिद्ध होता है।……..जो कल्याणस्वरूप और कल्याण का करने हारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम शिव है।’’

-स.प्र.1।

देवी का अर्थ भी ईश्वर परक करते हुए लिखते हैं-‘दिवु’ अर्थात् जिसके क्रीड़ा आदि अर्थ हैं, उससे देवी शबद सिद्ध होता है…….सबका प्रकाशक, सबको आनन्द देने वाला।

– पञ्चमहायज्ञविधि

शिव और देवी इन दोनों शबदों के अर्थ ईश्वर-परक हैं, प्रकरणानुरूप किन्हीं और के वाचक भी हो सकते हैं। वेद में जो ये शबद आये हैं, इनका अर्थ सती और पार्वती के पति, गणेश तथा कार्तिकेय के पिता, भस्मधारी, नरमुण्डमालाधारी, वृषारोही, सर्पकण्ठ, नटवर, नृत्यप्रिय, नन्दा वेश्यागामी, अनुसूया धर्मनाशक, हस्तेलिंगधृक् महादेव नामक पौराणिक व्यक्ति और चारभुजा आदि से युक्त देवी कदापि नहीं है।

शिव और देवी-इनका अर्थ जो ऊपर लिखा, इस अर्थ के अनुसार तो ये वैदिक ही कहायेंगे, किन्तु इसके विपरीत किसी व्यक्ति वा स्त्री विशेष अर्थ में तो अवैदिक ही कहे जायेंगे। और ये कहकर कि शिवलिंग यज्ञवेदी से उठती हुई अग्नि-शिखा का द्योतक है, शिवलिंग को सिद्ध करना अपनी कोरी कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं अर्थात् ये मिथ्या कल्पनामात्र है। यदि ऐसा है तो इस विषय में कोई आर्ष-प्रमाण प्रस्तुत करने की कृपा करें। आजकल कुछ विद्वान् इन पौराणिक गपोड़ों को अपनी कल्पना के आधार पर सही सिद्ध करने में लगे हैं। कोई गणेश को सही सिद्ध कर रहा है तो कोई विष्णु के चार हाथों की व्याखया कर उसको उचित सिद्ध करने में लगा है। ऐसा करने से पौराणिक मान्यताओं को बढ़ावा ही मिलना है न कि पाखण्ड न्यून होने को।

श्रीमान् मनसाराम जी वैदिक तोप की पुस्तक ‘‘पौराणिक पोल प्रकाश’’ में  इस कथा के विषय में विस्तार से लिखा है। इस कथा को जानकर कोई कैसे कह सकता है कि शिवलिंग अग्नि-शिखा का द्योतक है। यह तो शिव-पार्वती की अश्लील क्रियाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इसलिए आर्यजन व्यर्थ की कल्पनाओं पर विश्वास न कर यथार्थ को स्वीकार कर अपने जीवन को उत्तम बनावें।

 

श्री कृष्ण जी ने शपथ में कहा कि ‘‘अभिमन्यु का पुत्र जीवित हो जाये’’ तो क्या धर्मात्मा, योगी, महापुरुषों के शपथ या वरदान से मरा हुआ व्यक्ति जीवित हो सकता है?

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासा महोदय! जिज्ञासा-समाधान हेतु निमन विषय है- 1. परोपकारी पत्रिका मार्च (द्वितीय) 2016 के पृष्ठ 17 में श्री कृष्ण जी ने शपथ में कहा कि ‘‘अभिमन्यु का पुत्र जीवित हो जाये’’ तो क्या धर्मात्मा, योगी, महापुरुषों के शपथ या वरदान से मरा हुआ व्यक्ति जीवित हो सकता है?

समाधान– (क) मरे हुए को जीवित कर देना, यह बात असमभव प्रतीत होती है। कोई योगी महात्मा ऐसा कर देता हो, यह बात भी असमभव है। जब किसी शरीर से आत्मा-प्राण निकल गया हो, उसमें पुनः आत्मा व प्राण को डाल जीवित करना कभी नहीं हो सकता, यदि कहीं ऐसी घटनाएं मिलती हैं तो वे प्रायः कही-सुनी, असत्य, जनापवाद ही होता है। या जिस किसी मरे हुए को जीवित करने बात आती है, वह व्यक्ति मरा ही नहीं होता, उसके प्राण होते हैं और बाहर से मृतप्रायः दिखता है। ऐसी अवस्था में कुछ प्रयत्न विशेष से उसके प्राणों को संचालित किया जा सकता है।

आपने पूछा कि श्री कृष्ण ने अभिमन्यु के मरे हुए पुत्र को शपथ मात्र से जीवित कर दिया, क्या यह सत्य है? हमारे विचार में जब अभिमन्यु का पुत्र पैदा हुआ तो वह अश्वत्थामा द्वारा छोड़े हुए ब्रह्मास्त्र के प्रभाव में था। जिससे वह मृतप्रायः पैदा हुआ, पूर्णरूप से प्राण शरीर से नहीं निकले होंगे। ऐसी स्थिति में श्री कृष्ण के उपचार और पुण्य विशेष से उसके प्राण संचालित हो गये होंगे, ऐसा होने पर कृष्ण के विषय में प्रचलित कर दिया होगा कि श्री कृष्ण ने अभिमन्यु के मरे हुए पुत्र को जीवित कर दिया।

यदि श्री कृष्ण जी मरे हुओं को जीवित कर देते थे, तो महाभारत युद्ध में एक से एक उपकारी योद्धा मारे गये थे, उनको भी क्यों न जीवित कर दिया? अभिमन्यु को ही जीवित कर देते, जिससे इस आर्यावर्त को योग्य राजा मिल जाता अथवा भीमपुत्र घटोत्कच को जीवित कर देते, जिससे अतिशीघ्र कौरव सेना का संहार कर युद्ध को जल्दी निपटा देते। किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यहाँ अभिमन्युपुत्र को जीवित करने की जो बात है, हमें तो यही प्रतीत होता है कि वह मरा हुआ पैदा नहीं हुआ अपितु मरे जैसा पैदा हुआ। मरे हुए और मरे जैसे में बहुत बड़ा अन्तर है। मरा हुआ आज तक कभी जीवित नहीं हुआ है और न होगा क्योंकि यह सृष्टिक्रम के विरुद्ध है। हाँ, मरे जैसा तो जीवित हो सकता है, क्योंकि वह अभी पूरी तरह से मरा नहीं है, अभी प्राण शेष हैं- ऐसे को बुद्धिमान् व्यक्ति अपने कौशल, औषध और पुण्य कर्मों से जीवित कर सकता है। ऐसी स्थिति को देखकर लोग कह देते हैं कि उसने मरे हुए को जीवित कर दिया।

महाभारत के इस प्रकरण में अभिमन्युपुत्र को मरा हुआ ही लिखा है और उसको जीवित करने वाले कृष्ण द्वारा अपने पुण्यों के बल पर जीवित किया हुआ लिखा है। यह प्रकरण हमें मिलावट-युक्त लगता है, वास्तविकता कुछ और रही होगी। अस्तु

जो भी संसार में है, उसका नाम व काम परमेश्वर द्वारा नियम किया हुआ है। कहा जाता है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, इसका हनन उपरोक्त कथन में होता है।

जिज्ञासा- 

  1. इसलिए जो भी संसार में है, उसका नाम व काम परमेश्वर द्वारा नियम किया हुआ है।

कहा जाता है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है, इसका हनन उपरोक्त कथन में होता है।

अमरसिंह आर्य, सी-12, महेश नगर, जयपुर-15

समाधान-

(ग) जिज्ञासा-समाधान 103 में जो समाधान ‘क’ के अन्त में लिखा ‘‘इसलिए जो भी संसार में है, उसका नाम व काम परमेश्वर द्वारा नियम किया हुआ है।’’ इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि मनुष्य के कर्म करने की स्वतन्त्रता का हनन हो रहा है। वहाँ मनु का प्रमाण देते हुए कहा था-

सवेषां तु नामानि कर्माणि च पृथक्-पृथक्।

वेदशदेय एवाऽऽदौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे।।

-मनु. 1.21

परमेश्वर ने संसार के सब पदार्थों के नाम व काम निर्धारित कर रखे हैं। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, गो, अश्व, मनुष्यादि, इनके भिन्न-भिन्न कर्म, जैसे-सूर्य का गर्मी व प्रकाश देना, चन्द्रमा का शीतलता देना, गाय का दूध देना, अश्व का यान के रूप में आदि। गाय-अश्व आदि को हम विद्यालंकार, वेदालंकार करवाना चाहें तो वह होगा ही नहीं, क्योंकि यह काम इनका है ही नहीं। ऐसे ही मनुष्यों के कर्म विद्या अध्ययन करना, अगले नये शुा अथवा अशुभ कर्म करना मनुष्य की स्वतन्त्रता है।

यह स्वतन्त्रता परमेश्वर की ओर से निर्धारित है। इस निर्धारण के आधार पर मनुष्य स्वतन्त्र होकर शुभ अथवा अशुभ कर्म कर सकता है। इस रूप में जिज्ञासा-समाधान 103 के तात्पर्य को समझना चाहिए। अलमिति।

मुक्ति-महर्षि ने कर्म, उपासना, ज्ञान को मुक्ति का मार्ग बताया, जबकि कपिलमुनि ने ज्ञान से मुक्ति मानी है तथा गीता में कर्म और ज्ञान को मुक्ति का मार्ग बताया है। कृपया स्पष्ट करें कि ज्ञान मुक्ति का मार्ग है या कर्म-ज्ञान दोनों।

जिज्ञासा- 

  1. इसी अंक पृष्ठ 33 पर जिज्ञासा-समाधान-103 पर मुक्तिमहर्षि ने कर्म, उपासना, ज्ञान को मुक्ति का मार्ग बताया, जबकि कपिलमुनि ने ज्ञान से मुक्ति मानी है तथा गीता में कर्म और ज्ञान को मुक्ति का मार्ग बताया है। कृपया स्पष्ट करें कि ज्ञान मुक्ति का मार्ग है या कर्म-ज्ञान दोनों।

समाधान-

(ख)मुक्ति दुःखों से छूटने का नाम है। दुःख से पूर्णतः छूटना यथार्थ ज्ञान से ही हो सकता है। कर्म, उपासना से दुःख को दबाया जा सकता है, कम किया जा सकता है, किन्तु सर्वथा नहीं हटाया जा सकता, दुःख को सर्वथा तो ज्ञान से ही हटाया जा सकता है। जिस दिन ज्ञान से दुःख को पूर्णरूप से दूर कर दिया जायेगा, उस दिन मुक्ति की भी अनुभूति होगी।

योगदर्शन के अन्दर दुःख का हेतु अविद्या कहा है- ‘तस्यहेतुरविद्या’

दुःख का कारण अन्य कुछ नहीं कहा। जब दुःख का कारण अविद्या है तो अर्थापत्ति से दुःख के हटने का नियत कारण विद्या ही होगा। इसी बात को महर्षि कपिल ने सांखयदर्शन में कहा है ‘ज्ञानान्मुक्तिः’ज्ञान से मुक्ति होती है, इसी बात को अन्य शास्त्र भी पुष्ट करते हैं।

ज्ञान से ही मुक्ति होती है यह बात भक्ति-मार्गी तथा कर्ममार्गियों को नहीं पचती। उनको लगता है कि यह बात तो विपरीत है। कुछ लोग उपासना को ही प्रधान बनाकर चलते हैं। उनको उपासना ही मुक्ति का मार्ग दिखता है, किन्तु वे यह नहीं जानते कि बिना ज्ञान के परिष्कृत हुए उपासना भी ठीक-ठीक नहीं होने वाली, उपासना का स्तर नहीं बढ़ने वाला। जब तक व्यक्ति के सिद्धान्त परिष्कृत नहीं होंगे, तब तक वह कैसे ठीक-ठीक उपासना कर सकता है। हाँ, अपने आधे-अधूरे ज्ञान के बल पर उपासना करता है और उसी में सन्तुष्ट रहने लगता है तो वह कैसे आगे प्रगति कर सकता है। यदि व्यक्ति ठीक-ठीक उपासना करता है तो उसको ज्ञान के महत्त्व का भी पता लगेगा और वह ज्ञान प्राप्ति के लिए अधिक प्रयत्नशील रहेगा।

ज्ञान का तात्पर्य यहाँ केवल शाबदिक ज्ञान से नहीं है। अपितु यथार्थ ज्ञान, तात्विक ज्ञान से है। जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब हमारे अन्दर के क्लेश परेश्वर के सहयोग से क्षीण होने लगते हैं। क्षीण होते-होते सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जाते हैं, ऐसी अवस्था में मुक्ति होती है।

जैसे भक्तिमार्गी ज्ञान की आवश्यकता नहीं समझते, ऐसे ही कर्ममार्गी भी ज्ञान को आवश्यक नहीं मानते। उनका कथन होता है कि कर्म करते रहो, मुक्ति अपने आप हो जायेगी। उनका यह कहना अधूरी जानकारी का द्योतक है। यथार्थ ज्ञान के बिना शुद्ध-कर्म कैसे होगा? इसलिए ऋषियों की मान्यता के अनुसार ज्ञान से ही मुक्ति होती है। इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं कि कर्म और उपासना को छोड़ देना चाहिए। शुद्ध कर्म-उपासना हमारे अन्तःकरण को पवित्र करते हैं। पवित्र अन्तःकरण ज्ञान को ग्रहण करने में अधिक समर्थ होता जाता है। जैसे-जैसे यथार्थ ज्ञान होता जायेगा, वैसे-वैसे साधक मुक्ति की ओर अग्रसर होता चला जायेगा।

गीता के हवाले से जो बात आपने कही है, तो गीता में भी यत्र-तत्र ज्ञान को ही महत्त्व दिया है। कुछ प्रमाण गीता से ही-

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

तत्स्वं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।    – 4.38

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरूते तथा।। – 4.37

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।

छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।     – 4.42

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एक भक्तिर्विशिष्यते।

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।   – 7.27

गीता के इन सभी श्लोकों में ज्ञान को श्रेष्ठ कहा है, ज्ञान की महिमा कही है। इसलिए शास्त्र के मत में तो ज्ञान से ही मुक्ति होती है। इसमें न तो कोई ज्ञान के साथ लगकर मुक्ति देने वाला है और न ही ज्ञान का कोई विकल्प है। अस्तु

‘‘अध्यात्मवाद’’ आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, इन दोनों का आपस में समबन्ध क्या है-इस विषय का नाम अध्यात्मवाद है। मैंने किसी जगह पढ़ा था कि अध्यात्म वह स्थिति है, जब बुद्धि आत्मा में स्थित हो जाता है और उस समय जो विचार आता है वह उत्तम ही आता है। कृपया स्पष्ट करें।

– आचार्य सोमदेव1. परोपकारी के अंक जनवरी (द्वितीय) 2016 के पृष्ठ 30 पर ‘‘अध्यात्मवाद’’ आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, इन दोनों का आपस में समबन्ध क्या है-इस विषय का नाम अध्यात्मवाद है।

मैंने किसी जगह पढ़ा था कि अध्यात्म वह स्थिति है, जब बुद्धि आत्मा में स्थित हो जाता है और उस समय जो विचार आता है वह उत्तम ही आता है। कृ पया स्पष्ट करें।

समाधान-(क) आत्मा-परमात्मा को अधिकृत करके उस विषय में विचार करना, उसको आत्मसात करना अध्यात्म है। इस विचार को मानना अध्यात्मवाद है। व्यक्ति जब अपने आत्मा को जानना चाहता है, आत्मा क्या है, इसका स्वरूप क्या है, नाश को प्राप्त होता है या नित्य है, मरने के बाद आत्मा कहाँ जाता है, आत्मा बन्धन में क्यों बंध जाता है, इसका बंधन कैसे छूटेगा आदि-आदि आत्मा विषय में विचारना अध्यात्म ही है। ऐसे ही परमात्मा क्या है, स्वरूप क्या है परमातमा का? परमात्मा करता क्या है, उसको कैसे प्राप्त किया जा सकता है, उसके प्राप्त होने पर क्या अनुभूति होती है आदि विचारना अध्यात्म है। गीता में भी कुछ ऐसा ही कहा है-

अक्षरं परमं ब्रह्म स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। गी. 8.3

अपने मन में छिपे संस्कारों को देखना, अविद्यायुक्त संस्कारों को देखकर दूर करने का प्रयत्न करना, उनसे दुःख और हानि को देखना, अपने मन को उपासना, तप आदि के द्वारा निर्मल बनाना, बनाने का प्रयत्न करना अध्यात्म है। बुद्धि और आत्मा को पृथक् देखना, संसार के विषयों से विरक्त हो अन्तर्मुखी होना यह सब अध्यात्म है। विरक्त हो आत्मा का दर्शन करना, प्रज्ञा बुद्धि को प्राप्त करना, प्राप्त गुणातीत हो ईश्वर-दर्शन करना अध्यात्म है, अध्यात्म की पराकाष्टा है।

आपने जो पढ़ा वह स्थिति आध्यात्मिक व्यक्ति की होती है, हो सकती है। जब व्यक्ति अध्यात्मवाद को अपनाकर चलता है तो उसके अन्दर से श्रेष्ठ विचार उत्पन्न होने लगते हैं। इन्हीं उत्तम विचारों से व्यक्ति अपने जीवन को कल्याण की ओर ले जाता है। श्रेय मार्ग की ओर ले जाता है।

आजकल आर्यसमाज के नए-नए विद्वान् नई-नई खोज कर रहे हैं। एक नई खोज सामने आयी है कि आत्मा साकार है और सत्यार्थप्रकाश का हवाला देते हुए बताते हैं कि स्वामी जी ने निराकार नहीं निराकारवत् लिखा। अब सही और गलत आप ही बताएँ।

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासाआजकल आर्यसमाज के नए-नए विद्वान् नई-नई खोज कर रहे हैं। एक नई खोज सामने आयी है कि आत्मा साकार है और सत्यार्थप्रकाश का हवाला देते हुए बताते हैं कि स्वामी जी ने निराकार नहीं निराकारवत् लिखा। अब सही और गलत आप ही बताएँ।

– यतीन्द्र आर्य, मन्त्री आर्यसमाज बालसमन्द, हिसार, हरि.

समाधानवैदिक सिद्धान्त त्रैतवाद को मानता है अर्थात् ईश्वर, जीव व प्रकृति इन तीनों की सत्ता है और वह सत्ता इन तीनों की अपनी पृथक्-पृथक् है। वेद व ऋषिकृत ग्रन्थों में इनका स्पष्ट वर्णन मिलता है। महर्षि दयानन्द ने अपने सिद्धान्त में इसी को रखा है। महर्षि ने इन तीनों स्वरूपों का वर्णन अपने ग्रन्थों, प्रवचनों व पत्र-व्यवहारों में अनेकत्र किया है। आर्य समाज के विद्वानों में महर्षि की मान्यता सर्वोपरि रहती है। वेद के आधार पर जिस बात को महर्षि मानते हैं उसी को आर्य विद्वान् स्वीकार करते हैं।

महर्षि दयानन्द ने जीवात्मा के स्वरूप विषय में जीवात्मा को स्पष्ट शब्दों में निराकार कहा है। महर्षि की इस स्पष्ट मान्यता की अवहेलना कर आर्य समाज में एक वर्ग विशेष चलाने वालें ने जीवात्मा को साकार कहना-बताना आरम्भ कर दिया है। यह ज्ञान  जिनके अन्दर उतरा है उनकी मान्यता है कि आज तक इनके अतिरिक्त यह बात किसी ने नहीं की, इसकी खोज तो मैंने ही की है। इनकी इस बात से हम सहमत हैं कि ये इलहाम इन्हीं को हुआ, अन्य किसी को नहीं। ये लोग तर्क देते हैं कि निराकार-निराकार में नहीं रह सकता अर्थात् निराकार ईश्वर में निराकार आत्मा वा अन्य कोई वस्तु नहीं रह सकती। इस तर्क को ये कथन मात्र में दोहराते हैं, सिद्ध नहीं करते। इसके लिए जहाँ तक हमारा अनुमान है कि इनके पास कोई शब्द प्रमाण नहीं है कि जीवात्मा साकार है।

हमने परोपकारी में जिज्ञासा-समाधान स्तम्भ के अन्तर्गत महर्षि दयानन्द के अनेक प्रमाण दिये। अब फिर उन प्रमाणों को देते हुए महर्षि का नया प्रमाण प्रस्तुत करते हैंः-

१. ‘‘बदला दिये जावेंगे कर्मानुसार, और प्याले भरे हुए, जिस दिन खड़े होंगे रूह और फरिश्ते सफ़ बांधकर’’ मं. ७/सि./३०/सू. ७८/आ. २६/३४/३८

समीक्षा-यदि कर्मानुसार फल दिया जाता है तो……….और रुह निराकार होने से वहाँ खड़ी क्योंकर हो सकेगी।’’ सत्यार्थप्रकाश समु. १४ (द. ग्रं. मा. भाग एक सं. १२९ वाँ बलिदान समारोह २०१२)

२. ‘‘इसी प्रकार भक्तों की उपासना के लिए ईश्वर का कुछ आकार होना चाहिए, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं, परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है वह भी आकार रहित है, यह सब कोई मानते हैं अर्थात् वैसा आकार न होते हुए भी हम परस्पर एक-दूसरे को पहचानते हैं और प्रत्यक्ष कभी न देखते हुए भी केवल गुणानुवादों ही से सद्भावना और पूज्य बुद्धि मनुष्य के विषय में रखते हैं।’’ (पूना प्रवचन व्या. १)े

प्रश्न- ‘‘मूर्त पदार्थों के बिना ध्यान कैसे बनेगा?

उत्तर- शब्द का आकार नहीं, तो भी शब्द ध्यान में आता है वा नहीं? आकाश का आकार नहीं तो भी आकाश का ज्ञान करने में आता है वा नहीं? जीव का आकार नहीं तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं……।’’ (पूना. प्र. व्या. ४)

महर्षि दयानन्द का एक और प्रमाण सटीक व स्पष्ट रूप से देखिये-

यच्चेतनवत्वं तज्जीवत्वम्। जीवस्तु खलु चेतनस्वभावः।

अस्येच्छादयो धर्म्मास्तु निराकारोऽविनाश्यनादिश्च वर्त्तन्ते।

‘‘जो चेतन है, वह जीव है और जीव का चेतन ही स्वभाव है। उसके इच्छा आदि धर्म हैं तथा वह भी निराकार और नाश से रहित रहता है।’’ (महर्षि दयानन्द सरस्वती का पत्र व्यवहार भाग-१)

ये सभी शब्द प्रमाण हमने महर्षि दयानन्द के दिये हैं, इन आर्ष प्रमाणों को स्वीकार न कर अपनी काल्पनिक मिथ्या बात को सर्वोपरि रख उसको प्रचारित करना हठ-दूराग्रह ही हो सकता है।

अब इन आत्मा को साकार मानने वालों का जो कथन है कि निराकार परमात्मा में निराकार आत्मा कैसे रह सकता है? इनके इस कथन का उत्तर है कि जैसे साकार वस्तुएँ एकदेशीय होती हुईं निराकार परमात्मा में रहती हैं, वैसे ही एकदेशीय निराकार आत्मा भी निराकार परमात्मा में रहती है। यहाँ विशेष ध्यान देने की बात यह है कि आत्मा और परमात्मा निराकार होते हुए भी दोनों सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म रूप से भेद रखते हैं। इस विषय में महर्षि दयानन्द प्रश्नोत्तर पूर्वक सत्यार्थप्रकाश में लिखते हैं-

प्रश्न जिस जगह में एक वस्तु होती है उस जगह में दूसरी नहीं रह सकती, इसलिए जीव और ईश्वर का संयोग सम्बन्ध हो सकता है, व्याप्य-व्यापक का नहीं?

उत्तरयह नियम समान आकार वाले पदार्थों में घट सकता है, असमान आकृति में नहीं।…….वैसे जीव परमेश्वर से स्थूल और परमेश्वर जीव से सूक्ष्म होने से परमेश्वर व्यापक और जीव व्याप्य है।’’ महर्षि के इन वचनों से यह बात स्पष्ट हुई कि ईश्वर और जीव इयत्ता की दृष्टि से दोनों परिमाण वाले हैं, एक सूक्ष्म है दूसरा सूक्ष्मतर है, इस आधार पर एक व्याप्य है और दूसरा व्यापक है, एक एकदेशीय है तो दूसरा सर्वदेशीय है। आत्मा परमेश्वर से कुछ स्थूल है। कुछ स्थूल होने से निराकार आत्मा निराकार परमात्मा में रहता है। आत्मा के इस प्रकार रहने में कोई विरोध नहीं आ रहा।

अब साकार-निराकार पर विचार कर लेते हैं कि साकार व निराकार कहते किसे हैं।

१. जो पदार्थ आँख से दिखाई दे, वह साकार और इसके अतिरिक्त निराकार।

२. जो पदार्थ इन्द्रियों से प्रतीत होवे वह साकार और जो इन्द्रियों से प्रतीत न होवे वह निराकार।

३. जो पदार्थ प्रकृति से बना हुआ है, वह साकार और जो प्रकृति से नहीं बना वह निराकार।

पाठक विचार करके देखें कि वैदिक सिद्धान्त के अनुसार जीवात्मा में कौन सी परिभाषा घट रही है? इन तीनों परिभाषाओं में से एक भी परिभाषा जीवात्मा में नहीं घटेगी। क्योंकि जीवात्मा आँखों से दिखाई नहीं देता, इन्द्रियों से प्रतीत नहीं होता और न ही प्रकृति के अवयवों से बना हुआ। जब इन सब साकार की परिभाषाओं में जीवात्मा का स्वरूप घट ही नहीं रहा, तब जीवात्मा निराकार न होकर साकार कैसे हुआ, हाँ हो सकता है इन साकार मानने वाले अवतारों का आत्मा साकार हो।

आत्मा को निराकार न मानने वालों का तर्क है कि महर्षि ने आत्मा को निराकार न कहकर परिच्छिन्न लिखा है, इसलिए आत्मा निराकार नहीं है। इनके इस तर्क में कितना दम-खम है वह देख लेते हैं। जहाँ महर्षि ने आत्मा को परिच्छिन्न कहा है, वह किस सन्दर्भ में कहा है, वह सन्दर्भ पाठकों के लिए ज्यों का त्यों यहाँ लिख रहे हैं कि पाठक स्वयं जान लें कि सन्दर्भ आत्मा को निराकार-साकार दर्शाने के लिए है या कुछ और जानने के लिए। लीजिए सन्दर्भ प्रस्तुत है-

‘‘प्रश्न- जीव शरीर में भिन्न विभु है, वा परिच्छिन्न?

उत्तर- परिच्छिन्न। जो विभु होता तो जाग्रत, स्वप्न, मरण, जन्म,संयोग, वियोग, जाना, आना कभी नहीं हो सकता। इसलिए जीव का स्वरूप अल्पज्ञ, अल्प, अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर का अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर, अनन्त, सर्वज्ञ और सर्वव्यापक स्वरूप है। इसलिए जीव और परमेश्वर का व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है।’’ स.प्र.स.७

महर्षि के इन वचनों में आत्मा को निराकार कहने का कोई अवसर ही नहीं है। यहाँ तो महर्षि आत्मा के विभु अर्थात् सर्वव्यापक अथवा परिच्छिन्न अर्थात् एकदेशीय होने को लेकर चर्चा कर रहे हैं और इस चर्चा में महर्षि आत्मा को परिच्छिन्न=एकदेशीय युक्ति तर्क से सिद्ध कर रहे हैं। इस प्रकरण को न समझ समझाकर इससे अपनी काल्पनिक बात को प्रस्तुत कर जन सामान्य में मतिभ्रम फैलाना विद्वानों का कार्य नहीं हो सकता।

आओ साथ-साथ इस परिच्छिन्न और विभु शब्दों के अर्थों को और देख लेते हैं कि जिससे और स्पष्ट हो जाये कि यह सन्दर्भ आत्मा को निराकार न कहने के लिए है वा एकदेशीय।

‘‘प्रश्न- जीव शरीर में विभु है वा परिच्छिन्न?

उत्तर – परिच्छिन्न। जो विभु होता तो जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मरण, जन्म, संयोग, वियोग, जाना, आना नहीं हो सकता। इसलिए जीव का स्वरूप अल्पज्ञ, अल्प अर्थात् सूक्ष्म है और परमेश्वर का अतीव सूक्ष्मात्सूक्ष्मतर, अनन्त, सर्वज्ञ और सर्वव्यापकस्वरूप है। इसलिए जीव और परमेश्वर का ‘व्याप्य-व्यापक’ सम्बन्ध है।’’ स.प्र.७

महर्षि ने यहाँ साकार-निराकार निरुपण किया ही नहीं, यहाँ तो विभु अथवा परिच्छिन्न की चर्चा की है, ऐसा होते हुए भी कुछ अतिविद्वान् इस प्रसंग से आत्मा को साकार अथवा निराकार न होना सिद्ध करते हैं। पाठक स्वयं विचार कर देखें कि ऋषि की आढ़ में अपने मन्तव्य परोसना चाह रहे हैं या……।

आत्मा के निराकार होने के अनेक प्रमाण हमने यहाँ महर्षि दयानन्द के दे दिये हैं। इतना होने पर भी महर्षि के मन्तव्य को कोई स्वीकार न करे तो इसको अपना दम्भ वा महत्वाकांक्षा ही कह सकते हैं।

पुस्तक परिचय पुस्तक का नाम – ऋषि दयानन्द की प्रारमभिक जीवनी

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नामऋषि दयानन्द की प्रारमभिक जीवनी

लेखक         – दयाल मुनि आर्य

समपादक      – भावेश मेरजा

प्रकाशकडॉ. राजेन्द्र विद्यालंकार, सत्यार्थ

प्रकाश न्यास, 14251, सै. 13,

अर्बन एस्टेट, कुरु क्षेत्र, हरि.136118

पृष्ठ 168    मूल्य – निःशुल्क

महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्र के ऊपर अनेक ऋषि भक्तों ने कार्य किया उनमें मुखय रूप से धर्मवीर पं. लेखराम, बाबु श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द जी व उर्दू के जीवनी लेखक पं. लक्ष्मण  आर्योपदेशक आदि। इन श्रद्धालु महानुभावों ने अपना अमूल्य समय व धन लगा कर जहाँ-जहाँ ऋषिवर गये वहाँ-वहाँ पहुँचकर ऋषि जीवन की एक-एक घटना को एकत्र करने का पुण्य कार्य किया। जिनके इस पुण्य कार्य के कारण आज हम महर्षि दयानन्द के जीवन से परिचित अपने को अनुभव करते हैं।

महर्षि की मान्यता रही है कि जो भी इतिहास रूप में लिखा जाये वह सत्य के आधार पर ही लिखा जाये। महर्षि ने अपने जीवन के विषय में जो बताया वा लिखा वह तो प्रामाणिक है ही तथा महर्षि के देहपात होने के कुछ काल बाद जो ऋषि के श्रद्धालुओं ने परिश्रम करके ऋषि जीवन को लिखा वह भी  प्रामाणिक है। महर्षि दयानन्द जी की स्वयं इस बात के पक्षधर थे कि उनके विषय में जो लिखा जाये वह इतिहास सत्य ही लिखा जाये। यह बात महर्षि के एक ऐतिहासकि पत्र से ज्ञात होती है। इस पत्र को यहाँ ज्यों का त्यों लिखते हैं-

पण्डित गोपालराव हरि जी, आनन्दित रहो।

आज एक साधु का पत्र मेरे पास आया। वह आपके पास भेजता हूँ। साधु का लेख सत्य है, परन्तु आपने चित्तौड़ समबन्घी इतिहास न जाने कहाँ सुन सुना कर लिख दिया। उस काल उस स्थान में मेरा उदयपुराधीश से केवल तीन ही बार समागम हुआ। आपने प्रतिदिन दो बार होता रहा लिखा है। आप जानते हैं कि मुझे ऐसे कामों के परिशोधन का अवकाश नहीं। यद्यपि आप सत्य-प्रिय और शुद्ध भाव-भावित ही हैं और इसी हित-चित्त से उपकारक काम कर रहे हैं, परन्तु जब आपको मेरा इतिहास ठीक-ठीक विदित नहीं तो उसके लिखने में कभी साहस मत करो। क्योंकि थोड़ा-सा भी असत्य हो जाने से समपूर्ण निर्दोष कृत्य बिगड़ जाता है। ऐसा निश्चय रक्खो। और इस पत्र का उत्तर शीघ्र भेजो।

वैशाख शुक्ल 2 सवत् 1939 / स्थान शाहपुरा

दयानन्द सरस्वती

इस पत्र में महर्षि ने विशेष निर्देश किया है कि जो भी उनके विषय में लि जाये वह सत्य से युक्त हो। महर्षि के जीवन काल में ‘दयानन्द दिग्विजपार्क’ नामक जीवनी महाराष्ट्र के एक सज्जन पं. गोपालराव हरि प्रणतांकर जी ने लिखी थी। उनको यह पत्र महर्षि ने लिखा था।

प्रायः महर्षि के प्रारमभीक जीवन के विषय में सभी लेखकों का स्पष्ट मत नहीं आता दिख रहा है, जन्म स्थान माता-पिता का नाम आदि विषयों पर कुछा्रम-सा रहा है। उसा्रम को दूर करने के लिए ऋषि भक्त, चारों वेदों को गुजराती भाषा में अनुवाद करने का श्रेय प्राप्त करने वाले, अनेकों आयुर्वेद के विशाल ग्रन्थों के गुजराती अनुवादक, आयुर्वेदाचार्य, आयुर्वेद चूड़ामणि, डी.लिट्. (आयुर्वेद) उपाधियुक्त, सरल स्वभाव के धनी, टंकारा निवासी श्रीमान् दयाल मुनि आर्य जीने श्रीमान् डॉ. रामप्रकाश जी (कुरुक्षेत्र) कुलाधिपति गुरुकुल कांगड़ी के निवेदन पर महर्षि दयानन्द जी के प्रारमभिक जीवन का परिश्रम करके अन्वेषण किया, उस अन्वेषण को ‘‘ऋषि दयानन्द की प्रारमभिक जीवनी’’ नाम से पुस्तकाकार दे दिया है। जिस पुस्तक का समपादन ऋषि इतिहास व आर्य समाज के इतिहास में रूचि रखने वाले श्रीमान् भावेश मेरजा जी ने किया है।

पुस्तक में पाठकों को ऋषि के आरमभिक जीवन का परिचय कराने के लिए बारह विषय दिये गये हैं। 1. जन्म स्थान विषयक भ्रम निवारण, 2. ऋषि के भ्रातृवंश समबन्धी भ्रम का निराकरण, 3. ऋषि के वंश-वृक्ष की प्राप्ति के प्रयत्न, 4. टंकारा के जीवापुर मुहल्ले से सबन्धित तथ्य, 5.शिवरात्रि का उपासना मन्दिर, 6. ऋषि के स्व वंश समबन्धी तथ्य तथा एतद् विषयक भ्रम का निवारण, 7. ऋषि की माता का नाम क्या था, 8. ऋषि के भाई-बहन व चाचा के नामों के विषय में भ्रम निवारण, 9. ऋषि के महाभिनिष्क्रमण के समबन्ध में भ्रम निवारण, 10. ऋषि के महाभिनिष्क्रमण के बाद दूसरी रात्रि का निवास-स्थान कौन-सा था? 11. लाला भक्त (भगत) योगी नहीं थे, 12. डॉ. जॉर्डन्स की बात का निराकरण। और इस पुस्तक के परिशिष्ट में बड़ी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ सात विषयों को लेकर हैं। ऋषि जीवन प्रेमियों के लिए यह पुस्तक अति महत्त्व रखने वाली है।

लेखक ने प्राक्कथन में अपनी पीड़ा रखी-‘‘मैं ऐसा समझता हूँ कि ऋषि जीवनी के शोध कार्य में पण्डित लेखराम और पण्डित देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय के पश्चात् यदि किसी सुयोग्य व्यक्ति ने इस दिशा में शीघ्र ही शोध कार्य को आगे बढ़ाया होता तो उस समय बहुत कुछ बातें सुलभ होतीं, परन्तु ऐसा हो नहीं पाया और इस कार्य की उपेक्षा के परिणामस्वरूप आज भी हमें ऋषि जीवन विषयक कई छोटे-बड़े भ्रम एवं विवादों का निराकरण करने के लिए प्रवृत्त होना पड़ता है।’’

लेखक के विषय में डॉ. रामप्रकाश जी बड़े विश्वास पूर्वक पुस्तक के निवेदन में लिखते हैं- ‘‘वर्तमान में टंकारा निवासी वयोवृद्ध दयाल मुनि एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें महर्षि के प्रारमभिक जीवनी के विषय में सर्वाधिक सही जानकारी है। उन्होंने यह जानकारी वर्षों की सतत साधना से प्राप्त की है।’’

ऋषि जीवन के प्रारमभीक विषयों के लिए यह पुस्तक समस्त ऋषि प्रेमी, भक्तों को आनन्द देने वाली होगी व जो भी महर्षि जीवनी पर शोध करने वाले हैं उनके लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। सुन्दर आवरण,छपाई व कागज से युक्त इस पुस्तक का प्रकाशन आर्य जगत् के युवा विद्वान् डॉ. राजेन्द्र विद्यालंकार जी ने करवाया है। इस पुस्तक को पाठक प्राप्त कर लेखक के शोध कार्य के दर्शन करेंगे।

– आचार्य सोमदेव

 

मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सत मना ही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

– आचार्य सोमदेव

जिज्ञासाःआदरणीय समपादक महोदय सादर नमस्ते। निवेदन यह है कि मैंने आर्य समाज मन्दिर में महर्षि दयानन्द जी का एक स्टेचू (बुत) जो केवल मुँह और गर्दन का है जिसका रंग गहरा ब्राउन है, रखा देखा है। पूछने पर पता चला कि यह किसी ने उपहार में दिया है। आप कृपया स्पष्ट करें कि क्या महर्षि का स्टेचू भेंट में लेना, बनाना और भेंट देना आर्य समाज के सिद्धान्त के अनुरूप है? जहाँ तक मेरा मानना है महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने की सत मना ही की थी। कृपया स्पष्ट करें।

धन्यवाद, सादर।

– डॉ. पाल

समाधानःमहर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। वे वेद की मान्यतानुसार अपने जीवन को चला रहे थे और समपूर्ण विश्व को भी वेद की मान्यता के प्रति लाना चाहते थे। वेद ईश्वर का ज्ञान होने से वह सदा निर्भ्रान्त ज्ञान रहता है, उसमें किसी भी प्रकार के पाखण्ड अन्धविश्वास का लेश भी नहीं है। वेद ही ईश्वर, धर्म, न्याय आदि के विशुद्ध रूप को दर्शाता है। वेद में परमेश्वर को सर्वव्यापक व निराकार कहा है। प्रतिमा पूजन का वेद में किसी भी प्रकार का संकेत नहीं है। महर्षि दयानन्द ने वेद को सर्वोपरि रखा है। महर्षि दयानन्द समाज की अवनति का एक बड़ा कारण निराकार ईश्वर की उपासना के स्थापना पर प्रतिमा पूजन को मानते हैं। जब से विशुद्ध ईश्वर को छोड़ प्रतिमा पूजन चला है तभी से मानव समाज कहीं न कहीं अन्धविश्वास और पाखण्ड में फँसता चला गया। जिस मनुष्य समुदाय में पाखण्ड अन्धविश्वास होता है वह समुदाय धर्म भीरु और विवेक शून्य होता चला जाता है। सृष्टि विरुद्ध मान्यताएँ चल पड़ती हैं, स्वार्थी लोग ऐसा होने पर भोली जनता का शोषण करना आरा कर देते हैं।

महर्षि दयानन्द और अन्य मत समप्रदाय में एक बहुत बड़ा मौलिक भेद है। महर्षि व्यक्ति पूजा से बहुत दूर हैं और अन्य मत वालों का समप्रदाय टिका ही व्यक्ति पूजा पर है। महर्षि ईश्वर की प्रतिमा और मनुष्य आदि की प्रतिमा पूजन का विरोध करते हैं, किन्तु अन्य मत वाले इस काम से ही द्रव्य हरण करते हैं। इस व्यक्ति पूजा के कारण समाज में अनेक प्रकार के अनर्थ हो रहे हैं। इसी कारण बहुत से अयोग्य लोग गुरु बनकर अपनी पूजा करवा रहे हैं। जीते जी तो अपनी पूजा व अपने चित्र की भी पूजा करवाते ही हैं, मरने के बाद भी अपनी पूजा करवाने की बात करते हैं और भोली जनता ऐसा करती भी है। इससे अनेक प्रकार के अनर्थ प्रारमभ हो जाते हैं। महर्षि दयानन्द ने जो अपना चित्र न लगाने की बात कही है, वह इसी अनर्थ को देखते हुए कही है। महर्षि विचारते थे कि इन प्रतिमा पूजकों से प्रभावित हो मेरे चित्र की भी पूजा आरमभ न कर दें। इसी आशंका के कारण महर्षि ने अपने चित्र लगाने का निषेध किया था।

यदि हम आर्य महर्षि के सिद्धान्तों के अनुसार चल रहे हैं, प्रतिमा पूजन आदि नहीं कर रहे हैं तो महर्षि के चित्र आदि लगाए जा सकते हैं रखे जा सकते हैं। चित्र वा मूर्ति रखना अपने आप में कोई दोष नहीं है। दोष तो उनकी पूजा आदि करने में हैं। महर्षि मूर्ति के विरोधी नहीं थे, महर्षि का विरोध तो उसकी पूजा करने से था। यदि महर्षि केवल चित्र वा मूर्ति के विरोधी होते तो अपने जीवन काल में इनको तुड़वा चुके होते, किन्तु महर्षि के जीवन से ऐसा कहीं भी प्रकट नहीं होता कि कहीं महर्षि दयानन्द ने मूर्तियों को तुड़वाया हो। अपितु यह अवश्य वर्णन मिलता है कि जिस समय महर्षि फर्रुखाबाद में थे, उस समय फर्रुखाबाद बाजार की नाप हो रही थी। सड़क के बीच में एक छोटा-सा मन्दिर था, जिसमें लोग धूप दीप जलाया करते थे। बाबू मदनमोहन लाल वकील ने स्वामी जी से कहा कि मैजिस्ट्रेट आपके भक्त हैं, उनसे कहकर इस मठिया को सड़क पर से हटवा दीजिये। स्वामी जी बोले ‘‘मेरा काम लोगों के मनो से मूर्तिपूजा को निकालना है, ईंट पत्थर के मन्दिरों को तोड़ना-तुड़वाना मेरा लक्ष्य नहीं है।’’ यहाँ महर्षि का स्पष्ट मत है कि वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे, न कि मूर्ति के।

आर्य समाज का सिद्धान्त निराकार, सर्वव्यापक, न्यायकारी आदि गुणों से युक्त परमेश्वर को मानना व उसकी उपासना करना तथा ईश्वर वा किसी मनुष्य की प्रतिमा पूजन न करना है। इस आधार पर महर्षि का स्टेचू भेंट लेना देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विपरीत नहीं, सिद्धान्त विरुद्ध तब होगा जब उस स्टेचू की पूजा आरमभ हो जायेगी। आर्य समाज का सिद्धान्त चित्र की नहीं चरित्र की पूजा अर्थात् महापुरुषों के आदर्शों को देखना अपनाना है।

किसी भी महापुरुष के चित्र वा स्टेचू को देखकर हम उनके गुणों, आदर्शों, उनकी योग्यता विशेष का विचार करते हैं तो स्टेचू का लेना-देना कोई सिद्धान्त विरुद्ध नहीं है। जब हम उपहार में पशुओं वा अन्य किन्हीं का स्टेचू भेंट कर सकते हैं तो महर्षि का क्यों नहीं कर सकते?

घर में जिस प्रकार की वस्तुएँ या चित्र आदि होते हैं उनका वैसा प्रभाव घर में रहने वालों पर पड़ता है। जब फिल्मों में काम करने वाले अभिनेता अभिनेत्रियों के भोंडे कामुकतापूर्ण चित्र वा प्रतिमाएँ रख लेते हैं, लगा लेते हैं तो घर में रहने वाले बड़े वा बच्चों पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है आप स्वयं अनुमान लगाकर देख सकते हैं। इसके विपरीत महापुरुषों क्रान्तिकारियों के चित्र घर में होते हैं तो घर वालों पर और बाहर से आने वालों पर कैसा प्रभाव पड़ता होगा। घर में रहने वालों की विचारधारा को घर में लगे हुए चित्र व वस्तुएँ बता देती हैं। अस्तु।

महर्षि ने अपनी प्रतिमा बनाने का विरोध किया था, वह क्यों किया इसका कारण ऊपर आ चुका है। स्टेचू, चित्र आदि का भेंट में लेना-देना आर्य समाज के सिद्धान्त के विरुद्ध नहीं है। यह लिया-दिया जा सकता है, कदाचित् इसकी पूजा वा अन्य दुरुपयोग न किया जाय तो। इसमें इसका भी ध्यान रखें कि पुराण प्रतिपादित कल्पित देवता जो कि चार-आठ हाथ व चार-ेपाँच मुँह वाले वा अन्य किसी जानवर के  रूप में हों उनसे लेने देने से बचें।

– ऋषि उद्यान, पुष्कर मार्ग, अजमेर