Category Archives: हुतात्मा नाथूराम गोडसे

नाथूराम का मृत्युपत्र

प्रिय बन्धो चि. दत्तात्रय वि. गोडसे!

मेरे बीमा के रूपये आ जायेंगे तो उस रूपये का विनियोग अपने परिवार के लिए करना। रूपये 2000 आपके पत्नी के नाम पर, रूपये 3000 चि. गोपाल की धर्मपत्नी के नाम पर और रूपये 2000 आपके नाम पर। इस तरह से बीमा के कागजों पर मैंने रूपये मेरी मृत्यु के बाद मिलने के लिए लिखा है।मेरी उत्तरक्रिया करने का अधिकार अगर आपको मिलेगा तो आप अपनी इच्छा से किसी तरह से भी उस कार्य को सम्पन्न करना। लेकिन मेरी एक ही विशेष इच्छा यही लिखता हूँ।
अपने भारतवर्ष की सीमा रेखा सिंधु नदी है जिसके किनारों पर वेदों की रचना प्राचीन द्रष्टाओं ने की है।वह सिंधुनदी जिस शुभ दिन में फिर भारतवर्ष के ध्वज की छाया में स्वच्छंदता से बहती रहेगी उन दिनों में मेरी अस्थि या रक्षा का कुछ छोटा सा हिस्सा उस सिंधु नदी में बहा दिया जाएँ। मेरी यह इच्छा सत्यसृष्टि में आने के लिए शायद ओर भी एक दो पीढियों (Generations) का समय लग जाय तो भी चिन्ता नहीं। उस दिन तक वह अवशेष वैसे ही रखो। और आपके जीवन में वह शुभ दिन न आया तो आपके वारिसों को ये मेरी अन्तिम इच्छा बतलाते जाना। अगर मेरा न्यायालीन वक्तव्य को सरकार कभी बन्धमुक्त करेगी तो उसके प्रकाशन का अधिकार भी मैं आपको दे रहा हूँ।
मैंने 101 रूपये आपको आज दिये है जो आप सौराष्ट्र सोमनाथ मन्दिर पुनरोद्धार हो रहा है उसके कलश के कार्य के लिए भेज देना।
वास्तव में मेरे जीवन का अन्त उसी समय हो गया था जब मैंने गांधी पर गोली चलायी थी। उसके पश्चात मानो मैं समाधि में हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ। मैं मानता हूँ कि गांधी जी ने देश के लिए बहुत कष्ट उठाएँ, जिसके लिए मैं उनकी सेवा के प्रति और उनके प्रति नतमस्तक हूँ , किन्तु देश के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि का विभाजन करने का अधिकार नहीं था।
मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता और ना ही चाहता हूँ कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करें। अपने देश के प्रति भक्ति-भाव रखना अगर पाप है तो मैं स्वीकार करता हूँ कि वह पाप मैंने किया है। अगर वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पर मेरा नम्र अधिकार है। मुझे विश्वास है की मनुष्यों के द्वारा स्थापित न्यायालय से ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमें मेरे कार्य को अपराध नहीं समझा जायेगा। मैंने देश और जाति की भलाई के लिए यह कार्य किया है। मैंने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीतियों के कारण हिन्दुओं पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए। मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा कार्य ‘नीति की दृष्टि’ से पूर्णतया उचित है। मुझे इस बात में लेशमात्र भी सन्देह नहीं की भविष्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेंगे तो वे मेरे कार्य को उचित ठहराएंगे।
कुरूक्षेत्र और पानीपत की पावन भूमि से चलकर आने वाली हवा में अन्तिम श्वास लेता हूँ। पंजाब गुरू गोविंद की कर्मभूमि है। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव यहाँ बलिदान हुए। लाला हरदयाल तथा भाई परमानंद इन त्यागमूर्तियों को इसी प्रांत ने जन्म दिया।
उसी पंजाब की पवित्र भूमि पर मैं अपना शरीर रखता हूँ। मुझे इस बात का संतोष है। खण्डित भारत का अखण्ड भारत होगा उसी दिन खण्डित पंजाब का भी पहले जैसा पूर्ण पंजाब होगा। यह शीघ्र हो यही अंतिम इच्छा !

आपका शुभेच्छु
नाथूराम वि. गोडसे
14-11-49

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नाथूराम गोडसे द्वारा हस्तलिखित मृत्युपत्र की प्रति

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-सौ▪ गाँधी वध क्यों?

हुतात्मा नाथूराम गोड़से का ‘दिव्य संदेश’

वास्तव में मेरे जीवन का उसी समय अंत हो गया था, जब मैंने गाँधी पर गोली चलाई थी। उसके पश्चात् मैं मानो समाधि में हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ।
मैं मानता हूँ कि गाँधी जी ने देश के लिए बहुत कष्ट उठाए, जिसके कारण मैं उनकी सेवा के प्रति एवं उनके प्रति नतमस्तक हूँ, किन्तु देश के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि के विभाजन का अधिकार नहीं था।
  मैं किसी प्रकार की दया नहीं चाहता हूँ। मैं यह भी नहीं चाहता हूँ कि मेरी ओर से कोई दया की याचना करे।
अपने देश के प्रति भक्ति-भाव रखना यदि पाप है तो मैं स्वीकार करता हूँ कि वह पाप मैंने किया है। यदि वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य-पद पर मेरा नम्र अधिकार है।
मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा कार्य नीति की दृष्टि से पूर्णतया उचित है। मुझे इस बात में लेशमात्र भी सन्देह नहीं कि भविष्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार लिखेंगे तो वे मेरे कार्य को उचित ठहराएँगे।

-हुतात्मा नाथूराम गोड़से

हुतात्मा नाथूराम जी की अस्थियाँ

नाथूराम गोड़से और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी राख उनके परिवार वालों को नहीं सौंपी गई थी। जेल अधिकारियों ने अस्थियों और राख से भरा मटका रेल्वे पुल के उपर से घग्गर नदी में फ़ेंक दिया था। दोपहर बाद में उन्हीं जेल कर्मचारियों में से किसी ने बाजार में जाकर यह बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह खबर एक स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई। इन्द्रसेन उस वक्त “द ट्रिब्यून” के कर्मचारी भी थे। शर्मा ने तत्काल दो महासभाईयों को साथ लिया और दुकानदार द्वारा बताई जगह पर पहुँचे। उन दिनों नदी में उस जगह सिर्फ़ छ्ह इंच गहरा ही पानी था, उन्होंने वह मटका वहाँ से सुरक्षित निकालकर स्थानीय कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश कोहल को सौंप दिया, जिन्होंने आगे उसे डॉ एलवी परांजपे को नाशिक ले जाकर सुपुर्द किया। उसके पश्चात वह अस्थि-कलश 1965 में नाथूराम गोड़से के छोटे भाई गोपाल गोड़से तक पहुँचा दिया गया, जब वे जेल से रिहा हुए। फ़िलहाल यह कलश पूना में उनके निवास पर उनकी अन्तिम इच्छा के मुताबिक सुरक्षित रखा हुआ है।

नाथूराम गोड़से का न्यायालय में दिए गए ब्यान का सारांश

“मुझे सपष्ट दिखाई देता था कि यदि मैं गाँधी जी का वध करूँगा तो मुझे जड़ मूल से नष्ट कर दिया जाएगा। लोग मुझसे घृणा करेंगे और मेरा आत्मसम्मान जो मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है वो नष्ट हो जाएगा। किन्तु साथ में मैं ये भी जानता था कि गांधी जी सदा-सदा के लिए विदा हो जाएँगे और देश नपुंसक तत्व अहिंसा को त्यागकर शक्तिशाली बनेगा। मैं अवश्य मरूँगा लेकिन देश अत्याचारों से मुक्त होगा। सब मुझे देशद्रोही और मूर्ख कहेंगे पर देश ऐसे मार्ग पर चलेगा जो उचित होगा। ये सब सोचकर 30 जनवरी 1948 के दिन मैंने गांधी का वध किया।
मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं है। अगर देशभक्ति पाप है तो मैं मानता हूँ कि मैंने ये पाप किया है।”

नाथूराम गोडसे : न्यायालय में दिए गए ब्यान का सारांश , दिल्ली 8 नवंबर 1948 अभियुक्त क्रमांक

सौजन्य :- पुस्तक “गांधी वध क्यों”