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व्रुपासि वास्त्रा वैदिक वाड्.मय में पृथिवी – प्रो.-छाया ठाकुर

            लैटिन भाष के शब्द साइंटिया (Scientia) जिसका अर्थ ज्ञान है से व्युत्पन्न साइंस अर्थात् विज्ञान (विशिष्ट ज्ञानं विज्ञानमिति) प्रयोग और परीक्षण द्वारा सत्यापित ज्ञान है। विज्ञान की दो शाखायें हैं (१) प्राकृतिक विज्ञान (Natural Science) (२) सामाजिक विज्ञान (Human Science)। प्राकृतिक विज्ञान ही वह आधारभूत विज्ञान है जिसमें प्रकृति और पदार्थ का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। प्राकृतिक विज्ञान की एक शाखा भौतिक विज्ञान के अन्तर्गत हम ब्रह्माण्ड में स्थित वस्तुओं, क्रियाओं और उन्हें प्रभावित करने वाले कारकों का अध्ययन करते हैं। पदार्थ का अध्ययन करनेवाले समस्त विज्ञानों को भौतिक विज्ञान (Matarial Science) कहते हैं। पदार्थ-विज्ञान के अन्तर्गत ही हम ब्रह्माण्ड में स्थित विभिन्न तत्वों जैसे सूर्य, वायु, मेघ, पृथिवी, प्रकाश आदि का अध्ययन करते हैं।

            वैदिक साहित्य ही ज्ञान विज्ञान की परम्परा का वह उत्स है जो उत्तरोत्तर विकसित और समृद्ध होता गया। धातु विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, औषधि विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, गणित, ज्यामितीय, परमाणु विज्ञान और ज्योतिष आदि समस्त विज्ञानों का मूल वैदिक संहिताओं में ही खोजा जा सकता है। आधुनिक विज्ञान के मूलभूत तत्व हमें वैदिक साहित्य में उपलब्ध होते हैं। आवश्यकता है, उन्हें ढूँढने की, उस गुह्य-ज्ञान को अनावृत करने की। इस संगोष्ठी पदार्थ-विज्ञान के अन्तर्गत आनेवाले विभिन्न ब्रह्माण्डकीय प्राकृतिक तत्वों के वैदिक स्वरूपों के अध्ययन पर केन्द्रित है। इस संगोष्ठी के लिये निर्धारित विषयों में से मैंने ‘‘वेदों में पृथिवी का स्वरूप’’ इस विषय पर अपना आलेख लिखने का प्रयास किया है।

            प्रस्तुत आलेख में पृथिवी के स्वरूप का अध्ययन तीन दृष्टियों से किया गया है-

            (१) आधुनिक विज्ञान में पृथिवी का स्वरूप

            (२) ऋग्वेद में पृथिवी का स्वरूप

            (३) अथर्ववेद में पृथिवी का स्वरूप

१         आधुनिक विज्ञान में पृथिवी का स्वरूपः

            ब्रह्माण्ड तीन भागों में विभाजित है- (१) पृथ्वी (२) अन्तरिक्ष (३) द्यौः। द्यौः और पृथ्वी के बीच का भाग अन्तरिक्ष कहलाता है। इस ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा हिस्सा है। हमारे सौरमण्डल का केन्द्र सूर्य है। इस सौर परिवार में पृथिवी सहित नौ ग्रह, उपग्रह ग्रहिकायें और पुच्छल तारे हैं। ये सभी सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य के निकटतम बुध (Mercury) है, उसके बाद क्रमशः शुक्र, पृथिवी मंगल, बृहस्पति, शनि, अरूण, वरूण और यम हैं। पृथिवी को अन्य ग्रहों से पृथक् करनेवाली विशेषता यह है कि पृथ्वी पर जीवन है, अन्य ग्रहों में नहीं।

            सौरमंण्डल में सर्वाधिक प्रसिद्ध और मानव तथा जैव जगत् के लिये सर्वाधिक उपादेय ग्रह पृथ्वी ही है। यह बुध, शुक्र, मंगल और कुबेर (यम) से बड़ा और अन्य ग्रहों से छोटा ग्रह है। इसका व्यास १२७६० कि. मी. है। यह सूर्य से १४ करोड़ ८८ लाख कि. मी. की दूरी पर स्थित है। यह अपनी धुरा पर चैबीस घंटों में एक बार घूम जाती है। सूर्य की परिक्रमा करने में इसे ३६५ दिन ६ घंटे लगते हैं। यह अपनी धुरा पर २३ १/२ झुकी हुई है और इस झुकाव के कारण पृथिवी पर सौर ताप की प्राप्ति, वर्षा तथा ऋतुओं पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

पृथिवी की उत्पत्तिः

            पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धान्त पर आधुनिक वैज्ञानिकों में मतवैभिन्य है। कुछ वैज्ञानिकों को कथन है कि केवल सूर्य से ही पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की उत्पत्ति हुई है। कुछ कहते हैं कि एक तारा सूर्य से टकराया और इससे होनेवाले बिखराव से पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की उत्पत्ति हुई। आधुनिक काल में सर्वप्रथम १७४५ में बफन ने, १७५५ में काण्ट और १७९६ में लाप्लास ने पृथ्वी और सौरमण्डल की उत्पत्ति के बारे में विज्ञान सम्मत सिद्धान्त किये। पृथ्वी की उत्पत्ति के सिद्धान्त को तीन वर्गों में रखा जा सकता है-

            (१) एक तारक या अद्वैतवादी सिद्धान्त- यह सिद्धान्त बफन, काण्ट लाप्लास, हर्शल एवं रोशे (फ्रांसीसी) ने प्रस्तुत किया।

            (२) द्वैतारक या द्वैतवादी सिद्धान्त- यह सिद्धान्त गोल्टन और चेम्बरलीन (अमेरिकी) जीन्स, जैफ्रे और रसैल नामक विद्वानों ने प्रस्तुत किया।

            (३) आधुनिक सिद्धान्त- द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अत्याधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों और ब्रह्माण्ड के संबंध में एकत्रित की गई जानकारी पर ये सिद्धान्त आधारित हैं। इनमें मुख्यतः डॉ. ऑफवन, प्रो. होयल, एवं लिटिलटन (ब्रिटिश) का नोवा तारा सिद्धान्त, राजसन का आवर्तन एवं ज्वारीय सिद्धान्त तथा डॉ. बैनर्जी का सीफिड सिद्धान्त उल्लेखनीय है।

पृथिवी की उत्पत्ति की वैदिक अवधारणाः

            ऋग्वेद में परमेश्वर से ही सृष्टि का विकास माना गया है। स्वयंभू परमेश्वर (पुरूष) ने पहले महान अर्णव में गर्भ धारण किया जिससे प्रजापति उत्पन्न हुआ। ये महदण्ड संख्यातीत थे। इन्हीं अण्डों से अतिदूरस्थं सृष्टियाँ (Galaxy) उत्पन्न हुई। मानवधर्मशास्त्र के अनुसार हिरण्याण्ड के दो शकलों से दिव के और भूमि की उत्पत्ति हुई। तदनुसार पहले भूमि बनी और बाद में दिव के सूर्य आदि अस्तित्व में आये। यही बात शतपथ बाह्मण में भी कही गई है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा गया है कि प्रजापति ने भू शब्द उच्चारा और उसने भूति उत्पन्न की। प्रजापति अथवा ईश्वर के इस उच्चारण से भूमि आदि सृष्टियाँ बनीं, इस बात की प्रतिध्वनि बाईबिल में भी देखी जा सकती है। त्वष्टा जो जो बोला वही हुआ। बाईबिल का ईश्वर और ब्राह्मण ग्रंथों का त्वष्टा ही प्रजापति है-

१. And God said, Let there be light; ans there was light.

६.  And God said, Let there be a Hrmament (Heaven)

९. And God said, Let the dry land appear

१४. And God said, Let there be lights (Sun, Moon) in the firmament-Ch. १.३ (Old Testament)

यही भाव ऋग्वेद, कठोपनिषद् और गीता में भी व्यक्त हुआ है। यही बात पुराणों में भी दुहरायी गई है-भूरिति व्याहृते पूर्वं भूलोकश्व ततो भवत्।

            उपर्युक्त विवरण से हम इस निष्कर्ष पर पहंचते हैं कि हिरण्यगर्भ से ही भौतिक पदार्थों और सृष्टि (Galaxy) का विकास हुआ। वर्तमान सृष्टि का विकास आज से लगभग १९७.३ करोड़ वर्ष पूर्व आरंभ हुआ, ऐसी प्राचीन ग्रंथों की मान्यता है। पृथ्वी और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की आयु तो इससे भी अधिक है। वर्तमान वैज्ञानिक भी विभिन्न प्रमाणों के आधार पर पृथ्वी की उत्पत्ति को २०० करोड़ वर्ष पूर्व की मानते हैं।

पृथ्वी के स्वरूप की वैदिक धारणाः

बौद्ध दर्शन की मान्यता है कि जिस तरह अन्य ग्रह आधारशून्य होकर भ्रमणशील हैं उसी तरह पृथ्वी भी है और उसमें गुरूत्व भी है जिससे वह निरन्तर नीचे की ओर गतिमान है। उपनिषदों को प्रामाणिक मानकर वेदान्त दर्शन में कहा गया है। कि जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जल का आधार पृथिवी है। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री आर्यभट्ट  (४७६ ई.) की धारणा है कि पृथ्वी आकाश में निराधार अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है जिससे रात-दिन होते हैं। तत्पश्चात् दूसरे खगोलवैज्ञानिक वराहमिहिर  (५०५ ई.) ने कहा कि पञ्चमहाभूतमयी यह पृथिवी चुम्बक से घिरी होकर आकाश में टिकी है। ११५० ई. में वैज्ञानिक भास्कराचार्य ने भी कहा कि पृथ्वी का कोई आधार नहीं है। यह अपनी शक्ति से ही स्वभाववश आकाश में स्थित है। और सभी प्राणियों का आधार है।

पञ्चमहाभूतमयी पृथिवी में पांच विशिष्ट गुण पाये जाते हैं-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध। गन्ध पृथिवी का अतिविशिष्ट गुण है जो अन्य किसी द्रव में नहीं पाया जाता।

२. ऋग्वेद में द्यावापृथिवी का स्वरूपः

ऋग्वेद के अध्ययन से द्यावा-पृथिवी के संबंध में निम्नलिखित वैज्ञानिक तथ्य सामने आते हैं-

(१) द्यावा-पृथिवी की उत्पत्तिः

१.        परमात्मा से ही द्यावापृथिवी की उत्पत्ति हुई है और वह इन दोनों में व्याप्त है।

२.        सूर्य को द्यावापृथिवी का जन्मदाता कहा गया है।

३.        इसके विपरीत एक स्थान पर सूर्य को द्यावापृथिवी का पुत्र कहा गया है।

(२) सूर्य से ही पृथिवी प्रकाशित होती हैः- द्यावापृथिवी के बीच से सूर्य प्रकाश आदि धारण करने के धर्म से गतिशील है।

(३) पृथिवी अत्यधिक विस्तृत हैः- इसके लिये महिनी, अरूव्यचसा (१.१६०.२), उर्वी (विस्तीर्ण) पृथ्वी (फैली हुई) (६.७०.६) ज्येष्ठे मही रूचा द्यावापृथिवी (४.५६.१) कहा गया है।

(४) पृथिवी अपनी धुरी पर घुमती हैः

            ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा है कि पृथिवी अनेक तरह से विचरण करने वाली है (विचारिणी ५.७०.२) ऋतावरी (४.५६.२), घृतवती (६.७०.१) है। वह जल से युक्त, जल की शोभा से युक्त (घृतश्रिया) जल से संबंध रखनेवाली (घृतपृचा), जल का संवर्धन करने वाली है।

३. अथर्ववेद में पृथिवी का स्वरूपः

            वेदों में पृथिवी का कोई मूर्त रूप नहीं है। आधुनिक भूगोल विज्ञान, भूविज्ञान आदि में जो स्वरूप पृथिवी का है, मुख्यतया वही भौतिक स्वरूप हम अथर्ववेद में भी पाते हैं, यद्यपि कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को भी उसमें खोजा जा सकता है।?

            अथर्ववेद के १२ वें काण्ड का प्रथम सूक्त, जिसमें ६३ मंत्र हैं, पृथिवी को समर्पित है। यह पृथिवी सूक्त केनाम से विख्यात है। इसे भूमि सूक्त भी कहा जाता है। सभी प्राणी इस पृथिवी की सन्तान है अतः इसे मातृभूमि सूक्त भी कहते हैं। इसमें न केवल पृथिवी के स्वरूप का तथा पृथिवी द्वारा धनधान्य, बल और यश प्रदान करने का उल्लेख है अपितु इसमें मातृभूमि के प्रति कर्त्तव्यपालन करनेवालें के लिये सत्यनिष्ठा, यथार्थबोध, दक्षता, क्षात्रतेज, ब्रह्मज्ञान और त्यागादि गुणों, प्रवृत्तियों और मर्यादाओं का भी उल्लेख है। राष्ट्रीय अवधारणा तथा वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को विकसित और पुष्ट करने के लिये आवश्यक महनीय गुणों का भी समावेश, इसकी उपयोगिता को बढ़ाता है।

            अथर्ववेद में वर्णित पृथिवी सूक्त में पृथिवी के स्वरूप-इसके आधार से अध्ययन किया जा सकता है- (१) पृथ्वी का वैज्ञानिक स्वरूप-इसके आधार पर हम पृथ्वी और सौरमण्डल संबंधी अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का अध्ययन कर सकते हैं। (२) पृथ्वी का भौतिक स्वरूप-इसके आधार पर हम भूगोल विज्ञान से संबंधित तथ्यों की पुष्टि कर सकते हैं।

            (१) पृथ्वी का वैज्ञानिक स्वरूप- इसके आधार पर अनेक वैज्ञानिक तथ्य उभरकर सामने आते हैं-

            (क) पृथिवी की उत्पत्ति-‘‘अथर्वा” विश्व के प्रथम वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का उल्लेख अथर्ववेद में किया है। पृथिवी की उत्पत्ति सूर्य से हुई है, इस तथ्य का उल्लेख १८वें अध्याय के तीसरे सूक्त में किया गया है। इस सूक्त के ग्यारह मन्त्रों में यह कहा गया है कि पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य के हाथों से हुई है। प्रत्येक मन्त्र में इसे बाहुच्युता कहा गया है। ऋग्वेद में एक स्थल पर यह कहा गया है कि वरूण ने सूर्य द्वारा पृथिवी को बनाया या नापा।

            (ख) पृथिवी का केन्द्र बिन्दु सूर्य- हमारे सौरमण्डल का केन्द्र सूर्य ही है और सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, यह एक वैज्ञानिक तथ्य है जिसे अथर्वा ऋषि ने हजारों वर्ष पूर्व ही कह दिया था कि पृथिवी का केन्द्रबिन्दु (हृदय) आकाश में है- यस्य हृदयं परमे व्योमन्। आकाश में सूर्य के रूप में अग्नि है और अन्तरिक्ष उसी से प्र्रकाशित होता है- अग्निर्दिव आ तपत्यग्नेर्देवस्योर्वऽन्तरिक्षम्।

            (ग) पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है- पृथिवी द्वारा सूर्य की परिक्रमा करने का वैज्ञानिक सिद्धान्त अथर्ववेद के इस मंत्र में भी दृष्टिगत होता है-

पृथिवी सूकराय वि जिहीते मृगाय।

            अथर्ववेद में कहा गया है कि पृथिवी काँपते हुए चलती है। काँपते हुए चलने से तात्पर्य लट्टू की तरह अपने ही चारों ओर घूमते हुए चलने से है। पृथिवी की इस दैनिक गति से दिन और रात होते हैं यह बात भूगोलवत्ता भी जानते हैं। यही तथ्य हजारों वर्ष पूर्व अथर्ववेद में उद्घाटित किया गया है- याऽप् सर्पं विजयमाना विमृग्वरी। रात और दिन का उल्लेख ऋषि ने अहोरात्रे कहकर किया है।

(घ) पृथिवी पञ्चतन्मात्राओं से यूक्त है- पंचमहाभूतमय पदार्थों में पृथिवी ही ऐसा द्रव्य है जिसमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध पाये जाते हैं। पृथिवी का प्रधान गुण गंध है जो अन्य किसी द्रव्य में नहीं पाया जाता अतः उसे गन्धवती पृथिवी कहा गया है-

            यस्ते गंधः पृथिवी सम्बभूव यं बिभ्रत्योषधयो यमाषः

            यं गन्धर्वा अप्सरश्व भेजिरे तेन मा सुरभिं कृणु।।

            पृथिवी सूक्त के १२.१.२४ और २५वें मंत्र में भी पृथिवी के गंधयुक्त होने की बात कही गई है।

(ड.) गुरूत्वाकर्षण शक्ति- महान वैज्ञानिक न्यूटन ने पृथिवी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धान्त को फल के पृथ्वी पर गिरने के प्रयेाग से सिद्ध किया। इस गुरूत्वाकर्षण शक्ति के सिद्धान्त का अथर्वा ऋषि ने हजारों वर्ष पूर्व उद्घाटित किया है- मल्बं बिभ्रती गुरूभृत् कहकर। अर्थात् पृथ्वी में गुरू पदार्थ को अपनी ओर खींचने और धारण करने की शक्ति है।

            पृथिवी की आकर्षण शक्ति का वर्णन पातजंलि (१५०ई. पू.) भास्कराचार्य द्वितीय (१११४ ई.) वराहमिहिर (४७० ई.) और श्रीपति (१०३९ ई.) ने भी किया है, प्रत्येक परमाणु में आकर्षण शक्ति है और इसी शक्ति के कारण पृथिवी सूर्य और चन्द्रमा तीनों एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। सभी ग्रह एक-दूसरे के आकर्षण से बंधे हैं, यही कारण है कि वे आकाश में निराधार टिके हैं और नीचे नहीं गिरते।

            (च) पृथिवी का स्वरूप एवं आकार- पृथ्वी सूक्त में पृथिवी के स्वरूप एवं आकार का वर्णन अनेक मंत्रों में मिलता है। पृथिवी लंबी, चौड़ी, विस्तीर्ण, गोल ओर स्थिर है।

            (छ) पृथिवी पहले जलमग्न थी- आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि पृथ्वी पहले जलमग्न थी। प्राचीनकाल में पूरा यूरोप और एशिया जलमग्न था। धीरे-धीरे समुद्र हटता गया और कालान्तर में पृथिवी ऊपर आ गई। यही बात अथर्ववेद में भी कही गई है कि पृथिवी पहले समुद्र में मग्न थी और धीरे-धीरे ऊपर आई-यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीत्।

            पृथ्वी संबंधी उपर्युक्त तथ्यों के अतिरिक्त कुछ सामान्य वैज्ञानिक अवधारणाओं की पुष्टि भी पृथिवी सूक्त करता है-

            (१) ब्रह्माण्ड तीन लोकों में विभाजित है- सभी धर्मशास्त्र और वैज्ञानिकों (खगोल विज्ञान, भूविज्ञान, ज्योतिष्, भूगोल आदि) ने माना है कि यह ब्रह्माण्ड द्यौ, अन्तरिक्ष और पृथ्वी इन तीन लोकों में विभाजित है। अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त में हजारों वर्ष पूर्व यही बात कही गई है- द्यौश्व म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं च मे व्यचः।

            (२) तीन प्रकार की अग्नि- अथर्वा ऋषि ने तीन प्रकार से अग्नि की उत्पत्ति का वर्णन किया है- १. वृक्ष से अग्नि २. जल के मन्थन से अग्नि ३. भूगर्भीय अग्नि उपर्युक्त तीनों प्रकार की अग्नियों का वर्णन करते हुए वे कहते हैं- अग्निर्भूम्यामोषधीष्वग्निमापो बिभ्रत्यग्निरश्मसु। अर्थात् अग्नि भूमि में, विद्युत् रूप में मेघ अर्थात् जल में, ओषधियों में तथा पत्थरों में विद्यमान है।

            पृथ्वी अग्निमयी है- अग्निवासाः पृथिवीः अथर्ववेद में ही अन्यत्र अगिन के आविष्कार के तीन चरणों का उल्लेख है, वहां कहा गया है कि अग्नि पत्थर के घर्षण लकड़ी के घर्षण से और जल के घर्षण से उत्पन्न होती है। एक स्थान पर कहा गया है- यत् ते मध्यं पृथिवी यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवः। यहाँ पृथ्वी के गर्भ में स्थित ऊर्जा से तात्पर्य अग्नि से है जो आज की पृथिवी के गर्भ में लावे के रूप में स्थित है। इसके अतिरिक्त प्राणियों में स्थित जठराग्नि का भी उल्लेख किया गया है-अग्निरन्तुः पुरूषेषु गोष्वश्वेष्वग्नयः।

            (३) खनिज संपदा-  यह पृथिवी खनिज सम्पदा से परिपूर्ण है। इसमें सोना, चाँदी, हीरा आदि बहुमूल्य पदार्थ पाये जाते हैं, जिनका उल्लेख भूमिसूक्त में मिलता है- विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षाः। इस मन्त्र में वसुधानी का तात्पर्य खनिजों की खान और हिरण्यवक्षा का तात्पर्य सुवर्ण, चांदी आदि बहुमूल्य धातुओं से है। अन्यत्र भी वे सुवर्णमयी पृथ्वी को नमस्कार करते हैं- तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिव्या अकरं नमः। एक स्थल पर कहा गया है कि बहुत तरह की खानों में (बहुधा गुहा) ए (वसु) ए रत्न पन्नां, हीरादि (मणि), सोना, चाँदी आदि (हिरण्यं) की खान (निधिं) को धारण करने वाली पृथिवी हमें धन दे निधिं बिभ्रती बहुधा गुहा वसु मणिं हिरण्यं पृथिवी ददातु में वसूनि नो वसुदा रासमाना देवी दधातु सुमनस्यमाना।

            (४) भूकंप- भूगोल विज्ञान में वर्णित भूकंप का विवरण भी पृथिवी सूक्त में मिलता है- महान् वेग एजथु र्वेपथुष्ते। अर्थात् हे पृथिवी आपका हिलना डुलना अत्यन्त वेगवान होता है। यहाँ पृथ्वी के कंपन से भूकंप का संकेत मिलता है। इसका अन्य अर्थ यह भी है कि पृथ्वी जिस गति से आकाश में कंपित होकर जाती है, वह वेग अत्यन्त तीव्र है अर्थात् वह अपनी धुरा पर तेजी से घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती है।

            (५) विभिन्न दिशाओें का विवरण- भूमिसूक्त के इस मंत्र में दसों दिशाओं का विवरण मिलता है-

            ‘‘यास्ते प्राचीः प्रदिशो या उदीचीर्यास्ते भूमे अधरात्” याश्व पश्चात्। आगे वे कहते हैं- हे भूमि पूर्व पश्चिम, उत्तर दक्षिण चारों दिशाओं में प्रहरी बनकर हमारा संरक्षण करें- ‘‘मा नः पश्चान्या पुरस्तान्नुदिष्ठा मोत्तरादधरादुत।

            (६) जलप्रवाहों का संकेत- एक स्थल पर कहा गया है कि पृथिवी अनेक जलधाराओं से युक्त है- भूरिधारे पयस्वती।

            आधुनिक भूगोल में जिन शीत और उष्णजलधाराओं का वर्णन है, संभवतः उन्हीं जलधाराओं की ओर ऋषि का संकेत है। ये जलधारायें पृथिवी की गति, वायु के दबाव और वेग, भूसंरचना आदि के कारण उत्पन्न होती हैं जो तब भी थीं।

            अभी तक हमने पृथिवी सूक्त में पाये जाने वाले वैज्ञानिक तथ्यों का उल्लेख किया है। अब हम पृथ्वी के भौतिक स्वरूप पर दृष्टिपात करेंगे।

            ऋग्वेद के अतिरिक्त अन्य वैदिक वाड्.मय में यत्र तत्र पृथिवी सम्बन्धी कुछ वैज्ञानिक तथ्य हमारे सम्मुख आते हैं जो नियमानुसार हैं-

            (१) आद्र्रा शिथिला पृथिवी- आधुनिक वैज्ञानिकों की भी यह धारणा है कि पृथिवी पहले जलमग्न थी। प्राचीन काल में पूरा यूरोप और एशिया जलमग्न था। शनैः शनै समुद्र हटता गया और कालान्तर में पृथिवी ऊपर आ गई। यह तथ्य अथर्ववेद में वर्णित है- ‘‘यार्णवेऽधिसलिलमग्र आसीत्।’’ काठक तथा मैत्रायणी संहिता में भी पृथिवी को जलप्रधान, आद्र्रा और शिथिला कहा गया है। वात कभी उसे ऊपर और कभी नीचे ले जाती थी। उत्तर की ओर देवताओं का निवास था और दक्षिण में असुरों का। उत्तर की ओर ले जाने पर देवताओं ने इसे दृढ़ किया। यही कारण है कि पृथिवी का अधिकांश भाग उत्तर दिशा में है और दक्षिण में जलाधिक्य है।

            शतपथ ब्राह्मण (६.१.१) में आगे कहा गया है कि इस आधि पृथिवी पर प्रजापति ने क्रमशः १ फेन २ मृद् ३ शुष्काप ४ ऊष ५ सिकता ६ शर्करा ७ अश्मा ८ अयः और हिरण्य तथा ९ ओषधि और वनस्पति को उत्पन्न किया और वनस्पति से पृथ्वी को आच्छादित कर दिया।

            यह पृथिवी के क्रमशः ठोस व शीतल होने तथा उसमें जीवन के संचार का वैज्ञानिक क्रम है। शीतल होने की प्रक्रिया में अग्नि और जल के मेल से फेन उत्पन्न हुआ, जो न सूखा था न गीला।

            अग्नि और मरूत के संयोग से यह फेन सघन हुआ और पृथिवी का निर्माण हुआ। यही सघन फेन मृत में परिवर्तित होकर पृथिवी के रूप में परिणित हो गया।

            तृतीय अवस्था में सूर्य की भयंकर ऊष्मा से पृथ्वी पर स्थित जल सूखने लगा और वह शुष्कय हो गई। जल के शुष्क हो जाने के फलस्वरूप वह ऊसर अर्थात् ऊष, इस चतुर्थ अवस्था को प्राप्त हुई। तत्पश्चात् पृथिवी में सिकता की उत्पत्ति हुई। सिकता ही अंग्रेजी में सिलिका कहलाती है जिसमें सिलिकोन और ऑक्सीजन होता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी पृथ्वी की भीतरी परतों में सिलिका एल्यूमीनियम तथा ऑक्सीजन होने की पुष्टि की है। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (भाग २०,पृ. ५५) में भी ग्रहों के विभिन्न भागों में सिलिका के पाये जानेका उल्लेख है। सिकता से शर्करा की उत्पत्ति हुई। शर्करा का अर्थ है कंकर। शर्करा से पृथ्वी का आन्तरिक भाग भी दृढ़ हो गया। शर्करा के पश्चात् अश्मा (पाषाण) की उत्पत्ति हुई। शर्करा के छोटे-बड़े कण एकत्र हुए और संपीडन द्वारा संहत होकर अश्मा बने। अश्मा के पश्चात् अयः की उत्पत्ति हुई। ‘‘अश्मनो लोहमुत्थितम्” ऐसा उल्लेख महाभारत के उद्योगपर्व में मिलता है। लोहे के पश्चात् रांगा, सीसा सुवर्ण आदि की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् इस ऊसर पृथ्वी पर देवों ने वनस्पति, ओषधियों को उत्पन्न किया। यह पृथिवी वनस्पति व ओषधियों से आवृत्त हो गई।

            (२) अल्पा पृथिवी- तै. संहिता में ऐसा उल्लेख मिलता है कि आरंभ में पृथिवी अल्पा थी और बाद में धीरे-धीरे विस्तृत हुई। आधुनिक वैज्ञानिकों का भी यही मत है कि प्रारंभ में ग्रह छोटे थे और आज भी अपनी आकर्षण शक्ति से अन्तरिक्ष के धूलिकणों को अपनी ओर खींच रहे हैं जिससे अनमें विस्तार हुआ होगा।

            (३) अग्निगर्भा पृथिवी- आधुनिक वैज्ञानिकों का कथन है कि यह पृथिवी प्रारंभ में पिघली चट्टानों का एक गोला था। धीरे-धीरे पृथिवी की ऊपरी सतह ठंडी होकर ठोस हो गई। यह सतह दूध में मलाई की तरह अत्यन्त पतली है। पृथिवी का भीतरी भाग तो अभी भी गर्म पिघली दशा में है। पृथिवी के गर्भ में अभी भी गर्म लावा, उष्ण गैसें और वाष्प हैं। तापमान भी बहुत अधिक है। जितनी गहराई में जाओ उतना अधिक तापमान बढ़ता जाता है।

            संस्कृत वाड्.मय में भी पृथिवी को आग्नेयी कहा गया है। पृथिवी का ९७ प्रतिशत अंश पिघली दशा में है। अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि प्रवेश हुआ। अध्ययन से ही आग्नेयी थी अथवा उत्तर काल में उसमें अग्नि का प्रवेश हुआ। अध्ययन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्रारंभ में पृथिवी आग्नेयी नहीं थी। यदि आग्नेयी होती तो आद्र्रा न होती। प्रजापति ने इस पर अग्नि का चयन किया और उसे अग्निदाह से बचाने के लिये वनस्पतियाँ व ओषधियाँ उत्पन्न कीं। अश्वस्थ, शमी, वंश आदि वनस्पतियों ने पृथ्वी की अग्नि को अपने में धारण किया। औषधि पद का अर्थ ही है- ‘‘ओषं धय’’ अर्थात् दाहशक्ति को धारण कर। अर्थात् औषधियाँ पृथ्वीगत आग्नेय परमाणुओं को ग्रहण करती रहती हैं। बाद में यह अग्नि पृथिवी में प्रविष्ट हुई।

            तैत्तरीय ब्राह्मण में लिखा है- अग्नि देवेभ्यो निलायन (छिपा) आखरूपं कृत्वा। स पृथिवीं प्राविशत्। यहाँ आखू का तात्पर्य पृथ्वी पर रहनेवाले चूहे से नहीं अपितु अन्तरिक्ष स्थानीय पशु से है जिसका सूक्ष्म अर्थ अग्नि और अपः की अवस्था विशेष है। यह आखु रूद्र का पशु कहा गया है। रूद्र स्वयं अन्तरिक्ष स्थित अग्नि का स्वरूप है। इस प्रकार यह आखु अन्तरिक्षस्थ आग्नेय पशु अथवा विशेष प्रकार के अग्नि के परमाणु हैं जो जंगली चूहे की भाँति पृथ्वी के अन्दर-अन्दर धंसते जाते हैं।

            यह विवेचन अत्यन्त स्पष्ट तो नहीं है किन्तु इससेइतना स्पष्ट है कि आधुनिक विज्ञान की तुलना में यह अतिसूक्ष्म विज्ञान सहस्त्रों गुना गंभीर है।

            (४) परिमण्डला पृथिवी- पृथिवी गोलाकृति है, इसका विवरण भी वैदिक वाड्.मय में उपलब्ध होता है। जैमिनीय ब्राह्मण में लिखा है- ‘‘स एष प्रजापतिः अग्निष्टोमः परिमण्डलो भूत्वा अनन्तो भूत्वा शये। तदनुकृतीदम् अपि अन्या देवताः परिमण्डलाः। परिमण्डल आदित्यः परिमण्डलः चन्द्रमाः, परिमण्डल आदित्यः, परिमण्डलः चन्द्रमाः, परिमण्डला द्यौः, परिमण्डलमन्तरिक्षम् परिमण्डला इयं पृथिवी।”

            परिमण्डल का अर्थ है जिसके सब ओर मण्डल अथवा घेरा (Atmosphare) है। दूसरा अर्थ यह है- जो गोल घेरे में अथवा गोल आवृत्त हो।

            आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों से भी यह सिद्ध है कि पृथिवी गोल है और चारों ओर से वायुमण्डल से आवृत्त है।

            (५) अयस्मयी पृथिवी- यह पृथिवी लोह धातु से परिपूर्ण है। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है-ते (असुरा) वा अयस्मयीं एवेमां (पृथिवीं) अकुर्वन्। कौषितकि ब्राह्मण में भी ऐसा ही उल्लेख मिलता है। इस विवरण से आधुनिक विज्ञान में वर्णित पृथ्वी के चुम्बकीय शक्ति संपन्न होने का संकेत मिलता है। लोहे के अतिरिक्त अन्य खनिज संपदा (सोना, चांदी आदि) का उल्लेख भी अथर्ववेद में मिलता है।

            (६) धरित्री पृथिवी- प्राणियों को धारण करनेवाली के रूप में विख्यात यह धरित्री, धरा, धरिणी, पूरे सौरमण्डल में एक ही ऐसा ग्रह है जहाँ असंख्य विविध प्राणियों का निवास है। इसके अनेक कारण हैं-

            (क) बुध और चन्द्रमा में सूर्य के सामनेवाल भागों में जहाँ तापमान ८०० सेन्टी. और २०० सेन्टी. तक पहुँच जाता है तो रात्रि में इन ग्रहों में तापमान शून्य से भी १५० सेन्टी. नीचे चला जाता है। इन दोनों ही अवस्थाओं में वहाँ जीवन असंभव है।

            (ख) शुक्र में भूमि पर स्थित वायु की अपेक्षा कई गुना घनी जहरीली गैसें हैं, वनस्पतियों का नितान्त अभाव है और ४७० सेन्टी. की भयंकर ऊष्मा है। अतः ऐसी परिस्थितियों में वहाँ भी जीवन असंभव है।

            (ग) बृहस्पति में पृथ्वी की तुलना में तीन गुनी अधिक गुरूत्वाकर्षण शक्ति है जिससे वहां सीधे खडे़ रहना भी असंभव है। फिर वनज आदि उठाना तो दूर की बात है।

            (घ) प्लूटो और नेपच्यून सूर्य से दूर होने के कारण अत्यन्त शीत हैं। वहाँ मिथेन और अमोनिया जैसी प्राणघातक गैसें हैं। अतः वहाँ भी जीवन असंभव है।

            ठसके विपरीत पृथिवी पर जीवन धारण के लिये आवश्यक ऊष्मा, गुरूत्वाकर्षण प्रभूत जल, वनस्पतियों तथा प्राणवायु है। अतः इस धरा पर ही जीवन संभव है, अन्य ग्रहों में नहीं।

            (७) भूरेखा का उल्लेख- विष्णु पुराण में भूरेखा और उसके चलने का उल्लेख है।

            यदा विजृम्भतेऽनन्तो युदा घुर्णित लोचनः।

            त्दा चलति भूरेखा साद्रिद्वीपब्धिकानना। संभवतः यहाँ भूरेखा से, भूमध्यरेखा कर्क और मकररेखा से तात्पर्य है। इससे अधिक खोज और विश्लेषण की आवश्यकता है।

            निष्कर्ष- उपर्युक्त अध्ययन से, ऋग्वेद के द्यावापृथिवी के छह सूक्तों तथा अथर्ववेद के पृथिवी सूक्त से, आधुनिक विज्ञान सम्मत जो तथ्य सामने आते हैं,

            वे इस प्रकार हैं-

(१) पृथ्वी सौरमण्डल के नवग्रहों में से एक हैं।

(२) पृथ्वी की उत्पत्ति सूर्य से हुई है और वह सूर्य से ही प्रकाश पाती है। पृथिवी का केन्द्रबिन्दु सूर्य है और वह गुरूत्वाकर्षण से खिंचकर ब्रह्माण्ड में स्थित है।

(३) पृथ्वी स्थिर नहीं है। वह पश्चिम से पूर्व की ओर घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा करती है। वह अपनी धुरा पर घूमती है जिससे दिन और रात होते है।

(४) पृथ्वी में गुरूत्वाकर्षण शक्ति है।

(५) पृथ्वी गोल है।

(६) वह पहले जलमग्न थी।

(७) वह प्रारंभ में अल्पा थी, बाद में विस्तृत हुई।

(८) पृथ्वी आग्नेयी है। उसमें ९८ प्रतिशत लोहा व अन्य भारी पदार्थ है।

(९) वह अपार खनिज संपदा की स्वामिनी है।

(१०) एकमात्रा पृथिवी पर ही जीवन है।

(११) पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध है। गन्ध उसका विशिष्ट गुण है।

(१२) पृथिवी का भौतिक स्वरूप ही प्रधान है, दैवी रूप नहीं।

   इसके अतिरिक्त पृथिवी विश्व का कल्याण करने वाली अन्न, कीर्त्ति, धन और बलप्रदायिनी है। इस प्रकार यह पावन धरा अपने भूमि, क्ष्मा, मही, पृथिवी, उर्वी, उत्ताना, अपारा, धरित्री, विश्वंभरा, वसुधानी, हिरण्यवक्षा, धरिणी, धरती, वसुन्धरा, माता, सुक्षिति और सुक्षेमा सभी नामों को सार्थक करती हुई जगत् का कल्याण करती है अतः संक्षेप में हम सकते हैं-

‘‘विश्वंभरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतो निवेशनी’’

संदर्भ- ग्रन्थ

(१) अथर्ववेद संहिता; भाग २, संपा, वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य एवं भगवती देवी शर्मा

(२) अथर्ववेद का सुबोध भाष्य, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर

(३) अथर्ववेद संहिता-संपा. रामस्वरूप शर्मा गौड़

(४) ऋग्वेद का सुबोध भाष्य, भाग १, २, ३, ४ श्रीपाद दामोदर सातवलेकर

(५) ऋक्-सूक्त-संग्रह, व्याख्याकार डॉ. हरिदत्त शास्त्री, डॉ. कृष्णकुमार।

(६) न्यू वैदिक सिलेक्शन, भाग १, डॉ. ब्रजबिहारी चैबे।

(७) भारत और विज्ञान, संपा. डॉ. एस.पी.कोष्ठा।

(८) भारतीय दर्शन तथा आधुनिक विज्ञान, डॉ. सुद्युम्न आचार्य

(९) यूनीफाइड भूगोल, डॉ. चतुर्भुज मामोरिया, डॉ. एस.एम. जैन

(१०) वैदिक माइथोलॉजी, डॉ. ए.ए. मैक्डॉनल, अनु. रामकुमार राय

(११) वेद-विद्या-निदर्शन, भगवद्दत्त

(१२) वेदों में विज्ञान, डॉ. कपिलदेव  द्विवेदी

शब्द संकेत-

यजु. – यजुर्वेद

तै. ब्रा. -तैत्तरीय ब्राह्मण

ऋ. – ऋग्वेद

तै. उप. – तैत्तरीय उपनिषद्

अथ. वे. – अथर्ववेद

पाद-टिप्पणी

१.        यूनीफाइड भूगोल, डॉ. चतुर्भु ज मामोरिया, एस.एम.जैन, पृष्ठ ८

२.        सुभुः स्वयंभूः प्रथमोऽन्तर्महत्यर्णवे

            दधे गर्भभृत्वियं यतो जातः प्रजापतिः- यजु. २३/६३

३.        अण्डानां तु सहस्त्राणां सहस्त्राण्य युतानि च

            ईदृशानां तथा तत्र कोटि-कोटि शतानि च द्वितीयांश-विष्णु पुराण अध्याय ७

            अण्डानां ईदृशानां तु कोट्यो ज्ञेया सहस्त्रशः

            तिर्यगूर्ध्वमधस्ताच्च कारणाव्ययात्मनः।। वायु पुराण ४९/१५१

४.        भूतस्य प्रथमजा – यजु. ३७.४

            इयं वै पृथिवी भूतस्य प्रथमजा – मा.शत.ब्रा. १४.१.२.१०

५.        स भूरिति व्याहरत। स भूमिमसृजत्- तै. ब्रा. २.२.।४.२

६.        पदभ्यां भूमिः – ऋ. १०.९०.१४

            भूर्जज्ञ उत्तानंपादो भुव आशा अजायन्त – ऋ. १०.७२.४

            ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थ सनातनः – कठो. २.३.१

            ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुख्ययम् – गीता १४.१

७.        वायु पुराण १०१.१८

८.        यूनीफाइड भूगोल, डॉ. चतुर्भुज मामोरिया, एस.एम. जैन, पृ. १८

८.        भपञ्जरस्य भ्रमणावलोकादाधारशून्य कुरिति प्रतीतिः

            स्वस्थं न दृष्टं गुरू च क्षमातः खेऽधः प्रयातिति बौद्धः।

            (सिद्धान्तशिरोमणि, भुवनकोश नामक दूसरा अध्याय श्लोक ७)

९.        अग्नेरापः अद्भ्यः पृथिवी-तैत्त. उप. २.१.१

१०.     यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामंत्र कृष्टयः संबभूबुः। अथर्व. १२.१.३

११.     वृत्तभपञ्जरमध्ये कक्ष्यापरिवेष्टित खमध्यगतः

            मृज्जलशिखिवायुमयो भूगोलः सर्वतो वृत्तः।

            (आर्यभट्टीय, गोलपाद श्लोक ६)

१२.     पञ्चभूतमयस्य तारागणपञ्जरे महीगोलः

            खेऽयस्कान्तान्तस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः।

            (पञ्सिद्धान्तिका, त्रैलोक्य संस्थान नामक १३ अ. श्लोक १)

१३.     नान्याधारः स्वशक्त्या वियति च नियतं तिष्ठतीहास्य पृष्ठे

            निष्ठं विश्वञ्च शाश्वत् सदनुजमनुजादित्यदैत्यं समन्तात्।

            (सिद्धान्तशिरोमणि, भुवनकोश नामक दूसारा अ. श्लोक २)

१४.     ऋग्वेद ४.५६,३

१५.     यो जजान रोदसी विश्वशंभुवा – ऋग्वेद १.१६०.४

१६.     स वह्मिः पुत्रः पुत्र्योः – ऋग्वेद १.१६०.३

१७.     धिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणाः सूर्यः शुचिः – ऋग्वेद १.१६०.१

१८.     उत मन्ये पितुरदु्रहोमनो मातुर्महिस्वत स्तद्धवीमहि – ऋग्वेद १.२२.१५९.२

१९.     घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृत्ते, पृतश्रियां, धृतपृचा घृतवृधा – ऋग्वेद ६.७०.४-५

२०.     बाहुच्युता पृथिवी द्यामिव उपरि – अथर्व. १८.३.२५-३५

२१.     वि यो ममे पृथिवी सूर्येण- ऋग्वेद ५.८५.५

२२.     अथर्ववेद १२.१.८

२३.     -वही- १२.१.२०

२४.     -वही- १२.१.४८

२५.     -वही- १२.१.३७

२६.     -वही- १२.१.३६ अहोरात्रे पृथिवी नो दुहाताम्

            १२.१.५२ अहोरात्रे विहिते भूम्यामधि

२७.     अथर्ववेद १२.१.२३, २४, २५

            तुलना कीजिये – तत्र गंधवती पृथिवी – तर्क संग्रह, द्रव्य लक्षण प्रकरण पृथिवी इतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्वात् – तर्कसंग्रह अनुमान खण्ड

२८.     अथर्ववेद १२.१.४८

२९.     वेदों में विज्ञान, डॉ. कपिलदेव शास्त्री, पृष्ठ २७

३०.     ध्रुवां भूमिं – अथर्व. १२.१.१७, महती बभूविथ १२.१.१८

३१.     अथर्ववेद – १२.१.८

३२.     -वही- १२.१.५३

३३.     -वही- १२.१.१९

३४.     अथर्ववेद १२.१.२१

३५.     यो अश्मनोरन्तरग्निं जजान अथर्व. २०.३४.३

३६.     अरणी यभ्यां निर्मश्यते वसु – अथर्व. १०.८.२०

३७.     अग्ने पित्तमपामसि – अथर्व. १०.८.२०

३८.     अथर्ववेद १२.१.१२

३९.     -वही- १२.१.१९

४०.     -वही- १२.१.६

४१.     -वही- १२.१.२६

४२.     -वही- १२.१.४४

४३.     अथर्ववेद १२.१.१८

४४.     -वही- १२.१.३१ प्रदिशः का अर्थ आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य और ईशान है।

४५.     -वही- १२.१.३२

४६.     ऋग्वेद ६.७०.२

४७.     अथर्ववेद १२.१.८

४८.     इयं तर्हि शिथिरासीत् – काठक संहिता ३६.७, मै.सं. १.१०.१३

            शिथिरा वा इयमग्र आसीत् – मैत्रा.सं. १.६.३

४९.     सा हेयं पृथिवी अलेयद् यथा पर्णमेव। तां ह स्म वातः संवहति – शत. ब्राह्मण

            तां दिशोऽनुवातः समवहत् – तै. ब्रा. १.१.३

            अलेलेद वा इयं पृथिवी – काठक संहिता ८.२

५०.     ताः (आपः) अतप्यन्त। ताः फेनमसृजन्त। तस्माद् अपां तप्तानां फेनो जायते-

            शत. ब्राह्मण ६.१.३.२

५१.     न वा एष शुष्को नाद्र्रो व्युष्टासीत् – तै. ब्रा. १.७.१.६-७

            शत. ब्रा. १०.७.३.२

५२.     स (फेनः) यदोपहन्यते मृदेव भवति – शत. ब्रा. ६.१.३.३

            यन्मृद् इयं तत् (पृथिवी) शत. ब्रा. १४.१.२.९

५३.     एता वै शुष्का आपः – मै. सं. ३.६.३

५४.     स (मृद्) अतप्यत सा सिकता असृज्यत- शत. ब्रा. ६.१.३.४

५५.     सिकताभ्यः शर्करा – शत. ब्रा. ६.१.३, ५

५६.     शिथिरा वा इयमग्र आसीत्। तां प्रजापतिः शर्कराभिरहहंत्। मैत्रा. सं. १.६.३

५७.     शर्कराया अश्मानम् (असृजत) तस्मात् शर्कराश्मैव अन्ततो भवति- शत. ब्रा. ६.१.३.३

५८.     ऋक ह वा इयमग्र आसीत्। तस्यां देवा रोहिण्यां वीरूधोऽरोहयत् – मै. सं. १.६.७.२

            इयं वा अलोमिकोवाग्र आसीत् – ऐ. ब्रा. २४.२२। ओषधिवनस्पतयो वै लोमानि।

            जै. ब्रा.२.५४

५९.     वै तर्हि अल्पा पृथिव्यासीद् अजाता ओषधयः – तै. सं. २.१.२

६०.     आग्नेयी पृथिवी – ता. ब्रा. १५.४.८ अग्निवासाः पृथिवी – अथ. १२.१.२१

            आग्नेयो अयं लोकः जै. उप. १.३७.२, अग्निगर्भा पृथिवी – शत. ब्रा. १४.९कृ४.२१

६१.     शत. ब्राह्मण – २.२.४.५

६२.     तै. ब्रा. १.१.३.३

६३.     आखुस्ते रूद्रस्य पशुः – तै. ब्रा. १.६.१०.२

६४.     जैमिनीय ब्राह्मण १.१५७

६५.     परिमण्डल उ वा अयं (पृथिवी) लोकः – शत. ब्रा. ७.१.१.३७

६६.     ऐतरेय ब्राह्मण – १.२३

६७.     (असुराः) अयस्मयीं (पुरीम्) अस्मिन् (अकुर्वत) कौ.ब्रा. ८.८

६८.     २/५/२३ अद्भुद्सागर, पृ. ३८३

६९.     अथर्ववेद १९.३८.१

वेदोक्त सूर्य का स्वरूप और कार्य -वेदपाल वर्मा

            वेद कहता है कि पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थ विद्या का ज्ञान प्राप्त करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। पदार्थ विज्ञान के ज्ञाता इधर-उधर नहीं घूमते। पदार्थ विज्ञान से विद्या की वृद्धि-शुभकर्मों में प्रवृत्ति तथा निरन्तर सुख एंव ऐश्वर्यानन्द की प्राप्ति होती है १ ४/३ ऋक्।। 

मनुष्यों को चाहिये वे भू-जल-सूर्य-पवन -विद्युत् आदि पदार्थों के विशेष ज्ञान से शिल्प विद्या द्वारा उत्तम-उत्तम क्रियाएं प्रकाश में लाएं और उनका प्रयोग करें १ १/२ ऋक्।। 

इसीलिए विद्वानों को पदार्थ विद्या की खोज करनी चाहिए ५ २२/३ ऋक्।।

वेद यह भी कहता है कि सूर्यरूप पदार्थ विद्या के ज्ञाता सदा श्रीमान् व सुखी होते हैं ५ ४५/२ ऋक्।।  सूर्यो भूतस्यैकं चक्षुः- सूर्य जगत् का एकमात्र चक्षु है १३ १/४५ अथर्व. ।। सूर्यो वै सर्वेषां देवानात्मा- सूर्य सब देवों की आत्मा है शत. १४-३-२-९।। युवा कविः तिग्मेन ज्योतिषा विभाति- यह सदा तरूण रहता है- इसका तेज प्रखर है १३ १/११ अथर्व. ।।  ‘‘इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरूत्तम विश्वजित्- सूर्य संसार की श्रेष्ठतम-पवित्र-विश्व-विजेता -सभी दिव्य तेजों की ज्योति है- उषः काल में यज्ञ कराने वाली दीप्ति है १० १७०/३ ऋक्।।’’ अतन्द्रः यास्यन् हिरतः यदा आस्थात्-यह आलस्य न करने वाला दीर्घव्रत का पालन करने वाला है १३ २/२२ अथर्व.।।

सूर्यः आत्मा जगतस्तरथुषश्व- सूर्य स्थावर और जंगम पदार्थों का जीवन है १३ २/३४ अथर्व.।।  उत्तम किरणों वाला-निर्भय-उग्र एवं अलौकिक तेज का भण्डार-द्युलोक वासी है १९ ६५/१ अथर्व.।।  अदृशत्रस्य केतवो वि रश्मयो जनाँ अनु। भ्राजन्तो अग्नयो यथा- सूर्य की किरणें दहकते हुए अंगारों के समान दिखाई देती हैं साम. ६३४।। सूर्य राष्ट्र का भरण-पोषण करने वाला है १३ १/३४ अथर्व.।।  इसमें बढ़ाने की शक्ति है १३ १/२२ अथर्व.।।  इससे ही जगत् को सुन्दर रूप मिला है तथा राष्ट्र को घी-दूध से भरपूर करता है १३ १/८ अथर्व.।।  सूर्य को कोई लांघ नहीं सकता है १० ६२/९ ऋक्।।  शरीर में प्राण-अपान को जोड़ने वाला भी सूर्य ही है १० २७/२० ऋक्।।

पृथिवी पर द्युलोक का प्राण सूर्य किरणों द्वारा ही आता है। अन्तरिक्ष का प्राण वृष्टि द्वारा पृथिवी पर पहुंचता है वृष्टि का कारण सूर्य ही है ११-४ अथर्व.।। सूर्य ही दृढ़ता व आर्यत्व का प्रतीक है सविता इव आर्यः च ध्रुवः तिष्ठसि १९ ४६/४ अथर्व।। इसी हेतु प्रलयावस्था में परमात्मा ने ईक्षण (तप) किया तो सर्वप्रथम सूर्यलोक को ही बनाया। सः इमालोकानसृजत। अम्भोमरीचीमरमापो। अर्थात् ईश्वार ने अम्भस्-मरीची-मर और आप-इन (४) लोकों को रचा-ऐतरेयोपनिषद् प्रथमखण्ड।। सूर्य अपनी किरणों से जलों को खींचता है इसलिए वही अम्भस् है। मरीचि=किरणों को कहते हैं उनका आना जाना आकाश द्वारा ही होता है इसलिए मरीचि से अन्तरिक्ष अभिप्रेत है। मर-मरणधर्मा प्राणियों के रहने से ‘‘मर” नाम पृथिवी का है। आपः-नीचे की ओर बहने की प्रवृत्ति होने से जल को पृथिवी के नीचे होने की बात कही गई है। पृथिवी और सूर्य के मध्य में अन्तरिक्ष का होना स्वाभाविक है।

            तैत्तिरीयोपनिषद् की ब्रह्मानन्द वली प्रथमाध्याय के छठे अनुवाक में सूर्य को अनिलयन (निराश्रित) तथान्यग्रहों को निलयन (आश्रित) कहा है। सूर्य को किसी अन्य ग्रह के आधार की अपेक्षा नहीं है क्योंकि वह अनिलयन है। चन्द्रादिक-पृथिवी आदि दूसरे ग्रह सूर्य के आधार व आकर्षण से ही अन्तरिक्ष में ठहरे हुए हैं इसलिए वे निलयन कहे गये हैं।

            ईश्वर ने ही अपनी व्याप्ति और सत्ता से सूर्यादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये हैं- इनमें सूर्य मुख्य है क्योंकि इसके धारण आकर्षण और प्रकाश के योग से सब पदार्थ सुशोभित होते हैं १ ६/७ ऋक्।। ततो विराडजायत विराजोऽधिपूरूषः साम. ६२२ वें मंत्र में भी सौरमण्डल के जन्म वर्णन में पृथिवी-सूर्य-मंगल-बुध-बृहस्पति आदि की उत्पत्ति प्रभु के अधिष्ठातृत्व में ही सम्पन्न हुई। अयं विश्वानि तिष्ठति पुनानो भुवनोपरि। सोमो देवो न सूर्यः-निर्दोष किरणों वाला सूर्य सौरमण्डल का अधिष्ठाता है साम. ७५७।। यह सब लोकों से बड़ा है ३ २/१४ ऋक्।। आज के वैज्ञानिक सूर्य का व्यास १,३९,९६० कि.मी. बताते हैं। यह प्रकाशमान सूर्य ब्रह्माण्ड के मध्य में विराजित है, इसके चारों ओर बहुत भूगोल सम्बन्धयुक्त हैं। पृथ्वी और चन्द्रमा एक साथ चारों ओर घूमते हैं ४ ४५/१ ऋक्।। यह अपने चक्र को छोड़कर इधर-उधर नहीं जाता है, अपनी कक्षा में स्थिर रहता है इसी के आधार से पृथिवी आदि लोक सूर्य के चारों तरफ लगाते हैं २ २७/११ ऋक्।। यह अपनी परिधि में स्थिर व दिखाने वाला न हो तो तुल्य आकर्षण तथा किसी को कुछ भी देखना न बने २ ४१/१० ऋक्।। बण्महाँ असि सूर्यः बडादित्य महाँ असि। महस्ते सतो महिमा पनिष्टम मन्हा देव महाँ असि-सूर्यमहान् है, परिणाम में महान् है क्योंकि उसकी परिधि ८ कोस की लम्बाई से अधिक है। कर्म में भी महान् है क्योंकि सब ग्रहों-उपग्रहों का प्रकाशक और जीवनाधार है। गुरूत्वाकर्षण में भी महान् है क्योंकि सब आकाशीय पिण्डों को अपने आकर्षण से धारण किये हुए है। ज्योति में महान् है क्योंकि ज्योति का पुंज है साम,  १७८८, १७८९+अथर्व १३ २/२९।। सूर्यलोक प्रकाशलोक है, पृथिवी प्रकाशरहित लोक है, तीसरा परमाणु आदि अदृश्य जगत्, इन्हें आकाश में स्थापित किया है ५-१५ यजु.।।

            सूर्यलोक समुद्र में भी प्रकाशता है १३२/३० अथर्व।। इसकी सुषुम्णा नामक रश्मियाँ चन्द्रमा में प्रकाश धारण कराने वाली हैं साम १४७+यजु. १८-४०।। सूर्य ईश्वर की भी आंख है इसी के द्वारा वह ब्रह्माण्ड को देखता रहता है १० ७/३३ अथर्व।। द्युलोक में अग्नि से उत्पन्न होने वाली ‘नवग्व और दशग्व’ नामक अग्नि की लहरें समस्त किरणों के साथ रहकर उन्हें शक्ति प्रदान करती हैं। ये अग्नि की शक्तियां अथवा आग्नेय आगार द्युलोक में सूर्य सृष्टि नियमानुसार स्थापित करते हैं। सब भूतों की माता पृथिवी को फैलाते हैं। ये यज्ञीय हवि को भी ग्रहण करते है १० ६२/३६ ऋक्।। इसलिए आग्नेय पदार्थों का मुख्य केन्द्र सूर्य को माना है। अपनी पृथिवी पर जो भौतिक अग्नि है वह सूर्य का पोता है। विद्युत्सूर्य का पुत्र है क्योंकि सूर्य की उष्णता से मेघमण्डल में विद्युत् बनती है, यह विद्युत् सूखे घास पर या वृक्ष पर गिरकर अग्नि उत्पन्न करती है। अतः यह अग्नि का ही अंश है। अग्नि तत्व में जो उष्णता है, वह सूर्य के ही सम्बन्ध से है। वृक्षादि में उष्णता सूर्य किरणों से ही तो प्राप्त है इसलिए सब आग्नेय पदार्थ सूर्य के ही विभिन्न रूप हैं। सूर्य के अतिरिक्त कोई भिन्न पदार्थ नहीं है जो उष्णता दे सके।  सूर्य ही रूपान्तरित होकर अग्नि और विद्युत है। एक ही सूर्य ३ रूपों में दिखाई देता है-सः एव सविता.। सोऽअग्निः। सः इन्द्रः ४ २/५ अथर्व।। अग्नि-विद्युत्-आदि विभिन्न देव सूर्य के ही एक रूप होकर रहते हैं सर्वे देवा अस्मिन् एकवृत्तो भवन्ति १३ ५/२१ अथर्व।।

            सूर्य कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता है उसी के साथ चन्द्रमा-ग्रह-नक्षत्र-दिनरात-ऋतु-संवत्सर सभी मर्यादा पर चल रहे हैं। इन सबको मर्यादित करने वाला सूर्य ही है १३ २/४-५ अथर्व।। इसका मुख सर्वत्र है, वैसे ही इसके हाथ-पांव और भुजाएं सर्वत्र हैं। सबका पोषक यही एक देव पृथिवी से द्युलोक तक के सब पदार्थमात्र का उत्पत्तिकर्ता है १३ २/२६ अथर्व।। यह दुःखी मनुष्य का मार्गदर्शक है- सामथ्र्यशाली है। सुख का मार्ग बताता है। पृथिवीपालक है १३ ३/४४ अथर्व।। सूर्य लोक के समान कोई दूसरा श्रेष्ठ लोक नहीं है क्योंकि सूर्य की ही कृपा से चोर-डाकू अपनी क्रियाओं से निवृत्त हो जाते हैं। इसे पाकर प्राणिजगत निशक-निडर होकर सुख का अनुभव करते हैं तथा प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने व्यापार में लग जाते हैं ४-३५, ३६ यजु.।।

            सूर्य अपनी आकर्षण शक्ति से पृथिवी आदि लोक लोकान्तरों को धारण किये है १२-२१ यजु.।। सः वरूणः सायं अग्निः भवति, सः इन्द्रः भूत्वा मध्यतः दिवं तपति। वह वरूण है सायंकाल में अग्नि, प्रातः उदय होने के समय सबका मित्र, सविता बनकर अन्तरिक्ष में भी संचार करता हुआ-इन्द्र होकर द्युलोक के मध्य में तपता है १३ ३/१३ अथर्व, सूर्य के रूद्र-इन्द्र-चन्द्र-महेन्द्र-सविता-आदित्य-धाता-विधाता-पतग-अर्यमा-वरूण-यम-महायम-देव-महादेव-एक-एकवृत्त-रोहित-सुपर्ण-अरूण-केशी-हरिकेश-सप्ताश्रव्-सप्तरश्मि आदि नाम गिनाये है अथर्व काण्ड १३।। श्रीमद्भागवत में भी प्रातः काल के सूर्य का नाम ब्रह्मा, मध्याह्न के सूर्य का नाम विष्णु और रात्री के समय का नाम शिव कहकर त्रिमूर्ति को सूर्य में ही बताया है। सूर्य की महान् शक्ति का वर्णन ‘‘अन्तश्रव्रति रोचनास्यं प्राणदयानती व्यख्यन्महिषो दिवम्’’ अर्थात् सूर्य की रोचमान दीप्ति से शरीरों में प्राणवायु के ऊपर-नीचे-आने-जाने आदि का व्यवहार होता है १० १८९/२ ऋक्।। सूर्य में तप-हर-अर्चि-शोचि एवं तेज जो क्रमशः प्रतापशक्ति-नाशशक्ति-दीपनशक्ति-शोधनशक्ति व तेजनशक्ति के नाम से पुकारी जाती है काण्ड-२ अथर्व।। सूर्य ही काल है समय है क्योंकि दिन-रात उसी से होते हैं १३ १/२२ अथर्व।। सूर्य जिस समय जिस भूभाग के सम्मुख होता है वहाँ दिन होता है दूसरे भूभाग में रात्रि होती है १३ ३/४३ अथर्व।।

            योगीजन मरण से ऊपर उठकर सूर्य की तेजोमय रश्मियों पर आरूढ़ होकर जाते हैं और अमृतमय मोक्षधाम को प्राप्त हो जाते हैं साम. ९२।। मुण्डकोपनिषद् में भी ‘सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति’- अर्थात् सूर्य की किरणें उन्हें अमर-अविनाशी पुरूष के पास ले जाती हैं १-२-११।।

            इसी सूर्य की एक प्रकार की किरणें ‘‘आपः” नामकी हैं जिनमें जलीय तत्वों का समूह वेग से चमकता है १० ४३/४ ऋक्-जल रस को पीकर मेघ के अंकरूप जल बिन्दुओं को बरसा कर सब औषधि आदि पदार्थों को भिन्न-भिन्न करके बहुत छोटे-छोटे कर देती हैं, इसी से वे पदार्थ पवन के साथ ऊपर को चढ़ जाते हैं क्योंकि सूर्य क्षण-क्षण में जल को ऊपर खींचकर संसार में बरसाता है इसी से यह वर्षा का कारण है १ ६/१० ऋक्।। यह अपनी कक्षा में स्थिर रहता हुआ, अपने समीप के लोकों को चुम्बक-पत्थर और लोहे के समान खींचने को समर्थ रहता है २ ७/६८ ऋक्।। इसी से समय के विभाग उत्तरायण-दक्षिणायन तथा ऋतु-मास-पक्ष-दिन-घड़ी और पल आदि हो जाते हैं १ ११/५ ऋक्।। रात्रि में ग्रह-नक्षत्र-चन्द्रादि लोक इनमें अपना प्रकाश नहीं है-ये सूर्य के प्रकाश से प्रकाशमान होते हैं। न ये कहीं जाते हैं किन्तु ढके हुए दीखते नहीं हैं। रात्रि में सूर्य की किरणों से प्रकाशमान होकर दीखते हैं १ २४/१० ऋक्।।

सूर्य की ऊपरी अथवा बीच की किरणों मेघ की निमित्त हैं उनमें जो जल के परमाणु रहते हैं वे अति सूक्ष्मता के कारण दृष्टिगोचर नहीं होते हैं १ २४/७ ऋक्।। यह अग्निमय सूर्य लोक अपने स्वाभाविक गुणों से वर्षा की उत्पत्ति के निमित्त काम दिनरात करता है। और जगत् को जीवन देता है सूर्य निर्मित मेघ के जल से नदियां वहती हैं जिनके जल प्रवाहों में औषध भरा पड़ा है। यह सूर्य मेघ को पिता है। मेघ की उत्पत्ति को सूर्य से भिन्न कोई निमित्त नहीं है। मेघ के बिजली और गर्जना आदि गुणों से भय होता है, उस भय को भी दूर करने वाला भी सूर्य है। पृथिवी और अन्तरिक्ष सूर्य की दो स्त्री के समान हैं। वह पदार्थों से जल को वायु के द्वारा खींचकर जब अन्तरिक्ष में फेंकता है, तब वह पुत्र रूप मेघ प्रमत्त के सदृश बढ़कर उठता है और सूर्य के प्रकाश को ढक लेता है, तब सूर्य उसको मारकर भूमि में जल के रूप में गिरा देता है। जल की रूकावट को तोड़कर उसे अच्छी प्रकार बरसाता है। इसी से यह सूर्य समुद्रों के रचने को भी हेतु होता है तथा इस चराचर शान्त-अशान्त संसार में प्रकाशमान होकर, सब लोकों को अपनी-अपनी कक्षा में चलाता है।

सूर्य के बिना अति निकट मूर्तिमान लोक की धारणा-आकर्षक-प्रकाश और मेघ की वर्षा आदि कार्य किसी से नहीं हो सकते हैं १-३२ वां सूक्त ऋक्।। यह पृथिवी सूर्य के ऊपर-नीचे और उत्तर-दक्षिण को जाती है इसीलिये इसके परले आधे भाग में सदा अन्धकार और उरले आधे भाग में प्रकाश वर्तमान रहता है १ १६४/२ ऋक्।। उषा का निमित्त भी सूर्य है ४ ४०/१ ऋक्।। पृथिवी सूर्य के भय से ही चलती है ५ ५९/२ ऋक्।। सूर्य पृथिवी और द्युलोक से रस लेता है ६ ५७/२ ऋक्। सूर्य पदार्थों से ८ मास रस ग्रहण करके-मेघमण्डल में स्थापित करके, वर्षा ऋतु में बरसा के प्रजा को सुखी करता है। पृथिवी और पृथिवीस्थ पदार्थों को नष्ट नहीं करता-रक्षा करता है ६ ३०/२३ ऋक्।। सूर्यताप से अन्तरिक्ष स्थित वायु उत्तप्त होती है और वह ताप दूर भूमि तक पहुंचकर जहाँ-तहाँ की आर्द्रता को वाष्प को बदलकर मेघ रूप में एकत्र करता है और फिर वही बादल छिन्न-भिन्न हो वर्षा में परिणित होकर अन्न उत्पादन का कारण बनता है इसीलिए अन्तरिक्षस्थ अग्नि ‘वयोधा’ अन्न प्रदाता है ८ ७२/४ ऋक्।। सूर्य हमें विद्युत् प्रदान करता है जो अन्न-जल देने वाली एवं सब रोगों को दूर करने वाली है, जलवृष्टि में भी सहयोगी है। उस वृष्टि से शान्ति-सुख एवं कल्याण प्राप्त होते हैं क्योंकि वर्षा से ही अन्नादि उपजते हैं। यज्ञों में ऐसी समिधाएं समर्पित करनी चाहिए जो जल को ग्रहण करें। मेघविद्या मेंपारगत यज्ञों आदि के द्वारा भूमि पर बरसाने में सहायक होते हैं।

यज्ञकर्म मेघ को विद्युत् रूपी वाणी देता है। देव विज्ञान का ज्ञाता वृष्टिज्ञानी पुरूष जब यज्ञ करे-तो सर्वदिव्य गुणों से समपुष्ट होकर अग्नि तथा सूर्य जलप्रद मेघ को पुकारता है १०-९८ वां सूक्त ऋक्।। अनावृष्टि काल में बादल सूर्य के प्रकाश और जल को नीचे से रोककर भूमि पर अन्धकार और अवर्षण उत्पन्न कर देता है, तब इस मेघरूप वृत्र को मारकर यह सूर्य अपने प्रकाश तथा वर्षा जल को निर्बाध गति से भूमि के प्रति प्रवाहित करता है ११९ साम.।। सूर्य की स्थानान्तर गति नहीं है वह अपनी धुरी पर ही घूमता है। पृथिवी की २ प्रकार की गति है- पहली वह अपनी धुरी पर, जिससे अहोरात्र बनते हैं, दूसरी अपनी नियत कक्षा में सूर्य के चारों ओर, जिससे संवत्सर चक्र चलता है ६२० साम.।।

            यह पृथिवी अण्डाकृति मार्ग से सूर्य की परिक्रमा करती है और चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता हुआ, पृथिवी के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करता है। सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथिवी के आ जाने से प्रतिदिन चन्द्रमा के सम्पूर्ण गोलार्ध पर सूर्य का प्रकाश नहीं पड़ता। चन्द्रमा का जितना अंश पृथिवी की ओट में आ जाता है उतने अंश में सूर्य का प्रकाश न पड़ने से वह अंश अन्धकार से आच्छन्न ही रहता है। चन्द्रमा की ह्नास-वृद्धि का यही रहस्य है। अमावस्या को सम्पूर्ण चन्द्र के पृथिवी से ढ़क जाने के कारण पूरा ही चन्द्रमा अन्धकार से आवृत्त रहता है और पूर्णिमा को सम्पूर्ण चन्द्रमा के पृथिवी से छूटे रहने के कारण पूरा ही चन्द्रमा प्रकाशित रहता है साम. ९१५।।

            सूर्य जलों को आदान करता है अतः वह आदित्य कहलाता है। वह आंख से प्रत्यक्ष दिखाई देता है अतः वह विश्वदृष्ट कहलाता है। वह अदृष्ट दोषों का नाश करता है। जगत् में जो रोग बीज, हारिकारक रोगमूल हैं सूर्य किरण उन्हें नष्ट करती हैं अतः वह अदृष्टा कहलाता है। नंगा शरीर सूर्य प्रकाश में रखने से शरीर के रोग क्रीमी दूर होंगी-अतः वह विश्वभेषजी कहलाता है। सूर्य किरणों में भ्रमण करने वाली गौ का दूध पीने से लाभ होता है। सूर्य किरणें जिन वनस्पतियों पर गिरती हैं उनके खाने से भी आरोग्य लाभ होता है ६ ५२/३ अथर्व।। अथर्ववेद के २२वें काण्ड के मंत्र ३ के अनुसार ‘‘रोहिणीगाव’’ गौवें श्वेत-काले-लाल-भूरे-बादामी तथा विविध रंग के धब्बेवाली होती हैं। सूर्य किरणें उनकी पीठ पर पड़ती है। किरणों के रंगभेद के अनुसार दूध पर भी भिन्न-भिन्न परिणाम होता है। श्वेत गौ के दूध का गुणधर्म भिन्न होगा, काले रंग वाली गाय के दूध का गुणधर्म भिन्न तथा लाल रंग वाली गाय के दूध का गुणधर्म भिन्न होगा। लाल गौवों के दूध का तथान्य गोरसों का उपयोग हृदयरोग और ह्नमिला पीलिया रोग की चिकित्सा का विधान है। ते ह्नदद्योतः च हरिमा सूर्यमनु उदयताम् १-२२-१ अथर्व।।

            सूर्य की लाल किरण दीर्घायु-सौन्दर्य और बल को भी देने वाली होती है। मनुष्य का पीलियारोग और ह्नदयरोग बड़ा कष्टदायक होता है। पेट के अपचन-मद्यपान आदि से ह्नदय के दोष पैदा होते हैं। जवानी में वीर्य के दोष के कारण भी ह्नदय में विकार पैदा होते हैं। जिनसे मनुष्य कृश-निस्तेज-फीका-दुर्बल और दीन होता है। सूर्य किरणों द्वारा चिकित्सा करने से ये दोष दूर होते हैं। उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। सूर्य किरणों में शुक्ल-नील-पीत-रक्त-हरित-कपिश-चित्र ७ रंग होते हैं। सूर्य किरण चिकित्सा में परिधारण विधि का बड़ा महत्व है रोहितैः वर्णैः त्वा दीर्घायुत्वाय परिदध्मसि १-२२-२ अथर्व।। अथर्ववेद के २२ वें सूक्त में परिदध्मसि शब्द ४ बार तथा निदध्मसि शब्द १ बार, दध्मसि शब्द एक बार आया है, जिसका अर्थ है चारों ओर से धारण करना। सूर्य की रक्तवर्ण की किरणों का स्नान शरीर का सौन्दर्य-शरीर का रंग तथा शरीर की सुकुमारता का दायक है। किरण स्नान रोगी के रंग-रोगी की आयु-रोगी का पेशा तथा शरीर के बल के अनुसार होना चाहिए।

            सूर्य-किरणों में पित्त बढ़ाने की शक्ति है। सूर्य किरणों द्वारा यह पित्त वनस्पतियों में संचित होता है। ये वनस्पतियां रूप रंग का सुधार करने में सहायक हैं १-२४-१ अथर्व।। ये वनस्पतियां कुष्ठ रोग के लिये उत्तम औषध हैं। इससे शरीर की त्वचा समान रूपरंगवाली बनती हैं। श्यामा वनस्पति शरीर की चमड़ी शरीर का रंग ठीक करने वाली है १ २२/४ अथर्व।।

            सूर्य में नाना प्रकार के वीर्य हैं। ये वीर्य किरणों द्वारा वनस्पतियों में जाते हैं। वनस्पतियों से वीर्य प्राप्त होते हैं। सूर्य भेदन व्यायाम तथा सूर्यभेदी प्राणायाम द्वारा पेट के स्थान में रहने वाली आदित्य शक्ति जागृत हो जाती है। सूर्य किरणों से तपी हुई वायु प्राणायाम से अन्दर लेने के अभ्यास से क्षयरोग में भी बड़ा भारी लाभ पहुंचता है १-३०-१ अथर्व।। सूर्य की किरणों से सिरदर्द-अंगों के रोग-कर्णरोग आदि रोग दूर होते हैं ९ ८/२२ अथर्व।।

            मेघाच्छादित आकाश के पश्चात् जब सूर्य दर्शन होता है, हवा साफ हो जाती है तब मनुष्यों को अत्यन्त आनन्द होता है। वह सूर्य अपनी सीधी गति से रोगों को दूर करता हुआ शरीर का आरोग्य बढ़ाता है। सूर्य का १ तेज तीन प्रकार से कार्य करता है। मस्तिष्क में मज्जारूप में, ह्नदय में पाचन शक्ति के रूप में तथा सब शरीर में उष्णता के रूप में सूर्य का तेज प्रकाशता है १ १२/१ अथर्व।।

            अंगे-अंगे शिश्रियमाणं शोचिषा- शरीर के प्रत्येक अंग में तेज के अंश से सूर्य रहता है १ १२/२ अथर्व।। सूर्य के इस तेज से अपना तेज बढ़ाना चाहिये। चर्मरोग-दमा-खांसी तथा क्षयरोग उन्हीं को होते हैं जो नंगे शरीर पर सूर्य किरण नहीं लेते तथा तंग मकानों में जो लोग वस्त्रों से वेष्टित रहते हैं। पर्वतों पर औषधियों का सेवन निरोग रहकर दीर्घायु जीवन का कारण है १ १२/४ अथर्व।।

कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत्पतन्ति ६-२२-१ अथर्व। सूर्य की किरणें पृथिवी से जल लेकर आकाश में हरण करती हैं इसी से इनका नाम ‘‘हरिः” ‘‘हरयः” मिला है। ये किरणें सब स्थानों को पूर्ण करती हैं इसलिए इन्हें ‘‘सुपर्णाः” ‘‘सुपूर्णाः” कहते हैं। जल के स्थान अन्तरिक्ष में रहकर, वहाँ मेघ रूप में परिणित होकर उन मेघों से पृथिवी पर फिर वही जल आता है। यह कार्य सूर्य किरणों का सदा होता रहता है। वे समुद्र से पानी ऊपर खींचते हैं, मेघ बनाते हैं और वृष्टि होती है। इस प्रकार जल की शुद्धि होती है। पृथिवी पर का जल फिर अन्तरिक्ष में वाष्परूप से खींचा जाता है। वह वहाँ से शुद्ध बनकर फिर वृष्टिरूप में पृथिवी पर गिरता है-मानो मीठे शहद की वर्षा होती है। इस वृष्टि से औषधियाँ बनती हैं। जो रोगों को धोती हैं और दोषः धीः कहलाती हैं। वृष्टि के बिना पदार्थों की उत्पत्ति नहीं होती है और अकाल होता है। सूर्य ही इस अकाल व भुखमरी को दूर करता है व भोग्य पदार्थों का स्वामी है १० ४३/३ ऋक्।।

पर्जन्य का स्वातिजल मध्य नक्षत्रों से प्राप्त किया जा सकता है जो बड़ा आरोग्यप्रद है। वृष्टिजल से शरीर के शुष्क खुजली आदि का निवारण होता है। अन्तरिक्ष में शुद्ध प्राणवायु विराजमान है वह वृष्टि जल के साथ भूमि पर आता है ११-४ अथर्व सूक्त।। वृष्टि जल का स्नान आरोग्यवर्धक है इस जल के पान करने से मूत्र द्वारा शरीर के दोष बाहर हो जाते हैं १ ३/१५ अथर्व।। जो मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करना चाहता है वह सूर्य के प्रकाश में रहे क्योंकि वहाँ अमृत रहता है- इहायमस्तु पुरूषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके ८ १/१ अथर्व।। सूर्य तेरे कल्याण के लिये तपता है इसके प्रकाश को न छोड़ो-सूर्यस्ते शं तपाति ८ १/५ अथर्व।।

            सूर्य की ‘‘वृष्टिवनि’’ नामक किरणों से वर्षा होती है १० ४३/५ ऋक्।। इसकी ‘‘अरूण’’ नामक किरण दिन की उत्पत्ति करता है। इसका तेज द्युलोक में भरा पड़ा है। इस किरण से वास्तोष्पति नामक अग्नि की उत्पत्ति होती है। यह वास्तोपति अग्नि यज्ञहवि को देवों की तरफ फेंकता है। पदार्थों के संयोग-वियोग का कारण यही अग्नि है १० ६१/६ ऋक्।।

            सूर्य के बिना भूमण्डलों में अनेक व्याधियां पैदा हो जाती हैं। सारा भूमण्डल शुष्क एवं वृक्ष-औषधि-लता आदि से विहीन हो जाता साम. ९१३।। ये सूर्य की किरणें समुद्र व भूगर्भ में पहुंचकर अपने तेजस्वी ताप से स्वर्णादिधातु हीरे-रत्न उत्पन्न कर देती हैं ये अद्भुत शक्ति की राशि होती हैं सा. १०१४+ अथर्व १९ २६/१ + १३ २/१४।। सूर्य अपने वृष्टिजल से फलों में मिठास प्राप्त कराता है २१ २/१८ अथर्व-लिखकर निरन्तर सूर्य दर्शन होने की प्रार्थना की है।

            वैदिक भाषा व साहित्य के मर्मज्ञ महाकवि कालिदास ने भी रघुवंश के प्रथम सूर्य की महत्ता और जीवन दर्शन का रूप स्वीकारते हुए कहा है ‘‘सहस्त्र गुणमुत्सृष्टु मादत्ते हि रसं रविः” – सूर्य हजारों गुणा अधिक बरसाने के लिये पृथिवी से जल ग्रहण करता है।

            इसीलिए सूर्यादि पदार्थ विद्याओं के यथार्थज्ञाता शिल्पविद्या के ज्ञाता होकर विमानादि शीघ्रगामी पदार्थों की रचना कर विश्व विजयी होते हैं ५ १०/६ + ५ ३२/५ ऋक्।। सूर्य की श्रेष्ठता के कारण ही और इसीलिए दिव्य पदार्थों की माता द्योतमान प्रकृति भी इस प्राणदाता सूर्य को पृथक् उत्पन्न करती है = असावन्यो असुर सूयत द्यौः १० १३२/४ ऋक्।।

                                                                                  शाहपुर, मुजफ्फरनगर, उत्तरप्रदेश

वेदों की विद्याओं में लगने वाले कर्मभेद (वाम प्रशस्य कर्म) -छैलबिहारी लाल

वेदों में मूर्तमान संसार को बनाने में जो कर्म लगे उनको कभी सूचीकृत करके दस प्रशस्य नाम भेदों में वर्गीकृत किया गया है। यह कर्म प्रसार (प्रैशर) देने वाले कर्मों के रूप में है। अस्त्रेमा। अनैमा। अनेद्यः। अनेभि-शस्त्यः। उक्थ्य। सुनीथः। पाकः। वामः। वयुनम। यहाँ पर हम वाम नामक प्रसारित करने वाले कर्म का विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।

            इन्दवा वामुशान्ति हि (ऋ. १।२।४) मधुछन्दा ऋषि, इन्द्र वायु देवता, गायत्री छनद, इस कर्म को महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपनी चतुर्वेद विषय सूची में मित्र लक्षण में कार्य करने वाला कर्म बतलाया है और विद्युत एवं वायु की मित्रता द्वारा उशान्ति रूपी कान्ति कर्मों को प्रसारित करने वाला वाम कर्म सिद्धान्त दिया है। हमारे वैदिक ग्रन्थों में इस स्थल का बहुत अधिक तरह-तरह से वर्णन किया गया है। तैत्तरीय संहिता १।४।४।१, शतपथ ब्राह्मण ४।१।३।१९, एतरेय ब्राह्मण २।४।२, ३।१।१, आदि में भी बहुत विस्तार से वर्णन किया गया है। इस प्रकरण में शुक्ल नामक अन्न और अश्वनी उशमसि नामक क्रान्ति कर्म के १०९ भेदों में से एक भेद के साथ इसका प्रयोग दर्शाया गया है।

            ऋ. १।१७।३ में काण्डवो मेधातिथि ऋषि इन्दिरा वरूणो विज्ञान में गायत्री छनद भेद द्वारा विद्युत अग्नि और जल के मित्र लक्षणों में ‘‘ईम’’ नामक ज्वलनशील द्रव्य पदार्थ को वाम नामक प्रशस्य कर्म के द्वारा राये नामक धन को प्राप्त करने सिद्धान्त दिये गये हैं। इसी सूक्त के ७ से ९ वाले तीन मंत्रों में भी तरह-तरह से प्रयोग करने के सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है।

            ऋ. १।२२।३।४ में विमान विद्या के साथ शून्यता वृत्ति नामक ऊषा किरणों के रूप में वाम नामक प्रशस्य कर्मों के द्वारा आकाश में गमन आदि और हिरण्य-पाणिन नामक सुवर्ण आदि रत्न आदि को प्राप्त कराने में प्रयोग दर्शाया गया हैं। ऋ. १।३०।१८ में शुनशेप ऋषि के अश्विनो विज्ञान में समुद्र और अन्तरिक्ष में दस्त्रा अश्विनी द्वारा ऐसे अश्वों को खींचने में वाम कर्म सिद्धान्तों को दिया है जिसमें मनुष्य आदि प्राणी न लगे हों। इस प्रकरण को एतरेय ब्राह्मण ७।३।४ में भी दिया गया है। ऋ. १।३४।१, ५, १२ हिरण्य स्तूप ऋषि आगिरस सिद्धान्त के अश्विनों विज्ञान के युवम भेद द्वारा तीन बार (गेज प्रणाली) मे वाम कर्म का शिल्प क्रियाओं के साथ प्रयोग सिद्धान्त दिया गया है। इस सूक्त में विमान विद्या की शिल्प क्रियाओं के साथ प्रयोग सिद्धान्त दिया गया है। इस सूक्त में विमान विद्या की शिल्प क्रियाओं के लिए १२ मंत्रों में बहुत ही विस्तृत वर्णन किया गया है। इन विमान आदि को बनाने में कौन-कौन सी धातु लगेंगी इन सब के साथ तरह-तरह के ईंधन वलों और उनके साथ प्रयोग होने वाले अन्य वल लक्षणों का वर्णन करते हुए अन्तरिक्ष यानों के द्वारा ११ दिन में भूगोल पृथ्वी के अन्त को पहुंचाने वाले विमानों का भी वर्णन किया गया है। इस प्रकरण को आजकल के अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों के साथ आधुनिक विज्ञान से समन्वय करके आगे का ज्ञान बड़ी अति सहजता पूर्वक प्राप्त किया जा सकता है। ऋ. १।४६।१, ३, ५, ८, में प्रकण्व ऋषि सिद्धान्तों में दिव और उषा नामक प्रकाश और किरणों को मित्र गुणों द्वारा वाम कर्म द्वारा प्रयोग करने का विमान आदि सवारियों में प्रयोग करने के सिद्धान्त दिये गये हैं। इसी प्रकरण से सम्बन्धित ऊषा और प्रकाश को विमान विज्ञान में प्रयोग करने में वाम नामक प्रसारित करने वाले कर्मों के सिद्धान्त ४७ वें सूक्त में भी दिये गये हुए हैं। इन स्थलों को भिन्न-भिन्न वेद भाष्यकारों के भाष्यों से एवं चतुर्वेद व्याकरण पदसूचियों के माध्यम से प्राप्त करके संसार के विमान के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ाया जा सकता है। ऋ. १।९३।२, ३, ४ में रहुगणपुत्रों गौतम ऋषि के अग्नि सोम सिद्धान्तों में भूरिक उष्णिक, विराट, अनुष्टुप और स्वराट पंक्ति छनद भेद द्वारा अग्नि और सोम के मित्र लक्षणों में वाम नामक प्रेशर देने वाले कर्म सिद्धान्तों को वर्णन किया गया है। इस प्रकरण में भी विमान विद्या आदि में अग्नि के सोम से मित्र लक्षणों को विमान विद्या के साथ दर्शाया गया है। ऋ. १।१०८।१, ५, ६ में भी आगिरसकुत्स ऋषि के इन्द्राग्नि विज्ञान में त्रिष्टुप पंक्ति और विराट त्रिष्टुप छनद भेद द्वारा विमान विद्या में तरह-तरह के सिद्धान्तों का शिला सिद्धान्तों का शिल्प क्रियाओं के साथ वाम प्रशस्य कर्म के सिद्धान्त दिये हुए हैं। १०९ वाले सूक्त में भी इस विद्या का और अधिक विस्तार किया गया है। वहां पर अग्नि और विद्युत् के मित्र लक्षण द्वारा यवत अश्विनियों के साथ सूर्य और पवन का संयोग वाम नामक प्रशस्य कर्म में लगाने का सिद्धान्त दिया गया है।

            ऋ. १।११९।९ में कक्षीवान ऋषि के अश्विनी विज्ञान सिद्धान्त में यम वायु और श्वेत प्रकाश के साथ वाम नामक प्रशस्य कर्म को विमान विज्ञान की शिल्प क्रियाओं के प्रयोग करने का सिद्धान्त दिया गया है। इसी सूक्त में ११ से १३ वाले मंत्रों में नश, नासत्या और पुम भुजा नामक अश्विनी के साथ वाम प्रशस्य कर्म का प्रयोग दर्शाया गया है। २१-२८वें मंत्र में भी इसको विमान विद्या के साथ दर्शाया गया है। इससे अगले सूक्त में छंद भेद से ५, २, ४, ९, १०, १५, १८, २२, २३, २५ (२। ३९।८) में भी वाम नामक प्रशस्य कर्म की विद्याओं का भिन्न-भिन्न प्रयोग सिद्धान्त दर्शाया गया है। ऋ. १।११८।१ (२।५८।३) ४, ५। १०। ११ में कक्षीवान ऋषि के अश्विनौ विज्ञान में (श्येनपत्या) बाज के समान उड़ने वाला, पवन के समान वेगवाला, मन के समान गति वाला रथ या यान ऊपर से नीचे  उतरने का वाम सिद्धान्त दिया है। भिन्न-भिन्न मंत्रों में त्रिष्टुप छन्दों के माध्यम से जलयानों की गति वायुयानों का ऊपर-नीचे आने जाने का सिद्धान्त दिया है। जैसे ऊषा धीरे-धीरे प्रकाशित होती है उसी प्रकार क्रम से गति को बढ़ाया घटाया जाने को दर्शाया है। इन मंत्रों में जवसा गति का सिद्धान्त महत्व रखता है।

            ऋ. १।११९।१; २; ४;५; ७; ९ में दीर्घतमसः कक्षीवान ऋषि के अश्विनौ विज्ञान में जगती तथा त्रिष्टुप छन्दों द्वारा विमान विद्या की भिन्न-भिन्न कार्य प्रणलियों को प्रकाश्ति किया गया है। प्रथम मंत्र में (जीराश्वम्) गति वाले अश्व (इंजन) का वर्णन है। अश्विनौ विद्या में प्रशस्य कर्म से एक ऐसे विशाल यान को दर्शाया गया है जिसमें सैकड़ों भंडारण हों, हजारों पताकाएँ लगी हों। यह जलयान का वर्णन है। (ऊध्र्वाधीतिः) समुद्र लहरों पर ऊपर-नीचे करने का सिद्धान्त है। यहाँ (धर्मं) और (ऊर्जानी) पदों से सौर ऊर्जा सिद्धान्त दिया गया है जिससे प्रकाश के लिए यानों में दूसरा प्रयोग हो सके।

            ऋ. १।१२०।१; ३; ५; में उशिक पुत्रः कक्षीवान ऋषि तथा अश्विनौ देवता हैं। छनद गायत्री व उष्णिक छन्दों द्वारा प्रशस्य कर्म सिद्धान्त दिए हैं। यानादि में प्रकाश की आवश्यकता होती है। यहाँ इन मंत्रों में प्रकाश विद्या का वर्णन है। (जोषे) कान्ति या प्रकाश के लिए विद्या-विज्ञान का विधान करने को कहा है। ऋ. १।१२२।७; ९; १५ मंत्रों के कक्षीवान ऋषि विश्वेदेवा हैं। इन मंत्रों में त्रिष्टुप, पंक्ति छन्दों द्वारा प्रशस्य कर्म का सिद्धान्त दिया है एवं मित्र-वरूण क्रिया (उठाने गिराने की क्रिया) से चलने वाले यन्त्र विशेषों का सिद्धान्त है। चार के स्थान पर तीन व्यवधानों को नष्ट करना चाहिए अर्थात् क्रम से ही यन्त्रों की कमी दूर करनी चाहिए। ऋ. १।१३५।४, ५; ६; मन्त्रों के परूच्छेय ऋषि दृष्टा, वायुदेवता व अष्टि छनद हैं। प्रशस्य कर्म के लिए इन्द्र + वायु के प्रयोग से वाम क्रिया का दिग्दर्शन कराया है। विद्युत् वायु के योग से अनेक शिल्प क्रियाऐं हुआ करती है। अतः विमान विद्या में इनके प्रयोग का सिद्धान्त दिया है।

            ऋ. १।१३७। १-३ मंत्रों के परूच्छेप ऋषि, मित्रावरूणौ देवते, शक्चरी छनद हैं। मित्र + वरूण विज्ञान से वाम् क्रिया द्वारा यन्त्रों की क्रियाशीलता प्रकट हो रही है। (इन्दवः) द्रव का बूंद-बूंद होकर टपकने से यंत्र में गति प्रदान होती है यह गति ही समस्त जगत के कार्यों का सम्पादन करती है। ‘अद्रिभि’ क्रिया से यन्त्रों में स्निग्ध अर्थात् चिकनाई पहुँचाने की विधि या सिद्धान्त दिया गया है। आगे सूक्त १३९ के मंत्र ३, ४, ५ के परूच्छेप ऋषि, अश्विनौ देवता। अष्टी, व जगती छनद हैं। ‘‘स्वर्ण-यान’’ भारत के प्राचीन वैभव को उजागर कर रहे हैं। अश्विनौ विज्ञान-विमान विद्या की अंगभूत इकाई है जो विमानों की गति को नियंत्रण में रखती है। (पवयः) पहियों को घूमने की दिशा व दशा को प्रदान करने की क्रिया विशेष जिससे यान दिशा परिवर्तन व गति परिवर्तन कर सकें। (दिविष्टषु) आकश मार्ग में ही अग्नि आदि पदार्थों को प्रयुक्त करके नीचे न गिरने वाले सिद्धान्त को दर्शाया गया है। अर्थात् ऊपर की ही ओर उड़ान भरने का सिद्धान्त जैसे (राकेट) ऊर्ध्वयान। इन यानों के विषय में पांचवें मंत्र में कहा कि ये यान दिन रात चलते रहें तो भी ये नष्ट नहीं हो सकते। ये रहस्यमयी वेदविज्ञान-विद्याएं मंत्रों में छिपी पड़ी हैं। इन्हें उजागर कर हम आर्यावर्त्त के प्राचीन गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करें, भगवान से यही प्रार्थना है।

            ऋ. १।१५१।२; ३; ६-९; मंत्रों के दीर्घतमा ऋषि, मित्रा वरूणौ देवता तथा जगती छनद भेद हैं। शिल्प क्रियाओं में प्रशस्य कर्म भेद से वाम क्रिया द्वारा ऋषि ने विज्ञान के सिद्धान्त निरूपित किए हैं। यहाँ पृथ्वीस्थ कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मिस्त्रावरूणौ विज्ञान का समावेश है। ऋ. ६।१५२।३; ७ (३।६२।१६) प्रथम मंडल के सूक्त १५२ में दीर्घतमा ऋषि, मित्रावरूणौ देवते तथा त्रिष्टुप छनद भेद है। इन मंत्रों में वेद-विद्या के विभाग करने को कहा है जिससे विद्याओं को वर्गीकरण होकर उन-उन पर अलग-अलग क्रियाएँ की जा सकेंगे। अगले सूक्त के मंत्र १-४ तक मित्रा वरूणौ विज्ञान है। ऋषि दीर्घतमा, देवता मित्रावरूणौ छनद त्रिष्टुप, पंक्ति छन्द भेद हैं। १।१५४।२ के दीर्घतमा ऋषि, विष्णु देवता निचृत जगती छन्द हैं। मंत्र में इन्द्र विष्णु विद्या दी गई है। विद्युत् किसी कार्य-क्रिया को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाती है। ऋ. १।१५७।६ दीर्घतमा ऋषि, अश्विनौ देवते, विराट् त्रिष्टुप छन्द विमानों में चिकित्सा आदि का प्रबन्ध का होना अनिवार्य हो।

            ऋ. १।१५८। १-४ दीर्घतमा ऋषि अश्विनौ देवता, त्रिष्टुप, पंक्ति छन्द भेद हैं। सूर्य और पवन के योग से जो कार्य सिद्ध होते हैं वह विद्या दर्शाई गई है। अगले सूक्त १।१८०।१; २-५; ७, १० के अगस्त्य ऋषि, अश्विनौ देवते। त्रिष्टुप, पंक्ति छंद भेद। अश्विनौ विद्या एवं प्रशस्य कर्म से (द्याम् परि इयानम्) आकाश को सब ओर से जाते हुए रथ (विमान) को स्वीकार करें। अगले सूक्त १।१८१।१७-८९ के अगस्त्य ऋषि अश्विनौ देवते, त्रिष्टुप छन्द भेद हैं। पूरा सूक्त वाम् क्रिया से संबंधित है यहाँ पूरे सूक्त में वाम कर्म द्वारा अश्विनौ-विज्ञान को सिद्ध किया है। ऐश्वर्य के लिए मन के समान वेगवाले यानों का होना दिखाया है। १।१८२।८ के अगस्त्य ऋषि, अश्विनौ देवता हैं, स्वराट् पंक्ति छन्द हैं। अश्विनौ विज्ञान से यंत्रों में बल (शक्ति) को किस प्रकार बढ़ाया जाता है इसके विषय में कहा गया है। ऋ. १।१८३।३, ४ के अगस्त्य ऋषि, अश्विनौ देवते त्रिष्टुप छन्द भेद हैं। यहाँ सर्वाग सुन्दर रथ (विमान) विद्या को दर्शाया है और ऐसा विमान बनाने का वर्णन है जिसे कोई चोर, ठग अपहरण न कर सके।

अर्थात् अपहरणकत्र्ता का जिसमें प्रवेश ही न होने पाये। ऋ. १।१८४।१; ३; ४; ५; ६; अगस्त्य ऋषि, अश्विनौ देवता। पंक्ति और त्रिष्टुप छन्द भेद् द्वारा अश्विनौ विद्या का विधान है। वाम कर्म द्वाराशिल्प क्रियाओं के सिद्धान्त दिये हैं। अन्तरिक्ष में दिशाओं का ज्ञान करके विमान चालन की क्रिया को दर्शाया गया है। ऋ. १।१८५।४ के अगस्त्य ऋषि द्यावा पृथिव्यौदेवते निचृत् त्रिष्टुप छंद हैं। पृथ्वी से सूर्यादि प्रकाशित लोकों तक का विज्ञान प्रशस्य कर्मों द्वारा कैसे सिद्ध किया जा सकता है इसके लिए अगस्त्य ऋषि ने मंत्र में कहा है कि यानों को किस प्रकार संतापरहित करके सुख पूर्वक विचरण कर सकते हैं। और भी वाम् नामक प्रशस्य कर्म के चारों वेदों में अनेक स्थल उपलब्ध हैं।

वेद विद्या अनुसंधान, बारहद्वारी,

पसरट्टा हाथरस (अलीगढ़)-२०४१०१

आर्षी-संहिता और दैवत-संहिता । ✍🏻 पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु

      कई लोग वेद की इन संहिताओं को आर्षी अर्थात् ऋषियों के क्रम से संग्रहीत की हुई मानते हैं। यथा ऋग्वेद के आरम्भ में शतर्ची, अन्त में क्षुद्रसूक्त वा महासूक्त और मध्य में मण्डल द्रष्टा गृत्समद, विश्वामित्र आदि ऋषियों वाले क्रमशः मन्त्र हैं। 

      हम वादी से पूछते हैं कि क्या जैसा क्रम ऋग्वेद में दर्शाया, वैसा अन्य संहितामों में दर्शाया जा सकता है ? कदापि नहीं। तथा ऋग्वेद में भी जो क्रम वादी बताता है वह भी असम्बद्ध है। यदि ऋग्वेद वस्तुतः ऋषि क्रमानुसार संगृहीत होता तो विश्वामित्र के देखे हुए मन्त्र उसके पुत्र ‘मधुच्छन्दाः’ और पौत्र ‘जेता’ से पहिले होने चाहिये थे, न कि पीछे। ऋग्वेद में विश्वामित्र के मन्त्र तृतीय मण्डल में और मधुच्छन्दाः व जेता के मन्त्र प्रथम मण्डल में क्यों रक्खे गये ? यदि वादी कहे कि प्रथम मण्डल में केवल शचियों का संग्रह है, विश्वामित्र शतर्ची नहीं अपितु माण्डलिक है, तो यह भी ठीक नहीं। प्रथम मण्डल के जितने ऋषि हैं, उनमें बहुत से शतर्ची नहीं हैं। सव्य आङ्गिरस ऋषि वाले (१।५१-५७) कुल ७२ मन्त्र हैं। जेता ऋषिवाले कुल (१।११) ८ ही मन्त्र हैं। ऐसे ही और भी अनेक ऋषि हैं। आश्चर्य की बात है कि शचियों में पढ़े हुए प्रस्कण्व काण्व के ८२ मन्त्र तो प्रथम मण्डल में हैं, १० मन्त्र आठवें और ५ मन्त्र नवम मण्डल में क्यों संगृहीत हुए? समस्त ९७ मन्त्र एक जगह क्यों नहीं संग्रहीत किये गये ? इसी प्रकार जिसके सूक्त में १० से कम मन्त्र हों वह क्षुद्रसूक्त और जिसके सूक्त में १० से अधिक हों वह महासूक्त कहाते हैं, तो क्या ऐसे ऋषि ऋग्वेद के दशम मण्डल से अतिरिक्त अन्य मण्डलों में नहीं हैं ? हम कह आये हैं कि जेता के केवल आठ ही मन्त्र हैं, क्षुद्रसूक्त होने से उसके मन्त्रों का संग्रह दशम मण्डल में न करके प्रथम मण्डल में किस नियम से किया? तथा जब विश्वामित्र माण्डलिक ऋषि है तो उसके समस्त मन्त्र तृतीय मण्डल में क्यों संगहीत नहीं किये ? कुछ मन्त्र नवम (६७।१३-१५) और दशम (१३७।५) मण्डल में किस आधार पर संगृहीत किये ? इत्यादि अनेक प्रश्न वादी से किये जा सकते हैं। 

      वस्तुतः वादियों के पास इन प्रश्नों का कोई भी उत्तर नहीं है। वे तो 🔥”अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः’- इस उक्ति के अनुसार स्वयं शास्त्र के तत्त्व को न समझकर अन्य साधारण व्यक्तियों को बहकाने की क्षुद्र चेष्टा[१] किया करते हैं। 

[📎पाद टिप्पणी १. हमारी दृष्टि में वेद को अपौरुषेय न माननेवाले ही ऐसा मान सकते हैं। ऐसे व्यक्ति जनता के समक्ष कहने का साहस नहीं करते कि हम वेद को पौरुषेय (ऋषियों का बनाया) मानते हैं।] 

      वेदों की इन संहिताओं को आर्षी[२] संहिता कहने का तात्पर्य यह है ऋषि अर्थात् सर्वद्रष्टा सर्वज्ञ जगदीश्वर से इन का प्रादुर्भाव हुआ है। वस्तुतः यह नाम ही इस बात का संकेत करता है कि वेद ईश्वर के रचे हुए है।

[📎पाद टिप्पणी २. अथर्ववेद पञ्चपटलिका ५।१६ में जो आचार्यसंहिता तथा आर्षीसंहिता का उल्लेख मिलता है, वह पुराने आचार्यों की एक संज्ञा मात्र है, ऐसा समझना चाहिये।]

      जो व्यक्ति आर्षी नाम होने से इन्हें ऋषियों द्वारा संग्रहीत मानते हैं, वे यह भी कहते हैं कि इन संहितानों में इन्द्रादि देवताओं के मन्त्र विभिन्न प्रकरणों में बिखरे हुए हैं। अतः क्रमशः एक-एक देवता के समस्त मन्त्रों को संगृहीत करके एक दैवत संहिता बनानी चाहिये, जिससे अध्ययन में सुगमता होगी। 

      देवता-क्रम से संहिता के मन्त्रों को संग्रहीत करो से जिन मन्त्रों की आनुपूर्वी और देवता समान हैं, उन मन्त्रों का एक स्थान में संग्रह होने से पौनरुक्त्य तथा आनर्थक्य दोष आवेंगे। उन्हीं मन्त्रों को, जैसा वर्तमान संहिताक्रम में पढ़ा गया है, वैसा पाठ मानने में कोई दोष नहीं आता, क्योंकि वर्णानुपूर्वी समान होने पर भी प्रकरणभेद होने से अर्थ भेद की प्रतीति झटिति हो सकती है। उदाहरणार्थ पाणिनि के 🔥”बहुलं छन्दसि” सूत्र को उपस्थित किया जा सकता है। पाणिनि ने इस सूत्र को १४ स्थानों में पढ़ा है। इस सूत्र की वर्णानुपूर्वी समान होने पर भी प्रकरणभेद से अर्थ की भिन्नता होने के कारण सबकी सार्थकता रहती है। आनर्थक्य या पौनरुक्त्य दोष नहीं आता। यदि कोई व्यक्ति सब 🔥”बहुलं छन्दसि” सूत्रों को उठाकर एक स्थान में पढ़ दे, तो क्या उससे कुछ भी लाभ या विशेष अर्थ की प्रतीति होगी? उलटी उस एक स्थान में पढ़नेवाले की ही मूर्खता सिद्ध होगी। भला इससे कोई पाणिनि की ही मूर्खता सिद्ध करना चाहे तो कभी हो सकती है ! कभी नहीं। ऐसे ही इस देवताक्रम से पढ़ी जानेवाली संहिता का होगा। इसमें और भी अनेक दोष हैं, जिनका विस्तरभिया यहाँ अधिक उल्लेख करना अनुपयुक्त होगा। 

      जिसका शास्त्रीयचक्षुः है वही इन बातों के रहस्यों को समझ सकता है। शास्त्र-ज्ञान विहीन क्या जाने शास्त्रों के रहस्य को –

      🔥पश्यदक्षण्वान्न वि चेतदन्धः॥ ऋ० १।१६४।१६

      इस प्रकार हमने अनेक प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया कि वेद की आनुपूर्वी सर्वकाल से नित्य मानी जाती रही है, और इस समय भी उपलब्ध सामग्री के आधार पर यही निश्चित है कि हमें वही आनुपूर्वी प्राप्त हो रही है, जिसे सर्ग के आरम्भ में परमपिता परमात्मा ने आदिऋषियों के हृदयों में प्रकाशित किया था। 

[अगला विषय – वेद और उसकी शाखायें]

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु 

[ 📖 साभार ग्रन्थ – जिज्ञासु रचना मञ्जरी ]

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

वेदों की आनुपूर्वी । ✍🏻 पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु

[क्या प्राचीन ऋषियों के काल में वेद ऐसा ही था, जैसा कि इस समय हमें उपलब्ध हो रहा है?]

      वेद के मन्त्रों में आये पद, मण्डल[१], सूक्त तथा अध्यायों में आये मन्त्रों का क्रम सृष्टि के आदि में जो था, इस समय भी वही है, या उसमें कुछ परिवर्तनादि हुआ है, यह अत्यन्त ही गम्भीर और विचारणीय विषय है। इस विषय का सम्बन्ध वास्तव में तो हमारे आदिकाल से लेकर आज तक के भूतकाल के साहित्य तथा इतिहास के साथ है। दुर्भाग्यवश हमारा पिछला समस्त इतिहास तो दूर रहा, हमें दो सहस्र वर्ष पूर्व का इतिहास भी यथावत् रूप में नहीं मिल रहा, विशेष कर वैदिक साहित्य का। हाँ कुछ बातें हमें ठीक मिल रही हैं, जो संख्या में अत्यन्त अल्प है। ऐसी स्थिति में जो भी सामग्री हमें अपने इस प्राचीन साहित्य के विषय में मिलती है, उसी पर सन्तोष करना होगा। 

[📎पाद टिप्पणी १. इस विषय में ऋग्वेद में जो अष्टक, अध्याय, वर्ग और मन्त्र तथा दूसरा मण्डल, अनुवाक, सूक्त और मन्त्र तथा तीसरा मण्डल, सूक्त और मन्त्र का अवान्तर विच्छेद है, वह आर्ष है। ऐसा ऋग्वेद के भाष्यकार वेङ्कटमाधव ने अष्टक ५ अध्याय ५ के आरम्भ (आर्षानुक्रमणी पृ० १३) में लिखा है।]

      वेद नित्य हैं, सदा से चले आ रहे हैं। इनका बनाने वाला कोई व्यक्ति विशेष नहीं। इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं इत्यादि विषय हम पूर्व प्रकरणों में भली-भान्ति स्पष्ट कर पाये हैं। सब ऋषि-मुनि तथा अन्य विद्वान् वेद को नित्य मानते चले आ रहे हैं, यह सब पूर्व ही विस्तार से दर्शा चुके हैं। प्राचीन ऋषियों के काल में वेद क्या ऐसा का ऐसा ही था, जैसा कि इस समय हमें उपलब्ध हो रहा है? प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह विचार उठना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता, अत: इसकी विवेचना आवश्यक ही है। 

      ◾️(१) जहाँ तक हमें पता लगता है ब्राह्मणग्रन्थों के काल में ये ऋग, यजुः आदि वेद वही थे, जो इस समय हैं, क्योंकि गोपथब्राह्मण में लिखा –

      🔥”अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम्’ इत्येवमादिं कृत्वा ऋग्वेदमधीयते। .…’इषे त्वोजे त्वा वायवस्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण’ इत्येदमादिं कृत्वा यजुर्वेदमधीयते। …’अग्न आयाहि वीतये गुणानो हव्यदातये नि होता सत्सि बर्हिषि’ इत्येबमादिं कृत्वा सामवेदमधीयते।” (गो० १।१।२९) । 

      इससे स्पष्ट है कि गोपथब्राह्मण के काल तक ऋग, यजुः, साम – इन तीनों वेदों की संहितायें वही थीं, जो इस समय वर्तमान में हैं। इनके आरम्भ के मन्त्रों की प्रतीके वही की वही हैं, जो इन तीनों संहिताओं में हैं। यही बात हम पीछे के काल में भी पाते हैं (देखो विवरण टिप्पणी पृ. ६)। 

      गोपथब्राह्मण के उपर्युक्त लेख से यद्यपि इनकी सारी वर्णानुपूर्वी का निर्णय नहीं हो सकता, पर इतना तो स्पष्ट सिद्ध है कि इन संहिताओं के आदि मन्त्र का स्वरूप वही है, जो उस काल में पूर्व काल की परम्परा से चला आ रहा था, और अब तक भी वैसा का वैसा चला आ रहा है। गोपथ के इस स्थल में जो अथर्ववेद का आरम्भ 🔥’शन्नो देवी०’ से कहा गया है, वह पैप्पलाद शाखा का पाठ माना जाता है। हम आगे विशदरूप में बतायेंगे कि पैप्पलाद शाखाग्रन्थ है, और वह ऋषिप्रोक्त है। महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि ने 🔥’तेन प्रोक्तम्’ (अ० ४।३।१०१) सूत्र के भाष्य में शाखाविषय में ‘पैप्पलादकन्’ ऐसा उदाहरण दिया है। सम्भव है गोपथ ब्राह्मण अथर्ववेद की उसी शाखा का हो, जिसका आदि मन्त्र “शन्नो देवी.” कहा है। ऐसी अवस्था में अथर्ववेद के नाम से 🔥’शन्नो देवी.’ आदि मन्त्र का उल्लेख करना अन्य विरोधी प्रमाण होने से विशेष महत्त्व नहीं रखता।

      ◾️(२) अब हम इस बात को एक अन्य रीति से भी स्पष्ट करते हैं। शतपथब्राह्मण में यजुर्वेद के मन्त्रों की प्रतीके बराबर आरम्भ से कुछ अध्याय तक निरन्तर (आगे भी यत्र-तत्र) देकर तत्तद् विषय में मन्त्रों का विनियोग दर्शाया गया है। १७ अ० तक के मन्त्रों के पाठ तथा आनुपूर्वी के विषय में इन प्रतीकों से हमें बहुत कुछ सहायता मिल सकती है। यह आनुपूर्वी और पाठ वैसा का वैसा है, जैसा हमें यजुर्वेद में मिल रहा है। हाँ ! इतना अवश्य है कि कहीं-कहीं मन्त्रों के किसी प्रकरण को याज्ञिकप्रक्रिया के कारण कुछ क्रमभेद से भी विनियुक्त किया गया है, जैसा कि यजुर्वेद के प्रारम्भिक दर्शेष्टिसंबन्धी ४ मन्त्रों का विनियोग शतपथब्राह्मण में प्रारम्भ में न करके पौर्णमासेष्टि के अनन्तर किया है। क्योंकि याज्ञिकप्रक्रिया में प्रथम[२] पौर्णमासेष्टि करने का विधान है (अ० ७।८०।४)। इससे यह तो पता लग ही जाता है कि शतपथब्राह्मणकार के समय यजुर्वेद के कम से कम १७ अध्याय तक के मन्त्रों की आनुपूर्वी तो वही थी जो अब है। इसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह का स्थान नहीं रह जाता। 

[📎पाद टिप्पणी २. “🔥पोर्णमासी प्रथमा यज्ञियासीदह्नां रात्रीणामतिशर्वरेषु। ये त्वां यज्ञैर्यज्ञिये अर्धयन्त्यमी ते नाके सुकृतः प्रविष्टाः ॥ अथर्व० ७।८०।४॥] 

      ◾️(३) ऋग्, यजुः, साम, अथर्व इन चारों वेदों की अनुक्रमणियाँ भी उनकी इस आनुपूर्वी को जो वर्तमान में मिल रही है, वैसी की वैसी सिद्ध करने में परम सहायक हैं, चाहे उनका निर्माणकाल कभी का रहा हो। कम से कम इनसे यह तो सिद्ध हो ही जाता है, कि उन-उन सर्वानुक्रमणियों के काल में वर्तमान चारों वेदों की आनुपूर्वी वही थी, जैसी कि अब है, इसमें यत्किञ्चित् भी भेद नहीं हुआ। उन सर्वानुक्रमणियों के टीका कार भी हमें इस विषय में पूरी-पूरी सहायता दे रहे हैं। वे सब के सब इसी बात का प्रतिपादन करते हैं। इन ग्रन्थों की तो रचना ही इस आनुपूर्वी (क्रम) की रक्षा के लिये हुई, इसमें क्या सन्देह है ? ऋक्सर्वानुक्रमणी से यह बात विशेष रूप में सिद्ध हो रही है। 

      ◾️(४) अब हम यह बताना चाहते हैं कि महाभाष्यकार पतञ्जलि मुनि वेद की आनुपूर्वी और स्वर दोनों को ही नित्य (नियत) मानते हैं – 

      🔥”स्वरो नियत आम्नायेऽस्यवामशब्दय। वर्णानुपूर्वी खल्वप्याम्नाये नियता…” (महाभाष्य ५।२।५६) 

      अर्थात-वेद में अस्यवामादि शब्दों का स्वर नित्य[३] होता है, और उनकी वर्णानुपूर्वी (क्रम) भी नित्य होती है। 

[📎पाद टिप्पणी ३. यहाँ नित्य और नियत पर्यायवाची शब्द हैं। 🔥’अव्ययात् त्यप्’ (अ० ४।२।१०४) पर वात्तिक है – 🔥”त्यब् ने वे”, नियतं ध्रुवम्। काशिकाकार आदि वैयाकरण इसकी यही व्याख्या करते हैं।]

      महाभाष्यकार का यह प्रमाण ही इतना स्पष्ट है कि इसके आगे और किसी प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। इसीलिये समस्त ऋषि-मुनि वेद को नित्य मानते हैं। 

      इस पर एक शङ्का हो सकती है कि महाभाष्यकार ने 🔥”तेन प्रोक्तम्” (अ० ४।३।१०१) के भाष्य में लिखा है –

      🔥’यद्यप्यर्थो नित्यः, या स्वसौ वर्णानुपूर्वी साऽनित्या। तभेदाच्चैतद् भवति-काठकं, कालापकं, मौवकं, पप्पलादकमिति।’ 

      अर्थात्- यद्यपि अर्थ नित्य है, परन्तु वर्णानुपूर्वी अनित्य है। उसी के भेद से काठक, कालापक, मोदक, पैप्पलादक ये भेद होते हैं। इससे विदित होता है कि महाभाष्यकार वेद की वर्णानुपूर्वी को अनित्य मानते हैं। 

      इसका उत्तर यह है कि महाभाष्यकार ने यहाँ जितने उदाहरण दिये हैं, वे सब शाखाग्रन्थों के हैं, मूल वेद के नहीं। प्रवचन भेद से शाखाओं में वर्णानुपूर्वी की भिन्नता होनी स्वाभाविक है (शाखा के विषय में हम अगले प्रकरण में विस्तार से लिखेंगे)। इतने पर भी यदि पूर्वपक्षी को सन्तोष न हो तो मानना पड़ेगा कि अपने ग्रन्थ में दो परस्पर विरोधी वचनों को लिखनेवाला पतञ्जलि अत्यन्त प्रमत्त पुरुष था, जो ठीक नहीं। 

      ◾️(५) निरुक्तकार यास्कमुनि भी वेद की आनुपूर्वी को नित्य मानते हैं, जैसा कि –

      🔥”नियतवाचोयुक्तयो नियतानुपूर्व्या भवन्ति।” निरु० १।१६ 

      अर्थात्- वेद की आनुपूर्वी नित्य है। 

      यही बात जैमिनि, कपिल, कणाद, गौतमादि ऋषि-मुनि मानते हैं, यह हम पूर्व [४] कह आये हैं। 

[📎पाद टिप्पणी ४. द्रष्टव्य – यजुर्वेदभाष्य विवरण भूमिका ( 📖 जिज्ञासु रचना मञ्जरी ) – पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु]

      ◾️(६) इस विषय में सब से बड़ा और प्रत्यक्ष प्रमाणं तो उन ब्राह्मण कुलों के अनुपम तप और त्याग का है, जिससे अब तक वेद की आनुपूर्वी हम तक वैसी की वैसी सुरक्षित पहुंच रही है, जिन्होंने एक-एक मन्त्र के जटा-माला-शिखा-रेखा-ध्वज-दण्ड-रथ-घनपाठादि को बराबर कण्ठस्थ करके सदैव सुरक्षित रक्खा, और अब तक रख रहे हैं। उनके पाठ में किसी प्रकार का व्यतिक्रम दृष्टिगोचर नहीं हो सकता, न हो ही रहा है। यदि यह प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे सामने न होता, तो सम्भव था कि किसी को कहने का अवसर होता कि न जाने वेद में किस-किस काल में क्या क्या परिवर्तन, परिवर्द्धन होते रहे, इसको कोई क्या कह सकता है। पर ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण संसार भर में केवल भारतवर्ष में ही मिलेगा, जहाँ वेद के एक-एक अक्षर और मात्रा की रक्षा का ऐसा सुन्दर और सुनिश्चित प्रबन्ध सदा से निरन्तर चलता रहा हो। वेद की आनुपूर्वी को सुरक्षित रखने का यह ज्वलन्त उदाहरण हमारे सामने है। 

[अगला विषय – आर्षी-संहिता और दैवत-संहिता] 

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु 

[ 📖 साभार ग्रन्थ – जिज्ञासु रचना मञ्जरी ]

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

वेदभाष्य (वेदार्थ) की कसौटियां । ✍🏻 पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु

      यह पहिले बतलाया जा चुका है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान, अपौरुषेय, नित्य तथा सृष्टिनियमों के अनुकूल है। अतः उसका अर्थ करते समय भी उन्हीं कसौटियों को यथार्थ समझना अनिवार्य है, जो कि इन पूर्वोक्त बातों का विरोध न करती हों, अतः वेदार्थ की दृष्टि से संक्षेपतः उनका निरूपण करते हैं –

      ▪️(१) वेद में सार्वभौम नियमों का प्रतिपादन होना चाहिये, जो मानव समाज में परस्पर विरोध उत्पन्न करनेवाले न हों। 

      ▪️(२) किसी देश या जातिविशेष का सम्बन्ध उस में न होना चाहिये। 

      ▪️(३) ईश्वर के गुण, कर्म तथा सृष्टि नियमों के विरुद्ध न हो। 

      ▪️(४) ‘सर्वज्ञानमयो हि सः’ वेद सब सत्य विद्यानों का पुस्तक है, उस से यह अवश्य विदित हो। 

      ▪️(५) मानवजीवन के प्रत्येक अङ्ग पर प्रकाश डालता हो, अर्थात् मानव की ज्ञानसम्बन्धी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता हो। 

      ▪️(६) न्यायादि शास्त्रों के नियमों के विपरीत न हो, दूसरे शब्दों में तर्क की कसौटी पर ठीक उतरे, अर्थात् तर्कसम्मत हो। 

      ▪️(७) जिसमें किसी व्यक्तिविशेष का इतिहास न हो। 

      ▪️(८) त्रिविध अर्थों का ज्ञान कराता हो। 

      ▪️(९) आप्तसम्मत हो, ऋषि-मुनियों की धारणायें भी जिसके अनुरूप हों। 

      ▪️(१०) जिस की एक आज्ञा दूसरी आज्ञा को न काटती हो।

      अति संक्षेप से ये वेदार्थ की कसौटियाँ कही जा सकती हैं। इनके विषय में पूर्व(जिज्ञासु रचना मञ्जरी पृ॰ ३९-४०) संक्षेप से लिखा जा चुका है, यहाँ इस विषय में कुछ और प्रकाश डालना अनुपयुक्त न होगा –

      ◾️(१) सर्वतन्त्र-सिद्धान्त या सार्वभौम-नियम – 

      जो बातें सबके अनुकूल, सब में सत्य, जिनको सब सदा से मानते आये, मानते हैं और मानेंगे, जिनका कोई भी विरोधी न हो, जो प्राणिमात्र के कल्याणकारक हैं, ऐसे सर्वतन्त्र सर्वमान्य सिद्धान्त ही संसार में सुख और शान्ति के प्रतिपादक हो सकते हैं। वेद तो स्पष्ट ही कहता है –

      🔥…मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् ।       

      ……मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे॥ [यजु॰ ३६।१८] 

      प्राणिमात्र को मित्र की दृष्टि से देखो। 🔥“यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः” [यजु० ४०।७], 🔥”भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः” [केनोप॰ २।५], 🔥”स्वस्ति गोम्यो जगते पुरुषेभ्यः” [अथर्व॰ १।३१।४], वेद के इन मन्त्रों तथा उपनिषद् के वचनों में स्पष्ट इस उपर्युक्त बात का प्रतिपादन हमें मिलता है। ऐसी अवस्था में यदि कोई वेद का अर्थ इसके विरुद्ध करता है, तो कैसे माननीय हो सकता है ! ईश्वर का ज्ञान वेद, फिर भी जाति जाति में, और देश-देश में फूट डलवाने वाली बात कहे, यह कैसे हो सकता है। वह तो समता का प्रतिपादक है, न कि विषमता का। मानवहृदय की विषमता दूर करना ही तो उसका ध्येय है। वेद का प्रत्येक मन्त्र किसी न किसी रूप में सर्वतन्त्र सिद्धान्त का प्रतिपादक है, यह हमारा कहना है। इस कसौटी को लेकर प्रत्येक को वेद के अर्थ का परीक्षण करना चाहिये। 

      ◾️(२) किसी देश या जातिविशेष का सम्बन्ध उसमें न होना चाहिये – 

      ऐसा होने से ईश्वर में पक्षपात सिद्ध होगा। दूसरे-जिस जाति वा देश का वर्णन वेद में होगा, वेद की उत्पत्ति उसके पीछे ही माननी पड़ेगी, इस प्रकार उसकी नित्यता नहीं रह सकती। ऋ॰ १।३।११, १२ में –

      🔥”चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम्”। 

      🔥”धियो विश्वा वि रोजति”। 

      विश्व के लिये बुद्धियों वा ज्ञान के प्रकाश का उपदेश वेद करता है। योगदर्शन [२।३१] में भी 🔥’जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्’ ऐसा लिखा है। 

      इसके विरुद्ध जो शङ्का करते हैं, कि वेद में अमुक जाति वा अमुक व्यक्तियों का इतिहास है, इसके विषय में हम आगे लिखेंगे। 

      ◾️(३) ईश्वर के गुण, कर्म और सृष्टिनियमों के विरुद्ध न हो –

      ईश्वर सर्वज्ञ है, उत्पत्ति, स्थिति, संहार का कर्ता, सर्वनियन्ता, सर्वान्तर्यामी आदि गुणों से युक्त है। यदि वेद के मन्त्रों के अर्थ इन गुणों के विपरीत हों तो यही कहना होगा कि वह वेद का ठीक अर्थ नहीं है, अन्यथा वेद ईश्वर की कृति नहीं माना जा सकता। वेद कहता है –

      🔥विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखः॥ [ऋ॰ १०।८१।३] 

      🔥य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे॥ [अथर्व॰ ७।८७।१] 

      🔥प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्॥ [अथर्व॰ १०।७।८] 

      🔥यस्मिन भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्यस्मिन्नध्याहिंता। 

      यत्राग्निश्चन्द्रमाः सूर्यो वातस्तिष्ठन्त्यापिताः॥ [अथर्व॰ १०।१७।१२] 

      सब का स्रष्टा, धा, नियन्ता परमेश्वर है, इत्यादि मन्त्र उपयुक्त कसोटी के सर्वथा अनुरूप हैं। 

      ◾️(४) वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक हो – 

      जब वेद ईश्वरीय ज्ञान है, तो वह पूर्ण ज्ञान होना चाहिये, जो प्राणिमात्र को अपेक्षित है। अन्यथा उसकी अपूर्णता उसके वेदत्व का ही विघात करेगी। इसलिये ऋषि-मुनि ‘सर्वज्ञानमयो हि सः’ [मनु॰ २।७] वह समस्त विद्याओं का भण्डार है, ऐसा मानते हैं। यद्यपि यह बात अभी तक प्रायः साध्य कोटि में है, और तब तक रहेगी, जब तक सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञाता नहीं हो जाते। उससे पूर्व हमें इसका निर्बाध ज्ञान कैसे हो सकता है। पुनरपि हमें अंशतः इस का ज्ञान अवश्य हो रहा है। पर वेद में समस्त विद्यायें होनी चाहिये, इसका बाध तो कोई नहीं कर सकता। यह बात सर्वसम्मत है। स्वामी दयानन्दजी ने ही नहीं, स्वामी शङ्कराचार्य ने भी ऐसा ही माना है –

      🔥”महत ऋग्वेदादेः शास्त्रस्यानेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत् सर्वार्थावद्योतिनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म। नहीदृशस्य शास्त्रस्यर्ग्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञगुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः सम्भवोऽस्ति”। [वेदांत शाङ्करभाष्य १।१।३] 

      अर्थात्- अनेक विद्याओं के स्रोत ऋग्वेदादि का कर्ता विना सर्वज्ञ जगदीश्वर के कोई नहीं हो सकता।

      ◾️(५) मानव-जीवन के प्रत्येक प्रङ्ग पर प्रकाश डालता हो – 

      इस नियम से चारों वर्णों और चारों आश्रमों के सब धर्मों का मूलतः उपदेश वेद में होना अनिवार्य है। 🔥”ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्” [यजु॰ ३१।११] इत्यादि मन्त्र चारों वर्गों के कर्तव्यों का उपदेश करते हैं, इसी प्रकार चारों आश्रमों के कर्तव्यों का निरूपण करनेवाले ब्रह्मचर्यसूक्त [अथर्व॰ ११।५] तथा गृहस्थाश्रम (अथर्व॰ १४।२३] आदि के प्रकरण वेदों में अनेक स्थलों में हैं। 

     ◾️(६) तर्कसम्मत हो – 

     🔥”बुद्धि पूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे” (वैशे॰ ६।१।१) के अनुसार वेद में तर्क के विरुद्ध कुछ नहीं हो सकता। 🔥”तर्क एव ऋषिः” [निरु॰ १३।१२] ऋषियों के इन वचनों के आधार पर हमें मानना होगा कि वेद का कोई भी मन्त्र इसकी अवहेलना नहीं कर सकता। यह बात भी अभी वेद के मर्मज्ञ विद्वानों को छोड़कर अन्य साधारण जनता के लिये तो प्रायः साध्यकोटि में ही कही जा सकती है। 

     ◾️(७) व्यक्तिविशेषों का इतिहास न हो – 

      इन्द्र-कण्व-अङ्गिरः आदि शब्दों के आगे तरप-तमप (Comparative तथा Superlative degree) प्रत्यय हमें वेद में [ऋ॰ ७।७९।३ तथा ऋ॰ १।४८।४] स्पष्ट मिलते हैं। तरप्-तमप् प्रत्यय विशेषणवाची शब्दों के ही आगे प्रयुक्त होते हैं, न कि व्यक्तिविशेषों के नाम के आगे। इस से हम समझ सकते हैं कि ये विशेषणवाची शब्द हैं, न कि किन्हीं व्यक्तिविशेषों के नाम। स्थालीपुलाक-न्याय से यहाँ हम इतना ही लिखना पर्याप्त समझते हैं। शेष ऐतिहासिक स्थलों के विषय में आगे लिखा जायगा। 

      ◾️(८) त्रिविध अर्थों का ज्ञान करानेवाला हो –

      निरुक्तकार यास्क मुनि के मत में वेद के प्रत्येक मन्त्र का तीन प्रकार का अर्थ होना चाहिये, ऐसा ऋग्वेद के भाष्यकार स्कन्दस्वामी ने (निरुक्त का प्रमाण देकर) कहा है [देखो भाष्यविवरण पृ॰ २१, ३३]। ऐसी दशा में हमें किसी का भी किया अर्थ सामने आने पर देखना होगा कि वह तीनों अर्थों को कहता है, या तीनों में से किसी एक को, या तीनों से भिन्न ही कुछ बोल रहा है। इस कसोटी से हमें वेदार्थ करनेवाले व्यक्ति की योग्यता का भी पता तत्काल लग जायगा कि उसको वेदार्थ के विषय में कहाँ तक गहरा ज्ञान है। 

      ◾️(९) ऋषि-मुनियों की धारणा के अनुकूल हो –

      जैसा हमने ऊपर यास्क का मत दिखाया, इसी प्रकार यास्कमुनि की अन्य धारणाओं तथा अन्य ऋषियों की वेदार्थ विषय में जो धारणाएं हैं, उनको लेकर वेदार्थ की परीक्षा करनी होगी। जब यास्क प्रत्येक मन्त्र के तीन अर्थ मानता है, तो हमें बाधित होकर वैसा ही वेद का अर्थ ग्राह्य समझना होगा, दूसरा नहीं। 

      ◾️(१०) जिसकी एक आज्ञा दूसरी प्राज्ञा को न काटती हो –

      विप्रतिषिद्ध बात या तो पागल कहता है, या अज्ञानी। सो ईश्वर से बढ़ कर ज्ञानी और कौन हो सकता है ! अतः उसका ज्ञान भी परस्पर विरुद्ध कभी नहीं हो सकता। यह बात वेद में पूरी लाग होती है। अतः वेद के अर्थ में ऐसी किसी विप्रतिषिद्धता की सम्भावना नहीं हो सकती।

      ये सब कसौटियाँ हमने अति संक्षेप से निर्देश-मात्र वर्णन की हैं। इस विषय में और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है। पर यहाँ इतना ही पर्याप्त होगा। इन कसौटियों को लेकर ही हमें आगे वेदार्थविषय में विवेचना करनी होगी। 

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु 

[ 📖 साभार ग्रन्थ – जिज्ञासु रचना मञ्जरी ]

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

यास्क और मन्त्रों के कर्ता ऋषि । ✍🏻 पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु

इस विषय में यास्क की क्या सम्मति है सो भी सुनिये –

🤨पूर्वपक्षी – 

      ◾️(१) देखो निरुक्त ३।११ – 

      🔥ऋषिः कुत्सो भवति, कर्त्ता स्तोमानाम् इत्यौपमन्यवः॥

      अर्थात्- कुत्स ऋषि होता है, स्तोमों (मन्त्रों) का कर्ता, ऐसा औपमन्यवाचार्य का मत है। इसमें 🔥”कर्ता स्तोमानाम्” का अर्थ मन्त्रों का बनानेवाला – कितना विस्पष्ट है। क्या इससे प्रत्यक्ष सिद्ध नहीं कि यास्क ऋषियों को मन्त्रों का कर्ता (बनानेवाला) मानता है ? 

      ◾️(२) और देखिये- निरु० १०।४२ –

      🔥अम्यासे भूयांसमर्थ मन्यन्ते तत् परच्छेपस्य शीलम्। 

      यहाँ परुच्छेप ने मन्त्र बनाये, ऐसी झलक प्रतीत होती है। आगे का पाठ निम्न प्रकार है –

      🔥परुच्छेप ऋषिः पर्ववच्छेपः परुषि परुषि शेपोऽस्येति वा।

      यहाँ भी परुच्छेप को ‘ऋषि’ कहा गया है। क्या इन प्रमाणों से ऋषि मन्त्रों के कर्ता हैं, इसमें कुछ भी सन्देह रह जाता है ? 

🌺सिद्धान्ती –

      ◾️(१) सबसे प्रथम हम निरुक्त के 🔥“कर्ता स्तोमानाम्” का अर्थ स्वयं न करके आचार्य यास्क के अपने शब्दों में ही दर्शा देते हैं –

      देखिये निरुक्त ३।११ में 🔥”कर्ता स्तोमानामित्यौपमन्यवः” में जिस औपमन्यव आचार्य के मत से ‘कर्ता स्तोमानाम्’ ऐसा यास्क ने लिखा, उसी औपमन्यव आचार्य के मत से यास्क ने निरु० २।११ में ऋग्वेद दशम मण्डल के ९८ सूक्त के ५वे मन्त्र में आये हुये ऋषि शब्द का अर्थ दर्शाते हुए लिखा है –

      🔥ऋषिर्दर्शनात् स्तोमान् ददर्शेत्यौपमन्यवः॥

      अर्थात् ऋषि-द्रष्टा होने से – स्तोमों (मन्त्रों) को देखा (न कि बनाया), ऐसा औपमन्यव आचार्य का मत है। 

      कितना विस्पष्ट लेख है। जिस औपमन्यव आचार्य के मत से 🔥“कर्ता स्तोमानाम्” लिखा, उसी का मत दिखाते हुये यास्क ने 🔥”स्तोमान् ददर्श” ऐसा लिखा। यदि दूसरे के मत से लिखा होता तो पूर्वपक्षी को यह कहने का अवसर भी मिल सकता था कि एक आचार्य ऋषियों को मन्त्रों का कर्ता मानता है, दूसरे द्रष्टा। परन्तु यहाँ पर तो दोनों स्थलों में वही एक ही औपमन्यव आचार्य है। अतः इसमें शङ्का का यत्किञ्चित् भी स्थान नहीं रह जाता। 

      ◾️(२) 🔥”परुच्छेपस्य शीलम्”- यहाँ दुर्गाचार्य का मत निम्न प्रकार है –

      🔥”परुच्छेपस्य मन्त्रदृशः शीलम्” स हि नित्यमभ्यस्तैः शब्दः स्तौति। मन्त्रदृशोऽपि, स्वभाव उपेक्ष्य इत्युपप्रदर्शनायेदमुक्तम्। 

      कैसी हृदयग्राही सङ्गति लग रही है। इसमें भी कोई खींचातानी का व्यर्थालाप करे तो अन्धेर है। 

      इस विषय में एतद्देशीय तथा विदेशीय विद्वान् कुछ आशङ्कायें उठाते हैं कि –

      ▪️(क) 🔥”नम ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यः …..॥ [ते० आ० ४।१।१ तथा- शा० आरण्यक।] 

      🔥आङ्गिरसो मन्त्रकृतां मन्त्रकृदासीत्॥ [ताण्डयमहाब्राह्मण १३।३।२४॥ तथैव आपस्त० श्रौतसूत्रे॥] 

      ▪️(ख) 🔥यावन्तो वा मन्त्रकृतः॥ [कात्यायनश्रौतसू० ३।२।८।। तथा च–बौधायन श्रौ० सू०]

      ▪️(ग) गृह्यसूत्रों में – 🔥श्रद्धाया दुहिता-स्वसर्षीणां मन्त्रकृतां बभूव॥ [काठक गृह्यसूत्र ४१।११॥] 

      🔥ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यः॥ [सत्याषाढ श्री. सू० ३।१॥] 

      इत्यादि प्रमाणों को लेकर ऋषियों को मन्त्रों के बनानेवाले बताते हैं । (विशेष देखो ऋग्वेद पर व्याख्यान पृ० ३४ से ३५)। 

      इस पर अधिक न लिख कर हम कुछ ही स्थलों का भाष्यकारों का अर्थ दर्शाये देते हैं –

      ◾️(१) तै॰आ० के भाष्य में महाविद्वान् भट्टभास्कर का निम्न लेख है –

      🔥अथ नम ऋषिभ्यो द्रष्टुभ्यः, मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्राणां द्रष्टभ्यः, दर्शनमेव कर्त्तृत्वम्॥

      ◾️(२) सायणाचार्य ने भी तै॰आ० के इसी स्थल पर लिखा है –

      🔥ऋषिरतीन्द्रियार्थद्रष्टा मन्त्रकृत करोतिधातुस्तत्र दर्शनार्थः॥ 

      इन दोनों उद्धरणों से सर्व श्रौतगह्यादि में इस शब्द के अर्थ की अवस्था समझ में आ जाती है। इस प्रकार वेद तथा इन गृह्य श्रौत आदि मन में कर्तत्व से द्रष्टृत्व ही यास्क और औपमन्यव सदृश ऋषियों को अभिमत है। तब हमें ‘मन्त्रकृतां’ का ऐसा अर्थ मानने में क्या विप्रतपत्ति हो सकती है। 

      यहाँ यास्क का प्रमाण सब प्रमाणों में सर्वत: उपरि है। 

      (३) आप कहेंगे कि “डुकृञ्” तो ‘करणे’ अर्थ में धातुपाठ में पढ़ा है। सो भी अज्ञान की बात है। देखिये महामुनि भगवान् पतञ्जलि ‘करोति’ का अर्थ क्या मानते हैं –

      महाभाष्य 🔥”भूवादयो धातवः” के भाष्य में –

      🔥बह्वर्था अपि धातवो भवन्ति। तद्यथा वपिः प्रकिरणे दृष्टः, छेदने चापि वर्तते केशश्मश्रु वपतीति…..। करोतिरभूतप्रादुर्भावे दृष्टः, निर्मलीकरणे चापि वर्तते पृष्ठं कुरु, पादौ कुरु, उन्मृदानेति गम्यते। निक्षेपणे चापि वर्तते कटे कुरु, घटे कुरु, अश्मानमितः कुरु स्थापयेति गम्यते। [महाभाष्य अ० १।३।१]

      अर्थात्-धातु बहुत अर्थवाले भी होते हैं। जैसे वप् धातु बखेरने अर्थ में देखा जाता है। काटने के अर्थ में भी होता है। जैसे केशश्मश्रु को (वपति) काटता है, करोति अभूतप्रादुर्भाव (जो नहीं था और हो गया) अर्थ में देखा जाता है। निर्मलीकरण (धोने) अर्थ में भी होता है। जैसे पृष्ठं कुरु, पादौ कुरु का अर्थ पृष्ठ को धोओ पाँवों को धोवो, यह है। ‘इतः कुरु’ का अर्थ इधर कर दो, रख दो या हटा दो, यही प्रतीत होता है इत्यादि। अकस्मात् यहाँ करोति का ही अपना अभिमत अर्थ पतञ्जलि ने दे दिया है। अब भी इसे कोई कल्पनामात्र ही समझता रहे तो परमात्मा ही उसकी बुद्धि को सुमार्ग= सीधे सरल मार्ग पर लावे। इससे अधिक और क्या कह सकते हैं। 

     ◾️(४) वर्तमान उपलब्ध आधुनिक वेदभाष्यकारों में सर्वप्रथम आचार्य स्कन्द स्वामी (जिसके हम बहुत कृतज्ञ हैं) की सम्मति देते हैं- 

      निरुक्त भा० २ पृ० ५८३ – 

      🔥क्रियासामान्यवचनत्वात् करोतिरत्र रक्षणार्थ उत्तारणार्थो वा। 

      धात्वर्थ पर हम पुनः किसी समय अवसर मिलने पर विचार करेंगे, यहाँ पर इतना ही पर्याप्त है। 

      अन्त में निरुक्त का एक स्थल और उपस्थित करते हैं –

      ◾️(५) निरुक्त ७।३ –

      🔥एवमुच्चावचैरभिप्रायैऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ति। 

      ऋषियों को मन्त्रों का दर्शन होता है, न कि वह मन्त्रों के बनाने वाले होते हैं, यह इस लेख से विस्पष्ट है। 

      स्कन्दस्वामी (४।१९ पृ० २४६९) ऋषि का अर्थ स्तोता करते हैं। 

      🔥च्यवन इत्येतदनवगतम्। च्यावन इत्येव न्याय्यम्। ऋषिरभिधेयः, तदाह च्यावयिता स्तोमानाम्, देवानां प्रतिगमयिता स्तोतेत्यर्थः। 

      इसी प्रकार इस विषय में अन्य भी बहुत से प्रमाण हैं, परन्तु यहाँ पर इतने ही पर्याप्त हैं । अतः यास्क वेदों को अपौरुषेय मानते हैं, यह सर्वथा सिद्ध है। 

      ◼️यास्क और वेदों का नित्यत्व तथा प्रयोजनत्व – यह भी पूर्व निर्दिष्ट प्रमाण- 🔥”पुरुषविद्यानित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” में पुरुष की विद्या अनित्य होने से- तद्भिन्न नित्य विद्या वाले (प्रभु) की नित्य विद्या होने से नित्यत्व सिद्ध है।

      🔥“कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” इस वचन से वेद में सम्पूर्ण कर्त्तव्य कर्मों की सम्पत्ति (सम्पादन प्रकार) सम्पूर्णता प्रतिपादित है। इसी से वेद ज्ञान की प्रयोजनता प्रत्येक मनुष्य को स्वकल्याणार्थ अवश्य है, यह भी सुस्पष्ट है। 

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु 

[ 📖 साभार ग्रन्थ – जिज्ञासु रचना मञ्जरी ]

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

ऋषिभाष्य की अध्ययनविधि । ✍🏻 पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु

      अब हम यहाँ ऋषिभाष्य के अध्ययन विषयक कुछ विशेष निर्देश[१] कर देना भी आवश्यक समझते हैं, जिससे इस भाष्य का अध्ययन करनेवालों की बाधायें पर्याप्त दूर हो सकती हैं। 

[📎पाद टिप्पणी १. सामान्य निर्देश यह है कि श्री स्वामी जी महाराज अग्नि-वायु-इन्द्र आदि शब्दों से अभिधा (मुख्य) वृत्ति से ही परमेश्वर अर्थ लेते हैं, गौणीवृत्ति से नहीं। यह बात समझकर ही वेदभाष्य का अध्ययन करना चाहिये। जैसा कि हम पूर्व भी दर्शा चुके हैं।]

◼️(१) ऋषि दयानन्दकृत वेदभाष्य का अध्ययन करनेवाले अनेक सज्जनों की एक ही जैसी शङ्कायें हमारे सम्मुख समय-समय पर आती रही हैं –

      ◾️(क) बिना ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का सम्यक् अनुशीलन किये वेदभाष्य समझ में नहीं आ सकता। सर्वप्रथम इस पर अधिकार होना आवश्यक है। 

      ◾️(ख) संस्कृतपदार्थ देखने से मन्त्र का अभिप्राय कुछ भी समझ में नहीं आता। 

      ◾️(ग) संस्कृत और भाषा मेल नहीं खाती। 

      जिन महानुभावों को ऐसी शङ्का होती है, वह उनका भ्रममात्र है। मन्त्र का अभिप्राय अन्वय से ही ज्ञात हो सकता है। इसलिये मन्त्रोच्चारण के पश्चात् अर्थ समझने के लिए सब से प्रथम अन्वय को ही देखना चाहिए। तत्पश्चात् ही संस्कृतपदार्थ को देखने से ज्ञात होगा कि आचार्य ने उक्त अभिप्राय मन्त्र के किन-किन शब्दों से और कैसे-कैसे निकाला। इसका रहस्य आर्षशैली से संस्कृत पढ़े लिखे ही यथावत् रीति से अनुभव कर सकते हैं। 

      इस प्रक्रिया को न समझकर बहुत से संस्कृत पढ़े लिखे भी भूल करते देखे गये हैं। यह भी ज्ञात रहे कि भाषार्थ भाषा जाननेवालों की सुगमता को लक्ष्य में रखकर अन्वय के अनुसार ही किया गया है। “भ्रान्ति निवारण” पृ०६ में ऋषि का लेख निम्न प्रकार है –

      “भाषा में संस्कृत का अभिप्रायमात्र लिखा है। केवल शब्दार्थ ही नहीं, क्योंकि भाषा करने का तो यह तात्पर्य है कि जिन लोगों को संस्कृत का बोध नहीं, उनको बिना भाषार्थ के यथार्थ वेदज्ञान नहीं हो सकता”। 

      इस भाषार्थ को संस्कृत के पढ़े-लिखे अपनी संस्कृत के अभिमान में नही देखते, वास्तव में मन्त्र का अभिप्राय ‘अन्वय’ से याथातथ्य ज्ञात हो जाता है। भाषार्थ देखने से वह और भी स्पष्ट विदित हो जाता है, कुछ भी सन्देह नहीं रह जाता। श्री स्वामी जी महाराज के उक्त अर्थ में प्रमाण क्या हैं, तथा सब प्रक्रियाओं को लक्ष्य में रखते हुए तत्तद पद का अर्थ क्या होगा, बस इसके लिये संस्कृत पदार्थ है। ऋषिभाष्य में यह विशेष रहस्य की बात है, जिसको साधारण संस्कृत पढ़े-लिखे समझ नहीं सकते। वास्तव में संस्कृतपदार्थ ही ऋषि दयानन्द का मुख्य वेदार्थ है, अन्वय उसका एक अंश है, इसी में आचार्य की अपूर्व योग्यता और अगाध पाण्डित्य का परिचय मिलता है। 

      आशा है विज्ञ पाठक इतने से समझ लेंगे कि संस्कृतपदार्थ और भाषार्थ के मेल न मिलने की बात सर्वथा अज्ञतापूर्ण है, तथा संस्कृत में पदार्थ देखने का क्या प्रकार है, यह भी उनकी समझ में आ जायेगा। जिनको इस विषय में सन्देह हो, वे सज्जन मिलकर समझ सकते हैं। 

◼️(२) श्री स्वामीजी के संस्कृतपदार्थ में सब प्रक्रियाओं का अर्थ विद्यमान है, यह समझना चाहिये। जहाँ दो प्रकार का अन्वय है, वहाँ भी कहीं तो अन्वय सबका सब समान है, केवल अर्थभेद दिखा दिया है। जैसे यजु० १।८ पृ० ५७, ५८। कहीं-कहीं तीन प्रकार का अन्वय दिखाया है जेसे १।११ पृ० ६६, ६७। यहाँ तीनों अन्वय भिन्न हैं।

◼️(३) महर्षिकृतभाष्य में जड़पदार्थों के सम्बोधन में सर्वत्र व्यत्यय मानकर विकल्प में प्रथमान्त में अर्थ किया गया है, यह बात प्रत्येक पाठक को ध्यान में रखनी चाहिये। वर्तमान भ्रान्त संसार को जड़पदार्थों की पूजा वा उपासना से अभीष्ट कामनायों की प्राप्ति होती है, इस मिथ्याविचार को दूर करने की भावना से ऋषि दयानन्द ने जड़पदार्थों के सम्बोधन में उपर्युक्त प्रकार वर्ता है, जो वर्तमान अवस्था में तो सर्वोत्कृष्ट प्रकार ही कहा जायगा। हाँ, वेदार्थ का सच्चा ज्ञान होने पर सम्बोधन मान कर भी अर्थ किया जा सकता है। जब हम वेदमन्त्रों का मुख्य अर्थ आध्यात्मिक मानते हैं (जो वास्तव में मुख्य ही है), तो आधिभौतिक अर्थ में स्वभावतः सम्बोधन पदों को प्रथमा में ही समझने से हमें वेद में सब सत्यविद्याओं का ज्ञान उपलब्ध हो सकता है। नहीं तो जैसे विदेशी विद्वान् कहते हैं कि वेद जङ्गलियों की भौतिकपदार्थ सम्बन्धी प्रार्थना मात्र है, यही मानना पड़ेगा, चाहे इसके लिये उन्हें विग्रहवती (शरीरधारी) देवताओं की कल्पना ही करनी पड़ी, जैसा कि पिछले लगभग दो तीन सहस्र वर्ष से की जा रही है, जिन विग्रहवती देवताओं का मीमांसाशास्त्र के आचार्य कुमारिल भट्टादि ने भी स्पष्ट खण्डन किया है (देखो मीमांसा ९।१।५)। 

◼️(४) यजु० १।२ पृ० ३६ आदि में जहाँ-जहाँ “यज्ञो वै वसु” इत्यादि शतपथ तथा अन्य ब्राह्मणों के प्रमाणों में ‘व’ शब्द का प्रयोग है, वहां कोई कोई सज्जन शङ्का उठाया करते हैं कि यह ‘वै’ शब्द अर्थबोधक नहीं है। उनकी जानकारी के लिए हम यहाँ केवल एक ही स्थल उपस्थित करते हैं। लोगाक्षिगृह्यसूत्र का भाषयकार देवपाल पृ० -३२ में लिखता है ‘वैशब्दोऽवधारणार्थः’। 

◼️(५) ◾️(क) पाठकों को विदित होगा कि हमने भाषापदार्थ की सङ्गति, जो पूर्व संस्कृतसङ्गति के साथ ही थी, पाठकों की सुगमता के लिए भाषा पदार्थ से पहिले रखी है। इस विषय में यह विदित रहे कि तीन अध्याय तक की ‘क’ हस्तलेख कापी में भी भाषासङ्गति भाषा पदार्थ से पूर्व में ही है।

      ◾️(ख) भाषार्थ (पदार्थ) के स्थान में ‘पदार्थान्वय भाषा’ ऐसे बहुत से मन्त्रों में उपलब्ध होता है। अर्थात् भाषा ‘पदार्थ’ अन्वय के आधार पर है।

      ◾️(ग) संस्कृतपदार्थ में प्रत्येक व्याख्येय पद के अन्त में [।] इस प्रकार के विराम हैं। सो वे यजु० ५।३४ तक तो हैं, आगे ४०वें अध्याय के अन्त तक नहीं। हाँ, जहाँ प्रमाण पा जाता है, वहाँ तो प्रमाण के अन्त में विराम है। ऋग्वेदभाष्य के आरम्भ-आरम्भ में विराम हैं, आगे अन्त तक प्रमाणमात्र में हैं। भाषापदार्थ में भी यजु० ५।३५ से आगे विराम नहीं हैं। पाठकों को इसका ध्यान रहे। 

     ◾️(घ) द्वितीय अध्याय ६वें मन्त्र से लेकर २०वें मन्त्र तक आचार्य प्रदर्शित मन्त्र की सङ्गति विशेष देखने योग्य है।

◼️(६) वेदमन्त्रों में एक ही मन्त्र के अनेक अर्थ होने में यह हेतु है कि यह सृष्टि जीव के ज्ञान की अपेक्षा अनन्त है। कोई भी एक जीव इसका पारावार नहीं पा सकता, क्योंकि यह उसकी शक्ति से बाहिर है। इस अनन्त सृष्टि में अनन्त पदार्थ हैं, उनमें से यदि एक-एक का वर्णन होने लगे तो एक-एक ग्रन्थ बन जावे। केवल अग्नि, वायु, जल, मिट्टी, तुलसी की पत्ती वा आक (मदार) का ही वर्णन करने लगें तो एक-एक पृथक ग्रन्थ की रचना करनी पड़े। परमात्मा ने जीवों को ऐसा ज्ञान दिया कि एक ही मन्त्र में जिस ऋषि को जिस विषय की प्रौढ़ता प्राप्त थी, उस उस ने उस-उस विषय का ज्ञान उस-उस मन्त्र से उपलब्ध किया। इन्हीं से वेदाङ्ग तथा उपाङ्गों की रचना पृथक्-पृथक् हुई। 

      इस प्रकार ही ज्ञान देने से विश्वभूमण्डल का ज्ञान जीवों को दिया जा सकता था। यह बात तभी हो सकती है, जब एक-एक शब्द के अनेक अर्थ हों। अन्यथा “सर्वज्ञानमयो हि सः” मनु के इस वचनानुसार सम्पूर्ण विद्यानों का समावेश वेद में हो ही कैसे सकता है। सब व्यवहार तथा सर्वविध ज्ञान का भण्डार तो वेद ही है। वेद का स्वाध्याय करने वालों को यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए। 

◼️(७) वेद के प्रत्येक मन्त्र का अर्थ आध्यात्मिक, आधिदैविक और अधियज्ञपरक होता है, यह हम पृ० ४८-५० तथा ६७, ६८ पर सविस्तर निरूपण कर चुके हैं। याज्ञिक अर्थ मुख्य अर्थ नहीं, यह भी कह चुके हैं। यहाँ इतनी बात ध्यान में रखने योग्य है कि महर्षि दयानन्द ने “यज्ञ” शब्द से देवपूजा, संगतिकरण और दान इन तीनों अर्थों के आधार पर अति विस्तृत अर्थ लिये हैं। संसार के समस्त शुभकार्य “यज्ञ” शब्द के अन्तर्गत आ जाते हैं। इस भाष्य का स्वाध्याय करते हुये यह बात ध्यान में रखनी अनिवार्य है, तभी इस भाष्य का स्वरूप समझ में आ सकता 

◼️(८) भविष्य में वेदार्थगवेषण का कार्य बहुत ही योग्यता और गम्भीरता से होने की आवश्यकता है। इसके लिए विपुल सामग्री और प्रौढ़ पाण्डित्य चाहिये, तथा अनेक श्रद्धापूर्ण विद्वानों द्वारा निरन्तर परिश्रम से ही यह कार्य हो सकता है। भावी वेदार्थ की खोज में ऋषि का भाष्य प्रकाश का काम देगा, यह हमें पूर्ण विश्वास है। हमारा यह विवरण[२] इस ओर एक छोटा सा यत्न है। विज्ञ पाठक महानुभाव हमारे इस विवरण[२] को इसी दृष्टि से देखने का कष्ट करें, तभी इसकी उपयोगिता का ज्ञान हो सकता है। 

[📎पाद टिप्पणी २. यजुर्वेदभाष्य-विवरण की भूमिका]

      आशा है पाठक ऋषि भाष्य का अध्ययन करते समय हमारे इन निर्देशों पर अवश्य ध्यान देंगे और उनसे अवश्य लाभ उठावेंगे। 

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु 

[ 📖 साभार ग्रन्थ – जिज्ञासु रचना मञ्जरी ]

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

सर्गारम्भ में वेद का अर्थ । ✍🏻 पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु

      यह पूर्व कहा जा चुका है कि शब्द बिना अर्थ के नहीं रह सकता, और भाषा बिना ज्ञान के, ऐसी दशा में आदिज्ञान के साथ ही अर्थ[१] का प्रकाश भी उन आदि ऋषियों के हृदयों में हुआ। उनसे ही आगे भाषा का व्यवहार चला, और उन्हीं से अर्थ का ज्ञान आगे सबको हुआ। व्यवहार की भाषा वेद से ही चली, अर्थात् लौकिक भाषा का निर्माण वेद में वर्णित नियमों के आधार पर ही हुआ और वह वेद की भाषा से भिन्न थी। इतना तो ठीक है कि वेद से निकली होने के कारण देववाणी (संस्कृत) में वेद से लिये शब्दों का बाहुल्य रहा। यह भी कहा जा सकता है कि वेद के कुछ शब्दों को छोड़ कर लोक में उन्हीं शब्दों का व्यवहार हुआ, जो वेद में थे, अतः वेद के आधार पर निर्मित भाषा में जो शब्द मनुष्यों द्वारा बोले गये, वे लौकिक हैं और वेद में प्रयुक्त आनुपूर्वी से युक्त शब्द जो कभी किसी जाति विशेष के मनुष्यों द्वारा बोले नहीं गये, वे वैदिक हैं। इन लौकिक-वैदिक शब्दों का वर्णन महामुनि पतञ्जलि निम्न प्रकार करते हैं –

      🔥”केषां शब्दानां ? लौकिकानां वैदिकानां च। तत्र लौकिकास्तावद्गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इति। वैदिकाः खल्वपि-शं नो देवीरभिष्टये। इषे त्वोर्जे त्वा। अग्निमीळे पुरोहितम्। अग्न आयाहि वीतये॥” (महाभाष्यारम्भे)। 

      यहाँ वैदिक शब्दों में एक भी शब्द ऐसा नहीं, जो लोक में न बोला जाता हो। उधर ‘अश्वो ब्राह्मणः’ आदि सभी शब्द वेद में आते हैं। तब स्वभावतः प्रश्न उठता है कि फिर लौकिक और वैदिक शब्दों में भेद क्या हुआ? इसका उत्तर यह है कि वेद की आनुपूर्वी (क्रम) नित्य होती है। 🔥”अग्निमीळे पुरोहितम्” ऐसा ही पाठ रहेगा, 🔥”पुरोहितमग्निमीळे” इत्यादि नहीं हो सकता, अर्थात् वेद में ये शब्द आगे-पीछे कभी नहीं हो सकते। लौकिक शब्दों में यह बात नहीं। मीमांसकों ने 🔥“य एव लौकिकास्त एव वैदिकाः” ऐसा सिद्धान्त निश्चय किया है, उसका अभिप्राय यही है कि सामान्यतया जो शब्द वेद में आये हैं, वही लोक में आते हैं। दूसरे शब्दों में वेदवाणी की पुत्री देववाणी का व्यवहार वेद के शब्दों को लेकर हुआ। यह बात ध्यान में रखने की है कि वेद में कुछ विशेष शब्द आते हैं, जो लोक में नहीं आते। यह ज्ञान सृष्टि के आदि में ही सब ऋषि-मुनियों को था, उन्हीं के द्वारा आगे भी सबको हुआ। 

[📎पाद टिप्पणी १. (ऋ॰ १०।७१।१) में “नामधेय दधानाः” से यह बात अवभासित होती है। ‘अन्वविन्दन् ऋषिषु प्रविष्टाम्’ से यह अवभासित होता है कि वाणी (वैदिक वा लौकिक) ऋषियों द्वारा सबको बताई गई, पढ़ाई गई वा निर्धारित हुई।]

      लौकिक-वैदिक शब्दों के विषय में अर्थ के सामान्य, विशेष नियमों का ज्ञान आरम्भ में ही हुआ होगा। आगे अध्ययन-अध्यापन का व्यवहार कैसे चला होगा, इसमें सामान्य व्यवस्था तो वही हो सकती है, जो अब है अर्थात् बिना सिखाये कोई सीख नहीं सकता, किसी न किसी के द्वारा वेदार्थ का ज्ञान और आगे लौकिक शब्दों के अर्थ-सम्बन्ध का ज्ञान भी होना ही चाहिये। अध्यापन की प्रक्रिया में उस समय कोई भेद रहा हो, ऐसा तो समझ में नहीं पाता। इतना भेद अवश्य रहा होगा कि अतः उस समय भाषा देववाणी थी, अतः उन्हें वेद का अर्थ समझने में अतीव सुगमता थी। आरम्भ में वेदार्थ ज्ञान की क्या शैली थी, इस विषय में निरुक्तकार केवल इतना सङ्कत करते हैं – 

      🔥”साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवः। तेऽवरेभ्योऽसाक्षावकृतधर्मभ्य उपदेशेन मन्त्रान् सम्प्रादुः”॥ [निरु॰१।२०] 

      अर्थात्- साक्षात्कृतधर्मा ऋषियों ने, जिनको ज्ञान नहीं था, उनको उपदेश के द्वारा वेदार्थ का ज्ञान कराया। 

      🔥’अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥ [ऋ॰ १।१।१] 

      🔥’विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव। यद् भद्रं तन्न आ सुव’॥ [यजु॰ ३०।३] 

      इनमें तथा इसी प्रकार वेद के अन्य मन्त्रों में अर्थ का ज्ञान तत्काल ही हो जाता रहा होगा। इस समय भी इनके अर्थ समझने में कोई विशेष कठिनाई नहीं, न ही लौकिक शब्दों से कोई विशेष भेद है, सिवाय इसके कि ‘अग्नि’ आदि शब्दों का अर्थ वेद में केवल इतना ही नहीं होता, जितना कि लोक में। मन्त्र उच्चारण करने के साथ ही उसका अर्थ हृदयङ्गम हो जाता होगा, जैसा कि इस समय भी हो रहा है। भेद केवल इतना ही कहा जा सकता है कि उस समय वैदिक शब्दों के व्यापक अर्थों का ज्ञान प्रायः करके सबको था, क्योंकि आरम्भ में वह ऋषियों के द्वारा सबको मिला था। 

✍🏻 लेखक – पदवाक्यप्रमाणज्ञ पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु 

[ 📖 साभार ग्रन्थ – जिज्ञासु रचना मञ्जरी ]

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥

अमृतसर में पौराणिक विद्वानों तथा श्रीशंकराचार्य के साथ नौ घण्टे तक महान् शास्त्रार्थ ✍🏻 पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक

[पौराणिक विद्वानों तथा श्री गोवर्धनपीठाधीश शंकराचार्य वा श्री स्वामी करपात्रीजी के साथ अमृतसर में मेरा १६, १७ नवम्बर को ६.५ घण्टे संस्कृत में और २.५ घण्टे हिन्दी में शास्त्रार्थ हुआ। यद्यपि यह शास्त्रार्थ मेरा व्यक्तिगत था, पुनरपि यतः मैं ऋषि दयानन्द प्रदर्शित वैदिक सिद्धान्तों में पूर्ण आस्था रखता हूँ अतः यह शास्त्रार्थ आर्यसमाज के साथ हुआ, ऐसा ही माना गया। इस शास्त्रार्थ का उल्लेख भी मुझे ही करना पड़ रहा है और यह मेरे स्वभाव के विपरीत है। पुनरपि इस शास्त्रार्थ में ऐसे कई आज तक अछूते प्रमाण, उनके गम्भीर अर्थ तथा युक्तियाँ दी गई जो आर्य जनता तथा आर्य विद्वानों के लिए भविष्य में कभी लाभप्रद हो सकते हैं। (विशेषकर १७ ता० के मध्याह्नोत्तर के शास्त्रार्थ के समय की)। अतः न चाहते हुए भी मैं इस शास्त्रार्थ की संक्षिप्त रूप रेखा उपस्थित कर रहा हूँ। इसमें एक शब्द भी ऐसा नहीं है, जो उस काल के वर्णन से बाहर का हो। हाँ, भाषान्तर अवश्य है। इसे वेदवाणी में शीघ्र ही प्रकाशित करना था, परन्तु श्री पूज्य गुरुवर के स्वर्गमन के कारण समय पर प्रकाशित नहीं कर सके। – युधिष्ठिर मीमांसक] 

      अमृतसर में ११ नवम्बर से १९ नवम्बर ६४ तक अखिल भारतवर्षीय सर्व वेदशाखा सम्मेलन का सप्तम अधिवेशन हुआ था। इसके अध्यक्ष गोवर्धन पीठाधीश (पुरी के शंकराचार्य) थे और श्री करपात्रीजी की अध्यक्षता में हुआ था। लगभग ५० वैदिक तथा अन्य विषयों के विद्वान् सम्मिलित हुए थे। सम्मेलन की ओर से प्रायः सदा ही कातपय आर्य विद्वानों को भी निमन्त्रण भेजा जाता है, मार्गव्यय आदि देने की व्यवस्था भी सम्मेलन की ओर से की जाती है।

      मुझे भी प्रायः सदा ही निमन्त्रण प्राप्त होता है। चार वर्ष पूर्व देहली के अधिवेशन में मैं सम्मिलित हुआ था और इस बार पुनः सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ। 

      देहली के अधिवेशन में अन्तिम दिन अध्यक्ष श्री करपात्रीजी के मध्याह्न में उठ जाने पर किसी पौराणिक वक्ता ने आर्य समाज और ऋषि दयानन्द के प्रति पर्याप्त अनुचित बातें कहीं। मध्याह्नोत्तर सभा आरम्भ होने पर मैंने श्री करपात्रीजी से उनकी अनुपस्थिति में हुई अनुचित कार्यवाही के विषय में ध्यान आकृष्ट करके श्री स्वामी मेधानन्दनी सरस्वती के द्वारा पौराणिक वक्ता के द्वारा कही गई अनुचित-बातों का उत्तर दिलवा दिया। तत्पश्चात् मैंने ऋषि दयानन्द – के वेदभाष्य के वैशिष्टय के सम्बन्ध में विशिष्ट व्याख्यान दिया। उक्त आकस्मिक घटना के अतिरिक्त देहली अधिवेशन की कार्यवाही प्राय: संयत रूप से हुई। विद्वानों के विचार विमर्श चलते रहे। 

      इस बार श्री शंकराचार्यजी की ओर से निमन्त्रण प्राप्त होने पर मैंने उन्हें एक पत्र लिखा, जिसमें देहली में हुई अनुचित घटना का संकेत किया और लिखा कि जब आप लोग अपने से भिन्न विचार वाले विद्वानों को भी सम्मेलन में निमन्त्रित करते हैं, तब उनकी मान्यताओं का भी ध्यान रखना आप का कर्तव्य है। यदि हमें बुला कर हमारे सन्मुख ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के विषय में निरर्गल प्रलाप किया जाए तो उसका एकमात्र यही अभिप्राय होगा कि हमें बुलाकर अपमानित करने की आप की योजना है। यदि ऐसा है तो हमारा आना व्यर्थ है। मैं तो केवल शास्त्रीय चर्चा में ही भाग लेना चाहता हूँ। इत्यादि। 

      इस पत्र का जो उत्तर आया उसका पूर्वाध प्रायः प्रतिक्रियात्मक बातों से भरा था, परन्तु अन्त में लिखा था कि आप विश्वास रखें ऐसी कोई अनुचित कार्यवाही न होगी। आप आना चाहें तो आ सकते हैं। 

      यतः मुझे अमृतसर में कुछ अन्य भी कार्य था, अतः मैंने उत्तर दिया कि मैं १५ नवम्बर को मध्याह्नोत्तर पहुँचूंगा। तदनुसार सम्मेलन में १५ नवम्बर को सायं ५ बजे उपस्थित हुआ। 

      ◼️आर्यसमाज की उदासीनता – इस बार न मालूम मेरे पत्र के कारण अथवा उससे पूर्व आर्यसमाज अमृतसर के उत्सव में आर्यसमाज की ओर से हुए व्याख्यानों से कष्ट से होने के कारण आर्यसमान को नीचा दिखाने की सम्भवतः पूर्व से ही योजना बना रखी थी। मुझे इसका कुछ भी ज्ञान न था।

      अमृतसर नगर में आर्यसमाज का अच्छा जोर है। उन के सामने ही इस महान् आयोजन की तैयारी बहुत दिनों से चल रही थी। स्वयं शंकराचार्य महोदय तीन मास से डेरा लगाए बैठे थे, फिर भी अमृतसर आर्यसमाज के नेताओं ने इस सम्भावित आक्रमण के प्रतिरोध के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया। ११ या १२ तारीख को सार्वदेशिक सभा को शास्त्रार्थ के लिए विद्वानों को भेजने के लिए तार देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गई।

      देहली के अधिवेशन में भी यही स्थिति थी। सार्वदेशिक सभा और स्थानीय लगभग ११० समाजों के होते हुए भी किसी ने भी आवश्यकता के समय उचित उत्तर देने के लिए दो चार विद्वानों को बुला कर तैयार नहीं रखा था। उसमें श्री पं० बुद्धदेवजी और श्री स्वामी रामेश्वरानन्दजी कुछ समय के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे। वस्तुतः आर्यसमाज की यह उदासीनता उसके लिए बहुत हानिकारक हो रही है, विपक्षियों के हौसले बहुत बढ़ गए हैं। 

      ◼️शास्त्रार्थ का आरम्भ – १६ नवम्बर को प्रातः मैं १० बजे अधिवेशन में उपस्थित हुआ। मुझे देखकर एक पौराणिक विद्वान् ने (पूर्व योजनानुसार) उठ कर कहा [१] –

      “वेद में विज्ञान है या नहीं” इस पर अब शास्त्रार्थ होगा। हमारा पक्ष है कि वेद में विज्ञान नहीं है, वेद केवल यज्ञ कर्म के लिए हैं। इसलिए याज्ञिक अर्थ ही प्रामाणिक है। स्वामी दयानन्द ने आधुनिक विज्ञान को देखकर तदनुसार वेद से विज्ञान निकालने की चेष्टा की है। उदाहरणार्थ- 🔥‘आयं गौः पृश्निरक्रमीत्’ मन्त्र से पृथिवी का सूर्य के चारों ओर घूमना सिद्ध किया है, जबकि वेद का सिद्धान्त है कि सूर्य घूमता है। जो कोई वेद में विज्ञान – मानता है वह स्वामी दयानन्द के अर्थ की प्रामाणिकता सिद्ध करे।[२]

[💡पाद टिप्पणी १. यह ध्यान में रहे कि सम्मेलन की सारी कार्यवाही प्रायः संस्कृत में ही हुई। अतः शास्त्रार्थ भी संस्कृत में ही हुआ।]

[💡पाद टिप्पणी २. यह ध्यान रहे कि पूर्वपक्षी ने मुख्य विषय का प्रतिपादन न करके ऋषि दयानन्द के मन्त्रार्थ पर ही सीधी आक्षेप मुझे शास्त्रार्थ में घसीटने के लिए ही किया था।]

      यद्यपि यह मुझे ही लक्षित करके कहा गया था, पुनरपि इस आशा से कि सम्भव है स्थानीय आर्यसामाजिक व्यक्तियों ने किन्हीं अन्य विद्वानों का प्रबन्ध किया हुआ होगा। वे आए होगे, ऐसा सोच कर मैं मौन रहा। एक मिनट पश्चात् पुनः घोषणा की गई कि जो कोई स्वामी दयानन्द के उपस्थापित मन्त्रार्थ की प्रामाणिकता सिद्ध करना चाहे करे अन्यथा यह समझा जाएगा कि स्वामी दयानन्द का उक्त मन्त्रार्थ अशुद्ध है। 

      इस द्वितीय घोषणा पर मैं उठा। उठ कर कहा कि वेद में विज्ञान है इतना ही नहीं, विज्ञान ही वेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय है। भारतीय विज्ञान और यूरोपीय विज्ञान में भूतलोकाश का अन्तर है और यूरोपीय विज्ञान प्राय: परिवर्तित होता रहता है। अतः जो व्यक्ति आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान के अनुसार वेद से विज्ञान निकालने की चेष्टा करता है तो वह वस्तुत: निन्ध है, परन्तु स्वामी दयानन्द ने वेदार्थ में जिस पृथिवी भ्रमण विज्ञान का प्रतिपादन किया है वह भारतीय विज्ञान है। आर्यभट्ट ने अपने सिद्धान्त शिरोमणि ग्रन्थ में पृथिवी भ्रमण का विस्तार से प्रतिपादन किया है। ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मण में सूर्य के उदय और अन्त होने का निषेध किया है। इससे स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय ऋषि मुनि और आचार्य पृथिवी का भ्रमण तात्विक रूप से मानते थे।[३] जहाँ-जहाँ सूर्य भ्रमण का प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख है यह स्थूल दृष्टि से किया गया है। इतना ही नहीं, सम्पूर्ण श्रौत यज्ञ विज्ञान मूलक है वे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय काल में होने वाले आधिदैविक यज्ञ के रूपक है (इस प्रकरण में कर्म काण्ड गत अग्न्याधान का पार्थिव अग्नि के आधान का रूपकत्व प्राचीन संहिता और ब्राह्मण ग्रन्थों से विस्तार से बताया)। इस कारण जब कर्म काण्ड गत यज्ञ मूलतः आधिदैविक विज्ञान मूलक है अतः वेद के याज्ञिक अर्थ की भी परिसमाप्ति आधिदैविक विज्ञान में होती है। इसलिए वेद का मुख्य प्रतिपाद्य विषय विज्ञान ही है। साथ ही यह भी ध्यान रहे कि भारतीय परम्परा में यह बात सर्व सम्मत रूप से स्वीकृत है कि वेद के प्रत्येक मन्त्र का अर्थ तीन प्रकार का होता है। याज्ञिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक (इसमें स्कन्द स्वामी आदि के अनेक प्रमाण दिए) आधिदैविक अर्थ सारा विज्ञान मूलक ही है। अत: वेद का वैज्ञानिक अर्थ करना वस्तुतः ठीक है। 

[💡पाद टिप्पणी ३. इस विषय में जो महानुभाव विस्तार से जानना चाहे वे ऋषि दयानन्द कृत यजुर्वेद भाष्य के अस्मद् आचार्य श्री पं० ब्रह्मदत्तजी जिज्ञासु कृत भाष्य विवरण अ॰ ३ मं॰ ६ पृष्ठ २४९-२५६ तक देखें।] 

      मेरी इस स्थापना के पश्चात् पूर्वपक्षी पण्डित ने मुख्य विषय छोड़ कर मन्त्रार्थ तीन प्रकार का होता है या नहीं इस पर ही बल दिया और पूर्वाह्न का सारा समय इसी विषय में व्यतीत हुआ। अन्त में शंकराचार्य महोदय ने मुझे कहा कि आप तीन प्रकार का अर्थ होता है बार बार कहते हैं किसी एक मन्त्र का ही तीन प्रकार का अर्थ करके बतावे ‘अग्निमीळे’ का ही करें। यतः यह प्रश्न लगभग एक बजे किया गया था, सभा समाप्त होने को थी; अत: मैंने कहा कि कल प्रातः मैं उक्त मन्त्र के तीनों प्रकार के अर्थ बताऊँगा।[४] तत्पश्चात् सभा विसर्जित हुई। 

[💡पाद टिप्पणी ४. कार्यवश मुझे मध्याह्नोत्तर उपस्थित नहीं होना था।]

      १७ ता० को प्रातः ठीक १० बजे मैं सम्मेलन में उपस्थित हुआ और खड़े होकर पूर्व प्रतिज्ञानुसार ‘अग्निमीळे’ मन्त्र का तीन प्रकार का व्याख्यान आरम्भ किया। कुछ समय पश्चात् जनता की ओर से हिन्दी में बोलने के लिए आवाजें आनी शुरू हुई। अध्यक्ष श्री शंकराचार्यजी ने मुझे कहा कि आप के पक्ष के लोग कोलाहल मचा रहे हैं इन्हें शान्त करें। इसके उत्तर में मैंने कहा कि मेरे पक्ष का यहाँ कोई नहीं है, कारण मुझे यहाँ के किसी व्यक्ति ने नहीं बुलाया है। आप के निमन्त्रण पर आया हूँ। अतः जो कोई भी कोलाहल कर रहे हैं सब आप के ही पक्ष के हैं।

      इस प्रकार अन्त में कार्यवाही हिन्दी में आरम्भ हुई। मैंने यज्ञीय मन्त्रार्थ जो कि उभय पक्ष सम्मत था करके उसी – के आधार पर आधिदैविक व्याख्या की। आध्यात्मिक व्याख्या अभी पूरी तरह उपस्थित ही नहीं की थी कि अधिक काल हो जाने के बहाने अध्यक्ष महोदय के आदेश से मुझे बैठना पड़ा। इसके पश्चात् पूर्वपक्षी विद्वान् ने पुनः अपना पैतरा बदला। ब्राह्मण ग्रन्थ वेद है या नहीं इस पर प्रश्न किया। पूर्वाह्न में सारा वादविवाद इसी विषय में होता रहा।

      मैंने इस प्रकरण में कहा कि जिस 🔥मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् वचन के अनुसार ब्राह्मण की वेद संज्ञा मानी जाती है वह वचन केवल कृष्ण यजुर्वेद के श्रौत सूत्रों में ही मिलता है। ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद और सामवेद के श्रौत सूत्रों में नहीं है। इसका कारण यह है कि ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद और सामवेद की मन्त्र संहिताएँ स्वतन्त्र हैं और इनके ब्राह्मण स्वतन्त्र पृथक है, परन्तु कृष्ण यजुर्वेद की संहिताओं – (शाखाओं) में मन्त्र और ब्राह्मण दोनों का सम्मिश्रण है, अतः प्राचीन परम्परा के अनुसार उनके एक देश मन्त्र की ही वेद संज्ञा प्राप्त थी ब्राह्मण भाग[५] की नहीं। इस प्रकार सम्पूर्ण संहिता का वेदत्व सिद्ध करने के लिए कृष्ण यजुर्वेद के श्रौतसूत्रकारों को ही ऐसा वचन बनाना पड़ा। इसीलिए इस सूत्र की व्याख्या में हरदत्त और धूर्त स्वामी ने स्पष्ट लिखा है 🔥कैश्चिन्मन्त्राणामेव वेदत्वमाश्रितम् अर्थात् किन्हीं व्यक्तियों ने मन्त्रों का ही वेदत्व माना है। इससे भी स्पष्ट है कि प्राचीन अनेक आचार्य मन्त्र को ही वेद मानते थे ब्राह्मण को नहीं। इतना ही नहीं, यदि इस वचन को प्रमाण भी मान लें तब भी आप स्तम्बादि श्रौत सूत्रों के परिभाषा प्रकरण में पठित होने के कारण यह पारिभाषिक संज्ञा है ऐसा मानना पड़ेगा। पारिभाषिक संज्ञा उसी शास्त्र में स्वीकार की जाती है जिसमें वह बताई गई है। यथा पाणिनि की अ ए ओ वर्णों की गुण संज्ञा पाणिनीय शास्त्र में ही स्वीकार की जाएगी। लोक वा न्याय आदि शास्त्रों में गुण शब्द से अ ए ओ का ग्रहण नहीं होगा। अतः 🔥’मन्त्रबाह्मणयोर्वेदनामधेयम्’ सूत्र से ब्राह्मण ग्रन्थों की सामान्य रूप से वेद संज्ञा नहीं हो सकती। मैंने इस सूत्र पर पूरा विस्तृत विचार १२ वर्ष पूर्व ‘मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् इत्यत्र कश्चिदभिनवो विचार:’ पुस्तिका में उपस्थित किया है। श्री करपात्रीजी (वहीं उपस्थित थे) ने उसका उत्तर देने का प्रयत्न तो किया, परन्तु इस बात का उत्तर नहीं दिया कि कृष्ण यजुर्वेदियों को ही ऐसा सूत्र बनाने की क्या आवश्यकता पड़ी, ऋग्वेदादि के श्रौत सूत्रकारों ने क्यों नहीं सूत्र बनाया। कारण स्पष्ट है ऋग्वेदादि में मन्त्र ब्राह्मण का पूर्णतया पार्थक्य है संमिश्रण नहीं, अतः उन्हें ऐसा वचन बनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, इसका कोई उत्तर नहीं दिया। इतना ही नहीं मेरी घोषणा है कि कोई भी पौराणिक विद्वान् इस विवेचना का सही उत्तर आकल्पान्त नहीं दे सकता। इसके साथ ही ब्राह्मण ग्रन्थ के अनेक प्रमाण उद्धृत किये जिनसे स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण वेद से पृथक हैं। इस प्रकार १ बजे यह प्रकरण समाप्त हुआ। 

[💡पाद टिप्पणी ५. यहाँ ब्राह्मण भाग में ‘भाग’ शब्द का प्रयोग कृष्ण यजुर्वेद की संहिता की दृष्टि से किया है। आर्यसमाज के अनेक विद्वान् प्रायः मन्त्र भाग और ब्राह्मण भाग शब्दों का प्रयोग करते हैं, वह अशुद्ध है क्योंकि यदि मन्त्र भाग भी वेद है ऐसा कहा जाएगा तो उसका दूसरा भाग भी वेद माना जाएगा। जो वृक्षत्व वृक्ष की कुछ शाखाओं में है वह उसकी दूसरी शाखाओं तथा मूल वा तने में भी है। अत: मन्त्र भाग वेद है ऐसा स्वीकार करने पर ब्राह्मण भाग को भी न्याय की दृष्टि से भी आपाततः वेद मानना पड़ जाएगा। अतः मन्त्र और ब्राह्मण के साथ भाग शब्द का भूल कर भी व्यवहार नहीं करना चाहिए।]

      मध्याह्नोत्तर पुन: ३:३० बजे से संस्कृत में शास्त्रार्थ आरम्भ हुआ और अन्त तक संस्कृत में ही होता रहा। 

      प्रथम मैंने गोपथ ब्राह्मण पृ० २।१० का वचन उपस्थित किया – 🔥एवमिमे सर्वे वेदाः निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः (इतना ही उपस्थित किया शेष अगली बार के लिए छोड़ दिया)। इस वचन में रहस्य अर्थात् आरण्यक ब्राह्मण और उपनिषदों को वेद से पृथक् करके गिनाया है। यदि ये वेद के अन्तर्गत ही हैं तो पृथक् गिनाने की क्या आवश्यकता? इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषदें वेद नहीं हैं। ऐसे प्रमाणों को उपस्थित करने पर पौराणिक विद्वान् कहा करते हैं कि यद्यपि ब्राह्मण ग्रन्थ वेद के अन्तर्गत है तथापि 🔥‘ब्राह्मण वसिष्ठ न्याय’[६] से ब्राह्मण ग्रन्थों का वैशिष्टय दिखाने के लिए पृथक् निर्देश किया है। पूर्वपक्षी यही बात न कह दे, इसलिए मैंने स्पष्ट कर दिया कि ब्राह्मण वसिष्ठ न्याय वहाँ लगता है जहाँ वक्ता और श्रोता दोनों यह मानते हो कि वसिष्ठ भी ब्राह्मण है। यदि इनमें से एक भी यह न जानता हो कि वसिष्ठ भी ब्राह्मण है तब यह न्याय नहीं लगता। यहाँ भी यह न्याय तभी लग सकता है जब दोनों पक्ष यह स्वीकार करलें कि ब्राह्मण ग्रन्थ भी वेद हैं। परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थ वेद हैं यह तो अभी साध्य है। इतना ही नहीं 🔥सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः में स शब्द का प्रयोग है। इसका प्रयोग अप्रधान के साथ ही सदा होता है यथा 🔥देवदत्तः सपुत्र: समागतः (देवदत्त पुत्र सहित आया) यहाँ देवदत्त का आगमन मुख्य है पुत्र का गौण। इसलिए इस वचन में ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों को पृथक स्वीकार करते हुए (जैसे देवदत्त और उसका पुत्र पृथक् है) वेद से इनकी हीनता अप्रधानता ही व्यक्त की गई है। 

[💡पाद टिप्पणी ६. ब्राह्मणा आयाताः वसिष्ठोऽप्यायातः। यहाँ वसिष्ठ के ब्राह्मण होने से ‘बाहाणाः आयाताः’ कहने से कार्य चल सकता था फिर भी वसिष्ठ का पृथक् निर्देश इसलिए किया कि वह अन्य ब्राह्मणों से विशिष्ठ है, प्रधान है।]

      इस पर पूर्वपक्षी वक्ता ने यथार्थ उत्तर न देते हुए इधर उधर की बातें करके अपना समय बिताया। तदनन्तर मैंने पुनः कहा कि पूर्व आक्षेपों का कोई समाधान नहीं किया गया, इस के साथ ही उक्त वचन में आगे कहा है 🔥सेतिहासाः सपुराणाः क्या इतिहास (महाभारत) और पुराण आप के मतानुसार ( हमारे मत में नहीं ) जो व्यास कृत हैं वेद हैं? जैसे ब्राह्मण ग्रन्थ आदि। क्योंकि इनको भी उसी प्रकार स्मरण किया है। इतना ही नहीं अपौरुषेय वेद में (आप के मतानुसार) गोपथ में व्यास निर्मित महाभारत वा पुराणों का निर्देश कैसे हुआ? 

      इस पर पूर्वपक्षी ने कहा कि प्रतिद्वापर में व्यासजी पुराणों की रचना करते हैं अतः यह कर्म प्रवाह से नित्य है यथा सूर्य चन्द्रादि का निर्माण। इस पर मैंने कहा कि आप के पुराणों में यह नहीं लिखा कि प्रतिद्वापर व्यासजी पुराणों का प्रवचन करते हैं, बल्कि वेदों का प्रवचन करते हैं इतना ही लिखा है अतः आप का उक्त कथन ठीक नहीं। साथ ही मैंने पूछा कि 🔥मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् वचन से तो ब्राह्मण ग्रन्थों की वेद संज्ञा नहीं हो सकती, कोई ऐसा लक्षण बताइये जिस से ब्राह्मण ग्रन्थ भी वेद माने जाएँ। 

      इस पर पूर्वपक्षी ने कहा कि 🔥सम्प्रदायाविच्छिन्नत्वे सति अस्मर्यमाणकर्तृत्वं वेदत्वम् अर्थात् गुरु परम्परा का विच्छेद न होने पर भी जिस ग्रंथ का कर्ता स्मृत न हो वह वेद है। इस से जैसे मन्त्रों का कर्ता स्मृत नहीं वैसे ही ब्राह्मण ग्रंथों का कर्ता स्मृत न होने से दोनों समान रूप से वेद है। 

      पूर्वपक्षी के इस लक्षण पर ब्राह्मण ग्रन्थों के लेखकों का नाम उपस्थित किया जा सकता था परन्तु वैसा न करके मैंने उनके लक्षण में ही क्रमशः दो दोष उपस्थित किए।

      ◾️(१) आप के मत में जिन ग्रन्थों का गुरुशिष्य सम्प्रदाय नष्ट न हुआ हो वे वेद है। हम आपके ग्रन्थों से जानते है कि ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषद् ग्रन्थ पहले सस्वर थे अब शतपथ और तैत्तिरीय ब्राह्मण को छोड़ कर सब स्वर-रहित हो गए। अतः स्वर के लुप्त होने से स्पष्ट है कि इन ब्राह्मण ग्रन्थों के पठनपाठन में गुरुशिष्य सम्प्रदाय का नाश हुआ है। क्योंकि जहाँ जहाँ गुरुशिष्य सम्प्रदाय का नाश नहीं हुआ, उन ग्रन्थों में अक्षर मात्रा वर्ण स्वर का एक भी पाठान्तर नहीं मिलता। यथा शाकल संहिता माध्यन्दिन संहिता, तैत्तिरीय संहिता आदि। जिन ब्राह्मण ग्रन्थों में स्वरों का लोप हो गया वह लोप विना सम्प्रदाय नाश के हो नहीं सकता, अतः जिन ब्राह्मणों के स्वरों का नाश हो चुका है अर्थात् सम्प्रदाय भंग हो चुका है वे आपके लक्षणानुसार ही वेद नहीं हो सकते। 

      इस अभूतपूर्व करारी चोट से सभी पूर्वपक्षी घबरा गए। पूर्वपक्षी विज्ञान ने पराजय से बचने के लिए स्वमत विरुद्ध ‘स्वर रहित भी ग्रन्थ वेद है’ मत स्वीकार किया। इस पर मैंने श्री शंकराचार्यजी से व्यवस्था मांगी कि क्या ऋग्वेद के मन्त्रों से स्वर हटा दिए जाएँ तो आप उन्हें वेद मानेगे। उनके पास भी कोई उत्तर नहीं था, अतः उन्होंने स्वीकार किया कि स्वर रहित भी मन्त्र वेद ही है। इस पर मैंने कहा कि आपका यह कहना ठीक नहीं।[७] स्वर रहित ग्रन्थ कदापि वेद नहीं हो सकते क्योंकि मीमांसा के कल्प सूत्राधिकरण में ‘कल्पसूत्र वेद हैं या नहीं’ पर विचार करते हुए इनके वेदस्व को हटाने के लिए युक्ति दी है 🔥असन्निबन्धनत्वात्। इसका टीकाकारों ने अर्थ किया है 🔥स्वररहितत्वात् स्वररहित होने से कल्पसूत्र वेद नहीं है। इससे स्पष्ट है कि स्वर रहित ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हो सकते। इसी प्रसंग में मैंने कहा कि आरम्भ से ही उन ब्राह्मणों पर स्वर नहीं था, यह भी आप नहीं कह सकते क्योंकि पहले लौकिक भाषा भी सस्वर थी। पाणिनि का 🔥विभाषा भाषायाम् (६१) सूत्र इसमें प्रमाण है। इस पर श्री शंकराचार्य कहने लगे कि पाणिनि ने स्वर प्रक्रिया में सारे उदाहरण वेद के दिए है लौकिक भाषा में भी स्वर होता तो उसके भी उदाहरण देते। श्री शंकराचार्य के वक्तव्य के उत्तर में मैंने कहा कि पाणिनि ने कोई उदाहरण अपनी अष्टाध्यायी में नहीं दिए। जो उदाहरण मिलते हैं वे काशिका में वामन के हैं और सिद्धान्तकौमुदी में भट्टोजि दीक्षित के। इतना ही नहीं आप अपना कौमुदी ग्रन्थ भेजिए मैं पचासों सूत्रों के वे उदाहरण दिखाऊँगा जो वेद के नहीं है लौकिक भाषा के हैं। इस पर श्री शंकराचार्य जी को जो अपने को महावैयाकरण मानते हैं, निरुत्तर होना पड़ा। 

[💡पाद टिप्पणी ७. यहाँ से आगे प्रायः मध्यस्थ स्वरूप श्री शंकराचार्यजी से ही वादविवाद होता रहा।] 

      ◾️(२) इसके पश्चात् पूर्वपक्षी के वेद के लक्षण के दूसरे अंश पर दूसरा दोष उपस्थित किया । सम्प्रदाय के नाश न होने पर भी कई ग्रन्थ ऐसे हैं जिनके कर्ता का हमें ज्ञान नहीं परन्तु वे वेद नहीं माने जाते। यथा माध्यन्दिन संहिता का पदपाठ। ऋग्वेद के पदपाठ का कर्ता वा प्रवक्ता शाकल्य था, सामवेद का गार्ग्य, अथर्व का शौनक, तैत्तिरीय का आत्रेय। ऐसे माध्यन्दिन पदपाठ का कर्ता कौन है, यह किसी को ज्ञात नहीं और इसके गुरूशिष्य सम्प्रदाय का नाश भी नहीं हुआ। यदि सन्देश हो तो अपने वैदिकों से पूछ लें। अतः आपके लक्षण के अनुसार यह पदपाठ भी अपौरुषेय वेद होगा परन्तु पदपाठ को अपौरुषेय नित्य नहीं माना जाता। अत: आपका लक्षण उभयथा दोष युक्त है। 

      इस पर भी पूर्वपक्षी विद्वान् ने पुनः पराजय से बचने के लिए स्वमत विपरीत पदपाठ को भी नित्य अपौरुषेय वेद स्वीकार किया। इस पर मैंने पुनः मध्यस्थ श्री शंकराचार्यजी से व्यवस्था माँगी। श्री शंकराचार्य और श्री करपात्री जी दोनों ने पदपाठ को भी वेद स्वीकार किया। 

      इस स्वपक्ष विरुद्ध मत के स्वीकार करने पर मैं विशेष रूप से श्री शंकराचार्य और करपात्रीजी से ही सीधा जूझ पड़ा और पदपाठ अनित्य हैं पौरुषेय हैं, इस बात के सिद्ध करने के लिए एक पर एक प्रमाणों की कमशः झड़ी लगा दी। सबसे प्रथम यास्क का 🔥वनेन वायो न्यधायि चाकन मन्त्र के व्याख्यान में शाकल्य कृत पदपाठ के संबंध में लिखा वचन – 🔥वा इति च य इति च चकार शाकल्यः उदात्त त्वेषमाख्यालमभविष्यत् असुसमाप्तश्चार्थः (‘वाया’ को शाकल्य ने वा यः दो पद मानकर दो टुकड़े किए हैं ऐसा करने से यत् का योग होने से अधायि क्रिया उदात्त होनी चाहिए परन्तु वेद में अनुदात्त है और यत् के निर्देश से मन्त्रार्थ भी पूरा नहीं होता जब तक तत् का अध्याहार न किया जाए) उपस्थित करके कहा कि यास्क शाकल्य कृत पदपाठ को केवल अनित्य ही नहीं मानता अपितु उसमें दोष भी उपस्थित करता है। इस पर मध्यस्थ ने निरुक्त तथा उक्त मन्त्र का पता पूछा। स्थान निर्देश करने पर कई पण्डित उक्त ग्रन्थ निकाल निकाल कर पन्ने उलटने लगे लगभग १० मिनट पीछे करपात्रीजी ने इसका समाधान करने की चेष्टा की कि यास्क के चकार का अर्थ बनाना नहीं है प्रवचन करना है। व्याकरण के अनुसार तो वेद के अनेक पद अशुद्ध कहे जा सकते है पर उन्हें कोई अशुद्ध नहीं मानता। अतएव अर्थ की दृष्टि से वायः एक पद ही है परन्तु अध्ययन कृत अदृष्ट के लिए वा यः ऐसा ही परम्परा से स्वीकार किया जाता है इत्यादि। 

      इस पर मैंने उत्तर दिया कि यदि अर्थ की दृष्टि से वायः दो पद युक्त नहीं तो यास्क का शाकल्य पर दोष देना और उसे पौरुषेय कहना ठीक है। अन्यथा यदि आप पदपाठ को अपौरुषेय नित्य मानते हैं तो कह दीजिए कि यास्क का दोष दर्शन गलत है, मैं बैठ आता हूँ। इतना ही नहीं अब मैं अन्य प्रमाण देता हूँ जिसमें स्पष्टतया पदपाठ को अनित्य बताया है – कैयट महाभाष्य प्रदीप २*।१।१०९ [*अस्पष्ट] में लिखता है- 🔥संहिताया एव नित्यत्वं पदविच्छेदस्य तु पौरुषेयत्वम्। अतः पदपाठ अनित्य पौरुषेय हैं यह स्पष्ट है इस कारण पदपाठ अपौरुषेय वेद नहीं हो सकते। 

      इस पर भी करपात्रीजी कैयट के वचन पर विचार करके[८] कहने लगे कि वैयाकरण वेद विषय में प्रमाण नहीं। कैयट की अनेक बातों का नागेश ने खण्डन कर दिया है अत: कैयट का वचन प्रमाण नहीं। 

[💡पाद टिप्पणी ८. कैयट के वचन का पूरा पता देने पर भी जब शीघ्रता से पूर्वपक्षियों से न निकाला जा सका तो महाभाष्य मेरे पास भेजा, मैंने उक्त पृष्ठ निकाल कर उन्हें दिया।]

      इस पर मैंने उत्तर दिया कि यद्यपि नागेश ने कैयट के अनेक मतों का खण्डन किया है पुनरपि इस स्थल पर खण्डन नहीं किया, अत: यह उसे भी स्वीकृत है। इतना ही नहीं, नागेश ने तो महामाष्य ६।३ की टीका में पदपाठों में सम्प्रदाय भ्रंश भी माना है जिसे न आप स्वीकार करते है और न मैं। यह भी ध्यान रहे कि यदि कैयट ने पदपाठों के पौरुषेयत्व का विधान स्वयं अपने रूप में किया होता तब तो उसे कथंचित् अप्रमाण कहा जा सकता था। परन्तु कैयट ने उक्त मत तो महाभाष्यकार पतञ्जलि के 🔥न लक्षणेन पदकारा अनुर्क्त्याः पदकारैर्नाम लक्षणमनुवर्त्यम् (सूत्रकार को पदकारों का अनुसरण नहीं करना चाहिए पदकारों को सूत्रकारों के लक्षणों का अनुसरण करना चाहिए) वचन की व्याख्या में लिखा है। महाभाष्य के उक्त वचन का यह स्पष्ट अभिप्राय है कि पदपाठ पौरुषेय अनित्य है। यदि आप महाभाष्यकार पतञ्जलि के वचन को भी वैयाकरण होने मात्र से अप्रमाण कहें तो मैं बैठ जाता हूँ, मुझे ऐसी अवस्था में कुछ नहीं कहना। 

      इस पर पुन: कुछ समय परस्पर विचार विनिमय करके श्री करपात्रीजी बोले कि महाभाष्यकार का उक्त वचन प्रौढिवादमात्र (एक देशी जबरदस्ती का उत्तर) है सिद्धान्तरूप नहीं। महाभाष्यकार कई स्थानों पर प्रौढिवाद से उत्तर देते हैं वे उत्तर प्रामाणिक नहीं माने जाते। 

      इस वक्तव्य पर मैंने कहा कि यह सत्य है कि महाभाष्य में प्रौढिवाद से अनेक उत्तर दिए गए हैं परन्तु कौन सा उत्तर प्रौढिवाद से दिया गया है इसके परिज्ञान के लिए दो कसौटियों हैं। पहली – जिस उत्तर के विपरीत अन्यत्र लेख मिले उन परस्पर विरोधी उत्तरों में एक प्रौढिवाद का उत्तर होगा दूसरा सिद्धान्तरूप का। दूसरी – प्रौढिवाद का उत्तर एक स्थान पर ही मिलेगा उसका पुन: पुनः निर्देश न होगा। तदनुसार पदपाठ विषयक उक्त मन्तव्य का विरोधी वचन सम्पूर्ण महाभाष्य में उपलब्ध नहीं अतः यह प्रौढ़िवाद से कहा गया है यह कहना असत्य है। इतना ही नहीं यह वचन महाभाष्य में अध्याय ६ और ८ में दो स्थानों पर और भी आया है। इसलिए अनेक स्थानों में समानरूप से कहा गया उत्तर प्रौढ़िवाद का नहीं माना जा सकता। इतने पर भी यदि वैयाकरण होने से महाभाष्यकार के वचन से सन्तोष न हो तो मैं वैदिक विद्वान का मत उपस्थित करता हूँ – भृतहरि महाभाष्य की टीका में पृष्ठ २६८ पर लिखता है – 🔥एवं च कृत्वा वृको मासकृत इत्यवग्रहभेदोऽपि भवति। चन्द्रमसि प्रवृत्तो मासशब्दो अवगृह्यते वृके मासकृत् (वृको मासकृत मन्त्र में चन्द्रमा अर्थ में मास ऽकृत् ऐसा एक पद मानकर अवग्रह किया जाता है और वृक अर्थ में मा सकृत् दो पद माने जाते हैं)। यदि यह कहा जाए कि भर्तृहरि का वचन भी वैयाकरण होने से अप्रमाण है तो यह अशुद्ध है। भर्तृहरि वैयाकरण होते हुए भी परम वैदिक है। उसकी वैदिकता को गणरत्नमहोदधिकार वर्धमान जैसे जैन आचार्य भी मुक्त कण्ठ से स्वीकार करते हैं। वर्धमान लिखता है- 🔥तत्र भवतां वेदविदामलंकारभूतेन भर्तृहरिणा। यास्क भी वैदिक है अतः यास्क भर्तृहरि पतञ्जलि कैयट आदि के उद्धृत वचनों से स्पष्ट है कि पदपाठ ग्रन्थ अनित्य पौरुषेय हैं, ये पढपाठ ग्रन्थ अपौरुषेय वेद नहीं हो सकते। इस प्रकार आपका वेद लक्षण उभयथा दोष दुष्ट होने से त्याज्य है। 

      इसके पश्चात् सादे पाँच बजे का समय हो जाने के कारण श्री शंकराचार्यजी ने अपने भाषण में – “यह शास्त्रार्थ जय पराजय के लिए नहीं किया गया ज्ञानवर्धन के लिए किया गया है अतः यहाँ पराजय का कोई प्रश्न नहीं, यहाँ तो वाद कथा हुई है। श्री मीमांसकजी मेरे पूर्वाश्रम के मित्रों में से हैं इनकी योग्यता मैं जानता हूँ। बड़ी विद्वत्ता से इन्होंने अपने पक्ष का पोषण किया है। अब अतिकाल होने से यह सभा समाप्त की जाती है। अगले दिन ज्योतिष सम्मेलन होगा……………” आदि कह कर लीपापोती करके सभा विसर्जित की। 

      श्री शंकराचार्यजी के उक्त भाषण के मध्य में ही जब आपने वादकथा का निर्देश किया तब मैंने बीच में टोकते हुए उनसे कहा कि इस वादविवाद को वादकथा कहना शास्त्रार्थ के नियमों के विरुद्ध है। आपने दो बार अस्थान में मेरे लिए निग्रह स्थान का प्रयोग किया था अर्थात् आप निग्रह स्थान में आ गए। उस समय मैंने जानबूझ कर कि कहीं यह कथा न्याय शास्त्र में न चली जाए, कुछ नहीं कहा। परन्तु आपको ज्ञात होना चाहिए कि वाद कथा में प्रतिपक्षी के लिए निग्रह स्थान का प्रयोग नहीं होता। यत: आपने निग्रह स्थान का प्रयोग किया, अतः आपके वचनानुसार ही यह कथा वाद कथा न होकर जल्प वा वितण्डा कथा रही यह प्रमाणित होता है। 

      ◼️विशेष- जब से पदपाठों के अनित्यत्व का प्रकरण चला उस अन्तिम डेढ़ घण्टे में पौराणिक ३-४ विद्वान् बराबर अपनी पुस्तकों में से मेरे दिए गए उद्धरण निकाल निकाल कर श्री शंकराचार्यजी तथा श्री करपात्रीजी के हाथों में देते रहे। वे दोनों प्रतिवार ५-१० मिनट विचार करके उत्तर देते थे। इससे संस्कृत से अनभिज्ञ पौराणिक जनता पर भी आर्यसमाज का भारी प्रभाव पड़ा। प्रायः अनेक व्यक्ति कहते सुने गए कि आर्यसमाज का पण्डित बहुत तगड़ा रहा। वह अकेला मुँह जबानी २-३ मिनट ही बोलता था और उसका उत्तर देने के लिए कई कई पण्डित मिलकर पुस्तकों के पन्ने उलटते थे और दोनों ( श्री शंकराचार्य तथा करपात्रीजी) पुस्तकें देखकर और ५-७ मिनट सोच कर उत्तर देते थे। 

      इस प्रकार इस शास्त्रार्थ का पौराणिक मनता पर तो भारी प्रभाव पड़ा ही किन्तु अमृतसर की आर्यजनता भी कहने लगी कि आपने आर्यसमाज की लाज रख ली। मैंने आर्यसमाजियों के उक्त कथन पर कहा कि आप लोग इस भारी तैयारी को देखते हुए भी सोते रहे। मैं तो सम्मेलन द्वारा निमन्त्रित होकर आया था, आप लोगों ने क्या किया? यह उदासीनता आर्यसमाज को ले डूबेगी। 

      यह भी ज्ञात रहे कि सारे विवाद प्रकरण में कथन प्रतिकथन को टेप रिकार्ड मशीन से रिकार्ड किया गया परन्तु अनेक अवसरों पर मशीन बन्द होती थी ( मेरे पास ही मशीन थी अतः मैं देखता रहता था)। जहाँ तक मुझे शत है अन्तिम दृश्य का तो रिकार्ड किया ही नहीं गया। इस लेख में एक दो स्थान पर श्री करपात्रीजी और श्री शंकराचार्यजी के नामों में परिवर्तन हो सकता है क्योंकि प्रायः अन्तिम समय में दोनों ही महानुभाव उत्तर देने में प्रवृत्त हो जाते थे। 

✍🏻 लेखक – महामहोपाध्याय पण्डित युधिष्ठिर मीमांसक 

प्रस्तुति – 🌺 ‘अवत्सार’

॥ओ३म्॥