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मैं दुःखी क्यों हूँ?

मैं दुःखी क्यों हूँ?

प्रस्तुत समपादकीय प्रो. धर्मवीर जी के द्वारा उनके निधन से पूर्व लिखा गया था। ये लेख अधूरा है, अगर पूरा होता तो स्वयं एक जीवन-शास्त्र होता। पर जितना भी है, उतना ही उपयोगी है, सारगर्भित है। इस लेख में आचार्य जी ने जीवन जीने की आदर्श शैली की ओर संकेत किया है। इससे पाठकों को अवश्य लाभ मिलेगा।

-समपादक

मुझे लगता है कि संसार में सबसे दुःखी व्यक्ति मैं ही हूँ। सब मुझे सदा दुःख ही देते रहते हैं। भगवान् भी मुझे दुःख ही देता है। मैं अपने माता-पिता से दुःखी हूँ, मुझे लगता है कि घर में मुझसे पक्षपात् होता है और सबकी सुनी जाती है, सबकी इच्छाएँ पूरी होती हैं। मुझे इच्छा करना ही अपराध लगने लगा है। मैं अच्छा करता हूँ, पूरा करने का प्रयत्न भी करता हूँ, पर पूरा न होने पर एक दुःख और अपने दुःख में जोड़ लेता हूँ। इच्छा पूरी न होने का एक दुःख था, उसमें असफलता का दुःख और जोड़ लिया। क्या संसार में मैं दुःख पाने के लिये ही आया हूँ?

मुझे लगता है कि संसार में मेरे चारों ओर मुझे दुःख देने वाले एकत्र हो गये हैं। मुझे लगता है ये लोग गलत हैं, ठीक नहीं हैं। ये सुधर जायें तो सब ठीक हो सकता है। ये बच्चे सुधर जाते तो सब ठीक हो जाता, परन्तु इनको मेरी बात समझ में ही नहीं आती। समझा-समझा कर दुःखी हो गया हूँ। पत्नी है कि सुनती नहीं है, बच्चों को बिगाड़ दिया है। मैं जो कहता हूँ उसका उल्टा करती है, बच्चों को उल्टा सिखाती है। मेरा पड़ौसी नालायक है, गन्दा है, कोई अच्छी आदत ही उसमें नहीं है। गन्दा रहता है, गन्दगी करता है, शराब पीता, गालियाँ देता है, समझाने पर भी समझता नहीं है। मेरे कार्यालय में मेरे साथी चापलूस और कामचोर हैं, अधिकारी रिश्वतखोर, पक्षपाती हैं। संसार में जिधर देखता हूँ, सब बिगाड़-ही-बिगाड़ है। उससे मैं बहुत दुःखी हो गया हूँ।

मुझे लगता है कि लोग मन्दिर जाते हैं, सत्संग करते हैं, प्रवचन सुनते हैं, क्या इनसे दुःख दूर होता है? यदि ऐसा करने से दुःख दूर होता है तो सारे मन्दिर जाने वाले सुखी हो जाते। सारे प्रवचन करने वाले क्या सुखी हैं? सत्संग में सुख होता तो सभी सत्संग करके सुखी हो चुके होते, परन्तु ऐसा लगता नहीं। फिर सोचता हूँ कि यदि इन सबसे सुख नहीं मिलता, तो इतने लोग सुख प्राप्त करने के लिये यहाँ की ओर क्यों दौड़ रहे हैं? सुनने में आता है कि सत्संग सुनकर डाकू सय मनुष्य बन गया, अंगुलीमाल डाकू भगवान् बुद्ध का भक्त बन गया। ये ठीक है, सब तो नहीं सुखी होते, परन्तु कुछ तो सुखी होते देखे जाते हैं। जैसे खेत में डाले गये सारे बीज नहीं उगते। कोई पत्थर पर गिरकर पड़ा सड़ जाता है। किसी को पक्षी खा लेता है, तो कोई कीड़े से नष्ट कर दिया जाता है, कोई उगकर पशु-पक्षियों द्वारा खा लिया जाता है, फिर भी खेती की जाती है और उसी से भूखे मनुष्यों को भोजन मिलता है। लगता है सत्संग की खेती का भी यही हाल है, जो बीज उर्वरा भूमि में गिर जाता है, उसमें बीज पौधा बनकर फल देने लगता है। प्रवचनकर्त्ता सभवतः यही उपदेश कर रहे थे कि दुःख दूर करने का सत्संग ही एक उपाय है।

संसार में दुःख है, लोग इसे दूर भी करना चाहते हैं तो इसका उपाय भी निश्चित होगा। सत्संग में दुःख दूर करने का उपाय बताते हुए यही तो कहा जा रहा था। दुःखी हम इसलिये हैं कि हम अपने से बाहर की वस्तुओं को दुःख का कारण समझ रहे हैं। जब तक मैं दूसरों को दुःख का कारण समझूँगा, तब तक मेरे दुःखों से मुझे छुटकारा नहीं मिलेगा, क्योंकि दुःख का कारण मेरे अन्दर  है। जिन बातों से, जिन वस्तुओं से, जिन व्यक्तियों से मैं दुःखी हूँ, उसका कारण है कि मैं उनसे असन्तुष्ट हूँ। मेरे असन्तोष का मूल मेरी उनसे अपेक्षा है, मैंने सबसे अपेक्षा पाल रखी है। जब मेरी इच्छा पूरी नहीं होती तो मेरे अन्दर असन्तोष जन्म लेने लगता है। यह असन्तोष ही मेरे दुःख का कारण है।

मेरे दुःख का दूसरा कारण है कि मैं सब व्यक्तियों को सुधारना चाहता हूँ। सभी वस्तुओं को अपने अनुकूल बनाना चाहता हूँ। ऐसा करना मेरे सामर्थ्य से परे है। मेरे लिये समभव नहीं है। मैं जिसे सुधारने का यत्न करता हूँ और जिसे मैं सुधार नहीं सकता, उन दोनों में अन्तर होता है। जिसे मैं पहले से सुधारने योग्य नहीं मानता, उनसे मैं दुःखी नहीं होता, उन्हें वैसा ही मानकर व्यवहार करता हूँ, जिनको सुधारने की इच्छा करता हूँ, उनके लिये प्रयत्न करता हूँ, फिर असफल होने पर दुःखी होता हूँ। सुधार का प्रयत्न करना अच्छी बात है, परन्तु असफलता पर दुःखी होना बुरी बात है, जब कोई नहीं सुधरता तो उसको भी उपेक्षा की कोटि में डाल दिया जाए, तो मेरा दुःख दूर हो सकता है।

मैंने दुःखों के नाम रख दिये हैं। ये सास है, ये बहू है, ये देवरानी या जेठानी है, इन नामों से दुःख लगने लगता है, यथार्थ तो यह है कि दुःख व्यवहार में है, संज्ञा में नहीं। दुःख तो बेटे-बेटी से भी होता है। माता-पिता, भाई से भी होता है। संसार में रक्त-समबन्ध को सुख का कारण तथा दूर को दुःख का कारण मानते हैं, परन्तु यथार्थ में जितना दुःख समबन्धियों में, सगे भाइयों में होता है, उतना दुःख किसी और से नहीं मिलता। जितने झगड़े, लड़ाई, मुकद्दमें भाइयों में परस्पर होते हैं, उतने दूसरों से तो नहीं होते। फिर दुःख का कारण व्यक्ति नहीं, विचार है। विचार ठीक न होने की दशा में कोई भी दुःख का कारण बन सकता है, परन्तु मैंने मान लिया कि सास दुःख ही देगी, बहु विरोध ही करेगी।

जिनको मैं बदल नहीं सकता, जिन्हें मैं छोड़ भी नहीं सकता, क्या उनसे लड़ाई, झगड़ा, तनाव करके मैं सुखी रह सकता हूँ? कदापि नहीं। फिर मैं क्या करूँ, जिससे मेरा दुःख दूर हो? इसलिये उनसे मेरा व्यवहार निष्पक्षता का हो, उदासीनता का हो। ………

– धर्मवीर

 

धर्म और दर्शन के क्षेत्र में ऋषि दयानन्द की देन

धर्म और दर्शन के क्षेत्र में ऋषि दयानन्द की देन

प्रस्तुत सपादकीय प्रो. धर्मवीर जी के द्वारा उनके निधन से पूर्व लिखा था। इसे यथावत् प्रकाशित किया जा रहा है।

-समपादक

हर आर्यसमाजी को एक चिन्ता सताती है कि आर्यसमाज का प्रचार-प्रसार कैसे हो। अलग-अलग लोग अपनी-अपनी सममति देते हैं। सबसे पहले वे लोग हैं जो लोगों को आकर्षित करने के लिये लोकरञ्जक उपायों को अपनाने का सुझाव देते हैं। कोई सत्संग में भोजन का सुझाव देता है, तो कोई बच्चों में मिठाई बाँटने की बात करता है। खेल-मेले, आयोजन की बात करता है। स्वामी सत्यप्रकाश जी कहा करते थे कि आज आर्यसमाज का सारा कार्यक्रम तीन बातों तक सिमट गया है- जलसा, जूलूस और लंगर। भीड़ जुटाने के लिये हमारे पास विद्यालय के छात्रों के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं। बच्चों और विद्यालय के अध्यापकों की संखया जोड़कर आर्यसमाज के कार्यक्रम सफल किये जाते हैं।

नगर के स्तर पर यदि दो-चार समाजें हैं तो उत्सव के समय आर्यसमाजों के लोग मिलकर एक-दूसरे के कार्यक्रम में समिलित हो जाते हैं, तो संखया सौ-पचास हो जाती है और हम उत्सव सफल मान लेते हैं, प्रान्तीय स्तर हो या राष्ट्रीय स्तर, सभी स्थानों पर वही मूर्तियाँ आपको दिखाई देती हैं। यदि इस संखया को बढ़ाना हो तो हम अपने कार्यक्रम में किसी राजनेता को बुला लेते हैं।

ऐसे व्यक्ति के आने से उनके साथ आने वालों की संखया से समारोह की भीड़ बढ़ जाती है। समाज का भी कोई कार्य हो जाता है तथा राजनेताओं को जन-समपर्क करने का अवसर मिल जाता है। हमारी इच्छा रहती है कि हम कोई ऐसा कार्य करें, जिससे हमारे कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी बढ़े। हम अपने कार्यक्रमों की तुलना समाज के पन्थों, महन्तों के कथा आयोजनों से करते हैं। आजकल ये कथाएँ भागवत, सत्यनारायण, सुन्दरकाण्ड, और भी बहुत सी पौराणिक कथायें चलती हैं, इनसे लोगों का मनोरञ्जन हो जाता है, कथावाचक को अच्छी दक्षिणा की प्राप्ति हो जाती है और आयोजक भी  सोचता है कि वह पुण्य का भागी है। आर्यसमाज के पास ऐसी लोक लुभावन कथा तो है नहीं। आर्यसमाज वेद-कथा करता है, इस कथा को करने वाले ही नहीं मिलते तो सुनने वाले कहाँ से मिलेंगे।

हमें समझना चाहिए कि हमारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं, जिससे भीड़ को आकर्षित किया जा सके। भीड़ आकर्षित करने का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रकार है- चमत्कार दिखाकर जनसामान्य को मूर्ख बनाना। साईं बाबा, सत्य सांई, आसाराम, निर्मल दरबार, सच्चा सौदा व सैंकड़ों मत-मतान्तर हैं, जो चमत्कारों से जनता पर कृपा की वर्षा करते हैं, ऋषि दयानन्द ने किसी को कोई चमत्कार नहीं दिखाया।

न कोई झूंठा आश्वासन दिया। आज व्यक्ति ही नहीं बल्कि मत-समप्रदाय भी लोगों को चमत्कारों से ही मूर्ख बनाते हैं। ईसाई लोग चंगाई का पाखण्ड करते हैं, दूसरों के पाप ईसा के लिये दण्ड का कारण बताते हैं। ईसा पर विश्वास लाने पर सारे पाप क्षमा होने की बात करते हैं। मुसलमान खुदा और पैगमबर पर ईमान लाने की बात करते हैं। खुदा पर ईमान लाने मात्र से ईमान लाने वाले को जन्नत मिल जाती है। जिहाद करने, काफ़िर को मारने से और कुछ भी बिना किये खुदा जन्नत बखश देता है। पौराणिक गंगा-स्नान कराके ही मुक्त कर देता है। व्रत-उपवास, कथाओं से ही दुःख ढ़ल जाते हैं, स्वर्ग मिल जाता है। मन्दिर में देव-दर्शन से पाप कट जाते हैं। सारे ही लोग जनता को मूर्ख बनाते हैं और भीड़ चमत्कारों के वशीभूत होकर ऐसे गुरु, महन्त, मठ, मन्दिरों पर धन की वर्षा करती है। क्या ऋषि दयानन्द ने कोई चमत्कार किया अथवा क्या आर्यसमाज के पास कोई चमत्कार है, जिसके भरोसे भीड़ को अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है?

इसके अतिरिक्त लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का उपाय है-प्रलोभन। कोई व्यक्ति किसी के पास किसी के लाभ विचार से जाता है। कुछ लोग भोजन, वस्त्र, धन का प्रलोभन देते हैं। ईसाई लोग गरीबों में भोजन, वस्त्र बाँटकर लोगों को अपने पीछे जोड़ते हैं। कुछ लोग प्रतिष्ठा के लिये किसी गुरु, महन्त के चेले बन जाते हैं। किसी मठ-मन्दिर में नौकरी, समपत्ति का लोभ मनुष्य  को उनके साथ जोड़ता है। मुसलमान और ईसाई लोगों को नौकरी और विवाह का प्रलोभन देते हैं। आर्यसमाज में प्रलोभन के अवसर बहुत थोड़े हैं, परन्तु उनका उपयोग नये लोगों को अपने साथ जोड़ने या पुराने लोगों से काम लेने के लिये नहीं किया जाता, आर्यसमाज की समपत्ति या उसकी संस्थाओं का उपयोग अधिकारी प्रबन्धक लोग अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिये करते हैं। इसी कारण इन संस्थाओं में कार्य करने वाला व्यक्ति आर्य-सिद्धान्तों से जुड़ना तो दूर जानने की इच्छा भी नहीं करता।

आर्यसमाज में आने का एक लोभ रहता है- सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना। समाज की प्रजातान्त्रिक चुनाव-पद्धति के कारण किसी का भी इस संस्था में प्रवेश सरल है, दूसरे लोग संस्थाओं में घुसकर सपत्ति व पदों पर अधिकार कर लेते हैं, इनका विचार या सिद्धान्त से विशेष समबन्ध नहीं होता। संगठन के पास ऐसे अवसर इतने अधिक भी नहीं हैं कि इनसे अन्य मत-मतान्तर के लोगों में इसके प्रति कोई आकर्षण उत्पन्न हो सके। ऋषि दयानन्द के पीछे आने वाले लोगों में पहले भी कोई प्रलोभन नहीं था। आज तो संस्था के पास समपत्ति, भूमि, भवन, विद्यालय, दुकानें आदि बहुत कुछ हैं, परन्तु आर्यसमाज के प्रारमभिक दिनों में आर्यसमाज में आने वालों ने अपना समय, धन, प्रतिष्ठा, प्राण सभी कुछ समाज और ऋषि की भावना के लिये अर्पित किया। फिर कौन सा कारण है, जिससे हमें लगता है कि लोग ऋषि के पीछे आते थे और आज हमारे पीछे क्यों नहीं आते?

लोग चमत्कारों के पीछे जाते हैं। हमारे पास चमत्कार नहीं है, ऋषि के पास भी नहीं थे। हमारे पास भी किसी को लाभ पहुँचाने के लिये कोई साधन नहीं है। फिर कौन सी बात है, जिसके कारण लोग ऋषि के अनुयायी बने, उनके पीछे चले और फिर आज हमारे में कौन सी कमी आ गई है, जिसके कारण लोग हमारी ओर आकर्षित नहीं हो रहे हैं? वह इन सब बातों का एक उत्तर है- ऋषि दयानन्द ने जो कुछ कहा था, वह बुद्धि को स्वीकार करने योग्य और तर्क-संगत था। जो कहा, यथार्थ था, सत्य था, तर्क और प्रमाण से युक्त था। लोगों को स्वीकार करने में संकोच नहीं होता था। जो भी उनकी बात सुनता था, उसकी समझ में आ जाती थी और वह उनका अनुयायी हो जाता था।

ऋषि दयानन्द ने दुकानदारी का सबसे बड़ा आधार कि भगवान् पाप क्षमा करता है, इसे ही समाप्त कर दिया। ईश्वर ने संसार बनाया और जीवों के उपकार के लिये बनाया। प्रत्येक प्राणी के जीवन के लिये जो जितना आवश्यक है, उसे देता है, परन्तु जिसका जितना व जैसा कर्म है, उसको उतना और वैसा ही फल देता है। वह अपनी इच्छा से कम या अधिक नहीं कर सकता। इसका कारण बताया कि वह न्यायकारी है। यदि किसी को कुछ भी दे सकता तो सबको सब कुछ बिना किये ही दे देता। सबको सब कुछ बिना किये ही मिलता तो किसी को कुछ भी करने की आवश्यकता ही नहीं थी। कर्म करने की आवश्यकता नहीं रही, तो संसार के बनाने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी।

ऋषि कहते हैं- ईश्वर से जीव भिन्न है, न वह उससे बना है और न कभी उसका उसमें लय होता है। न जीव कभी ईश्वर बनता है और न ईश्वर कभी जीव बनता है। अवतारवाद पाखण्ड है। गंगा आदि में स्नान करने से मुक्ति मानना पाखण्ड है। देवता जड़ भी होते हैं, चेतन भी। परमेश्वर निराकार चेतन देवता है, शरीरधारी साकार चेतन तथा शेष जड़ देवता हैं। मूर्ति न परमेश्वर है, न मूर्ति-पूजा परमेश्वर की रजा है, यह तो व्यापार है, ठगी है। तीर्थ यात्रा से भ्रमण होता है, कोई पुण्य या स्वर्ग नहीं मिलता। जन्म से ऊँच-नीच, जाति-व्यवस्था मानना मनुष्य समाज का दोष है, इससे दुर्बलों को उनके अधिकार से वञ्चित किया जाता। विद्या-ज्ञान का अधिकार सब मनुष्यों को समान रूप से प्राप्त है। इस प्रकार सैकड़ों पाखण्ड इस समाज में व्याप्त थे, उन सबका ऋषि दयानन्द ने प्रबल खण्डन किया। यह अनुचित है तो फिर ईसाई हो या मुसलमान, जैन हो या बौद्ध, हिन्दू हो या पारसी, आस्तिक हो या नास्तिक, कुरान में हो या पुराण में, देशी हो या विदेशी, जहाँ पर जो भी गलत लगा, ऋषि ने उसका खण्डन किया। इस प्रकार उनके भाषण, उनकी पुस्तकें, जिसके पास भी पहुँची, उसे बुद्धिगय होने से स्वीकार्य लगीं। यही ऋषि दयानन्द के विचारों का तीव्रता से फैलने का कारण था।

आज हमारी समस्या यह है कि हम दूसरे के पाखण्ड का खण्डन करने में असमर्थ हैं और स्वयं पाखण्ड से दूसरों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। इस कारण इस कार्य में सफलता कैसे मिल सकती है। सफलता के लिये बुद्धिमान लोगों तक ऋषि के विचारों का पहुँचना आवश्यक है, जिसमें हम असफल रहे हैं। आज समाज में युवा-वर्ग अपनी भाषा से दूर हो गया है, उस तक उसकी भाषा में पहुँचना आवश्यक है। इसके लिये सभी भाषाओं में साहित्य और प्रचारक दोनों ही सुलभ नहीं हैं, परिणामस्वरूप नई पीढ़ी से हमारा समपर्क समाप्त प्राय है। समाज को यदि बढ़ना है तो बुद्धिजीवी व्यक्ति तक वैदिक विचारों को पहुँचाने की आवश्यकता है, इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

नान्यः पन्था विद्यतेऽभनाय।

– धर्मवीर

 

शैल्डन पोलॉक का शोध- संस्कृति का शीर्षासन

शैल्डन पोलॉक का शोध

संस्कृति का शीर्षासन

चार सितम्बर के दिन कर्नाटक यात्रा के प्रसंग में हम्पी भ्रमण करते हुये विजय नगर साम्राज्य के खण्डहर देख रहे थे। विरुपाक्ष मन्दिर, मन्दिर समूह, कृष्ण मन्दिर, विट्ठल मन्दिर, अच्युतराय मन्दिर देखते हुए एक मुस्लिम शासक निर्मित भवन दिखाई दिया। उसके परिचय में लिखा हुआ था- ‘एक सैक्यूलर इमारत’ पढ़कर हृदय गदगद हो गया। इस देश की नई शब्दावली से परिचित हुये बिना यहाँ की और इस देश को लेकर सोचने वालों की मानसिकता को नहीं समझा जा सकता। इस देश में पीड़ित को साम्प्रदायिक और आक्रान्ता को सैक्युलर, धर्म-निरपेक्ष, समाजवादी और उदार कहा जाता है।

आजकल हमारे तथाकथित प्रगतिशील लोगों की यह शब्दावली है जहाँ शब्द भी उनका भी दिया अर्थ बताते हैं। वास्तविक अर्थ कुछ रहा होगा तो रहे, परन्तु आज तो यही अर्थ ठीक है। वेद, शास्त्र, हिन्दू, ब्राह्मण आदि ऐसे शब्द हैं जिनका अर्थ होता है- शोषक, उत्पीड़क, रुढ़िवादी, स्त्री-विरोधी, दलित-विरोधी, अल्पसंख्यक-विरोधी, असभ्य, असंस्कृत आदि। यदि कोई मुसलमान की बात हो, चाहे औरंगजेब हो, अकबर हो, गजनी हो, ख्ुादा हो, कुरान हो या पैगम्बर हो, उनका अर्थ होता है- सैक्युलर, उदार, समन्वयवादी आदि। कहीं अंग्रेज, अंग्रेजी, विदेशी शोधकर्त्ता का नाम आ जाये तो अर्थ होगा प्रगतिशील, वैज्ञानिक दृष्टिवाला, दयालु, परोपकारी आदि। ऐसे शब्द आजकल के सुपठित लोगों की भाषा में इन्हीं अर्थों में आते हैं।

इन शब्दों का उदारता से व्याख्यानपूर्वक प्रयोग देखना हो तो आजकल के महान् शोधकर्त्ता कोलम्बिया विश्वविद्यालय के प्रोफे सर सर शैल्डन पोलॉक हैं। जिनका बहुत सारा शोध कार्य है, परन्तु रामायण को उन्होंने जिस दृष्टि से देखा है वह इस शब्दावली से समझा जा सकता है। शैल्डन पोलॉक के शोध के अनुसार वेद निरर्थक हैं (मीनिंग लेस) बाकि जितने भी शास्त्र हैं इनमें अपना कुछ नहीं है, ये सब वेद से दबे हुए हैं। बाद के काव्य, व्याकरण आदि राजाओं के प्रभाव को स्थापित करने, जनता को दबाने, उनका शोषण करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा लिखे गये। इसका एक उदाहरण रामायण है। रामायण कोई इतिहास नहीं है। राम नाम का कोई व्यक्ति नहीं हुआ। राम के नाम पर राजाओं के प्रभाव को बढ़ाने और जनता को दबाकर रखने के लिये वाल्मिकी ने इस की रचना की है।

शैल्डन पोलॉक का शोध दूर की कौड़ी है। श्लोकों का अर्थ मनमाना और अप्रासंगिक है। तटस्थ अध्ययनकर्त्ता यदि ग्रन्थकर्ता की एक  बात को प्रस्तुत करता है तो उसके विपरीत बातों को भी उद्धृत करना उसका कर्त्तव्य बनता है। पोलॉक महाभारत का श्लोक उद्धृत कर कहता है कि संस्कृत ग्रन्थों में राजा के  माहात्म्य को बढाने के लिये उसे भगवान् का रूप दिया गया है। ऐसा करने के पीछे उद्देश्य यह है कि कोई राजा का विरोध न कर सके और राजा अपने को भगवान् मानकर प्रजा पर मन मरजी चला सके। प्रजा का शोषण कर सके। पोलॉक के विचार से सारा संस्कृत साहित्य राजाओं के द्वारा अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए ब्राह्मणों के माध्यम से कराया गया प्रयास है। पोलॉक का विचार है कि पूरे संस्कृत साहित्य में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसमें मनुष्य की स्वतन्त्रता, बौद्धिकता, समानता की बात दिखाई पड़ती हो। उसके विचार से हिन्दुओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव इन संस्कृत ग्रन्थों द्वारा बौद्धिक स्वतन्त्रता को बन्धक बनाये जाने के कारण है। वेद या शास्त्रों में आध्यात्मिकता की बात करना निरी मूर्खता है। वेद, शास्त्र, संस्कृत साहित्य दलित-विरोधी, स्त्री-विरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी है। पोलॉक का मानना है कि रामायण के माध्यम से शासकों ने प्रजा के मन में मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काने का कार्य किया है। वह यहाँ तक कहता है कि भाजपा या विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा रथ-यात्रा निकालना हिन्दुओं के मन में रामायण के माध्यम से मुस्लमानों के प्रति शत्रुता का भाव उत्पन्न करने का प्रयास है।

पोलॉक रामायण को मुस्लिम विरोध के लिये लिखवाया ग्रन्थ कहकर दो बात सिद्ध करना चाहता है, एक– राम नाम का कोई इतिहास में व्यक्ति ही नहीं हुआ, उसके आदर्श राजा होने की बात तो बहुत दूर है। दूसरी रामायण की रचना का समय वह इस्लाम के भारत आक्रमण के बाद का सिद्ध करना चाहता है। यह ग्रन्थ के साथ और इतिहास की परम्परा के साथ भी मनमानी है। इस्लाम के उत्पन्न होने से पहले ही रामायण का विश्व में प्रचार प्रसार हो चुका था। जहाँ इस्लाम का जन्म चौदह सौ वर्ष पुराना है तो रामायण के चित्रों का प्रदर्शन ब्राह्यीलिपि के साथ तीन हजार वर्ष से भी पुराना मिलता है। चीन, तिब्बत, लंका, मलेशिया, इन्डोनेशिया आदि देशों में रामायण का प्रचार-प्रसार वहाँ इस्लाम के पहुंचने से पहले ही पहुँच चुका था। साहित्य में हजारों ग्रन्थ ऐसे हैं जिनकी रचना रामायण के आधार पर की गई है। रामायण इन ग्रन्थों का उपजीव्य है।

शैल्डन पोलॉक का शोध है कि रामायण में राक्षस शब्द मुसलमानों के लिये प्रयुक्त हुआ है। संस्कृत साहित्य में मुसलमानों के लिये यवन शब्द तो देखने में आता है पर किसी भी शब्दकोश में राक्षस का अर्थ मुसलमान देखने को नहीं मिलता। वैदिक साहित्य में दो ही वर्ग देखने में आते हैं। इनमें एक को आर्य कहते हैं दूसरे को दस्यु कहा जाता था। दस्यु के लिये भी अनार्य शब्द का प्रयोग मिलता है। ये दोनों शब्द एक वर्ग के लोगों के लिये प्रयुक्त होते थे, क्योंकि ये शब्द गुणवाचक हैं न कि जाति के वाचक। संस्कृत साहित्य में दस्यु शब्द का अर्थ करते हुये कहा गया है ‘अकर्मा दस्युः’ जो पुरुषार्थ न करके निर्वाह करना चाहता है वह दस्यु है। वह कोई भी हो सकता है। जिन का आचरण आर्योचित या मर्यादा रहित होता था, उनके लिये म्लेच्छ शब्द का प्रयोग देखा जा सकता है। जहाँ तक राक्षस शब्द की बात है। राक्षस शब्द बहुत पुराना है, वेद में भी प्रयुक्त हुआ, प्रारम्भ में इसका अर्थ बुरा नहीं था, बाद में बुरे अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है। राक्षस का अर्थ किसी भी रूप में मुसलमान अर्थ में रामायण में प्रयुक्त नहीं हुआ है।

रामायण में राक्षस वंशों का वर्णन मिलता है। राक्षसों के नाम, स्थान, वंश, क्षेत्र आदि का उल्लेख रामायण में विस्तार से पाया जाता है। ऐसी स्थिति में रामायण के राक्षस शब्द से मुसलमान अर्थ लेना- यह मनमानापन शोध तो नहीं कहा जा सकता है। शैल्डन पोलॉक का मानना है कि बुद्ध से पहले हिन्दुओं को लिखना-पढ़ना नहीं आता था। पोलॉक का शोध कहता है कि रामायण की रचना बौद्ध जातक कथाओं की नकल पर की गई है। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है रामायण बुद्ध से पूर्व भी इस देश में प्रचलित थी। इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। सोचने की बात है कि सब कुछ इस देश में बुद्ध के बाद आया तो बुद्ध से पहले यहाँ क्या था। इतना ही नहीं, बुद्ध ने जो कुछ जाना-सीखा वह सब कहाँ से सीखा। बौद्ध-दर्शन यदि वैदिक दर्शन का खण्डन करता है तो वैदिक दर्शन की उपस्थिति बुद्ध से पहले हुए बिना खण्डन कैसे हो सकता है। जैन, बौद्ध साहित्य में ब्राह्मणवाद का खण्डन बताया जाता है तो ब्राह्मण धर्म बुद्ध से पहले था तभी तो खण्डन किया जा सका। जब कोई विचार किसी विचार की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न होता है तो जिसके लिये विरोध या प्रतिक्रिया हुई है, उसका पहले स्थापित होना तो स्वतः सिद्ध होता है। फिर यह कहना कि वेद से लेकर पुराण तक की रचना बुद्ध काल के बाद हुई है- युक्ति संगत नहीं कहा जा सकता। संस्कृत साहित्य में काल निर्णय की समस्या चार कारणों से उत्पन्न होती है। प्रथम है नाम साम्य-एक ही नाम के अनेक व्यक्ति विभिन्न समय और स्थानों पर होते रहे इसलिये उनका काल निर्णय करना बहुत कठिन हो जाता है। दूसरा कारण है- वेद को छोड़कर समस्त शास्त्रीय साहित्य में समय-समय पर मिलावट होती रही है, जिस कारण ग्रन्थ के मूलपाठ को प्रक्षेप से पृथक् करना एक कठिन और चुनौती वाला कार्य है। तीसरा कारण- भारत में क्रमबद्ध इतिहास लिखने की परम्परा बहुत कम मिलती है। हमारे देश में रामायण व महाभारत को छोड़कर बचे इतिहास ग्रन्थ कम ही मिलते हैं। इतिहास के लिये पुराणों का अध्ययन आवश्यक है, परन्तु इनमें मिलावट होने के कारण तथ्यों को छांटना कठिन कार्य है। फिर चौथा कारण है- इस देश की दासता की लम्बी अवधि और मुसलमानों द्वारा साहित्य को जलाना और अंग्रेज, डच, फ्रेंच आदि द्वारा साहित्य, संस्कृति कला की वस्तुओं को इस देश से उठा ले जाना। ऐसी परिस्थिति में इतिहास न होने का दोष किसे दिया जा सकता है। रामायण में भी प्रक्षेप हैं जिसका लाभ पोलॉक उठाना चाहता है। रामायण में एक श्लोक आता है-यथा हि बुद्धस्तथा हि चौर– जैसा बुद्ध वैसा चोर, जैसी पंक्तियों के आधार पर आप रामायण को बुद्ध के बाद बताना चाहते हैं, पर पहले रामायण की प्राचीनता को प्रतिपादित करने वाले प्रमाणों का खण्डन करना होगा। जिसे शैल्डन पोलॉक का शोध स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है।

एक और महत्त्वपूर्ण शोध कार्य शैल्डन पोलॉक ने किया है, उस पर भी दृष्टिपात् करना उचित होगा। शैल्डन पोलॉक अपने शोध कार्य से इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि रामायण हिन्दुओं की मरी हुई, दबी-कुचली इच्छाओं, अपूर्ण-दामित कामवासनाओं को काव्य के माध्यम से प्रकाशित कर सन्तुष्टि पाने वाला ग्रन्थ है। इसमें दबी इच्छाओं और उनको पूर्ण करने में आने वाले भय का निरुपण किया गया है। शैल्डन पोलॉक की दृष्टि में हिन्दू समग्ररूप से विकृत काम-वासना से ग्रसित समुदाय है। यह पोलॉक ही नहीं, बहुत सारे योरोपियन अमेरिकन वर्ग के लेखक भी कहते हैं, पिछले दिनों वेन्डीडोनिगर की एक पुस्तक निकली ‘हिन्दू-एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’। इस पुस्तक में क्या होगा इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुस्तक के मुख पृष्ठ पर एक नग्न महिला पर चढ़कर कृष्ण को बांसुरी बजाते हुये दिखाया गया है। यह मनोविकृति कृष्ण की है या हिन्दुओं की अथवा वेन्डिडोनिगर और उनके साथी यूरोप, अमेरीकी शोधकर्त्ता की- यह समझना कठिन नहीं है।

पोलॉक के शोध में सारा प्रयास यह दिखाई देता है कि वह समाज को टुकड़ों में बँटा हुआ और एक-दूसरे के विरोध में खड़ा हुआ देखना चाहता है। वह संस्कृत को क्षेत्रीय भाषाओं के विरोध में, बौद्धों को हिन्दुओं के विरोध में, हिन्दुओं को मुसलमानों के विरोध में, पुरुषों को स्त्रियों के विरोध में, ब्राह्मणों को दलितों के विरोध में, सवर्णों को शूद्रों के विरोध में खड़ा करना चाहता है। सारे प्रयत्न उसके शोध के निष्कर्ष के रूप में दिखाई देते हैं। इस समाज में पोलॉक को सब कुछ खराब और घटिया दिखाई देता है। उसकी सद्भावना इतनी ही है कि वह हिन्दू समाज को इस कलंक से दूर करना चाहता है, इसलिये वह इस समाज को संस्कृत से बचने और दूर रहने की सलाह देता है, जिससे यह समाज बौद्धिक स्वतन्त्रता का अनुभव कर सके और योरोप-अमेरीका के शोध कर्त्ताओं का धन्यवाद कर सके, उनके आदर्शों पर चलकर अपना जीवन धन्य मान सके।

इस सारी शोध मानसिकता की भूमि में जो बात है वो ये कि जब संस्कृत के विचारों की शोपनहावर ने प्रशंसा की तो वह भारत पर राज्य करने वाले अंग्रेजों को अच्छी नहीं लगी। एक ओर उन्हें भारत में पैर जमाने के लिये ईसाइयत के प्रचार-प्रसार में आने वाली मुख्य बाधा संस्कृत और वेद के रूप में आ रही थी। दूसरी ओर ऊपर से योरोप में संस्कृत के, वेद-ज्ञान के प्रशंसक हों यह उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा। इसके बाद सर विलियम जोन्स ने संस्कृत का अध्ययन किया, उसमें वो अपनी नस्लीय श्रेष्ठता और बाइबिल की उच्चता को अपने मस्तिष्क से नहीं निकाल सके और इसी मानसिकता को लेकर उन्होंने जो शोध किये, पोलॉक उसी परम्परा का निर्वाहक है।

यह संस्कृ त भाषा और साहित्य का अध्ययन पहले संस्कृति स्टडी फिर तुलनात्मक व्याकरण (कम्पेरेटिव ग्रामर) कहा गया। बाद में इसका नाम भाषा विज्ञान (लिंलिंग्विस्टिक) हुआ। फिर भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के रूप में इन्डोलॉजी कहा गया। आजकल इस अध्ययन को दक्षिण एशिया के अध्ययन के रूप में साउथ एशियन स्टडी कहा जाता है। इस अध्ययन की एक ही विशेषता है, यह सारा अध्ययन शोध के लिये न होकर अपने प्रयोजन को सिद्ध करने के लिये किया जा रहा है। पहले योरोप और इंग्लैण्ड के विद्वानों ने इस अध्ययन से संस्कृत, भारतीय संस्कृति और इतिहास को अपनी तरह से व्याष्यायित करके भारतीयों को पढ़ाने का काम किया। अब अमेरिकी विद्वान् शैल्डन पोलॉक जैसे लोग भारत के संस्कृत इतिहास, संस्कृति, भाषा के विषय में हमें बताने का  प्रयास कर रहे हैं।

इस सारे शोध और अध्ययन की विशेषता है- भाषा भारत की, संस्कृ ति यहाँ की इतिहास भारतीयों का, परम्परा भारतीयों की और निर्णायक हैं मैक्समूलर और शैल्डन पोलॉक। किसी देश की इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि उसके साहित्य, इतिहास, संस्कृति की व्याख्या करने का अधिकार विदेशी और शत्रु के हाथ में हो।

यह अधिकार उन्होंने अपने हाथ में बलपूर्वक ले लिया है, क्योंकि उन्होंने इस अपने से जोड़ने वाली वस्तु भाषा को हम से छीन लिया । आज हम हमारे विषय उनकी भाषा में पढ़ते हैं तो फिर वो जैसा चाहते है। उसे वैसा ही पढ़ना और समझना भी पड़ता है, इसे कहते हैं- मियाँ जी की जूती, मियाँ जी का सर। आज हम संस्कृत को भी उन्हीं की पद्धति से पढ़ते हैं। मनुष्य अपनी भाषा बोलना और समझना पहले सीखता है। लिखना और पढ़ना बाद में आता है पर अंग्रेज हमको संस्कृत लिखना-पढ़ना पहले सिखाता है। बोलना समझना हमें आता नहीं। इसी आधार पर वह कहता है कि जिसमें बोला न जाय और बोला हुआ समझा न जाय- वह भाषा मृत भाषा है।

अन्त में शैल्डन पोलॉक का शोध समझाता है कि रामायण में कुछ भी अच्छा नहीं, सम्भवतः यह विचार भी नहीं-

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

– धर्मवीर

वेद विज्ञान के प्रचार-प्रसार में आकण्ठ डूबे एक हृदय रोग विशेषज्ञः डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा

वेद विज्ञान के प्रचार-प्रसार में आकण्ठ डूबे एक हृदय रोग विशेषज्ञः डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा M.B.B.S, M.S, M.CH. (कार्डियोवास्कुलर सर्जरी) F.I.G.S., F.I.C.C., F.I.A.S.

काडियोथोरेसिक व वास्मुलर सर्जन

अपने व्यावसायिक कार्य में अत्यधिक व्यस्तता होने पर भी कोई प्रतिष्ठित चिकित्सक वेद-विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए इतना समर्पित हो सकता है, यह अपने आप में चकित करने वाला है। उनसे मेरा परिचय कई वर्ष पूर्व बेंगलूरु में एक वैदिक विद्वान् के नाते हुआ और वह समबन्ध निरन्तर बना हुआ है। उनसे सबन्धित संक्षिप्त सा विवरण पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत है।    – समपादक

 

संक्षिप्त परिचय

डॉ. शर्मा बैगलौर में 26 वर्ष से कार्यरत सीनियर हृदय सर्जन हैं। विगत 30 वर्षों में आपने देश के विभिन्न सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में कार्य कर हजारों हृदय व वक्ष रोगियों को सर्जरी व स्वास्थ्य सेवायें प्रदान की हैं।

डॉ. शर्मा को M.B.B.S. डिग्री, सर्जरी में आर्नस के साथ (1978-79) तथा M.S. (जनरल  सर्जरी) (1982-83) से एस.एन. मेडीकल कॉलेज, आगरा विश्वविद्यालय, भारत के द्वारा समानित किया गया।

डॉ. शर्मा को M.CH..(कार्डियोवास्कुलर व थोरेसिक पोस्ट डोक्टोरल) डिग्री से 1986 में ‘‘पी.जी.आई. चण्डीगढ’’ संस्थान के द्वारा समानित किया गया।

1986 से 1988 तक डॉ. शर्मा ने ‘‘अपोलो अस्पताल चिन्नई’’ के हृदय सर्जरी विभाग में सर्जरी व स्वास्थ्य सेवायें प्रदान कीं।

1988 से 1989 तक ‘‘सैन्ट्रल इन्डिया इन्सटीट्यूट नागपुर’’ के हृदय सर्जरी विभाग को प्रारमभ किया तथा ओपन हार्ट सर्जरी सेवायें प्रारमभ की।

(1990-1995) में बैगलोर में वाई. डी. अस्पताल का हृदय सर्जरी विभाग प्रारम्भ किया व ओपन हार्ट सर्जरी प्रारम्भ की। अस्पताल के मेडीकल अधीक्षक भी रहे।

1996 में हृदय सर्जरी विभाग, सेन्ट विनसेन्ट अस्पताल पोर्टलैण्ड, यू.एस.ए. में विजिटिंग प्रोफेसर रहे तथा सर्जरी व स्वास्थ्य सेवायें प्रदान कीं।

1996 से वर्तमान समय तक बैगलौर में विभिन्न सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में हृदय सर्जरी  व स्वास्थ्य सेवायें प्रदान कर रहे हैं।

डॉ. शर्मा ने पिछले 20 वर्षों में पूरे देश व विदेशों में हृदय व वक्ष रोग चैरिटी परामर्श शिविरों में सेवायें देकर हजारों रोगियों की सर्जरी की तथा स्वास्थ्य लाभ दिया।

राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सभाओं में वक्तव्य दिये व निजी शोध कार्यों को राष्ट्रीय व अर्न्तराष्ट्रीय जनरलों में प्रकाशित किया।

कुछ निम्न पुरस्कारों से समानित किया गया

  1. रीव. एच. वैट्स फैलोशिप-हर्ट सर्जरी- 1994, 1 एक्ट के द्वारा
  2. स्टार-अहमद फैलोशिप-हर्ट सर्जरी-1995, पोर्टलैन्ड, अमेरीका
  3. ‘‘टैन आउट स्टैन्डिग यन्ग इन्डियन’’ अवार्ड-1995 मेडीकल इन्नोवेसन क्षेत्र में- जे.सी.भारत द्वारा
  4. ‘‘आउट स्टैडिंग परसन आफ वर्ल्ड’’ अवार्ड के 3 फायनलिस्ट में से एक चुने गये- जे.सी.इन्टरनेशनल शिकागो के द्वारा 1996

डॉ. शर्मा पिछले 40 वर्ष से आर्य समाज के पक्षधर हैं तथा 10 वर्ष से इन्द्रानगर आर्यसमाज बैंगलौर के ट्रस्टी हैं। पिछले 5-6 वर्ष से कार्यरत ‘‘विश्व वेद विज्ञान संस्थान’’ ट्रस्ट के संस्थापक व चैयरमैन हैं। इस ट्रस्ट का मुखय कार्य वैदिक ज्ञान-विज्ञान का सपूर्ण विश्व में प्रसार तथा शोध करना है। यज्ञ का मनुष्य, अन्य जीव व वातावरण पर प्रभाव को जानने के लिये दो विशाल यज्ञों में आधुनिक विज्ञान व मेडीकल साइन्स की सहायता से शोध किये गये। एक यज्ञ में गाय के शुद्ध घी की 6 करोड़ आहुतियाँ दी गयी थी तथा दूसरे सोमयज्ञ में 15 दिन तक शोध कार्य चला। शोध के परिणामों से हजारों डाटा लिये गये तथा विश्लेषण के बाद निश्चय किया गया कि यज्ञ के द्वारा वर्षा, वायुमण्डल शुद्धि, जीव स्वास्थ्यवर्धन तथा हानिकारक वैक्टीरिया कम हुये। डॉ. शर्मा ने वैदिक व आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का समन्वय करके बहुत सारे अनुसन्धानपरक कार्य देश-विदेश में किये हैं।

 

कर्म फल की समस्या

कर्म फल की समस्या

– श्री पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

(स्थूल रूप में तो कर्म फल व्यवस्था को प्रायः सभी मानते हैं, परन्तु सूक्ष्म रूप में चिन्तन करते समय विषय की स्पष्टता कई बार कुछ लोगों को अस्पष्ट-सी लगने लगती है, धुंधली पड़ जाती है। आर्य समाज की पुरानी पीढ़ी के मौलिक चिन्तक, विचारक एवं विद्वान् श्री पं. गंगाप्रसाद जी उपाध्याय का इस विषय में एक उपयोगी एवं प्रासांगिक लेख पाठकों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत है – समपादक)

कर्म फल की समस्या समस्त धार्मिक समस्याओं में विकटतम समझी जाती है। यह इतनी जटिल है कि बहुतों ने अपना पीछा छुड़ाने के लिए इसके मानने से इन्कार कर दिया है। ईसाई और मुसलमान भारतीयों के पुनर्जन्मवाद पर व्यङ्ग उड़ाते हुए, इसको कर्म फल की भूल-भुलइयाँ बताया करते हैं। वह समझते हैं कि इस व्यंग से वह समस्या की जटिलता से बच सकेंगे। जो लोग पुनर्जन्म को मानते हैं, उनके सिद्धान्त भी भिन्न-भिन्न हैं। हम देखते हैं कि बहुत से लोगो ंने इस विषय में अपने-अपने सिद्धान्तों की कल्पना कर ली है। ये कल्पनाऐं आगे चल कर कितनी आपत्तियाँ उत्पन्न कर देती हैं। इसका अनुभव वही लोग कर सकते हैं जिन्होंने समस्याओं के मूल तक पहुँचने का श्रम उठाया हो, यों तो मन को सान्त्वना सभी दे लेते हैं, परन्तु यह सान्त्वना स्थिर होनी चाहिए। क्षणिक सान्त्वना से कुछ काम नहीं चलता और प्रायः यह भ्रान्ति-मूलक तथा व्यवहार अवस्था में दुखदायी होती है। हम बहुत से अकर्त्तव्य कर्म इसीलिए कर बैठते हैं, या कर्त्तव्य कर्मों से जी चुराते हैं कि हमको कर्म और फल की समस्याओं का उचित ज्ञान नहीं।

पहला प्रश्न यह है कि कर्म फल की समस्या का विचार कहाँ से आरमभ किया जाए, जब तक आरमभ बिन्दु (starting point) निश्चित न हो जाए, उस समय तक हम अवश्य ही भूल भुलइयों में पड़े रहेंगे और किसी निश्चित परिणाम पर न पहुँच सकेंगे।

जिन लोगों ने कर्म फलवाद के सिद्धान्तों से इनकार कर दिया है और जो इस सिद्धान्त को मानते हैं, उनमें क्या कोई सादृश्या भी  है।

थोडी देर उनके भावों का विश्लेषण कीजिए। कर्म फलवाद का मूल सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक को दुःख और सुख अपने कर्मों द्वारा मिले। जो जैसा करे वह वैसा पावे। यह सिद्धान्त सभी लोगों को अभिमत है। यदि इससे सर्वथा इन्कार कर दिया जाए, तो संसार का कोई काम न चले। किसी पुरुष को यह सह्य नहीं है कि वह काम करे और उसका उसको फल न मिले या दूसरा आदमी काम न करे और उसको फल मिल जाए।

किसी स्कूल के विद्यार्थियों से पूछो, परीक्षा का समय है प्रश्न-पत्र हाथ में है, सभी उसको हल करने का यत्न कर रहे हैं। क्यों? इसलिए कि जो सबसे अच्छा पर्चा करेगा उसको सबसे अधिक अंक मिलेंगे। उसकी सबसे अधिक कीर्ति होगी। कल्पना कीजिए कि मोहन ने सबसे अच्छा पर्चा किया और सोहन ने सबसे बुरा। अब अगर मोहन को सबसे कम नबर मिलें और सोहन को सबसे अधिक तो इसका क्या परिणाम होगा। सोहन को हर्ष अवश्य होगा, परन्तु मोहन के जी से पूछो! मोहन कहेगा, ‘‘इस अन्धेर नगरी में रहने से क्या लाभ जिसमें टके सेर भाजी ले लो या टके सेर खाजा। मैं क्यों श्रम करूं जब मुझे कुछ नहीं मिलना।’’ सोहन की यह खुशी भी क्षणिक ही होगी। क्योंकि सोहन यह समझेगा कि बिना परिश्रम के मुझे नबर मिल सकते हैं अतः मुझे श्रम करने की क्या आवश्यकता थी। ऐसी व्यवस्था न तो अध्यापकों को सह्य होगी और न विद्यार्थियों को।

किसी कारखाने को लीजिए। एक अध्यक्ष के अधीन सैकड़ों आदमी काम करते हैं उनकी योग्यता, बुद्धि तथा श्रम के अनुकूल उनको वेतन दिया जाता है, जो अधिक योग्यता का कार्य करते हैं उनको अधिक रुपया मिलता है। जो अति साधारण कार्य करते हैं उनको वेतन भी अल्प होता है। यदि किसी कारखाने का अध्यक्ष इसके विपरीत करने लगे और अकर्मण्य को अधिक वेतन और परिश्रमशील को कम दे तो सभी कार्य-कर्त्ता निरुत्साह हो जाएँ और असन्तोष की आग कारखाने को शीघ्र ही भस्म कर दे।

किसी राज्य पर दृष्टि डलिए। राज्य क्या है! एक बड़ा भारी कारखाना है। जिसमें भिन्न-भिन्न योग्यता के भिन्न-भिन्न मनुष्य कार्य कर रहे हैं और अपने-अपने कर्मों के अनुकूल फल पा रहे हैं, सबसे उल्लंघन होता है और इस नियम की अधिक उच्छृंखलता ही उस राज्य की अधोगति का चिन्ह है।

ये तीन दृष्टान्त विद्याथियों, कारखानों और राज्य के जो हमने यहां दिए कर्मफलवाद के मानने वालों और न मानने वालों दोनों में समान ही हैं। अर्थात् इतना कर्मफलवाद सभी को माननीय है। अन्य पारलौकिक सिद्धान्त चाहे कुछ भी क्यों न हो।

यह सिद्धान्त इतना सर्वतन्त्र क्यों है? क्या कारण है कि इस सिद्धान्त से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता? शायद आप कहें कि कुछ लोग इसके विरोधी हैं। नवुयग का जो दल सामयवादी कहलाता है, वह योग्यता और श्रम पर विचार नहीं करता। वह चाहता है कि संसार के सभी मनुष्य समान सुख और समपत्ति को भोग सकें, परन्तु सामयवादी भी वस्तुतः इतने सामयवादी नहीं है कि वह कर्मफल के बन्धन को तिलांजलि दे दें। वह केवल अन्धेर नगरी को मिटाना चाहते हैं। कभी-कभी समाज इतना पतित हो जाता है कि निठल्ले लोग हलवा खाते हैं और श्रमशील भूखों मरते हैं। जब यह बात पराकाष्ठा को पहुँच जाती है तो एक समय आता है कि समाज में उसके प्रति घृणा उत्पन्न होकर सामयवाद की लहर चलती है। जहाँ-जहाँ ऐसी क्रान्ति करने की आावश्यकता पड़ी है, वहाँ वस्तुतः कर्मफल के बन्धनों से लोग मुक्त हो चुके थे। यह क्रान्ति उन बन्धनों को फिर से स्थापना के लिए ही हुई।

इससे यह सिद्ध हो गया कि यह सर्वतन्त्र ही है। कोई इससे इन्कार नहीं कर सकता। सर्वतन्त्रता बताती है कि यह सिद्धान्त सर्वव्यापी भी होना चाहिए। यह मेरे या आपके या किसी एक मनुष्य समूह के मस्तिष्क की उपज होता तो कोई न कोई तो उसका विरोधी अवश्य ही मिलता, परन्तु ऐसा नहीं है। इससे हम कह सकते हैं, कि वे नियम प्राकृतिक या अपौरुषेय हैं, मनुष्य की गढन्त नहीं।

अगर हम यह मान लें कि जैसा करेंगे वैसा ही, भोगेंगे तो यह भी मानना आवश्यक ही है जैसा भोग रहे हैं वैसा ही किया होगा, जो आज की अपेक्षा भविष्य है वह कल की अपेक्षा वर्तमान या भूत हो जायेगा और जो आज वर्तमान या भूत है, वह कुछ दिन पहले अवश्य ही भविष्य रहा होगा। यह कल्पना नहीं किन्तु अकाट्य युक्ति है जिसका खण्डन हो ही नहीं सकता।

मैं इस पिछली बात को और अधिक स्पष्ट कर दूं। हर एक ईसाई और मुसलमान को पुनर्जन्म या कर्मफलवाद मान्य नहीं। वह मानता है कि यदि धर्म के अनुकूल चलोगे, तो भविष्य में आनन्द या स्वर्ग मिलेगा और यदि अधर्म पर चलोगे तो दुःख या नरक भोगोगे। यह क्यों? इसलिए ‘‘जैसा बोवोगे वैसा काटोगे’’ का सिद्धान्त उसको अभिमत है। यदि वह ऐसा न मानें तो अपने धर्म का उपदेश क्यों करे? यदि उसके बताए हुए धर्म पर न चलने से भी सुख या स्वर्ग मिल सकता है तो उसके उपदेशों से क्या लाभ?् यह रही भविष्य की बात, परन्तु किसी ईसाई या मुसलमान  से पूछो कि तुमहारा वर्तमान अगर अभी भविष्य हो जाएगा तो क्या तुमहारा यह वर्तमान किसी भूतकाल का भविष्य न रहा होगा अर्थात् यदि आज के धार्मिक कृत्य अगले सुख का कारण हो सकते हैं तो आज के सुख किसी पिछले कर्म का फल क्यों न होंगे? या तो यह मानों कि  हमारा यह वर्तमान ऐसा वर्तमान है, जिसका भूतकाल है ही नहीं और यदि इसका कोई भी भूतकाल है, तो इन वर्तमान सुख या दुःखों का कारण अवश्य रहा होगा।

अब विचार कीजिए। आप यह मानते हैं कि हमारे आने वाले सुख या दुखों का कारण हमीं होंगे, दूसरा कोई नहीं, यदि दूसरा हो तो हम अपने कर्म में स्वाधीन नहीं। हम तो परतन्त्र हो गए। कैसे? सभवतः आप नहीं समझे, फिर सोचिए। यदि मेरे सुखों का कारण दूसरे किसी व्यक्ति के कर्म हो सकते हैं, तो मेरा सर्वस्व उस व्यक्ति के अधीन हो गया। मैं क्या कर सकता हूँ? मुझे तो उसका ही मुख ताकना चाहिए। क्योंकि जैसा वह करेगा वैसा पाऊँगा। क्या यह कर्म की स्वतन्त्रता है? कदापि नहीं, मैँ तो उसी के आश्रय हो गया जिसके कर्मों से मुझे फल मिलेगा। कल्पना कीजिए कि पिता के कर्मों का फल पुत्र के सुख या दुःख का कारण होता है। तो पुत्र अपने कर्मों में स्वतन्त्र कैसे रहा? वह तो पिता की इच्छा के अधीन हो गया। पिता चाहे तो उसके लिए दुःख का सामान कर दे और चाहे सुख का।

कुछ लोग आसानी के लिए यह मान बैठते हैं कि हमारे कुछ सुख और दुःख का कारण हमारे कर्म हैं और कुछ का हमारे पिता के कर्म, परन्तु यदि यह नियम मान लिया जाए तो यह प्रश्न उठेगा कि अपने कर्म गौण या पिता के कर्म या दोनों की प्रतिष्ठा समान रूप से है। यदि एक के कर्मों को गौण और दूसरे के कर्मों को मुखय माना जाए तो कोई व्यवस्था न बन सकेगी क्योंकि गौणता और मुखयता के लक्षण करने के लिए किसी तीसरी निरपेक्ष वस्तु की आवश्यकता होगी। समान रूप मानने का कोई अर्थ ही नहीं। क्या पिता और पुत्र के कर्म का एक ही मूल्य है और यदि है तो क्यों? सारांश यह है कि इस सिद्धान्त के मानने में इतनी आपत्तियाँ हैं कि हम को इससे कुछ भी शान्ति नहीं मिल सकती।

अच्छा तो यह मान ही लेना पड़ा कि हमारे वर्तमान अच्छे या बुरे कर्मों का फल आगे के सुख या दुःख के रूप में मिलेगा। अब प्रश्न रहा वर्तमान के सुख और दुःख का। यह सुख और दुःख हम भोग रहे हैं हमारे ही कर्मों का फल होना चाहिए। न्याय दर्शन में कहा भी हैः-

पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः।। (3-2-60)

अर्थात् पहले किये हुये कर्मों के फल से शरीर आदि की उत्पत्ति होती है।

हम जब से उत्पन्न होते हैं उसी समय से दुःख या सुख हमको होते रहते हैं।

पापों से छुटकारा और महर्षि दयानन्द

पापों से छुटकारा और महर्षि दयानन्द

– पं. महामुनि शास्त्री विद्याभास्कर

[यह लेख आर्य मर्यादा साप्ताहिक के 28 फरवरी 1971 के अंक में प्रकाशित हुआ था। सैद्धान्तिक दृष्टि से लेख की उपयोगिता को देखते हुए, पाठकों के लाभार्थ हमने प्रस्तुत किया है।  – समपादक]

[27 सितबर 1970 के ‘आर्य मित्र’ में श्री पं. मदन मोहन जी विद्यासागर महर्षि दयानन्द मार्ग हैदराबाद के ‘पापों को क्षमा कर’ नामक लेख के उत्तर में]

स्वाध्यायशील आर्य जनों को सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के पठन-पाठन से महर्षि दयानन्द जी का निमनलिखित मन्तव्य सूर्य प्रकाशवत् विदित है- ‘जो मनुष्य जैसा शुभ-अशुभ कर्म करता है, वह उसके तदनुरूप फल को अवश्य प्राप्त करता है। कोई भी कृतकर्म निष्फल नहीं जाता। किया हुआ शुभाशुभ कर्म का फल यथाकाल समय पर कर्ता को भोगना ही पड़ता है।

कर्मफल स्वयमेव नहीं मिलता, उसको देने वाला परमेश्वर है। वह किसी के साथ पक्षपात (रियायत व ज्यादती) नहीं करता। कर्मानुसार यथोचित व्यवहार करता है। इत्यादि।

परन्तु कहीं-कहीं ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना के प्रकरण में श्रद्धालु विचारशील साधकों को ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी जी महाराज भी अपने पूर्वोक्त सिद्धान्त के विपरीत अन्य पन्थाइयों के समान कह रहे हैं। इसका समाधान होना चाहिये।

इसलिये ‘पाप को क्षमा कर’ नामक लेख में प्रदर्शित स्थलों के सबन्ध में भी समाधान प्रस्तुत किये जाते हैं।

प्रथम विचारशील जनों को यह बात हृदयङ्गम कर लेनी (समझ लेनी) चाहिये कि भाषा की रचना विद्वान् जन प्रतिपाद्य विषय के अनुरूप ही किया करते हैं। प्रत्येक विषय का अपना-अपना उद्देश्य होता है, वह उद्देश्य सतत् (उस-उस) विषय की भाषा से पूर्ण होना चाहिये, इसी में वक्ता की सफलता समझी जाती है।

महर्षि दयानन्द जी का बनाया हुआ ‘आर्याभिविनय’ नामक ग्रन्थ ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना रूप विषय का प्रतिपादक है।

स्तुति कहते हैं- गुण-कीर्तन (गुणवर्णन) को, प्रार्थना=माँगना याचना, उपासना= समीपस्थिति (समीप होना) अर्थात् ईश्वर के स्वरूप में मग्न होना। स्तुति से ईश्वर के प्रति प्रेमभाव की उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। प्रार्थना से निरभिमानिता, सामर्थ्य और सहायता की प्राप्ति होती है। उपासना से तल्लीनता (ईश्वर के स्वरूप में मग्न हो जाना) और ईश्वरीय गुणों की प्राप्ति होती है।

दूसरी बात यह भी ध्यान में रखनी चाहिये कि अभिविनय (ईश्वर के प्रति नम्रता प्रदर्शन वा ईश्वर को सर्वव्यापक समझ कर आत्म समर्पण आदि) में भाषा के भावों को सिद्धान्तानुसार ढ़ालना (निकालना) चाहिये। अभिविनय के शदों से किन्हीं सिद्धान्त विशेषों का निर्माण करना (निकालना) अनुचित होगा। अर्थात् जहाँ-जहाँ सिद्धान्त की भाषा में और अभिविनय की भाषा में विरोधाभास (विरोध प्रतीत) हो, वहाँ विरोधपरिहारार्थ (विरोध दूर करने के लिए) अभिविनय की भाषा के भावों को ही सिद्धान्तानुसार ढ़ालना (निकालना) होगा, क्योंकि अभिविनय (स्तुति प्रार्थना) की भाषा काव्यमयी (चमत्कारपूर्ण) लचक वाली हुवा करती है तथा सिद्धान्त की भाषा सदा कठोर (दृढ़) और अपरिवर्तनशील होती है।

मान्यवर विद्वान् पं. विद्यासागर जी ने आर्याभिविनय के चारस्थल शंकनीय समझकर विचारार्थ प्रस्तुत किये हैं। अब उन पर क्रमशः विचार किया जाता है।

  1. 1. आर्याभिविनय की द्वितीय प्रकाश के प्रथम मन्त्र की व्याखया में लिखा है- ‘[मनसा वाचा कर्मणा अज्ञानेन प्रमादेन वा सद् यत् पापे कृतं मया, तत्तत् सर्वं कृपया क्षमस्य। ज्ञानपूर्वकपापकरणान्निवर्त्तय माम्। मन से, वाणी से और कर्म से अज्ञान वा प्रमाद से जो-जो पाप किया हो, किंवा करने का हो, उस-उस मेरे पाप को क्षमा कर (और) ज्ञानपूर्वक पाप करने से भी मुझे रोक दे।] जिससे शुद्ध होके मैं आपकी सेवा में स्थित होऊँ।’

समाधान पूर्वोक्त सन्दर्भ में शंकराऽस्पद (शंका का विषय) पद ‘क्षमस्व’ (क्षमा कर) है। महाभाष्यकार आचार्य पतञ्जलि जी का वचन है- ‘अनेकार्था अपि धातवो भवन्ति।’ अर्थात् ‘धातूनामनेकार्थाः’। इसका भाव यह है कि धातु पाठ में जो धात्वर्थ (धातुओं के अर्थ) आचार्य पाणिनि जी ने लिखे हैं केवल वही अर्थ उन धातुओं के नहीं है अपितु उन अर्थों से भिन्न भी अनेक अर्थ उन धातुओं के होते हैं। वे प्रकरणानुसार विद्वानों को समझ लेने चाहिये। धातुपाठ के वादिगण में ‘क्षमूष् सहने’ ऐसा पढ़ा है तथा सह् धातु का अर्थ- ‘षहमर्षणे’ ऐसा पढ़ा है। मर्षण शबद के अनेक अर्थों में एक अर्थ पृथक्करण= दूर करना परे हटाना (जुदा करना) भी है। जैसे सन्ध्या के ‘अघमर्षण’ मन्त्रों का अर्थ करते हुए ‘मर्षण’ पद का यही पूर्वोक्त अर्थ (दूर करना) स्वामी जी महाराज ने किया है।

पाप का दूरीकरण वा छुड़ाना क्या है? अकृत पाप को अपने पास अर्थात् मन में भी न आने देना, तथा कृत पाप का पुनः (दो बार तीन बार आदि) न होने देना ही पाप का दूरी करण है।

‘क्षमस्व’ इस क्रिया पद से पूर्व ‘कृपया’ पद भी पठित है जिसका अर्थ है ‘सामर्थ्य के द्वारा’ ईश्वर की सामर्थ्य क्या है? प्राकृतिक नियम ही ईश्वर की सामर्थ्य है। इस विषय में (सुख-दुःख प्राप्ति के सबन्ध में प्राकृतिक (ईश्वरीय) नियम है- ‘धर्मात् सुखम् अधर्माद् दुःखम्’ अर्थात् धर्माचरण से सुख प्राप्ति और अधर्माचरण से दुःख प्राप्ति होना। नियम तोड़ना वा नियम विरुद्ध करना ईश्वर की सामर्थ्य नहीं है। इसलिए ‘क्षमस्व’ पद का अर्थ कृत (किये हुए) पाप कर्म के फल को ‘माफ कर दो= न दो- नष्ट कर दो’ ऐसा समझना भूल है। क्योंकि पूर्वोक्त अर्थ का स्पष्टीकरण (खुलासा) स्वामी जी महाराज ने स्वयमेव इसी वाक्य के अन्तिम पद ‘निवारयतु’ से कर दिया है। अर्थात् ‘क्षमस्व’ और ‘निवारण’ दोनों पद यहाँ पर्यायवाची (एकार्थक) हैं। हिन्दी भाषार्थ में जो ‘क्षमस्व’ का ‘क्षमा कर’ किया है, यहाँ भी क्षमा का अर्थ निवारण (दूर करना) ही उपयुक्त (ठीक) है, क्योंकि भाषार्थ में एक वाक्यांश है- ‘किंवा करने का हो’। जो पाप कर्म अभी तक कर्मणा वाचा मनसा (कर्म वाणी व मन से) किया ही नहीं है, उसको क्षमा कर अर्थात् उसका फल न दो, माफ कर दो, नष्ट कर दो, यह करने का क्या अर्थ? क्षमा का निवारण अर्थ स्वीकार करने पर तो अर्थ की संगति बैठ जाती है, उसका निवारण यही है कि- वह हमारे पास कभी न आने पावे, उसकी मन से भी किञ्चित् इच्छा भी न हो।

अन्यच्च- यहाँ (इस प्रकरण में) ‘क्षमस्व’ (क्षमा) का अर्थ निवारण न मानकर ‘फल न देना’ मानने पर अग्रिम (अगला) वाक्य ‘जिससे शुद्ध होके…’ इत्यादि असंगत हो जावेगा, क्योंकि आत्मा की शुद्धि (निर्मलता) ज्ञानपूर्वक पाप कर्म के त्याग करने से ही हो सकती है। पाप करने और उसका फल न मिलने से तो पापाचरण अधिक होकर आत्मा की मलिनता घटने की अपेक्षा अधिक बढ़ेगी। दुःखित होने पर ही मनुष्य दुःख के कारण को दूर करने का प्रयत्न करत है, अन्यथा नहीं।

इसलिये यहाँ पर क्षमा का अर्थ ‘दूर करना’ अर्थात् निवारण ही वक्ता को अभिप्रेत है। ऐसा समझना चाहिये। क्षमा के निवारण अर्थमें वेद का भी प्रमाण है। तद्यथा-

ओम् शं च नो मयश्च नो मा चनः किञ्चनाममत्।

क्षमारपो विश्वं नो अस्तु भेषजं सर्वं नो अस्तु भेषजम्।।

– अथर्व. काण्ड 6, सूक्त 57, मन्त्र 3

इस मन्त्र में पठित ‘क्षमा’ पद का अर्थ ‘क्षम्’ धातु का अर्थ निवारण (उपशमन) अर्थ ही संगत बैठता है। ऐसा ही अर्थ सायणाचार्य और पं. क्षेमकरण दास जी आदि भाष्यकारों ने भी किया है।

मनुस्मृति का प्रमाण-

क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वासो दानेनानिसृकारिणः।

प्रच्छन्नपापा जप्पेन तपसा वेदवित्तमाः।

– मनु. अ. 5, श्लोक 107।

संस्कारविधि गृहाश्रम प्रकरण।

‘विद्वान् लोग क्षमा से शुद्ध होते हैं।’ यहाँ भी क्षमा का अर्थ कुकाम, कुक्रोध, कुलोभ आदि मानसिक विकारों का उपशमन अर्थात् मन से पृथक्करण (दूर हटाना) अर्थ ही अभिप्रेत है।

  1. द्वितीय शंका स्थल- ‘आप जिसको चाहो उसकी ऐश्वर्य देओ’। आ.द्वि.प्र.मं. 11 इस पर अन्य टिप्पणी मान्यवर पण्डित जी ने नहीं लिखी (की)। मेरे विचार में इस वाक्य को इसलिए शंकित समझा गया है कि इससे यह ध्वनित होता है कि कर्मफल देना, न देना, न्यूनाधिक देना तथा कर्म किये बिना भी अच्छा-बुरा फल दे देना ईश्वराधीन है। जैसे ईसाई, मुसलमान आदि मतवादी मानते हैं कि ईश्वर स्वतन्त्र है, वह अपनी इच्छा से सब कुछ कर सकता है। इत्यादि।

समाधान ‘आप जिसको चाहो, उसको ऐश्वर्य देओ।’ इस वाक्य से पूर्व (प्रथम) और ऊपर (पश्चात्) वाक्य इस प्रकार है-

‘आप के ही स्वाधीन सकल ऐश्वर्य है। अन्य किसी के नहीं। आप जिसको चाहो, उसको ऐश्वर्य देओ। सो आप कृपा से हम लोगों का दारिद्रय छेदन करके हमको परमैश्वर्य वाले करे, क्योंकि ऐश्वर्य के प्रेरक आप ही हैं।’ यहाँ प्रथम वाक्य में- ‘आप के ही स्वाधीन सकल ऐश्वर्य है’ इस वाक्य में ‘आप के ही आधीन…. है’ ऐसा कथन न करके ‘स्व’ शबद जो अधिक सन्निवेश किया है, उसका यह अर्थ (अभिप्राय) है- आपका जो ‘स्व= प्राकृतिक (ईश्वरीय) नियम, उसके आधीन सकल ऐश्वर्य है तथा ‘सो आप कृपा से इत्यादि वाक्य में कृपा से’ (कृपया) पद भी पूर्वोक्त नियम का ही बोधक है। किसी को ऐश्वर्य देने और न देने के विषय में ईश्वरीय नियम क्या है? इस विषय में आर्ष वचन है।

  1. ‘न ऋते श्रान्तस्य सयाय देवाः’।
  2. ‘इन्द्र इच्चरतः सखा।’ इत्यादि।
  3. अर्थ- जब तक मनुष्य किसी प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये पूर्ण (शक्तिभर) परिश्रम करके सर्वथा श्रान्त (थका हुआ) नहीं हो जाता, तब तक परमदेव परमात्मा उसकी मित्रता के लिए अभिमुख नहीं होता अर्थात् उसको मनोवाञ्चित फल नहीं देता।
  4. इन्द्र= ऐश्वर्य का दाता परमेश्वर परिश्रम करने वाले का ही मित्र है, आलसी, प्रमादी का नहीं। इत्यादि आर्ष वचनों को जानता हुआ ही ज्ञानी भक्त ज्ञानूर्वक परिश्रम (उद्योग) करता है। उसको दृढ़ विश्वास है कि मेरा भगवान् न्यायकारी है, मेरे परिश्रम का फल अवश्य देगा।

किंवा वस्तुतः चाहना (इच्छा करना) ईश्वर में घटता ही नहीं, क्योंकि ईश्वर तो सर्वज्ञ, सर्वव्यापक होने से आप्तकाम है। इच्छा करने वाला (अपूर्णमनोरथ) तो एक देशी (परिछिन्न) अल्पज्ञ अल्प शक्ति जीव है। उसी का गुण इच्छा है। ईश्वर में इच्छा गुण नहीं घट सकता। अतः ‘जिसको चाहो’ का अर्थ (अभिप्राय) होगा- ‘जिसको आप अधिकारी समझो’ उसको ऐश्वर्य दीजिये।

  1. तृतीय शंका स्थल-जैसी आपकी इच्छा हो वैसा हमारे लिए आप कीजिये ‘आ. द्वितीय प्रकाश’ मन्त्र 13.

समाधान स्वकीय आयु प्राण इन्द्रिय, मन, बुद्धि, आत्मा आदि सर्वस्व का समर्पण करने के पश्चात् ही ये पूर्वोक्त शबद ज्ञानी भक्त ने कहे हैं। यहाँ तो स्पष्ट रूप से इच्छा शबद का अर्थ (भाव) न्याय (नियम) ही है, इन शबदों से भक्त का भगवान् के न्याय के प्रति पूर्ण विश्वास ही प्रकट होता है।

  1. चतुर्थ शंका स्थल- आ.द्वि.प्र. 17वें मन्त्र में पठित ‘अङ् घारि’ और ‘मार्जालीयः’ इन पदों के अर्थ हैं यथा-

‘अङ्घारिः’= स्व भक्तों का जो अघ (पाप) उसके अरि (शत्रु) हो। उस समस्त पाप के नाशक हो।

मार्जालीय= पापों का मार्जन (निवारण) करने वाले आप ही हो। अन्य कोई नहीं।

समाधान जिस प्रकार बीज से वृक्ष पैदा होता है और वृक्ष से पुनः उसका उत्पादक बीज बन जाता है। उसी प्रकार कुसंस्कार से कदाचार (कुकर्म) होता है तथा उस कदाचार से पुनः तत्सदृश कुसंस्कार बन जाता है, उस कुसंस्कार से पुनरपि कदाचार होगा।

यहाँ उसी कुसंस्कार आदि पाप को अंहस् (वा अघ) शबद से कहा गया है। उस कुसंस्कार आदि पाप का शत्रु= शातयिता छिन्न-भिन्न करने वाला अर्थात् नाशक परमात्मा ही है, क्योंकि परमेश्वर की उपासना के बिना कुसंस्कार आदि पापों का सर्वथा नाश नहीं हो सकता। उसकी उपासना से ही पापकर्म मूल सहित छिन्न-भिन्न वा भस्मीभूत हो सकता है। इसीलिये स्वामी जी महाराज ने मन्त्रार्थ में- ‘उस (कारण कार्य रूप सूक्ष्म स्थूल) समस्त पाप के नाशक हो।’ ऐसा कहा है।

मार्जालीयः= पापों का मार्जन, शोधन, निवारण वा पृथक् करण का भाव यही है कि जो दुष्ट कर्म हम से हो जाते हैं, जिनको हम अपने लिए हानिकारक  (अनिष्टकर) समझते हैं, परन्तु अज्ञान, प्रमाद आदि दोषों (कमजोरियों) के कारण हमसे बार-बार हो जाते ळैं, उनको हमसे छुड़ाने वाले अर्थात् वे पाप कर्म हमसे फिर कभी न हो, ऐसा हम परमात्मा की सहायता (ज्ञान व शक्ति की प्राप्ति) से ही कर सकते हैं। यह भाव है। जो परमात्मा के न्याय पर पूर्ण विश्वास करके उसकी वेदोक्त आज्ञाओं का पालन करने वाला है, वही वास्तव में परमात्मा का भक्त है (उसको ही परमात्मा का भक्त कहना चाहिये) ऐसा भक्त यह कभी नहीं सोच सकता कि वेद (ईश्वरीय नियम) विरुद्ध आचरण तो करता रहूँ, परन्तु उसका कुफल मुझे न मिले अथवा उस कुफल को ईश्वर नष्ट कर देवे वा ईश्वर उसको नष्ट कर सकता है।

  1. पच्चम शंका स्थल- ‘हम सब मनुष्यों के भी पाप दूर करने वाले एक आप ही दयामय पिता हो, हे महा अनन्त विद्य! जो-जो मैंने विद्वान् वा अविद्वान् होके (अर्थात् जाने-अनजाने) पाप किया हो, उन सब पापों का छोड़ने वाला आपके बिना कोई भी इस संसार में हमारा कारण नहीं।’ (आ.2, यप्र.मं. 18) इन वाक्यों में भी वही पाप क्षमा की बात कही गई है।

समाधान इस पूर्वोक्त (ऊपर लिखे) आर्य मित्र में छपे पाठ में तथा आर्याभिविनय ग्रन्थ के पाठ में कुछ अन्तर (मिलता) है। तद्यथा- ‘और हम सब मनुष्यों को भी पाप से दूर रखने वाले एक आप ही दयामय पिता हो, हे महाऽनन्तविद्य! जो-जो मैंने विद्वान् वा अविद्वान् होके पाप किया हो, उन सब पापों का छुड़ाने वाला आपके बिना कोई भी इस संसार में हमारा शरण नहीं है। इस हमारे अविद्या आदि सब पाप छुड़ा के शीघ्र हमको शुद्ध करो।’ (आ. 2 यप्र. मं. 19वाँ) मनुष्यों के पाप दूर करने में और मनुष्यों को पाप से दूर रखने में किञ्चित अन्तर (मिलता) है।

प्रथम में तो चोरी, जारी, शराब से खोरी, मिथ्या व्यवहार आदि बुरी आदतें- (कर्म) जिनमें मनुष्य ग्रस्त है, उनका छुड़ाना अभिप्रेत है।

द्वितीय में जो बुरे कर्म (बुरी आदत) मनुष्य से अभी तक समबद्ध नहीं है, जिनमें फंसना समभव है, उनसे मनुष्य बचा रहे, कभी लिप्त न हो। यह भाव है। दोनों कार्य शुभ (अच्छे) हैं। दोनों के उपाय भी भिन्न-भिन्न हैं। आगामिनी (आने वाली) बुराई (पापकर्म) के कुफल (बुरा परिणाम) समझा कर अत्यन्त प्रत्यक्ष दिखाकर (उदाहरण द्वारा पुष्ट करके) पापकर्म से मनुष्य को दूर रक्खा जा सकता है तथा उस पापकर्म से विपरीत शुभ कर्म के अच्छे परिणाम उदाहरण आदि द्वारा समझाकर शुभ कर्म में प्रेरित करके भी पापकर्म से मनुष्य को पृथक् रखा जा सकता है।

इसी प्रकार मनुष्य से समबन्ध पापकर्म को छोड़ने के भी अनेक उपाय हैं। कुछ मनुष्य प्रेमपूर्वक समझाने मात्र से ही बुराई करना छोड़ देते हैं और अच्छे कर्म करने लग जाते हैं। कुछ मनुष्य पापकर्म के कठोर भाषा में भयङ्कर परिमाण दिखाने से बुरा कर्म त्याग देते हैं। कुछ मनुष्य ताड़ना आदि कठोर उपायों का अवलमबन (आश्रय) करने से बुरा कर्म छोड़ जाते हैं। पूर्वोक्त सभी उपाय पाप छुड़ाने वाले ही कहे जाते हैं। इसी प्रकार परमात्मा भी अनेक उपायों से यथायोग्य रीति से मनुष्यों को पापों से दूर रखता है और अनेक पापों को छुड़ाता है।

आशा है मेरे पूर्वोक्त समाधानों से विचारशील स्वाध्यायशील श्री मान्यवर पं. मदनमोहन जी विद्यासागर आदि सज्जन महाशयों की कुछ सन्तुष्टि हुई होगी। आशा है इसी रीति से, इसी प्रकार के अन्य सन्देहास्पद स्थलों का भी समाधान विद्वान् जन कर लेवेंगे। इति।

 

स्वतन्त्रता-दिवस पर ऋषि दयानन्द का उल्लेख न होना भय या अज्ञान

स्वतन्त्रता-दिवस पर ऋषि दयानन्द का उल्लेख न होना भय या अज्ञान

अभी-अभी देश ने स्वतन्त्रता-दिवस उत्साहपूर्वक मनाया। कांग्रेस की सरकार स्वतन्त्रता-दिवस को नेहरू-गांधी तक सीमित रखने का प्रयास करती थी। नेहरू परिवार को ही देश मान बैठी थी। मोदी सरकार के आने से इस विचार में परिवर्तन आया है। आज देश के क्रान्तिकारियों का, साधु-सन्तों का, देश के महापुरुषों का उल्लेख सरकारी कार्यक्रमों में होने लगा है। सावरकर, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे लोगों को सरकार ने अछूत समझ रखा था, आज उनका समानपूर्वक उल्लेख होता है। उनके चित्र दिखाये जाते हैं।

इस वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर आजादी नाम से एक चित्र पन्द्रह अगस्त को दूरदर्शन पर दिखाया जा रहा था। उसमें बहुत सारे क्रान्तिकारियों, महापुरुषों, राजनेताओं के चित्र गीत-संगीत की पृष्ठभूमि में चल रहे थे। प्रस्तुति बहुत अच्छी थी, उसमें शंकराचार्य और स्वामी विवेकानन्द के चित्र थे। अन्य धार्मिक महापुरुषों के भी चित्रों की झलक थी। राजनेताओं की चर्चा देश के साथ स्वाभाविक है। इस सबमें एक खटकने वाली बात लगी कि कहीं भी ऋषि दयानन्द का उल्लेख इसमें दिखाई नहीं दिया।

लाल किले की प्राचीर से भाषण प्रारभ करते हुए तथा भाषण के मध्य प्रधानमन्त्री मोदी ने बहुत सारे व्यक्तियों का नामोल्लेख किया। महात्मा गांधी के गुरु की अंहिसा की परिभाषा बताई। आचार्य रामानुज के समाज सेवा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए ऊँच-नीच के भेद, अस्पृश्यता सबन्धी उनके विचारों का उल्लेख भी किया। पंजाब के चुनावों को ध्यान में रखते हुए गुरु गोविन्द सिंह की साड़े तीन सौ वीं जयन्ती का एकाधिक बार नाम लिया। भाषण प्रारमभ करते हुए विवेकानन्द को वेद से भी जोड़ दिया, जबकि बेचारे विवेकानन्द का वेद से कितना समबन्ध है, यह वेद जानने वाले भली प्रकार जानते हैं। हमारे हिन्दुत्त्ववादी विवेकानन्द के विचारों को ही वेद समझ लें, तो इनका कोई दोष नहीं है।

आश्चर्य की बात तो ये है कि जब आप आचार्य रामानुज की बात कर रहे हैं, आचार्य शंकर का नाम ले रहे हैं, गुरु गोविन्दसिंह की चर्चा हो रही है, वेद का प्रकरण चल रहा है, तब ऋषि दयानन्द इस चर्चा से कैसे ओझल हो गये? दुनियाँ में दयानन्द को कोई किसी से जोड़े या न जोड़े परन्तु वर्तमान युग में वेद और दयानन्द पर्याय हैं। आप दयानन्द के विरोध में खड़े हैं तो भी दयानन्द साथ होंगे और वेद के समर्थन में खड़े हैं तो भी दयानन्द के साथ होंगे। विदेशी दयानन्द के विरोधी हों, ये स्वाभाविक है, क्योंकि उन्हें दयानन्द का विचार अपने अनुकूल नहीं लगता। ईसाई या मुसलमान दयानन्द का विरोध करें, तो भी तर्क संगत है, क्योंकि दयानन्द ने उनके धर्म और दर्शन की धज्जियाँ उड़ाने में कसर नहीं छोड़ी, परन्तु हिन्दू समाज की मिथ्या बातों का, पाखण्डों का, अन्धविश्वासों का खण्डन करके दयानन्द ने उनका भला ही किया है, उनका सुधार किया, इनके प्रयत्नों से हिन्दू समाज की प्रतिष्ठा बढ़ी है। आज हिन्दुओं की सरकार कही जाती है, परन्तु जो हिन्दू सहनशीलता के नाम पर मुसलमान, पीर, फकीरों की कब्रों को स्वीकार करता है, नास्तिक चार्वाक और आज के चार्वाक ओशो का आदर करता है, वही तथाकथित हिन्दू समाज दयानन्द को सहन करने का साहस नहीं रखता। दयानन्द के काल में दयानन्द की जय ने पाखण्डियों के मन में भय को उत्पन्न किया था, लगता है वह भय अभी भी नहीं गया है, यह भय ही दयानन्द की जय है।

मोदी के भाषण में जहाँ भाषा और अभिव्यक्ति तो अच्छी है, परन्तु एकरूपता के विशृंखलन का अनुभव हुआ। इसका कारण ये कि जिन लोगों ने इस भाषण को तैयार किया है, उन्होंने अपने-अपने विषय तो लिखे, परन्तु सब को एक क्रम में  संजोना उन्हें नहीं आया।

जिन महापुरुषों ने देश-सेवा के कार्य किये हैं, वे प्रशंसनीय हैं। उनके कार्यों पर विचार करते हुए ऋषि दयानन्द के कार्यों पर दृष्टि डाली जाये तो कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें ऋषि की भूमिका महत्त्वपूर्ण न हो, इस देश के दीन-अनाथों की पीड़ा को ऋषि ने कैसा अनुभव किया था, इसे जानना हो तो उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा के स्वीकार-पत्र को देखना चाहिए, जहाँ ऋषि ने सभा के नियम व उद्देश्यों की चर्चा करते हुए तीसरे उद्देश्य में सभा द्वारा आर्यावर्तीय दीन-अनाथों की रक्षा और पालना करने की बात की है। आज नेता लोग जिस दलित को हथियार बनाकर अपनी राजनीति चमका रहे हैं, उस दलित की पीड़ा को ये नेता तो अनुभव नहीं कर सकते, परन्तु ऋषि ने उस पीड़ा को अनुभव करते हुए आदेश दिया था कि हमारे देश की शिक्षा-व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें एक गरीब और राजा के बच्चे के लिये समान आसन, भोजन, शिक्षा का निर्देश दिया हो।

ऋषि दयानन्द ने हिन्दू समाज को बल प्रदान किया। यह समाज अपने अन्दर व्याप्त पाखण्ड, कुरीतियों और अन्धविश्वास से जकड़ा हुआ था। समाज स्वार्थवश परस्पर के वैर-विरोध से विभाजित और दुर्बल भी था। ऐसे समय में ईसाई और इस्लाम के हिन्दू समाज पर आक्रमण निरन्तर हो रहे थे। इस परिस्थिति को देखकर ऋषि दयानन्द ने इस समाज को बचाने के लिये दो प्रकार से कार्य किया, प्रथम- इस देश में संस्कृति, साहित्य, इतिहास के माध्यम से इस समाज की अस्मिता को जगाया और समाज में व्याप्त कुरीतियों का जोरदार खण्डन किया। कुरीति और अन्धविश्वास की चपेट में इस्लाम और ईसाइयत भी थे, ऋषि ने उन पर भी आक्रामक रूप से प्रहार किये, उनके साथ शास्त्रार्थ किये। साहित्य के माध्यम से बाइबिल और कुरान की अज्ञानता, पाखण्ड, झूठ का भाण्डाफोड़ किया, जिससे एक ओर हिन्दू समाज में सुधार प्रारमभ हुआ, साथ ही आत्मबल के आने से समाज बचाव के स्थान पर आक्रमण की मुद्रा में आ गया। इस भावना ने पराधीनता से संघर्ष करने और स्वतन्त्रता की इच्छा को प्रबल रूप से जगा दिया।

दयानन्द ने समाज में फैले जातिवाद पर प्रहार किया। मनुष्य में मनुष्यता के रूप में कोई भेद, ऊँच-नीच मानने से इन्कार कर दिया। समाज में ऊँचनीच की भावना को जन्म देता है- अवतारवाद। जातिवादी श्रेष्ठता को बल देता है, अतः ऋषि ने अवतारवाद का खण्डन किया। जड़-पूजा से मनुष्य अकर्मण्य, भाग्यवादी और दीन-हीन याचक बन जाता है। ऋषि ने हिन्दू समाज के पतन के कारण- इस जड़-पूजा पर कठोर प्रहार किया। जिन लोगों के स्वार्थ और आजीविका इस जड़ पूजा से जुड़े हैं, उनका ऋषि-विरोधी होना स्वाभाविक है। आज जड़ताओं को जो लोग हिन्दू धर्म का अंग बनाकर रखना चाहते हैं, उनको ऋषि दयानन्द के नाम से भय लगता है। उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और आजीविका जाने का भय सताता रहता है।

ऋषि दयानन्द समाज के पिछड़े, दलित और उपेक्षित लोगों के कल्याण के लिये सतत् प्रयत्नशील रहे। ऋषि दयानन्द के मानवीय पक्ष को वे लोग अनुभव कर सकते हैं, जिन्होंने ऋषि के उस ज्ञापन को देखा हो, जिसमें सरकार से माँग की गई कि जो सन्तानें अवैध कही जाकर उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार हैं, वे निर्दोष हैं। वे प्रकृति के नियम से उत्पन्न हैं, यदि मनुष्य के बनाये नियमों को मनुष्य ने तोड़ा है तो उसके लिये निर्दोष सन्तान को क्यों उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए? ऋषि ने पिछड़े पुरुष, महिला, अनाथ, दलित के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदला। दयानन्द की उपेक्षा कृतघ्नता होगी। ये कृतघ्नता हमारे व समाज के लिये ही हानिकारक सिद्ध होगी, ऋषि दयानन्द ने तो स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश में निर्भीक होकर कहा है-

निन्दन्तु नीति-निपुणा यदि वा स्तुवन्तु,

लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,

न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।।

– धर्मवीर