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भगवान आर्यों को पहली लगन लगा दे | रचयिता पं.स्त्यपाल पथिक

 

 

 

 

Lekhram

भगवान आर्यों को पहली लगन लगा दे |

वैदिक धर्म की खातिर मिटना इन्हें सिखा दे ||

फिर राम कृष्ण निकलें घर-घर गली-गली से |

अर्जुन व कर्ण जैसे योद्धा रणस्थली से ||

भीष्म से ब्रह्मचारी और भीम महाबली से |

गौतम कणाद जैमिनी ऋषिवर पतंजलि से ||

फिर से कोई दयानंद जैसा ऋषि दिखा दे |

भगवान आर्यों को पहली लगन लगा दे ||

ऐसे हों लाल पैदा खेलें जो गोलियों से |

भूमि को तृप्त करदें श्रद्धा की झोलियों से ||

गूंजे यह देश मेरा शेरो की बोलियों से |

बिस्मिल गुरु भगत सिंह वीरों की टोलियों से ||

इन को वतन की खातिर फांसी पे भी हँसा दे |

भगवान आर्यों को पहली लगन लगा दे ||

कोई लेखराम जैसा गुरुदत्त सा आज होवे |

कोई श्रद्धानन्द होवे कोई हंसराज होवे ||

बढती बीमारियों का फिर से इलाज होवे |

नेतृत्व जिनका पाकर उन्नत समाज होवे ||

बेधड़क लाजपत सा फिर से पथिक बना दे |

भगवान आर्यों को पहली लगन लगा दे ||

वैदिक धर्म की खातिर मिटना इन्हें सिखा दे ||

भगवान आर्यों को पहली लगन लगा दे |

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प्रार्थना : सचिन शर्मा

Krishan

ओ३म् सर्वव्यापी समर्थ तुम्हें कोटिशः प्रणाम सम्पूर्ण क्रियाओ के कर्ता-कारण-कार्य तुम्ही हो वृहद सृष्टि के धार्य-व्याप्य- परिहार्य तुम्ही हो सर्वसौख्य-सम्पन्न-सृष्टि के सृष्टा अभियंता सदजन को अंतिम-अविरल स्वीकार्य तुम्ही हो निर्विशेष-नवनित्य- निरंजन – पुरुष पुरातन नित्य असंख्य नेत्रो वाले तुम्हें कोटिशः प्रणाम हे अनादि-अविनाशी आदि और अंत रहित हो अंतर्यामी-अव्यय-अमित-अतुल-अपरिमित हो सर्वशक्तिसम्पन्न-सौख्यप्रद-सुधर्म-संस्थापक वायु-वरुण-आदित्य विविध नामो से मंडित हो दुर्निरीक्ष – दुसाध्य – दुर्गम अज-मुक्तिप्रदाता सर्वत्र-समान-सर्वव्यापी हे तुम्हें कोटिश: प्रणाम ऋग-यजु-अर्थव-साम शास्त्र सब तुमको गाते स्तुति-स्रोत-भजन-यज्यादि से तुम्हें मनाते निराकार हे निर्विकार आप बिन जग निर्वश है अनघ सृष्टि-ग्रह-दिवस निशा आपके ही वश है पावन-परमानन्द-सत्यचित हे परमात्मन तज आपको अन्य की पूजा विष है व्यर्थ है अश्रुपुरित नेत्रो संग तुम्हें कोटिशः प्रणाम आप अभेद-अखंड-अभय-अक्लेद्य अकलुष हो अकथनीय -आनंदपूर्ण- अज- आदिपुरुष हो तेजरूप-तमनाशक, सत्य-प्रकाशक वेद-प्रणेता कृपा करो ,हम करे वही तुम जिससे खुश हो आर्यों के सर्वस्व परमाश्रय-परमधाम हे जीवन के हर पल हर क्षण मे तुम्हें कोटिशः प्रणाम ………..

اوم ہی جیون ہمارا

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اوم ہی جیون ہمارا اوم پرنان دھار ہے
اوم ہے کرتا ودھاتا اوم پالن ہار ہے
اوم ہی دکھ کا وناشک اوم سروا نند ہے
اوم ہے بل تج دھارے اوم کرنا نند ہے
اوم سبکا پوجتے ہے ہم اوم کا پوجن کریں
اوم ہی کے دھیان سےہم شدہ اپنا من کریں
اوم کے گورو منتر جپنے سے رہیگا شدھ من
بوڑھی دن پرتی دن بدھاگئی دھرم میں ہوگے لگن
اوم کے جاپ سے ہمارے گیاں بڑھ تا جاےگا
انت میں یہ اوم ہمکو موکش تک پہنچا یہ گا

आनन्द स्त्रोत बह रहा – प्रकाश्चन्द”कविरत्न”

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आनन्द  स्रोत  बह   रहा   पर  तू   उदास   है ।

अचरज यह जल में रह के भी मछली को प्यास है ॥

फ़ूलों   में   ज्यों  सुवास , ईख  में  मिठास  है ,

भगवान का त्यों विश्व के कण  – कण में वास है ॥ आनन्द………

 

टुक  ज्ञान   चक्षु  खोल  के तू, देख  तो  सही  ,

जिसको  तू   ढूंडता   है  सदा  तेरे   पास   है ॥ आनन्द ……….

कुछ  तो समय निकाल  आत्म शुद्धि  के  लिए  ,

नर  जन्म  का उद्देश्य  ना केवल  विलास  है   ॥ आनन्द …….

 

आनन्द मोक्ष का न पा सकेगा जब तलक ,

तू जब तलक “प्रकाश” इन्द्रियों का दास है ॥

ओउम नाम की माला लेकर, फूल हमेशा खिलते हैं |

भला किसी क कर न सको तो ,बुरा किसी का मत करना ।
पुष्प नहीं बन सकते तो तुम, कांटे बनाकर मत रहना ।।
बन न सको भगवान अगर तुम , कम से कम इंसान बनो ।
नहीं कभी शैतान बनो तुम, नहीं कभीहैवान बनो ।।
सदाचार अपना न सको तो , पापों में पग मत धरना ।।
सत्य वचन न बोल सको तो, झूठ कभी भी मत बोलो ।।
मौन रहो तो ही अच्छा कम से, कम,विष तो मत घोलो ।
बोली यदि पहले तुम तोलो तो , फिर मुंह को खोला कारो ।।
घर न किसी का बसा सको तो , झोंपड़ियाँ न जला देना ।
मरहम पट्टी कर न सको तो, घाव नमक न लगा देना ।।
दीपक बनाकर जल न सको तो ,अंधियारा भी मत करना ।।
अम्रात पिला सको न किसी को ,जहर पिलाते भी डरना ।
धीरज बंधा नहीं सकते तो, घाव किसी के मत करना ।।

ओउम नाम की माला लेकर , फूल हमेशा खिलते हैं ।।
सच्चाई की रह में बेशक, कष्ट अनेकों मिलते हैं ।
पर काँटों के बीच में देखो , फूल हमेशा खिलते हैं ।।
सूरज की भांति खुद जलाकर , सब जग को रोशन करना ।।पुष्प …

भजन कविता

सब के गुण , अपनी हमेशा गलतियाँ देखा करो |

जिन्दगी की हुबहू तुम झलकियाँ देखा करो ||

 

हसरतें महलों की तुमको गर सताएं आनकर |

कुछ गरीबों की भी जाकार बस्तियां देखा करो ||

 

खाने से पहले अगर तुम हक़ पराया सोच लो |

कितने भूखों की है इन में रोटियां देखा करो ||

 

आ दबोचें, गर कहीं तुम को सिकंदर सा गरूर |

हाथ खाली आते जाते अर्थियां देखा करो ||

 

ये जवानी की अकाद सब ख़ाक में मिलाजावेगी |

जल चुके जो शव हैं उनकी अस्थियाँ देखा करो ||

 

जिंदगी में चाहते हो सुख अगर अपने लिए दूसरों के गम में अपनी सिसकियाँ देखा करो |

मिलाजावेगी जल चुके जो शव हैं उनकी अस्थियाँ देखा करो ||

 

जिंदगी में चाहते हो सुख अगर अपने लिए ,

दूसरों के गम में अपनी सिसकियाँ देखा करो ||

देव दयानंद अकेला था

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देव दयानंद अकेला था…….

थे न मठ मंदिर हवेली हाट ठाट बाट ,
सोना चांदी कहाँ पास पैसा था न धेला था |
तन पै न थे सुवस्त्र हाथ थे न अस्त्र शस्त्र ,
जोगी न जमात कोई चेली थी न चेला था ||
सत्य की सिरोही से संहारे सब मिथ्या मत ,
संकट विकट मर्दानगी से झेला था |
सारी दुनियां के लोग एक तरफ थे प्रकाश,
एक ओर अभय दयानंद अकेला था ||