Category Archives: भजन

‘‘माँ’’ – देवेन्द्र कुमार मिश्रा

बस माँ ही है

धरती की भगवान

बेटों के लिए वरदान।

जिसके कारण

जीवन में सुगन्ध

रहती है।

वरना दुर्गन्ध आने लगी

रिश्तों से। माँ न होती तो

तो पता नहीं दुनियाँ का क्या होता।

जब सारे रिश्ते

बाजार लगते हैं

जब मोह भंग हो जाता है

जीने से ही

तब वो माँ है

जिसे देखकर

जीने की इच्छा होती है

और भगवान पर भरोसा होता है।

क्योंकि उसनें माँ दी है।

माँ देकर उसने

मरने से बचा लिया।

कलयुग के इस चरण में

जब भगवान, भक्ति

ध्यान-ज्ञान भी बिकता है

ऐसे में बस एक ही अनमोल

चीज है बच्चों के पास

वो है माँ

जो जन्म से मरण तक

सिर्फ  माँ होती है

घने वृक्ष की छाँव

शीतल जल का स्रोत

तेरी गोद में सारे दुखों से मुक्ति

माँ तुहारा स्नेह ममता दुलार

जन्म-जन्म तक नही चुका सकता

माँ शद अपने

आप में

पूर्ण है।

किसी व्याया, विवरण

अर्थ की जरुरत नहीं है।

माँ बिना संभव ही नहीें

हे संसार की समस्त

स्त्रियों तुम माता हो

संसार की

तुहारी चरण वन्दना

करता हूँ और जानता हूँ

मेरे रोने से मेरे हंसने से

तुम क्षमा करके छिपा लोगी

अपनी आंचल की छाँव में

और तुहारे स्पर्श मात्र

से सब दुख दूर हो जायेंगे

हे मेरी जननी।

मेरी जान न जाने

कहाँ-कहाँ भटकी रहती है।

लेकिन माँ की जान बेटे में

अटकी रहती है।

मेरा प्रणाम स्वीकार करो

अपनी ममता की छाँव में करो

मैं दूर बहुत हूँ तुमसे

रोजी-रोटी का चक्कर है

लेकिन मैं जानता हूँ

मेरी याद में आंँसू बहाती होगी।

मेरी सलामती की दुआ माँगती होगी।

माँ मैं तो श्रवण कुमार बन नहीं सका

लेकिन मैं जानता हूँ तुम माँ ही

रहोगी।

आरभ से अन्त तक।

युग बदले,दुनियाँ बदली

जमाना बदला

लोगों के चाल-चलन

रहन-सहन बदले

दिल बदले, व्यवहार बदले।

लेकिन नहीं बदली।

तो सिर्फ  माँ।

– पाटनी कॉलोनी, भारत नगर, चन्दनगाँव, छिन्दवाड़ा, म.प्र.-480001

दयानन्द थे भारत की शान -श्रीकृष्ण चन्द्र शर्मा

लड़े जो कर-करके विषपान।

दयानन्द थे भारत की शान।।

बोले गुरुवर दयानन्द, क्या दक्षिणा दोगे गुरु की।

विनय युक्त वाणी में बोले, आज्ञा दो कह उर की।।

आर्य धर्म की ज्योति बुझी है, चली गई उजियारी।

घोर तिमिर में फंसे हुए हैं, पुत्र सभी नर-नारी।।

 

चार कार्य करने को निकलो, आज्ञा मेरी मान।

दयानन्द थे भारत की शान।।

पहला है आदेश, देश का करना है उपकार।

देश धर्म से बड़ा नहीं है, जग का कुछ व्यवहार।।

पराधीन हो कष्ट भोगता, जन-जन यहाँ कुरान।

स्वतन्त्रता का शुभ प्रभात हो, आवे आर्य सुराज।।

 

भाव संचरण हो स्वराज का, छेड़ो ऐसी तान।

दयानन्द थे भारत की शान।।

दूजे भारत की जनता है, सच्ची भोली-भाली।

पाखण्डी रचते रहते हैं, नित नई चाल निराली।।

निजी स्वार्थ हित गढ़ते रहते, झूठे ग्रन्थ पुरान।

हुए आचरणहीन इन्हीं से, भूले सच्चा ज्ञान।।

 

सत्य शास्त्रों की शिक्षा दे, दूर करो अज्ञान।

दयानन्द थे भारत की शान।।

सत् शास्त्रों से वंचित कर दिया, रच-रच झूठे ग्रन्थ।

अपनी पूजा मान के कारण चलाये, निज-निज पन्थ।।

अपने मत को उजला कहते, अन्य की चादर मैली।

सत्य आचरण के अभाव में दिग्भ्रमता है फैली।।

 

दूर अविद्या हो इनकी यह तृतीय कार्य महान।

दयानन्द थे भारत की शान।।

वेद ज्ञान के विना देश पर आई विपत्ति अपार।

झूठ, कुरीति पाखण्डों की हो रही है भरमार।।

चला रहे ईश्वर के नाम पर, उदर भरु व्यापार।

कार्य चतुर्थ करो तुम जाकर, वैदिक धर्म प्रचार।।

 

आपके ये आदेश महान, करूँगा जब तक तन में प्राण।

दयानन्द थे भारत की शान।।

-एस.बी.7, रजनी विहार, हीरापुरा,

अजमेर रोड़, जयपुर।

वह विछोना वही ओढ़ना है- तर्ज-मनिहारी का वेष बनाया – पं. संजीव आर्य

आओ साथी बनाएँ भगवान को।

वही दूर करेगा अज्ञान को।।

कोई उसके समान नहीं है

और उससे महान नहीं है

सुख देता वो हर इंसान को।।

वह बिछोना वही ओढ़ना है

उसका आँचल नहीं छोड़ना है

ध्यान सबका है करुणा निधान को।।

दूर मंजिल कठिन रास्ते हैं

कोई साथी हो सब चाहते हैं

चुनें उससे महाबलवान को।।

सत्य श्री से सुसज्जित करेगा

सारे जग में प्रतिष्ठित करेगा

बस करते रहें गुणगान को।।

रूप ईश्वर के हम गीत गाए

दुर्व्यसन दुःख दुर्गुण मिटाएँ

तभी पाएँगे सुख की खान को।।

– गुधनीं, बदायुँ, उ.प्र.

पढ़े वेद अरु पढ़ावें – सतीश गुप्ता ‘‘द्रवित’’

जान लिया शिव तत्व को, लिया नाम ओंकार।

देख ऋषि दयानन्द ने, बदला जीवन सार।।

हो वेदों सा आचरण, तभी बचेगी लाज।

जग का दरपन वेद हैं, दर्शन आर्य समाज।।

नित्य हवन पूजन करें, होय प्रदूषण अन्त।

बने शुद्ध वातावरण, आये नवल बसन्त।।

जो वेदों से विमुख हैं, कुछ मर्यादाहीन।

लक्ष्य मिले किस विधि यहाँ, सब हैं तेरह-तीन।।

राह वेद की छोड़कर, मतकर खोटे कर्म।

ओ3म् रूप में निहित है, भाग्योदय का मर्म।।

गूजें संस्कृति सुखद स्वर, अखिल विश्व तम तोम।

वेदों के अनुसार ही, नित्य करें सब होम।।

पढ़ें वेद अरु पढ़ावें, मानव बने प्रबुद्ध।

तज दे वो पाखंडता, करे हृदय को शुद्ध।।

लोभ, मोह, अभिमान से, मत कर जीवन नष्ट।

बिना वेद कमाया धन, देता निश्चित कष्ट।।

मानवता मन में बसे, कर से करें सुकर्म।

वाणी समता मय रहे, आर्य मनुज का धर्म।।

धर्म, कर्म अरु ज्ञान से, बदलेगा परिवेश।

‘‘द्रवित’’ धर्म रत ही रहो, वेदों का उपदेश।।

– निर्मल कुंज, 103, सिकलापुर, बरेली, उ.प्र. 243001

‘उल्लास’ – देवनारायण भारद्वाज

विश्वकर्मा विमनाऽआद्विहाया धाता विधाता परमोत सन्दृक्। तेषमिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऽऋषिन् परऽएक माहुः।

 

उपवास मिल गया उसका, अब और कौन आभास चाहिए।

विश्वास मिल गया उसका,अब और कौन उल्लास चाहिए।।

 

ईश्वर सर्वज्ञ विश्वकर्मा

विज्ञान विविध का शिवशर्मा

सर्वव्याप्त है निर्विकार वह

जग कर्त्ता धर्त्ता सध्दर्मा

 

आकाश मिल गया उसका, अब और कौन अवकाश चाहिए।

विश्वास मिल गया उसका,अब और कौन उल्लास चाहिए।।

 

परमेश जगत निर्माता है

वह धाता और विधाता है

सब पाप पुण्य वह देख रहा

वह यथायोग्य फल दाता है

 

सहवास मिल गया उसका, अब और कौन वातास चाहिये।

विश्वास मिल गया उसका, अब और कौन उल्लास चाहिये।।

 

अद्वितीय एक प्रभु ने जगका

निर्माण किया इस जगमग का

ऋषि सप्तशक्ति में उसकी हैं

करता संचालन रग-रग का

 

मधु हास मिल गया उसका, अब और कौन मधुमास चाहिए।

विश्वास मिल गया उसका, अब और कौन उल्लास चाहिए।।

– अवन्तिका प्रथम, रामघाट मार्ग, अलीगढ़, उ.प्र.-202001

सुनहरागीत वह मीत कौन? – देवनारायण भारद्वाज

को वः स्तोमं राधति यं जुजोषथ विश्वे देवासो मनुषो यतिष्ठन।

को वोऽध्वरं तुविजाता अरं करद्यो नः पर्षदत्यंहः स्वस्तये।।

– ऋ. 10.63.6

ये स्तवन गीत बुन रहा कौन, सुन सिद्ध कर रहा गीत कौन।

गा रहा मधुर ये गीत कौन, सुन रहा गीत वह मीत कौन।।

 

किसने यह ऋचा रचाई हैं

मृदु भाव भंगिमा लाई हैं,

किसने स्तुतियाँ गाई हैं।

 

ये छेड़ रहा संगीत कौन, कर रहा सरस स्वर प्रीति कौन।

गा रहा मधुर ये गीत कौन, सुन रहा गीत वह मीत कौन।।

 

ज्ञानी अग्रज या अनुज सभी

जग मनन शील ये मनुज सभी

इनके शुभ कर्म पूर्ण करता

कौन हटाता अघ दनुज सभी।

 

हिंसा पर करता जीत कौन, दे रहा अहिंसा रीति कौन।

गा रहा मधुर ये गीत कौन, सुन रहा गीत वह मीत कौन।।

 

क्या तुमने कुछ अनुमान किया

हो भले अपरिमित ज्ञान किया

प्यारे उस परम पिता ने ही

वरदान पूर्ण यह गान किया।

 

ये छेड़ रहा संगीत कौन, यह मुखर किन्तु वह मीत मौन।

गा रहा मधुर ये गीत कौन, सुन रहा गीत वह मीत कौन।।

 

– अवन्तिका प्रथम, रामघाट मार्ग, अलीगढ़, उ.प्र.-202001

स्वाधीनता को नमन – संयम वत्स ‘मनु’

आजादी ये आजादी हमारी आजादी

शहीदों के खून से लिखी किताब थी,

नेताजी ने रक्तिम कलम से लिखा,

भगत ने चाकू औरबम से लिखा,

सावरकर ने कोल्हुओं पर श्रम से लिखा,

ढींगरा ने वायली पर गन से लिखा,

लिखते-लिखते कितने महान् हो गए,

लिखने वाले खुद दास्तान हो गए,

बड़ी मेहनत से सजाई भारती,

आजादी ये आजादी………….।

भाई, बहन, परिवार वाले वे भी थे,

किसी के नयन के उजाले वे भी थे,

राष्ट्रहित स्वयं ही बलिदान हो गए,

लहों में सदियाँ तमाम हो गए,

आजादी की ज्वाला को प्रचण्ड कर दिया,

अभिमानी का दर्प खण्ड-खण्ड कर दिया,

है यह सच्चाई किन्तु लगे वाब सी,

आजादी ये आजादी……………….।

आजादी को मैंने भूतकाल क्यों लिखा,

बार-बार कोंधता सवाल क्यों लिखा,

आजादी बची ही कहाँ आज देश में,

लूट, घूसखोरी बैठे इसके वेश में,

भारतवासी अपना ओज भूल गये हैं,

कायर बनकर अपना तेज भूल गए हैं,

किन्नरों की मण्डी बनी सिंहो की सभा,

आजादी ये आजादी…………..।

बहुत सब्र किया अब न और सहेंगे,

ये न सोचो भारतवासी कुछ न कहेंगे,

सिंहनाद होगा, अब गाण्डीव बजेगा,

भीषण निनाद से अब देश जगेगा,

मानव, माँ भारती का भक्त बनेगा,

सिंहो के मुख पर रक्त लगेगा,

शत्रुओं के मुण्ड से सजेगी भारती,

आजादी ये आजादी हमारी आजादी,

शहीदों के खून से लिखी किताब थी।

– चौरासी घण्टा, मुरादाबाद

उम्र से लड़ती आधुनिकायें – डॉ. रामवीर

उम्र से लड़ती आधुनिकायें

तरह-तरह से आयु छिपायें,

कभी-कभी इन की चेष्टायें

अति उपहास्यास्पद हो जायें।

 

मुझे बताया गया पड़ोसन

बेटे संग न बाहर जाये,

माँ बेटे को साथ देखवय,

का न कहीं अनुमान हो जाये।

 

यदि हो जाना बहुत जरूरी

पुत्र को देती हिदायत पूरी,

देखो पल्लू पकड़ न चलना,

रखना दस मीटर की दूरी।

 

एक बार सरकारी काम से

मैंने जन्मतिथि पुछवाई,

तो तारीख बताई केवल

वर्ष की संया नहीं बताई।

 

वर्ष जानने के आग्रह पर

बोली कुछ गुस्से में आ कर,

फॉर्म में कॉलम जन्मतिथि है,

जन्म वर्ष नहीं छपा वहाँ पर।

 

बिना वर्ष के कैसे जानूँ

आप हैं बालिग या नाबालिग?

तो बोली ‘मैं कुछ कामों में

बालिग हूँ कुछ में नाबालिग’।

 

उसने आयु छिपाई मानो,

देह अन्य है, प्राण अन्य हैं।

आखिर पिण्ड छुड़ाया उससे

कह कर ‘मैडम आप धन्य हैं’।

– 86, सैक्टर-46, फरीदाबाद,

हरियाणा-121003

ध्यान से मिलता है भगवान -वाशी पुरसवानी

भूख से तड़प रहा इन्सान,

तू पूजे पत्थर का भगवान।

गरीबों में बसता है ईश,

अरे, तू क्यों होता हैरान?

 

लुटाकर लाखों रुपये व्यर्थ,

बनाया मन्दिर एक विशाल।

न दीनों का है कोई याल,

बन गए वे सारे कंगाल।

नहीं पत्थर में है भगवान,

अरे, वह खुद ही है इन्सान।

 

खा रहा लोभी ब्राह्मण खूब,

नहीं छोड़े मुर्दे का माल।

गपोड़ों के बल पर ही आज

बन गया देखो मालामाल।

बाँचता रहता रोज पुराण,

कथाओं की है जिसमें खान।

 

वेद है सत्य, ओम् है ब्रहम,

ज्ञान की गंगा निर्मल धार।

खोल पट अन्दर के ऐ मूर्ख!

चढ़ेगा तुझ पर तभी खुमार।

मंत्र ऋषि दयानन्द का जान,

ध्यान से मिलता है भगवान।

मलेशिया