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जागरण की बात कर लें। – रामनिवास गुणग्राहक

 

आ तनिक उठ बैठ अब कुछ जागरण की बात कर लें।

अथक रहकर लक्ष्य पा ले, उस चरण की बात कर लें।।

जगत् में जीने की चाहत, मृत्यु से डरती रही है।

जिन्दगी की बेल यूँ, पल-पल यहाँ मरती रही है।।

प्राण पाता जगत् जिससे, उस मरण की बात करे लें-

अथक रह कर लक्ष्य पा ले.-

सत्य से भटका मनुज, पथा्रष्ट होकर रह गया है।

उद्दण्डता का आक्रमण, मन मौन होकर सह गया है।।

उद्दण्डता के सामने सत्याचरण की बात कर लें-

अथक रहकर लक्ष्य पा ले.-

परिश्रम से जी चुराना साहसी को कब सुहाता?

उच्च आदर्शों से युत्र्, जीवन जगत् में क्या न पाता??

साहसी बन आदर्शों के, अनुकरण की बात कर लें-

अथक रहकर लक्ष्य पा ले.-

दोष, दुर्गुण, दुर्ष्यसन का, फल सदा दुःख दुर्गति है।

सुख सुफल है सद्गुणों का, सज्जनों की समति है।।

संसार के सब सद्गुणों के संवरण की बात कर लें-

अथक रहकर लक्ष्य पा ले. –

हैं करोड़ों पेट भूखे, ठण्ड से ठिठुरे बदन हैं।

और कुछ के नियंत्रण में, अपरिमित भूषण-वसन हैं।।

भूख से व्याकुल उदरगण के भरण की बात कर लें-

अथक रहकर लक्ष्य पा ले.-

अन्न जल से त्रस्त मानव का हृदय जब क्रुद्ध होगा।

सूाी आंतो का शोषण से, तब भयानक युद्ध होगा।।

निरन्तर नजदीक आते, न्याय-रण की बात कर लें-

अथक रहकर लक्ष्य पा लें

आर्यसमाज शक्तिनगर

Bhajan

बैठकर-निज मन से घंटों तक झगड़िए: आर्य संजीव ‘रूप’,

गीत

बैठकर-निज मन से घंटों तक झगड़िए

(तर्ज – राम का गुणगान करिए)

ईश का गुणगान करिए,

प्रातः सायम्् बैठ ढंग से ध्यान धरिए।।

ध्यान धरिए वह प्रभो ही इस जगत का भूप है,

यह जगत ही सच्चिदानन्द उस प्रभो का रूप है।

देख सूरज चाँद उसका भान करिए।।

हाथ में गाजर टमाटर या कोई फल लीजिए,

वाह क्या कारीगरी तेरी प्राो कह दीजिए,

ये भजन हर वक्त हर एक स्थान करिए।।

मित्रता करनी हो तो मन से भला कोई नहीं,

शत्रुता करनी हो तो मन से बुरा कोई नहीं

बैठकर निज मन से घंटों तक झगड़िए।।

– आर्य संजीव ‘रूप’, गुधनी (बदायूँ)

वह ऐतिहासिक गीत : – प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु

‘‘सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं’’

श्री यतीन्द्र आर्य की उत्कट इच्छा से मैं कई मास से इस पूरे गीत की खोज में लगा रहा। जब कुँवर सुखलालजी पर विरोधियों ने प्राणघातक आक्रमण किया था, तब पता करने वालों के प्रश्न के उत्तर में इसका प्रथम पद्य बोला था। यह गीत कुँवर जी की रचना नहीं है- जैसा कि प्रायः हम सब समझे बैठे थे। यह किसी पंजाबी आर्य लिखित गीत है। इसके अन्त में ‘धरम’ शब्द  से लगता है कि यह लोकप्रिय पंजाबी आर्य गीतकार पं. धर्मवीर की रचना है। कुछ पंक्तियाँ छोड़कर इसे परोपकारी की भेंट किया जाता है। यह लेखराम जी के बलिदान के काल में रचा गया था।

– जिज्ञासु

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं।

झण्ड दुनिया में उनके गड़े हैं।।

एक लड़का हकीकत नामी,

सार जिसने धरम की थी जानी,

जग में अब तक है जिसकी निशानी,

सीस कटवाने को खुश खड़े हैं।

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं……………………

बादशाह ने कहा सब तुहारे,

राज दौलत खजाने हमारे

सुन हकीकत यह बोले विचारे,

हम तो इनसे किनारे खड़े हैं।

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं……………………

यह हकीकत को दौलत न भाई,

बल्कि आािर को है दुःखदायी

कारुँ जैसे ने प्रीत बढ़ाई,

आ नरक में वे आखिर पड़े हैं।

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं……………………

गुरु गोविन्द के थे दो प्यारे,

गये रणभूमि में वे भी मारे

और जो छोटे थे जो न्यारे,

जिन्दा दीवार में वे गड़े हैं।

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं…………………..

महर्षि दयानन्द प्यारे,

धरम कारण खा विष सिधारे

सुनके हिल जाते थे दिल हमारे,

ओ3म् जपते वे आगे बढ़े हैं।

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं………………….

लेखराम धरम का प्यारा,

जिसने धरम पर तन मन वारा

खाया जिस्म पर तेग कटारा,

उठ ‘‘धरम’’ तू याँ क्या करे है?

सीस जिनके धरम पर चढ़े हैं

झण्डे दुनिया में उनके गड़े हैं।।

ईश-भजन

ग़ज़ल

पाप माफ नहीं करता ईश्वर वेद में कहता है,

तो बतलाओ ईश-भजन से क्या-कुछ मिलता है?

ईश भजन करने से ऐसा साहस आ जाता,

हो पहाड़ जैसा दुःख वह भी राई लगता है।

जितनी देर भी जाकर बैठे कभी जो सत्संग में,

उतनी देर ये मन पापी चिन्तन से बचता है।

जब भी कोई सुधरा है सत्संग से सुधरा है,

मुंशीराम, अमीचन्द, मुगला साधक बनता है।

हमने रूप किया है अनुभव आज बताते हैं,

आत्मिक बल ही ईश-ाजन से दिन-दिन बढ़ता है।

– आर्य संजीव ‘रूप’, गुधनी (बदायूँ)

रचकर नया इतिहास कुछ : राजेन्द्र ‘जिज्ञासु

रचकर नया इतिहास कुछ
जब तक है तन में प्राण तू
कुछ काम कर कुछ काम कर।
जीवन का दर्शन है यही
मत बैठकर विश्राम कर॥
मन मानियाँ सब छोड़ दे,
इतिहास से कुछ सीख ले।
पायेगा अपना लक्ष्य तू,
मन को तनिक कुछ थाम ले॥
जीना जो चाहे शान से,
मन में तू अपने ठान ले।
ये वेद का आदेश है,
अविराम तू संग्राम कर॥
रे जान ले तू मान ले,
कर्•ाव्य सब पहचान ले।
रचकर नया इतिहास कुछ,
तू पूर्वजों का नाम कर॥
भोगों में सब कुछ मानना,
जीवन यह मरण समान है।
इस उलटी-पुलटी चाल से,
न देश को बदनाम कर॥
रचयिता—राजेन्द्र ‘जिज्ञासु

‘‘माँ’’ – देवेन्द्र कुमार मिश्रा

बस माँ ही है

धरती की भगवान

बेटों के लिए वरदान।

जिसके कारण

जीवन में सुगन्ध

रहती है।

वरना दुर्गन्ध आने लगी

रिश्तों से। माँ न होती तो

तो पता नहीं दुनियाँ का क्या होता।

जब सारे रिश्ते

बाजार लगते हैं

जब मोह भंग हो जाता है

जीने से ही

तब वो माँ है

जिसे देखकर

जीने की इच्छा होती है

और भगवान पर भरोसा होता है।

क्योंकि उसनें माँ दी है।

माँ देकर उसने

मरने से बचा लिया।

कलयुग के इस चरण में

जब भगवान, भक्ति

ध्यान-ज्ञान भी बिकता है

ऐसे में बस एक ही अनमोल

चीज है बच्चों के पास

वो है माँ

जो जन्म से मरण तक

सिर्फ  माँ होती है

घने वृक्ष की छाँव

शीतल जल का स्रोत

तेरी गोद में सारे दुखों से मुक्ति

माँ तुहारा स्नेह ममता दुलार

जन्म-जन्म तक नही चुका सकता

माँ शद अपने

आप में

पूर्ण है।

किसी व्याया, विवरण

अर्थ की जरुरत नहीं है।

माँ बिना संभव ही नहीें

हे संसार की समस्त

स्त्रियों तुम माता हो

संसार की

तुहारी चरण वन्दना

करता हूँ और जानता हूँ

मेरे रोने से मेरे हंसने से

तुम क्षमा करके छिपा लोगी

अपनी आंचल की छाँव में

और तुहारे स्पर्श मात्र

से सब दुख दूर हो जायेंगे

हे मेरी जननी।

मेरी जान न जाने

कहाँ-कहाँ भटकी रहती है।

लेकिन माँ की जान बेटे में

अटकी रहती है।

मेरा प्रणाम स्वीकार करो

अपनी ममता की छाँव में करो

मैं दूर बहुत हूँ तुमसे

रोजी-रोटी का चक्कर है

लेकिन मैं जानता हूँ

मेरी याद में आंँसू बहाती होगी।

मेरी सलामती की दुआ माँगती होगी।

माँ मैं तो श्रवण कुमार बन नहीं सका

लेकिन मैं जानता हूँ तुम माँ ही

रहोगी।

आरभ से अन्त तक।

युग बदले,दुनियाँ बदली

जमाना बदला

लोगों के चाल-चलन

रहन-सहन बदले

दिल बदले, व्यवहार बदले।

लेकिन नहीं बदली।

तो सिर्फ  माँ।

– पाटनी कॉलोनी, भारत नगर, चन्दनगाँव, छिन्दवाड़ा, म.प्र.-480001