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Cows domestication in Vedas

domestication of cows

Cows domestication in Vedas AV12.4

AV Sukta12.4 अथर्व वेद 12-4 सूक्त -वशा गौ ,ऋषि- कश्यप:

4.1.0.1 AV 12.4.1 अथर्व 12-4-1 On Donating a cow

गौ दान  किस को

ददामीत्येव ब्रूयादनु चैनामभुत्सत।

वशां  ब्रह्मभ्यो याचद्भ्यस्तत्प्रजावदपत्यवत्‌ || अथर्व 12.4.1

Cows should be given in keeping of learned persons

(veterinarians) who have noble temperaments.

गौओं को ब्राह्मण वृत्ति के पशु पालन  वैज्ञानिकों के ही दायित्व में देना  चाहिए ।

4.1.0.2 AV 12-4-2 Curse of a sick Cow दुःखी गौ का श्राप

प्रजया स वि क्रीणीते पशुभिश्चोप दस्यति।

य आर्षेयेभ्यो याचभ्दयो देवानां  गां न  दित्सति ।। अथर्व 12-4-2

Those who do not give cows in the keeping of such

virtuous persons to bring about improvements in the

cows, merely trade and do no service for society.

They  suffer from curse of unhappy cows.

जो लोग कुशल कार्य कर्ताओं की सहायता से गौ संवर्द्धन  का कार्य

नहीं करते, वे केवल व्यापार वृत्ति से कार्य कराते हैं। वे दुखी  गौ के

श्राप के भोगी होते हैं।

4.1.0.3 AV 12-4-3 Underfed Cow’s Curse

दुःखी गौ का श्राप

कूटयास्य सं शीर्य-ते श्लोणया काटमर्दति।

बण्ड्या दह्य-ते गृहाः काणया दीयते स्वम् ।। अथर्व 12-4-3

Society that trades in unhealthy cows gets destroyed

By  curse of unhappy cows.

जो समाज गौ को व्यापार मान  कर चलाते हैं, वे दुखी गौ के श्राप से

नष्ट हो जाते हैं।

4.1.0.4 AV12-4-4 same as above फिर वही

विलोहितो अधिष्ठानाच्छद्विक्लिदुर्नाम विन्दति गोपतिम् ।

तथा वशायाः संविद्यं दुरदभ्ना  ह्युच्यसे ।। अथर्व12-4-4

Miserly person’s looking after the cows neglect their

Feed and health. Cows suffer bleeding and such

ailments which become incurable.

कंजूस गोपालक की गौ,रक्त  स्राव जैसे असाध्य रोगों से ग्रसित हो

कर नष्ट  हो जाती हैं।

4.1.0.5 AV 12-4-5 Foot and mouth disease

मुंह खुरपका

पदोरस्या अधिष्ठानाद्विक्लिन्दुर्नाम विंदति|

अनामनात्सं शीर्यन्ते या मुखेनोपजिघ्रति ।। अथर्व 12-4-5

By sniffing her feet/ place where cow puts her feet, A

disease ‘Wiklindu’ is contracted that finally destroys

the cow. ( The obvious reference is to the contagious

Foot and mouth disease)

गौ अपने  खुर सूंघने  से मुंह खुर पका रोग से ग्रस्त हो कर नष्ट हो

जाती  है।

4.1.0.6 AV12-4-6 Do not make Cut marks on Cow

ears

गौ की पहचान के लिए कान मत काटो

यो अस्याः कर्णावास्कुनोत्या स देवेषु वृश्चते ।

लक्ष्मं कुर्व इति मन्यते कनीयः कृणुते स्वम् ।। अथर्व 12-4-6

Those persons who make cut marks on cow’s ears for

Identification, are as if cutting short their own wealth.

गौ की पहचान के लिए  के कान नहीं काटने  चाहिएं।

4.1.0.7 AV 12-4-7 Do not cut COW Hair गौ के बाल नही

काटे  जाते

यदस्याः कस्मै चिद्भोगाय बालान्कश्चित्प्रकृन्तति ।

ततः किशोरा म्रियन्ते वत्सांश्च धातुको वृकः ।। अथर्व 12-4-7

Those who cut hair of a cow for any reasons, are

Cursed  to suffer in life.

जो किसी तांन्त्रिक कार्य के लिए गौ के बाल लेते हैं उन को श्राप

लगता है।

4.1.0.8 AV 12-4-8 Protect Cows from attack by birds गौ को कौए इत्यादि पक्षियों से बचाएं

यदस्या गोपतौ सत्या लोम ध्वाङ्क्षो अजीहिडत् ।

ततः कुमारः म्रियन्ते  यक्ष्मो विन्दत्यनामनात् ।। अथर्व 12-4-8

If crows are allowed to attack a cow, the lazy care

taker of  cows will suffer from tuberculosis.

( Lazy persons attract Tuberculosis)

जो चरवाहा गौ को कौए जैसे पक्षियों से नहीं बचाता , उस आलसी

को  क्षय रोग होगा । (आलस्य के कारण क्षय रोग होता है)

4.1.0.9 AV12-4-9 Cow Dung and Urine

गोबर गोमूत्र

यदस्याः पल्पूलनं  शकृद्दासी समस्यति ।

ततोऽपरूपं जायते तस्मादव्येष्यदेनसः ।। अथर्व 12-4-9

Throwing away in to waste the Cow Dung and Cow

Urine disfigures the society.

गोबर गोमूत्र व्यर्थ करने  से समाज के रूप की सुन्दरता नष्ट हो जाती

है ।

VETERINARY SERVICES

पशु चिकित्सा सेवाएं

4.1.0.10 AV 12-4-10 Cow Protection गौ सुरक्षा

जायमानाभि जायते  देवान्त्सब्राह्मणान्वशा ।

तस्माद ब्रह्मभ्यो देयैषा तदाहुः स्वस्य गोपनम् ।। अथर्व 12-4-10

Cow should always be under the care of

Knowledgeable persons having altruistic attitudes.

This  is the best form of COW PROTECTION

गौपालन  में ब्राह्मण वृत्ति के कुशल गोपालकों से ही गौ सुरक्षित

रहती है।

4.1.0.11 AV12-4-11 No Cow protection is cruelty

गौ की असुरक्षा अपराध है

य एनां  वनिमायन्ति तेषां देवकृता वशा।

ब्रह्मज्येयं तदब्रुवन्य एना निप्रयायते ।। अथर्व 12-4-11

Not providing cow in to proper hands for care is

cruelty to cows.

गौ को ब्राह्मण वृत्ति के लोगों के हाथ न देना गौ पर  अत्याचार है।

4.1.0.12 AV 12-4-12 Same again वही विषय

य आर्षेयेभ्यो या चद्भयो देवानां गां न  दित्सति ।

आ स देवेषु वृश्चते ब्राह्मणानां  च मन्यते ।। अथर्व 12-4-12

Not providing the cows with such care, destroys good

traditions of society.

गौवों को ऐसी सुरक्षा न  देने  से सामाजिक परम्पराओं का  नाश

होता है।

4.1.0.13 AV 12-4-13 pre parturition post parturition

care

दूध से हटी गर्भिनी गौ सेवा विषय

यो अस्य स्याद् वशाभोगो अन्यामिच्छेत तर्हि सः ।

हिंस्ते अदत्ता पुरुषं याचितां च न  दित्सति ।। अथर्व 12-4-13

Productive cows can be kept for the immediate

benefits but unproductive cows must be given for

care by selfless persons.

बाखड़ी, गर्भिणी, दूध से सूखी गौ को निस्वार्थ सेवा चाहिए।

4.1.0.14 AV 12-4-14 Same as above वही विषय फिर

यथा शेवधिर्निहितो  ब्राह्मणानां  तथा वशा ।

तामेतदच्छायन्ति  यस्मिन्कस्मिंश्च जायते ।। अथर्व 12-4-14

Like the protection to be provided for hidden

treasures, such cows must be provided with due

protection .

( Modern science calls it Pre parturition & post

parturition- a 90 days regime two months or more

before calving and at least one week after calving

care under best hands)

जैसे किसी कोष की सुरक्षा की जाती है, उसी प्रकार विद्वान  कुशल

हाथों से बाखड़ी, कम/बिना  दूध की गर्भवती गौ की सुरक्षा होती है।

4.1.0.15 AV 12-4-15 denial of this service is cruelty to Cows

यह गौ सेवा उप्लब्ध न होना  गौ पर अत्याचार है

तस्मेतदच्छायन्ति  यद् ब्राह्मणा अभि ।

यथैनानन्यस्मिञ्जिनीयादेवास्या निरोधनम् ।। अथर्व 12-4-15

It is the duty of selfless good persons (veterinarians)

To provide this service. Denial of this service is cruelty towards Cows.

गौ वंश की ऐसी सेवा समाज का दायित्व है। इस सेवा का प्रबंध  न

होना  गौ पर अत्याचार है।

Importance of Veterinary Services गो विज्ञान  का महत्व

4.1.0.16 AV 12-4-16 Increase of Cows and identification

गो वंश विस्तार और उसे चिह्नित  करना

चरेदेवा त्रैहायणादविज्ञातगदा सती ।

वशां च विद्यान्नारद ब्राह्मणास्तह्येर्ष्याः ।। अथर्व 12-4-16

Up to three years of age a heifer moves around with

its mother. Then it Caves and has to be given an

identity and  donated to a deserving good household.

तीन  वर्ष तक की उस्रिया माता के संग रहती है। बछ्ड़ा देने  पर उस

का नामकरण करके किसी उपयुक्त परिवार को दान  की जाती है

4.1.0.17 AV 12-4-17 Nonobservance of such practice

Is not in best interests of society

ऐसे गोदान न करना समाज कल्याण हित में नही होता

य एनामवशामाह देवानां निहितं निधिम् ।

उभौ तस्मै भवाशर्वौ परिक्रम्येषुमस्यतः ।। अथर्व 12-4-17

Those who realize the wealth in cow’s udders and

milk, but do not share these cows with population, are

doing great disservice to welfare of the community.

जो गौ के दुग्ध का महत्व जानते हुए भी ऐसे गोदान नहीं करते वे

समाज के लिए कल्याण कारी नहीं सिद्ध होते

4.1.0.18 AV 12-4-18 Same again वही विषय फिर

यो अस्या ऊधो न  वेदाथो अस्या स्तनानुत ।

उभयेनैवास्मै दुहे दातुं चेदशकद्वशाम् । । अथर्व 12-4-18

Even ignorant persons if they donate cows for

Spreading them, do a great community service.

अविद्वान  लोग भी जो गोदान  से गौ संवर्द्धन  करने  के लिए यथा

समय गौ सेवा के लिए गौ दान  करते हैं, वे समाज सेवा का बड़ा

काम करते हैं

4.1.0.19 AV 12-4-19 Same again वही विषय फिर

दुर दभ्नैनमा शये याचितां च ना  दित्सति।

नास्मै कामाः समृध्यन्ते  यामदत्त्वा चिकीर्षति ।। अथर्व 12-4-19

Motivated by selfish considerations those who do not

Lend their cows at appropriate times for proper care

by experts, make their cows suffer and are in the end

not able to derive the benefits they were trying to

protect in the first place .

बाखड़ी गर्भ वती गौ की विशेष सेवा के लिए जो लोग अपनी  गौओं

को विशेषज्ञों के पास दान रूप से नही भेजते, उन  की गौएं कष्ट में

रहती हैं और जो लाभ अपेक्षित था वह नहीं मिलता।

4.1.0.20 AV 12-4-20  

Provide Vet experts honorable place

गो चिकित्सकों का आदर करो

देवा वशामयाचन्मुखं कृत्वा ब्राह्मणम् ।

तेषां सर्वेषामददद्धेडं न्येति मानुषः ।। अथर्व 12-4-20

Veterarian’s offer  for providing help to community to

take care of Cows should be gratefully accepted .

Ignoring the Vet Services angers the Vet Experts

पशु चिकित्सक गो सेवा के लिए उत्सुक रहते हैं। उन  सेवा ने  लेने

पर वे  क्रुद्ध होते हैं।

4.1.0.21 AV 12-4-21 Veterinarians पशु चिकित्सक

हेडं पशूनां न्येति ब्राह्मणेभ्योऽददद्वशाम् ।

देवानां निहितं भागं मर्त्यश्चेन्निप्रियायते ।। अथर्व 12-4-21

Veterinarians are to be made available to serve cows.

By not taking  their services properly even the cows

are put to great  discomfort.

गौ सेवा के लिए प्रशिक्षित जन गोसेवा अवसर की प्रतीक्षा में  उत्सुक

रहते हैं। उन  की सेवा न  लेने  से गौ को भी बहुत पीड़ा होती है।

4.1.0.22 AV 12-4-22 Veterinary help

पशु चिकित्सा दायित्व

यदन्ये  शतं याचेयुर्ब्राह्मणा गोपतिं वशाम्‌।

अथैनां  देवा अब्रुवन्नेवं ह विदुषो वशा ।। अथर्व 12-4-22

Hundreds of people seek help from veterinarians, and

All their cows are said to belong to him.

बहुत से लोग अपनी  गौएं पशु चिकित्सक के पास ले जाते हैं। वे सब

गौ उस चिकित्सक की कही जाती हैं।

4.1.0.23 AV12-4-23 Expert Vet Services

कुशल पशु चिकित्सक सेवा

य एवं विदुषेऽदत्त्वाथान्येभ्यो ददद्वशाम् ।

दुर्गा तस्मा अधिष्ठाने पृथिवी सहदेवता ।। अथर्व 12-4-23

Those who do not take help of trained Vets and go to

Seek help from illiterates, cause lot of misery and loss

to society.

जो लोग विद्वान  पशुचिकित्सकों को छोड़ कर अविद्वानों  के पास

जाते हैं, वे समाज में दुःख का कारण होते हैं।

4.1.0.24 AV 12.4.24 Ignoring Vet help

पशु चिकित्सा न लेना

देवा वशामयाचन्यस्मिन्नग्रे अजायत ।

तामेतां विद्यान्नारदः सह देवै रुदाजत ।। अथर्व 12-4-24

First time pregnant cow needs extra care. House

Holders may think of such cows to be their blessing

and feel that it can take care of itself on its own as a

routine.

पहली बार गर्भ वती को गृह स्वामी अपना  सौभाग्य समझ कर यह

सोच लेता है कि सब अपने  से ठीक होगा। यह ग़लती है

4.1.0.25 AV 12-4-25 Continued वही विषय

अनपत्यमल्पपशुं वशा कृणोति पूरुषम्‌।

ब्राह्मणैश्च याचितामथैनां निप्रियायते ।। अथर्व 12-4-25

Ignoring the expert Vet help those who confine such cows to their family out of misplaced affection, unknowingly cause harm to their cows and bring damage to the interests of their family.

विशेषज्ञों की सहायता न  ले कर ये गो स्वामी गौ और अपने  परिवार का और गौ का अहित करता है।

4.1.0.26 AV 12-4-26

अग्नीषोमाभ्यां कामाय मित्राय वरुणाय च ।

तेभ्यो याचन्ति  ब्राह्मणास्तेष्वा वृश्चतेऽददत् ।। अथर्व 12-4-26

Knowledge, Skills, Expert help, Implements and Resources all are needed for proper care. Ignoring this is a retrograde step.

विद्वत्ता, ज्ञान , हर प्रकार के संसाधन  उपयुक्त  स्थान  और समय पर उपलब्ध रहने  चाहिएं।

इन  सब पर ध्यान न  देना  समाज में पिछड़ापन  बढ़ाता है।

PASTURE FEEDING गोचर विषय

4.1.0.27 AV 12.4.27 Time to release Cows for Pastures प्रातः काल गोचर

यावदस्या गोपतिर्नोपशृणुयाद्दचः स्वयम् ।

चरेदस्य तावद्गोषु नास्यं श्रुत्वा गृहे वसेत् ।। अथर्व 12-4-27

Morning strains of mantras when heard being recited at Agnihotras indicates the time to release cows to go to pastures for self feeding.

प्रातः कालीन मंत्रो के पाठ की ध्वनि  जब सुनाई देती है, तब जानिए कि गौओं को गोचर में जाने  का समय हो चला

4.1.0.28 AV 12-4-28 Stall feeding is harmful घर में गौ को बंध कर मत रखो

यो अस्या ऋचउपश्रुत्याथ गोष्वचीचरत् ।

आयुश्च तस्य भूतिं च देवा वृश्चन्ति  हीडिताः ।। अथर्व 12-4-28

One who keeps Cows at home to feed even after hearing the morning mantra patha suffers in life.

जो प्रातःकाल मंत्र ध्वनि  सुनने  के पश्चात भी गौ को अपने  घर पर बांध कर खिलाता है, वह जीवन  मे दुख पाता है।

4.1.0.29 AV 12.4.29 Time to stay in Pastures गोचर में रहने  का समय

वशां चरन्ति  बहुधा देवानां निहितो निधिः ।

आविष्कृणुष्व रूपाणि यदा स्थाम जिघांसति ।। अथर्व 12- 4-29

As long as the cows like to feed in pastures they represent community assets. When cows want to retreat from pastures they indicate it by many signs.

गोचर में गौएं समाज की धरोहर के रूप में रहती हैं।जब वे पुन: अपने  गृह स्वामी के स्थान  जाना  चाहती हैं, स्वयम् संकेत करती हैं।

4.1.0.30 AV 12-4-30

आविरात्मानं कृणुते यदास्त्थाम जिघांसति।

अथो ह ब्रह्मभ्यो वशा याञ्च्याय कृणुते मन:।। अथर्व 12-4-30

Cow herself indicates the time for her to go back to her home for help from her master

जब गोचर से गृह स्वामी के पास जाने  का समय होता है गौ स्वयम् ऐसे संकेत देती है।

4.1.0.31 AV 12-4-31Cow’s desires are to be complied , गौ के अनुकूल आचरण हो

मनसा सं कल्पयति तद्देवाँ अपि गच्छति ।

ततो ह ब्रह्माभ्यो  वशामुपप्रयन्ति  याचितुम् ।। अथर्व 12-4-31

When Cows want to leave pastures to return to their homes, their desires should be complied with. ( It is the udder stress when it is full of milk, that prompts cow to return to her master for milking her and feeding her calf)

गौ के घर लौटने  के संकेत पर दूध दुहने  के लिए गौ को गृह स्वामी के यहां ले जाना चाहिए।

4.1.0.32 AV 12-4-32 Cow’s Blessings गौ के आशीर्वाद

स्वधाकारेण पितृभ्यो यज्ञेन  देवताभ्यः ।

दानेन  राजन्यो  वशाया मातुर्हेडं न गच्छति ।। अथर्व 12-4-32

Cows blessings flow by long life  and  presence of  elders in Society, Ajya for havi in yagyas, for the Society by her bounties (organic agriculture).

पितरों को अपने  स्वरूप से, ब्राह्मणों को यज्ञ में आज्य की हवि से,राज्य को अपनी  उपलब्धियों से धन्य  करती हैं।

4.1.0.33 AV 12-4-33 Cows belong to the learned गौ बुद्धिजीवियों की होती है

वशा माता राजन्यस्य तथा संभूतमग्रशः ।

तस्या आहुरनर्पणं यद ब्रह्मभ्यः प्रदीयते ।। अथर्व 12-4-33

Cow on first priority provides for protecting the welfare of society like a

mother does. But Cow really belongs to the Veterinarian intellectuals, who

provide for its  upkeep.

गौ सामाज को सर्व प्रथम माता कि तरह संरक्षण प्रदान  करती है।

परन्तु वास्तव में विद्वान  बुद्धिजीवि ही गौ को सुरक्षा प्रदान  करते

हैं।

4.1.0.34 AV12-4-34 Gross treatment of Cows a Crime गाव से दुर्व्यवहार अपराध है

यथाज्यं प्रगृहीतमालुम्पेत्स्त्रुचो अग्नये ।

एवा ह ब्रह्मभ्यो वशग्नय आ वृश्चतेऽददत् ।। अथर्व 12-4-34

Like Ajya havi dropping outside the fire is a crime, not providing the cows

with good Veterinary care is also a crime.

जैसे यज्ञाग्नि  से बाहर स्रुवा से आज्य गिराना  अपराध है, उसी प्रकार गौ को पशु चिकित्सक की

सेवा से दूर रखना  भी एक अपराध है।

4.1.0.35 AV 12-4-35 Productive cow fulfils all needs दुधारु गौ सम्पन्नता प्रदान करती है

पुरोडाशवत्सा सुदुधा लोकेऽस्मा उप तिष्ठति

सस्मै सर्वान्कामान्वशा  प्रददुशषे  दुह ।। अथर्व 12-4-35

Productive Cows fulfill all needs of the society

सवत्सा दुधारु गौ सब कामानाएं पूर्ण करती है

4.1.0.36 AV 12-4-36 Denying provision of cows leads to hell गो सेवा न  करना नरक देता है

सर्वान्कामान्ययमराज्ये वशा प्रददुशे दुहे  ।

अथहुर्नारकं लोकं निरुन्धा नस्य याचिताम् ।। अथर्व 12-4-36

Not making provision for good cows, denying cow products to the needy,

turns the society in to a living hell

गो सेवा से यम राज के यहां भी सब इच्छा पूरी होती हैं, परन्तु  गौ की  सेवा न  करने  से नरक

से छुटकारा नहीं मिलता।

4.1.0.37 AV 12-4-37 Cows denied mating are angry cows

गौ को वृषभ आवश्यक है

प्रवीयमाना  चरति क्रुद्धा गोपतये वशा ।

वेहतं मा मन्यमानो  मृत्योः पाशेषु बध्यताम् ।। अथर्व 12-4-37

Denial of breeding to good cows makes them infertile makes cows angry

and curse the keepers to Death.

(Modern practice of artificial insemination is known to  cause infertility. This

is a challenge for modern Dairy Practice.))

गौ को वृषभ का सहवास न  मिलने  पर गौ क्रोधित और बांझ होने

लगती  हैं। (क्रित्रिम गर्भाधान में गौ बांझ होने लगती हैं )

4.1.0.38 AV 12-4-38 Cow Breeding facility

गौ प्रजनन व्यवस्था

यो वेहतं मन्यमानो ऽमा च पचते वशा ।

अप्यस्य पुत्रान्‌ पौत्रांश्च याचयते बृहस्पति ।। 12-4-38

Neglect of breeding a good cow makes the coming  generation of society in

to beggars

जिस समाज में गौ प्रजनन सुव्यवस्थित नहीं होता वहां के लोग भीख मांगते हैं।

Pasture Significance गोचर महत्व

4.1.0.39 AV 12-4-39 Pastures should have free access गोचर महत्व

महदेषाव तपति चरन्ति  गोषु गौरपि ।

अथो ह गोपतये वशाददुषे विषं दुहे ।। अथर्व 12-4-39

Barriers in pastures angers the cows, the milk from such cows is likened to

poison. (महदेषाव – Big barriers)

(This fact is fully supported by latest dairy

science researches. Only milk of green forage fed cows is rich Essential

Fatty acids-Omega3 & Omega 6 and has much lower saturated fat content

and is rich with all Carotenoids. This is confirmed by the researches

shown here.)

Advice to Teachers on education from Vedas

gurukul

RV 3 .12 Advice to Teachers on education

Devtaa: Indragni = Self motivated & Fired with invincible spirit to always successfully achieve his goal.

देवता:-इन्द्राग्नि: = उत्साह और ऊर्जा से  पूर्ण सदैव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे विजयी व्यक्ति

Create fire in their belly to be ultimate Doers.

ऋषि: गाथिनो विश्वामित्र:

प्रभु का गायन करने वाला सब  के साथ बन्धुत्व को अनुभव करता है और ‘ सखायस्त्वा वृणीमहे हम सब परस्पर सखा बन कर ही प्रभुका वरण कर सकते हैं यही भावना सभी से स्नेह करने वाला प्राणीमात्र का मित्र‘विश्वामित्र’ बना देती है.

शिक्षकों को उपदेश = विद्यार्थियों में (इन्द्राग्नि: ) उत्साह पूर्वक सदैव अपने लक्ष्य को प्राप्त करने मे विजयी व्यक्तित्व बनाएं

1.इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम | 
अस्य पातं धियेषिता ||ऋ3.12.1

To successfully lead their life, instil among your wards the students the temperaments of Self motivation fired with invincible spirit to always successfully achieve their  goals, and develop   physical and mental strengths with excellence of speech, intelligence & competence.

अस्य सुतं- इन बच्चों की (जीवन में), पातं – रक्षाके लिए, इन्द्राग्नी – जीवन में उत्साह पूर्वक कर्मपरायणता जैसे इंद्र के गुण और शरीर में अपने खान पान जीवन शैली से  ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसी अग्नि की स्थापना करने के लिए , आ गतं- आ कर,गीर्भिर्नो – उत्तम वाणियों द्वारा, धियेषिता – उत्तम  बुद्धि के विकसित करें.

Social Community Responsibility 
2. इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः | 
अया पातमिमं सुतम ||ऋ3.12.2

Develop sense of responsibility & temperaments to evolve knowledge creation and execute projects for community welfare.

इन्द्राग्नी के प्रभाव से चेतना और बुद्धि के विकास से समस्त संसार के पालन का प्रबंध उपलब्ध करवाओ.

Seminars-Workshops
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे | 
ता सोमस्येह तृम्पताम || ऋ3.12.3

Hold seminars of experts to focus on current problems to arrive at consensus solutions and adopt them

कविच्छदा- विद्वानों के सत्संग से  , यज्ञस्य- धर्मसम्बंधी व्यवहार से , तृम्पताम- सब के सुख के लिए, इन्द्रमग्निं- समस्याओं को भस्म करने की योजना के  निर्णयों को, वृणे- स्वीकार करें.

Develop Problem Solving Talents

तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता | 

इन्द्राग्नी वाजसातमा ||ऋ3.12.4

Develop talents to develop fail safe solutions to problems, and ability to balance the allocation of resources for (R&D) knowledge development and execution of the projects.

वृत्र हणा- समस्याओं के दूर करने के लिए , तोशा – नाश कारक बाधाओं का , सजित्वानापराजिता –  विज्ञान शील पराजित न होने वाले प्रगति शील समाधानों द्वारा , वाजसातमा हुवे – समस्त ज्ञान विज्ञान के साधनों  और ऊर्जा की शक्तियों को प्राथमिकता के अनुसार महत्व दें.

Recognize the talented   
5.प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः | 
इन्द्राग्नी इष आ वृणे || ऋ3.12.5

Give recognition to research projects that propose strategies for growth and welfare of socity by participatory democratic processes.

वामर्चन्त्य – इन निर्णयों योजनाओं को कार्यान्वित करने वाले  दोनों -विद्वत्‌जन और प्रशासनीय कार्य कर्ता,  नीथाविदो- नम्रनिवेदन से , उक्थिनः उल्लेख के योग्य हैं.

Effectiveness of strategy  

6. इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम | 
साकमेकेन कर्मणा ||ऋ3.12.6

A single strategy implementation should be able to relegate the situations that bring harm to (90%) most of the community

एक ही सफल योजना के कार्यान्वित करने से अधिकांश (90%) समाज के कष्टों का निवारण सम्भव होता है.

Well conceived strategies 
7. इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः | 
ऋतस्य पथ्या अनु || ऋ3.12.7

To follow well meditated, fair and just strategies in all situations in short term and long term.

अपसस्पर्युप- कर्म मार्ग में सब ओर और समीप से, ‘ प्र यन्ति धीतय:’ बुद्धिमत्ता पूर्वक   ‘ऋतस्य पथ्या अनु’ सत्य मार्ग का अनुसरण करें

Staff & Line Function

8. इन्द्राग्नी तविषाणि वां सधस्थानि प्रयांसि च | 
युवोरप्तूर्य्यं हितम्‌ || ऋ3.12.8

To cultivate both the staff functions and line functions- the planners and executors should perform in tandem to implement all projects efficiently.

योजना आयोग और  कृयान्वन पक्ष  राजाऔर शासन  एक दूसरे के पूरक  बन के समस्त योजनाओं को शीघ्रता से सफल बनाते हैं .

Staff & Line Function

9.इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः | 
तद्वां चेति प्र वीर्य्यम्‌ ||ऋ3.12.9

राजा और शासन दोनों के पराक्रम और कर्मण्यता से सूर्य की ज्योति से प्रकाशित दिन के समान उज्वल समृद्ध समाज/राष्ट्र का निर्माण सम्भव है |

By the joint dedicated efforts of planning and executive immense welfare and prosperity of the community is possible.

Bounties of Forests

forest 

Bounties of Forests

ऋषि: ऐरम्मदो देवमुनि:-गृहस्थ से वानप्रस्थ और मितभाषी जीवन में आनंद लेने वाला। Seer of this Vedic Hymn is a person seeking relaxation away from noise of city life and is attracted to living in quiet natural surroundings of forests. देवता:-अरण्यानी – जो अ‍ऋण रखता है देता है बिना लौटाने की इच्छा से. ।Sanskrit name of FOREST means one who does not give loan to be returned with or without interest but provides its bounties as GIFTS.

1.अरण्यान्यरण्यान्यसौ या प्रेव नश्यसि ।कथा ग्रामं न पृच्छसि न त्वा भीरिव विन्दती3ँ ।। 10.146.1

Forests as they are appear to be perishing/deserted but they do not deter your entry and do not ask any questions about your antecedents.

2. वृषारवाय वदते यदुपावति चिच्चिक: ।आघाटिभिरिव धावयन्नरण्यानिर्महीयते ।। 10.146.2

Ambient (fauna ) sounds in the forests such as singing crickets, birds are very soothing and convey a calming peaceful message.

3.उत गाव इवादन्त्युत वेश्मेव दृश्यते । उतो अरण्यानि: सायं शकटीरिव सर्जति ।। 10.146.3

Cow with other animals find sustenance in the wild like in their homes, and when in the evening carts laden with forest produce emerge they return to their home, as if the gods in forests are sending them back to their homes with carts laden with bounties of the forests.

4. गामङ्गैष आ ह्वयति दार्वङ्गैषो अपावधीत् ।वसन्नरण्यान्यां सायमक्रुक्षदिति मन्यते ।। 10.146.4

The gods of forest as if give directions to the cows from not going astray, and allow men to cut down on some trees. Those who chose to make their dwellings in forest become accustomed to hear fearful noises in the darkness of the nights.

(This has been a traditional Indian practice with our forests. It is now accepted that lower branches of trees should be regularly lopped off. This provides leaf fodder for cows, and fire wood for rural women. But there is a great advantage hidden in the practice of pruning forest trees. This allows sun light to reach the ground level to facilitate undergrowth in forests. This undergrowth not only stabilizes the forest soil. This prevents soil erosion that results in Landslides and Floods. Green Undergrowth ground cover also gives rise to Pseudomonas Syringe bacteria that ensure regular rains in forests.)

5. न वा अरण्यानिर्हन्त्यन्यश्चेन्नाभिगच्छति ।स्वादो: फलस्य जग्ध्वाय यथाकामं नि पद्यते ।। 10.146.5

Forests cause no harm to anyone who goes there to partake of the sweet fruits and bounties of nature, and not to exploit the forest wealth for his greed.

6.आञ्जनगन्धिं सुरभिं बहु अन्नामकृषीवलाम् । प्राहं मृगाणां मातरमरण्यानिमशंसिषम् ।। 10.146.6

Give recognition to role of Forests like a mother. Uncultivated without human efforts unselfishly they provide sweet smelling scents like those of musk deer and sustenance to nurture cows and humans to feed freely on excellent nutritive natural food.

Writer- Subodh Kumar 

Atankvad and Nation Building

peace bird

Atankvad and Nation Building

RV7.104 reiterated as AV8.4

Twins of: इन्द्रसोम इन्द्रवरुण:, इन्द्राग्नि:,मित्रवरुण: make great contributions in Nation Building.  Here the role of इन्द्रसोम:  has been described.   

राष्ट्र निर्माण में इन्द्रसोम:,  इन्द्रवरुण:, इन्द्राग्नि:,मित्रवरुण: का बड़ा योगदान होता है. इस स्थान पर इन्द्रसोम: पर वेदों का व्याख्यान पाया जाता है.

 

ऋषि: – मैत्रावरुणिर्वसिष्ठ: । देवता:- (रक्षोघ्नं) इन्द्रासोमौ; 8, 16, 19-22 इन्द्र:; 9, 12-13 सोम:; 10-14 अग्नि:; 11 देवा:; 17 ग्रावाण:; 18 मरुत:; 23 (पूर्वार्धस्य) वसिष्ठाशी: (उत्तरार्धस्य) पृथिव्यन्तरिक्षे ।

त्रिष्टुप्, 1-6, 18,21,23 जगती; 7 जगतीत्रिष्टुप् वा; 25 अनुष्टुप्।

(हरिशरण जी सिद्धांतालंकार – मनोहर विद्यालंकार जी ,  ऋग्वेद के ऋषि: से साभार  )

मैत्रावरुणिर्वसिष्ठ: – तांड्य ब्राह्मण के अनुसार मित्रावरुण प्राण अपान हैं, इन को  पूर्णरूप से सबल

 बनाने वाला ऋषि  मैत्रावरुणि है. यह वश करने वालों में श्रेष्ठ होने से ‘वसिष्ठ’हैं,अथवा उत्तम निवास शील होने से वसिष्ठहैं | ऐसा मानव जितेंद्रिय हो कर इस शरीर मे वास करता है.  यही बात दूसरी प्रकार से ऐत्रेय  में चक्षु और मन को मित्रावरुणि और इन को वश में रखनेवाले को वसिष्ठ  बता कर उपदेश दिया है. प्रभु से प्रार्थना है कि ‘त्वायुजा पृतनायु रभिष्याम्‌’ तेरा साथी बन कर मैं प्रलोभनों की कामादि शत्रुओं की सेना पर विजय पा लूं.  ‘ मा नो अग्ने अवीरते परादा दुर्वाससे’ हम वीर हों अयोग्य जीवनवास करने वाले न हों |

This Sookt of RV 7.104, due to the significance of Nation Building message in it

is found reiterated in Atharv Ved as AV8.4. IndraSomo इन्द्रसोम: is the operative term of this Sookt .  In Nation Building SOMA correspond to the Staff Functions –the software of Planning – Voice of Civil Society reflected in Judiciary & Govt . INDRA corresponds to the hardware Line Functions the state organs of law enforcement Administration, Police and Defence services. Thus IndraSomo इन्द्रसोम: calls for their synergic operations of intelligence and law enforcement for Nation Building.

It is also noted that severe exemplary punishments are laid down for offenders. Only severe punishments act as true deterrents. Only then a king could proclaim as in Chandogyopanishad5.11 “ न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो ननाहिताग्निर्नाविद्वान्न  स्वाइरी स्वैरिणी कुत:.”  There are no thieves in my kingdom, no greedy hoarders’ misers, no drunkards, nor those who do not perform Agnihotras, or uneducated persons without wisdom, nor sex offender men hence the question of  female exploitation does not arise.

मेरे जनपद में न चोर हैं, न कृपण, न शराबी,न अग्निहोत्र न करने वाले हैं, न मूर्ख हैं , न व्यभिचारी (पुरुष)  फिर व्यभिचारिणी स्त्री कहां.?

राष्ट्र निर्माणके लिए इन्द्रसोमो का वर्णन – सोम केवल न्यायोचित सर्वहितकारी मार्ग दर्शन कर  सकता

है परन्तु उस का पालन कराने के लिए जितेंद्रिय राजा को इन्द्र के रूप में  सोम के साथ जुड़ना आवश्यक हो जाता है.

(स्वामी समर्पणानान्द जी के ऋग्वेद मण्डल – मणि –सूत्र पर आधारित )

 

1.इन्द्रासोमा तपतं रक्ष उब्जतं न्यर्पयतं वृषणा तमोवृध: ।
परा शृणीतमचितो न्योषतं हतं नुदेथां नि शिशीतमत्रिण: ।।  RV 7.104.1, AV8.4.1

सात्विक ज्ञान से प्रेरित पराक्रम द्वारा , तामसिक हृदय हीन,मूर्खों को तहस नहस कर दो. दूसरों का सर्वस्व खा जाने वालों को सर्वथा क्षीण कर दो.

Motivated with selfless intellect and strength of  your valour, destroy and render  ineffective,  the heartless, lecherous, selfish, wicked elements from society that prosper by usurping the entire wealth of others.

 

2.इन्द्रासोमा समघशंसमभ्य1घं तपुर्ययस्तु चरुरग्निवाँ  इव ।
ब्रह्मद्विषे क्रव्यादे घोरचक्षसे द्वेषो धत्तमनवायं किमीदिने ।। RV7.104.2, AV8.4.2

पापाभिलाषी जनों को अच्छी तरह से दबा दो.अग्नि पर रक्खी हवि की भांति उन्हें

संताप प्राप्त हो.असत्याचरण करने वाले, कच्चा मांस खाने की भयंकर दृष्टि से दूसरे के धनादि को हड़प कर जाने वालों पर सदैव द्वेष धारण करो.

 

3.इन्द्रासोमा दुष्कृतो वव्रे अन्तरनारम्भणे तमसि प्र विध्यतम् ।
यथा नात: पुनरेकश्चनोदयत् तद् वामस्तु सहसे मन्युमच्छव: ।। RV 7.104.3, AV8.4.3

दुष्कर्म करने वालों को जिन गुफाओं में वे छिपे हैं वहीं घोर अंधकार में ही बींध डालो.झां से एक भी फिर बाहर न आ पाए. तुम्हारा जगप्रसिद्ध बल क्रोध  से युक्त हो कर उन्हे दबाने के लिए हो.

 

 

4.इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवो वधं सं पृथिव्या अघशंसाय तर्हणम् ।
उत तक्षतं स्वर्यं पर्वतेभ्यो येन रक्षो वावृधाना निजूर्वथ: ।। RV7.104.4, AV8.4.4

पापाभिलाषी पुरुष के विरुद्ध तुम द्यु से पृथिवी से विनाशकारी अस्त्र का प्रयोग करो.पर्वतों जैसे ऊंचे ऊंचे बादलों से भयङ्कर स्वर वाला शस्त्र उत्पन्न करो, जिस के द्वारा बढ़्ते हुए राक्षस को जला डालो.

 

5.इन्द्रासोमा वर्तयतं दिवस्पर्यग्नितप्तेभिर् युवमश्महन्मभि: ।
तपुर्वधेभिरजरेभिरत्रिणो नि पर्शाने विध्यतं यन्तु निस्वरम् ।। RV7.104.5, AV8.4.5

सात्विक ऊर्जा और बल से इन को आकाश से लुढ़का दो.आग से तपे हुए पत्थरों की सी मार करने वाले कभी जीर्ण न होने वाले संतापकारी आग्नेय अस्त्रं द्वारा सर्वभक्षी पापियों की पसलियों को बींध दो, जिस से वे शब्दहीन हो कर चुप चाप दुनिया से चले जाएं.

 

6.इन्द्रासोमा परि वां भूतु विश्वत इयं मति: कक्ष्याश्वेव वाजिना ।
यां वां होत्रां परिहिनोमि मेधया इमा ब्रह्माणि नृपतीव जिन्वतम् ।। RV7.104.6, AV8.4.6

 

इंद्र- कर्मठ व्यक्तित्व  और सोम- सात्विक बुद्धि द्वारा प्रेरित ज्ञान,  दो बलवान घोड़ों को एक समान रथ में सुशोभित , राज्य के अनुकूल आदेशों को कार्यान्वित  करने का साधन  देखा जाता है.

 

 

7.प्रति स्मरेथां तुजयद्भिरेवैर्हतं द्रुहो रक्षसो भङ्गुरावत: ।
इन्द्रासोमा दुष्कृते मा सुगं भूद् यो न: कदा चिदभिदासति द्रुहा ।। RV7.104.7, AV8.4.7

इंद्र सोम अपने गति साधनों का स्मरण करो. राष्ट्र, समाज द्रोह करने वाले असुर नष्ट करो. समाज राष्ट्र को कष्ट पहुंचाने वाले जन दुष्कर्म कभी भी सुगमता से न कर सकें.

 

8.यो मा पाकेन मनसा चरन्तमभिचष्टे अनृतेभिर्वचोभि: ।
आप इव काशिना संगृभीता असन्नस्त्वासत इन्द्र वक्ता ।। RV7.104.8,AV8.4.8

शुद्ध मन से चलने वालों पर जो व्यक्ति झूठे वचनों द्वारा आरोप लगाता है, उस के वचन मुट्ठी में से जल की भांति निकल जाएं. झूठ बोलने वाला व्यक्ति सत्ता रहित हो जाए.

 

9.ये पाकशंसं विहरन्त एवैर्ये वा भद्रं दूषयन्ति स्वधाभि: ।
अहये वा तान् प्रददातु सोम आ वा दधातु निर्ऋतेरुपस्थे ।। RV7.104.9, AV8.4.9

जो दुष्ट हमारे भोजन को मिलावट से निस्सार, अथवा स्वादिष्ट किंतु हानि कारक बना कर अन्न को दूषित करते हैं, ऐसे ठग और शत्रु हीनता को प्राप्त हों उन का सामर्थ्य और व्यवस्था नष्ट कर दी जाए.

 

 

 

10.यो नो रसं दिप्सति पित्वो अग्ने यो अश्वानां यो गवां यस्तनूनाम् ।
रिपु स्तेन स्तेयकृद् दभ्रमेतु नि ष हीयतां तन्वा3 तना च ।। RV7.104.10, AV8.4.10

जो घोड़ों, गौओं की नसल बिगाड़ते हैं, गौ के दुग्ध को निस्सार करते हैं. वे मानवता के शत्रु और निक्रिष्ट, हीन लोग हैं. उन की सामर्थ्य और व्यवस्था का नाश कर देना चाहिए

 

 

11.पर: सो अस्तु तन्वा तना च तिस्र: पृथिवीरधो अस्तु विश्वा: ।
प्रति शुष्यन्तु यशो अस्य देवा यो नो दिवा दिप्सति यश्च नक्तम् ।। RV7.104.11, AV8.4.11

ऐसे दोषी जनों को देश से निष्कासित कारावास दण्ड देना चाहिए.

12.सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते ।
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमोऽवति हन्त्यासत् ।। RV7.104.12, AV8.4.12

परंतु उन के दोष का निर्णय विज्ञान आधारित विद्वान पुरुषों द्वारा  सत्य असत्य के  विचार  के आधार पर होना चाहिए.

 

13.न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति न क्षत्रियं मिथुया धारयन्तम् ।
हन्ति रक्षो हन्त्यासद् वदन्तमुभाविन्द्रस्य प्रसितौ शयाते ।। RV7.104.13, AV8.4.13 सत्य और ज्ञान विज्ञान पर आधारित निर्णय स्वतंत्र न्याय के रक्षा करने वाले हों. वे किसी शक्ति,- धन इत्यादि के  प्रलोभन से  प्रभावित न हों.
14.यदि वाहमनृतदेव आस मोघं वा देवाँ अप्यूहे अग्ने ।
किमस्मभ्यं जातवेदो हृणीषे द्रोघवाचस्ते निर्ऋथं सचन्ताम् ।। 7.104.14,AV8.4.14

जो असत्याचरण का प्रचार करते हैं, जो वैदिक परम्पराओं के विरुद्ध प्रचार ,समाज में  विद्रोह करते  हैं , उन्हे समाज राष्ट्र के शत्रु के समान दण्डित किया जाना चाहिए. वे मृत्यु दण्ड के योग्य हैं

Those who propagate the untruth, or revolt against the traditional/ Vedic wisdom they should be treated as enemies of the society/ nation. They deserve death sentence.

 

15.अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य ।
अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह ।। RV7.104.15, AV8.4.15

यदि मैंने स्वार्थवश धूर्ताचरण से समाज का अहित और  पर्यावरण को क्षति पहुंचाने का दोषी हूं तो मै मृत्युदण्ड पाऊं.

If I have caused harm by sorcery/cheating in my self interest to life / health/property/ environments, I deserve to be dead.

 

16.यो मायातुं यातुधानेत्याह यो वा रक्षा: शुचिरस्मीत्याह ।
प्रजापीड़क और जोराजा को भी ना

There may those who are cheats and sorcerers themselves, but accuse me of being one.  They deserve to be exposed as beings of very low character and should be given proper punishment.

 

17.प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहा तन्वं1 गूहमाना ।
वव्राँ अनन्ताँ अवसा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दै: ।। RV7.104.17, AV 8.4.17

जो राक्षस स्वभाव वाला अपने को पवित्राचरण वाला बता कर असहाय सज्जन प्रजाजनों की हिंसा करता है वह निकृष्ट  कर्म करता है, और मृत्यु दण्ड के योग्य है.

 

18.वि तिष्ठध्वं मरुतो विक्ष्विच्छत गृभायत रक्षस: सं पिनष्टन ।
वयो ये भूत्वी पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे ।। RV7.104.18, AV 8.4.18

It is the function of secret services to look for those culprits who conceal their wrong actions by flying like birds in darkness of night, and in their daily activities resort to violent activities.
19.प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन् त्सं शिशाधि ।
प्राक्तादपाक्तादधरादुदक्तादभि जहि रक्षस: पर्वतेन ।। RV7.104.19, AV 8.4.19

.(Can we see a suggestion of a Drone like attacks here?

By intelligent innovative methods and adequate financial support, smart sharp  weapons like thunder bolts from sky and all sides may rain on them to destroy them

20.एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवोऽदाभ्यम् ।
शिशीते शक्र: पिशुनेभ्यो वधं नूना सृजदशनिं यातुमद्भ्य: ।।RV 7.104.20, AV8.4 .20

These inhuman persons behave like hungry dogs and want to take on the might of invincible Nationalistic forces. They indeed have to be dealt with like mad dogs.

 

21.इन्द्रो यातूनामभवत् पराशरो हविर्मथीनामभ्याविवासताम् ।
अभीदु शक्र: परशुर्यथा वनं पात्रेव भिन्दन् त्सत एति रक्षस: ।। RV7.104.21, AV 8.4.21

ऐसी राक्षस वृत्ति वाले प्रजा पीड़क, आक्रामक, यज्ञ विध्वंसक तत्वों को आमूलनष्ट करना चाहिए .

 

 

 

 

22.उलूकयातुं शुशुलूकयातुं जहि श्वयातुमुत कोकयातुम् ।
सुपर्णयातुमुत गृध्रयातुं दृषदेव प्र मृण रक्ष इन्द्र ।। RV7.104.22, AV 8.4.22

समाज से उल्लू की तरह रात्रि के अंधकार में छिप कर अथवा  कर्कश स्वर से चीख कर भयभीत कर के हिंसा करने की , कुत्तों की तरह आपस में लड़ने झगड़ने, भेड़ियों की तरह दूसरों को काटने क्रूर व्यवहार करने की , चकवे –हन्स की तरह कामुक और समलैंगिक व्यवहार करने की  ,गरुड़ की भंति अभिमानी जनों और गिद्ध की भांति लोभ राक्षसी वृत्तियों का उन्मूलन करो.

Destroy the evil spirit of indulging in criminal behaviors like owls by scaring innocent with their shrill noises in darkness and attack, fight and shout at each other like stray dogs, indulge in violence like wolves, exhibit strong sexual behavior like birds particularly homosexual traits of geese, exhibit greed like vultures and egoist proud behavior like golden eagle to eliminate from society.

 

23.मा नो रक्षो अभि नडयातुमावतामपोच्छतु मिथुना या किमीदिना ।
पृथिवी न: पार्थिवात् पात्वंहसोऽन्तरिक्षं दिव्यात् पात्वस्मान् ।। RV7.104.23, AV8.4.23

No terrorists and violence creators should ever be able to show their presence.

यातना पहुंचाने वाले, राक्षस आदि समा के शत्रु कोई  भी हमारे  निकट ना आ पावे.

 

 

24.इन्द्र जहि पुमांसं यातुधानमुत स्त्रियं मायया शाशदानाम् ।
विग्रीवासो मूरदेवा ऋदन्तु मा ते दृशन् त्सूर्यमुच्चरन्तम् ।। RV7.104.24, AV 8.4.24 प्रजा के शत्रुओं, कुटिल आचरण कर हिंसा करनेवालों को, चाहे वे पुरुष हों अथवा  स्त्री मृत्यु दण्ड दो. अभिचार कर्म करने वाले दुष्ट जन ग्रीवा (गर्दन से )  रहित हो कर नाश को प्राप्त हों. वे आकाश में चढ़ते सूर्य को न देख पावें .

Those who commit heinous crimes and then murder, they should be hanged from neck to die. The justice should be meted out so expeditiously that they do not see another sun rise.

 

25.प्रति चक्ष्व वि चक्ष्वेन्द्रश्च सोम जागृतम् ।
रक्षोभ्यो वधमस्यतमशनिं यातुमद्भ्य: ।। RV7.104.25, AV 8.4.25

सुरक्षा अधिकार्यों को हिंसक समाज के शत्रुओं की गतिविधियों को सदैव ध्यानदे कर विवेचना करनी चाहिए और उन को नष्ट करने के लिए प्रभावशाली उपाय करने चाहिएं.

Intelligence and security agencies should be ever vigilant, and keep a close watch over all terrorist violence enacting elements, analyse their modus operendii and carry out  effective operations to destroy them.

Writer – Subhodh Kumar 

 

 

Are even women and Shudraas (low-caste) allowed to study the Vedas?

 

women and shudras

Are even women and Shudraas (low-caste) allowed to study the Vedas?

Q- What shall we do if they take to reading? Besides, there is no authority for their doing so. On the other hand, is condemned by the Vedas thus – Shruti “Never should women and the Shoodraas study.”

A. ~ All men and women ( i.e., the whole of mankind) have a right to study. You may go and hang yourselves. As for the text you have quoted, it is of you own fabrication, and is no where to be found either in the Vedas or any other authoritative book. On the other hand, here is a verse from the Yajur Veda that authorizes all men to study the Veda and hear it read:- God says:- “As I have given this Word (i.e., the four Vedas) which is the word of salvation* for all making [Here some one might say that by the word Jana, which we have translated into all mankind, only Dwijas are meant, as in the Smritis** ( so-called) they alone are allowed to study the Veda but not women and Shoodraas, the other half of this verse answers this objection by adding] – Braahmans, Kshatryas, Vaishyaas, Shoodraas, women, servants, aye, even the lowest of the low, so should you all do, i.e., teach and preach the Veda and thereby acquire true knowledge, practise virtue, shun vice, and consequently being freed from all sorrow and pain, enjoy true happiness.” YAJUR VEDA 26:2.

Now sir, shall we believe your word or God’s ? God’s, certainly. He who will still refuse to believe, (that women and Shoodraas are entitled to Veda learning) shall be called a Nastika (an infidel) because Manu has said, “He is an infidel who is a reviler and disbeliever of the Veda.” Does not God desire the welfare of the Shoodraas? Is God prejudiced that he should allow the study of the Veda to Dwijas and disallow it to Shoodraas?

Had God meant that the Shoodraas should not study the Veda or hear it read, why should He have created the organs of speech and hearing in their bodies? As He has created the sun, the moon, the earth, the water, the fire, the air, various food and drinks, etc., for all, so has He revealed the Veda for all. Wherever it is declared (in the books of Rishis) that the Shoodraas are debarred from the study of the Veda, the prohibition simply amounts to this that he, that does not learn anything even after a good deal of teaching, being ignorant and destitute of understanding, is called a Shoodraa. It is useless for him to learn, and for others to teach him any longer. As for you debarring women from education, that only shows your ignorance, selfishness and stupidity. Here is an authority from the Veda entitling girls to study:- “Just as boys acquire sound knowledge and culture by the practice of Brahmacharya and then marry girls of their own choice, who are young , well educated, loving and of like temperament, should girl practice Brahmacharya study the Veda and other sciences and thereby perfect her knowledge, refine her character, give her hand to a man of her own choice, who is young, learned and loving.” ATHARVA VEDA 11, 14:3, 18.

 

Q-Should even women read the Veda?

 

A. ~ Certainly. Here is an authority from the Shraut Sutra: “(In the Yajna) let the wife recite this mantra.”

Were she not a scholar of the Veda as well as of other Shaastraas, how could she in the Yajna receive the Vedic Mantraas with proper pronunciation and accent, as well as speak Sanskrit?

In ancient India, Gaargi and other ladies, – jewels among women – were highly educated and perfect scholars of the Veda. This is clearly written in the Shatpatha Brahmana. Now if the husband be well-educated and the wife ignorant or vice versa, there will be a constant state of warfare in the house. Besides of women were not to study, where will the teachers, or Girls’ schools come from? Nor could ever the affairs of the state, the administration of justice, and the duties of married life, that are required of both husband and wife [such as keeping each other happy, the wife having the supreme control over all household matters] be carried on properly without thorough education ( of men and women).

The Kshatriyaas women in ancient India, used to be well-acquainted even with the military science, or how could they have gone with their male relations and fought side by side with them in battle-fields, as Kekai did with her royal husband Dasharatha. Therefore it behoves Braahman and Kshatriyaa women to acquire all kinds of knowledge, and Vaishya women to learn trace, and the mechanical arts and the like, and Shoodraa women, the art of cooking, etc.

As men should, at the very least, learn the science of Grammar, Dharma and their profession or trade, likewise should women learn Grammar, Dharma*, Medical Science, Mathematics and the mechanical arts at the least, for without a knowledge of these, ascertainment of truth, proper behaviour towards their husbands and other people, bearing of good children, their proper up-bringing and instruction, proper management of the household affairs, preparation of foods and drinks in accordance with the requirements of Medical Science, ( so that they may act on the system like good medicine and keep the whole family free from disease and thereby make them happy), can never be effected.

Without a knowledge of mathematics, they can never keep accounts of their household properly; and without a knowledge of true religion, as taught by the Veda and other Shaastraas, they cannot know what God and Dharma are, and can never, therefore, escape going astray from the path of rectitude.

Verily, those parents have done their duty and, therefore, a thousand thanks to them, who have their best to make their children practise Brahmacharya, acquire knowledge, and perfect their character, which al help to develop both their bodies and minds to the fullest extent, so that they may accord a just and righteous treatment to all – parents, husbands, wives, fathers -in-laws, mothers-in-laws, their king and fellow subjects, neighbours, friends and offspring, etc.

Knowledge alone is the inexhaustible treasure; the more you spend it, the more it grows. All other treasures run out by spending, and the claimants inherit their shares as well. Thieves cannot steal this treasure, nor, can anyone inherit it.

It is the chief duty of the rulers, as well as of the ruled, to protect and augment this treasure.

Manu says:- “The State should make it compulsory for all to send their children of both sexes to school at the said* period and keep them there for the said** period till they are thoroughly well-educated. It should be made a penal offence to break this law. In other words, let no child – whether a girl or a boy – be allowed to stay in the house*** after the 8th year; let him remain in the seminary till his Samaavartana time, [i.e. the period of Return home****] and let no one be allowed to marry before that.” MANU 7:152.

Again says Manu:- “Of all gifts (that one can bestow on another) – water, food, animals ( as cows, and buffaloes), sesamum seeds, land, clothes, gold, and butter, etc. – that of the knowledge of the Veda is the best and the noblest.” MANU 4:233

Let all, therefore, try their utmost to disseminate knowledge with all their heart, with all their soul, and with all the material resources at their command.

That country alone prospers where Brahmacharya is properly practised, knowledge is keenly sought after, and the teachings of the Vedic religion followed.