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सूक्ष्म ईश्वर स्थूल न होने के कारण आंखों से दिखाई नहीं देता

ओ३म्

सूक्ष्म ईश्वर स्थूल होने के कारण आंखों से दिखाई नहीं देता

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

संसार के अधिकांश लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं और बहुत से ऐसे भी है जो ईश्ष्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं  रखते। आंखों से दिखाई न देने के कारण वह ईश्वर की सत्ता से इनकार कर देते हैं। इन भाइयों को यह नहीं पता की सूक्ष्म पदार्थ आंखों से देखे नहीं जा सकते। क्या हम वायु और जल के एक  अणु वा इसके दो तत्वों हाइड्रोजन व आक्सीजन के परमाणुओं को देख पाते हैं? कोई भी वैज्ञानिक आंखों से न दिखने वाले परमाणुओं सहित वायु व अन्य सूक्ष्म पदार्थों के अस्तित्व से इनकार नहीं करता। यदि वैज्ञानिक आंखों से न दिखने वाले अनेक पदार्थों को मान सकते हैं तो फिर ईश्वर  पर ही यह शर्त लगाना हमें अल्प बुद्धि वालों का ही कार्य प्रतीत होता है। हमने किसी अज्ञात व्यक्ति को एक पत्र लिखा और डाक से भेज दिया। पत्र पाने वाला हमें देख नहीं रहा है। हमें जानता भी नहीं है। परन्तु वह पत्र को पढ़कर हमें हमारे पते पर उसका उत्तर भेज देता है। उसे पत्र देखकर ही हमारी सत्ता का विश्वास हो जाता है। हमने पत्र भेजने वाले को नहीं देखा और न उसने हमें देखा परन्तु एक दूसरे की सत्ता को दोनों स्वीकार करते हुए आपस में पत्रव्यवहार करते हैं। यहां हमारा पत्र उसमें लिखी बातें ही हमारे अस्तित्व के होने का प्रमाण है। इसे लक्षण प्रमाण कह सकते हैं। पत्र लक्षण है हमारे विद्यमान होने का। यदि हम न होते तो पत्र भेजा ही नहीं जा सकता था। इसी प्रकार संसार में भिन्नभिन्न पदार्थों की रचना को देखकर इसके रचयिता का ज्ञान प्रत्यक्ष होता है। सूर्य को देखकर इसको बनाने धारण करने वाले का, इसी प्रकार से पृथिवी, पृथिवी पर विद्यमान सभी पदार्थ और समस्त जड़ जंगम जगत एक ईश्वर के होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। स्वार्थी, अज्ञानी, मूर्ख, हठी, दुराग्रही व अविद्या से ग्रस्त लोग दूसरे मनुष्य के सत्य को भी असत्य ही ठहराते हैं और अपने असत्य को सत्य मान कर व्यवहार करते व दूसरों को भ्रमित कर उसमें फंसाने का काम करते हैं। यही स्थिति हमें ईश्वर को न मानने वालों में से अधिकांश शिक्षित लोगों की लगती है। उनके पास विवेक की कमी है और वह सब मिथ्या प्रचार के शिकार हैं।

आईये, विचार करते हैं कि यदि ईश्वर न होता तो क्या हमारे इस दृश्य संसार का अस्तित्व होता?  हम व वैज्ञानिक जानते हैं कि यह संसार जड़ पदार्थों के परमाणुओं से मिलकर बना है। भिन्न-भिन्न तत्वों के सूक्ष्म परमाणु मिलकर सूक्ष्म अणु बनाते हैं और उन अणुओं की घनीभूत अवस्था यह दृश्य पदार्थ होते हैं। अब प्रश्न यह है कि सृष्टि के उपादान कारण इन परमाणुओं और उन परमाणुओं से अणुओं को किसने बनाया? किसको पता था कि इस सृष्टि में मनुष्य व अन्य प्राणी जन्म लेंगे, वह जल, वायु, अन्न, दूध, फल, मेवे आदि का सेवन कर जीवित रहेंगे, इसलिये उनके लिए आवश्यक सभी पदार्थ बनाने होंगे। यह सोचने योजना बनाने का काम जड़ पदार्थ कदापि नहीं कर सकते। यह कार्य केवल चेतन पदार्थ वा सत्ता द्वारा ही सम्भव होता है। ‘‘ज्ञान जड़ पदार्थों का गुण नहीं है। जड़ता और चेतन गुण परस्पर विरोधी होते हैं। दोनों भिन्न भिन्न पदार्थ है। यह एक दूसरे से नहीं बनते अपितु जड़ पदार्थों का कारण सत्व, रज व तम गुणों वाली सूक्ष्म प्रकृति है। चेतन पदार्थों में आने वाले जीवात्मा और ईश्वर अनादि, अजन्मा व नित्य पदार्थ हैं। ईश्वर व जीवात्मा चेतन पदार्थ होने के कारण ही इनमें ज्ञान होता है। ईश्वर अनादि, सर्वज्ञ, सर्वशतक्तिमान, निराकार, सर्वव्यापक और सच्चिदानन्दस्वरूप है। अनादि होने से उसने एक बार नहीं, सौ हजार बार नहीं अपितु अनन्त बार इसी प्रकार की सृष्टि को बनाया धारण कर संचालन किया है। यदि वह न बनाता तो यह हमारी सृष्टि न बनती। प्रलय अवस्था अर्थात् ब्रह्म रात्रि में में ईश्वर इस सम्पूर्ण सृष्टि को 4.32 अरब वर्षों तक नहीं बनाता है तो यह नहीं बनती। परमाणुओं की पूर्व अवस्था सत्व, रज व तम अवस्था में यह प्रकृति सूर्य न होने के कारण घोर अन्धकार में रहती है। उसके बाद ईश्वर इस सृष्टि को बनाता है तो बन जाती है। अब बनाई है तो इसकी आयु 4.32 अरब वर्ष पूर्ण होने पर यह प्रलय को प्राप्त होगी। प्रलयवस्था का समय पूरा होने पर ईश्वर इसे अपनी शाश्वत व सनातन सन्तान वा प्रजा जीवात्माओं के लिए पुनः बनायेगा। इसी प्रकार उसने इससे पूर्व भी ऐसी ही सृष्टि को अनन्त बार बनाया है। यह सृष्टि चक्र इसी प्रकार से चलता आ रहा है। इसमें शंका व भ्रान्ति अज्ञानियों व अविद्या से ग्रस्त लोगों को होती है। इस दृष्टि से हमारे जो वैज्ञानिक इस वैदिक सत्य सिद्धान्त को नहीं मानते उनके बार में भी यह मानना पड़ता है कि वह इस विषय में, अन्य विषयों में नहीं, अविद्या अर्थात् मिथ्या ज्ञान से ग्रस्त हैं। अतः यह विज्ञान का सिद्धान्त है कि कोई भी रचना तभी होती है जब कोई चेतन सत्ता ईश्वर व मनुष्य उसकी रचना करे। यदि वह नहीं करेंगे तो प्रयोजनवान रचना का अस्तित्व सम्भव नहीं है। अपने आप बिना कर्ता व रचयिता के कोई पदार्थ कदापि नहीं बनता है। इसको अधिक विस्तार से जानने के लिए वेद व दर्शन ग्रन्थों मुख्यतः सांख्य, वैशेषिक, योग, न्याय आदि को देखना व पढ़ना चाहिये। इससे सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती हैं।

वेद और वैदिक धर्म को छोड़कर सभी मत-मतान्तर-सम्प्रदाय-धर्म विज्ञान से प्रायः शून्य हैं। यूरोप के जिन देशों में हमारे सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक उत्पन्न हुए, वहां के धर्म व मतों में विज्ञान के विपरीत अन्य सिद्धान्त पाये जाते थे। इस कारण उन्होंने धर्म को विज्ञानहीन व विज्ञान का विरोधी मान लिया और आज तक मानते आ रहे हैं जबकि वेदों में यह बात नहीं है। वेद कहते ही ज्ञान को हैं और वेद पूर्ण ज्ञान विज्ञान सम्मत हैं। हमारा अनुमान और विश्वास है कि यदि यूरोप के सभी विद्वान भारत में उत्पन्न होते, वेद और वेदिक साहित्य को पढ़ते तो वह एक स्वर से ईश्वर जीवात्मा के अस्तित्व को अवश्य स्वीकार करते। यदि आज भी संसार के सभी वैज्ञानिक वेदों व वैदिक साहित्य का सत्य स्वरूप जान लें तो वह अवश्य ही ईश्वर व जीवात्मा विषयक भ्रान्तियों से मुक्त हो सकते हैं।

 

ईश्वर दिखाई नहीं देता, इसका एक कारण यह भी है कि ईश्वर हमसे बहुत दूर, अतिदूर है और निकट से निरटतम भी है। सूर्य पृथिवी से 13 लाख गुणा बड़ा बताया जाता है परन्तु आकाश में यह एक गेद या फुटबाल के समान दिखाई देता है। इसका कारण पृथिवी और सूर्य के बीच की दूरी संबंधी विज्ञान के नियम हैं। ईश्वर सूर्य में व्यापक होने से विद्यमान है व उससे भी कहीं अधिक दूर होने से भी आंखों से दिखाई नहीं देता। हमारी आंख में यदि कोई तिनका पड़ जाये तो भी वह अति निकट होने के कारण दिखाई नहीं देता। उसे आंख से निकाल कर हाथ पर रखकर देख सकते हैं। अतः आंखों में भी समाये होने के कारण ईश्वर हमें दिखाई नहीं देता। आंखों के अन्धे हमारे भाईयों को भी संसार की सभी वस्तुयें होने पर भी दिखाई नहीं देती। दिखाई देने के लिए आंखों का निर्विकार होना भी आवश्यक है। अतः यदि अन्धा व्यक्ति यह कहे कि मुझे संसार दिखाई नहीं देता, अतः यह है ही नहीं, ऐसा ही तर्क उन लोगों का है जो कहते हैं कि ईश्वर दिखाई न देने से नहीं है। फिर ईश्वर का अनुभव व ज्ञान कैसे हो? ईश्वर का ज्ञान किस प्रकार हो इसके लिए हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू आदि अनेक भारतीय व विदेशी भाषाओं में उपलब्ध सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को पढ़कर जाना व अनुभव किया जा सकता है। योगदर्शन जीवात्मा को परमात्मा वा ईश्वर के साथ जोड़ने की विद्या का ग्रन्थ है। इसे पढ़कर, समझ कर व अभ्यास कर ईश्वर का प्रत्यक्ष किया जा सकता है। वेदों का अध्ययन कर ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव को जानकर उसे आंखे बन्द कर अपनी आत्मा में खोजने पर वह ईश्वर की कृपा होने पर यथासमय साक्षात् जाना जा सकता है। इसे ईश्वर-साक्षात्कार कहा जाता है। महर्षि दयानन्द व अनेक योगियों ने ईश्वर का साक्षात्कार किया था। आज भी देश में ईश्वर साक्षात्कार किये हुए योगी हो सकते हैं। ईश्वर साक्षात्कार के साधक तो हजारों व लाखों में है जिनके अपने-अपने आश्चर्यजनक अनुभव होते हैं। प्राचीनकाल में हमारे सभी ऋषि-मुनि ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए होते थे जिन्हें आप्त पुरूष कहा जाता था। महर्षि दयानन्द ने सन्ध्योपासना की विधि लिखी है। इसे पढ़कर व समझकर साधनाभ्यास करने से भी ईश्वर को जाना व प्रत्यक्ष किया जा सकता है। ईश्वर का वेद वर्णित संक्षिप्त स्वरूप लिखकर हम इस लेख को विराम देते हैं। वेदों के अनुसार ईश्वर कि जिसके ब्रह्म, परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्मिान्, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणयुक्त है, उसी को परमेश्वर कहते हैं। ईश्वर के इसी स्वरूप को सभी धार्मिक बन्धुओं को मानना चाहिये। इससे भिन्न स्वरूप को मानने वाले लोग वस्तुत मिथ्या ज्ञान से ग्रस्त हैं। सत्य को ग्रहण करना और असत्य का त्याग करना मनुष्य का मुख्य धर्म है। जो ऐसा नहीं करता वह धार्मिक नहीं पाखण्डी ही कहा जा सकता है।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

सृष्टि उत्पत्ति क्यों और कैसे ? मानव का प्रादुर्भाव कहाँ? – आचार्य पं. उदयवीर जी शास्त्री

 

सृष्टि का सर्वोत्कृष्ट प्राणी मानव है। मानव को अपनी इस स्थिति के विषय में कदाचित् अभिमान हो सकता है, पर अधिकाधिक उन्नति कर लेने पराी यह सृष्टि रचना में सर्वथा असमर्थ रहता है। इसका कारण है, मानव जब अपने रूप में प्रकट होता है, उससे बहुत पूर्व सृष्टि की रचना हो चुकी होती है, इसलिये यह प्रश्न ही नहीं उठता कि मानव सृष्टि रचना कर सकता है। तब यह समस्या सामने आती है कि इस दुनिया को किसने बनाया होगा?

भारतीय प्राचीन ऋषियों ने इस समस्या का समाधान किया है। जगत को बनाने वाली शक्ति का नाम ‘परमात्मा’ है, इसको ईश्वर, परमेश्वर, ब्रह्म आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। यह ठीक है कि परमात्मा इस पृथिवी, चाँद, सूरज आदि समस्त लोक-लोकान्तर रूप जगत् को बनाने वाला है, परन्तु जिस मूलतत्त्व से इस जगत् को बनाया जाता है, वह अलग है। उसका नाम प्रकृति है। प्रकृति त्रिगुणात्मक कही जाती है। वे तीन गुण हैं- सत्व, रजस् और तमस्। इन तीन प्रकार के मूल तत्त्वों के लिये ‘गुण’ पद का प्रयोग इसीलिये किया जाता है कि ये तत्त्व आपस में गुणित होकर, एक-दूसरे में मिथुनीभूत होकर, परस्पर गुँथकर ही जगद्रूप में परिणत होते हैं। जगत् की रचना पुण्यापुण्य, धर्माधर्म रूप शुभ-अशुभ कार्मों के करने और उनके फलों को भोगने के लिये की जाती है। इन कर्मों को करने और भोगने वाला एक और चेतन तत्त्व है, जिसको जीवात्मा कहा जाता है। ये तीनों पदार्थ अनादि हैं-ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति।

जगत उत्पन्न होता है या नहीं?

प्रश्न-यह जगत् कभी उत्पन्न नहीं होता, अनादि काल से ऐसा ही चला आता है और अनन्त काल तक ऐसा ही चला जायगा, ऐसा मान लेने पर इसके बनने-बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता, तब इसको बनाने के लिए ईश्वर की कल्पना करना व्यर्थ है। यह चाहे प्रकृति का रूप हो या कोई रूप हो, अनादि होने से ईश्वर की कल्पना अनावश्यक है।

उत्तर-जगत् को जिस रूप में देखा जाता है, उससे इसका विकारी होना स्पष्ट होता है। यदि जगत् अनादि-अनन्त एक रूप हो, तो यह नित्य माना जाना चाहिये, नित्य पदार्थ अपने रूप में कभी परिणामी या विकारी नहीं होता, परन्तु जागतिक पदार्थों में प्रतिदिन परिणाम होते देखे जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों की दृश्यमान स्थिति अपरिणामिनी अथवा अविकारिणी नहीं है। इसमें परिणाम का निश्चय होने पर यह मानना पड़ेगा कि यह बना हुआ पदार्थ है, तब इसके बनाने वाले को भी मानना होगा।

प्रश्न-पृथिव्यादि को विकारी मानने पर भी बनाने वाले की आवश्यकता न होगी। जिन मूलतत्त्वों से इनका परिणाम होना है, वे स्वतः इस रूप में परिणत होते रहते हैं। संसार में अनेक पदार्थ स्वतः होते देखे जाते हैं। अनेक स्वचालित यन्त्रों का आज निर्माण हो चुका है।

उत्तर-पृथिव्यादि समस्त जगत् जड़ पदार्थ है, चेतना-हीन। इसका मूल उपादान तत्त्व भी जड़ है। किसीाी जड़ पदार्थ में चेतन की प्रेरणा के बिना कोई क्रिया होना संभव नहीं। चेतना के सहयोग के बिना किसी जड़ पदार्थ में स्वतः प्रवृत्ति होती नहीं देखी जाती। इसके लिये न कोई युक्ति है, न दृष्टान्त। स्वचालित यन्त्रों के  विषय में जो कहा गया, उन यन्त्रों का निर्माण तो प्रत्यक्ष देखा जाता है। उनको बनाने वाला शिल्पी उसमें ऐसी व्यवस्था रखता है, जिसे स्वचालित कहा जाता है। यन्त्र अपने-आप नहीं बन गया है, उसको बनाने वाला एक चेतन शिल्पी है और उस यन्त्र की निगरानी व साज-सँवार बराबर करनी पड़ती है, यह सब चेतन- सहयोग-सापेक्ष है, इसलिये यह समझना कि पृथिव्यादि जगत् अपने मूल उपादान तत्त्वों से चेतन निरपेक्ष रहता हुआ स्वतः परिणत हो जाता है, विचार सही नहीं है। फलतः जगत् के बनाने वाले ईश्वर को मानना होगा।

प्रकृति की आवश्यकता?

प्रश्न – आपने यह स्पष्ट किया कि ईश्वर को मानना आवश्यक है। यदि ऐसा है, तो केवल ईश्वर को मानने से कार्य चल सकेगा। ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् माना जाता है, वह अपनी शक्ति से जगत् को बना देगा, उसके अन्य कारण प्रकृ ति की क्या आवश्यकता है? कतिपय आचायरें ने इस विचार को मान्यता दी है।

उत्तर- ईश्वर जगत् को बनाने वाला अवश्य है, पर वह स्वयं जगत् के रू प में परिणत नहीं होता। ईश्वर चेतन तत्त्व है, जगत् जड़ पदार्थ है। चेतना का परिणाम जड़ अथवा जड़ का परिणाम चेतन होना संभव नहीं। चेतन स्वरूप से सर्वथा अपरिणामी तत्त्व है। यदि चेतन ईश्वर को ही जड़ जगत् के रूप में परिणत हुआ माना जाय तो यह उस अनात्मवादी की कोटि में आजाता है, जो चेतन की उत्पत्ति जड़ से मानता है। कारण यह है कि यदि चेतन जड़ बन सकता है, तो जड़ को भी चेतन बनने से कौन रोक सकता है? इसलिये चेतन से जड़ की उत्पत्ति अथवा जड़ से चेतन की उत्पत्ति मानने वाले दोनों वादी एक ही स्तर पर आ खड़े होते हैं। फलतः यह सिद्धान्त बुद्धिगय है कि न चेतन जड़ बनता है और न जड़ चेतन बनता है। चेतन सदा चेतन है, जड़ सदा जड़ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जड़ जगत् जिस मूल तत्त्व का परिणाम है, वह जड़ होना चाहिये, इसलिये चेतन ईश्वर से अतिरिक्त मूल उपादान तत्त्व मानना होगा, उसी का नाम प्रकृति है।

जब यह कहा जाता है कि सर्वशक्तिमान् ईश्वर अपनी शक्ति से जगत् को उत्पन्न कर देगा, उस समय प्रकृति को ही उसकी शक्ति के रूप में कथन कर दिया जाता है। वैसे सर्वशक्तिमान् पद के अर्थ में यही भाव अन्तर्निहित है कि जगत् की रचना करने में ईश्वर को अन्य किसी कर्त्ता के सहयोग की अपेक्षा नहीं रहती। वह इस कार्य के लिये पूर्ण शक्त है, अप्रतिम समर्थ है। फलतः यह जगत् परिणाम प्रकृ ति का ही होता है, ईश्वर केवल इसका निमित्त, प्रेरयिता,नियन्ता व अधिष्ठाता है। यही सत्य  स्वरूप प्रकृति सब जगत् का मूल घर और स्थिति का स्थान है।

इस प्रसंग में सत्यार्थप्रकाश [स्थूलाक्षर, वेदानन्द संस्करण, पृ. 191, पंक्ति 10-12] के अन्दर एक वाक्य है, जिसे अस्पष्टार्थ कहा जाता है। वह वाक्य है – ‘यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और जीवात्मा, ब्रह्म और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था, अभाव न था- इस वाक्य के अभिमत अर्थ को स्पष्ट करने व समझने के लिये इसमें से दो अवान्तर वाक्यांशों का विभाजन करना होगा। इस वाक्य में से ‘और जीवात्मा ब्रह्म’ इन पदों को अलग करके रख लीजिये फिर शेष वाक्य को पढ़िये, वह इस प्रकार होगा- ‘यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था, आाव न था।’ इतना वाक्य एक पूरे अर्थ को व्यक्त करता है। जगत् जो अब हमारे सामने विद्यमान है, यह सृष्टि के पूर्व अर्थात् प्रलय अवस्था में असत् के सदृश था, सर्वथा असत् या तुच्छ न था, कारण यह है कि यह प्रकृति में लीन होकर वर्तमान था, तात्पर्य यह कि कारण-रूप से विद्यमान था, इससे प्रतीत होता है कि ऋषि ने कार्य-कारणभाव में सत्कार्य सिद्धान्त को स्वीकार किया है। प्रलय अवस्था में जगद्रूप कार्य कारण रूप से विद्यमान रहता है, उसका सर्वथा अभाव नहीं हो जाता।

जो पद हमने उक्त वाक्य में से अलग करके रक्खे हैं, वे दो अवान्तर वाक्यों को बनाते हैं -1-‘और जीवात्मा वर्त्तमान था’। 2- ‘ब्रह्म वर्त्तमान था’ तात्पर्य यह कि प्रलय अवस्था में प्रकृति के साथ जीवात्मा और ब्रह्म भी वर्तमान थे। इस प्रकार उक्त पंक्ति से ऋषि ने उस अवस्था में तीन अनादि पदार्थों की सत्ता को स्पष्ट किया है तथा इस मन्तव्य का एक प्रकार से प्रत्यायान किया है, जो उस अवस्था में एक मात्र ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार करते हैं, जीव तथा प्रकृति की स्थिति को नहीं मानते, इनका उद्भव ब्रह्म से ही मान लेते हैं।

तीन अनादि पदार्थों के मानने पर जगद्रचना की व्याया सर्वाधिक निर्दोष की जा सकती है। कारण यह है कि लोक में किसी रचना के हेतु तीन प्रकार के देखे जाते हैं। प्रत्येक कार्य का कोई बनाने वाला होता है, कुछ पदार्थ होते हैं, जिनसे वह कार्य बनाया जाता है, कुछ सहयोगी साधन होते हैं। पहला कारण निमित्त कहलाता है, दूसरा उपादान और तीसरा साधारण। संसार में कोई ऐसा कार्य संभव नहीं, जिसके ये तीन कारण नहीं है। जब दृश्यादृश्य जगत् को कार्य माना जाता है तो उसके तीनों कारणों का होना आवश्यक है। इसमें जगत् की रचना का निमित्त कारण ईश्वर, उपादान कारण प्रकृति तथा जीवों के कृत शुभाशुभ कर्म अथवा धर्माधर्म आदि साधारण कारण होते हैं, इसलिये इन तीनों पदार्थों को अनादि माने बिना सृष्टि की निर्दोष व्याया नहीं की जा सकती।

ब्रह्म से ही जगत्-उत्पत्ति नहीं?

प्रश्न-वेदान्त दर्शन पर विचार करने वाले तथाकथित नवीन आचार्यों की यह मान्यता है कि एक मात्र ब्रह्म को वास्तविक तत्त्व मानने पर सृष्टि की व्याया की जा सकती है। उनका कहना है कि जगत् के निमित्त और उपादान कारण को अलग मानना आनावश्यक है। एक मात्र ब्रह्म स्वयं अपने से जगत् को उत्पन्न कर देता है, उसे अन्य उपादान की अपेक्षा नहीं। लोक में ऐसे दृष्टान्त देखे जाते हैं। मकड़ी अपने आप से ही जाला बुन देती है, बाहर से उसे कोई साधन-सहयोग लेने की अपेक्षा नहीं होती, ऐसे ही जीवित पुरुष से केश-नख स्वतः उत्पन्न होते रहते हैं। इसी प्रकार ब्रह्म अपने से ही जगत् को उत्पन्न कर देता है।

उत्तर – यह बात पहले कही जा चुकी है कि यदि ब्रह्म अपने से जगत् को बनावे तो वह विकारी या परिणामी होना चाहिये। ब्रह्म चेतन तत्त्व है, चेतन कभी विकारी नहीं होता। इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि चेतन ब्रह्म का परिणाम जगत् जड़ कैसे हो जाता? क्योंकि कारण के विशेष गुण कार्य में अवश्य आते हैं। या तो जगत् भी चेतन होता, या फिर कार्य जड़-जगत् के अनुसार उपादान कारण ईश्वर या ब्रह्म को भी जड़ मानना पड़ता, पर न जगत् चेतन है, और न ईश्वर जड़, इसलिये ईश्वर को जगत् का उपादान कारण नहीं माना जा सकता।

ब्रह्म उपादान से जगत् की उत्पत्ति में मकड़ी आदि के जो दृष्टान्त दिये जाते हैं, उनकी वास्तविकता की ओर किसी ब्रह्मोपादानवादी ने क्यों ध्यान नहीं दिया, यह आश्चर्य की बात है। ये दृष्टान्त उक्त मत के साधक न होकर केवल बाधक हैं। मकड़ी एक प्राणी है, जिसका शरीर भौतिक या प्राकृतिक है और उसमें एक चेतन जीवात्मा का निवास है। उस प्राणी द्वारा जो जाला बनाया जाता है, वह उस भौतिक शरीर का विकार या परिणाम है, चेतन जीवात्मा का नहीं। यहाी ध्यान देने की बात है कि शरीर से जाला उसी अवस्था में बन सकता है, जब शरीर का अधिष्ठाता चेतन जीवात्मा वहाँ विद्यमान रहता है। वह स्थिति इस बात को स्पष्ट करती है कि केवल जड़ तत्त्व चेतन के सहयोग के बिना स्वतः विकृत या परिणत नहीं होता। दृष्टान्त से स्पष्ट है कि जाला रूप जड़ विकार जड़ शरीर का है, चेतन जीवात्मा का नहीं। इस दृष्टान्त का उद्भावन करने वाले उपनिषद् (यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च) वाक्य में यही स्पष्ट किया है कि जैसे मकड़ी जाला बनाती और उसका संहार करती है, उसी प्रकार अविनाशी ब्रह्म से यह विश्व प्रादुर्भूत होता है।

उपनिषद् के उस वाक्य में ‘यथा’ और ‘तथा’ शद ध्यान देने योग्य हैं। जैसे मकड़ी जाला बनाती और उपसंहार करती है- ‘तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम्’, वैसे अविनाशी ब्रह्म से यहाँ विश्व प्रादुर्भूत होता है। अब देखना यह है कि जाला मकड़ी के भौतिक शरीर से परिणत होता है और बनाने वाला अधिष्ठाता चेतन आत्मा वहाँ इस प्रवृति का प्रेरक है, चेतन स्वयं जाला नहीं बनता, ऐसे ही ब्रह्म अपने प्रकृति रूप देह से विश्व का प्रादुर्भव करता है। समस्त विश्व परिणाम प्रकृति का ही है, प्रकृति से होने वाली समस्त प्रवृत्तियों का प्रेरक व अधिष्ठाता परमात्मा रहता है। वह स्वयं विश्व के रूप में परिणत नहीं होता, इसलिए वह विश्व का केवल निमित्त कारण है, उपादान कारण नहीं हो सकता।

जगत् का निर्माण क्यों?

प्रश्न- यह ठीक है कि सृष्टिकर्त्ता ईश्वर है और वह प्रकृति मूल उपादान से जगत् की रचना करता है, परन्तु प्रश्न है, जगत् की रचना में उसका क्या प्रयोजन है? जगत् की रचना किस लक्ष्य को लेकर की जाती है? यदि इसका कोई प्रयोजन ही नहीं, तो रचना व्यर्थ है, उसने क्यों ऐसा किया? वह तो सर्वज्ञ है, फिर ऐसी निष्प्रयोजन रचना क्यों?

शेष भाग अगले अंक में…..

Creation of life: Aachary Udayveer ji

Advaitwaad Khandan Series 11: पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

ग्यारहवाँ अध्याय

शंकर – सूक्तियाँ

यद्यपि शांकर  – भाश्य में मौलिक भूलें हैं तथापि जैसा हम पहले कह चुके हैं श्री शंकराचार्य महाराज के भाश्य मंे अनेक ऐसी सूक्तियां पाई जाती हैं जिन से वैदिक धर्म और वैदिक संस्कृति के उत्थान मंे बडी सहायता मिलती है । यदि मायावाद, छायावाद, स्वप्नवाद, ब्रह्मोकवाद, जीव ईष्वर अभेद वाद, प्रकृति – विरोधवाद को छोड दिया जाय या आँख से ओझिल कर दिया जाय तो शांकर  – भाश्य अर्णव मंे बहुत से रत्न हैं जो वेद तथा वैदिक ग्रन्थों से मथ कर ही निकाले गये हैं । उनसे पाठकों को बहुत लाभ हो सकता है । हम यहाँ कुछ नमूले के तौर पर देते हैं:-

(1)

वेदस्य हि निपेक्ष स्वार्थे प्रामाण्यं रवेरिति रूप विशये ।

(2।1।1 पृश्ठ 182)

वेद स्वतः प्रमाण है । इसके प्रमाणत्व में किसी अन्य को नहीं । जैसे सूय्र्य की रूप विशय में ।

(2)

ब्रह्म जिज्ञासा के लिये चार बातें चाहियेंः-

(अ) नित्यानित्य वस्तु विवेकः

नित्य और अनित्य की पहचान!

(आ) इहामुत्रार्थभोगविरागः ।

लोक और परलोक के भोग से विरक्ति!

(इ) षमदमादि साधन संपत् ।

षम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान रूपी छः मानसिक वृत्तियां ।

(ई) मुमुक्षुत्व ।

मोक्ष की इच्छा !

(3)

(1।1।1 पृश्ठ 5)

महतः ऋग्वेदादेः षास्त्रस्यानेकविद्यास्थानोपबृंहितस्य प्रदीपवत् सर्वार्थविद्योतिनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म । नहीद्रषस्य षास्त्रस्यग्र्वेदादिलक्षणस्य सर्वज्ञ गुणान्वितस्य सर्वज्ञादन्यतः संभवोस्ति ।

(1।2।3 पृश्ठ 9)

ऋग्वेद आदि बडे षास्त्र हैं । उनमंे अनेक विद्यायें हैं । दीपक के समान वे सब अर्थों के द्योतक हैं । ऐसे सर्वगुण सम्पन्न षास्त्रों का प्रकाष सर्वज्ञ ईष्वर के सिवाय और किसी से नहीं हो सकता ।

(4)

तच्च सम्îग् ज्ञानमेकरूपं वस्तुतन्त्रत्वात् । एकरूपेण ह्यवस्थितो योऽर्थः स परमार्थ । लोके तद्विशयं ज्ञानं सम्यग्ज्ञान मित्युच्यते यथाग्निरूश्ण इति ।

(षां॰ भा॰ 2।1।11 पृश्ठ 194)

जो ज्ञान एक रूप रहे वह सम्यक् हैं, क्यांेकि वह वस्तु के आश्रित् है । परमार्थ वही है जो एक रूप में स्थित रहे, जैसे अग्नि की उश्णता ।

(5)

ध्यानं चिन्तनं यद्यपि मानसं तथापि पुरूशेण कर्तुमकतु मन्यथा वा कत्तुं षक्यं, पुरूशतन्त्रत्वात् । ज्ञानं तु प्रमाणजन्यं प्रमाणं च यथाभूत वस्तु विशयमतो ज्ञानं कर्तुमकर्तुमन्यथावा कत्र्तुमषक्य केवलं वस्तु तन्त्रमेव तत् ।

(1।1।4 पृश्ठ 18)

ध्यान यद्यपि मानस व्यापार है तो भी वह पुरूश के अधीन है, करे, न करे, या अन्यथा करे । ज्ञान प्रमाण जन्य है प्रमाण वस्तु विशय के आश्रित है । इसलिये ज्ञान मंे करने, न करने, या उल्टा करने का प्रष्न नहीं । वह वस्तु के आधीन है

(6)

ज्ञानस्य नित्यत्वे ज्ञानक्रियां प्रति स्वातंत्र्यं ब्रह्मणो हीयते । अथानित्यं तदिति ज्ञानक्रियाया उपरमेतापि ब्रह्म, तदा सर्वज्ञान षक्तिमत्त्वेनैव सर्वज्ञत्वमापतति ।

(1।1।5 पृश्ठ 25)

यदि ब्रह्म सर्वज्ञ है और उसका ज्ञान नित्य है तो संसार मंे जो क्रियायें हुआ करती हैं उनके जानने के लिये ब्रह्म स्वतन्त्र न रहेगा । क्यांेकि उसका ज्ञान बदलेगा नहीं । और यदि वह ज्ञान अनित्य है तो ब्रह्म कभी ज्ञान क्रिया से उपरत भी हो जायगा । अर्थात् ब्रह्म कभी ज्ञान क्रिया को नहीं भी करेगा । इसलिये यही मानना चाहिये कि ब्रह्म की सर्वज्ञता से ‘‘सर्वज्ञान – षक्ति’’ ही अभिप्रेत है ।

(7)

‘‘प्राण’’ के चार अर्थ:-

(1) वायुमात्र (2) देवतात्मा (3) जीव (4) परंब्रह्म ।

(1।1।28 पृश्ठ 56)

(8)

न ह्यन्यत्र परमात्मज्ञानाद्धिततम प्राप्तिरस्ति ।

(1।1।28 पृश्ठ 57)

परमात्मा के ज्ञान से इतर और कोई परम हितकारी प्राप्ति नहीं है ।

(9)

क्रतुः संकल्पो ध्यानमित्यर्थः ।

(1।2।1 पृश्ठ 63)

‘क्रतु’ का अर्थ है संकल्प या ध्यान!

(10)

यद्यपि अपौरूशेये वेदे वक्तुरभावान् नेच्छार्थः संभवति तथा प्युपादानेन फलेनोपचर्यते । लोके हि यच्छब्दाभिहितमुपादेयं भवति तद् विवक्षितमित्युच्यते, यदनुपादेयं तदविवक्षितमिति तद् वद् वेदेप्युपादेयत्वेनाभिहितं

विवक्षितं भवति इतरदविवक्षितम् ।

(1।2।2 पृश्ठ 64-35)

वेद अपौवुशेय है । कोई उसका वक्ता नहीं । इसलिये कहने की इच्छा का प्रष्न नहीं उठता । तथापि उपादान फल के उपचार से ऐसा कहा जाता है । लोक मंे देखते हैं कि जो उपादेय है उसको विवक्षित (कहने योग्य) कहते हैं । जो उपादेय नहीं उसको ‘अविवक्षित’ । ऐसे ही वेद मंे भी है ।

(11)

नन्वोष्वरोपि षरीरे भवति । सत्यम् । षरीरे भवति न तु षरीर एव भवति, ‘ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षात्’ ‘आकाषवत् सर्वगतश्च नित्यः’ इति च व्यापित्वश्रवणात् । जीवस्तु षरीर एव भवति, तस्य भोगाधिश्ठानाच्छरीरादन्यत्र वृत्त्यभावात् ।

(षां॰ भा॰ 1।2।3 पृश्ठ 66)

जीव को ‘षरीर’ (षरीर वाला) कहते हैं । ईष्वर को नहीं । इस पर प्रष्न करते हैं कि जब ईष्वर भी षरीर मंे रहता है तो वह भी षारीर क्यों नहीं? इसका उत्तर देते हैं । यह ठीक है कि ईष्वर षरीर में है । परन्तु ‘षरीर मंे ही है’ ऐसा नहीं। श्रुति में कहा है कि ‘वह पृथ्वी से भी बडा है’, । अन्तरिक्ष से भी बडा है । आकाष के समान व्यापक है नित्य है । इसके विरूद्ध जीव केवल षरीर में ही है । षरीर से बाहर नहीं । षरीर ही उसके भोग का स्थान है । षरीर से बाहर उसकी वृत्ति नहीं । अतः जीव ही ‘‘षारीर’’ है । ईष्वर नहीं ।

(12)

कर्मफल भोगस्य प्रतिशेवकमेतद् दर्षनं, तस्य संनिहितत्वात् । न विकारसंहारस्य प्रतिशेधकं, सर्ववेदान्तेशु सृश्टि स्थिति संहार कारणत्वेन ब्रह्मणः प्रसिद्धत्वात् ।

(1।2।9 पृश्ठ 70)

ईष्वर कर्मफल का भोक्ता नहीं । इसका यह अर्थ नहीं कि ईष्वर सृश्टि मंे विकार और संहार भी नहंी करता । सब वेदान्त मंे प्रसिद्ध है कि ईष्वर स्त्रश्टि, स्थिति और संहार करने वाला है ।

(13)

विष्वश्चायं नरष्चेति, विष्वेशां वायं नरः, विष्वे वा नरा अस्येति विष्वानरः परमात्मा, सर्वात्मत्वात् । विष्वानर एव वैष्वानरः ।

अग्नि षब्दोपि अग्रणीत्वादि योगाश्रयेण परमात्म विशय एव भविश्यन्ति ।

(1।2।28 पृश्ठ 91)

परमात्मा को वैष्वानर कहते हैं क्योंकि वह विष्व नर या विष्व का नर है । या सब नर उसी के हैं ।

अग्रणी होने से अग्नि भी ईष्वर का ही नाम है ।

(देखो स्वामी दयानन्द का सत्यार्थ प्रकाष समुल्लास पहला) ।

(14)

सर्वाणीन्द्रियकृतानि पापानि वारयतीति सा वरणा, सर्वाणीन्द्रियकृतानि पापानि नाषयतीति सा नासीति ।

भ्रुवोघ्राणस्य च यः संधिः स एश द्यौलोकस्य परस्य च संधि र्भवति ।

(1।2।32 पृश्ठ 93)

जो पापों को वारे वह वरणा, जो उनको नासे वह नासी । यह ‘वाराणसी’ की व्युत्पत्ति है । नाक के ऊपर भौओं के बीच का भाग ईष्वर के ध्यान होने से ‘वाराणसी’ है । आजकल ‘वाराणसी’ काषी या बनारस नगर का नाम है ।

(15)

नहीदमतिगम्भीरं भावयाथत्म्यं मुक्तिनिबन्धनमागममन्तरे-णोत्प्रेक्षितुमपि षक्यम् रूपाद्यभावाद्धि नायमार्थः प्रत्यक्षगोचरः, लिंगाद्यभावाच्च नानुमानादीनामिति चावोचाम ।

(2।1।11 पृश्ठ 193)

मुक्ति का विशय अति गंभीर है । इसलिये वेद से ही इसका ज्ञान होता है । मुक्ति में न तो रूप आदि है कि प्रत्यक्ष से ज्ञान हो सकता । न लिंग आदि हैं कि अनुभव आदि से ज्ञान हो सके ।

(16)

यद्यपि अस्माकमियं जगद्विम्बविरचना गुरूतरसंरम्भेवाभाति तथापि परमेष्वरस्य लीलैव केवलेयम् । अपरिमित षक्तित्वात् ।

(2।1।33 पृश्ठ 217)

यद्यपि जगत् की रचना हमको बडी भारी तैय्यारी का फल प्रतीत होती तो भी ईष्वर के लिये यह लीला के समान है क्योंकि ईष्वर की षक्ति अपरिमित है ।

(17)

यथापि पर्जन्यो व्रीहि यवादि सृश्टौ साधारणं कारणं भवति, व्रीहियवादि वैशम्ये तु तत्तद् बीजगतान्येवासाधारणानि सामथ्र्यानि कारणानि भवन्ति, एवमीष्वरो देवमनुश्यादिसृश्टौ साधारणं कारणं भवति । देवमनुश्यादि वैशम्येतु तत्तज् जीवगतान्येवा साधारणानि कर्माणि कारणानि भवन्ति ।

(2।1।34 पृश्ठ 217-218)

जैसे चावल जौ आदि के उत्पत्ति मंे वर्शा साधारण कारण है और उनका भेद उनको बीजों के भेद के कारण है इसी प्रकार देव मनुश्य आदि की उत्पत्ति मंे ईष्वर सामान्य कारण है और उनके भेद उन – उन जीवों के भिन्न – भिन्न कर्मों के कारण हैं ।

(18)

‘पुर्यश्टकेन लिगंेन प्राणाद्येन स युज्यते । तेन बद्ध वै बन्धो मोक्षो मुक्तस्य तेन च ।’

षरीर के आठ बन्धन हैं । इनसे बद्ध होता है । और इनसे जो मुक्त है वही मुक्त है ।

(1) प्राणादि पच्चक्रम् ।

प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान ।

(2) भूतसूक्ष्म पच्चक्रम् ।

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाष ।

(3) ज्ञानेन्द्रिय पच्चक्रम् ।

आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा ।

(4) कर्मेन्द्रिय पश्चक्रम् ।

हाथ, पैर, वाणी, पायु, उपस्थ ।

(5) अन्तःकरण चतुश्टय ।

मन, बुद्धि, चित्त, अंहकार ।

(6) अविद्या ।

(7) काम वासना ।

(8) कर्म ।

(2।4।3 पृश्ठ 311)

(16)

अन्नंषब्दश्चोपभोगहेतुत्व सामान्यादनन्नेऽप्युपचयमाणो द्रष्यते । यथा विषोऽत्रं राज्ञां पषवोऽत्र विषामिति ।

(3।1।7 पृश्ठ 329)

‘अन्न’ षब्द सब उपभोग की सामग्री के अर्थों में भी आता है । केवल खाद्य पदार्थ के अर्थ में ही नहीं । जैसे प्रजा राजा का अन्न है और पषु प्रजा के अन्न हैं ।

(20)

यथेह क्षुधितावाला मातर पर्युपासते, एवं सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ।

(3।3।40 पृश्ठ 414)

जैसे भूखे बालक माता को चाहते हैं ऐसे ही सब भूत अग्निहोत्र को चाहते हैं । अर्थात् बिना अग्निहोत्र के पंचभूत अपूर्ण रहते हैं । अग्निहोत्र पूरक हैं । उससे क्षीण अंष की पूर्ति हो जाती है ।

(21)

यदा प्रक्रान्तस्य विद्यासाधनस्य कश्चित् प्रतिबन्धो न क्रियते उपस्थितविपाकेन कर्मान्तरेण तदेहैव विद्योत्पद्यते, यदा तु खलु तत् प्रतिबन्धः क्रियते तदामुत्रेति ।

(3।4।51 पृश्ठ 457)

यदि किसी अन्य कर्म का फल बाधक न हो । तो विद्या का फल इसी जन्म मंे मिलता है । और यदि कोई प्रतिबन्ध आ जाय तो दूसरे जन्म में ।

(22)

उपासनं नाम समानप्रत्यय प्रवाहकारणं न च तद् गच्छते । धावतो वा संभवति गत्यादीनां चित्तविक्षेपकत्वात् । तिश्ठतोऽपि देहधारणे व्यापृतं मनोन सूक्ष्मवस्तु निरीक्षणक्षमं भवति । षयानस्याप्यकस्मादेव निद्रयाभिभूयेत । आसीनस्य त्वेवं जातीयको भूयान् दोशः सुपरिहर इति ।

 

(4।1।7 पृश्ठ 470)

एक ही प्रत्यय का प्रवाह करना उपासना है । उपासना चलते या दौडते नहीं हो सकतीं । क्योंकि चलने फिरने से चित्त विक्षिप्त होता है । खडे होने में भी मन षरीर के रोके रखने में व्यग्र रहता है अतः सूक्ष्म वस्तु का निरीक्षण नहीं कर सकता । लेटने में निद्रा की संभावना रहती है । इसलिये बैठ कर ही उपासना करने में दोशों से बचत है ।

(23)

नहि वयं कर्मणः फलदायिनी षक्तिमवजानीमहे । विद्यत एव सा, सा तु विद्यादीना कारणान्तरेण प्रतिवध्यत इति बदामः ।

(4।1।13 पृश्ठ 473)

हम कर्म की फलदायिनी षक्ति का अनादर नहीं करते । वह तो होती ही है । परन्तु हमारा तो इतना कहना है कि वह विद्या आदि अन्य कारणों से दब जाती है ।

नोट – इसी का नाम कर्मक्षय है ।

(24)

स्मरति ह्यापस्तम्बः – तद् यथाम्रेफलार्थे निमिते छायागन्धावनूत्पद्येते एव धर्म चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते । इति ।

(4।3।14 पृश्ठ 500)

आप स्तम्ब का कथन है कि जैसे फल के लिये आम लगाओ तो छाया और गन्ध ऊपर से लाभ में मिलती हैं इसी प्रकार धर्म का आचरण करने से अर्थ – लाभ तो ऊपर से हो जाता है ।

(25)

जगदुत्पत्यादि व्यापारं वर्जयित्वाऽन्यदणिमाद्यात्म कमैष्वर्यं मुक्तनां भवितुमर्हति जगद्व्यापारस्तु नित्यसिद्धस्यैतेश्वरस्य ।

(4।4।17 पृश्ठ 510)

अणिमा आदि षक्तियाँ तो मुक्त जीवों को भी प्राप्त हो जाती हैं परन्तु जगत् का रचना आदि तो नित्य सिद्ध ईष्वर के ही वष में है । अर्थात् मुक्त जीव सृश्टि की उत्पत्ति नहीं कर सकते ।

नोट – इससे ज्ञात होता है कि मुक्त जीव जिन्होंने अविद्या से छूट कर मुक्ति को प्राप्त किया है ब्रह्म नहीं हुये । वे जीव ही हैं, और नित्यसिद्ध ब्रह्म अलग है जो सृश्टि करता है । यहाँ शंकर स्वामी ने ‘ईष्वर’ षब्द अपर ब्रह्म के लिये प्रयुक्त नहीं किया जो मायावष सृश्टि उत्पत्ति करता है । शांकर  मत में ईष्वर नित्य सिद्ध नहीं । ब्रह्म ही नित्य सिद्ध है ।

Advaitwaad Khandan Series 10 पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

दसवाँ अध्याय

परस्पर विरोध

श्री शंकराचार्य जी महाराज मायावाद और ब्रह्म के अभिन्न – निमित्त उपादान कारणवाद को सिद्ध करना चाहते थे जो उपनिशदों, वेदान्त तथा वैदिक सिद्धान्त के विरूद्ध है । अतएव कई स्ािनों पर परस्पर विरोध हो गया है । यहाँ कुछ उद्धरण दिये जाते हैं ।

1- (अ) ‘अविकार्योऽयमुच्यते ।’

(षां॰ भा॰ 1।1।4 पृश्ठ 17)

वह ईष्वर अविकारी है ।

 

(क) प्राणानां ब्रह्मविकारत्व सिद्धिः ।

(षां॰ भा॰ 2।4।4 पृश्ठ 308)

इससे सिद्ध है कि प्राण ईष्वर के विकार हैं ।

2- (अ) प्रदीप प्रभायाश्च द्रव्यात्रत्वं व्याख्यातम् ।

(षां॰ भा॰ 2।3।29 पृश्ठ 286)

दीपक का प्रकाष एक द्रव्य ही दूसरा है ।

(क) अग्नेरिवौश्ण्य प्रकाषौ ।

(षां॰ भा॰ 2।3।29 पृश्ठ 286)

जैसे गरमी और प्रकाष अग्नि के गुण हैं ।

 

3- (अ) अविद्यावद् विशयाण्येव प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि षास्त्राणि च ।

(षां॰ भा॰ 1।1।1 पृश्ठ 3)

षास्त्र आदि अविद्यावत हैं । षास्त्र में वेद भी आ गया ।

(क) महतऋग्वेदादेः षास्त्रस्यानेक विद्यास्थानोपवंृहितस्य प्रदीपवत् सर्वार्थावद्योतिनः सर्वज्ञकल्पस्य योनिः कारणं ब्रह्म । (षां॰ भा॰ 1।1।3 पृश्ठ 9)

वेद प्रदीप के समान स्वयं सिद्ध हैं क्यांेकि ब्रह्म ही उसकी योनि है ।

4- (अ) षरीर संबन्धस्य धर्माधर्मयोस्तत् कृतत्वस्य चेतरेताश्रयन्वप्रसंगादन्धपरम्प रैशाऽनादित्वकल्पना ।  (1।1।4 पृश्ठ 22)

यदि षरीर कर्म के आधीन और कर्म षरीर के आधीन मानें जायँ तो यह अनादित्व की कल्पना अन्ध परम्परा हो जायगी ।

(क) नैश दोशः । अनादित्वात् संसारस्य ।          (2।1।45 पृश्ठ 218)

यह दोश नहीं । क्यांेकि संसार अनादि है ।

5- (अ) तत् कृतधर्माधर्म निमित्तं सषरीरत्वमितिचेन्न । षरीरसंबन्धस्यासिद्धत्वाद् धर्माधर्मयोरात्मकृतत्वासिद्धः ।

(षां॰ भा॰ 1।4।4 पृश्ठ 22)

आत्मा के किये हुये धर्म अधर्म के कारण षरीर नहीं है । षरीर का सम्बन्ध तो सिद्ध ही नहीं, और धर्म अधर्म आत्मकृत हैं यह भी सिद्ध नहीं ।

(क) सापेक्षो हीश्वरो विशमां सृश्टिं निर्मिमीते । किमपेक्षत इति वदामः

(2।1।34 पृश्ठ 217)

ईष्वर की बनाई हुई सृश्टि की विशमता अपेक्षा के कारण है । किसकी अपेक्षा से? धर्म और अधर्म की अपेक्षा से । ऐसा हमारा कथन है ।

6- (अ) ज्ञानं तु प्रमाणजन्यम् । (1।4।4। पृ॰ 18)

ज्ञान प्रमाणों द्वारा होता है ।

(क) अविद्यावत् विशयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि ।        (1।1।1 पृश्ठ 2)

प्रत्यक्ष आदि प्रमाण अविद्यावत् हैं ।

7- (अ) द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते, नामरूप विकारभेदोपाधि विषिश्टं, तद् विपरीतं च सर्वोपाधि विवर्जितम् ।          (1।1।12 पृ॰ 34)

ब्रह्म के दो रूप जाने गये हैं एक नामरूप विकार भेद उपाधि विषिश्ट और दूसरा उपाधि रहित ।

(क) समस्त विषेश रहितं निर्विकल्पकमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यं न तद् विपरीतम् ।

(3।2।11 पृश्ठ 356)

ब्रह्म को सब विषेशणों से मुक्त निर्विकल्प ही मानना चाहिये अन्यथा नहीं ।

8- (अ) परस्माद्धि ब्रह्मणो भूतानामुत्पत्तिरिति वेदान्तेशु मर्यादा ।

(1।1।22 पृश्ठ 47)

परब्रह्म से ही भूतों की उत्पत्ति हुई ऐसी वेदान्त वाक्यों की मर्यादा है ।

(क) उपाधीनां चाविद्या प्रत्युपस्थापितत्वात् ।

(3।2।11 पृश्ठ 355-356)

ब्रह्म में उपाधि तो अविद्या के कारण है ।

9- (अ) न ह्येकस्मिन्धर्मिणि युगपत् सदसत्त्वादि विरूद्धधर्मसमावेषः संभवति षीतोश्णवत् ।(षां॰ भा॰ 2।2।33 पृश्ठ 253)

एक ही धर्मो में एक ही समय सत् और असत् दो विरूद्ध धर्म नहीं रह सकते जैसे सर्दी और गर्मी दोनों ।

(क) तत्त्वान्यत्वाभ्याम निर्वचनीये नामरूपे ।        (1।1।5 पृश्ठ 27)

नाम और रूप न तत्व हैं न अतत्व । अनिर्वेचनीय हैं ।

10- (अ) अविद्यावत् विशयाणि प्रत्यक्षदीनि प्रमाणानि ।

(षां॰ भा॰ 1।1।1 पृश्ठ 2)

प्रत्यक्षादि प्रमाण अविद्यावत् हैं ।

(क) यद्धि प्रत्यक्षादीनामन्येतमेन प्रमाणेनोपलभ्यते तत् संभवति । यत् तु न केनचिदपि प्रमाणेनोपलभ्यते तत्र संभवति ।            (2।2।28 पृश्ठ 248)

जो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध हो वह संभव है जो किसी प्रमाण से न सिद्ध हो वह असंभव ।

11- (अ) मायेव संध्ये सृश्टिनं परमार्थ गन्धोऽप्यस्ति ।

(3।2।3 पृ॰ 344)

माया के समान स्वप्न की सृश्टि मंे परमार्थ का गंध भी नहीं है ।

(क) स्मृतिरेशा यत् स्वप्न-दर्षनम् ।               (2।2।29 पृश्ठ 250)

स्वप्न में स्मृति की चीजें ही प्रतीत होती हैं ।

12- (अ) द्विरूपं हि ब्रह्मावगम्यते नामरूप विकार भेदोपाधि विषिश्टं, तद् विपरीतं च सर्वोपाधि विवर्जितम् ।

(षां॰ भा॰ 1।1।12 पृश्ठ 34)

 

 

 

ब्रह्म के दो रूप हैं एक नाम रूप उपाधि वाला, दूसरा उपाधि रहित ।

 

 

 

 

 

(क) समस्त विषेशकरहितं निर्विकल्पमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यं न तद् विपरीतं ।        (3।2।11 पृश्ठ 356)

विषेश रहित, निर्घिकल्प ही ब्रह्म है । इससे विपरीत नहीं ।

न तावत् स्वत एव परस्य ब्रह्मण उभेयलिंगत्वमुपपद्यते ह्येकं वस्तु स्वत एव रूपादि विषेशोपेतं तद् विपरीतं चेत्य-वधारयितंु षक्यं विरोधात् ।

(पृश्ठ 356)

परब्रह्म मंे स्वतः ही उभय लिंगत्व नहीं हो सकता । यह नहीं हो सकता कि एक वस्तु ही स्वतः रूप आदि विषेशता वाली भी हो और इसके विपरीत भी ।

 

13- (अ) अयमनादिरनन्तो नैसर्गिकोऽध्यासः ।

(1।1।1 पृश्ठ 4)

यह अध्यास अनादि अनन्त नैसर्गिक है ।

 

(क) अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय आत्मैकत्व विद्या प्रति एत्तये सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते

(पृश्ठ 4)

इसी अनर्थ के प्रहाण के लिये सब वेदान्त यत्न करते हैं ।

नोट – नैसंर्गिक अनादि अनन्त का प्रहाण कैसा?

 

14- (अ) क्रियासमवाया- भावाच्चात्मनः कर्तृतवानुपपत्तेः ।

(1।1।4 पृश्ठ 22)

आत्मा का कत्र्ता होना सिद्ध नहीं क्यांेकि आत्मा और क्रिया मंे समवाय सम्बन्ध का अभाव है ।

(क) अनादौ तु संसारे बीजांकुरवद्धेतुमöावेन कर्मणः सर्गवैशम्यस्य च प्रवृतिर्न-विरूध्यते ।

(2।1।35 पृश्ठ 218)

अनादि संसार में बीज और अंकुर के समान कर्म और विशमता की प्रवृत्ति मंे कोई विरोध नहीं । अर्थात् ईष्वर जीवों के कर्मों के अनुकूल षरीर आदि देता है ।

 

15- (अ) इदं तु परमार्थिकं, कूटस्थनित्यं, व्योमवत् सर्वव्यापि, सर्व विक्रियाग्हितं, नित्यंतृप्तं, निरवयवं स्वयं ज्योतिः स्वभावम् ।

(1।1।4 पृश्ठ 14)

यह तो परमार्थ में कूटस्थ, नित्य, आकाष के समान सर्वव्यापक, सब क्रियाओं से षून्य नित्य तृप्त, अवयव रहित स्वयं ज्योति है ।

(क) अभिध्योपदेषाच्चात्मनः कर्तृतवप्रकृतित्वे गमयति ।

(1।4।24 पृश्ठ 176)

अभिध्या के उपदेष से ब्रह्म का कर्ता और उपादान होना सूचित होता है ।

नोट – जो विक्रिया रहित हो वह उपादान कैसा?

 

16- (अ) ब्रह्मणोऽपितर्हि सत्तालक्षणः स्वभाव आकाषा दिश्वनुवतमानो द्रष्यते ।

(2।1।6 पृश्ठ 187)

कारण ब्रह्म और काय्र्य आकाष दोनों में सत्तालक्षण मिलता है ।

(क) काय्र्यस्य तद्धर्माणां चाविद्याध्यारोपितत्वान्न तैः कारणं संसृज्यत इति ।

(2।1।9 पृश्ठ 191)

काय्र्य और उसके धर्म सत्य नहीं, अविद्या के आरोपित मात्र हैं ।

 

 

17- (अ) सर्वज्ञस्येश्वर-स्यात्मभूत इव

(2।1।14 पृश्ठ 201)

सर्वज्ञ ईष्वर के ही आत्मभूत ।

 

 

 

 

 

(क) अविद्या कल्पिते नाम-रूप ।

(2।1।14 पृश्ठ 201)

अविद्या कल्पित नाम रूप हैं ।

नोट – यहाँ एक ही वाक्य मंे दो परस्पर विरूद्ध बातें हैंः-

(1) सर्वज्ञ ईष्वर के आत्म भूत ।

(2) अविद्या कल्पित नाम-रूप ।

सर्वज्ञ ईष्वर के अविद्या कल्पित नाम रूप आत्म भूत कैसे हुये?

 

 

 

18- (अ) यथा च कारणं ब्रह्म त्रिशुकालेशु सत्वं न व्याभिचरति एवं कार्यमपि जगत् त्रिशु कालेशु सत्त्वं न व्याभिचरति ।

(2।1।16 पृश्ठ 203)

जैसे कारण ब्रह्म तीनों कालों मंे सत्य है इसी प्रकार काय्र्य जगत् भी तीनों कालों मे सत्य है ।

 

(क) जगत् मिथ्या है ।

 

 

 

 

 

 

 

19- (अ) अनिर्वचनीये नाम रूपे ।

(1।1।5 पृश्ठ 27)

नाम और रूप न सत् हैं न असत् । अनिर्वाचनीय हैं ।

 

 

 

 

(क) अवक्तव्याष्चेत्रोच्येरम् । उच्यन्ते चावक्तव्यष्चेति विप्रतिशिद्धम् ।

(2।2।33 पृश्ठ 253)

अवक्तव्य हैं तो कहना नहीं चाहिये था । कहे भी जाते हो । और अवक्तव्य भी कहते हो । यह तो परस्पर विरोध है ।

 

20- (अ) द्रष्यतेहि लोके चेतनत्वेन प्रसिद्धेभ्यः पुरूशादिभ्यो विलक्षणानां केषनखादीनामुत्पत्तिः । अचेतनत्वेन च प्रसिद्धेभ्यो गोमयादिभ्यो वृश्चिकादीनाम् ।

(2।1।6 पृश्ठ 187)

 

 

(क) विलक्षण काय्र्योत्पत्त्यभ्युपगमात् समानः प्रागुत्पत्तेरसत्काय्र्यवादप्रसंगः ।

(2।1।12 पृश्ठ 192)

विलक्षण काय्र्य की उत्पत्ति से तो असत्काय्र्य वादी हो जाओगे ।

नोट – षंकर स्वामी असत्काय्र्य वादी नहीं । तो भी विलक्षण उत्पत्ति मानते हैं ।

 

 

 

 

 

21- (अ) न ब्रूमो यस्मिन्नचेतने प्रवृत्तिर्द्रष्यते न तस्य सा इति । भवतु तस्यैव सा । सा तु चेतनाद् भवतीति ब्रूमः ।

(2।2।2 पृश्ठ 222)

हम यह नहीं कहते कि जिस अचेतन में प्रवृत्ति देखी जाती है वह उसकी नहीं । उसी की हो । परन्तु हम यह कहते हैं कि यह प्रवृत्ति चेतन से आती है ।

(क) देहेन्द्रियादिश्वहं ममाभिमानरहितस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्यनुपपत्तेः ।

(1।1।1 पृश्ठ 2)

देह और इन्द्रिय आदि में ‘अहं’ ‘मम’ रहित प्रमाता की उपपत्ति नहीं हो सकती । अतः प्रमाण की भी प्रवृत्ति नही ।

नोट – यहाँ यह क्यांे नहीं मानते कि यह प्रवृत्ति आत्मा जो चेतन है उसके कारण है?

 

22- (अ) यथा सुप्तस्य प्राकृतस्यजनस्य स्वप्न उच्चाव-चान्भावान्पष्यतो निष्चितमेव प्रत्यक्षाभिमतं विज्ञानं भवति प्राक्प्रबोधनात् न च प्रत्यक्षाभासाभिप्रायस्तकाले भवति, तद्वत् ।

(2।1।14 पृश्ठ 198)

जैसे स्वप्न में मनुश्य अतथ्य देखता है ऐसे ही जाग्रत में भी अतथ्य ही है ।

(क) न स्वप्नादि प्रत्ययवज् जाग्रत् प्रत्यया भवितुमर्हन्ति । कस्मात् ? वैधम्र्यात् । वैधम्र्य हि भवति स्वप्रजागरितयोः । किं पुनर्वैधम्र्यम् । बाधाबाधाविति ब्रूमः ।

(2।2।21 पृश्ठ 250)

स्वप्न के प्रत्यय और जाग्रत् के प्रत्ययों में भेद है स्वप्न के प्रत्ययों का बाध हो जाता है जाग्रत के प्रत्ययों का बाध नहीं होता ।

 

23- (अ) गायत्री वा इदं सर्वमिती । न ह्यक्षरंनिवेष-मात्राया गायत्र्याः सर्वात्मकत्वं संभवति । तस्माद् यद् गायत्र्याख्य विकारेऽनुगतं जगत्कारणं ब्रह्म तदिह सर्वमित्युच्यते ।

(1।1।24 पृश्ठ 54)

 

(क) विक्रियारहितम् ।

(1।1।4 पृश्ठ 14)

ब्रह्म विकार रहित है ।

 

 

 

 

 

 

24- (अ) नहि जीवनामात्यन्तभिन्नो ब्रह्मणः ।

(1।1।31 पृश्ठ 61)

ब्रह्म से भिन्न जीव नहीं ।

 

 

 

 

 

 

(क) नन्वीष्वरोऽपिषरीरे भवति, सत्यम् । षरीरे भवति न तु षरीर एव भवति ।………..जीवन्तु षरीरएव भवति, तस्य भोगाधिश्ठानाच्छरीरादन्यत्र वृत्त्याभावात् ।

(1।2।3 पृश्ठ 66)

ईष्वर भी षरीर में है । यह ठीक है । परन्तु षरीर में ही है ऐसा नहीं । जीव तो षरीर में ही है । षरीर से बाहर उसकी वृत्ति नहीं जाती । षरीरा उसके भोग का अधिश्ठान है ।

नोट – यहाँ जीव और ईष्वर का स्पश्ट भेद है ।

 

 

25- (अ) कर्तृतवानुपपत्तेः ।

(1।1।4 पृश्ठ 22)

 

 

 

 

 

 

(क) सर्ववेदान्तेशु सृश्टि-स्थिति संहारकारणत्वेन ब्रह्मणः प्रसिद्धत्वात् ।

(1।2।9 पृश्ठ 70)

सब वेदान्तों में प्रसिद्ध है कि ईष्वर सृश्टि, स्थिति और संहार करने वाला है ।

 

26- (अ) नषारीरस्य तनुमहिम्नः ।

(1।2।23 पृश्ठ 85)

जीव अल्पषक्ति है । वह सब भूतों की योनि नहीं हो सकता ।

(क) नहि जीवनामात्यन्त भिन्नो ब्रह्मणः ।

(1।1।31 पृश्ठ 61)

 

 

 

 

 

27- (अ) परमार्थावस्थायां सर्वव्यवहाराभावं वदन्ति वेदान्ताः सर्वे ।

(2।1।10 पृश्ठ 201)

परमार्थ अवस्था में सब व्यवहारों का अभाव होता है । ऐसा वेदान्त मानता है ।

 

 

(क) व्यवहारावस्थायां तूक्तः श्रुतावर्प ष्वरादिव्यवहारः ।

(2।1।10 पृश्ठ 201)

व्यवहार अवस्था में तो वेद में भी ईष्वरादि का व्यवहार किया है ।

नोट – व्यवहार परमार्थ से भिन्न क्यांे है? यदि व्यवहार परम अनर्थ है तो वेद में इसका प्रतिपादन क्यों है? वेद को तो सूय्र्यवत् कहा है ।

 

28- (अ) यत् सर्वज्ञं सर्वषक्ति ब्रह्मनित्यषुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं षारीराधिकमन्यत्, तद्वयं जगतः स्त्रश्ट ब्रूमः ।

(2।1।22 पृश्ठ 208)

जो सर्वज्ञ सर्वषक्तिमान, नित्य षुद्ध बुद्ध बुद्ध मुक्त स्वभाव है और जीव से बडा है, उसी को हम जगत् का स्त्रश्टा कहते हैं ।

(क) जीवस्य संसारित्वं ब्रह्मणश्च स्त्रश्टंत्वं………सम्यग् ज्ञानेन बाधितत्वात् ।

(2।1।22 पृश्ठ 209)

सम्यग् ज्ञान से जीव का संसारीपन और ब्रह्म का स्त्रश्टा होना बाधित हो जाता है ।

नोट – जब बाधित हो गया तो ब्रह्म का स्त्रश्टा होना भी झूठ रहा ।

 

29- (अ) सामान्याद्धि विषेशा उत्पद्यमाना द्रष्यन्ते मृदादेर्घटादयो न तु विषेशेभ्यः सामान्यम् ।

(2।3।9 पृश्ठ 271)

सामान्य से ही विषेश उत्पन्न हुये देखे जाते हैं जैसे मिट्टी से घडे आदि । विषेश से सामान्य नहीं ।

नोट – यहाँ षंकर स्वामी सामान्य विषेश का भेद स्वीकार करते हैं ।

 

(क) न च वैषेशिकैःकल्पितेभ्यः शड्भ्यः पदार्थेभ्योऽन्येऽचिकाः षतं सहस्त्रं वार्था न कल्पयितव्या इति निवारको हेतुरस्ति ।

(2।2।17 पृश्ठ 237)

वैषेशिक ने छः पदार्थों की कल्पना की है । सौ और हजार की भी हो सकती है । कोई हेतु तो है नहीं ।

नोट – यहाँ वैषेशिकों के छः पदार्थों का मखौल उडाया है और आगे स्वयं इन्हीं को माना है

Advaitwaad Khandan Series 9 पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

प्रलय का क्रम

षं॰ स्वा॰ – एवं क्रमेण सूक्ष्मं सूक्ष्मतंर चानन्तरमनन्तरं कारणमपीत्य सर्वं कार्याातं परमकारणं परमसूक्ष्म च ब्रह्माप्यतीति वेदितव्यम् ।

(षां॰ भा॰ 2।2।14 पृश्ठ 295)

इस प्रकार क्रम पूर्वक सूक्ष से सूक्ष्मतर, एक काय्र्य से उसके कारण मंे, फिर उसके कारण में, फिर उसके कारण में अन्त को सभी जगत् अन्त्य कारण परमसूक्ष्म ब्रह्म मंे लय हो जाता है ऐसा जानना चाहिये ।

हमारी आलोचना – यदि सृश्टि मिथ्या और अविद्या जन्य होती तो क्रम कैसे हो सकता था? क्रम विद्या का सूचक है न कि अविद्या का । क्रम – भंग के कारण ही तो स्वप्न विष्वसनीय नहीं होते । स्वप्नों मंे कहीं न कहीं कोई न कोई क्रम भंग ऐसा होता है जिससे स्वप्न का अतत्यत्व प्रकट हो जाता है । सृश्टि – रचना की प्रक्रिया में तो अविद्या और माया को स्थान दिया गया है परन्तु प्रलय की प्रक्रिया में नहीं । यह क्यों ? वहाँ तो केवल यह कह दिया गया:-

भूतानामुत्पत्तिप्रलयावनुलोम प्रतिलोम क्रमाभ्यां भवतः

(षां॰ भा॰ 2।3।15 पृश्ठ 275)

भूतों की उत्पत्ति और प्रलय अनुलोम प्रतिलोम क्रम से होती है । यहाँ प्रतिलोम में न कहीं अविद्या है न माया न अभ्यास । उपनिशद् में भी जहाँ उत्पत्ति का उल्लेख है वहाँ अनुलोम क्रम मंे कहीं अविद्या या माया का उल्लेख नहीं । देखोः-

‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाषः सम्भूतः’ (तै॰ 2।1)

यहाँ एक बात और याद रखनी चाहिये । यद्यपि माया द्वारा सृश्टि की उत्पत्ति में यह कहा जा सकता है कि कुछ क्रम तो होता है चाहे वह उलटा ही हो परन्तु यह बात प्रलय में कैसे घट सकती है? ‘माया – वाद’ से प्रलय की व्याख्या कठिन है । प्रलय और सृश्टि में क्या भेद है? यदि सृश्टि को स्वप्न माना जाय तो क्या प्रलय भी स्वप्न मंे ही षामिल है? यदि स्वप्न ही है तो भेद क्या हुआ? और यदि स्वप्न नहीं, जागृत अवस्था है तो क्रम कैसा? कल्पना कीजिये कि मैंने स्वप्न में देखा कि मैंने व्यापार किया, धन कमाया, गाय खरीदी, दूध दूहा, दही जमाया, रायता बनाया । यह था स्वप्न का क्रम । आँख खुल गई तो व्यापार, धन, गाय, दूध, दही, रायता रूपी सृश्टि एक क्षण मंे समाप्त हो गई । वहाँ प्रतिलोम प्रलय के लिये स्थान ही नहीं । यदि सृश्टि और प्रलय वास्तविक है तो अनुलोम और प्रतिलोम क्रम ठीक है । परन्तु यदि सृश्टि माया या अविद्या के कारण है तो अनुलोम प्रतिलोम क्रम का प्रष्न ही नहीं उठ सकता ।

Advaitwaad Khandan Series 8 पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

शंकर और जादू

शांकर भाष्य में ‘मायावी’ अर्थात् जादूगर का उल्लेख बहुत आता है । श्री शंकराचार्य जी जादू की उपमा देकर इस संसार को मिथ्या सिद्ध करते हैं । आज कल किसी का जादूगर के जादू पर विष्वास नहीं है । बाजारों में नित्य जादू का खेल हुआ करता है । और जादूगर हाथ की चालाकी से कुछ का कुछ दिखा कर लोगों का मनोविनोद किया करते हैं । परन्तु कोई उनसे धोखा नहीं खाता । जादूगर रेत की चुटकी हाथ में लेकर कुछ मन्तर पढ कर रेत की घडी बना देता है । लोग चकित रह जाते हैं । परन्तु किसी को यह विष्वास नहीं होता कि वस्तुतः रेत की घडी बना दी गई हैं । श्री शंकराचार्य जी के समय में जादूगरों के विशय में लोगों की क्या धारणा थी इसका कुछ नमूना भाश्य से मिल जाता है । हम यहाँ कुछ उदाहरण देते हैं ।

(1)

यथा मायाविनश्चर्मखगंधरात् सूत्रेणाकाषमधिरोहतः स एव मायावी परमार्थरूपो भूमिश्ठोऽन्यः ।

(षां॰ भा॰ 1।1।17 पृश्ठ 39)

अर्थ – जैसे असली जादूगर तो जमीन पर खडा रहता है और एक झूठा जादूगर हाथ में ढाल तलवार लिये रस्सी पर चढता हुआ प्रतीत होता है इसी प्रकार जीव ब्रह्म से अलग है । ब्रह्म तो वास्तविक सत्ता है और जीव की केवल प्रतीति होती है । यहाँ श्री शंकराचार्य जी समझते हैं कि वस्तुतः एक मायावी ऊपर चढ जाता है । इसीलिये उन्होंने यह उपमा दी । बात यह नहीं है । रस्सी पर चढे हुये जादूगर भी असली ही होते हैं । उनको इस प्रकार खेल का अभ्यास रहता है कि वह षीघ्र ही उतर चढ सकते हैं । यह उपमा ब्रह्म के विशय मंे विशम ठहरती है । बादरायण के सूत्र में न तो यह उपमा है न इस सिद्धान्त का गन्धमात्र है ।

(2)

यथा स्वयं प्रसारितया मायया मायावी त्रिश्वपि कालेशु न संस्पृष्यते अवस्तुत्वात्, एवं परमात्मापि संसारमायया न संस्पृष्यत इति ।

(षां॰ भा॰ 2।1।9 पृश्ठ 191)

जैसे अपनी फैलायी हुई माया से जादूगर तीन कालों में भी दूशित नहीं होता क्यांेकि वह अवस्तु है इसी प्रकार परमात्मा भी संसार की माया से दूशित नहीं होता ।

यहाँ षं॰ स्वा॰ मान लेते हैं कि जादूगर में यह षक्ति है कि अवस्तु को वस्तु करके दिखा दे । आजकल जादूगर पर बहुत साहित्य उपस्थित है । उसके देखने से ज्ञात हो जाता है कि केवल धोखा है । जादू की उपमा ब्रह्म को देनी सर्वथा असंगत और अनुचित है ।

Advaitwaad Khandan Series 7 पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

शंकराचार्य और पौराणिक मत

यह एक प्रसिद्ध बात है कि पौराणिक मत वैदिक धर्म का एक बिगडा हुआ रूपान्तर है । मूर्ति पूजा, देवी देवते, जाति पांति के बंधन इत्यादि बोसियों बुराइयाँ जिन्हांेने हिन्दू जाति को नश्ट कर डाला वैदिक धर्म में विहित न थीं । पुराणों मंे इनका समावेष हो गया । वेदान्त दर्षन आदि में पुराण तथा पौराणिक सिद्धान्तों के विशय में कुछ भी नहीं पाया जाता । परन्तु षंकर स्वामी के समय मंे वातावरण पौराणिक बातों से भरा हुआ था । अतः उसके प्रभाव मंे आकर षंकर स्वामी ने अपने भाश्य में भी उन बातों को तद्वत् मान लिया । वह वैदिक धर्म और पौराणिक मत में कोई विवेक नहीं कर सके । हम यहाँ कुछ उदाहरण देते हैं:-

(1)

हृद्यपेक्षया तु मनुश्याधिकारत्वात् ।         (1।3।25)

इस सूत्र का सम्बन्ध ‘अंगुश्ठमात्रः पुरूशो मध्य आत्मनि तिश्ठति’ से है (षां॰ भा॰ 1।3।24) यहाँ प्रष्न उठा कि ‘अंगूठे’ तो भिन्न – भिन्न प्राणियों के भिन्न – भिन्न होंगे । इस पर उत्तर देते हैं:-

‘‘मनुश्याधिकारत्वादिति । षास्त्र ह्यविषेश प्रवृत्तमपि मनुश्यानेवाधिकरोति । षक्तत्वात्, अर्थित्वात्, अपर्युदस्तत्वात्, उपनयनादि षास्त्राच्च ।’’

(षां॰ भा॰ पृश्ठ 119)

अर्थात् मनुश्य को ही षास्त्र पढने का अधिकार है । इसलिये मनुश्य के अंगूठे से ही नापना चाहिये । इसके आगे का सूत्र है –

‘‘तदुपर्यपि बादरायणः संभवात्’’ (1,3,26)

इसका सीधा अर्थ यह है कि ‘अगुंश्ठमात्र’ से भी ब्रह्म ऊपर है । अर्थात् वह सब प्राणियों के भीतर है । परन्तु शंकराचार्य जी ने ‘‘देवादयः’’ अर्थात् पौराणिक देवताओं का अर्थ लिया है जिसका मूल सूत्र में कुछ उल्लेख नहीं । इसकी युक्ति देते हैंः-

तत्राथित्वं तावन् मोक्ष विशयं देवादीनामपि संभवति विकार विशय विभूत्यनित्यवालोचनादि निमित्तम् ।

(षां॰ भा॰ पृश्ठ 120)

अर्थात् देवतों को भी मोक्ष की इच्छा है । क्योंकि संासारिक विकार, विशय, विभूति आदि अनित्य हैं ।

तथा सामथ्र्यमपि तेशां संभवति, मंत्रार्थवादेतिहास पुराण लोकेभ्यो विग्रहवत्त्वाद्यवगमात् ।

(षां॰ भा॰ पृश्ठ 120)

पुराण आदि में बताया है कि देवतों में मूर्तिमान् होने की भी षक्ति है ।

देवतों को उपनयन आदि संस्कारों की आवष्यकता नहीं । क्यों?

उपनयन तो वेद पढने के लिये होता है । देवता तो वेदों को जानते ही हैं ।

अपि चैशां विद्याग्रहणार्थ ब्रह्मचर्यादि दर्षयति ।

अर्थात् देवतों को विद्याग्रहण आदि के लिये ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के पालने का भी उपदेष है ।

इन सबसे विदित होता है कि श्री शंकराचार्य जी के देवतों के विशय में कितने अनिष्चित विचार थे । एक ओर तो देवताओं को स्वयं ही वेदों का ज्ञान है (स्वयं प्रतिभातवेदत्वात्) दूसरी ओर उनको पढने और ब्रह्मचर्य रखने की भी आवष्यकता है । शंकराचार्य जी के देवते ‘अमर’ नहीं है । उनको मोक्ष की अभिलाशा है । वह ‘मोक्ष’ भी षंकर जी विचार नहीं करते ? मनुश्यों के बन्धमोक्ष! और देवों के बन्ध-मोक्ष में क्या अन्तर है । इत्यादि इत्यादि ।

क्या इन्द्रादि देव व्यक्तियाँ हैं या जातियाँ । यह भी निष्चित नहीं ।

स्थानविषेशसंबन्धनिमित्ताष्चेन्द्रादिषब्दाः     सेनापत्यादि षब्दवत् ।

(षां॰ भा॰ 1।3।28 पृश्ठ 123)

जैसे सेनापति आदि किसी व्यक्ति विषेश के नाम नहीं किन्तु पदों के नाम हैं ऐसे ही इन्द्र आदि भी ।

तथा देवादिव्यक्ति प्रभवाभ्युपगमेऽप्याकृतिनित्यत्वान्न कश्चिद् वस्वादिषब्देशु विरोध इति द्रश्टव्यम् ।

(षां॰ भा॰ 1।3।28 पृश्ठ 133)

वादि व्यक्तियों का तो जन्म होता है । परन्तु आकृति तो नित्यादि देवों की आकृति से सम्बन्ध है । व्यक्ति से नहीं ।

यहाँ देवों को मनुश्यों की ही एक जाति लिया गया । वे अमर नहीं रहे । वह व्यक्ति भी नहीं रहे केवल पदवियों के नाम रह गयें । इससे देवतापन ही नश्ट हो गया । यह है पौराणिक देवतों की लीला जिसको श्री षंकर स्वामी ने बिना विष्लेशण किये मान लिया है ।

(2)

सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेष्वरानुग्रहा दीष्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तेः ।

(षां॰ भा॰ 1।3।30 पृश्ठ 129)

ईष्वर के अनुग्रह से हिरण्यगर्भ आदि का एक कल्प से दूसरे कल्प तक व्यवहार जारी रहता है ।

यद्यपि महाप्रलय में व्यवहार का उच्छेद हो जाता है तो भी यहाँ ब्रह्म से इतर हिरण्यगर्भ आदि देवताओं की कल्पना की गई है जो वेदों के मत के विरूद्ध है ।

(3)

तथापि प्राणित्वाविषेशेऽपि मनुश्यादिस्तम्बपर्यन्तेशु ज्ञानैष्वर्यादि प्रतिबन्धः परेण परेणभूयान्भवन् द्रष्यते, तथा मनुश्यादिश्वेव हिरण्यगर्भपर्यन्तेशु ज्ञानैष्वर्याद्यभिव्यक्तिरपिपरेण परेण भूयसीभवति ।

(षां॰ भा॰ 1।3।30 पृश्ठ 129)

जिस प्रकार यद्यपि कीट पतंग आदि से लेकर मनुश्य तक सब में प्राण हैं तो भी ज्ञान की अवनति का तारतम्य है इसी प्रकार मनुश्यादि से लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त तक ज्ञान की वृद्धि का तारतम्य है ।

यहाँ यह मान लिया गया कि देवता केवल जीवों की ही उत्कृश्ट योनियाँ हैं ।

(4)

स्मर्यते च – ‘‘आदित्यः पुरूशोभूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह’’ इति ।

(षां॰ भा॰ 1।3।33 पृश्ठ 133)

स्मृति मंे कहा है कि ‘सूय्र्य ने पुरूश का रूप धारण करके कुन्ती के साथ प्रसंग किया ।’

(5)

तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्ष व्यवहरन्तीति स्मर्यते ।

(षां॰ भा॰ 1।3।34 पृश्ठ 135)

स्मृति मंे लिखा है कि व्यास आदि देवताओं से प्रत्यक्ष बात करते थे ।

(6)

तस्मादुपपन्नो मन्त्रादिभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमः ।

(षां॰ भा॰ 1।3।33 पृश्ठ 135)

इसलिये मन्त्रादि से सिद्ध है कि देव मूत्र्तिमान् होेते हैं ।

(7)

एवं प्राप्ते ब्रूमः – न षूद्रसयाधिकारः, वेदाध्ययनाभावात् । अधीतवेदो हि विदितवेदार्थो वेदार्थेश्वधिक्रियते । न च षूद्रस्यवेदाध्ययनमस्ति, उपनयनपूर्वकन्वाद् वेदाध्ययनस्य । उपनयनस्य च वर्णत्रयविशयत्वात् । तत्त्वर्थित्वं न तदसति सामर्थोऽधिकार कारणं भवति । सामथ्र्यमपि न लौकिकं केवलमधिकार कारणं भवति । षास्त्रीयेऽर्थे षास्त्रीयस्य सामथ्र्यस्यापेक्षितत्वात् ।

(षां॰ भा॰ 1।3।34 पृश्ठ 136)

‘‘हमारा उत्तर है कि षूद्रों को अधिकार नहीं । क्यांेकि उन्होंने वेद नहीं पढा । जिसने वेद पढा हो और वेद को समझता हो वही वैदिक कर्मों का अधिकारी है । षूद्र वेद नहीं पढता । वेद पढने के लिये उपनयन आदि संस्कार चाहिये और उपनयन आदि तीन उच्च वर्णों का ही होता है । जब तक सामथ्र्य न हो केवल इच्छामात्र से किसी को अधिकार नहीं हो सकता । सामथ्र्य भी यदि केवल लौकिक हो तो पय्र्याप्त नहीं हैं, षास्त्रीय बातों मंे षास्त्रीय सामथ्र्य चाहिये’’ ।

यहाँ षंकर स्वामी षूद्र को अधिकार नहीं देते । यह वेद के विरूद्ध है । ‘यथेमांवाचं’ इति आदि मन्त्र मंे वेद पढने की आज्ञा सबको है ।

नोट – इस सूत्र में कोई ऐसा षब्द नहीं जिससे षूद्र का वेद पढने का अनधिकार पाया जावे । क्यांेकि इसी सूत्र के भाश्य में षूद्र की व्युत्पत्ति की हैः-

षुचमभिदुद्राव, षुचावाभिदुद्रवे ।

जो षोक से भर जाय, या षोक को भर ले ।

(8)

भवति च वेदोच्चारणे जिह्वाच्छेदो धारणे षरीरभेद इति ।

(षां॰ भा॰ 1।3।38 पृश्ठ 138)

षूद्र वेद का उच्चारण करे तो जीभ छेद दी जाय, वेद को धारण करे तो षरीर का भेद किया जाय ।

षंकर जैसे अद्वैतवादी के लिये यह सिद्धान्त कैसे सह्य हुआ? पौराणिक मत के प्रभाव से ही ।

(9)

यदा कर्मसु काम्येशु स्त्रियं स्वप्नेशु पष्यति समृद्धि तत्र जानी-यात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्षने । (छा॰ 5।2।9)

(षां॰ भा॰ 2।1।14 पृश्ठ 199)

यदि काम्य कर्म करते हुये स्वप्न में स्त्री देखे तो समझ ले कि काम में अवष्य सफलता होगी ।

तथा प्रत्यक्षदर्षनेशु केशुचिदारिश्टेशु जातेशु ‘न चिरमिव जीविश्यतीति विद्यात्’ इत्युक्त्वा ‘अथ स्वप्नाः पुरूशं कृश्णं कृश्णदन्तं पष्यति स एनं हन्ति’ इत्यादिना तेन तेनासन्येनैव स्वप्नदर्षनेन सत्यं मरणं सूच्यत इति दर्षयति ।

(षां॰ भा॰ 2।1।14 पृश्ठ 199)

यदि स्वप्न मंे कोई काले तथा कालेदांत वाले पुरूश को देखे कि मार रहा है तो अवष्य ही समझे कि मृत्यु निकट है ।

प्रसिद्धं चेदं लोकेऽन्वय व्यतिरेक कुषलानामीद्रषेन स्वप्न दर्षनेन साध्वागमः सूच्यत ईद्रषेनासाध्वागम इति ।

(षां॰ भा॰ 2।1।14 पृश्ठ 199)

लोक में प्रसिद्ध है कि ऐसा स्वप्न षुभ होता है और ऐसा अषुभ ।

नोट – षां॰ भा॰ 3।2।4, पृश्ठ 345-46 मंे भी ऐसी ही बातें दी हुई हैं ।

(10)

यथा लोके देवाःपितर ऋशयइत्येवमादयो महाप्रभावाष्चेतना अपि सन्तोऽनपेक्ष्यैव किंचिद्वाह्यं साधनमैश्वर्य विषेशयोगादमिध्यानमात्रेण स्वत एव बहूनि नानासंस्थानानि षरीराणि प्रासादादीनि च रथादीनि च निर्मिमाणा उपलभ्यन्ते मन्त्रार्थवादेतिहास पुराण प्रामाण्यात् ।

(षां॰ भा॰ 2।1।25 पृश्ठ 211)

जैसे लोक मंे देव, पितर, ऋशि आदि महा प्रभावषाली व्यक्ति चेतन होते हुये भी बिना किसी बाहरी साधन की अपेक्षा के ध्यान मात्र से स्वयं ही बहुत से भिन्न – भिन्न संस्थान, षरीर राजमहल आदि तथा रथ आदि को बनाते पाये गये हैं । मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण आदि इस बात में प्रमाण हैं ।

हमारी आलोचना – सूत्र में ध्यान आदि से बिना साधनों के महल, रथ आदि बनाने का कोई प्रमाण नहीं है । पौराणिक कल्पना मात्र है । श्री षंकर स्वामी का भी अपना अनुभव नहीं है । अन्यथा पुराण आदि की साक्षी न देते ।

सूत्र का वास्तविक अर्थ यह हैः-

देवादिवदपि लोके ।         (2।1।25)

लोक मंे अग्नि, वायु आदि देव (भौतिक देव) बिना किसी अन्य साधन के ही कार्य करते हैं । जैसे दूध में गाय की चेतन षक्ति काम करती है इसी प्रकार इन भौतिक देवों में ईष्वरीय षक्ति काम करती है । बाहर के साधन की आवष्यकता नहीं ।

‘लोके’ षब्द मंे स्पश्ट है कि किसी ऐसी चीज की ओर संकेत नहीं है जो लोक में देखी न जाती हो और जिसकी साक्षी के लिये पुराणों के पन्ने पलटने पडें । ध्यान से महल बनते न हम देखते हैं न श्री षंकर ने देखे थे और न श्री षंकर ने स्वयं ध्यान से महल बना दिये । यह सूत्र वस्तुतः उस सिद्धान्त के खण्डन में है कि अग्नि स्वभाव से जलता है, पानी स्वभाव से बहता है, ईष्वर की क्या आवष्यकता? यदि ईष्वर के द्वारा यह काम करते होते तो ‘उपसंहार’ दिखाई पडता । जैसे कुम्हार घडा बनाने के लिये चाक आदि का प्रयोग करता है । सूत्रकार ने दूध का द्रश्टान्त (2।1।24) देकर बताया कि वहां भी चेतन षक्ति बिना उपंसहार के काम करती है । और अग्नि आदि देवों में भी उपसंहार की आवष्यकता नहीं पडती ।

(11)

अपि च सप्त नरका रौरवप्रमुखा दुश्कृतफलोपभोगभूमित्त्वेन स्मर्यनते पौराणिकैः । ताननिश्टादिकारिणः प्राप्नुवन्ति ।

(षां॰ भा॰ 3।1।15 पृश्ठ 337)

पुराणों मंे दुश्कर्मिंयों के भोग के लिये सात रौरव आदि नरक बताये गये हैं । फिर चन्द्रलोक में उनके जाने की क्या आवष्यकता है ।

तेश्वपि सप्तसु नरकेशु तस्यैव यमस्याधिश्टातृत्व व्यापाराभ्यु पगमादविरोधः । यम प्रयुक्ता हिते चित्रगुप्तादयोऽधिश्ठातारः स्मर्यनते ।

(षां॰ भा॰ 3।1।16 पृश्ठ 337)

उन सात नरकों में भी यम ही मुख्य अधिश्ठाता है । चित्रगुप्त आदि तो उसके बनाये हुये अभिद्रश्टा (ैनचमतपदजमदकमदजे) मात्र हैं ।

हमारी आलोचना – सूत्रों मंे न तो यम का नाम है, न चित्रगुप्त का । और न नरकों का । केवल ‘सप्त’ षब्द से सात नरक नहीं लिये जा सकते । इससे तो श्री स्वामि हरिप्रसाद का भाश्य अधिक युक्ति संगत है देखो:-

सप्तकिल चक्षुरादयः प्राणाः सप्तर्शय इह निगद्यन्ते ‘‘प्राणा वा ऋशयः’’ (षत॰ 6।1।1।1) ते चास्मिन शाट्कौशिके जीवात्म षरीरे यथा स्नानं प्रति धीयन्ते । यत्रैतच्छु ते भवति ‘‘सप्त ऋशयः प्रतिहिताः षरीरे, सप्तरक्षन्ति सदमप्रमादम् । सप्तापः स्वपतो लोकमीयुस्तत्र जागृतो अस्वप्रजौ सत्रसदौ च देवौ ।’’

(यजु॰ 34।55)

अर्थात् चक्षु आदि सात प्राण हैं । उल्लेख षतपथ और यजुर्वेद में हैं ।

(12)

अपि च स्मर्यते लोके । द्रोणधृश्टधुम्न प्रभृतीनां सीता द्रौपदी प्रभृतीनां चायेनिजत्वाम् । तत्र द्रोणादीनां योशिद् विशयैकाहुतिर्नास्ति । धृश्टद्युम्नादीनां तु योशित् पुरूश विशये द्वे अप्याहुती न स्तः । यथा च तत्राहुतिसख्यानादरो भवत्येवमन्यत्रापि भविश्यति । बलाकाप्यन्तरेणैव रेतः । सेकं गर्भं धत्त इति लोकरूढिः ।

(षां॰ भा॰ 3।1।19 पृश्ठ 338-339)

लोक मंे प्रसिद्ध है कि द्रोण, धृश्ट द्युम्न, सीता द्रौपदी आदि अयोनिज हैं (योनि से उत्पन्न नहीं हुये) । द्रोण आदि के विशय मंे तो एक आहुति का अभाव था (जो पुरूश स्त्री की योनि मंे गर्भ के रूप में देता है) । और धृश्टद्युम्न आदि के विशय में दो आहुतियों का अभाव था (अन्न द्वारा जो पुरूश के षरीर मंे छोडी जाती है अर्थात् अन्न से वीर्य बनता है) । जैसे यहां पांच आहुतियों का नियम नहीं है वैसे अन्यत्र भी समझना चाहिये । लोक में प्रसिद्ध है कि बलाकी (सारसी) बिना नर के संग के गर्भ धारण करती है ।

हमारी आलोचना – यह पुराणों की गप हैं । जैसे हजरत ईसा मसीह बिना बाप के उत्पन्न हुये । ‘अयोनिज’ उत्पत्ति भी होती है जैसे वैषेशिक दर्षन में आया है ‘‘सन्त्ययो निजाः’’ (वे॰ 4।2।11)

परन्तु यहाँ अमैथुनी सृश्टि की ओर संकेत हैं । सृश्टि के आरम्भ में बिना माता पिता के उत्पत्ति होती है । जूँ ,खटमल आदि में पहले मैल से ही पैदा हो जाते हैं । चार प्रकार की योनियाँ हैः-

जरायुज – (जैसे मनुश्य, भैंस,गाय आदि) जो जरायु से उत्पन्न होते हैं ।

अण्डज – (जैसे सांप, पक्षी आदि) यह अण्डांे से उत्पन्न होते हैं ।

स्वेदज – (जैसे जूँ, आदि) जो पसीने या षरीर के मल से उत्पन्न होते हैं ।

उöिज – बीरबहुट्टी आदि जो भूमि से फोड कर उत्पन्न हो जाती हैं ।

इनमें पहली दो ‘योनिज’ हैं और दूसरी दो ‘अयोनिज’ हैं । सृश्टि के आरम्भ मंे सभी अयोनिज होते हैं ।

(13)

ननु ‘नहिंस्यात् सर्वा भूतानि’ इति षास्त्रमेव भूतविशयां हिंसामधर्म इत्यवगमयति । बाढम् । उत्सर्गस्तु सः । अपवादः ‘अग्नीशोमीयं पषुमालभेत इति ।’

(षां॰ भा॰ 3।1।25 पृश्ठ 342)

पूर्व पक्ष – षास्त्र मंे लिखा है कि किसी की हिंसा मत करो, पषु योग में पषु की हिंसा होती है अतः वह कर्म अषुद्ध है ।

षं॰ स्वा॰ – वह उत्सर्ग है (सामान्यनियम), यह अपवाद है कि अग्नि – सोम के लिये पषु की आहुति दो । अपवाद अषुद्ध नहीं होता ।

षंकर स्वामी पूर्वमीमांसा का इतना खण्डन करने (देखो 1।2।4) के पष्चात् भी यज्ञ में पषु हिंसा को विहित मानते हैं ।

(14)

यथा प्राणिहिंसा प्रति शेधस्य पषुसंज्ञपनविधिना बाधः ।

(षां॰ भा॰ 3।1।16 पृश्ठ 337)

‘हिंसा न करनी चाहिये’ इस निशेध का वाध पषु यज्ञ से होता है । षंकर स्वामी यज्ञों में पषु – बध का निशेध नहीं करते । यद्यपि ऊपर की उक्ति पूर्व पक्ष में है परन्तु इसका खण्डन नहीं किया गया । इस आक्षेप सं॰ 12 से मिला कर पढिये । ‘अपवाद’ विहित क्यों समझा जावे? इस अपवाद ने तो लाखों प्राणियों का बध करा के बौद्ध जैसे अवैदिक धर्म को जन्म दिया ।

(15)

सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्यर्थं स्थानविषेशो न विरूध्यते, षालग्राम इव विश्णोरिति।

(षां॰ भा॰ 1।2।14 पृश्ठ 76)

सर्व व्यापक ब्रह्म का उपलब्धि के लिये एक कोई स्थान मान लेना विरोध नहीं है । जैसे षालग्राम की बटिया मंे विश्णु का ।

उपनिशदो या वेदों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है । यह पुराणों का प्रभाव है ।

(16)

यथा वा प्रतिमादिशु विश्ण्वादि बुद्धîध्यासः ।

(षां॰ भा॰ 3।3।9 पृश्ठ 382)

‘‘जैसे प्रतिमा आदि में विश्णु आदि बुद्धि का अभ्यास होता है’’ । यह पुराणों की बात है, उपनिशद् आदि मंे इनका उल्लेख नहीं ।