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हदीस : दियत (हर्जाना)

दियत (हर्जाना)

मुहम्मद ने रक्तपात-शोध की पुरानी अरब प्रथा को बरक़रार रखा (4166-4174)। अतएव जब एक औरत ने अपनी गर्भवती सौत को लाठी मारी और सौत का गर्भपात हो गया, तो उसके लिए मुहम्मद ने ”उस गर्भ में जो था“ उसके एवज में ”सबसे बढ़िया किस्म के एक मर्द या औरत गुलाम“ को हर्जाने के रूप में निश्चित किया। उस औरत के एक मुखर रिश्तेदार ने हर्जाना माफ़ करने की पैरवी की और तर्क दिया कि ”क्या हमें किसी ऐसे के लिए हर्ज़ाना देना चाहिए जिसने न कुछ खाया और न कोई शोर किया और जो न-कुछ के समान था।“ मुहम्मद ने उसके एतराज को ठुकरा दिया और कहा कि वह ”काफिया-बन्द मुहावरे बोल रहा है, जैसे कि रेगिस्तान के अरब बोलते रहते हैं (4170)।

author : ram swarup

अल्लाह का इलाज

अल्लाह का इलाज

बरेली में मुसलमान भाइयों का उत्सव था। धर्मवार्ता-शास्त्रार्थ के लिए देहलवीजी को भी बुला लिया गया। देहलवीजी ने वहाँ दर्शनों के नामी पण्डित स्वामी दर्शनानन्दजी की युक्ति दी कि अल्लाह तौरेत में कौन-सी बात भूल गया था, जो ज़बूर में ठीक कर दी?

और फिर ज़बूर के बाद इंजील आई तो ज़बूर में कौन-सी चूक रह गई थी, जो कुरआन में ठीक की है? और यह क्रम कहाँ तक चलेगा?

आगे अब कौन-सी पुस्तक आएगी, यदि कुरआन में भी कमी रह गई हो?

पण्डितजी के इस प्रश्न पर एक मौलाना मुस्कराते हुए खड़े हुए और कहा कि पण्डितजी प्रतीत होता है आपको कभी किसी हकीम (वैद्य) से काम नहीं पड़ा। पण्डितजी ने कहा कि मेरा ज़्या काम वैद्य से? रोगी को वैद्यों-डाज़्टरों से पाला पड़ता है, न कि स्वस्थ मनुष्य को। चलो, कहो ज़्या कहना चाहते हो? मौलाना बोले कि हकीम लोग पेट के रोगी को पहले ऐसी ओषधि देता है जिससे मेदा (आमाशय) नर्म हो जाता है, फिर कोई ऐसी ओषधि देता है जिससे जुलाब लगें और सारा मल निकल जाए। अल्लाह ने ये पुस्तकें (तौरेत, ज़बूर, इंजील आदि) देकर उन पुराने मनुष्यों में सत्य के, एकेश्वरवाद के विरुद्ध जितना मल था उसे नर्म कर दिया और जब क़ुरान मजीद आया तो जुलाब से सबको कतई निकालकर बाहर फेंक दिया।

पण्डितजी ने उज़र दिया कि वे लोग (तौरेत, जबूर, इंजीलवाले) जिनका आमाशय तो नर्म कर दिया गया परन्तु जुलाब नहीं दिया गया, चिल्ला रहे हैं और वे भी शोर कर रहे हैं जिनको जुलाब तो दे दिया, परन्तु मेदा नर्म नहीं किया गया। यह ज़्या ढंग है कि पेट में गड़बड़ एक के हो, आमाशय दूसरे का नर्म किया और जुलाब तीसरे को दिया जाता है।

HADEES : A MOSAIC PRACTICE REVIVED

A MOSAIC PRACTICE REVIVED

The punishment of stoning to death (rajm) is Mosaic.  The Old Testament prescribes it for adultery and fornication (Deuteronomy 22:19-23), and also for those who �serve other gods� (Deuteronomy 13:10).  Muhammad retained it for adultery but prescribed death by other means for crimes like apostasy.

Among the Jews themselves, by the time of Muhammad, stoning had fallen into disuse.  According to one tradition, a Jew and a Jewess who had committed adultery were brought to Muhammad.  He asked the Jews what their Torah prescribed for such offenses.  The Jews replied: �We darken their [the culprits�] faces and make them ride on a donkey with their faces turned to the opposite direction.� Muhammad said: �Bring the Torah.� The prescribed punishment was found to be stoning to death.  So �Allah�s Messenger pronounced judgment about both of them and they were stoned,� says �Abdullah, the son of �Umar.  �I was one of those who stoned them, and I saw him [the Jew] protecting her [the Jewess] with his body,� he adds (4211).

Another hadIs gives more details about the same incident.  The Jews sent the two accused to Muhammad, telling their chiefs: �Go to Muhammad; if he commands you to blacken the face and award flogging as punishment, then accept it; but if he gives verdict for stoning, then avoid it.� Muhammad was grieved at this softening of the Scriptures.  But Allah comforted him: �O Messenger, the behaviour of those who vie with one another in denying the truth should not grieve you� (QurAn 5:41).  Allah also told him that �they who do not judge in accordance with what Allah has revealed-they are indeed wrongdoers, they are the iniquitous� (5:45, 47).  The man and woman were stoned to death at Muhammad�s order, and he was happy and thanked Allah: �O Allah, I am the first to revive thy command when they had made it dead� (4214).

author : ram swarup

हदीस : मुसलमान और मृत्युदंड

मुसलमान और मृत्युदंड

एक मुसलमान को जो ”यह गवाही दे कि अल्लाह के सिवा अन्य आराध्य नहीं, और मैं (मुहम्मद) उस का रसूल हूँ“ सिर्फ़ तभी मृत्यु-दंड दिया जा सकता है, जब वह शादीशुदा होते हुए परस्त्री-गामी हो, अथवा जब उसने किसी को मार डाला हो (अनेक इस्लामी न्यायविदों के अनुसार किसी मुसलमान को मार डाला हो) अथवा यदि उसने इस्लाम का त्याग किया हो (4152-4155) अनुवादक हमें बतलाते हैं कि इस्लाम के न्यायविदों में इस बात पर लगभग सहमति है कि इस्लाम त्यागने की सजा मौत है। जो लोग ऐसी सजा को बर्बर मानते हैं, उन्हें इसके बारे में अनुवादक की मार्जना और युक्ति पढ़नी चाहिए (टि0 2132)।

author : ram swarup

गोल-गोल बातों वाले पण्डितजी

गोल-गोल बातों वाले पण्डितजी

श्रद्धेय पण्डित गणपति शर्मा शास्त्रार्थ-महारथी एक बार जगन्नाथपुरी देखने उत्कल प्रदेश पहुँचे। वहाँ के पण्डितों को किसी प्रकार पता चल गया कि पण्डित गणपति शर्मा आये हैं। जहाँ पण्डितजी ठहरे थे वहाँ बहुत-से लोग पहुँचे और कहने लगे- लोग-ज़्या आप आर्यसमाजी पण्डित हैं?

पण्डिजी-हाँ, मैं आर्यपण्डित हूँ।

लोग-आर्यपण्डित कैसे होते हैं?

पण्डितजी-जैसा मैं हूँ!

लोग-पण्डित के साथ आर्य शज़्द अच्छा नहीं लगता!

पण्डितजी-ज़्यों? इस देश का प्रत्येक निवासी आर्य है। यह आर्यावर्ज़ देश है। इसमें रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति आर्य है।

लोग-ज़्या आर्यावर्ज़ में रहनेवाला प्रत्येक व्यक्ति आर्य है?

पण्डितजी-देश के कारण आर्य कहला सकते हैं। धर्म के कारण नहीं।

लोग-आप किस धर्म को मानते हैं?

पण्डितजी-वैदिक धर्म को मानता हूँ!

लोग-ज़्या सत्य सनातन धर्म को नहीं मानते?

पण्डितजी-वैदिक धर्म ही तो सत्य सनातन धर्म है।

लोग-ज़्या मूर्ति को मानते हैं?

पण्डितजी-ज़्यों नहीं, मूर्ज़ि को मूर्ज़ि मानता हूँ।

लोग-जगन्नाथजी को ज़्या मानते हो?

पण्डितजी-जो है सो मानता हूँ।

लोग-जगन्नाथ को परमेश्वर की मूर्ज़ि नहीं मानते हो?

पण्डितजी-हम सब भगवान् की बनाई हुई मूर्ज़ियाँ हैं।

लोग-श्राद्ध को मानते हो?

पण्डितजी-ज़्यों नहीं, माता, पिता, गुरु आदि का श्राद्ध करना ही चाहिए, अर्थात् इनमें श्रद्धा करनी ही चाहिए।

लोग-और पितरों को?

पण्डितजी-पितरों का भी श्राद्ध करो। पितर अर्थात् बड़े-बूढ़े बुजुर्ग, विद्वान् आदि।

पण्डितजी के मुख से अपने प्रश्नों के ये उज़र पाकर लोग परस्पर कहने लगे ‘‘देखो! यह कैसी गोल-गोल बातें करता है।’’

HADEES : MODEL PERSECUTION

MODEL PERSECUTION

These cases provide a model for all future persecutions.  When a woman is to be stoned, a chest-deep hole is dug for her, just as was done in the case of GhamdIya (the woman of GhAmid), so that her nakedness is not exposed and the modesty of the watching multitude is not offended.  No such hole need be dug for a man, as no such hole was dug for MA�iz, the self-confessed adulterer whose case we have just narrated.

The stoning is begun by the witnesses, followed by the imAm or qAzI, and then by the participating believers.  But in the case of a self-confessed criminal, the first stone is cast by the imAm or qAzI, following the example of the Prophet in the case of GhamdIya.  And then the multitudes follow.  The QurAn and the Sunnah, in fact, enjoin the believers to both watch and actively participate in the execution.  �Do not let pity for them take hold of you in Allah�s religion. . . . and let a party of the believers witness their torment,� the QurAn urges while prescribing punishment for the fornicators.

सच्ची रामायण का खंडन भाग-२२

*सच्ची रामायण का खंडन भाग-२२*
*अर्थात् पेरियार द्वारा रामायण पर किये आक्षेपों का मुंहतोड़ जवाब*
*-कार्तिक अय्यर*
नमस्ते मित्रों!हम एक बार फिर उपस्थित हुये हैं *भगवान श्रीराम पर किये आक्षेपों का खंडन*
आगे २२ वें आक्षेप से समीक्षा प्रारंभ करते हैं:-
*आक्षेप-२२-* इसका सार है कि अपने पास वन में आये हुये भरत से रामने कहा-” हे भरत! क्या तुम प्रजा द्वारा खदेड़ भगाए हुए हो? क्या तुम अनिच्छा से हमारे बाप की सेवा करने आये हो? (अयोध्याकांड १००)( पेरियार ने १०० की जगह १००० लिखा है।यदि ये मुद्रण दोष है तो भी चिंतनीय है)
*समीक्षा-* हम चकित हैं कि इस प्रकार से बेधड़क झूठ बोलकर किसी लेखक की पुस्तक हाई कोर्ट से बाइज्जत बरी हो जाती है।
इस सर्ग में श्रीराम ने भरत से यह बिल्कुल नहीं पूछा कि “क्या तुम जनता द्वारा खदेड़ कर भाग आए हुए हो ” ।अब भला राजा भरत को कौन खदेड़ेगा ?राजा भरत माता पिता मंत्रियों और सेना सहित श्री राम से मिलने के लिए आए थे। क्या कोई खदेड़ा हुआ व्यक्ति सेना के साथ आता है? “क्या तुम अनिच्छा से हमारे बाप की सहायता सहायता करने आए”- न ही यह प्रश्न भी श्री राम ने नहीं किया।भला भरत जैसा पितृ भक्त अपने पिता की ‘अनिच्छा’ से सेवा क्यों करेगा? और वन में आकर पिता की कौन सी सेवा की जाती है ?यह पेरियार साहब का श्री राम पर दोषारोपण करने का उन्मत्त प्रलाप है यह देखिए अयोध्या कांड सर्ग १०० में मात्र यह लिखा है कि:-
क्व नु तेऽभूत् पिता तात यदरण्यं त्वमागतः ।
न हि त्वं जीवतस्तस्य वनमागन्तुमर्हसि ॥ ४ ॥
“तात ! पिताजी कहां थे कि तुम इस वनमें निकलकरआये हो? वे यदि जीवित होते तो तुम वनमें नहीं आ सकते थे॥ ४ ॥ “
चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम् ।
दुष्प्रतीकमरण्येऽस्मिन् किं तात वनमागतः ॥ ५ ॥
’मैं दीर्घ काल केबाद दूरसे (नानाके घर से ) आये भरतको आज इस वनमें देख रहा हूं, परंतु इसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया है।तात ! तुम किसलिये इस बुरे वनमें आये हो ? ॥ ५ ॥
देखा यहां पर मात्र इतना ही उल्लेख है आपकी कही वही कपोल कल्पित बातें यहां बिल्कुल भी नहीं है।
*आक्षेप-२३-*राम ने भरत से पुनः कहा कि ,”जब तुम्हारी मां का मनोरथ सिद्ध हो गया, क्या वो प्रसन्न है?”(अयोध्याकांड सर्ग १००)
*समीक्षा-* इस बात का अयोध्याकांड सर्ग 100 में बिल्कुल भी उल्लेख नहीं है विसर्ग में तो श्रीराम अपनी तीनो माताओं की कुशल क्षेम पूछ रहे हैं देखियेे प्रमाण:-
तात कच्चिच्च कौसल्या सुमित्रा च प्रजावती ।
सुखिनी कच्चिदार्या च देवी नंदति कैकयी ॥ १० ॥
’बंधो ! माता कौसल्या सुखमें है ना ? उत्तम संतान होनेवाली सुमित्रा प्रसन्न हैे ना ? और आर्या कैकेयी देवीभीआनंदित है ना ? ॥ १० ॥’
देखिये, श्रीराम वनवास भेजने वाली अपनी विमाता कैकेयी को भी ‘आर्या’ तथा ‘देवी’ कहकर संबोधित करते हैं।
 यदि आप की कही हुई बाक मान भी ली जाये तो भी इससे श्रीराम पर क्या आक्षेप आता है?कैकेयी राम के वनवास और भरत के राज्य प्राप्ति पर तो प्रसन्न ही होगी।इसमें भला क्या संदेह है?यह प्रश्न पूछकर श्रीराम ने कौन सा पाप कर दिया?
*आक्षेप-२४-* इसका सार है:- भरत ने कहा कि उन्होंने सिंहासन के लिये स्वत्व का त्याग कर दिया,तब श्रीराम ने कैकेयी के पिता को दशरथ के वचन देने की बात कही। (अयोध्याकांड सर्ग १०७)
*समीक्षा-* हम पीछे सिद्ध कर चुके हैं कि कैकेयी के पिता को दशरथ ने कोई वचन नहीं दिया था।अतः यह आक्षेप निर्मूल है।
परंतु अभी तो भरत को सिंहासन मिल ही गया न?अब यदि दुर्जनतयातोष इस वचन को सत्य मान भी लें तो भरत को तो राज्य मिल ही गया है! एक तरह से दशरथ का दिया वचन सत्य ही हुआ। फिर भला इस पर क्या आपत्ति।
*आक्षेप-२५-*इसका सार है, कि भरत रामजी की पादुकायें लेकर लौटे,उन्होंने अयोध्या में प्रवेश न किया नंदिग्राम में निवास,तपस्वी जीवन करके क्षीणकाय होना इत्यादि वर्णन है।आक्षेप ये है कि “रामने ऐसे सज्जन और पर संदेह किया”।
तत्पश्चात वनवास से लौटकर हनुमान जी द्वारा अपने आगमन की सूचना देने का उल्लेख किया है।यह वचन सुनकर भरत अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीराम के स्वागत को चल पड़े। यहां महोदय ने टिप्पणी की है कि,” संपूर्ण भोगोपभोग पूर्ण अयोध्या को त्यागकर राम के स्वागत के लिये दौड़ कर जाना अत्यंत दुष्कर था”।
*समीक्षा-* हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आप किस प्रकार के प्राणी है ।यहां भला कहां लिखा है कि श्रीराम ने भारत के ऊपर संदेह किया ?वे तो उन्हें प्राणों के समान प्रिय मानते थे इसलिए उनको राजनीति का उपदेश देकर अयोध्या में राज्य करने हेतु वापस भेज दिया। यदि श्रीराम का भारत के ऊपर संदेह होता तो उन्हें ना तो राजनीति का उपदेश करते और ना अयोध्या में राज्य करने के लिए भेजते ।हम समझ नहीं पा रहे हैं कि आप कैसे बेसिर-पैर के आरोप लगा रहे हैं।
आप की दूसरी आपत्ति है कि समस्त भागों को त्याग करके तपस्वी जीवन बिताते भरत जी श्री राम के आगमन की सूचना पाते ही अचानक दौड़ कर उनका स्वागत करने हेतु कैसे पहुंच गए ।क्यों महाशय! शंका करने की क्या बात है श्रीराम भी १४ वर्ष तक वनवास में रहे वह भी मात्र कंद-फल-मूल खाकर।फिर भी उन्होंने अपने तपोबल और ब्रह्मचर्यबल से १४००० राक्षसों समेत खर-दूषण का नाश कर दिया।बालि जैसे योद्धा को एक बाण में ही मार गिराया।लंका में घुसकर कुंभकर्ण और रावण को मार गिराया।उनको तो मांस और राजसी भोग भोगने वाले राक्षस लोग भी पराजित ना कर सके तो इसमें भला क्या संदेह है कि राज्य  को छोड़कर कोई तपस्वी जीवन जिए और किसी के स्वागत के लिए भागकर जा भी ना पाए। यदि श्रीराम 14 वर्ष तक वन में रहकर राक्षसों का संहार कर सकते हैं तो भरत जी के लिए मात्र उनके स्वागत के लिए दौड़े दौड़े चले आना सामान्य सी बात है ।रामायण में यह थोड़े ही लिखा है कि भरतजी कुछ नहीं खाते थे।वे राजसी भोग छोड़कर ऋषि-मुनियों योग्य आहार करते थे।
आपने इसका पता भी “उत्तरकांड १२७” लिखा है।क्योंजी!उत्तरकांड में राम जी वापस आये थे?इसका सही पता युद्ध कांड सर्ग १२७ है।ऐसी प्रमाणों की अशुद्धि चिंताजनक है।आप केवल सर्ग लिखकर गपोड़े हांक देते हैं पर उन्हें खोलकर पढ़ा होता तो आधे से अधिक आक्षेप न करते। युद्ध कांड सर्ग १२७ में यह लिखा है कि भरत उपवास से दुर्बल हो गये थे:-
उपवासकृशो दीनः चीरकृष्णाजिनाम्बरः ।
भ्रातुरागमनं श्रुत्वा तत्पूर्वं हर्षमागतः ॥ २० ॥
परंतु यह नहीं लिखा कि उनमें श्रीराम का स्वागत करने की भी शक्ति न थी। वे तो उस समय राजा थे।वे पैदल थोड़े ही गये थे!वे पूरे गाजे-बाजे हाथी-घोड़े के साथ उनके दर्शन करने चले।
यहां वर्णन है कि भरत जी ने स्वागत के लिये घोड़े और रथ सजाये थे:-
प्रत्युद्ययौ तदा रामं महात्मा सचिवैः सह ।
अश्वानां खुरशब्दैश्च रथनेमिस्वनेन च ॥ २१ ॥
क्या आपको लगता है कि राजा पैदल किसी का स्वागत करने जायेगा? वे राजसी भोग न खाकर ऋषि मुनियों का भोजन करते थे।उपवास का अर्थ नहीं कि निर्जला व्रत कर लिया।उपवास में भी फलाहार किया जाता है।आपका यह आक्षेप मूर्खतापूर्ण है।
*आक्षेप-२६-* संक्षेप में श्री राम का मां सीता के चरित्र पर संदेह करने उनकी अग्निपरीक्षा लेने का वर्णन है श्रीराम के कारण सीता को दुख भोगना पड़ा साथ ही उनके गर्भवती पाए जाने पर उन्हें वन में छोड़ने का आरोप लगाया है।
*आक्षेप-* हम डंके की चोट पर कहते हैं की मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने मां सीता को कभी वन में नहीं भेजा।यह बात उत्तर कांड में लिखी है,जोकि पूरा का पूरा प्रक्षिप्त है। अतः श्री राम पर आरोप नहीं लग सकता यह प्रश्न अग्निपरीक्षा का तो महोदय उस प्रसंग में पौराणिक पंडितों ने काफी मिलावट की है बारीकी से अवलोकन करने से यह विदित होता है कि श्री राम ने समस्त विश्व के आंगन में मां सीता के पावन तन चरित्र को सिद्ध करने के लिए ऐसा किया था इस वर्णन में संक्षेप में है कि जब विभीषण ने मां सीता को अलंकृत करके श्रीराम की सेवा में भेजा तब श्री राम ने उनको कहा कि तुम बहुत समय तक राक्षस के घर में रह कर आई हूं अतः मैं तुम्हें स्वीकार नहीं कर सकता तुम चाहो तो सुग्रीव लक्ष्मण या विभीषण के यहां रहो या जहां इच्छा हो वहां जाओ परंतु मैं तुम्हें ग्रहण नहीं करूंगा ऐसा आप स्वयं का अपमान होते देख मां सीता ने ओजस्वी वाणी में श्रीराम को उत्तर दिया उसके बाद उन्होंने अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर चिता में भस्म होने का निश्चय किया उनके आदेश पर लक्ष्मण ने चिता सजा दी जब मां सीता सीता की अग्नि की परिक्रमा करते हुए जैसे ही उसने प्रवेश करने वाली थी श्री रामचंद्र ने उनको रोक लिया पता तथा सबके सामने उनके पवित्र होने की साक्षी दी यदि वह ऐसा नहीं करते तो लोगापवाद हो जाता कि रघुकुल नंदन राम अत्यंत का व्यक्ति है जिसने दूसरे के यहां आ रही अपनी स्त्री को ऐसे ही स्वीकार कर लिया।
अतः यह आवश्यकता था।
यह अग्नि का गुण है कि चाहे जो भी हो,वह उसे जला देती है।फिर चाहे मां सीता हो या अन्य कोई स्त्री उसका अग्नि में जलना अवश्यंभावी है। जिस स्त्री को अग्नि ना जला पाए वह पतिव्रता है -यह कदापि संभव नहीं है , तथा हास्यास्पद,बुद्धिविरुद्ध बात है।यह अग्नि का धर्म है कि उसमें प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति जलता है ।पुराणों में तो होलि का नाम की राक्षसी का उल्लेख है ।उसे भी अग्नि में ना जलने का वरदान था ।तो क्या इसे वह प्रति पतिव्रता हो जाएगी?? दरअसल अपने पति द्वारा त्यागी जाने पर मां सीता ने अपने प्राणों को तिनके की तरह त्यागने का निश्चय किया।उनके अग्निसमाधि लेने के निश्चय से सिद्ध हो गया कि श्री राम के सिवा उनके मन में सपने में भी किसी अन्य पुरुष की प्रति (पति समान)प्रेम भाव नहीं था।मां सीता क अतः मां सीता को चिता के पास जाने से रोक कर श्रीराम ने समस्त विश्व के सामने उनकी पवित्रता को प्रमाणित कर दिया जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागे जाने पर एक क्षण भी जीना पसंद नहीं करती तथा अपने शरीर को अग्नि में झुककर मरना चाहती है उसका चरित्र अवश्य ही असंदिग्ध एवं परम पवित्र है इस तथ्य से मां सीता का चरित्र पावनतम था।
     हां ,हम आपको बता दें कि इस प्रसंग में ब्रह्मा विष्णु आदि देवताओं का तथा महाराज दशरथ का स्वर्ग से आकर सीता की पवित्रता की साक्षी देना तथा ब्रह्मा जी का श्रीराम से उनके मूल रूप के बारे में पूछना और श्री राम की ईश्वर होने का वर्णन तथा स्तुति करना यह सारे प्रसंग पौराणिक पंडितों ने श्री राम पर ईश्वरत्व का आरोप करने के लिए  लिखे हैं। इन्हें हटाकर अवलोकन करने से अग्नि परीक्षा की पूरी कथा स्पष्ट हो जाती है।
(अधिक जानकारी के लिये आर्यसमाज के विद्वान स्वामी जगदीश्वरानंदकृत रामायण की टीका को पढ़ें)
 हम आपके सामने इसके प्रमाण रखते हैं अवलोकन कीजिए।
यत् कर्तव्यं मनुष्येण धर्षणां प्रतिमार्जता ।
तत् कृतं रावणं हत्वा मयेदं मानकाङ्‌क्षिणा ।। १३ ।।
अपने तिरस्कारका बदला लेने हेतु मनुष्यका जो कर्तव्य है वो सब मैंने अपने मानके रक्षण की अभिलाषा से रावणका वध करके पूर्ण कर दिया है॥१३॥
कः पुमान् हि कुले जातः स्त्रियं परगृहोषिताम् ।
तेजस्वी पुनरादद्यात् सुहृल्लोभेन चेतसा ।। १९ ।।
ऐसा कौन कुलीन पुरुष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घरमें रही स्त्रीके केवल” ये मेरेसाथ बहुत दिवस रहकर सौहार्द स्थापित कर चुकी है इस लोभसे उसके मनसे ग्रहण कर सकेगा ? ॥१९॥
यदर्थं निर्जिता मे त्वं सोऽयमासादितो मया ।
नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामिति ।। २१ ।।
इसलिये जिस उद्देश्यसे मैंने तुमको जीता था वो सिद्ध हो गया है।मेरे कुलके कलंक का मार्जन हो चुका है। अब मेरी तुम्हारेप्रति ममता अथवा आसक्ति नहीं है इसलिये तुम जहां जाना चाहो वहां जा सकती हो॥२१॥
और साथ ही कहा कि तुम चाहे भरत,शत्रुघ्न, या विभीषण के यहां चली जाओ,या जहां इच्छा हो वहां जाओ-
शत्रुघ्ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा विभीषणे ।
निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना ।। २३ ।।
(युद्ध कांड ११५)
फिर मां सीता फूट-फूटकर रोने लगीं और हृदय स्पर्शी वाणी में श्रीराम को उत्तर दिया:-
‘स्वामी आप साधारण पुरुषों की भांति ऐसे कठोर और अनुचित वचन क्यों कह रहे हैं? मैं अपने शील की शपथ करके कहती हूं आप मुझ पर विश्वास रखें प्राणनाथ हरण करके लाते समय रावण ने मेरे शरीर का अवश्य स्पर्श किया था किंतु उस समय में परवश थी ।इसके लिए तो मैं दोषी ठहरा ही नहीं जा सकती ;मेरा हृदय मेरे अधीन है और उस पर स्वप्न में भी किसी दूसरे का अधिकार नहीं हुआ है।फिर भी यदि आपको यही करना था तो जब हनुमान को मेरे पास भेजा था उसी समय मेरा त्याग कर दिया होता ताकि तब तक मैं अपने प्राणों का ही त्याग कर देती।’
( युद्ध कांड सर्ग ११६ श्लोक ५-११ का संक्षेप)
मां सीती ने लक्ष्मण से कहा:-
अप्रीतस्य गुणैर्भर्त्रा त्यक्ताया जनसंसदि ।
या क्षमा मे गतिर्गन्तुं प्रवेक्ष्ये हव्यवाहनम् ।। १९ ।।
एवमुक्तस्तु वैदेह्या लक्ष्मणः परवीरहा ।
अमर्षवशमापन्नो राघवं समुदैक्षत ।। २० ।।
‘ लक्ष्मण! इस मिथ्यापवाद को लेकर मैं जीवित रहना नहीं चाहती।मेरे दुःख की निवृत्ति के लिये तुम मेरे लिये चिता तैयार कर दो।मेरे प्रिय पति ने मेरे गुणों से अप्रसन्न होकर जनसमुदाय में मेरा त्याग किया है।अब मैं इस जीवन का अंत करने के लिये अग्नि में प्रवेश करूंगी।’
जानकी जी के वचन सुनकर तथा श्रीराम का संकेत पाकर लक्ष्मण ने चिता सजा दी।मां सीता पति द्वारा परित्यक्त होकर अग्नि में अपना शरीर जलाने के लिये उद्यत हुईं।
एवमुक्त्वा तु वैदेही परिक्रम्य हुताशनम् ।
विवेश ज्वलनं दीप्तं निःशंकेनान्तरात्मना ।। २९ ।।
ऐसा कहकर वैदेहीने अग्निकी परिक्रमा की और निशंक चित्तसे वे उस प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करने को उद्यत हुईं। ॥२९॥
जनश्च सुमहांस्तत्र बालवृद्धसमाकुलः ।
ददर्श मैथिलीं दीप्तां प्रविशन्तीं हुताशनम् ।। ३० ।।
बालक और वृद्धों से भरे हुये उस महान्‌ जनसमुदायने उन दीप्तिमती मैथिलीको जलती अग्नि प्रवेश करते हुये (घुसने को उद्यत होते )देखा ॥३०॥
इसके बाद मां सीता की अग्नि में कूद जाने ,अग्निदेव के प्रकट होकर उन्हें उठाकर लाने का वर्णन है ।वहीं पर ब्रम्हा ,शिव, कुबेर ,इंद्र ,वरुण आदि बड़े बड़े देवता उपस्थित हो जाते हैं उस समय ब्रह्मा जी श्री राम और सीता के रहस्य की बहुत सी बातें कहते हैं।वहां पर श्रीराम के ऊपर ईश्वरत्व का आरोप है। हमारा मानना है कि यह सारे प्रसंग पौराणिक पंडितों ने मिलाएं हैं , अतः हम उनको प्रक्षिप्त मानकर उल्लेख नहीं करेंगे। हमारा मत में  जब मां सीता अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत थी उसी समय श्रीराम को उन की पवित्रता का भान हो गया था और फिर श्रीराम ने यह वचन कहे:-
अवश्यं त्रिषु लोकेषु न सीता पापमर्हति ।
दीर्घकालोषिता हीयं रावणान्तःपुरे शुभा ।।  ।।
बालिशः खलु कामात्मा रामो दशरथात्मजः ।
इति वक्ष्यन्ति मां सन्तो जानकीमविशोध्य हि ।।
अनन्यहृदयां भक्तां मच्चित्तपरिवर्तिनीम् ।
अहमप्यवगच्छामि मैथिलीं जनकात्मजाम् ।।
प्रत्ययार्थं तु लोकानां त्रयाणां सत्यसंश्रयः ।
उपेक्षे चापि वैदेहीं प्रविशन्तीं हुताशनम् ।।
इमामपि विशालाक्षीं रक्षितां स्वेन तेजसा ।
रावणो नातिवर्तेत वेलामिव महोदधिः ।।
न हि शक्तः स दुष्टात्मा मनसा ऽपि हि मैथिलीम् ।
प्रधर्षयितुमप्राप्तां दीप्तामग्निशिखामिव ।।
नेयमर्हति चैश्वर्यं रावणान्तःपुरे शुभा ।
अनन्या हि मया सीता भास्करेण प्रभा यथा ।।
विशुद्धा त्रिषु लोकेषु मैथिली जनकात्मजा ।
न हि हातुमियं शक्या कीर्तिरात्मवता यथा ।।
(युद्ध कांड सर्ग ११८ श्लोक १४-२०)
लोक दृष्टि में सीता की पवित्रता की परीक्षा आवश्यक थी क्योंकि यह बहुत समय तक रावण के अंतः पुर में रही हैं। यदि मैं जानकी की परीक्षा ना करता तो लोग यही कहते कि दशरथ पुत्र राम बड़ा ही मूर्ख और कामी है।जनक नंदिनी सीता का मन अनन्य भाव से मुझे में लगा रहता है और यह मेरे ही चित्त का अनुसरण करने वाली है। यह बात मैं भी जानता हूं यह अपने तेज से स्वयं ही सुरक्षित है इसलिए समुद्र जिस प्रकार अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकता उसी प्रकार रावण इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता था ।जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्निशिखा का कोई स्पर्श नहीं कर सकता उसी प्रकार दुष्ट रावण अपने मन से भी इस पर अधिकार नहीं कर सकता था ।यह तो उसके लिए सर्वथा अप्राप्य थी। रावण के अंतः पुर में रहने पर भी इसका किसी प्रकार तिरस्कार नहीं हो सकता था क्योंकि प्रभाव जैसे सूर्य से अभिन्न है उसी प्रकार इसका मूल्य से कोई भेद नहीं है ।जनक दुलारी सीता तीनों लोकों में पवित्र है इसलिए आत्माभिमानी पुरुष जैसे कीर्ति का लोभ नहीं छोड़ सकते, वैसे ही मैं इसका त्याग नहीं कर सकता।’
इससे सिद्ध है कि केवल लोगों के सामने मां सीता को निर्दोष और पवित्र सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा ली गई ।वस्तुतः श्रीराम जानते थे कि मां सीता महान सती और पतिव्रता स्त्री हैं। अतः पेरियार साहब का आक्षेप निर्मूल है कि भगवान श्री राम माता सीता के चरित्र पर संदेह करते थे वह तो मानते थे। कि जिस प्रकार से सूर्य प्रभाव से अभिन्न है उसी प्रकार से उनमें और मां सीता में कोई भेद नहीं। अस्तु।
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।।मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की जय।।
।।योगेश्वर श्री कृष्ण चंद्र की जय।।
।।ओ३म्।।
नोट : इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आर्यमंतव्य  टीम  या पंडित लेखराम वैदिक मिशन  उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. |