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वेदों में मूर्ति पूजा : सत्य या मिथ्या?

आक्षेपकर्ता के आकर्षित दावों की पड़ताल : कुतर्क और अनार्ष भाष्यो का सप्रमाण खंडन

विगत कुछ दिनों से, ऐसी छवि “सामाजिक प्रचार तंत्र” (फेसबुक) पर प्रचारित की जा रही है, जिससे आमजनमानस (विशेषतया धर्म के सत्य स्वरुप से अनभिज्ञ हिन्दू) इन क्रमवार बिन्दुओं को पढ़कर, जो कथित रूप से वेदों के प्रमाण स्वरुप उद्दृत बताये जाते हैं, भर्मित और संशय में पड़ गया है। यहाँ तक की अनेको आर्यों में भी ऐसी भ्रान्ति घर कर गयी है, कि क्या वेदो में मूर्ति पूजा सिद्धांत हैं ?
वेदों में मूर्ति पूजा सिद्धांत यदि कोई सिद्ध करता है, तो इस सिद्धता के साथ वह मनुष्य जो ऐसा हीन कार्य करता है, वह वेदों के मूल तत्व से अनभिज्ञ अवस्था यह भी अकारण सिद्ध कर देता है, कि वेदों में इतिहास विषयक सामग्री समावेश है। हमारा दायित्व है की हम ऐसी कुटिलता और वेद विषक ईश्वरीय ज्ञान को यथारूप सर्वमनुष्य हितकारी अवस्था में प्रचारित करें , इसीलिए इन क्रमवार बिन्दुओं का खंडन अत्यंत आवश्यक है। तो आइये देखें, क्या आक्षेपकर्ता के अनुसार वर्णित वेदों में मूर्तिपूजा विषयक सामग्री और मूर्ति पूजा का प्रचार प्रसार है अथवा हिन्दू समाज को धर्म से विमुख करने का सुनियोजित षड्यंत्र रचा गया है? देखिये :

१.

मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि।

[तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ]

अर्थ- हे महावीर तुम इश्वर की प्रतिमा हो।

आर्यसिद्धान्ती – वेदों से आप ब्राह्मण आरण्यक ग्रंथों पर आ गये। लेकिन पोप जी आप ने किस शब्द का अर्थ यहा परमेश्वर लिया यह मुझे ज्ञात नही हो रहा क्यूंकि आपको आधी अधुरा प्रमाण दे कर अपनी बात रखना अच्छे से आता है।
चलिए आपने यहा पर एक महावीर शब्द लिखा जिसे आप हनुमान जी की मूर्ति समझ रहे हो। लेकिन शतपथ ब्राह्मण में महावीर कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक प्रकार का यज्ञ पात्र है –

“कुशान्त्स स्तीर्य द्वंद पात्रा………भवति”

[ शत. १४/१/३/१  ]
अर्थ- कुशाय बिछा कर दो दो पात्र रखो। उपयमनी ,महावीर ,परीशा ,पिन्वन ,रोहिंकपाल ,ओर भी दूसरे पात्र।
यहाँ महावीर पात्र का नाम है।

[ शतपथ १४/१/२/१७ ]में महावीर बनाने की विधि लिखी है – मिट्टी लेकर एक बालिश्त ऊँचा ,गढनेवाला ,मध्य में खाली ,मेखला युक्त महावीर बनाये।
यहा भी स्पष्ट है कि यह महावीर पात्र ही है। आपका पूंछ वाला हनुमान नही न ही कोई प्रतिमा।
इसी में महावीर को घोड़े की लीद (पखाने ) में पकाने का उलेख हैं। देखें [ शतपथ १४/१/२/२० ] महावीर को पहले घोड़े के लीद में पकाओ फिर ३ मन्त्र पढ़ कर महवीर को घोड़े की लीद की धूप दो।क्या पोप जी आप अपने महावीर की मूर्ति को घोड़े की लीद की धुप देते हो या नहीं?
तो इन गृहसूत्रों, ब्राह्मणों में यह महावीर कोई मूर्ति नही बल्कि यज्ञ पात्र ही है

२.

सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि।

[ यजुर्वेद १५/६५ ]

हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ] हैं।

आर्य सिद्धान्ती – पोप जी इस मन्त्र का देवता है “विद्वान” और यह विद्वान को कहा गया है न कि ईश्वर को इस मन्त्र की व्याख्या [ शतपथ ८/७/४/१०,११ ] में दी हुई है एक बार उसे भी देख लेते तो यह भ्रम ही न होता।
शतपथ में भी यह ईश्वर को नहीं विद्वान् को दी हुई उपमा है क्योंकि विद्वान को ज्ञान होने से उसे यह उपमा दी है।
जिस प्रकार वेद पढ़कर विद्वान् होते हैं और वह विद्वान् वेद पढ़ने से असंख्य होकर, समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसी प्रकार ईश्वर भी विद्वान् होने से, जीव (चेतन सत्ता) आदि असंख्य विद्वान, और कार्यरूप जगत (जड़सत्ता) का प्रतिनिधित्व करता है।

३.

अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत।

[ अथर्ववेद-20.92.5 ]

हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन करो,भली भांति पूजन करो।

आर्य सिद्धान्ती – धन्य हो! पोप जी इस मन्त्र में कहीं भी प्रतिमा, मूर्ति शब्द तक नहीं लेकिन आपने प्रकट कर दिए। मन्त्र में २ शब्द है एक पुरम जिसका अर्थ दुर्ग होता है। दूसरा धुरम जिसका अर्थ होता है शत्रुओं का धर्षण करने वाले।
इस मन्त्र में ईश्वर को दुर्ग के समान बताया है। जैसे दुर्ग शत्रुओं के हमलो से बचाता है। उसी तरह ईश्वर भी रक्षा करता है इसलिए दुर्ग विशेषण प्रयुक्त हुआ है।
इस मन्त्र का अर्थ कुछ इस प्रकार होगा –
है विद्वानों / प्रियमेधों! उस ईश्वर का भलि भाँति अच्छे तरह पूजन करो जो निर्भय दुर्ग की तरह रक्षा करने वाला ओर शत्रुओ का धर्षण करने वाला है। अब बताइए आप कहाँ से मूर्ति पूजा ले आये आप?

४.

ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय प्रस्तराय

[ अथर्व ० १६.२.६  ]

हे प्रतिमा! तू ऋषियों का पाषण है। तुझ दिव्य पाषण के लिए नमस्कार है।

आर्य सिद्धान्ती – पोप जी ! थोडा निरुक्त और व्याकरण भी देख लेते तो काहे भ्रम में रहते! मन्त्र में ऋषीणाम् शब्द का निरुक्त में इन्द्रिय अर्थ किया है देखें –
सप्त ऋषय: प्रतिहिता: शरीरे षडइन्द्रियानि विसप्तति [ निरुक्त १२/३७ ] इन्द्रियणाम्
और दूसरा प्रस्तरा जिसका व्याकरण से अर्थ फैलाने वाला होता है देखें – ( प्रसारक: प्रश्वर असि )
तो मन्त्र का अर्थ होगा – हे परमेश्वर! इन्द्रियों को फैलाने वाले, देवों का विस्तार करने वाले, तुम्हे नमन हो।
यदि इस मन्त्र में ऋषीणाम् का अर्थ ऋषि ने तब भी आपके मन्तव्य की पुष्टि नही होती है। देखें – इस में देवता -वाक् है जिसका अर्थ है वाणी। अब भौतिक परख व्याख्या निम्न तरह से होगी। हे वाणी! तू ऋषियों द्वारा विस्तार होने वाली है। तुझ देव स्वरूप सर्वत्र विस्तारित को नमन हो।
यहा मन्त्र द्रष्टा विद्वानों द्वारा वेद वाणी को संसार में प्रचारित करने का भी उपदेश है।
तो कहिये यहा भी आपकी मूर्ति पूजा आदि सिद्धांत सिद्ध नही होते है?

उनका कहना है कि श्रीराम ने मूर्ति पूजा (शिवलिंग पूजा) की। अब इस ऐतिहासिक विषयक सामग्री का सर्वमान्य ग्रन्थ, जो श्रीराम के समकालीन थे, ऋषि वाल्मीकि रचित “वाल्मीकीय रामयण” में कहीं भी प्राप्त नहीं होता। जबकि इनके दावे का विपरीत, अर्थात श्रीराम ने महादेव (परमेश्वर) की सहायता मांगी और वैदिक रीति अनुसार यज्ञ किया। इसके अनेको प्रमाण “वाल्मीकीय रामायण” में ही उपस्थित हैं। इसलिए लिए अधिक प्रमाण न देकर, शंकाओं के समाधान हेतु कुछ ही प्रमाण उपलब्ध करवाए जाते हैं। देखिये :
श्रीराम संध्योपसना और यज्ञ करते थे :
ऐतिहासिकता का प्रमाण ऐतिहासिकता से ही दिया जा सकता है। अतः यहाँ श्लोक न देकर ऐतिहासिक विषय बताता हूँ। अंजली लखेड़ा हाजीपुर, बिहार में रामभद्र स्थित रामचौरा मंदिर भगवान श्रीराम को समर्पित है। यहाँ आज भी मान्यता है की जनकपुर सीता स्वयंवर में जाने के दौरान अपने गुरू विश्वामित्र व अनुज लक्ष्मण के साथ श्रीराम ने संध्योपासना और दैनिक यज्ञ किया और यहीं पर रात्रि विश्राम भी किया था।
आक्षेपकर्ता को वालमीकि रामायण से उत्तर : जब रामचन्द्र सीता जी को ले हनुमान् आदि के साथ लंका से चल आकाश मार्ग में विमान पर बैठ अयोध्या को आते थे तब सीता जी से कहा है कि-

अत्र पूर्वं महादेव प्रसादमकरोद्विभु।
सेतुबन्ध इति विख्यातम्।।

[ वाल्मीकि रा०। लंका कां०।। ]

हे सीते! तेरे वियोग से हम व्याकुल होकर घूमते थे और इसी स्थान में चातुर्मास किया था और परमेश्वर की उपासना ध्यान भी करते थे। वही जो सर्वत्र विभु (व्यापक) देवों का देव महादेव परमात्मा है उस की कृपा से हम को सब सामग्री यहां प्राप्त हुई। और देख! यह सेतु हम ने बांध कर लंका में आके, उस रावण को मार, तुझ को ले आये। इसके सिवाय वहाँ वाल्मीकि ने अन्य कुछ भी नहीं लिखा।
(सत्यार्थ प्रकाश, एकादश समुल्लास)
अतः सिद्ध है श्रीराम जी रामेश्वरम में मूर्ति पूजा (शिवलिंग पूजा) किये थे, इसके प्रमाण वाल्मीकिरामायण में नहीं मिलते हैं। अतः यह तर्क ही खंडित हुआ।

6. आक्षेपकर्ता का अंतिम कुतर्क कि ईश्वर सर्वव्यापी है तो मूर्ति में भी विद्यमान है। अतः मूर्ति की पूजा करना, ईश्वर की ही पूजा है।
समाधान : अब अंतिम तर्क इसी प्रकार का होगा, यह हमें पहले से ही अनुमान है। तो अब आप निम्नलिखित कुछ तर्कों पर विचार करें।
वेदों के अनुसार सर्वत्र ईश्वर व्याप्त है, तो ईश्वर तो प्रत्येक मनुष्य के भीतर भी व्याप्त है। मोटरसिकिल, कार, बस ट्रक आदि वाहन, कंप्यूटर, लैपटॉप आदि यंत्र और खम्बे, ईंट, रोड़ी, बदरपुर आदि सामग्री में भी ईश्वर है। तो अब क्या हम मनुष्य भी मनुष्य की पूजा करें? और जो बस, ट्रक आदि वाहन हैं उनकी भी? तो जो सड़क पर पड़े ईंट, रोड़ी बदरपुर हैं, उनकी भी पूजा होनी चाहिए। फिर विशेष तौर से मूर्ति की ही क्यों?
क्या उसमे विशेष ईश्वर है या ईश्वर सर्वव्यापी नहीं है?
आक्षेपकर्ता के बिंदुवार दावे दिखने और सुनने में निश्चित रूप से आकर्षक हैं। किन्तु ये आक्षेप ऊपर वर्णित सत्य सिद्धांतों और वेदानुकूल वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाण प्रस्तुत करने से स्वतः खंडित हो जाते हैं। अतः सभी धर्मप्रेमी बंधुओं से विनती है, कृपया सत्य को अपनायें और विश्व को आर्य बनायें।
कृण्वन्तोविश्वमार्यम्

“नव वर्ष” : शिवदेव आर्य, गुरुकुल पौन्धा

सृष्टि विवेचनम्
यहाँ पर्व मनाने की परम्परा में नववर्ष का पर्व विशेष महत्व रखता है, क्योंकि सृष्टि की उत्पत्ति चैत्र मास शुक्ला प्रतिपदा को स्वीकार की जाती है। किसी कवि ने कहा है कि-

चैत्रे मासि जगद् ब्रह्म ससर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति।।

सृष्टि किसे कहते हैं इस विषय में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज आर्योद्देश्यरत्नमाला में कहते हैं कि- ‘जो कर्ता की रचना से कारण द्रव्य किसी संयोग विशेष से अनेक प्रकार कार्यरूप होकर वर्तमान में व्यवहार करने योग्य होती है, वह सृष्टि कहाती है।’ इसी बात को स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में कहते हैं कि ‘सृष्टि उसको कहते हैं जो पृथक्द्रव्यों को ज्ञान, युक्तिपूर्वक मेल होकर नानारूप बनना।’
हम सभी इस सिध्दान्त से अवगत हैं कि किसी भी वस्तु का निर्माणकर्ता अवश्य होता है। निर्माणकर्ता पहले होता है और निर्मितवस्तु पश्चात् होती है। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और उसने जीवों के कल्याण के लिए यह सृष्टि बनायी। सृष्टि के सृजन से पूर्व मूल प्रकृति सत्व-रज-तम की साम्यावस्था में होती है।
सत्यार्थप्रकाश में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि – अनादि नित्य स्वरूप सत्व, रजस् और तमो गुण की एकावस्था रूप प्रकृति से उत्पन्न जो परम सूक्ष्म पृथक्-पृथक् तत्वायव विद्यमान हैं, उन्हीं का प्रथम ही जो संयोग का प्रारम्भ है, संयोग विशेषों से अवस्थान्तर दूसरी इसकी अवस्था को सूक्ष से स्थूल, स्थूल से बनते बनाते विविधरूप बनी है, इसी से संसर्ग होने से सृष्टि कहाती है।

इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।
यो अस्याध्यक्ष: परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेदग॥

[ ऋग्वेद १०-१२९-७ ]

इस ऋग्वेदीय मन्त्र के आधार पर कहा गया है कि जिस परमेश्वर के द्वारा रचने से जो नाना प्रकार का जगत् उत्पन्न हुआ है,वही इस जगत् का धारणकर्ता, संहर्ता व स्वामी है।

अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यैरसाच्च विश्वकर्मणः समवत्रताग्रे।
अस्य त्वष्टा विदधद्रपमेति तन्मत्र्यस्य देवत्वमाजानमग्रे॥

[ यजु ३१-१७ ]

तेन पुरुषेण पृथिव्यै पृथिव्युत्त्पत्यर्थमद्भ्यो रसः सं भृतः संगृह्य तेन पृथिवी रचिता। एवमग्निरसेनाग्नेः सकाशादाप उत्पादिताः। अग्निश्च वायोः सकाशाद्वायुराकाशादुत्पादित आकाशः प्रकृतेः प्रकृतिः स्वसामथ्र्याच्च। विश्वं सर्वं कर्म क्रियमाणमस्य स विश्वकर्मा, तस्य परमेश्वरस्य सामर्थ्यमध्ये कारणाख्येग्रे सृष्टेः प्राग्जगत् समवत्र्तत वत्र्तमानमासीत्। तदानीं सर्वमिदं जगद् कारणभूतमेव नेदृशमिति। तस्य सामर्थ्यस्यांशान् गृहीत्वा त्वष्टा रचनकत्र्तेदं सकलं जगद्विदधत्।

[ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, सृष्टिविद्याविषयः ]

अर्थात् परमपिता परमेश्वर ने पृथिवी की उत्पति के लिए जल से सारांश रस को ग्रहण करके, पृथिवी और अग्नि के परमाणुओं को मिला के पृथिवी रची है। इसी प्रकार अग्नि के परमाणु के साथ जल के परमाणुओं को मिलाकर जल को रचा एवं वायु के परमाणुओं के साथ अग्नि के परमाणुओं से वायु रचा है। वैसे ही अपने सामर्थ्य से आकाश को भी रचा है, जो कि सब तत्वों के ठहरने का स्थान है। इस प्रकार परमपिता परमेश्वर ने सूर्य से लेकर पृथ्वी पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् को रचा है।

सृष्टि उत्पत्ति विषय को अंगीकार कर  ऋग्वेद में इसका निरुपण इसप्रकार किया गया है कि –

ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्र्रो अणवः।।
समुद्रार्दणवादधि संवत्सरो अजायत।
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी।।

अर्थात् प्रदीप्त आत्मिक तप के तेज से ऋत और सत्य नामक सार्वकालिक और सार्वभौमिक नियमों का प्रथम प्रादुर्भाव हुआ। तत्पश्चात् प्रलय की रात्रि हो गई। किन्हीं भाष्यकार के मत से यहां रात्रि शब्द अहोरात्र का उपलक्षण है और वे उस से प्रलय का ग्रहण न करके इसी कल्प की आदि सृष्टि के ऋतुओं सत्य के अनन्तर अहोरात्र का अविर्भाव मानते हैं। फिर मूलप्रकृति में विकृति होकर  उसके अन्तरिक्षस्थ समुद्र के प्रकट होने (उसके क्षुब्ध होने) के पश्चात् विश्व के वशीकर्ता विश्वेश्वर ने अहोरात्रों को करते हुए संवत्सर को जन्म दिया। इससे ज्ञात होता है कि – आदि सृष्टि में प्रथम सूर्योदय के समय भी संवत्सर और अहोरात्रों की कल्पना पर ब्रह्म के अनन्त ज्ञान में विद्यमान थी। उनके जन्म देने का यहां यहीं अभिप्राय प्रतीत होता है कि वेदोपदेश द्वारा इस संवत्सरारम्भ और उसके मन कल्पना का ज्ञान सर्वप्रथम मन्त्र द्रष्टा ऋषियों को हुआ वा यों कहिये कि – प्रत्येक सृष्टिकल्प के आदि में यथा निमय होता है और उन्होंने यह जान लिया कि – इतने अहोरात्रों के पश्चात् आज के दिन नवसंवत्सर के आरम्भ का नियम है और उसी के अनुसार प्रतिवर्ष संवत्सरारम्भ होकर वर्ष, मास और अहोरात्र की कालगणना संसार में प्रचलित हुई।
भारतीय संवत् के मासों के नाम आकाशीय नक्षत्रों के उदयास्त से सम्बन्ध रखते है। यही बात तिथि अंश (दिनांक) के सम्बन्ध में भी है। वे भी सूर्य-चन्द्र की गति पर आश्रित हैं। विक्रम-संवत्  अपने अंग-उपागों के साथ र्पूणतः वैज्ञानिक सत्य पर स्थित है। विक्रम-संवत् विक्रमादित्य के बाद से प्रचलित हुआ। विक्रम-संवत् सूर्य सिध्दान्त पर आधारित है। वेद-वेदांगमर्मज्ञों  के अनुसार सूर्य सिध्दान्त का मान ही सदैव भ्रमहीन एवं सर्वश्रेष्ठ है। सृष्टि संवत् के प्रारम्भ से लेकर आज तक की गणनाएं की जाएं तो सूर्य-सिध्दान्त के अनुसार एक भी दिवस का अन्तर नहीं होगा। सौर मंडल को ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति एवं स्थिति पर हमारे दिन, महीने और वर्ष पर आधारित हैं।
स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्यार्थप्रकाश के अष्टम समुल्लास में कहते हैं कि-‘आदि सृष्टि मैथुनी नहीं होती, क्योंकि जब स्त्री पुरुष के शरीर परमात्मा बनाकर उनमें जीवों का संयोग कर देता है, तदनन्तर मैथुनी सृष्टि चलती है।’
सृष्टि और प्रलय को शास्त्रों में ब्रह्मदिन-ब्रह्मरात्री के नाम से जाना जाता है, ये दिन-रात के समान निरन्तर अनादि काल से चले आ रहे हैं। सृष्टि और प्रलय का समय बराबर माना है, इसमें कोई विवाद नहीं है। इसी प्रक्रिया को स्वामी जी कुछ इसप्रकार परिभाषित करते हैं कि – जैसे दिन के पूर्व रात और रात के पूर्व दिन, तथा दिन के पीछे रात और रात के पीछे दिन बराबर चला आता है, इसी प्रकार सृष्टि के पूर्व प्रलय और प्रलय के पूर्व  सृष्टि तथा सृष्टि के पीछे प्रलय और प्रलय के आगे सृष्टि अनादि काल से चक्र चला आता है। इसकी आदि वा अन्त नहीं, किन्तु जैसे दिन वा रात का आरम्भ और अन्त देखने में आता है, उसी प्रकार सृष्टि और प्रलय का आदि अन्त होता रहता है। क्योंकि जैसे परमात्मा, जीव, जगत् का कारण तीन स्वरूप से अनादि हैं, जैसे जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और वर्तमान प्रवाह से अनादि हैं, जैसे नदी का प्रवाह वैसा ही दीखता है, कभी सूख जाता है, कभी नहीं दीखता फिर बरसात में दीखता और उष्ण काल में नहीं दीखता ,ऐसे व्यवहारों को प्रवाहरूप जानना चाहिए, जैसे परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव अनादि हैं, वैसे ही उसके जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करना भी अनादि है जैसे कभी ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव का आरम्भ और अन्त नहीं इसी प्रकार उसके कर्तव्य कर्मों का भी आरम्भ और अन्त नहीं।
सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय यह अनवरत चलने वाला चक्र है। ऋषिवर देव दयानन्द जी ऋग्वेदादिभाष्याभूमिका के वेदोत्पत्ति विषय में लिखते हैं कि-
सृष्टि के वर्तमान होने का नाम दिन और प्रलय होने का नाम रात्रि है। यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है इसके (१९६०८५२९७६) एक अर्ब, छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार, नव सौ, छहत्तर वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में व्यतीत हुए हैं और (२३३३२२७०२४) दो अर्ब तैंतीस करोड़, बत्तीस लाख, सत्ताइस हजार, चैबीस वर्ष इस सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं। इन में से अन्त का यह चैबीसवां वर्ष भोग रहा है। आगे आने वाले भोग के वर्षों में से एक-एक कांटाते जाना और गत वर्षों में क्रम से एक वर्ष मिलाते जाना चाहिए, जैसे आज पर्यन्त कांटाते बढ़ाते आए हैं।’
[ वेदोत्पत्ति विषय, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ]

ऋषि का अनुसरण करते हुए वर्तमान विक्रमी सम्वत् २०७४ को हम इस प्रकार से देखें-
१ सृष्टि = १४ मन्वन्तर
१ मन्वन्तर = ७१ चतुर्युग
१ चतुर्युग =  सतयुग (१७,२८,०००)
त्रेतायुग (१२,९६,०००)
द्वापरयुग (८,६४,०००)
कलियुग (४,३२,०००)
कुलयोग = ४३,२०,०००
७१ चतुर्युग (४३,२०,००० × ७१) = ३०,६७,२०,००० वर्ष
१४ मन्वन्तर (३०,६७,२०,००० × १४) = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष

(१४ मन्वन्तर – स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तमि, तामस, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, देवसावर्णि तथा इन्द्रसावर्णि)

कुल सृष्टि की आयु    = ४,२९,४०,८०,००० वर्ष
सृष्टि की वर्तमान आयु = १,९६,०८,५३,११८ वर्ष
इस प्रकार वर्तमान सृष्टि की आयु कुल आयु से कांटाने पर  सृष्टि की आयु  २,३३,३२,२६,८८२ अभी शेष रहती है। यह वैवस्वत् नामक सातवाएं मन्वन्तर वर्तमान में चल रहा है।    अनेक आचार्य १४ मन्वन्तरों की १५ सन्धिकाल के अवधि की गणना पृथक् करते हैं जिसके आधार पर वर्तमान सृष्टिसंवत् १,९६,०८,५३,११८ में ७ सन्धिकाल की आयु (७ × १७,२८,०००) १,२०,९६,००० मिलाकर १,९७,२९,४९,११८ सृष्टिसंवत् स्वीकारते हैं।
प्रत्येक संवत्सर अर्थात् वर्ष को २ अयन (उत्तरायण एवं दक्षाणायन), ६ ऋतु (वसन्त, गीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमन्त), १२ मास (चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन), २ पक्ष (शुक्ल एवं कृष्ण), ७ दिवस (रविवार, चन्द्रवार या सोमवार, भौमवार या मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार या गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार), १ अहोरात्र (दिन) अर्थात् ८ प्रहर में विभक्त किया गया।
परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि का निर्माण व इसको नियमित रूप से चलाये रखा है। उस परमेश्वर को जानने वाले हम लोग होवें। इसीलिए वेद हमें बार-बार उपदेश देता है कि-

हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत्।
स दधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।

[ ऋग्वेद १०/१२९/१ ]
अर्थात् हिरण्यगर्भ जो परमेश्वर है, वही एक सृष्टि के पहिले वर्तमान था, जो इस सब जगत् का स्वामी है और वहीं पृथिवी से लेके सूर्यपर्यन्त सब जगत् को रच के धारण कर रहा है। इसलिए उसी सुखस्वरूप परमेश्वर देव की ही हम लोग उपासना करें, अन्य की नहीं।

सभी सहृदय पाठकों को भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत् २०७४ एवं सृष्टिसंवत् १,९६,०८,५३,११८ तथा होलिकोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं।

– शिवदेव आर्य
गुरुकुल-पौन्धा, देहरादून
मो—8810005096

रक्तसाक्षी पंडित लेखराम “आर्य मुसाफिर”

जन्म– आठ चैत्र विक्रम संवत् १९१५ को ग्राम सैदपुर जिला झेलम पश्चिमी पंजाब |
पिता का प.तारासिंह व माता का नाम भागभरी(भरे भाग्यवाली]) था | १८५० से १८६० ई. एक एक दशाब्दि में भारत मेंकई नर नामी वीर, जननायक नेता व विद्वान पैदा हुए | यहाँ ये बताना हमारा कर्त्तव्य है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के हुतात्मा खुशीरामजी का जन्म भी सैदपुर में ही हुआ था | वे भी बड़े दृढ़ आर्यसमाजी थे | आर्यसमाज के विख्यात दानी लाला दीवानचंदजी इसी ग्राम में जन्मे थे | पण्डितजी के दादा का पं.नारायण सिंह था | आप महाराजा रणजीतसिंह की सेना के एक प्रसिद्द योध्या थे |
आर्यसमाज में पण्डितजी का स्थान बहुत ऊँचा है | धर्मरक्षा के लिए इस्लाम के नाम पर एक मिर्जाई की छूरी से वीरगति पाने वाली प्रथम विभूति पं.लेखराम ही थे | आपने मिडिल तक उर्दू फ़ारसी की शिक्षा अपने ग्राम में व पेशावर में प्राप्त की | फ़ारमुग़लकाल के बाद सी के सभी प्रमाणिक साहित्यिक ग्रन्थों को छोटी सी आयु में पढ़ डाला | अपने चाचा पं.गण्डाराम के प्रभाव में पुलिस में भर्ती हो गए | आप मत, पन्थो का अध्ययन करते रहे | प्रसिद्द सुधारक मुंशी कन्हैयालाल जी के पत्र नीतिप्रकाश से महर्षि दयानन्द की जानकारी पाकर ऋषि दर्शन के अजमेर गए | १७ मई १८८१ को अजमेर में ऋषि के प्रथम व अंतिम दर्शन किये, शंका-समाधान किया | उपदेश सुने और सदैव के लिए वैदिक-धर्म के हो गए |

सत्यनिष्ठ धर्मवीर, वीर विप्र लेखरामजी का चरित्र सब मानवों के लिए बड़ा प्रेरणादायी है | इस युग में विधर्मियों की शुद्धि के लिए सबसे अधिक उत्साह दिखाने वाले पं.लेखराम ही थे, इस कार्य के लिए उन्होंने अपना जीवन दे दिया| आज हिन्दू समाज उनके पुनीत कार्य को अपना रहा है | परन्तु खेद की बात है कि आर्यसमाज मन्दिरों के अतिरिक्त किसी हिन्दू के घर या संघठन में पण्डितजी का चित्र नही मिलता | आर्यों की संतान इन हिन्दुओं को नही भूलना चाहिए कि विदेशी शासकों के पोषक व प्रबल समर्थक इन्हीं मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने अपनी एक पुस्तक में हिन्दुओं को “सैदे करीब” लिखा था | इसका अर्थ है कि हिन्दू तो मुसलमानों की पकड़ में शीघ्र आनेवाला शिकार है |

पण्डितजी अडिग ईश्वरविश्वासी, महान मनीषी, स्पष्ट वक्ता, आदर्श धर्म-प्रचारक, त्यागी तपस्वी, लेखक, गवेषक, और बड़े पवित्र आत्मा थे | एक बार पण्डितजी ने आर्यसमाज पेशावर के मंत्री श्री बाबू सुर्जनमल के साथ अफगानिस्तान में ईसाई मत के प्रचारक पादरी जोक्स से पेशावर छावनी में भेंट की | पादरी महोदय ने कहा कि बाइबिल में ईश्वर को पिता कहा गया है | ऐसी उत्तम शिक्षा अन्यत्र किसी ग्रन्थ में नहीं है | पण्डितजी ने कहा “ऐसी बात नही है | वेद और प्राचीन आर्य ऋषियों की बात तो छोड़िये अभी कुछ सौ वर्ष पहले नानकदेव जी महाराज ने भी बाइबिल से बढ़कर शिक्षा दी है| पादरी ने पूछा कहाँ है ?? पण्डितजी ने कहा देखिये—

तुम मात पिता हम बालक तेरे |
तुमरी किरपा सुख घनेरे || “

यहाँ ईश्वर को पिता ही नही माता भी कहा गया है| ये शिक्षा तो बाइबिल की शिक्षा से भी बढ़कर है| माता का प्रेम पिता के प्रेम से कहीं अधिक होता है | इसीलिए ईसा मसीह को युसूफ पुत्र न
कहकर इबने मरियम (मरियम पुत्र) कहा जाता है | ये सुनकर पादरी महोदय ने चुप्पी साध ली | इसी प्रकार अजमेर में पादरी ग्रे(Grey) ने भी इसी प्रकार का प्रश्न उठाया तब पण्डितजी ने यजुर्वेद
मंत्र संख्या ३२/१० का प्रमाण देकर उनकी भी बोलती बंद कर दी थी |

रोपड़ के पादरी पी सी उप्पल ने एक राजपूत युवक को बहला-फुसलाकर ईसाई बना लिया, पण्डितजी को सुचना मिली तो वे रोपड़ पहुंचे, तब तक रोपड़ के दीनबंधु सोमनाथजी ने उसे शुद्ध कर लिया था | पण्डितजी ने रोपड़ पहुंचकर मंडी में लगातार कई दिन तक बाइबिल पर व्याख्यान दिए | पादरी उप्पल को लिखित व मौखिक शास्त्रार्थ के लिए निमंत्रण दिया | उप्पल महोदय ने चुप्पी साध ली | घटना अप्रैल १८९५ की है |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने ‘सत बचन’ नाम से एक पुस्तक छापी | उसमें यह सिद्ध करने का यत्न किया कि बाबा नानकदेवजी पक्के मुसलमान थे | इस पुस्तक के छपने पर सिखों मरण बड़ी हलचल
मची | तब प्रतिष्ठित सिखों ने पण्डितजी से निवेदन किया वे इसका उत्तर दें | उस समय पण्डितजी के सिवा दूसरा व्यक्ति इसका उत्तर देने वाला सूझता भी नही था | बलिदान से पूर्व इस विषय पर एक ओजस्वी व खोजपूर्णव्याख्यान देकर मिर्ज़ा साहेब की पुस्तक का युक्ति व प्रमाणों से प्रतिवाद किया| भारी संख्या में सिख उन्हें सुनने आये, सेना के सिख जवान भी बहुत बड़ी संख्या में वहां उपस्थित थे | आपके व्याख्यान के पश्चात् सेना के वीर सिख जवानों ने पण्डितजी को ऐसे उठा लिया जैसे पहलवान को विजयी होने पर उसके शिष्य उठा लेते हों |

पं.लेखरामजी धर्म रक्षा के लिए संकटों, आपत्तियों और विपत्तियों का सामना किया | उनके व्यवहार से ऐसा लगता है कि मानों बड़े से बड़े संकट को भी वो कोई महत्व नही देते थे | उनके पिताजी की मृत्यु हुई तो भी वे घर में न रुक सके | बस गए और चल पड़े | उन्हें भाई की मृत्यु की सूचना प्रचार-यात्रा में ही मिली, फिर भी प्रचार में ही लगे रहे | एक कार्यक्रम के पश्चात् दुसरे और दुसरे के पश्चात् तीसरे में| इकलौते पुत्र की मृत्यु से भी विचलित न हुए | पत्नी को परिवार में छोड़कर फिर चल पड़े | दिन रात एक ही धुन थी कि वैदिक धर्म का प्रचार सर्वत्र करूँ |

पंडित लेखराम तो जैसे साक्षात् मृत्यु को ललकारते थे| कादियां का मिर्ज़ा गुलाम अहमद स्वयं को नबी पैगम्बर घोषित कर रहा था और पण्डितजी को मौत की धमकियाँ दे रहा था | उसने श्रीराम पर
श्रीकृष्ण पर, गौ पर, माता कौशल्या पर, नामधारी गुरु रामसिंह पर, महर्षि दयानन्द, वेद और उपनिषद इत्यादि सब गन्दे-गन्दे प्रहार किये | उसने श्रीकृष्ण महाराज को तो सुअर मारने वाला लिखा |
पर यहाँ पं.लेखराम धर्म पर उसके प्रत्येक वार का उत्तर देते थे | जब पण्डितजी सामने आते तो खुद को शिकारी कहने वाला बिल में छुप जाता | अपने बलिदान से एक वर्ष पूर्व पण्डितजी लाहौर रेलवे स्टेशन के पास एक मस्जिद में पहुंचे, उन्हें पता चला कि मिर्ज़ाजी वहां आये हैं | मिर्ज़ा उनकी हत्या के षड्यंत्रों में लगा था| जाते ही मिर्ज़ा को नमस्ते करके सच और झूठ का निर्णय करने का निमंत्रण दे दिया | विचार करिए जिस व्यक्ति से मृत्यु लुकती-छिपती थी और नर नाहर लेखराम मौत को गली-गली खोजता फिरता था | मौत को ललकारता हुआ लेखराम मिर्ज़ा के घर तक पहुंचा|
कादियां भी मिर्ज़ा के इलहामी कोठे में जाकर उसे ललकारा | आत्मा की अमरता के सिद्धांत को मानकर मौत के दांत खट्टे करने लेखराम जैसे महात्मा विरले होते हैं |

पण्डितजी ने हिन्दू-जाति की रक्षा के लिए क्या नही किया ?? स्यालकोट में सेना के दो सिख जवान मुसलमान बनने लगे | जब सिख विद्वानों के समझाने पर भी वे नही टेल तप सिंघसभा वालों ने
आर्यसमाजियों से कहा पं.लेखराम को शीघ्र बुलाओ | पण्डितजी आये | उन युवकों का शंका-समाधान किया, शास्त्रार्थ हुआ और वे मुसलमान बनने से बचा लिए गए | जम्मू में कोई ठाकुरदास मुसलमान होने लगा तो पण्डितजी ने जाकर उसे बचाया | एल लाला हरजस राय मुसलमान हो गए | ये प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे थे | फारसी, अरबी, अंग्रेजी के बड़े ऊँचे विद्वान थे | हरजस राय का नाम अब मौलाना अब्दुल अज़ीज़ था | वह गुरुदासपुर में Extra Assistant Commisiner रहे थे | यह सबसे बड़ा पद था जो भारतीय तब पा सकते थे | पण्डितजी कृपा से वे शुद्ध होकर पुनः हरजस राय बन गए| एक मौलाना अब्दुल रहमान तो पण्डितजी के प्रभाव से सोमदत्त बने | हैदारबाद के एक योग्य मौलाना हैदर शरीफ पर आपके साहित्य का ऐसा रंग चढ़ा कि हृदय बदल गया | वे वैदिक धर्मी बन गए |
मौलाना शरीफ बहुत बड़े कवि थे |

एक बार पण्डितजी प्रचारयात्रा से लाहौर लौटे तो उन्हें पता चला कि मुसलमान एक अभागी हिन्दू युवती को उठाकर ले गए हैं | पण्डितजी ने कहा मुझे एक सहयोगी युवक चाहिए मैं उसे खोजकर लाऊंगा | पण्डितजी युवक को लेकर मस्जिदों में उसकी खोज में निकले | उन्होंने एक बड़ी मस्जिद में एक लड़की को देखा | भला मस्जिद में स्त्री का क्या काम ? यह आकृति में ही हिन्दू दिखाई दी | पण्डितजी ने उसकी बांह पकड़कर कहा “चलो मेरे साथ |” शूर शिरोमणि लेखराम भीड़ को चीरकर उस अबला को ले आये | आश्चर्य की बात तो यह है कि उस नर नाहर को रोकने टोकने की उन लोगों की हिम्मत ही न हुई |
इसी कारण देवतास्वरूप भाई परमानन्द जी कहा करते थे कि डर वाली नस-नाड़ी यदि मनुष्यों में कोई होती है तो पं.लेखराम में वो तो कत्तई नही थी |

पं.लेखराम जी ने ‘बुराहीने अहमदियों’ के उत्तर में ‘तकजीबे बुराहीने अहमदिया’ ग्रन्थ तीन भागों में प्रकाशित करवाया | इसके छपने के साथ ही धूम मच गयी | ईसाई पत्रिका ‘नूर अफशां’ में भी इसकी समीक्षा करते हुए पण्डितजी की भूरी-भूरी प्रशंसा की | पण्डितजी इस मामले में आर्य समाज में एक परम्परा के जनक भी हैं, विरोधी यदि कविता में आर्य-धर्म पर प्रहार करते थे तो पण्डितजी कविता में ही उत्तर देते थे | जिस छंद में प्रहारकर्ता लिखता, पण्डितजी उसी छंद में लिखते थे |

मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने पण्डितजी को मौत की धमकियाँ देकर वेद-पथ से विचलित करना चाहा| पण्डितजी ने सदा यही कहा मुझे जला दो, मार दो, काट दो, परन्तु मैं वेद पथ से मुख नही मोड़ सकता | इसी घोष के अनुसार एक छलिया उनके पास शुद्धि का बहाना बनाकर आया | उनका नमक खता रहा | उनका चेला बनने का नाटक किया | पण्डितजी महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र लिखते-लिखते थक गए तो अंगडाई ली | अंगड़ाई लेते हुए अपनी छाती को खोला तो वो नीच वहीँ बैठा था, उसने कम्बल में छुरा छुपा रखा था | क्रूर के सामने शूर का सीना था, पास कोई नही था | उस कायर ने पण्डितजी के पेट में छूरा उतार दिया और भाग निकला | वो तारीख थी ६ मार्च १८९७ |

उपसंहार—धर्मवीर पं.लेखराम की महानता का वर्णन करने में लेखनी असमर्थ है | स्वामी श्रद्धानंद जैसे नेता उनका अदब मानते थे | सनातन धर्म के विद्वान और नेता पं.दीनदयाल व्याख्यान वाचस्पति कहते थे कि पं.लेखराम के होते हुए कोई भी हिन्दू जाति का कुछ नही बिगाड़ सकता | ईसाई पत्रिका का सम्पादक उनकी विद्वत्ता पर मुग्ध था | उनके बलिदान पर अमेरिका की एक पत्रिका ने उनपर लेख छापा था | ‘मुहम्मदिया पाकेट’ के विद्वान लेखक मौलाना अब्दुल्ला ने तो उन्हें ‘कोहे वकार’ अर्थात गौरव-गिरी लिखा है | पर पण्डितजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, वेदों को जीवन भर पानी पी पीकर कोसने वाला मिर्ज़ा भी मरते वक़्त वेदों को ईश्वरीय ज्ञान लिखकर जाता है | पण्डितजी हम और क्या लिखे ! अपनी बात को महाकवि ‘शंकर’ के शब्दों में समाप्त करते है—–

धर्म के मार्ग में अधर्मी से कभी डरना नही |
चेत कर चलना कुमारग में कदम धरना नही ||
शुद्ध भावों में भयानक भावना भरना नही |
बोधवर्धक लेख लिखने में कमी करना नहीं ||

सुजीत मिश्र

कश्मीर नर्क कैसे बना?

कश्मीर को   भारत  का स्वर्ग   कहा जाता है . लेकिन इसको  नर्क  बनाने  में  नेहरू  की  मुस्लिम परस्ती   जिम्मेदार है . जो आज  तक चली  आ रही है . चूँकि देश  का विभाजन धर्म  के आधार  पर हुआ था .और जिन्ना जैसे  कट्टर नेताओं का तर्क था कि  मुस्लिम  बहुल  कश्मीर  के बिना  पाकिस्तान  अपूर्ण  है . इसलिए पाकिस्तान  प्रेरित उग्रवादी  और पाक सेना मिल   कर कश्मीर  में ऐसी  हालत  पैदा  करना चाहते हैं ,जिस से  कश्मीर के हिन्दू  भाग   कर किसी  अन्य  प्रान्त में  चले  जाएँ .कांगरेस  की अलगाववादी  नीति  के  कारण  हालत इतनी गंभीर हो गयी कि   हिन्दू श्रीनगर के  लाल चौक   में खुले आम  तिरंगा  भी नहीं  फहरा  सकते हैं .जबकि हिन्दू  हजारों  साल से कश्मीर में  रहते  आये हैं ,और  महाभारत  के समय  से ही कश्मीर पर हिन्दू  राजा राज्य  करते  आये हैं .  इसके लिए हमें  इतिहास के पन्नों  में   झांकना होगा  ,कि  कश्मीर  को विशेष  दर्जा  देने का  क्या औचित्य  है ,?

1-कश्मीर का प्राचीन  इतिहास

कश्मीर  के प्राचीन इतिहास    का   प्रमाणिक  इतिहास   महाकवि  ” कल्हण ”  ने  सन  1148 -49  में  अपनी  प्रसिद्ध  पुस्तक ” राजतरंगिणी ”  में  लिखा  था . इस पुस्तक में   8  तरंग   यानि  अध्याय   और संस्कृत  में कुल    7826  श्लोक  हैं . इस   पुस्तक के  अनुसार  कश्मीर  का  नाम  ” कश्यपमेरु  ”   था  .  जो  ब्रह्मा  के  पुत्र  ऋषि  मरीचि  के पुत्र  थे .चूँकि  उस समय में  कश्मीर  में  दुर्गम  और ऊंचे पर्वत थे ,  इसलिए ऋषि कश्यप ने लोगों   को आने जाने के लिए   रास्ते  बनाये थे .  इसीलिए  भारत के इस   भाग  का नाम ” कश्यपमेरू ” रख  दिया गया  , जो बिगड़  कर  कश्मीर    हो गया  .राजतरंगिणी  के  प्रथम  तरंग में  बताया गया है  कि सबसे पहले  कश्मीर  विधिवत     पांडवों   के  सबसे  छोटे  भाई  सहदेव   ने राज्य    की  स्थापना  की थी , और  उस समय   कश्मीर में   केवल  वैदिक   धर्म   ही  प्रचलित  था .फिर  सन  273  ईसा  पूर्व   कश्मीर में  बौद्ध  धर्म   का  आगमन  हुआ  . फिर भी कश्मीर में  सहदेव  के वंशज  पीढ़ी  दर पीढ़ी   कश्मीर  पर 23  पीढ़ी  तक  राज्य  करते  रहे ,यद्यपि  पांचवीं सदी में ” मिहिरकुल ”   नामके  ” हूण ” ने  कश्मीर  पर  कब्ज़ा  कर लिया  था . लेकिन  उसने शैव  धर्म  अपना  लिया  था .

2-कश्मीर  में इस्लाम

इस्लाम  के  नापाक  कदम  कश्मीर में सन 1015 में   उस समय  पड़े  जब  महमूद  गजनवी ने  कश्मीर  पर हमला  किया था  .लेकिन  उसका उद्देश्य  कश्मीर में इस्लाम   का प्रचार करना नहीं   लूटना था , और लूट मार कर वह वापिस गजनी  चला गया . उसके बाद ही कश्मीर पर दुलोचा  मंगोल  ने  भी हमला  किया . लेकिन  उसे तत्कालीन  कश्मीर के राजा  सहदेव   के मंत्री ने  पराजित करके  भगा  दिया . और सन  1320  में  कश्मीर में  “रनचिन ” नामका  तिब्बती  शरणार्थी सेनिक  राज के पास   नौकरी के लिए  आया  . उसकी वीरता  को देख कर राजा ने  उसे सेनापति  बना  दिया . रनचिन  ने  राज से  अनुरोध  किया कि  मैं  हिन्दू  धर्म  अपनाना  चाहता  हूँ .लेकिन  पंडितों  ने  उसके अनुरोध का  विरोध  किया  और कहा कि दूसरी जाती का होने के कारण  तुम्हें  हिन्दू  नहीं  बनाया   जा सकता  .कुछ  समय के  बाद  राजा  सहदेव   का  देहांत  हो  गया  और उसकी पत्नी ” कोटा  रानी  ”  राज्य  चलाने लगी   और  उसने  ” रामचन्द्र ” को अपना  मंत्री  बना   दिया .   उस समय  कश्मीर में कुछ  मुसलमान   मुल्ले सूफी बन कर कश्मीर में   घुस  चुके  थे . ऐसा एक  सूफी  ” बुलबुल  शाह  ” था .उसने  रनचिन   से कहा  यदि  हिन्दू पंडित तुम्हें  हिन्दू नहीं   बनाते  तो  तुम  इस्लाम  कबुल   कर लो .इसा तरह  बुलबुल शाह ने  रनचिन  कलमाँ   पढ़ा कर  मुसलमान   बना दिया . जिस जगह  रनचिन  मुसलमान  बना था उसे  बुलबुल  शाह का  लंगर कहा  जाता है  .जो  श्रीनगर के पांचवें  पुल के पास है . रन चिन   ने  अपना  नाम   ” सदरुद्दीन  ”   रखवा   लिया  था .बुलबुल शाह   की संगत  में  रनचिन  हिन्दुओं   का घोर शत्रु  बन गया . और 6 अक्टूबर  1320  को   रन चिन   ने धोखे से  मंत्री   रामचन्द्र   की  हत्या  कर दी .मंत्री   को  मरने के बाद   रनचिन   अपना  नाम ” सुलतान  सदरुद्दीन  ‘ रख  लिया .फिर   अफगानिस्तान  से   मुसलमानों को   कश्मीर में  बुला कर बसाने लगा . और  करीब  सत्तर  हजार  मुसलमान की  सेना  बना ली  .  और कुछ  समय बाद  सन  1339 में  कोटा रानी   को  को कैद  कर लिया और  उस से  बलपूर्वक  शादी   कर  ली .सदरुद्दीन   के सैनिक  प्रति दिन  सैकड़ों  हिन्दुओं   का  क़त्ल  करते थे .इसलिए कुछ लोग  यातो  दर के कारण  मुसलमान  बन गए या भाग कर   जम्मू  चले   गए  . और  कश्मीर  घाटी  हिन्दुओं  से खाली  हो  गयी .

लेकिन   वर्त्तमान  कांग्रेस   की  सरकार    जम्मू को भी  हिन्दू विहीन   बनाने में   लगी  हुई है .  काश  उस समय  महर्षि  दयानंद होते   जो  रनचिन  को  मुसलमान   नहीं    होने देते  .
इसलिए    हिन्दुओं   को चाहिए कि सभी   हिन्दुओं   को अपना  भाई  समझे  , और जो भी  हिन्दू धर्म  स्वीकार करना चाहे उसे   हिन्दू बना कर अपने  समाज में शामिल  कर लें  .  और  हिन्दू विरोधी  कांग्रेस का  हर प्रकार   से विरोध   करें  .

बृज नंदन शर्मा

भंडाफोड़ू

पंडित मनसाराम जी “वैदिक तोप”

स्वनामधन्य पं॰मनसारामजी ‘वैदिक तोप’ आर्यजगत्‌ की महान विभूतियोँ मेँ अपना स्थान रखते हैँ। पण्डितजी का जन्म 1890 ई॰ हड्डाँवाला नंगल[जाखल के निकट] हरियाणा प्राप्त मेँ हुआ था।

आपके पिता लाला शंकरदासजी अन्न-धन से सम्पन्न, सुखी सद्‌गृहस्थ व्यापारी थे। वे कट्टर मूर्तिपूजक और पौराणिक थे।
पुत्र भी उनके रंग मेँ रंग गया। पण्डितजी की प्राइमरी तक की शिक्षा वामनवाला ग्राम मेँ हुई। तत्पश्चात्‌ टोहाना के मिडल स्कूल मेँ दाखिल हो गये। 1907 मेँ पण्डितजी आठवीँ श्रेणी मेँ प्रविष्ट हुए। इसी वर्ष मेँ पिताजी का देहान्त हो गया। पण्डितजी को स्कूल छोड़कर घर सम्हालना पड़ा।

लाला शंकरदास जी के वहां एक पटवारी श्री रामप्रसादजी रहा करते थे, ये बड़े सदाचारी, मधुरभाषी और निष्ठावान आर्य समाजी थे | जब मनसारामजी घर पर रहने लगे तो वे इनको वैदिक धर्म के सिद्धांतों और तत्वज्ञान से परिचय कराया करते थे | मनसारामजी महाशय रामप्रसादजी के सत्संग से आर्य समाज की ओर आकृष्ट हो गये |
१९०८ में टोहाना में आर्यों और पौराणिकों के बीच एक शास्त्रार्थ हुआ | आर्य समाज के तरफ से पं.राजारामजी शास्त्री ने पक्ष रखा और पौराणिको की ओर से पं.लक्ष्मीनारायण जी थे | श्री उदमीरामजी अध्यक्ष नियुक्त हुए | इस शास्त्रार्थ को देखने वालों में पंडित मनसाराम भी थे | शास्त्रार्थ में पं.राजाराम जी की युक्तियों की धाक पंडित मनसारामजी के मस्तिष्क पर जम गयी | आप आर्य समाज के दीवाने हो गये | अब पं.मनसाराम के मन में संस्कृत अध्ययन की धुन सवार हुई | सर्वप्रथम आप कुरुक्षेत्र की सनातनधर्म पाठशाला में प्रविष्ट हुए | यहाँ से हरिद्वार पहुंचे, संस्कृत अध्ययन की लगन में
आपने गुरुकुल काँगड़ी में चपरासी की नौकरी कर ली, उनका विचार था कि गुरुकुल में एक ओर संस्कृत अध्ययन भी कर लूँगा औरे आर्य समाज की सेवा भी कर लूँगा | पर इनकी मनोकामना
यहाँ भी पूरी न हुई | यहाँ से निराश होकर ये ज्ञानपिपासु विद्या-नगरी काशी में पहुँच गया |

काशी में संस्कृत अध्ययन के कई केन्द्र खुले हुए थे | पर उनमें सिर्फ जन्म के ब्राह्मणों को ही भोजन मिलता था | संस्कृतज्ञान के पिपासु ने कितने दिन भूखे रहकर काटे होंगे, कौन जानता है ? श्रीमनसाराम जी जंगल से बेर तोड़कर लाया करते थे, उन्हें ही खाकर निर्वाह करते
थे | एक दिन वे बेर तोड़ रहे थे, एक सेठ उधर आ निकले | संस्कृत का विद्यार्थी भांपकर सेठ ने पूछा—“क्या कर रहे हो ?” मनसाराम जी ने अपनी समस्या बता दी | सेठ ने पूछा—“केन्द्रों में भोजन क्यूँ नही करते ? मनसाराम जी ने कहा “वहां तो केवल ब्राह्मणों को भोजन मिलता है, मैं तो जन्म से अग्रवाल हूँ |” सेठ की गैरत जागी, वो स्वयं भी ऐसे कई केन्द्रों को दान देता था, उसने मनसाराम जी से कहा “तुम अमुक केन्द्र में जाकर भोजन किया कारो, वहां कोई तुम्हारी जाति नही पूछेगा |”

भोजन की समस्या से निश्चिन्त होकर मनसाराम जी विद्याध्ययन में जुट गए | विद्या समाप्त करके मनसारामजी काशी के पण्डितों के बीच गए और उनके समक्ष एक प्रश्न रखा कि—‘मैं जन्म से अग्रवाल हूँ, मुझे अब पण्डित कहलाने का अधिकार प्राप्त है या नही ? इसपर बड़ा वाद-विवाद हुआ | मनसाराम जी की विजय हुई | उन्हें पण्डित की पदवी प्रदान की गई|

विद्या प्राप्ति के बाद आप कार्यक्षेत्र में उतरे | आपके गहन अध्ययन, तीव्रबुद्धि, और अकाट्य तर्कों के कारण आपकी कीर्ति-चन्द्रिका छिटकने लगी | आर्यसमाज के क्षितिज पर एक नया नक्षत्र अपनी
प्रभा विकीर्ण करने लगा | पण्डितजी सिरसा में धर्म-प्रचार कर रहे थे, उन्ही दिनों स्वामी स्वतंत्रानन्दजी सिरसा पधारे | पण्डितजी की बहुमुखी प्रतिभा से प्रभावित होकर इन्हें आर्य प्रतिनिधिसभा पंजाब की सेवा में ले गए | पण्डितजी ने सारे पंजाब को वैदिक-नाद से गुंजा दिया| शास्त्रार्थ में उनकी विशेष रूचि थी | शास्त्रार्थ-समर के आप विजयी-योध्या थे|

एक बार भिवानी में शास्त्रार्थ हो रहा था, पौराणिकों ने आपको पूरा समय न दिया | नियमानुसार आपने २५ मिनट मांगे | उत्तर में पण्डितजी पर लाठियों से आक्रमण हुआ | जिसपर पण्डितजी ने
एक ट्रैक लिखा “मेरे पच्चीस मिनट” | इस शास्त्रार्थ का टेकचन्दजी पंसारी पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने प्रतिमाएं फ़ेंक और आस्तिक बन गया | आर्यों से भिन्न लोगों पर पण्डितजी की कैसी धाक थी, इस विषय में निम्न घटना अति महत्वपूर्ण है | एक बार रामामंडी में एक जैन विद्वान आये | उनके प्रवचन होने लगे | एक दिन सभा के
अंत में एक किसान वेशधारी ने जैनियों के अहिंसा सम्बन्धी सिद्धांत पर कुछ प्रश्न कर दिए | प्रश्न सुनते ही जैन विद्वान ने कहा—“आप पं.मनसाराम तो नही हैं? ऐसे प्रश्न वे ही कर सकते हैं, साधारण व्यक्ति इतनी गहराई से विचार ही नही कर सकता| सचमुच वे ग्रामीण पण्डितजी ही थे |

उधर २-३ मई १९३१ को आर्यसमाज जाखल के वार्षिकोत्सव पर शास्त्रार्थ रखा गया | इसके अध्यक्ष थे स्वामी स्वतंत्रतानन्द और शास्त्रार्थकर्ता थे पं.लोकनाथजी ‘तर्कवाचस्पति’ |
पण्डितजी ने ‘शास्त्रार्थ-जाखल’ नाम से उर्दू में एक पुस्तक लिखी | पौराणिक बौखला उठे| भारी धन-व्यय करके उन्होंने ‘सनातन-धर्म विजय’ नामक पुस्तक लिखवाई \ पुस्तक क्या थी गाली-गलौज का पुलिन्दा थी | पण्डितजी ने सभ्य भाषा में युक्ति और प्रमाणों से सुभूषित लगभग पांच गुना बड़ा १२२४ पृष्ठों का ग्रन्थ लिखा, जिसका नाम रखा- “पौराणिक पोप पर वैदिक तोप” | इस ग्रन्थ के प्रकाशन होते ही पण्डितजी के नाम की धूम मच गयी और आपका
नाम ही ‘वैदिक तोप’ पड़ गया |

पण्डितजी के तर्क कितने तीखे होते थे, इसका आभास भटिंडा-शास्त्रार्थ से होता है | पण्डितजी ने चार प्रश्न रखे थे—
१- सनातन धर्म में पशुवध आदिकाल से है या बाद की मिलावट है ?
२- नाविक की पुत्री सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न व्यास जी का वर्ण पौराणिक-मत के अनुसार क्या है?
३- पौराणिक मत के अनुसार सिख, जाट, स्वर्णकार, और कायस्थ किस वर्ण में हैं ?
४- पौराणिक मत के अनुसार दलित भाई ईसाई-मुसलमानों से अच्छे हैं वा नही ? अच्छे हैं तो उनके साथ अच्छा व्यवहार क्यूँ नही किया जाता ?

पण्डितजी के प्रश्न सुनकर पौराणिक अधिकारी ने कहा—मनसाराम को यहाँ से बाहर निकालो |

संगरूर-शास्त्रार्थ में मृतक-श्राद्ध पर बोलते हुए पण्डितजी ने कहा— ‘मैं भी इस जन्म में कहीं से आया हूँ| यदि मृतकों को श्राद्ध का माल पहुँचता है तो मेरा पार्सल कहाँ जाता है ?

पण्डितजी विद्या के सागर थे, आर्य समाज के मंच व्याख्यान देते तो श्रोताओं से कहते कि किस विषय पर बोलूं, आप जिस पर कहें उसी पर बोलता हूँ| उनके व्याख्यान सैद्द्धान्तिक होते थे|
व्याख्यानों में प्रमाणों की बहुलता होती थी | पण्डितजी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी भाग लिया था और कई बार जेल भी गए | १९२२ में
गाँधी द्वारा चलाये गए पहले सत्याग्रह में पण्डितजी जेल गए | उन्हें हिसार जेल में रखा गया | अभियोग के दिनों में आपने एक ऐसी साहसिक बात कही जो किसी भी क्रन्तिकारी की मुख से न निकली होगी | पण्डितजी को मजिस्ट्रेट के आगे पेश किया गया तो आपने पाने मुंह पर कपड़ा डाल लिया | मजिस्ट्रेट ने कारण पूछा तो आपने कहा—“जिस व्यक्ति ने चाँदी के चन्द-ठीकरों के लिए अपने आपको बेच दिया हो, मैं उसकी शक्ल नही देखना चाहता | ये कोर्ट का अपमान था | सत्याग्रह के साथ-साथ एक और अभियोग न्यायालय की मानहानि का भी चलने लगा |

पण्डितजी ने साहित्य भी बहुत लिखा, इनका सारा साहित्य खोजपूर्ण है | पौराणिको के खण्डन में इस साहित्य से उत्तम साहित्य नही लिखा गया | उनके कुछ प्रसिद्ध ग्रन्थ है—
१- पौराणिक पोलप्रकाश
२- पौराणिक पोप पर वैदिक तोप
३- चेतावनी प्रकाश
४- पौराणिक दम्भ पर वैदिक बम्ब

शिवपुराण आलोचना, भविष्यपुराण आलोचना आदि और अनेक ग्रन्थ पण्डितजी ने लिखे थे| दुर्भाग्य से अधिकतर अप्राप्य है | जून ईसवी १९४१ में पण्डितजी परलोक सिधार गए | पण्डितजी का पार्थिव शरीर नही रहा, परन्तु उनका यशरूपी शरीर अजर और अमर है |

सुजीत मिश्र

शैतान रात में मोमिनों के नाक में ठहरता है!

इस्लाम में वैज्ञानिकी तथ्यों की कोई कमी नहीं। इसके एक नहीं सहस्त्रों प्रमाण हैं। एक उदाहरण–

सही बुखारी, जिल्द ४, किताब ५४, हदीस ५१६-

अबु हुरैरा से रिवायत है कि मोहम्मद साहब आप फरमाते हैं, “यदि तुम में से कोई नींद से उठता है और मुँह(चेहरा) धोता है, तो उसे अपनी नाक को पानी में डालकर धोना चाहिए और तीन बार छिड़कना चाहिए क्योंकि शैतान पूरा रात नाक के उपरी हिस्से में ठहरता है।”

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यही बातें सही मुस्लिम, किताब २, जिल्द ४६२ में भी है।

वाह जी वाह! क्या बात है? चलो कुछ प्रश्नों का उत्तर दे दो जी।

१. ये शैतान रात में नाक में क्यों आ जाता है? क्या उसे रात में डर लगता है?
२. शैतान दिन में कहाँ चला जाता है? क्या खाता-पीता है?
३. और ये शैतान नाक में घुस कैसे जाता है? घुस कर करता क्या है?
४. शैतानों की संख्या कितनी है? यदि उसकी संख्या बढ़ती-घटती है तो कैसे?
५. इतने सारे शैतानों को पैदा करता कौन है और क्यों?
६. शैतान इतना छोटा है या अपने हाइट को घटा-बढ़ा सकता है?
७. शैतान यदि नाक में घुस जाता है तो वो उस मोमिन को बहका नहीं देता होगा? जो बहक गया वो काफिर हुआ न! अर्थात् रात में सभी सोये हुए मोमिन काफिर हुए? तो जो मोमिन जगे होते होंगे रात में उन्हें इन सोये हुओं का जिहाद कर देना चाहिए?

मुफ्त का सुझाव : यदि शैतान नाक में घुस आता है तो काबे के पत्थर पर क्यों मारते हो? अपने नाक पर ही पत्थर मारो। इससे शैतान मर जाएगा।

इस्लाम समीक्षा : जहाँ शैतान करता है कानों में पेशाब

सूर्योदय के बाद उठने का कारण संभवतः रात्रि में देर से सोना या अधिक थकान हो सकता है। अपितु इस्लाम का विज्ञान तो कुछ और ही कहता है। आइये देखते हैं।

सही बुखारी, जिल्द२, किताब २१, हदीस २४५–

अब्दुल्लाह से रिवायत है कि एक बार मुहम्मद साहब को बताया गया कि एक व्यक्ति सुबह तक अर्थात् सूर्योदय के बाद तक सोया रहा और नमाज के लिए नहीं उठा। मुहम्मद साहब ने कहा कि शैतान ने उसके कानों में पेशाब कर दिया था

वाह जी वाह! क्या विज्ञान है अल्लाह तआला का?
वर्तमान युग में अनेकों व्यक्ति चाहे वो मुस्लिम हैं या मुशरिक हैं, सूर्योदय के पश्चात् निद्रा त्यागने के अभ्यस्त हैं। लेकिन आज तक किसी ने ऐसी शिकायत नहीं की और न ही किसी की शैतान के मूत्र त्यागने के कारण निद्रा ही टूटी है।

इसपर कुछ प्रश्नों को उत्तर भी दे दीजिए-

१. ये शैतान कानों में पेशाब क्यों करता है?

२. क्या ये वही शैतान है जो रात भर नाक में रहता है(पिछले पोस्ट को देखिए)?

३. शैतान पेशाब कब करता है? ठीक सूर्योदय होने के बाद क्या? उसे ऐसे ऐक्युरेट टाइमिंग का पता कैसे चलता है?

४. यदि शैतान कानों में पेशाब करता है तो वो बदबू नहीं देता होगा?

५. कानों में प्रायः पेशाब होने के कारण कान खराब नहीं होते होंगे?

६. कानों के eustechean tube का लिंक सीधे pharynx से होता है। अर्थात् शैतान का पेशाब मुँह में भी चला जाता होगा जो पेट में ही अंततः जाता होगा न? तब भी शैतान का पेशाब हलाल हुआ या हराम?

७. सूर्योदय के बाद उठने पर मोमिनों के बिस्तर या तकया भीगता नहीं है?

मूत्र विसर्जन करते समय यदि मोमिन करवट बदल लेवे तो पेशाब कहाँ जाता होगा?

एक मुफ्त का सुझाव : कानों के लिए डायपर्स, पैंपर्स आदि का उपयोग करें और वैज्ञानिक इसके उपयोग को सरल करें।

यदि किसी भी व्यक्ति से, जिसने सूर्योंदय के बाद निद्रा त्याग किया है, से कहा जाये कि शैतान ने आपके कान में मूत्र त्याग किया है तो वह कहने वाले को मानसिक रोगी ही समझेगा। ऐसे में यह मौलानाओं का दायित्व्य बनता है कि वो इस हदीस की वैज्ञानिकता को सिद्ध करें जिससे सभी को इस हदीस की सत्यता का ज्ञान हो सके।