बाबासाहब के निर्माण में आर्यसमाज की त्रिमूत का अविस्मरणीय सहयोग:डॉ कुशलदेव शाश्त्री

लन्दन से वापस लौटने पर बैरिस्टर अम्बेडकर ने जून 1923 में अपना वकालत का व्यवसाय प्रारम्भ किया। 5 जुलाई 1923 को वे हाईकोर्ट के वकील भी बने, पर दलितों के प्रति समाज में उपेक्षा भाव होने के कारण उनकी आय इतनी नहीं थी कि वे अनुबन्ध के अनुसार बड़ोदरा प्रशासन के ऋण से उऋण हो चुकी थी। बड़ोदरा रियासत की ओर से पैसे वापस करने के लिए तकाजा लगा हुआ था। ऐसी स्थिति में उन्होंने 9 दिसम्बर 1924 को आर्यसमाजी विद्वान् पं0 आत्मारामजी अमृतसरी को याद किया और पत्र लिखकर उन्हें यह स्पष्ट किया कि ’हमारी आर्थिक परिस्थिति अभी ऐसी नहीं हो पाई है कि हम किसी निश्चित कालावधि तक हफ्ते-हफ्ते से अपना कर्ज वापस कर सकें। तत्काल पं0 आत्मारामजी ने बड़ोदरा प्रशासन को डॉ0 अम्बेडकरजी की व्यथा से सुपरिचित कराया और उन्हें इस विषय में सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का अनुरोध किया। फलस्वरूप बड़ोदरा नरेश श्री सयाजीराव गायकवाड़ ने इस कर्ज प्रकरण को ही सदा-सदा के लिए रद्द कर दिया।

बड़ोदरा और कोल्हापुर नरेश ने बाबासाहब अम्बेडकरजी को स्वदेश और विदेश में शिक्षा प्राप्त करने के लिए काफी आर्थिक सहायता प्रदान की थी। श्री अम्बेडकर जब बी0 ए0 में पढ़ रहे थे, तभी से बड़ोदरा नरेशजी ने उन्हें प्रतिमास पन्द्रह रुपये की छात्रवृत्ति देनी प्रारम्भ की थी। इन दोनों प्रगतिशील आर्यनरेशों के निमन्त्रण पर ही आर्यविद्वान् पं0 आत्मारामजी अमृतसरी ने पददलित और उपेक्षित समाज के लिए अपने जीवन के लगभग मूल्यवान् तीन दशक समर्पित किये थे। श्री सयाजीराव गायकवाड़, राजर्षि शाहू महाराज तथा पं0 आत्मारामजी अमृतसरी से श्री अम्बेडकरजी को क्रमशः सहृदयतापूर्वक आत्मीयता और अविस्मरणीय आर्थिक सहायता प्राप्त हुई थी। ये तीनों भी महापुरुष तहेदिल से आर्यसमाजी थे। महर्षि दयानन्द और उनके द्वारा लिखित सत्यार्थप्रकाश पर इस त्रिमूर्ति की गहरी आस्था थी। मराठी ’सत्यार्थप्रकाश‘ प्रकाशित करने में बड़ोदरा और कोल्हापुर नरेश ने समय-समय पर उल्लेखनीय आर्थिक सहायता प्रदान की थी। पं0 आत्मारामजी ने तो उर्दू के साथ पंजाबी में भी सत्यार्थप्रकाश का अनुवाद किया था।

श्री अम्बेडकरजी से पं0 आत्मारामजी आयु में तीस वर्ष बड़े थे। उन्होंने श्री अम्बेडकर को उस समय अपना पितृतुल्य वात्सल्य प्रदान किया, जब रूढ़िवादी संकीर्ण समाज बड़ोदरा में उनके निवास भोजनादि की भी व्यवस्था करने के लिए तैयार नहीं था। उच्च अधिकारी होने के बावजूद भी उन्हें कार्यालय में रखा पानी तक पीने की अनुमति नहीं थी और उनके मातहत कर्मचारी भी फाइल आदि फेंक-फेंककर दे रहे थे। पं0 नरदेवरावजी वेदतीर्थ ने अपनी आत्मकथा में पं0 आत्मारामजी के विषय में लिखा है, ’अद्भुत वक्तृत्व, अनुपम कार्य कर्तृत्व? अनथक लेखक, अद्वितीय प्रबन्धक आदि गुणों के कारण मास्टर आत्मारामजी का नाम आर्यसमाज के सर्वोच्च नेताओं की पंक्तियों में दर्शनीय था। मास्टरजी बड़े मिलनसार, विनोदी और निरभिमानी पुरुष थे और उनकी दिनचर्या ऐसी थी, जैसे-घड़ी का काँटा। समय को कभी भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे। कट्टर, किन्तु विचारशील सामाजिक थे। आपका विद्याविलास और स्वाध्याय प्रबल था। बड़ोदरा में जितनी भी सामाजिक जागृति दिखलाई पड़ती है और जितनी भी संस्थाएँ हैं, उन सबका श्रेय मास्टरजी को है। बड़ोदरा के महाराज आपसे अत्यन्त प्रसन्न थे और आपको उन्होंने राज्यरत्न, राज्यमित्र, रावबहादुर आदि उपाधियों से विभूषित किया था।‘ (आप बीती और जग बीती: प्रकाशक-गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर, हरिद्वार, संस्करण-1957: पृष्ठ 318-19)

 

डॉ0 अम्बेडकरजी ने भी अपने एक सुपुत्र का नाम ’राजरत्न‘ ही रखा था। सम्भव है राजरत्न पं0 आत्मारामजी के उदात्त गुणों की स्मृति में ही श्री अम्बेडकरजी ने उक्त नाम रखा हो। यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि बड़ोदरा नरेश सयाजीराव गायकवाड़, कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज तथा आर्य विद्वान् पं0 आत्मारामजी अमृतसरी की त्रिमूर्ति के आर्योचित उदार आचरण को ध्यान में रखकर ही पं0 गंगाप्रसादजी उपाध्याय ने सन् 1954 में प्रकाशित ’जीवन-चक्र‘ नामक आत्मकथा में लिखा था कि ’श्री अम्बेडकरजी को प्रथम शरण तो आर्यसमाज में ही मिली थी।‘

2 thoughts on “बाबासाहब के निर्माण में आर्यसमाज की त्रिमूत का अविस्मरणीय सहयोग:डॉ कुशलदेव शाश्त्री”

  1. यह क्या बात हुई की अपने आपको ‘आर्य’ शब्द का प्रयोग करने वाले आर्य समाजिष्ट ‘हिन्दू’ शब्द पर हठ धर्मी बन गए और१९३६ लाहौर् में आयोजित ‘ज़ात पात तोड़क मण्डल’ सम्मेलन ही रद्द कर दिया गया .

    1. जनाब अपने मन से कुछ बोल दो | वाह क्या बात है | आर्य कभी जात पात को नहीं मानता | आर्य कर्म के आधार पर वर्ण को मानता है | मगर आप तो सुनी हुयी बात को ही सही समझोगे और बिना प्रमाण के चर्चा करोगे | आपके इल्जाम लगा देने से सत्य झूठ नहीं हो जाता | सत्य की मार्ग पर आये | मगर आप सत्य की मार्ग पर नहीं आओगे |

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