दिपावलीको वैदिक महत्व

ओ३म्..

दिपावलीको वैदिक महत्व:

dipavali

दीपावलीलाई आदि सृष्टि (१,९६,०८,५३,११८ वर्ष) देखि चली आएको वैदिक धर्ममा “शारदीय नवसस्येष्टि पर्व” भनिन्छ।
अर्थात्, नव= नयाँ, सस्य= फसल या अन्न, ईष्ट= कामनाहरु पूर्ण गर्नको लागि यज्ञ [हवन], शारदीय= शरद ऋतुमा। वैदिक संस्कृतिका जनक सृष्टिनियन्ता सर्वव्यापक एवं निराकार परमात्माले मानव मात्र लाई धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष प्राप्ति एवं प्रकृतिलाई पवित्र राख्नको लागि ऋतुहरु र पर्वहरुले बाँधेर राखेको छ। जसले यी नियमहरुको पालन गर्दछ उसलाई सुख, शांति तथा आनन्द तीनै प्राप्त हुन्छन्।

यो शरद ऋतु हो। समस्त मानवको लागि धान मुख्य फसल हो। यो फसल काट्ने  तथा रबी फसल रोप्ने (छर्ने) काम यहि समयमा नै हुन्छ तथा शरद् र हेमन्त ऋतुको सन्धिकाल  कार्तिक अमावस्यामा नयाँ फसलको अन्न द्वारा गरिने विशाल यज्ञ प्राचीन कालदेखि नै शारदीय नवसस्येष्टि नामले परिचित छ। यज्ञोपरान्त नवान्न ग्रहण गर्ने प्राचीन वैदिक परम्परा रहेको छ। अघि व्यापारी समुदायहरुको आफ्नो पुरानो हिसाब-किताब बन्द गर्ने र नयाँ वहि-खाता सुरु गर्ने प्रचलन पनि यहि समयमा हुने गर्दथ्यो, त्यसैले यस पर्वलाई वैश्य-पर्व पनि भनिन्छ।

कालान्तरमा यस दिन दीपमाला सजाउने परम्परा प्रचलित भयो। ऋतुहरुको सन्धिकालमा गरिने विशाल यज्ञ रोगनिवारणमा सहयोगी हुन्छ। कुनै अन्ध परम्परानुसार यस दिनलाई मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम लंका विजय पश्चात् अयोध्या फर्केको प्रसंग संग पनि जोड्ने गरिन्छ, यो नितान्त भ्रामक छ। वाल्मीकि रामायण अनुसार श्रीरामको अयोध्या आगमन चैत्र शुक्ल पंचमीमा भएको थियो। यस पर्वको श्रीरामको इतिहास संग कुनै सम्बन्ध छैन। यो पर्वका साथ विस्तारै अनेकौं दुरितिहरु पनि जोडियो। जुवा खेल्नु, पटाका आदि द्वारा पर्यावरण नष्ट गर्नु र समाजको शान्ति भंग गर्नु भयङ्कर पाप हो, जुन हिन्दू समाज मिथ्या गौरवको गरुङ्गो भारि बोकेर थाकिसकेको छ। पर्यावरण शोधक यज्ञ गर्ने परम्पराको  स्थानमा पर्यावरण नाश गर्ने अभियान प्रचण्ड वेग संग चल्दैछ। ईश्वर संग प्रार्थना छ कि हिन्दुहरुको विवेक यसरि जागृत होस् कि ऊ आफ्नो हानिकारक अन्ध परम्पराहरुलाई त्यागेर समस्त जगतको लागि लाभदायक वैदिक परम्परालाई अपनाएर यस्ता खालका पर्वहरुको परिष्कार गरोस्। हाम्रो हृदयमा ज्ञान, सत्य, प्रेम, करुणा, देशभक्तिको प्रकाश भरियोस, यही ईश्वर संग प्रार्थना छ।

अत: प्रत्येक घरमा आँपको समिधा (दाउरा) तथा हवन सामग्रीहरुमा धानको भुजा, धानको च्युरा, गुड, गुग्गल, बेसार आदि मिलाएर हवन गर्नु पर्दछ जसबाट शरद ऋतुमा हुन सक्ने रोग-व्याधिहरु बाट व्यक्ति, परिवार, समाज एवं समस्त प्राणि जगतलाई बचाउन सकियोस्। तर हाम्रो अज्ञानता भनौं या दुर्भाग्य परमात्माको आदेश र ज्ञानको उपेक्षा गरेर पटाका जलाएर, मोमबत्ती तथा बिजुलीको दुरुपयोग गरेर आफ्नो तन, मन, धन नाश गर्दैछौं।
हामि संकल्प गरौँ कि बिदेशी पटाका, मोमबत्ती, बिजुलीको माला, र वर्क लगाएको मिठाई प्रयोग नगरौं। हवन गरेर घीउ, तिल, तोरीको तेल र माटाको पालाको दीपक जलाएर खीर, पूरी, हलुवाई खाएर आफ्नो देशलाई विश्वगुरु बनाउँ।

परदेशवासी तथा देशवासी समस्त बन्धु बान्धव तथा आफन्तजनलाई दीपावलीको हार्दिक शुभकामना।

नमस्ते..!

(तिहारमा दाजु-भाइ तथा दिदी-बहिनीहरुको टिका (भाइ टिका) को प्रसंग वैदिक हैन, यो नेपालि समाजमा पछी प्रचलित भएको हो। सायद मेरो अनुमान मा यो भाइ टिका लगाउने र दिदी बहिनीहरुको रक्षाको लागि अठोट गर्ने प्रचलन भारतमा मुस्लिम आक्रामण पछी प्रचलित भएको हो। किनकि मुस्लिमहरुले गैरमुस्लिमका चेली-बेटीहरुलाई अपहरण गरेर लग्थे, अस्मिता लुट्थे र दासी बनाउँथे, जबर्जस्ति धर्मान्तरण हुने गर्दथ्यो। त्यसैले उनको रक्षार्थ दाजु-भाइहरुले कसम खान्थे, प्रण गर्दथे र त्यहि सम्झना स्वरूप भारतमा राखी र नेपालमा भाइ-टिका प्रचलित भएको हुन सक्छ।)

-प्रेम आर्य

दोहा, कतार बाट

आत्मनिवेदन: दिनेश

आचार्य धर्मवीर जी नहीं रहे। यह सुनना और देखना अत्यंत हृदय विदारक रहा है। आचार्य धर्मवीर जी देशकाल के विराट मंच पर महर्षि दयानन्द के विचारों के अद्वितीय कर्मवीर थे। महर्षि दयानन्द के विचारों के विरुद्ध प्रतिरोध की उनकी क्षमता जबर्दस्त थी। वैचारिक दृष्टि से तात्विक चिन्तन का सम्प्रेषण सहज और सरल था, यही उनका वैशिष्ट्य था, जो उन्हें अन्य विद्वानों से अलग खड़ा कर देता है। वे जीवनपर्यन्त संघर्ष-धर्मिता के प्रतीक रहे। ‘परोपकारी’ के यशस्वी सम्पादक के रूप में उन्होंने वैदिक सिद्धान्त ही नहीं, अपितु समसामयिक विषयों पर अपने विचारों को खुले मन से प्रकट किया। वे सत्य के ऐसे योद्धा थे जो महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित पथ के सशक्त प्रहरी रहे और ऐसा मानदण्ड स्थापित कर गये, जो अन्यों के लिये आधारपथ सिद्ध होगा। मानवीय व्यवहारों के प्रति वे सिद्धहस्त थे। भले ही अपने परिवार पर केन्द्रीभूत न हुये हों, परन्तु समस्त आर्यजगत् की आदर्श परोपकारिणी सभा के विभिन्न प्रकल्पों के प्रति वे सर्वात्मना समर्पित रहे।

उन्होंने ‘परोपकारी’ का सम्पादन करते हुए जिन मूल्यों, सिद्धान्तों का निर्भय होकर पालन किया, जिस शैली और भाषा का प्रयोग किया, जिन तथ्यों के साथ सिद्धान्तों को पुष्ट किया, वे प्रभु की कृपा से ही संभव होते हैं। मैं विश्वास दिलाता हँू कि कीर्तिशेष आचार्य धर्मवीर जी ने सम्पादन का जो शिखर निर्धारित किया है वहाँ तक पहुँचना यद्यपि असंभव है तथापि केवल भक्ति-भावना से मैं चलने का प्रयास भी कर लूँ तो भी मेरे लिए परमशुभ हो सकेगा। प्रभु मुझे इसकी शक्ति दे।

‘परोपकारी’ के पाठक विगत लगभग ३३ वर्षों से अमूल्य विरासत से परिपूर्ण तार्किक विश्लेषण से सम्प्रक्त सम्पादकीय पढऩे के आदी हुए हैं, उस स्तर को बनाये रखना यद्यपि मेरे लिये दुष्कर है, लेकिन पाठक हमारे मार्गदर्शक हैं, मैं आचार्य धर्मवीर जी के द्वारा निर्धारित पथ का पथिक मात्र हो सकूं, यही मेरे लिये परम सौभाग्य की बात होगी।

आज चुनौतियाँ हैं, दबाव हैं, सिद्धान्तों के प्रति मतवाद है, फिर भी हमें इन सभी से सामना करना है।

आचार्य धर्मवीर जी ने महर्षि दयानन्द के चिन्तन को सम्पूर्ण रूप में स्वीकार कर उनकी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा की जीवन्तता में अद्वितीय साहस का परिचय दिया। राष्ट्र की आकंाक्षा को दृष्टिगोचर रखते हुए वे अघोषित आर्यनेता के रूप में आर्यजगत् के सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता बने। वैदिक संस्कृति और सभ्यता के माध्यम से उन्होंने सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक मूल्यों को समृद्ध ही नहीं किया अपितु अपने व्यक्तित्व से, लेखनी से, वक्तृत्वकला से राष्ट्रीय तत्वों की अग्रि को उद्बुध किया।

आचार्य डॉ. धर्मवीर कुशल संगठनकत्र्ता थे, उन्होंने दृढ़ इच्छाशक्ति और समर्पण से जहाँ परोपकारिणी सभा को आर्थिक स्वावलंबन दिया, वहीं सृजनात्मक अभिव्यक्ति से वैदिक सिद्धान्तों के विरोधियों को भी वैदिक-दर्शन से आप्लावित किया। आचार्य धर्मवीर ने जीवनपर्यंत उत्सर्ग करने का ही कार्य किया, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने स्वयं को परिपूर्ण किया है। वैदिक पुस्तकालय में नित्य नूतन ग्रन्थों का प्रकाशन, वितरण, नवलेखन को प्रोत्साहन, वैदिक साहित्य के अध्येताओं को वैदिक साहित्य पहुँचाना जैसे पुनीत कार्य उनके कत्र्तृत्व के साक्ष्य परिणाम हैं। उन्होंने सारस्वत साधना से विभिन्न विद्वानों, संन्यासियों के व्यक्तिगत पुस्तकालयों को मँगवाकर वैदिक पुस्तकालय को समृद्ध किया है।

आचार्य डॉ. धर्मवीर ने महर्षि दयानन्द के हस्तलेखों, उनके द्वारा अवलोकित ग्रन्थों एवं उनके पत्रों इत्यादि का डिजिटलाईजेशन करने का अभूतपूर्व कार्य किया ताकि आगामी पीढ़ी को उस अमूल्य धरोहर को संरक्षित कर सौंपा जा सके। आर्यसमाज के प्रसिद्ध चिन्तकों को निरन्तर प्रोत्साहन कर लेखन के लिए सहयोग प्रदान करने का उन्होंने जो महनीय कार्य किया है, वह स्तुत्य है।

वैदिक चिन्तन के अध्येता आचार्य धर्मवीर जी ने परोपकारी पत्रिका को पाक्षिक बनाकर उसकी संख्या को १५ हजार तक प्रकाशित कर, देश-विदेश में पहुँचाकर एक अभिनव कार्य संपादित किया। उनकी भाषा में सहज प्रवाह और ओज था। वैदिक विचारों के प्रति वे निर्भीक और ओजस्वी वक्ता के रूप में हमेशा याद किये जाएंगे। उनकी मान्याता थी कि असत्य के प्रतिकार में निर्भय होकर अपने विचारों को व्यक्त करने का अधिकार जन्मजात है। लेकिन संवादहीनता उन्हें स्वीकार्य नहीं थी। यही कारण था कि वे अजातशत्रु कहलाते थे। परोपकारी के लेखों और संपादकीय के द्वारा आर्यजगत् में उनकी प्रासंगिकता निरन्तर प्रेरणादायी बनी रही। सहज और सरल शब्दों में वैदिक सिद्धान्तों के प्रति कितने ही बड़े व्यक्ति की आलोचना करने में वे कभी भयभीत नहीं हुए। उन्होंने भारत के समस्त विश्वविद्यालयों के कुलपतियों व कुलसचिवों को परोपकारी पत्रिका नि:शुल्क पहुँचाने का अभिनव कार्य किया।

उन्होंने देवभाषा संस्कृत को जिया और अपने परिवार से लेकर समस्त आर्यजनों को भी आप्लावित किया। यह कहना और अधिक प्रासंगिक होगा कि अष्टाध्यायी-पद्धति के अध्ययन और अध्यापन को महाविद्यालय में ही नहीं अपितु ऋषिउद्यान में संचालित गुरुकुल में पाणिनी-परम्परा का निर्वहन करने का उन्होंने अप्रतिम कार्य किया।

आचार्य धर्मवीर जी ऋषिउद्यान मेें विभिन्न भवनों के नवनिर्माण के प्रखर निर्माता थे, जिन्होंने देश में निरन्तर भ्रमण करते हुए धन का संग्रह कर विद्यार्थियों, साधकों, वानप्रस्थियों और संन्यासियों के लिए श्रेष्ठ  आवास की सुविधा प्रदान की, ताकि ऋषिउद्यान में निरन्तर आध्यात्मिक जीवन का संचार होता रहे एवं चर्चा का कार्य संपादित होता रहे। वे स्पष्ट वक्ता थे। उन्हें कितनी ही बार विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य का पद, चुनाव लडऩे, पुरस्कार प्राप्त करने हेतु आग्रह किया गया, लेकिन उनके लिए ये पद ग्राह्य नहीं थे। उनके लिए महर्षि दयानन्द का अनुयायी होना ही सबसे बड़ा पद था।

आचार्य डॉ. धर्मवीर जी, आचार्य की प्रशस्त परम्परा की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। वे अकेले ही अन्याय का प्रतिकार करने में समर्थ थे। वे उन मतवादियों के लिए कर्मठ योद्धा थे, जो भारत विरोधी मत रखते थे। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि लोग क्या कहेंगे अपितु उन्हें यह स्वीकार्य था कि आर्ष परम्परा क्या है। समकालीन प्रख्यात विचारकों, राजनीतिक व्यक्तियों, विद्वानों का वे व्यक्तिश: आदर करते थे, परन्तु वैदिक विचारधारा के विरुद्ध लोगों का खण्डन करने में वे कोताही नहीं बरतते थे। उन्होंने परोपकारिणी सभा के विकल्पों का संवर्धन किया और परोपकारिणी सभा की यशकीर्ति को फैलाने में विशेष योगदान किया। आलोचना और विरोधों का धैर्यपूर्वक सामना करना उनकी विशेषता थी।

वे दिखने में कठोर थे, लेकिन हृदय से अत्यन्त सरल थे। चाहे आचार्य वेदपाल सुनीथ हों या श्री नरसिंह पारीक या डॉ. देवशर्मा या सहायक कर्मचारी सुरेश शेखावत, मैंने ऐसे दृढ़निश्चयी स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की आँखों में उन सबके लिए अश्रुकणों को बहते देखा है। आर्थिक सहयोग करना, बिना किसी को बताये, यह उनकी मानवीय श्रेष्ठता का अद्वितीय उदाहरण है।

ऐसे चिन्तक, विशेषताओं के आगार, वैदिक चिन्तन के सजग प्रहरी तथा विचारों के विरल विश्लेषक आचार्य डॉ. धर्मवीर जी की संपादकीय परम्परा के कार्य का प्रारम्भ करते हुए मैं उन्हें जिन्होंने अनादि ब्रह्म की उपासना के साथ राष्ट्रचेता महर्षि दयानन्द के विचार और आचार से कभी विमुख नहीं हुए, को शत्-शत् नमन करता हुआ उस पथ का अनुयायी बनने का प्रयास करूं, ऐसा विश्वास दिलाता हँू।

आपका

– दिनेश

वैदिक प्रणालीको ईसाई निन्दा

ओ३म्..

वैदिक प्रणालीको ईसाई निन्दा:

-प्रेम आर्य

दोहा, कतार बाट

यूरोपमा ईसाई पन्थ जसरि दिन-प्रतिदिन बढ्दै गयो, त्यसरी नै उसले वैदिक-धर्मका चिह्नहरु र साहित्यहरु मेटाउँदै गयो। पहिले यी सब वैदिक-धर्मी नै थिए। किनभने स्वयंलाई वैदिक-धर्मिहरु बाट अलग देखाउनु थियो, त्यसैले उनीहरु एकदम अलग हुन थाले । क्यूमोन्टले लेखेको छ कि “सबथोक लुप्त भयो” । दोस्रो शताब्दीमा Eusebius र Pallas जस्ता लेखकहरुले “The Mysteries of Mithra” जस्ता प्राचीन दन्तेकथाहरुको जुन विशाल ग्रन्थ प्रकाशित गरे, ति सबैलाई निर्दयता पूर्वक नष्ट गरियो। यी ग्रन्थहरुमा वैदिक संस्कृति झल्काउने खालका कथाहरुको संग्रह गरिएको थियो।
ति ईसाईहरुले घाउमा नुन-चुक लगाए झैं अनेक तरिकाले वैदिक प्रथा, कर्मकाण्ड, संस्कार आदिको निन्दा गर्न थाले। अरब प्रदेशमा र यूरोपका कैयौं नगरहरुमा असंख्य वैदिक उपासना स्थल र कृष्ण मन्दिरहरु थिए । अरबिहरुले ति सबलाई मस्जिदमा बदले । तर पनि तिनले केहि अंस भने पूर्ण रुपमा मेटाउन सकेनन्। वैदिक-धर्म एवं संस्कृतको अवशेषको रुपमा केहि शब्द र केहि प्रथाहरुको उनीहरुकहाँ रहन गए जो अध्यावधि देख्न सकिन्छ जस्तै-

• ईश्वर वाहेक अर्को कुनै ईश्वर छैन (ला इलाहा इल्लल्लाह) यो एकेश्वरवादको        सिधान्त वेद बाट लिइएको हो।
• मक्का-मदिना संस्कृत कै मख-मेदिनी शब्दको अपभ्रंस हो।
• हज गर्दा लगाउने वस्त्र –इहराम यज्ञ गर्दा लगाउने वैदिक ब्राह्मण कै वस्त्र हो।
• काबामा ७ पटक परिक्रमा गर्ने प्रचलन वैदिक नै हो (तर यिनले उल्टो गर्दछन) ।
• जमजमको पानी हिन्दुहरुकै गंगाजल बाट अपभ्रंस भएर गंगगंग हुँदै जमजम भएको हो।
• हरम शब्द हिन्दुहरुकै हरि शब्द बाट बनेको हो, जसले हरिओम् लाइ दर्शाउँछ।
• नमाज पनि नमःशब्द बाट नै लिइएको हो।
• अरब देशहरुमा निक्कै स्थानको नामको अगाडी ‘उम्’ जोडिएको छ, त्यो ‘ओ३म्’ को अपभ्रंस नै हो।
खोज्दै जानेहो भने यस्ता अनेकौं अवशेषको प्रमाणहरु भेटाउन सकिन्छ.. ।
• यूरोपमा हरि-कुल-ईश बाट Hercules, हनुमान बाट Hanniman, राम बाट Rome, वाटिका नगर बाट Vatican city, ईसाई र इस्लाममा पनि ईश नै छ, वैदिक प्रणालीमा ईश परमात्मालाई भनिन्छ।
• बेथलेहम शब्द वत्सल-धाम बाट अपभ्रंस भएको हो।
• Christianity पनि कृष्ण-नीति नै हो। त्यति मात्र हैन, जति पनि शब्दको पछी niti झुन्डिएको छ ति सब संस्कृतका नीति नै हुन्।
• Trinity पनि हिन्दुको ब्रह्मा-विष्णु-महेश अथवा वैदिक त्रिनिती-ईश्वर-जीव र प्रकृति को नीति नै हो।

यहुदीहरु सब यदुवंशी नै हुन्, उनीहरुले मान्ने सम्बत् पनि महाभारत काल संग ठ्याक्कै मिल्न जान्छ तर उनीहरुलाई यसको अवगत छैन। किनकि महाभारतमा जुन मुसल-पर्वको वर्णन छ, त्यो वास्तवमा एक भयङ्कर त्रासदी पूर्ण घटना थियो। त्यहाँ आणविक दुर्घटना भएको थियो। किनकि श्रीकृष्ण संग आणविक शक्ति सम्पन्न मुसल-अस्त्र (मिसाइल) थियो, कृष्ण त्यहाँ नभएको समयमा उनका छोरा प्रध्युम्नको नेतृत्वमा केहि उद्दण्ड युवाहरु मदिरा सेवन गरेर आणविक अश्त्रागारमा पसी केहि खेलवाड गरेको हुनाले त्यहाँ विशाल विस्फोट भयो र हजारौं संख्यामा मरे र जो बाँचे, तिनीहरु आणविक विकिरण को प्रभाव बाट हुन सक्ने खतरा बाट बच्न त्यहाँ बाट भागेर अरब देश र त्यसको आसपास तिर लागे। त्यहि घटनाको स्मरण स्वरूप यहुदीहरुले आफ्नो काल गणना सुरु गरे र मुसलमानहरुले पनि त्यहि मुसल पर्वको स्मरण स्वरूप आंफूलाई मुसलमानको संज्ञा दिए । यो कुरो स्वयं मुसलमानलाइ पनि थाह छैन कि उनीहरु कसरि मुसलमान भए। किनकि उनीहरुले १४०० वर्ष भन्दा अघिको सम्पूर्ण इतिहास र साहित्य नष्ट गरे, जसरि ईसाईहरुले २००० वर्ष भन्दा अघिको वैदिक दस्तावेजहरु नष्ट गरेका थिए ।

प्रारम्भमा ईसाई पन्थ निक्कै सानो थियो। लगभग २५-५० जनाको समुह थियो। तिनीहरुले वैदिक संस्कृति बाट स्वयंलाई अलग देखाउनको लागि अनेक प्रयत्न र वितण्डा गर्ने गर्दथे। उनीहरु के गरेर कुन प्रकारले कसरि स्वयंलाई अलग गर्ने प्रयत्न गर्दथे भन्ने कुराको वर्णन क्यूमोन्ट (Franz Cumont) नामक ब्रिटिश लेखकले आफ्नो पुस्तक “Textas Monuments Figure’s relatifs aux mysteres de Mithra” मा लेखेका छन्। छोट्करीमा यहाँ- “२५ देखि ५० जनाको समुहले स्वयंलाई वैदिक धर्मीहरु देखि अलग देखाउने गर्दथे। सबै वैदिक धर्मको चिह्नहरुको निन्दा गर्ने गर्दथे। पूजा-पाठ र ईश्वरोपासना छोडिसकेका थिए। हवन क्रियालाई घृणित कर्म मान्न थालेका थिए। तिनीहरुले आस्तिकहरुलाई घृणा गर्दथे। ति स्वयंलाई नास्तिक मान्दथे।यिनको संख्या शुरुमा निक्कै कम थीयो तर सशक्त थिए।
अर्को अम्रिकन लेखक (Grant Showerman) ले आफ्नो पुस्तक “Oriental Religions’ को भूमिकामा लेखेका छन् कि “रोममा ईसापूर्व जति पनि वैदिक धर्मी थिए, उनका सिद्धान्तहरु ईसाई पन्थको सिद्धान्तहरु भन्दा कहीं अधिक शरीर, मन, बुद्धि, चेतना आदि सबैको समाधान गर्न सक्षम थिए। उनका परम्परा निक्कै सालिन र प्राचीन थिए । विज्ञान र सभ्यतामा आधारित थिए। उनका विविध उत्सवहरु हुने गर्दथे। तिनीहरु ईश्वरको अनुभूतिमा मग्न हुने गर्दथे। उनका देवता निक्कै दयालु द। उनका धार्मिक समारोहहरुमा सामाजिक समागम निक्कै उत्तम प्रकारको हुन्थ्यो। उनको धार्मिक प्रणाली तर्कमा आधारित हुने गर्दथ्यो। तिनीहरु पुनर्जन्मको सिद्धान्त मान्दथे, अतः अर्को जन्म अधिक शुद्ध, पवित्र र पुण्य प्रदायी होस् भनेर वैदिक धर्मीहरु सदैव प्रयत्न गर्ने गर्दथे। ईसाइहरुले यी सबको विरोध गर्न शुरु गरे। ईसाईहरुले यिनलाई पोगा-पन्थी भन्दथे। जबकि यथार्थता यहि थियो कि ईसाई नै ठूला पोगा-पन्थी थिए। ईसाईहरुले वैदिकहरुको खण्डन गर्न कुनै पनि अवसर चुकाउँदैनथे।” । अस्तु..
नमस्ते..

  • (हार्दिक आभार: शिशु संस्कृतम)

अब स्मृतियाँ ही शेष: -साहब सिंह ‘साहिब’

पक्षी पिंजड़ा छोडक़र चला गया कोई देश,

डॉ. धर्मवीर की अब स्मृतियाँ ही शेष।

स्मृतियाँ ही शेष नाम इतिहास बन गया,

लेकिन हम लोगों में यह दुख खास बन गया।

लेकिन हमको याद रहे हम जिस पथ के हैं अनुगामी,

देह स्वरूप मरण धर्मा है आत्मा तत्व अपरिणामी।

मन में उनकी ले स्मृतियां याद करें अवदान को,

आर्य समाजी इस योद्धा के ना भूलें बलिदान को।

और सब मिलकर यही प्रार्थना सदा करें भगवान् से,

जो अनवरत् चला करता है चलता जाये शान से।

उनके लक्ष्यों को धारण कर ऐसा इक परिवेश बने,

वेदभक्त हो सकल विश्व यह गुरु फिर भारत देश बने।

कृतज्ञता ज्ञापन

-आनन्दप्रकाश आर्य

जिन क्षेत्रों में आर्य समाज शिथिल था सपने टूट रहे थे।

धर्मवीर जी के उपदेशों से अब वहाँ अंकुर फूट रहे थे।।

समाचार मिला ये दु:खद अचानक कि जहाँ से धर्मवीर गये।

ये शब्द सुने जिस आर्य ने उसका ही कलेजा चीर गये।।

परोपकारिणी सभा में छटा बिखेरी ज्योत्स्नापुंज चमत्कारी थे।

उत्तराधिकारिणी सभा में ऋषि के सच में उत्तराधिकारी थे।।

आर्यसमाज का यशस्वी योद्धा महा विद्वान् रणधीर गया।

दयानन्द के तरकश में से मानो एक अमूल्य तीर गया।।

देह चली गई तो क्या घुल गये हो सबकी आवाजों में।

हे धर्मवीर! तुम रहोगे जिन्दा हर जगह आर्यसमाजों में।।

रामायणमा उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त भएको प्रमाण:

ओ३म्..

रामायणमा उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त भएको प्रमाण

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प्रेम आर्य

दोहा, कतार बाट

सायद कुनै यस्तो व्यक्ति होला जुन रामायण महाकाव्य र रचियता महर्षि वाल्मीकि संग परिचित नहोस्? नेपालमा पनि रामायणको नाम लिना साथ् आदिकवि भानुभक्त आचार्यको नाम स्मरण हुन्छ। रामायण हाम्रो प्राण हो। यसको शिक्षा आज पनि त्यतिकै व्यवहारिक र महत्व छ जति प्राचीन कालमा थियो। यसमा जीवनको अति गहन र अति गम्भीर समस्याहरुको समाधान भएको स्वरुप दृष्टिगोचर हुन्छ। एकातिर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एक महान आदर्श पुत्र, आदर्श दाजु, आदर्श शिष्य, आदर्श पति,  आदर्श सेवक एवं आदर्श राजा हुन् भने अर्को तिर महा रानी सीता एक आदर्श पुत्री, आदर्श पत्नी, आदर्श वधु, आदर्श भाउजू र आदर्श नारी हुन्। जहाँ एकातिर आदर्श माताको रूपमा कौशलयाको चरित्र चित्रण छ भने अर्को तिर एक आदर्श भाईको रूपमा लक्ष्मणको वर्णन छ। जहाँ एकातिर भरत जस्ता त्यागि, तपस्वी आदर्श अनुजको वर्णन छ भने त्यहीं अर्कोतिर महा विद्वान हनुमान जस्ता आदर्श सेवकको वर्णन पनि छ। जहाँ एकातिर सुग्रीव जस्ता आदर्श सहयोगीको वर्णन छ भने अर्को तिर जटायु जस्ता आदर्श त्यागीको पनि वर्णन छ। रामायणमा के छैन र? एक सम्पूर्ण जीवनदर्शन छ यसमा। जीवनको सार छ यसमा। तात्पर्य यहि हो कि रामायणमा हामीलाई जीवन जिउनको लागि एक अति उच्चतम आचारको दृष्टान्त पाइन्छ। रामायण बाट पूर्वकालमा जनमानसलाई एक उच्चतम प्रेरणा र मार्गदर्शन पाइयो, आज पनि पाइदैछ र भविष्यमा पनि पाइने नै छ।

आजभोलि हामीकहाँ प्राप्त हुने रामायणको विभिन्न संस्करणमा केहि केहि भिन्नता छन्। यस समय प्राप्त रामायणमा ७ काण्ड छन्- बाल काण्ड, अयोध्याय काण्ड, अरण्य काण्ड, किष्किन्धा काण्ड, सुंदर काण्ड, युद्ध (लंका) काण्ड र उत्तर काण्ड।
त्यसो त रामायण भित्र केहि श्लोकहरु प्रक्षेपित पनि भएको छ तर यसमा सबभन्दा अधिक विवादस्पद उत्तर काण्डलाई मानिन्छ, किनकि यस काण्डमा श्रीरामको अन्तिम जीवन, सीताको निन्दा र वन गमन, सीता शोक, लव कुशको जन्म, शम्बूक वध आदि वर्णित छन्।
यो पुरै उत्तर काण्ड प्रक्षेपित हुनुको कारण:
१. छैठौं काण्ड समाप्त गर्ने बेला कवि वाल्मीकिले फलश्रुति रावणवधका साथ रामायणको अन्त गरेका छन् तर फेरी सातौँ काण्डको अन्तमा अर्को पटक फलश्रुति हुनु संदेहजनक छ किनकि एक ग्रन्थमा दुई फलश्रुति हुँदैनन्।
२. श्री रामलाई आरम्भका ६ काण्डमा (केहि प्रक्षिप्त श्लोकहरु छोडेर) वीर महापुरुष प्रदर्शित गरिएको छ, केवल सातौँ काण्डमा मात्र विष्णुको अवतार देखाइएको छ, जुन विषयान्तर हुनाले प्रक्षिप्त सिद्ध हुन्छ।
३. सातौँ काण्डमा यस्ता अनेकौं उपाख्यान छन् जसको रामायणको मूल कथा भन्दा कुनै पनि प्रकारको सम्बन्ध छैन, जस्तै ययाति नहुषको कथा, वृत्र वध, उर्वशी-पुरुरवाको कथा आदि।  रावण र अन्य राक्षसहरुको वध पहिले नै भैसकेको थियो, फेरी सातौँ काण्डमा रावणको इन्द्र संग युद्ध, राक्षसहरुको उत्पत्तिको वर्णन छ। हनुमान राम मिलन पहिले नै भैसकेको थियो, फेरी सातौँ काण्डमा हनुमानको यौवन कालको उल्लेख अप्रासंगिक प्रतीत हुन्छ।
४. सीताको अग्निपरीक्षा एवं निर्वासनको घटनाको वर्णन सातौँ काण्डमा पाइन्छ। यदि समग्र रूपले सम्पूर्ण रामायण पढ्नेहो भने हामीलाई यही सन्देश प्राप्त हुन्छ कि श्री रामचंद्रले आफ्नी पत्नी सीतालाई अपहरण गर्ने दुष्ट रावणलाई खोजेर उसलाई यथोचित दण्ड दिए। उस् कालको सामाजिक मर्यादा पनि हेरौं, सीतालाई अपहरण गरेपछी पनि रावणमा यति शिष्टाचार थियो कि सीताको अनुमति बिना रावणले सीतालाई स्पर्श गर्ने साहस पनि गरेन। फेरी यो कसरि सम्भव छ कि मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचंद्र महाराज जो उस कालमा  आर्य शिरोमणिको पद्विले विभूषित थिए, सीता माथि एक अज्ञानीका समान संका गर्दथे, अग्निपरीक्षा लिने गर्दथे, प्रतिज्ञा गराउने गर्दथे, धोबीको भनाइ मानेर वनमा जाने आदेश दिए। रामायणमा प्रथम देखि छैठौं काण्ड सम्म नारी जातिको लागि सामाजिक अधिकारहरुको वर्णन प्रभावशाली रूपमा पाइन्छ जस्तै – कौशलयाले महलमा वेद पढ्नु एवं अग्निहोत्र गर्नु, कैकई दशरथका साथ सारथि बनेर युद्धमा भाग लिनु, सीता द्वारा शिक्षा ग्रहण गरेर स्वयंवर द्वारा आफ्नो वर चुन्नु आदि। नारीको यस सम्मानजनक स्थानको ठीक विपरीत सातौँ काण्डमा पुरुष द्वारा नारी जाति माथि संदेह गर्नु, उसको परीक्षा गर्नु, उसलाई घरबाट निष्काशित गरेर निसहाय वनमा एक्लै छोडिदिनुले यही दर्शाउँछ कि मध्य कालमा जब नारीलाई हेयको वस्तु सम्झन थालिएको थियो यो त्यसै कालमा प्रक्षेप गरिएको हो। यसबाट पनि यही सिद्ध हुन्छ कि रामायणको उत्तर काण्ड प्रक्षिप्त हो।
५.  एकातिर रामायणमा श्री रामले माझि, निषाद राज, भीलनी शबरी आदिका साथ बिना कुनै भेद भावले सद्व्यवहार गरेको पाइन्छ भने अर्को तिर सातौँ काण्डमा शम्बूक माथि शुद्र भएको कारणले अत्याचार गरेको वर्णन छ। यी दुवै प्रसंग आपसमा मेल खांदैनन त्यसैले यसबाट यही सिद्ध हुन्छ कि सीताको वनवास, अग्नि परिक्षा र शम्बूक-वध भएको उत्तर काण्डको पुरै कथा प्रक्षिप्त हो।
यस प्रकारका अनेकौं उदहारण उत्तर काण्डलाई प्रक्षिप्त सिद्ध गर्नको लागि दिन सकिन्छ। उत्तर काण्ड श्री रामचंद्रको महान रामायणमा उनको गुण विपरीत हुनाले पनि यसको अंग हैन।अस्तु..

नमस्ते..!

(हार्दिक आभार: वेदको सत्यता)

ब्रह्मा : इब्राहीम : कुरान : बाइबिल: – पं. शान्तिप्रकाश

विधर्मियों की ओर से आर्य हिन्दू जाति को भ्रमित करने के लिये नया-नया साहित्य छप रहा है। पुस्तक मेला दिल्ली में भी एक पुस्तिका के प्रचार की सभा को सूचना मिली है। सभा से उत्तर देने की माँग हो रही है। ‘ज्ञान घोटाला’ पुस्तक के साथ ही श्रद्धेय पं. शान्तिप्रकाश जी का यह विचारोत्तेजक लेख भी प्रकाशित कर दिया जायेगा। पाठक प्रतिक्षा करें। पण्डित जी के इस लेख को प्रकाशित करते हुए सभा गौरवान्वित हो रही है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

हमारे शास्त्र ब्रह्मा को संसार का प्रथम गुरु मानते हैं। जैसा कि उपनिषदों में लिखा है कि

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।

परमात्मा ब्रह्मा को पूर्ण बनाता और उसके लिये (चार ऋषियों द्वारा) वेदों का ज्ञान देता है। अन्यत्र शतपथादि में भी अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा पर ऋग्यजु: साम और अथर्व का आना लिखा है। सायण ने अपने ‘ऋग्वेदोपोद्घात’ में इन चार ऋषियों पर उन्हीं चार वेदों का आना स्वीकार किया है। वेदों में वेदों को किसी एक व्यक्ति पर प्रकट होना स्वीकार नहीं किया। देखिये-

यज्ञेन वाच: पदवीयमायन्तामन्वविन्दनृषिषु प्रविष्टाम्।

– ऋ. मण्डल १०

इस मन्त्र में ‘वाच:’ वेदवाणियों के लिये बहुवचन है तथा ‘ऋषिषु प्रविष्टाम्’ ऋषियों के लिये भी बहुवचन आया है।

चार वेद और चार ऋषि- ‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि’ चार वेद वाणियाँ हंै, जिनके अक्षर पदादि नपे-तुले हैं। अत: उनमें परिवर्तन हो सकना असम्भव है, क्योंकि यह ईश्वर की रचना है।

देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति।

– अथर्व. १०

परमेश्वर देव के काव्य को देख, जो न मरता है और पुराना होता है। सनातन ईश्वर का ज्ञान भी सनातन है। शाश्वत है।

अपूर्वेणेषिता वाचस्ता वदन्ति यथायथम्।

– अथर्व. १०-७-१४

संसार में प्रथम उत्पन्न हुए ऋषि लोग ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा पृथ्वी के वैज्ञानिक रहस्यों को प्रकट करने में समर्थ अथर्ववेद का प्रकाश ईश प्रेरणा से करते हैं।

प्रेणा तदेषां निहितं गुहावि:।। – ऋ. १०-७१-१

इन ऋषियों की आत्म बुद्धि रूपी गुहा में निहित वेद-ज्ञान-राशि ईश प्रेरणा से प्रकट होती है। इस प्रसिद्ध मन्त्र में भी ऋषियों के लिए ‘एषां’ का प्रयोग बहुवचनान्त है।

अत: उपनिषद् के प्रथम प्रमाण का अभिप्राय यह हुआ कि ब्रह्मा के लिये वेदों का ज्ञान ऋषियों द्वारा प्राप्त हुआ, वह स्पष्ट है।

अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान जिन ऋषियों को दिया, उसमें ब्रह्मा ने सबसे प्रथम मनुष्यों में वेद-धर्म का प्रचार किया और धर्म की व्यवस्था तथा यज्ञों का प्रचलन किया। अत: ब्रह्माजी संसार के सबसे पहले संस्थापक गुरु माने जाने लगे। क्योंकि वेद में ही लिखा है कि-

ब्रह्मा देवानां पदवी:। – ऋग्वेद ९-९६-६

-ब्रह्मा विद्वानों की पदवी है। बड़े-बड़े यज्ञों में चार विद्वान् मन्त्र-प्रसारण का कार्य करते हैं। उनमें होता, उद्गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा अपने-अपने वेदों का पाठ करते हुए ब्रह्मा की व्यवस्था में ही कार्य करते हैं, यह प्राचीन आर्य मर्यादा इस मन्त्र के आधार पर है-

ऋचां त्व: पोषमास्ते पुपुष्वान्

गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु।

ब्रह्मा त्वो वदति जातिवद्यां

यज्ञस्य मात्रां विमिमीत उत्व:। – ऋग्. १०-७१-११

ऋग्वेद की ऋचाओं की पुष्टि होता, सामकी, शक्तिदात्री ऋचाओं की स्तुति उद्गाता, यजु मन्त्रों द्वारा यज्ञमात्रा का अवधारण अध्वर्यु द्वारा होता है और यज्ञ की सारी व्यवस्था तथा यज्ञ कराने वाले होतादि पर नियन्त्रण ब्रह्मा करता है।

मनु-धर्मशास्त्र में तो स्पष्ट वर्णन है-

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।

दुदोह यज्ञ सिद्धयर्थमृग्यजु: सामलक्षणम्।

-मनु. १/२३

-ब्रह्माजी ने अग्नि, वायु, आदित्य ऋषियों से यज्ञ सिद्धि के लिये ऋग्यजु:साम का दोहन किया।

मनु के इस प्रमाण में अथर्ववेद का उल्लेख इसलिये नहीं किया गया कि यज्ञ सिद्धि में अथर्ववेद तो ब्रह्मा जी का अपना वेद है।

वेदत्रयी क्यों- जहाँ-जहाँ यज्ञ का वर्णन होगा, वहाँ-वहाँ तीन वेदों का वर्णन होगा तथा चारों वेदों का विभाजन छन्दों की दृष्टि से भी ऋग्यजुसाम के नाम से पद्यात्मक, गद्यात्मक और गीतात्मक किया गया है। अत: ज्ञानकर्मोपासना-विज्ञान की दृष्टि से वेद चार और छन्दों की दृष्टि से वेद-त्रयी का दो प्रकार का विभाजन है। कुछ भी हो वेद, शास्त्र, उपनिषद् तथा इतिहास के ग्रन्थों में ब्रह्मा को प्रथम वेद-प्रचारक, संसार का अगुवा या पेशवा के नाम से प्रख्यात माना गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलमान संस्कार-वशात् मानते चले आए हैं, जैसा कि उनकी पुस्तकों से प्रकट है।

कुर्बानी का अर्थ- ब्रह्मा यज्ञ का नेता अगुआ या पेशवा है। यज्ञ सबका महोपकारक होने से देवपूजा, संगतिकरण दानार्थक प्रसिद्ध है। इसी को सबसे बड़ा त्याग और कुर्बानी माना गया है। किन्तु वाममार्ग प्रचलित होने पर महाभारत युद्ध के पश्चात् पशु-यज्ञों का प्रचलन भी अधिक-से-अधिक होता चला गया। इससे पूर्व न कोई मांस खाता और न यज्ञों के नाम से कुर्बानी होती थी।

बाईबल के अनुसार भी हजरत नूह से पूर्व मांस खाने का प्रचलन नहीं था, जैसा कि वाचटावर बाईबल एण्ड टे्रक्स सोसायटी ऑफ न्यूयार्क की पुस्तक ‘दी ट्रुथ वेट सीड्स ईटनैल लाईक’ में लिखा है।

यहूदियों और ईसाईयों के अनुसार मांस की कुर्बानी खूदा के नाम से नूह के तूफान के साथ शुरु हुई है। तब इसको हजरत इब्राहीम के नाम से शुरू किया गया कि इब्राहीम ने खुदा के लिये अपने लडक़े की कुर्बानी की, किन्तु खुदा ने लडक़े के स्थान पर स्वर्ग से दुम्बा भेजा, जिसकी कुर्बानी दी गई। स्वर्ग से दुम्बा लाने की बात कमसुलम्बिया में लिखी है।

यहूदी कहते हैं कि हजरत इब्राहीम ने इसहाक की कुर्बानी की थी, जो मुसलमानों के विचार से हजरत इब्राहीम की पत्नी एरा से उत्पन्न हुआ था। किन्तु मुसलमानों का विश्वास है कि हजरत इब्राहीम की दासी हाजरा से उत्पन्न हुए हजरत इस्माईल की कुर्बानी दी गयी थी, जिसके बदले में जिब्राइल ने बहिश्त से दुम्बा लाकर कुर्बानी की रस्म पूरी कराई।

इसलिये मुसलमान भी हजरत इब्राहीम की स्मृति में पशुओं की कुर्बानी देना अपना धार्मिक कत्र्तव्य समझते हैं। परन्तु भूमि के पशुओं की कुर्बानी की आवश्यकता खुदा को होती तो बहिश्त से दुम्बा भेजने की आवश्यकता न पड़ती। दुम्बा तो यहीं धरती पर मिल जाता।

बाईबल के अनुसार तो पशुबलि की प्रथा हजरत इब्राहीम के बहुत पहले नूह के युग में आरम्भ हुई है। जैसा कि पीछे ‘वाच एण्ट टावर’ का प्रमाण दिया जा चुका है। किन्तु वास्तव में ब्रह्मा मनु से पूर्व हुए हैं। मनु को ही नूह माना जाता है।

ब्रह्मा ही इब्राहीम- हाफिज अताउल्ला साहब बरेलवी अनुसार हजरत इब्राहीम तो ब्रह्मा जी का ही नाम है, क्योंकि वेदों में ब्रह्मा और सरस्वती, बाईबिल में इब्राहम हैं और सर: तथा इस्लाम में इब्राहीम सर: यह वैयक्तिक नाम हैं, जो समय पाकर रूपान्तरित हो गये। सर: सरस्वती का संक्षेप है। आर्य-जाति में वती बोलना, न बोलना अपनी इच्छा पर निर्भर है जैसा कि पद्मावती की पद्मा और सरस्वती को सर: (य सरस) बोला जाता है, जो शुद्ध में संस्कृत का शब्द है। सरस्वती शब्द वेदों में कई बार आया है। जैसे-

चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां।

यज्ञं दधे सरस्वती। – ऋ. १-३-११

सत्य-वक्ता, धर्मात्मा-द्विज, ज्ञानयुक्त लोगों को धर्म की प्रेरणा करती हुई, परोक्ष पर विश्वास रखने वाले सुमतिमान् लोगों को शुभ मार्ग बताती हुई, सरस्वती-वेद वाणी यज्ञो (पंच महायज्ञादि) प्रस्थापना करती है।

अत: स्पष्ट है कि सरस्वती वेद-वाणी को कहते हैं और ब्रह्मा चार वेद का वक्ता होने से ही पौराणिकों में चतुर्मुख प्रसिद्ध हो गया है।

चत्वारो वेदा मुखे यस्येति चतुर्मुख:।

लुप्त बहुब्रीहि समास का यह एक अच्छा उदाहरण है। चारों वेद जिसके मुख में अर्थात् कण्ठस्थ हंै। चारों वेदों में निपुण विद्वान् का नाम ही ब्रह्मा है। ब्रह्मा विद्वानों की एक उच्च पदवी है जो सृष्टि के आरम्भ से अब तक चली आ रही है और जब तक संसार है, यह पदवी मानी जाती रहेगी। अनेकानेक ब्रह्मा संसार में हुए हैं और होंगे।

अब भी यज्ञ का प्रबन्धक ब्रह्मा कहलाता है। ब्रह्मा का वेदपाठ और यज्ञ के साथ विशेष सम्बन्ध है। वेदवाणी को सरस्वती कहा गया है।

यहूदी, ईसाई और मुसलिम मतों में सरस्वती का सर: और ब्रह्मा का इब्राम बन इब्राहीम हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है।

काबा-यज्ञस्थली- ब्रह्मा यज्ञ का आदि प्रवर्तक है। वेद, कुरान और बाईबल इसमें एक मत है। यज्ञशाला चौकोर बनाई जाती है। इसीलिये मक्का में काबा भी चौकोर है, जो इब्राहीम ने बनवाया था। यह यज्ञीय स्थान है। यज्ञ में एक वस्त्र जो सिला न हो, पहनने की प्राचीन प्रथा है। मुसलमानों ने मक्का के हज्ज में इस प्रथा को स्थिर रखा हुआ है। यज्ञ को वेद में अध्वर कहा गया है।

ध्वरति हिंसाकर्म तत्प्रतिषेध:।

अध्वर का अर्थ है, जिसमें हिंसा न की जाय। इसलिये मुसलमान हाजी हज्ज के लिये एहराम बांध लेने के पश्चात् हिंसा करना महापाप मानते हैं।

वैदिक धर्मियों में वाममार्ग युग में हिंसा का प्रचलन हुआ। वाममार्ग के पश्चात् ही वैदिक-धर्म का ह्रास होकर बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई, इस्लाम आदि मतों का प्रचलन हुआ है। यज्ञों में पशु हत्या और कुर्बानी में पशु बलि की प्रथा भी वाममार्ग=उल्टा मार्ग- ही माना गया है, जो वास्तव में सच्चे यज्ञों अथवा सच्ची कुर्बानी का मार्ग नहीं है।

नमस्=नमाज- आर्यों के पाँच यज्ञों में नमस्कार का प्रयोग हुआ, नमाज नमस् का रूपान्तर है। पाँच नमाज तथा पाँच इस्लाम के अकान पंचयज्ञों के स्थानापन्न हंै:-

कुरान में पंचयज्ञ- १. ब्रह्म यज्ञ- दो समय सन्ध्या- नमाज तथा रोजा कुरान के हाशिया पर लिखा है कि पहिले दो समय नमाज का प्रचलन था। देखो फुर्कान आयत ५

२. देव यज्ञ- हज्ज तथा जकात या दान पुण्य।

३. बलिवैश्वदेवयज्ञ- कुर्बानी पशुओं की नहीं, किन्तु पशु-पक्षी, दरिद्रादि को बलि अर्थात् भेंट देना ही सच्ची कुर्बानी है। धर्म के लिये जीवन दान महाबलिदान है।

४-५. पितृ यज्ञ तथा अतिथि यज्ञ- इस प्रकार आर्यों के पंच यज्ञ और इस्लाम के पाँच अरकानों का कुछ तो मेल है ही। इस्लाम के पाँच अरकार नमाज, जकात, रोजा, हज्ज और कुर्बानी हैं।

कुर्बानी शब्द कुर्व से निकला, जिसके अर्थ समीप होना अर्थात् ईश्वरीय गुणों को धारण कर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करना है, इन अर्थों में पशु हत्या तो हिन्दुओं के पशुयज्ञ की भाँति विकृति का परिणाम मात्र है। वेदों में यज्ञ को अध्वर कहा है, जिसका अर्थ है- हिंसारहित शुभकर्म इसी प्रकार कुर्बानी शब्द में भी हिंसा की भावना विद्यमान नहीं।

ब्रह्मा ने वेदों के आधार पर यज्ञों का प्रचलन किया तथा यज्ञों में सबसे बड़े विद्वान् को आर्यों में ब्रह्मा की पदवी से विभूषित किया जाता है। अत: ब्रह्मा शब्द रूढि़वादी नहीं। अनेक ब्रह्मा हुए हैं और होंगे भी। किसी समय फिलस्तीन में ब्रह्मा को इब्राम और अरब देशों में इब्राम का इब्राहीम शब्द रूढ़ हो गया।

वैदिक-ज्ञान को वेद में सरस्वती कहा है, लोक में पद्मावती को केवल पद्मा सरस्वती को केवल सर: कहने की प्रथा का उल्लेख कर चुके हैं। अत: पुराणों में ब्रह्मा और सरस्वती तथा सर: एवं इस्लाम में भी इब्राहीम और सर: शब्दों का प्रचलन होने से सिद्ध होता है कि दोनों शब्द वेदों के अपभ्रंश मात्र होकर इन मतों में विद्यमान हैं।

कुरान शरीफ में लिखा है कि हजरत साहिब फरमाते हैं-

१. लोग कहते हैं कि यहूदी या ईसाई हो जाओ, किन्तु में तो इब्राहीम के धर्म को मानता हूँ, जो एक तरफ का था और मूर्ति-पूजक न था। परमात्मा का सच्चा उपासक था। -सूरा: वकर आयत १३५

२. ईश्वर ने ब्रह्माहीम संसार का इमाम= [धर्म का नेता] बनाया। सूरा बर, आयत १२४

३. ऐ लोगो! इब्राहीम के सम्बन्ध में क्यों झगड़ते हो और इब्राहीम पर तौरेत व इन्जील नहीं उतरी, किन्तु यह तौरेत व इन्जील तो उनके बहुत पीछे की हैं। पर तुम समझदारी क्यों नहीं करते।

इबराहीम न यहूदी था, न ईसाई, किन्तु एक ओर का मुस्लिम था वा मुशरिक मूर्ति-पूजक न था अनेक-ईश्वरवादी भी न था- अल इमरान, आयत ६४.६६

उस इब्राहीम के धर्म को मानो जो एक निराकार का उपासक था और मूर्ति-पूजक न था। -अल, इमरान, आयत ९४

कुरान शरीफ में हिजरत इब्राहीम के यज्ञ मण्डप का नाम काबा शरीफ रखा है। काबा चौकाने यज्ञशाला की भाँति होने से भी प्रमाणित है कि किसी युग में यह अरब के लोगों का यज्ञीय स्थान था, जहाँ हिंसा करना निषिद्ध था, जिसकी परिक्रमा भी होती थी और उपासना करने वालों के लिये उसे हर समय पवित्र रखा जाता था। इसकी आधारशिला इब्राहीम और इस्माईल ने रखी थी। देखो- सूरा बकर, आयत १२५ से १२७

कुरान शरीफ में स्पष्ट लिखा है कि कुर्बानी आग से होती थी। अल इमरान आयत १, २, खूदा की सुन्नत कभी तबदील नहीं होती। सूरा फतह, आयत २४

मूसा को पैगम्बरी आग से मिली। जहाँ जूती पहन के नहीं जाया जाता। सूरा त्वाह, आयत ११-१३

खुदा को कुर्बानी में पशु मांस और रक्त स्वीकार्य नहीं। खुदा तो मनुष्यों से तकवा अर्थात् पशु-जगत् पर दया-परहेजगारी-शुभाचार-सदाचार स्व्ीकारता है। सूरा हज्ज, आयत १७

‘‘हज्ज और अमरा आवश्यक कर लेना एहराम हैं। एहराम यह कि नीयत करे आरम्भ करने की और वाणी से कहे लव्वैक। पुन: जब एहराम में प्रविष्ट हुआ तो स्त्री-पुरुष समागम से पृथक् रहें। पापों और पारस्परिक झगड़ों से पृथक् रहें। बाल उतरवाने, नाखून कटवाने, सुगन्ध लेप तथा शिकार करने से पृथक् रहें। पुरुष शरीर पर सिले वस्त्र न पहिने, सिर न ढके। स्त्री वस्त्र पहिने, सिर ढके, किन्तु मुख पर वस्त्र न डाले। -मौजुहुल्कुरान, सूरा बकर, आयत १९७’’

इस समस्त प्रमाण भाग का ही यही एक अभिप्राय है कि हज्ज में हिंसा की गुंजाइश नहीं। कुर्बानी – कुर्वे खुदा अर्थात् ईश्वरीय सन्निध्य प्राप्ति का नाम हुआ। अत: कुरान-शरीफ में पशुओं की कुर्बानी की मुख्यता नहीं है। ऐसा कहीं नहीं लिखा कि जो पशुहत्या न करे, वह पापी है। हाँ, यह तो लिखा है कि खुदा को पशुओं पर दया करना ही पसन्द है, क्योंकि वह खून का प्यासा नहीं और मांस का भूखा नहीं। -सूरा जारितात, आयत ५६-५८

कुछ स्थानों पर मांस खाने का वर्णन है, किन्तु वह मोहकमात=पक्की आयतें न होकर मुतशावियात=संदिग्ध हैं अथवा उनकी व्याख्या यह है कि आपत्ति काल में केवल जीवन धारण के लिये अत्यन्त अल्प-मात्रा में प्रयुक्त करने का विधान है। देखो-सूरा बकर, आयत १७३

अत: मुस्लिम संसार से प्रार्थना है कि कुरान शरीफ में मांस न खाना पाप नहीं है। खाना सन्दिग्ध कर्म और त्याज्य होने से निरामिष होने में ही भलाई है, यही दीने- इब्राहीम और ब्रह्मा का धर्म है, जिस पर चलने के लिये कुरान शरीफ में बल दिया है।

इसी आधार पर आर्य मुस्लिम एकता तो होगी ही, किन्तु राष्ट्र में हिन्दू मुसलमानों के एक कौम होने का मार्ग भी प्रशस्त हो जायेगा। परमात्मा करे कि ऐसा ही हो।

महर्षि दयानन्दाष्टकम्

टिप्पणी- महामहोपाध्याय श्री पं. आर्यमुनि जी ने यह अष्टक महर्षि का गुणगान करते हुए अपने ग्रन्थ आर्य-मन्तव्य प्रकाश में दिया था। कभी यह रचना अत्यन्त लोकप्रिय थी। ११वीं व १२वीं पंक्ति ऋषि के चित्रों के नीचे छपा करती थी। पूज्य आर्यमुनि जी ने ऋषि जीवन का पहला भाग पद्य में प्रकाशित करवा दिया था, इसे पूरा न कर सके। यह ऐतिहासिक रचना परोपकारी द्वारा आर्य मात्र को भेंट है। – राजेन्द्र ‘जिज्ञासु’

वेदाभ्यासपरायणो मुनिवरो वेदैकमार्गे रत:।

नाम्ना यस्य दया विभाति निखिला तत्रैव यो मोदते।

येनाम्नायपयोनिधेर्मथनत: सत्यं परं दर्शितम्।

लब्धं तत्पद-पद्म-युग्ममनघं पुण्यैरनन्तैर्मया।।

भाषाछन्द-सवैया

१.            उत्तम पुरुष भये जग जो, वह धर्म के हेतु धरें जग देहा।

धन धाम सभी कुर्बान करें, प्रमदा सुत मीतरु कांचन गेहा।

सनमारग से पग नाहिं टरे, उनकी गति है भव भीतर एहा।

एक रहे दृढ़ता जग में सब, साज समाज यह होवत खेहा।।

२.            इनके अवतार भये सगरे, जगदीश नहीं जन्मा जग माहीं।

सुखराशि अनाशी सदाशिव जो, वह मानव रूप धरे कभी नाहीं।

मायिक होय यही जन्मे, यह अज्ञ अलीक कहें भव माहीं।

मत एक यही सब वेदन का, वह भाषा रहे निज बैनन माहीं।।

३.            धन्य भई उनकी जननी, जिन भारत आरत के दु:ख टारे।

रविज्ञान प्रकाश किया जग में, तब अंध निशा के मिटे सब तारे।

दिन रात जगाय रहे हमको, दु:खनाशकरूप पिता जो हमारे।

शोक यही हमको अब है, जब नींद खुली तब आप पधारे।।

४.            वैदिक भाष्य किया जिनने, जिनने सब भेदिक भेद मिटाए।

वेदध्वजा कर में करके, जिनने सब वैर विरोध नसाए।

वैदिक-धर्म प्रसिद्ध किया, मतवाद जिते सब दूर हटाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

५.            जाप दिया जगदीश जिन्हें इक, और सभी जप धूर मिलाए।

धूरत धर्म धरातल पै जिनने, सब ज्ञान की आग जलाए।

ज्ञान प्रदीप प्रकाश किया उन, गप्प महातम मार उड़ाए।

डूबत हिन्द जहाज रहा अब, जासु कृपा कर पार कराए।।

६.            सो शुभ स्वामी दयानन्द जी, जिनने यह आर्यधर्म प्रचारा।

भारत खण्ड के भेदन का जिन, पाठ किया सब तत्त्व विचारा।

वैदिक पंथ पै पाँव धरा उन, तीक्ष्ण धर्म असी की जो धारा।

ऐसे ऋषिवर की सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

७.            व्रत वेद धरा प्रथमे जिसने, पुन भारत धर्म का कीन सुधारा।

धन धाम तजे जिसने सगरे, और तजे जिसने जग में सुतदारा।

दु:ख आप सहे सिर पै उसने, पर भारत आरत का दु:ख टारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।

८.            वेद उद्धार किया जिनने, और गप्प महातम मार बिदारा।

आप मरे न टरे सत पन्थ से, दीनन का जिन दु:ख निवारा।

उन आन उद्धार किया हमरा, जो गिरें अब भी तो नहीं कोई चारा।

ऐसे ऋषिवर को सज्जनो, कर जोड़ दोऊ अब वंद हमारा।।