Algeria defends Ahmadiyah sect arrests, community says vilified

Algeria defends Ahmadiyah sect arrests, community says vilified

ALGIERS, April 28 (Reuters) – Algeria’s government has rejected accusations from rights groups that it persecuted the Ahmadiyah religious sect during a recent spate of arrests, saying those detained were targeted for breaking the law not for their beliefs.

International rights groups have expressed concern in Algeria about crackdowns and religious persecution of Ahmadiyah, a Muslim sect also found in Pakistan and Indonesia as well as in communities in Europe but who some Sunnis accuse of apostasy.

The Ahmadiyah identify as Muslims, but believe another prophet followed the Prophet Mohammed, who founded Islam. That view runs counter to the Muslim religion’s central belief and is considered problematic by most mainstream Islamic organizations.

Algeria’s Minister of Religious Affairs Mohamed Aissa told diplomats and reporters this week that any arrests in Algeria’s Ahmadiyah community were for individual crimes and not a crackdown on their religious community.

His comments came after some Algerian political leaders had said there was no place for the Ahmadiyah in Algeria, where most people are Sunni Muslims. In the past, officials have suggested the community was involved in illegal proselytizing.

“All those Ahmadiyah individuals’ activities in our country were illegal, we are not targeting the Ahmadiyah, but rather individuals,” Aissa said at a conference this week.

PAST CIVIL WAR

Those arrested have been investigated for offences including unauthorized fundraising and the illicit use of private homes to conduct unauthorised secret meetings

He said 123 Ahmadiyah were under investigation and 21 had been arrested. The minister said some of the community had sympathies with Islamic State and ties to former Algerian militant groups or were non-Muslims.

But Fareed Ahmad, the group’s national secretary for external affairs based in London, told Reuters they were deeply concerned about a “vilification campaign” against Ahmadiyah in Algeria.

“We are a peace-loving Muslim community and have consistently campaigned against extremism around the world. We urge the authorities to release the 26 Ahmadi Muslim who have been unjustly imprisoned in the past six months,” he said.

“They are loyal Algerian citizens who are committed to the peace and prosperity of Algeria.”

The High Islamic Council, the highest religious authority in Algeria considers the Ahmadiyah a non-muslim group.

More than 90 percent of Algeria’s 40 million people are Sunni Muslims The question of Islamic activism outside mainstream, state-sanctioned Sunni Islam is sensitive following a 1990s civil war with armed, ultra-conservative Islamists that killed more than 200,000 people.

(Editing by Patrick Markey and Ralph Boulton)

source : http://news.trust.org/item/20170428153626-c26w7

हदीस : यीशु

यीशु

मुहम्मद को यीशु में एक प्रकार की आस्था थी। वस्तुतः इस आस्था को तथा साथ ही मूसा और इब्राहिम की पैगम्बरी में उनकी आस्था को बहुधा मुहम्मद की उदार तथा सहिष्णु दृष्टि के प्रमाण के रूप में उद्धृत किया जाता है। पर यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो पायेंगे कि इस आस्था में उनका स्वार्थ निहित था। इसका आंशिक उद्देश्य था। अपनी पैगम्बरी की परम्परा को प्रमाणित करना तथा अंशतः यह आस्था यहूदियों और ईसाईयों का मतान्तरण करने के आशय से प्रेरित थी। बहरहाल यीशु के प्रति उनका अभिमत अधिक वजनदार नहीं है। उन्होंने यीशु को अपने काफिले का एक मुजाहिद मात्र बना डाला। यीशु का पुनरुत्थान या पुनरावतरण, मुहम्मद की एक धुंधली छाया के रूप में होगा। वे और लोगों के साथ ईसाइयों के खिलाफ युद्ध छेड़ रहे होंगे। मुहम्मद का उद्घोष है-”मरियम का बेटा तुम्हारे बीच एक न्यायशील न्यायाधीश के रूप में जल्द ही आयेगा। वह सलीबों को तोड़ डालेगा, सुअरों को मारेगा और जजिया खत्म कर देगा“ (287)। कैसे ? अनुवादक समझाते हैं-”सलीब ईसाइयत का प्रतीक है। मुहम्मद के आगमन के बाद यीशु इस प्रतीक को तोड़ देंगे। इस्लाम अल्लाह का दीन (मजहब) है और कोई और मजहब उसे मंजूर नहीं। इसी तरह, सुअर का मांस ईसाइयों का प्रिय आहार है। यीशु इस गंदे और घृणित जानवर का अस्तित्व ही समाप्त कर देंगे। सम्पूर्ण मानवजाति इस्लाम अपना लेगी और कोई जिम्मी नहीं बचेगा और इस तरह जजिया खुद-ब-खुद खत्म हो जायेगा“ (टि0 289-290)। यीशु को एक न्यायशील न्यायाधीश माना गया है, पर इसका मतलब सिर्फ यह है कि वह मुहम्मद की शरह के मुताबिक न्याय करेगा। जैसा कि अनुवादक ने स्पष्ट किया है-”मुहम्मद की पैगम्बरी के बाद, पहले के पैगम्बरों की शरह निरस्त हो जाती है। इसीलिए यीशु इस्लामी कानून के मुताबिक न्याय करेंगे“ (टी0 288)।

लेखक : राम स्वरुप

 

इस्लाम : महिलाओं का खतना बन्द हो .. सुप्रीम कोर्ट में गुहार

महिलाओं का खतना बन्द हो .. सुप्रीम कोर्ट में गुहार

जो किसी ने सुना भी नहीं होगा , उसे देखना पड़ रहा है लोगों को अब उनकी आंखों के आगे .  और जो देख रहे हैं वो सोचते हैं कि उन्होंने इसे झेला कैसे रहा होगा .. 3 तलाक को कुप्रथा और क्रूरता की संज्ञा देने वालों को ये नहीं पता कि वो तो एक बानगी मात्र भर है .. एक समाज औरतों का भी खतना करता है और खास कर उस समय मे जब उनका बाल्यकाल चल रहा होता है .. सुप्रीम कोर्ट में सुनीता तिवारी नाम की एक समाज सेविका ने याचिका दाखिल करते हुए मुस्लिमों की दाऊदी वोहरा समुदाय में 5 वर्ष से रजस्वला होने के मध्य की बच्चियों के साथ होने वाली इस प्रथा को बेहद अमानवीय और मानवता के विरुद्ध बताते हुए इसे कुप्रथा मान कर तत्काल बन्द करने की मांग की .. याचिका की गम्भीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल भारत सरकार , महाराष्ट्र सरकार , दिल्ली सरकार , गुजरात सरकार और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी करते हुए इस मुद्दे पर जवाब मांगा .  याचिकाकर्ती ने इस मुद्दे पर भारत संविधान की धारा 14 व धारा 21 के साथ नीति निर्देशक तत्व 39 का भी हवाला देते हुए बताया कि यह महिलाओ को समानता के अधिकार से वंचित करता है . अपने तथ्यों के समर्थन में श्रीमती सुनीता ने लिखित दिया कि संयुक्त राष्ट्र संघ में मुस्लिम औरतों के खतना को विश्व भर में बंद करने के प्रस्ताव पर खुद भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं , ऐसे में इस कुप्रथा का भारत मे ही चलना किसी भी प्रकार से तर्कसंगत नहीं है ..

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए तत्काल 4 राज्यों और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया .. इन सरकारों के उत्तर आने के बाद इसकी अगली सुनवाई की जाएगी .. पर ये प्रथा अधिकांश जनता के लिये बिल्कुल पहली बार सुनने जैसा है जिस के बाद काफी लोग आश्चर्यचकित हैं .

source: http://www.sudarshannews.com/category/national/categorynationalpetition-against-female-brutality-in-supreme-court–2013

पितृ-यज्ञ

                  पितृ-यज्ञ

‘पितृयज्ञ’ दो शबदों से मिलकर बना है। एक ‘‘पितृ’’ और दूसरा ‘यज्ञ’।

‘पितृ’ का अर्थ है पिता। माता और पिता दोनों को भी ‘पितृ’ कहते हैं। जैसे ‘‘माता च पिता च पितरौ’’ (द्वन्द्वैकशेष समास)। ‘माता’ और ‘पिता’ दोनों शबदों का जब द्वन्द्व समास बनाते हैं तो ‘पितरौ’ बनता है। अर्थात् ‘पितृ’ का अर्थ है माँ और पिता दोनों।

‘पितृ’ का प्रथम विभक्त में ‘पिता’ हो जाता है। कुछ संस्कृत न पढ़े हुये लोग समझते हैं कि ‘पिता’ जीते हुये बाप को कहते हैं और ‘पितर’ मरे हुये बाप को, परन्तु यह बात नहीं है। असली शबद ‘पितृ’ है। जब उसका कर्त्ताकारक बनाते हैं तो ‘पिता’ हो जाता है। जब कर्मकारक बनते हैं तो ‘पितरम्’ हो जाता है। कर्त्ताकारक बहुवचन में ‘पितरः’ होता है। जैसे ‘मम पिता गच्छति’ का अर्थ है ‘मेरा बाप जाता है’। ‘पितरम् अपश्यम्’ का अर्थ है मैंने बाप को देखा। ‘तेषां पितर आयान्ति’ का अर्थ है ‘उनके बाप आते हैं’।

इस प्रकार ‘पितृ’ या ‘पितर’ शबदों में मौत का कुछ संकेत नहीं है। और यह कहना गलत है कि ‘पितृ’ या ‘पितर’ मरे हुये बाप के लिये आता है, जीते हुए के लिये नहीं।

दादे, परदादे या दादी और परदादी के लिये भी ‘पितृ’ शबद आता है। ‘यज्ञ’ शबद का अर्थ है पूजा, सत्कार। कुछ लोग समझते हैं कि ‘यज्ञ’ शबद और ‘हवन’ शबद का एक अर्थ है। यह भी गलत है। हवन को भी यज्ञ कहते हैं, परन्तु यज्ञ अन्य अर्थों में आता है। ‘यज्’ धातु-जिससे ‘यज्ञ’ शबद बना है-देवपूजा, संगतिकरण और दान, तीन अर्थों में आती है। इसलिये ‘यज्ञ’ का अर्थ केवल हवन नहीं है। उदाहरण के लिये ‘ब्रह्मयज्ञ’ का अर्थ है-स्वाध्याय या ईश्वर का ध्यान। अतिथि-यज्ञ का अर्थ है ‘मेहमान की खातिरदारी करना’। यहाँ न तो होम या हवन से समबन्ध है, न आहुति देने से, न किसी पशु आदि के काटने से। देखिये मनुस्मृति अध्याय 3, श्लोक 70-

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृ यज्ञश्च तर्पणम्।

होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्।।

अर्थात् पढ़ने-पढ़ाने का नाम ब्रह्मयज्ञ है। तर्पण को पितृ-यज्ञ कहते हैं। होम देवयज्ञ कहलाता है। पशुओं को भोजन देने का नाम भूतयज्ञ है और अतिथि के सत्कार को नृयज्ञ कहते हैं। हमने यहाँ यह श्लोक इसलिये दिया है कि केवल ‘देवयज्ञ’ में ‘यज्ञ’ शबद का अर्थ ‘होम’ है। अन्यत्र यज्ञ का अर्थ पूजा और सत्कार ही है।

आश्वालयन गृहसूत्र में भी ऐसा ही है।

अर्थात् पंचयज्ञो देवयज्ञो भूतयज्ञः पितृयज्ञो ब्रह्मयज्ञो मनुष्ययज्ञ इति तद् यदग्नौ जुहोति स देवयज्ञो यद् बलिं करोति स भूतयज्ञो यत् पितृयो ददाति सः पितृयज्ञो यत् स्वाध्यायमधीते स ब्रह्मयज्ञो यन् मनुष्येयो ददाति स मनुष्य यज्ञ इति तानेतान् यज्ञानहरहः कुर्वीत। (अश्वालयन गृह्यसूत्र तृतीय अध्याय)

हम ऊपर कह आये हैं कि पितृ का अर्थ है माता, पिता या अन्य पूर्वज। और यज्ञ का अर्थ है सत्कार। इसलिये ‘पितृयज्ञ’ का अर्थ हुआ माता-पिता आदि की सेवा सुश्रुषा।

इसमें वेद का भी प्रमाण हैः-

अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः

अर्थात् लड़के को चाहिये कि पिता के व्रतों का अनुसरण करने वाला और माता को प्रसन्न करने वाला हो। अर्थात् सन्तान को माता-पिता आदि गुरुजनों की सेवा करनी चाहिये।

अब एक प्रश्न उठता है कि पितृयज्ञ मरे हुये माता-पिता का होता है या जीते हुओं का। इसमें लोगों का मतभेद है। हम कुँआर के महीनों में लोगों को अपने मरे हुये पितरों का श्राद्ध-तर्पण करते हुए देखते हैं, कुँआर के कृष्ण-पक्ष को लोग ‘पितृपक्ष’ कहते हैं, क्योंकि इसमें मरे हुये पुरखों का श्राद्ध-तर्पण किया जाता है।

हम अभी कह चुके हैं कि ‘पितृ’ शबद में कोई ऐसी बात नहीं, जो मरे हुये माँ-बाप की ओर संकेत करे। अब हम यहाँ यह देखना चाहते हैं कि क्या मरा हुआ भी किसी का बाप या माँ हो सकता है।

मनुष्य नाम है विशेष शरीरधारी जीव का। न तो केवल शरीर को ही मनुष्य कहते हैं। न केवल जीव को। जब शरीर से जीव निकल जाता है तो उसे मनुष्य नहीं कहते किन्तु ‘मनुष्य की लाश’ कहते हैं। वह जीव भी मनुष्य नहीं है, क्योंकि वह जीव मनुष्य के अतिरिक्त अन्य शरीर भी धारण कर सकता है। जो आज आदमी के शरीर में है, वह कल मरकर चींटी के शरीर को धारण कर सकता है और परसों कुत्ता, बिल्ली इत्यादि का। समभव है कि फिर किसी जन्म में वह मनुष्य का शरीर धारण करे।

इसी प्रकार न तो शरीर को ही माँ या बाप कहते हैं न जीव को। जब तक हमारे माता, पिता, दादी, बाबा जीवित हैं, तब तक वह हमारे माता, पिता, दादी या बाबा हैं। जब मर गये तो उनकी लाश रह जायगी, जिसको जला देंगे। न्याय-दर्शन में कहा है कि-

‘‘शरीरदाहे पातकाभावात्।’’

– (न्याय-दर्शन अध्याय 3)

अर्थात् लाश के जलाने से पाप नहीं होता। जब हमारे माता-पिता आदि मर जाते हैं और हम उनकी लाश को जला आते हैं, तो कोई हमसे यह नहीं कहता कि तुमने पितृ-हत्या की, तुम पापी हो। क्योंकि जिस चीज को हमने जलाया वह माँ-बाप न थे, किन्तु माँ-बाप की लाशें थीं।

अब प्रश्न होता है कि मरने के बाद हमारे माँ-बाप कहाँ हैं? क्या वह जीव माँ-बाप हैं? कदापि नहीं। उन जीवों की पितृ संज्ञा नहीं। क्योंकि मरने के पश्चात् न जाने उन्होंने कहाँ जन्म लिया। वही जीव समभव है कि हमारे ही घरों में नाती पोतों या पुत्र के रूप में जन्म लें। या अपने कर्मानुसार ऊँच या नीच योनियों को प्राप्त हों या यदि परमयोगी हों तो उनकी मुक्ति भी हो जाए। यदि हमारे माता या पिता हमारे पुत्र या पुत्री के रूप में जन्म लेंगे तो हम उनके ‘पितृ’ होंगे न कि वह हमारे। वस्तुतः माता-पिता आदि समबन्ध उसी समय तक है जब तक कि शरीर और जीव संयुक्त हैं? मृत्यु होते ही यह समबन्ध छूट जाते हैं।

जब माता-पिता मर जाते हैं तो हम कहते हैं कि हमारे माता-पिता मर गये, परन्तु वह मरते नहीं। जीव तो सदा अमर है। इसीलिये मरे हुये माता-पिता की पितृ संज्ञा केवल भूतकाल की अपेक्षा से होती है, वर्तमान काल की अपेक्षा से नहीं। क्योंकि वह समबन्ध केवल भूतकाल में था, अब नहीं। इसीलिये यह कहते हैं कि हमारे पिता धनाढ्य थे, या निर्धन थे, विद्वान् थे या अविद्वान् थे, परन्तु यह कोई नहीं कहता कि आज हमारे माता कुत्ता या घोड़ा हैं या हाथी हैं, क्योंकि हमारा पितृत्व का समबन्ध उसी दिन समाप्त हो गया, जिस दिन वे मर गये। इसीलिये पितृयज्ञ केवल जीवित माता-पिता का हो सकता है न कि मरे हुओं का। इसी को चाहे श्राद्ध कह लीजिये चाहे तर्पण। साधारणतया श्राद्ध का मरे हुओं के साथ जो समबन्ध है, वह गलत है और वह एक प्रकार की कुप्रथा है। कुँआर को पितृपक्ष कहना गलत है। अगर हमारे माँ-बाप या दादी बाबा जीवित हैं तो हमारे लिये सौभाग्यवश समस्त वर्ष ही पितृपक्ष है, क्योंकि हमको नित्य उनकी सेवा, सत्कार करना चाहिये, परन्तु यदि वह मर गये हैं तो कुँआर में ही कहाँ से आयेंगे। इसलिये श्राद्ध-तर्पण जीते हुओं का होना चाहिये।

यह बात मनुस्मृति के नीचे के श्लोकों से प्रकट होती हैः-

देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्च यः।

न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्रवसन्न स जीवति।।

– (मनु. 3/72)

इस पर मन्वर्थ मुक्तावली में कुल्लूकभट्ट की टीका इस प्रकार हैः-

देवतेति।। देवता शदेन भूतानामपि ग्रहणम्।

तेषामपि बलिहरणे देवतारूपत्वात्। भृतयः वृद्ध माता

पित्रोदयोऽवश्यं सवर्धनीयाः। सर्वत एवात्मानं गोपायेत् इति श्रुत्या आत्मपोषणमप्यवश्यं कर्त्तव्यम्।

देवतादीनां पञ्चानां योऽन्नं न ददाति स उच्छ्रवसन्नपि जीवित कार्याकरणान्नजीवतीति निन्दयावश्यकर्त्तव्यता बोध्यते।

यहाँ ‘पितृ’ का अर्थ ‘‘वृद्ध मातापित्रादयो’’ अर्थात् ‘‘बूढ़े माँ-बाप’’ स्पष्ट दिया है। यह श्लोक भी उसी प्रसंग का है जिसमें पाँच यज्ञों का वर्णन है। इसलिये हमारी यह धारणा ठीक है कि पितृयज्ञ बूढ़े माता-पिता का हेाता है न कि मरों का। इसमें कुल्लूक भट्ट ने ‘अन्न देने’ का भी वर्णन किया है। अर्थात् देवता, अतिथि, भृत्य, पितृ और आत्मा को अन्न देना चाहिये। इनमें जब मरे हुये अतिथि, मरे हुये भृत्य, मरे हुये आत्मा का वर्णन नहीं, तो ‘पितरों’ को ही मरा हुआ क्यों माना जाए? जिस प्रकार अतिथियज्ञ जीवित अतिथियों का है, इसी प्रकार पितृयज्ञ भी जीवित पितरों का होना चाहिये।

आगे के श्लोक से और भी स्पष्टता होती हैः-

ऋषयः पितरो देवा भूतान्यतिथयस्तथा।

आशासहे कुटुबियस्तेयः कार्य विजानता।

– (मनु. 3/80)

इस पर कुल्लूकाट्ट की टीका हैः-

एते गृहस्थेयः सकाशात्प्रार्थयन्ते। अर्थात् ऋषि, पितर, देव, भूत और अतिथि लोग गृहस्थियों से ही अन्न आदि की आशा रखते हैं। इससे भी स्पष्ट है कि ऋषि, देव, पितर और अतिथि सब जीवित ही हैं। मरे हुए नहीं।

अगले श्लोक से तो कोई सन्देह ही नहीं रहताः-

कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्ये नोदकेन वा।

पयोमूलफलैर्वापि पितृयः प्रीतिमावहन्।

– (मनु. 3/82)

अर्थात् (अहरहः) प्रतिदिन श्राद्ध करे। किस प्रकार? अन्न, जल, दूध, मूल, फल से। किसका श्राद्ध करे? पितृयः-पितरों का। किस प्रकार? प्रीतिमावहन् अर्थात् प्रेम से बुलाकर।

यहाँ तीन बातें कहीं हैं। (1) हर दिन श्राद्ध करे। (2) अन्न, जल, दूध, फल आदि से। (3) प्रीतिपूर्वक बुलाकर। यह तीनों बातें जीते हुओं में घट सकती हैं, मृतकों में नहीं। इसमें न तो कुंआर के पितृपक्ष का वर्णन है, न गया के पिण्डदान का, न कौओं को खिलाने का। जीते पिता-माता के लिये, जो बुड्डे हो गये हैं रोज-रोज श्राद्ध करने का विधान है।

फिर यदि मरे हुये पितरों का तात्पर्य होता तो उनको प्रीतिपूर्वक कैसे बुला सकते? क्या वे अपनी-अपनी योनि को छोड़कर आ सकते थे? कदापि नहीं। हम तो कभी नहीं देखते कि कोई जीव कुँआर के कृष्णपक्ष में अपने शरीर को छोड़कर श्राद्ध लेने के लिये जाता हो या जा सकता हो। मरे हुओं का श्राद्ध करना असमभव और असमबद्ध कार्य करने की कोशिश करने के समान है।

यहाँ एक प्रश्न उठता है कि संस्कृत शास्त्र में मृतक-श्राद्ध का वर्णन नहीं है। हम मानते हैं। स्वयं मनुस्मृति मृतक-श्राद्ध का बहुत से श्लोकों में वर्णन है। उनके लिये कहीं मांस के पिण्डों का वर्णन है, कहीं अन्य अण्ड-बण्ड बातों का। जैसे

द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन्मासान् हारिणेन तु।

औरन्भ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै।।

षण्मासांच्छागमांसेन पार्षतेन च सप्त वै।

अष्टावेणस्य मांसेन रारवैण नवैव तु।।

दशमासांस्तु तृप्यन्ति बराहमहिषामिषैः।

शश कूर्मयोस्तु मांसेन मासानेकादशैव तु।।

– (मनु. 31, 268, 169, 270)

अर्थात् मछली से दो मास के लिये, हिरण के मांस से तीन मास के लिये, भेड़ के मांस से चार मास के लिये, पक्षियों के मासं से पाँच मास के लिये, बकरी के मांस से 6 महीनों के लिये, चित्र मृग के मांस से सात मास के लिये, एण के मास से आठ, हरु के मास से नौ, सुअर और भैंसे के मांस से दस और खरगोश और कछुवे के मांस से 11 महीनों के लिये पितरों की तृप्ति होती है।

ऐसी अण्ड-बण्ड और हिंसायुक्त बातों को आज कोई पण्डित नहीं मानता। और न कहीं इस प्रकार के श्राद्ध किये ही जाते हैं। बात यह है कि मनुस्मृति में पीछे से स्वार्थी लोगों ने समय-समय पर अपने स्वार्थ की बातें मिलाकर उसको दूषित कर दिया है। इसी प्रकार अन्य शास्त्रों में भी बहुत मिलावट हुई है। बुद्धिमान् लोगों को थोड़े से विचार करने से ही पता चल सकता है।

हम कह चुके हैं कि मृतक-श्राद्ध न केवल अनुचित ही है, किन्तु असमभव भी है। हमारे पास कोई साधन नहीं है कि यदि हम घोर प्रयत्न करें तो भी उन जीवों को जो अपनी जीवित दशा में हमारे माता-पिता कहलाते थे कुछ खाना पानी पहुँचा सकें। मरकर प्राणी की दो ही दशा हो सकती हैं। या तो मुक्त हो गये या जन्म-मरण के फेर में हैं। यदि मुक्त हो गये हों तो मुक्त जीवों को खाना-पानी या श्राद्ध-तर्पण से क्या प्रयोजन? वह तो परमगति को पहुँच चुके। प्राकृतिक पदार्थों से उनका कुछ समबन्ध नहीं रहा। यदि वे जन्म ले रहे हैं और पशु, पक्षी या मनुष्य की योनि में हैं तो उन तक हम उनके शरीरों द्वारा ही पहुँच सकते हैं। केवल नदी में जलदान करने या ब्राह्मणों को खिलाने, या कौओं को खिलाने से उन तक कुछ भी नहीं पहुँच सकता। अतः यह सब व्यर्थ और भ्रममूलक है।

कुछ लोग कहते हैं कि हमारे कर्मों का उनको फल मिलता है, परन्तु यह तो महा अनर्थ है। वैदिक-सिद्धान्त में जो करता है, वही भोगता है। एक के कर्म का फल दूसरे को मिला करे तो बड़ा अन्याय हो जाए। ईश्वर जन्म तो मरते समय ही देता है। फिर हमारे कर्मों का फल हमारे मरे हुये पितरों को कदापि नहीं पहुँच सकता।

कुछ लोग श्राद्ध इसलिये करते हैं कि इस बहाने से ब्राह्मणों को भोजन देने का पुण्य मिल जाता है, परन्तु वह ठीक बात का विचार नहीं करते। हम ब्राह्मणों को भोजन खिलाने के विरुद्ध नहीं हैं, न कौओं या मछलियों को भोजन खिलाने के। क्योंकि विद्वान्, ऋषि, मुनि अथवा अतिथि ब्राह्मणों को खिलाना अतिथियज्ञ है और कौओं, चीटियों, मछलियों को खिलाना भूतयज्ञ है, परन्तु हमारा विरोध इस अज्ञान और धोखे से है। तुम यदि अतिथि यज्ञ करते हो तो अतिथियज्ञ के नाम से करो। भूतयज्ञ करते हो तो भूतयज्ञ के नाम से करो। करते तो हो भूतयज्ञ या अतिथियज्ञ और नाम रखते हो पितृयज्ञ का इससे खाने वाले और खिलाने वाले दोनों को भ्रम होता है। ब्राह्मणों को यज्ञ कहकर खिलाओ कि हम तुमको खिलाते हैं। कौओं को यह कह कर खिलाओ कि हम पक्षियों को खाना देते हैं। पितरों का बहाना क्यों करते हो! जो काम झूठ और अज्ञान के मिलाकर किया जाता है उससे पुण्य के स्थान में पाप होता है।

सच पूछिये तो मृतक-श्राद्ध का सिद्धान्त वैदिक नहीं है। या तो इसका आरमभ बौद्धों से हुआ है, जो मृतकों के आत्माओं की पूजा करते थे। या ईसाई-मुसलमानों से लिया है, जो पुनर्जन्म को नहीं मानते। पुराने मिश्र देश वालों को इस बात का ज्ञान न था कि मृत्यु के पीछे जीव का क्या होता है। इसलिये जब कोई मर जाता था तो उसकी लाश के साथ भोजन आदि भी कब्रों में गाड़ देते थे। वह समझते थे कि लाश को खाने की जरूरत होगी। जब कोई राजा मरता था तो उसकी रानियाँ भी साथ में गाड़ी जाती थीं। आजकल भी ईसाई और मुसलमानों को यह पता नहीं कि मृत्यु के पीछे जीवात्मा का क्या होता है। वह समझते हैं कि कब्र में जीवात्मा रहता है, इसीलिये वह कब्र पर फातिहा पढ़ते हैं, चद्दर चढ़ाते हैं और मन्नत माँगते हैं। वह समझते हैं कि जीव वहाँ मौजूद है। कुछ लोग समझते हैं कि क़यामत के दिन मुर्दे उठेंगे। यह सब ‘आत्मा’ के तत्व को न समझने और पुनर्जन्म न मानने का फल है। यदि ईसाई, मुसलमान मरे हुओं का श्राद्ध करते तो आश्चर्य न होता, क्योंकि उनको पुनर्जन्म और कर्म-व्यवस्था का पता नहीं, परन्तु बड़े आश्चर्य की बात है कि वैदिक-धर्म के मानने वाले हिन्दू भी ऐसे भ्रममूलक काम करते हैं, जबकि उनको आवागमन और कर्मफल-व्यवस्था का ज्ञान है।

वस्तुतः पितृयज्ञ यह है कि हम जीते हुये माता-पिता, आदि की सेवा करें। क्योंकि वह बुड्ढे हो गये हैं। अब वह धन कमाने के योग्य नहीं रहे। उन्होंने हमारे ऊपर उपकार किया है। हमको पाल-पोस कर बड़ा किया। उनका हमारे ऊपर कर्जा है, जिसको पितृऋण कहते हैं। पितृऋण के चुकाने का एकमात्र उपाय पितृयज्ञ है। माता-पिता की सेवा करने से हम अपने ऋण से उऋण होंगे। वह हमको आशीर्वाद देंगे और हमारा कल्याण होगा।

सच पूछिये तो मृतक-श्राद्ध पितृयज्ञ का बाधक है, साधक नहीं। हम नित्यप्रति आँख से देखते हैं कि बूढ़े माँ-बाप को कोई पूछता तक नहीं। वह अनेक प्रकार के कष्ट उठाते हैं। मरने पर उनका बहुत धन लगाकर श्राद्ध किया जाता है।

जियत पिता से दंगमदंगा।

मरे पिता पहुचाये गंगा।।

बहुत से बूढ़े लोग भी भ्रम में पड़े हैं। वे जीते जी खाते नहीं। एक-एक कौड़ी जोड़कर अपने श्राद्ध के लिये छोड़ मरते हैं। इस प्रकार वह अपने कर्त्तव्य की हानि करते हैं। यदि उनको दान ही करना था तो अपने जीते जी दान कर जाते, परन्तु वह दान नहीं करना चाहते, मानों दान को भी स्वार्थ के साथ मिलाकर दूषित कर रहे हैं।

जब तक लोग यह न समझेंगे कि पितृयज्ञ का मृतकों से समबन्ध नहीं, उस समय तक लोगों में सच्चे पितृयज्ञ के लिये श्रद्धा न होगी। और माता-पिता की उपेक्षा ही होती रहेगी।

बहाने मत खोजो। जो करना है उसको उद्देश्य समझकर और ज्ञानपूर्वक करो, तभी कल्याण है। गपोड़ों पर विश्वास मत करो।

 

hadees: BATHING AFTER A SEMINAL EMISSION

BATHING AFTER A SEMINAL EMISSION

There are a dozen ahAdIs (674-685) on the subject of bathing after a seminal emission.  Once Muhammad called out an ansAr who was in the midst of sexual intercourse.  �He came out and water was trickling down from his head.  Muhammad said: perhaps we put you to haste.  The man said yes.  The prophet said: When you made haste and semen is not emitted, bathing is not obligatory for you, but ablution is binding� (676).  In another hadIs, Muhammad says that when a man leaves his wife in the midst of an intercourse without having experienced orgasm, �he should wash the secretion of his wife, and then perform ablution and offer prayer� (677).  But when there is a seminal emission �bath becomes obligatory� (674).

Once there was a controversy on this point between some muhAjirs (�Emigrants� or �Refugees�) and some ansArs(�Helpers�).  One of them came to �Aisha for clarification, asking: �What makes a bath obligatory for a person?� She answered: �You have come across one well-informed.� Then she reported what Muhammad had said on the subject: �When anyone sits amidst fore parts of the woman, and the circumcised parts touch each other a bath becomes obligatory� (684).  And on yet another occasion, a man asked Muhammad whether a bath is obligatory for one who parts from intercourse with his wife without having had an orgasm.  The Prophet, pointing to �Aisha, who was sitting by him, replied: �I and she do it and then take a bath� (685).

author : ram swarup

Military court sentences Moscow mosque imam charged with justifying terrorism to 3 years’ imprisonment

Military court sentences Moscow mosque imam charged with justifying terrorism to 3 years’ imprisonment

Moscow, April 28, Interfax – The Moscow District Military Court has found Makhmud Velitov, the imam of Moscow’s Yardyam Mosque, guilty in the case of publicly justifying terrorism and sentenced him to three years in a general regime penal colony on Friday, an Interfax correspondent reported.

“The court is coming to the conclusion that the defendant’s guilt has been proved. [The court ruled] to find the defendant guilty of justifying terrorism, to sentence Velitov to three years in a general regime penal colony,” the judge said in a ruling.

Only the introductory and the operative parts of the court’s decision were read today, the court’s reasoning behind it will be disclosed later.

Investigators believe that on September 23, 2013, during prayers at the mosque located on Khachaturyan Street, Velitov, who holds the posts of the Council’s chairman and the imam of the religious organization, delivered a speech justifying the activity of one of the members of the terrorist organization Hizb ut-Tahrir al-Islami (banned in Russia).

As reported, during arguments in the court, prosecutor Yekaterina Rozanova sought to find Velitov guilty, sentence him to three years and six months in a general regime penal colony and deprive him of the right to engage in religious activity for three years.

The imam himself insists he is innocent.

source: http://www.interfax-religion.com/?act=news&div=13746

हदीस : मुहम्मद द्वारा रात को जन्नत का सफर

मुहम्मद द्वारा रात को जन्नत का सफर

”किताब अल-ईमान“ में अनेक अन्य विषयों पर भी विचार किया गया है, जैसे कि मुहम्मद द्वारा रात में यरूशलम जाना और कयामत के पहले दज्जाल तथा यीशु का आना। इस्लामी मीमांसा में इनका पर्याप्त महत्व है।

 

एक रात, अल-बराक (एक लम्बा सफेद जानवर, जो गधे से बड़ा पर खच्चर से छोटा था) पर चढ़कर मुहम्मद यरूशलम के मंदिर में पहुंचे। और वहां से विविध लोकों में या स्वर्ग के विविध ”वृत्तों“ में (जैसा कि दांते ने उन्हें कहा है) घूमते रहे-रास्ते में विभिन्न पैगम्बरों से मिलते हुए। पहले आसमान में उन्हें आदम मिले। दूसरे में यीशु। छठे में मूसा और सातवें में इब्राहिम। फिर वे अल्लाह से मिले, जिन्होंने मुसलमानों के लिए हर रोज पचास नमाजों का आदेश दिया। पर मूसा की सलाह पर मुहम्मद ने अल्लाह से अपील की और तब नमाजों की संख्या घटाकर पांच कर दी गई। ”पांच और फिर भी पचास“-एक प्रार्थना दस के बराबर मानी जासगी, क्योंकि ”जो कहा जा चुका है, वह बदलेगा नहीं“ (313)। इसलिए असर में अन्तर नहीं आएगा और पांच ही पचास का काम करेंगी।

 

रहस्यवादी भावना वाले लोग इस यात्रा को आध्यात्मिक यात्रा के रूप में समझते हैं। किन्तु मुहम्मद के साथी, और बाद के अधिकांश मुस्लिम विद्वान, यही विश्वास करते हैं कि यह यात्रा या आरोहण (मिराज) दैहिक था। मुहम्मद के समकालीन अनेक लोगों ने उनकी खिल्ली उड़ाई और इस यात्रा को एक सपना बतलाया। पर हमारे अनुवादक का तर्क है कि यात्रा पर यकीन नहीं किया गया, इसीलिए वह एक सपना नहीं थी। क्योंकि ”अगर वह सपना होता, तो उस पर इस तरह की प्रतिक्रिया नहीं होती। इस तरह के सपने तो किसी भी काल के किसी भी व्यक्ति की कल्पना में कौंध सकते हैं“ (टि0 325)।

author : ram swarup