समर्पित से भी अधिक समर्पित डॉ. धर्मवीर जी

समर्पित से भी अधिक समर्पित

डॉ. धर्मवीर जी

उदयपुर जाने से पहले ऋषि दयानन्द को अनेक भक्तों ने बड़े आग्रहपूर्वक रोका। उन्हें समझाया भी गया कि उदयपुर का प्रशासन ठीक नहीं है, राजव्यवस्था भी बिगड़ी हुई है। राजा विलासिताओं में फँसा हुआ है। महाराज! वहाँ के लोग अच्छे नहीं हैं, आप वहाँ सुरक्षित नहीं होंगे।

ऋषि दयानन्द ने ये सारी बातें सुनकर कहा कि चाहे मेरी उंगलियों को मोमबत्ती की तरह क्यों न जला दिया जाये, पर मैं सत्य सिद्धान्तों का प्रचार अवश्य करूँगा।

उपरोक्त इस घटना में एक व्यक्ति का सिद्धान्तों के प्रचार के लिये दीवानापन, पागलपन स्पष्ट दिखाई देता है। मानव जाति के दुःखों को अपना दुःख मानकर उन्हें दूर करने के लिये अपने जीवन तक को आहूत कर देने का उदाहरण ऋषि दयानन्द थे। आगे चलकर उनकी शिष्य परमपरा में स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम जैसे बलिदानियों की लबी शृंखला चलती गई और भारतभूमि ऐसे राष्ट्र-भक्त दिव्य बलिदानियों को पाकर गौरवान्वित हुई। ऋषि दयानन्द के बाद पं. लेखराम से प्रारमभ होकर यह शृंखला हिन्दी आन्दोलन, निजाम आन्दोलन, गौरक्षा आन्दोलन जैसी कड़ियों को जोड़ती हुई और लमबी होती गई। जब तक धर्म-समर में स्वयं को आहूत करने वाले योद्धा आते रहे, आर्य समाज पाखण्डों, अन्धविश्वासों, वेद विरोधियों के समुख और दृढ़ता के साथ बढ़ता गया।

कुछ समय से आर्य समाज में ये उत्साह, ये पागलपन, ये दीवानगी नदारद-सी दिखाई पड़ने लगी थी, इसलिये आर्य समाज लगातार अपना गौरव खोता जा रहा था। इस निराशा भरे वातावरण में भी एक दीपक था, जो लगातार स्वयं को जलाकर वर्तमान में आर्यजाति को प्रकाशित कर रहा था-आर्य समाज के आकाश का एकमात्र सितारा, जिसे आर्यजनता आशा की दृष्टि से देखती थी। निःस्वार्थ-भाव से ऋषि दयानन्द के मिशन में लगे कार्यकर्त्ताओं, युवकों के मन में हर समस्या का एकमात्र समाधान था-आचार्य धर्मवीर। ये वो नाम था जो कभी किसी से डरा नहीं-कभी भी नहीं। कभी झुका नहीं, कभी रुका नहीं। आर्य समाज का पूरा संन्यासी वर्ग इस आचार्य की विद्वत्ता व संन्यस्तता के सामने नममस्तक था।

पाठक वृन्द  सोच रहे होंगे कि इतनी बड़ी भूमिका किस बात को समझाने के लिये लिखी गई है। अनुभव कहता है कि किसी व्यक्ति की वास्तविकता उसकी निकटता व उसके व्यवहार से ही निखरकर सामने आती है। आचार्य धर्मवीर जी बलिदानियों की शृंखला में एक और कड़ी जोड़ गये या उन्होंने पूर्ण निष्ठा से जीवन समर्पित करके भी आर्यवाटिका को सींचा-ये वाक्य किसी प्रमाण की अपेक्षा तो नहीं रखते, पर फिर भी उनके जीवन से आने वाली पीढ़ी कुछ प्रेरणा ले सके, इसलिये उनके समर्पण का एक उदाहरण सप्रमाण दिया जा रहा है।

परोपकारिणी सभा, परोपकारी पत्रिका और गुरुकुल ऋषि उद्यान जिस ओहदे पर आज है, उसके पीछे एक नितान्त समर्पित व्यक्तित्व छिपा है, ऐसा समर्पण जिसे केवल समर्पण कहते मन नहीं मानता।

परोपकारी पत्रिका आर्य जगत् की शिरोमणि व प्रामाणिक पत्रिका है, पर कैसे बनी?

आचार्य धर्मवीर उन्हें जब भी जहाँ भी ऐसा लगा कि यहाँ विचारशील पाठकों की उपस्थिति है, यहाँ पत्रिका की उपयोगिता हो सकती है, उस स्थान के लिये उन्होंने निःशुल्क पत्रिका भेजना प्रारमभ कर दिया, चाहे इसके लिये अपनी जेब से ही धन क्यों न देना पड़ा हो। और एक बार जो पत्रिका का ग्राहक बन गया, उसे आजीवन पत्रिका भेजते ही रहे, चाहे शुल्क आया, या नहीं आया। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक कारणवशात् पत्रिका का ग्राहक बनने में असमर्थ होता तो तत्काल अपनी ओर से उसे पत्रिका भेजने लगते। उन्हें पाठक की पहचान थी, उनका उद्देश्य था-ऋषि दयानन्द को हर विचारशील मस्तिष्क तक पहुँचाना। इसी कार्य के लिये मॉरिशस निवासी श्री सोनेलाल नामधारी जी को लिखा गया उनका पत्र हम सबके लिये प्रेरणास्रोत है।

आचार्य धर्मवीर जी द्वारा सोनालाल जी को लिखा गया पत्रUntitled

प्रत्युत्तर में सोनालाल जी का पत्र

आदरणीय डॉ. दिनेशचन्द्र शर्मा जी,

सादर नमस्ते!

‘परोपकारी’ पत्रिका के दूसरे अंक में डॉ. धर्मवीर जी की अन्तिम यात्रा का समाचार पढ़ा। आर्य जगत् का एक कोना खाली दिखता है। उसकी कमी की पूर्ति असभव है। आर्यजगत् में फैले डॉ. धर्मवीर ऐसे सिकुड़कर नहीं रह रह सकते। वो सारे आर्यजगत् में व्याप्त लगते हैं और लगते रहेंगे। उनकी उदारता का बखान कहाँ तक किया जाय शद कम पड़ने लगेंगे। मैं भारतीय धार्मिक पत्रिकाओं का पाठक काफी वर्षों से रहा- परोपकारी, जनज्ञान, आर्यजगत्, टंकारा समाचार और सत्यार्थसौरभ। उम्र की थकावट और आर्थिक आय मद्धम-धारा के कारण मैंने पत्रिकायें लेना बन्द कर दिया, पर लगता है, डॉक्टर धर्मवीर जी आदरी रूप में अभी भी पत्रिका भिजवा रहे हैं। उनकी उपस्थिति न होने पर भी उनका आशीर्वाद प्राप्त हो रहा है। पाठकों की पहचान रखते हैं। हमारे पास है ही क्या जो उन्हें दे सकें? परिवार के  लिए मन से संवेदना प्रकट कर रहे हैं, आर्य जगत् का विस्तृत समाज उन्हें मन में बसाये रखेगा। उनके सपादकीय का तो कुछ कहना ही नहीं एक खाई अवश्य दीख रही है। ईश्वर के दरबार में वे सिंहासन पर ही विराज होंगे, ऐसी आशा है। आर्य जगत् को देखते हुये आशीर्वाद दे रहे होंगे।

स्वजनों को ईश्वर धीरज दे।

विशेष सूचना के आधार पर विशेषांक  के लिए उनका पत्र मेरे पास है भेज रहा हूँ। आशा है, छोटा कोना मिल ही जायेगा।

अग्रिम धन्यवाद!

पाठक

सोनालाल नेमधारी, आर्यभूषण

कारोलिन, वेल-पुर, मॉरिशस

हदीस : नैतिक निष्ठाएं

नैतिक निष्ठाएं

मुहम्मद का मजहब प्रधानतः मीमांसात्मक है। तथापि उसमें नैतिक निष्ठाओं की पूरी तरह उपेक्षा नहीं की गई है। इस्लाम-पूर्व काल में अरब लोग उन अनेक नैतिक निष्ठाओं में आस्था रखते थे, जो समस्त मानव-जात में समान रूप से मान्य रही है। मुहम्मद ने इन निष्ठाओं को कायम रहने दिया, परन्तु उन्हें एक साम्प्रदायिक मोड़ दे दिया। मुसलमान सभी मामलों में स्वयं को मिल्लत का ऋणी मानता है, दूसरों के प्रति आभार-भाव उसमें नगण्य होता है। मानव जाति के अंगभूत गैर-मुसलमानों के प्रति वह किसी भी नैतिक या आध्यात्मिक दायित्व की भावना नहीं रखता। उनके प्रति तो उसका भाव यही रहता है कि तलवार से, तथा लूट कर और जजिया लगाकर उनका मतान्तरण किया जाए। मसलन, सद्भाव एक सार्वभौम मानवीय निष्ठा है और हमें इसका व्यवहार करना ही चाहिए-सम्बन्धित व्यक्ति की राष्ट्रीयता अथवा उसके उपासना-पंथ का विचार किए बिना। किन्तु इस्लाम में, सद्भाव केवल मुसलमानों तक सीमित रहता है। एक जगह मुहम्मद ’अल-दीन‘ (’मजहब‘ यानी इस्लाम) की व्याख्या ”सद्भाव एवं शुभेच्छा“ के रूप में करते हैं जोकि किसी भी मजहब की एक सम्यक् परिभाषा होनी चाहिए। पर जब उनसे पूछा गया कि ”किसके प्रति सद्भाव एवं शुभेच्छा ?“ तब उन्होंने उत्तर दिया-”अल्लाह के प्रति, आस्मानी किताब के प्रति, अल्लाह के रसूल के प्रति, इस्लामी नेताओं-नायकों तथा सर्वसाधारण मुसलमान के प्रति“ (98)। जरीर बिन अब्दुल्ला बतलाते हैं कि उन्होंने ”प्रत्येक मुसलमान के प्रति सद्भाव एवं शुभेच्छा पर ही अल्लाह के पैगम्बर के प्रति निष्ठा प्रतिष्ठित की है“ (122)।

 

इसी तरह का मोड़ अन्य नैतिक निष्ठाओं में भी उभारा गया है और सार्वभौम को साम्प्रदायिक बना डाला गया है। मुहम्मद अपने अनुयायियों से कहते हैं-”किसी मुसलमान को अपशब्द कहना अपराध है और किसी मुसलमान से लड़ना कुफ्र है“ (122)।

लेखक : रामस्वरूप

दैनिक यज्ञ-प्रार्थना

दैनिक यज्ञ-प्रार्थना

पूजनीयप्रभोऽस्माकं।

क्रियतां भावमुज्ज्वलम्।

विना छलेन जीवाम।

बौद्धबलं प्रदीयताम्।।

सर्वे वदन्तु ऋग्वाणी।

जीवने सत्यधारणम्।

जीवन्तु मोदमानाश्च।

तरामः शोकसागरात्।।

अश्वमेधादियज्ञंतु।

यजन्तां नरपुङ्गवः।

सञ्चाल्य धर्म मर्यादां।

संसार सुलभामहै।।

श्रद्ध्या भक्त्या च नित्यं हि।

यज्ञादिकं यजामहै।

रोगपीडितविश्वस्य।

संतापं हर्त्तुमुद्यताः।।

मनसो भावना लुपेत्।

पापस्य पीडनस्य च।

पूर्णाः सन्तु मनोरथाः।

यज्ञेन नर-नारीणाम्।

लाभकारी भवेद् यज्ञः।

प्राणीं प्राणीं प्रति प्रभो।

जलवायुं तु सर्वत्र।

शुभगन्धसुधारकः।।

भूयात् प्रेमपथव्यासः।

व्रजेम स्वार्थ-भावना।

प्रत्येके व्यवहारे स्यात्।

इदन्न मम सार्थकम्।।

सप्रार्थयामहे नित्यं।

प्रभुप्रेमसमर्पितम्।

हे लोकनाथ! कारुण्य सर्वोपरि तवाशीषः।।

– डॉ. वेदप्रिय प्रचेता (जितेन्द्रनाथ)

वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी क्षेपक : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

आज कल हिन्दू जाति बहुत भी उप-जातियों में विभक्त है।  यह सब जन्म पर निर्भर है। अर्थात् ब्राहम्ण का पुत्र ब्रहम्ण होता है और कान्यकुब्ज ब्राहम्ण का कान्यकुब्ज। क्षत्रिय का लडका क्षत्रिय होता है। चैहान क्षत्रिय का चैहान । इसी प्रकार नाई का लडका नाई , कहार का कहार। वेदो मे इन उप जातियो के नाम तो है नही । हां चार  वर्णो का वर्णन आता है। अर्थात ब्राहम्ण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र। हिन्दूओं में यह जनश्रुति प्रचलित है कि ब्राहम्ण ईश्वर के मुख से उत्पन्न हुए, क्षत्रिय भुजाओं से वैश्य उरू से और शूद्र पैर से। परन्तु आज तक किसी भले मानस ने यह सोचने का कष्ट नहीं उठया कि इसका अर्थ क्या हुआ ? ईश्वर का मुख क्या है और उससे ब्राहम्ण कैसे उत्पन्न हो गये ? ईश्वर का पैर क्या है और उससे शूद्र कैसे उत्पन्न हो गये ? क्या यह आलक्डारिक भाषा है या  वास्तविक ? यदि आलंकारिक है तो वास्तविक अर्थ क्या है ? यदि वास्तविक है तो अर्थ क्या हुआ ? यदि कोई कहे कि आकाश के मुख से हाथी उत्पन्न हो गया तो पूछना चाहिये कि आकाश के मुख से क्या तात्पर्य है और उससे हाथी कैसे हो सकता है ? तमाशा यह है कि सैकड़ों वर्षो से हिन्दू यह कहते चले आते है कि ब्राहम्ण ईश्वर के मुख से उत्पन्न हुए और शूद्र पैरों से । परन्तु किसी ने  यह नही पूछा कि ईश्वर का पैर क्या है और उससे स्त्री या पुरूष कैसे उत्पन्न हो सकते है । लोग कहते है कि  वेद में ऐसा लिखा है। जिस वेदमंत्र का प्रमाण दिया जाता है वह यह कहता है:-

ब्राहम्णोऽस्य मुखमासीत् बाहू राजन्यः कृतः।

ऊरूतदस्य यद् वैश्यः पद्रयां शूद्रोऽजायत।।

शब्दार्थ यह है:-

(1) “ब्राहम्णः अस्य मुख आसीत्।” ब्राहम्ण इसका मुख था। “

(2) “बाहू राजन्यः कृतः” क्षत्रिय भुजा बनाया गया ।

(3) ”ऊरू तत् अस्य यत् वैश्यः”जो वैश्य है वह उसकी जंघा थी।

इसमें यह नहीं लिखा गया कि ब्राहम्ण मुख से उत्पन्न हुआ । क्षत्रिय बाॅह से और वैश्य जंघा से । अर्थ निकालने के दो ही  उपाय है या तो शब्दों से सीधा अर्थ निकलता हो या आलंकारिक अर्थ लेने के लिये कोई विशेष कारण हों। प्रत्येक शब्द के आलंकारिक अर्थ भी नही लेने चाहिये जब तक सीधा अर्थ लेना अप्रासंगिक न हो । और ऐसे आलंकारिक अर्थ भी न लेने  चाहिये जो असम्भव या निरर्थक हो।

अब देखना चाहिये कि ”ब्राहम्ण मुख से उत्पन्न हुआ“ ऐसा अर्थ निकलने के लिये क्या हेतु है ? ’मुख‘ का अर्थ ’मुखात्‘ नही हों सकता। यह स्पष्ट है । न आसीत् अर्थ उत्पन्न हुआ हो सकता है। ‘ऊरू तत् अस्य यद् वैश्यः“ “जो वैश्य है वही ऊरू है“ वाक्य की इस शैली से भी स्पष्ट है कि ऊरू से वैश्य के उत्पन्न होने की कल्पना बुद्धि-शून्य है। फिर यह सब अर्थ कैसे ले गया ? इसमें सन्देह नही कि समस्त पौराणिक साहित्य इस  प्रकार की प्रतिपत्ति सें व्याप्त हो रहा है । परन्तु इसकों वेदो का आधार तो नही मिल सकता। मंत्र के चौथे पाद में अवश्य “पद्भ्यां शूद्रः अजायत ” “पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ“ ऐसे  शब्द  हैं।  परन्तु इस पाद की प्रत्यनुवृत्ति पहले तीनो तक ले जाना ठीक नहीं। यदि कल्पना कीजिये कि चारों पादों में ऐसा ही होता कि ब्राहम्णोऽस्य मुखादजायत। इत्यसदि तो भी प्रसंग को देखकर कुछ और अर्थ लेना पडता क्योकि मुख या बाहू से तो मनुष्य उत्पन्न हो नहीं सकते और न पैरो से ,पूर्वापर देखने से अर्थ स्पष्ट हो जाते है क्योकि जो मंत्र हमने ऊपर दिये है उससे पहला मंत्र यह है:-

यत् पुरूषं व्यदधुः कविता व्यकल्पयन्। मुखं किमस्यासीत् कि बाहू किमूरू पादा उच्यते।

( यजु0 31।10 )

शब्दार्थ इस प्रकार है:-           यत् =जब

पुरूषं=पुरूष को

व्यदधुः=बनाया

क्तिधा=किस किस प्रकार से

मुख कि अस्य असीत्=इस का मुख क्या था ?

कि बाहू=भुजायें क्या थीं ?

किं ऊरू=जंघायें क्या थी?

पादा उच्येते= दोनो पैर क्या कहे जाते हैं अर्थात् किस नाम से पुकारे जाते हैं।

यहाॅ तो शूद्र के सम्बन्ध में भी न पंचमी विभक्ति है , न उत्पन्न होनक का सूचक शब्द है। केवल चार प्रश्न है कि पुरूष की किस किस रूप से कल्पना की गई है। अर्थात् किसको मुख माना गया , किसको बाहू, किसको ऊरू, किसको पैर ? इन प्रश्रों से उपमालंकार स्पष्ट है और उसी के अनुसार अर्थ लने चाहिये। उब्बट ने इसका अर्थ इस प्रकार किया है:-

1- “कति प्रकारं विकल्पितवन्तः”

2‘- “ब्राहम्णक्षत्रियवैश्यशूद्राः स्थिता इत्यर्थः”

( उब्बट- भाष्य )

महीधार कहते हैं

किं च पादौ उच्येते पादावपि किमास्तामित्यर्थः।

( महीधर – भाष्य )

इनसे स्पष्ट है कि यहाँ मुख आदि अंगो से ब्रहम्णादि के उत्पन्न होने की कथा न केवल असंगत किन्तु असंभव भी है और कोई थोडी सी बुद्धिवाला मनुष्य भी ऐसी अंड बंड कल्पना न कर सकेगा। हम महीधर के इन शब्दो से सहमत है कि

” प्रश्नोत्तर रूपेणब्राहम्णादिसृष्टि वक्तुं ब्रहम्वादिनां प्रश्रा उच्यन्ते।”

अर्थात प्रश्न-उत्तर रूप् से ब्राहम्ण आदि की सृष्टि का कथन करने के लियें ब्रहम्वादियों के प्रश्न कहे जाते है ।

इस मंत्रो का सीधा , सुसंगत तथा युक्ति-युक्त अर्थ यही है कि यह जो पुरूष-संघ या मनुष्य जाति है उसमें मुख ब्राहम्ण हैं, बाहू क्ष़ित्रय, ऊरू वैश्य पैर शूद्र। अर्था सबसे उत्कृष्ट ज्ञानवान नेता ब्राहम्ण कहे जाने के योग्य है। बाहू के तुल्य रक्षा करने वाले क्षत्रिय कहे जाने के योग्य है । ऊरू के तुल्य धन संचय करने वाले वैश्य और निम्न श्रेणी के लोग शूद्र । मनुस्मृति के निम्न श्लोक से भी यही ज्ञात होता है:-

विप्राणां ज्ञानेतों ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः।

वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणमेव जन्मतः।।

( 2। 155)

ब्राहम्णों में बडप्पन ज्ञान की अपेक्षा से है, क्षत्रियों में शक्ति की अपेक्षा से वैश्य में धन -धान्थ से और शूद्रों में जन्म से । अर्थात् जन्म के द्वारा बडप्पन मनुष्य की निकृष्टतम वृत्ति है। नीचे के श्लोको में ब्रहम्ण आदि के जो कत्र्तव्य बताये गये है वह भी इसी दृष्टिकोण को बताते है:-

अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।

दान प्रतिग्रहं चैव ब्रहम्णानामकल्पयत्।।

प्रजानां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च ।

विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः।।

पशूनां रक्षणं दानमिज्याऽध्ययनमेव च ।

वणिक् पथं कुसीदंच वैश्यस्य कृषिमेव च।।

एवमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्।

एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया।।

( मनु0 1।88-91 )

यहाॅ प्रश्न हो सकता है कि इनसे पहले श्लोक में “मुख बाहूरूपज्जाना“ का  क्या अर्थ अन्य प्रसंगों से अर्थ निश्चित हो गये तो इस वाक्य का अर्थ कुछ अड़चन नहीं डाल सकता । “जनी प्रादुर्भावे” ‘जन’ धातु का अर्थ है प्रादुर्भाव जिसके ’जायते‘ ‘अजायत’ आदि रूप् है। इसलिये जब मुख बाहू आदि से उत्पन्न होना एक असंभव बात हो गई तो ऐसे वाक्यों का यही अर्थ लेना चाहिये कि मुख आदि रूप से जिनका प्रादुर्भाव हुआ। अर्थात् जो पुरूष मुख बाहू आदि रूप् से काय्र्य करते है।

मृत-पितरों का श्राद्ध, तर्पण आदि: पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

यह दूसरी मिलावट है। ऊपर बताया जा चुका है कि

पितृयज्ञस्तु तर्पणम्

(मनु0 3।70)

पितृयज्ञ को तर्पण कहते है। साधारण हिन्दू समझता है कि तर्पण मरे पितरों को पानी देने का नाम है । मनु के इस श्लोक से तो मृत पितरो की गंध नही पाई जाती । इसी श्लोक का भाष्य करते हुए कुल्लूक भट्ट लिखते हैं:-

‘अन्नाद्येनोदकेन वा’ इति तपणं वक्ष्यति स पितृयज्ञः। अर्थात् तर्पण में अन्न पानी देने का विधान आगे कहेगे। यही पितृयज्ञ हैं। जिसके विषय में वक्ष्यति (आगे कहेंगे ) लिखा है। वह श्लोक यह है:-

कुर्यादहरहः श्राद्धमत्राद्येनोदकेन वा ।

पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्।।

अर्थात पितरों को प्रीतिपूर्वक बुलाकर खना, पानी, दूध, मूल फल से प्रति दिन श्राद्ध करे इस श्लोक के होते हुए कौन कह सकता है कि यहाॅ मृत पितरो को रोज बुलाने का विधान है ? इन दोनो श्लोको और कुल्लूक की टिप्पणी को देखकर प्रतीत होता है कि जिसको तर्पण कहते है और दूसरे में श्राद्ध है । एक श्लोक में तर्पण शब्द आया है और दूसरे में श्राद्ध। बात एक ही है प्रबन्ध करना । “अन्नद्य” वैदिक ग्रन्थों का एक परिचित शब्द है जो इसी अर्थ में आता है। मरे हुए पितरों को प्रीतिपूर्वक बुलाने का कुछ भी अर्थ नहीं । वह आ ही कैसे सकते है ? वैदिक सिद्धान्तानुसार तो उनका दूसरा जन्म हो जाता है और जो पुनर्जन्म को नही मानते वह भी मृत आत्मा की कुछ न कुछ गति तो मानते ही है उनक ेमत में भी मृतकों का बुलाना असम्भव है। मृतको को खाना पानी पहुॅचाने की प्रथा कहाॅ से चली यह कहना कठिन है। साधारणतया तो यह प्रथा बहुत पुरानी मालूम होती है। दो सहस्त्र वर्ष से अवश्य पुरानी है, इसलिये समस्त तत्कालीन साहित्य में इतस्ततः इसके उदाहरण मिलते है। मर कर आत्मा की क्या गति होती है इसके विषय में प्राचीन मिश्र आदि देशो की जातियों में भिन्न मत थे। आत्मा के साथ प्रेम करते-करते हमको शरीर से भी प्रेम हो जाता है। यह शरीर का प्रेम ही है जिसके कारण लोगों ने मृतक की लाश का अपने प्रकार से आदर-सम्मान करके की प्रथा डाल ली। वैदिक सिद्धान्त तो यह था कि

भस्मान्त  शरीरम्

(यजुर्वेद 40।15 )

आर्थात् मरने पर लाश को जला देना चाहिये । मनु 2।16 से भी ऐसा ही पाया जाता है। यही सब से उत्तम रीति थी। क्योकि पांच भौतिक शरीर को बिना सडे गले अपने कारण में लय कराने की अन्य कोई विधि नही है । परन्तु जो लोग मृत्यु के तत्व को नही समझते थे वह उसी प्रकार मृतक के शव को सुरक्षित रखने का प्रयव करते थे जैसे बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को गले से चिपटाये फिरा करती है । शव को सुरक्षित रखने के कई प्रकार प्रचलित हो गये। मिश्र देश में लाश के भीतर मसाला लगाकर शरीर के ऊपरी भाग को सुरक्षित रखने की प्रथा थी । कुछ लोग समझते थे कि आत्मा को परलोक यात्रा के लिये खना पानी रख देने की आवश्यकता है जैसे यात्रा पर चलते समय लोग साथ भोजन बाॅध लेते हैं। इस प्रकार लोग लाश के साथ भोजन या पिण्ड रखने लगे। ’पिंड‘ शब्द का मौलिक अर्थ भोजन था जैसे कि नीचे के उदाहरणो से ज्ञात होता है:-

(1) तथेति गामुत्कवते दिलीपः सद्यः प्रतिष्टम्भविमुक्त बाहुः।

सन्यस्त शस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत् पिंडामवामिषस्य।।

(रघुवंश 2।51 )

(2) न शोच्यस्तत्र भवान् सफलीकृतभर्तृ पिंडः।

(मालविकाग्रिमित्र पंचमोऽक्कः )

(3) लांगूलचालनमधश्ररणाव पातं

भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च।

श्रा पिंडदस्य कुरूते गजपुंगवस्तु

धीर विलोकयति चाटु शतैश्य भुक्ते।।

(भर्तृहरि नीतिशतकम् 31 )

यब यह लोग लाश के साथ पिंड रखते थे तो यह जानने का यत्न नही करते थे कि यदि आत्मा यात्रा पर चली गइर्    तो भी वह लाश से तो निकल ही गई । लाश के साथ भोजन रखने से क्या प्रयोजन ? आत्मा मरने के पश्चात् कहीं जाय, चाहे नष्ट हो जाय चाहे अन्यत्र चली जाय। कम से कम इतना तो मानना ही पडेगा कि उसका इस शरीर के साथ सम्बन्ध टूट गया। जीवन और मृत्यु मे क्या भेद ? यह न कि जब तक जीव शरीर के साथा है जीवन है जब साथ छूट गया तो मृत्यु हो गई। इस प्रकार मृतक के शव के साथ भोजन या पिंड रखना कुछ अर्थ नही रखता। परन्तु मनुष्य मे मोह होता है। वह अज्ञानवश मृत्यु के तत्व को भूल जाता है और मृतक की लाश से ही प्रेम करने लगता है। कवरो पर फातिहा पढने की प्रथा भी इसी अज्ञान की द्योतक है । लोग कबरों पर चादर चढा कर समझते है कि आत्मा उस कबर में कही चिपटी हुई है  पिंड के यह मौलिक अर्थ पीछे से बदल गये और पिंड शब्द आटे के उन पिंडो का अर्थ देने लगा जो आजकल मृतक के नाम पर दिये जाते है ।

जब एक बार कोई प्रथा चल पडती है तो उसके लिये युक्तियाॅ भी गढ ली जाती हैं, चाहे वह प्रथा कितनी ही भ्रमात्मक क्यों न हो। भिन्न भिन्न देशों के इतिहास मे इस प्रकार की युक्तियाॅ मिलती हैं। जिन देशो में पुनर्जन्म मानने की प्रथा जाती रही वहाॅ के लोगों का विचार था कि आत्मा शरीर से निकलकर विक्षिप्त अवस्था में इधर उधर फिरती रहती है। उसकी शांति के लिये कुछ कृत्य करना होता है। भारतवर्ष के हिन्दुओं ने भी एक युक्ति गढ ली कि भौतिक शरीर के त्यागने पर जो लिंग शरीर रह जाता है उसकी पुष्टि पिंडदान द्वारा की जाती है। मौनियर विलियम्स ¼Monier Williams½  ने हिन्दुओं के श्राद्ध के विषय मे लिखा हैं।

‘’It is performed for the benefit of a deceased person after he has regained an intermediate body and become a pitri or beatified father’’ . (Brahmanism p. 285)

अथार्त मृतक के आत्मा के ’पितृ‘ हो जाने पर उसके लिंग शरीर के लाभार्थ श्राद्ध किया जाता हैं। परन्तु लोग यह सोचने का कष्ट नहीं उठते कि श्राद्ध करके या पिण्डदान करके लिग्ड शरीर को किस प्रकार लाभ पहुॅचाया जा सकता है । साधारणतय तीन पीढियों तक श्राद्ध किया है । इससे भी प्रतीत होता है कि जीवित पिता, पितामह, प्रपितामह, आदि के श्राद्ध तर्पण का ही बिगडकर यह रूप हो गया है। लिंग शरीर को इन तीन पीढियों तक ही क्यों लाभ पहुॅचता है और लिंग शरीर इतने दिनो पुनर्जन्म के लिये क्यो ठहरा रहता है, यह एक ऐसी समस्या है जो मृतक श्राद्ध के ढकोसले को आगे बढने नही देती।

कुछ लोगों ने पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति को मृतक श्राद्ध के पक्ष में लिया है। पुत्र कहते है पुत् नाम नरक से जो बचावे उसको । लोग कहते है कि पुत्र जब श्राद्ध करेगा तो पिता नरक से बच सकेगा। यदि किसी का पुत्र श्राद्ध नहीं करता तो उसका नरक से त्राण भी नहीं होने का । परन्तु ऐसी धारणा करने वाले कर्म के सिद्धान्त को नही समझते । मौनियर ने इस विषय में एक चुभता हुआ नोट दिया है:-

It is wholly inconsitant with the true theory of Hinduism that the Shraddha should deliver a man from the consequence of his own deeds. Manu says ‘‘ Iniquity once practiced, like a seed, fails not to yield its fruit to him that wrought it.’ ( iv 173 ) but Hinduism bristles with such inconsis tencies.

( Brahmanism,page 28 )

अर्थात् यह बात हिन्दू धर्म के सिद्धान्त के सर्वथा विरूद्ध है कि श्राद्ध के द्वारा मनुष्य अपने निज कर्मो के फल से बच सके  क्योकि मनु 4।173 मे लिखा है कि एक बार किया पाप बीज के समान फल लाने से नही रूक सकता। परन्तु हिन्दू धर्म इस प्रकार के परस्पर-विराधों से भरा पडा है। ” वस्तुतः बात भी ठीक है । जब मनुष्य अपने कर्मो के अनुसार ही दूसरी योनि पाता है तो उसके पुनर्जन्म को उसकी सन्तान के कर्मो के आधीन कर देना कहाॅ का न्याय है ?

शायद पाठक कहें कि फिर पुत्र को नरक से बचाने वाला क्यों कहा ? क्या निरूक्त में यास्क ने पुत्र की यह व्युत्पत्ति नहीं की ? हमारा उत्तर यह है कि व्युत्पत्ति तो ठीक है। केवल समझ का फेर है। प्रथम तो यह धारणा भ्रम-मूलक है कि पुत्र केवल लडके को ही कहते है लडकी को नहीं ।

यास्क के निरूक्त में यह श्लोक मिलता है:-

अविशेषण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः।

मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भवोऽब्रवीत्।।

अर्थात् धर्म के अनुसार लडका और लडकी दोनो को बिना विशेषता के दायभाग मिलता है। ऐसा स्वायम्भव मनु ने कहा था।    दूसरे, सन्तान को नरक का त्राता कहने का तात्पर्य यह है कि सन्तानोत्पत्ति करके और उसका यथोचित पालन करके मनुष्य ’पितृ-ऋण‘ से छूट जाता है। बिना ऋण चुकाये मोक्ष का भागी होना कठिन है। सन्तान को धर्मात्मा और सुशिक्षित छोड जाना एक प्रकार से मृतक के आत्मा के लिये भी लाभदायक है। क्योकि पिता मरकर जब जन्म लेगा तो उसी प्रकार के घरों में जैसे उसने छोडा है। यदि सन्तान अधर्मी और विद्याहीन है तो आने वाले समाज की अवस्था भी बुरी होगी। और जो आत्मा मरकर जन्म लेगी उसको इसी बुरे समाज के नरक रूपी गढे मे पडना जिससे उसका अगला विकास बन्द हो जायगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संतान मनुष्य को नरक से बचाती है, परन्तु पिंड देकर नहीं किन्तु सामाजिक वातावरण को शुद्ध करके। यदि इस दृष्टि से देखा जाता तो मौनियर विलियम्स को हिन्दू धर्म में इतना विरोध दिखाई न पडता। परन्तु जब हिन्दुओं ने स्वयं ही आपने सिद्धान्तों को बिगाड  रखा हो तो विदेशियो का क्या दोष ?

भारतवर्ष में यह प्रथा कब से चली इसमें सन्देह है। भारतवर्षो पहले भी पुनर्जन्म को मानते थे और अब भी मानते है। बौद्ध और जैन मतों ने वेदो को मानना त्याग दिया था, परन्तु पुनर्जन्म पर वह भी उसी भाॅति विश्वास रखते थे। दूसरे देशों के अति प्राचीन इतिहास तो पुनर्जन्म का पता देते है परन्तु पीछे के लोगों ने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को त्याग दिया और वे मृत-आत्माओं की भाति -भाति से पूजा करने लगे। इसका प्रमाण पूर्वी तथा पश्चिमी देशो के इतिहास से मिलता है। बौद्धमत का जब चीन, जापान, ब्रह्मा आदि देशों मे प्रचार हुआ तो बौद्ध लोग भी मृत-आत्मा के उपासक बन गये । बौद्धो का सिद्धान्त आत्मा के विषय मे वहीं नहीं है। जो वोदों का है। बौद्धों का आत्म-विज्ञान वाद भारतवर्ष के अन्ंय मतों के आत्मा-विषयक भिन्न-भिन्न वादो से भेद रखता है। वे आत्मा को एक स्थायी पदार्थ नही मानते। इनका निर्वाण भी वैदिक अपवर्ग से भिन्न है। श्री शंकराचार्य ने वेदान्त भाष्य में इसका कई स्थानो पर उल्लेख किया है। महात्मा बुद्ध की मृत्यु के प्श्चात् उनके उपासक उनको पूजने लगे थे । पूजा का यही अर्थ है कि वह मृत आत्मा को पूजते थे। यद्यपि महात्मा बुद्ध की जातक में मृतक श्राद्ध का उल्लेख मिलता है और चार्वाक आदि की पुस्तको में मृतक-श्रद्ध का खंडन आता है तथापि बौद्धों ने मृत आत्मा की पूजा के प्रचार मे कमी के बजाय बढती ही की। इसका चिह यह है कि भारतवर्ष के भिन्न भिन्न तीर्थ स्थानों में जो भिन्न कारण से वर्तमान प्रसिद्धिद को प्राप्त हुए है गाया का तीर्थ-स्थान केवल मृतक-श्राद्ध और तर्पण के लिये प्रसिद्ध है। गय के तीर्थ होने का पता बुद्ध-भगवान से पहले नही मिलता।

मनुस्मृति मे तो ‘गया’ का नाम है ही नही । याज्ञवल्क्य में श्राद्ध, तर्पण के सम्बन्ध में गया का नाम आया हैं:-

यद् ददाति गयास्थश्च सर्वमानन्त्यमश्नुते।

तथा वर्षात्रयोदश्यां मद्यासु च विशेषतः।।

( याज्ञवल्क्य 1।261 )

याज्ञवल्क्यस्मृति स्पष्टतया ही बुद्ध भागवान के बहुत पीछे की है। हमरी धारणा है कि गया को इस कीर्ति के दाता बुद्ध भगवान ही थे । जब बैद्धों तथा पौराणिकों में विग्रह आरंम्भ हुआ और बौद्धों को पराजय तथा पौराणिकों कों वियज प्राप्त हुई तो बौद्धों का मन्दिर इनके हाथ लग गया और अभी तक उसी भाॅति चला आता है। पौराणिक धर्म की नई विशेषताओं का निरीक्षण करने से भली भाॅति ज्ञात होता है कि प्राचिन वैदिक धर्म के विकृत रूप में यदि बौद्ध और जैन मत की पोट दे दी जाय तो परिणाम पौराणिक मत होगा। पौराणिक मत के गन्थों और बौद्ध तथा जैन ग्रन्थों में इस बाह्म रूप में बहुत बडा साहश्य है । देवी देवता, अवतार , तीर्थकर, मृतियाॅ, मन्दिर, पूज्य पुरूषों के जन्म तथा आयु से सम्बद्ध गाथायें सब मिलते जुलते है। इसी युग मे वैदिक ग्रन्थों मे मिलावट भी बहुत हुई है। हमारी धारणा है कि श्राद्ध और तर्पण का मृतको के लिये विधान इसी मिलावट का फल स्वरूप है। कुछ लोग कह दिया करत है कि यदि मिलावट होती तो उनके प्रमाण इस बहुतायत से न मिलते। वे दो बातों पर विचार नहीं करते। प्रथम तो बौद्ध मत की आॅधी का वेग बहुत जोर का था। उसने भारतीय जीवन के भी विभागों में अपना हस्ताक्षेप किया था। दूसरे यह कि इस युग को दो सहस्त्र वर्ष के लागभग हो गये । इतने समय में जातियाॅ कही की कहीं पहुँच जाती है। यदि पिछले पचास वर्ष के केवल हिन्दी के साहित्य का समालोचनात्मक अध्ययन किया जाय तो पचास वर्ष पहले के और अब के सिद्धान्तों में बहुत बडा भेद मिलगा। यूरोपियन जातियों के साहित्य में सौ वर्ष पहले विकासवाद का चिन्ह भी न था । डार्विन के पश्चात् विकासवाद ने सभ्य देशों के साहित्य के सभी विभागों पर इतना बलपूर्वक आक्रमण किया कि अब काव्य, विज्ञान, इतिहास, दर्शन सभी पर विकासवाद  का ठप्पा है । इसलिये यह कोई आश्चय-जनक बात नहीं है यदि पितृ-यज्ञ को जीवित पितरों के स्थान पर मृत-पितरों के लिये मान लिया गया मनु0 अध्याय 3।83 श्लोक इस प्रकार हैः-

एकमप्याशयेद् विप्रं पित्रर्थे पान्चयज्ञिके।

न चैवात्राशयेत् कंचिद् वैश्रवदेवं प्रतिद्विजम्।।

”पंच यज्ञ सम्बन्धी पितृ-यज्ञ में एक ब्राहम्ण को भी भोजन कराना पर्याप्त है। परन्तु वैश्रदेव के सम्बन्ध में किसी ब्राहम्ण को भोजन न करावे।

यह श्लोक और आगे के कई श्लोक मृतक-श्राद्ध के गौरव के हेतु ही जोडे गये है और इस अध्याय के अंन्त में तो मृतक श्राद्ध की वह विधियाॅ दी गई है जो आजकल के पौराणिकों को भी चक्कर में डलती है और उनको कहना पडता है कि मनुस्मृति कलियुग के लिये है ही नहीं।

मृमक-श्राद्ध का प्रभाव  दायभाग पर भी पडा़ है। हम ऊपर कह चुके है कि पिंड का अर्थ भोजन है। पिंड का दूसरा अर्थ है उस भोजन से बना हुआ शरीर। पिंड का हिन्दी पय्र्याय लोथडा़ प्रसिद्ध ही है। जैसे मृत-पिंड़ अर्थात् मिट्टी का लोथडा़। पिंड के इसी अर्थ से सम्बद्ध ’सपिंड’ है जिसका अर्थ है एक ही शरीर से सम्बन्ध रखने वाला । अर्थात् एक ही माता-पिता की सन्तान या एक ही परिवार का । याज्ञवल्क्य स्मृति आचाराव्याय विवाह प्रकरण में यह श्लोक है:-

अविलुप्तब्रहम्चर्यो लक्षण्यां स्त्रियमुद्वहेत्।

अनन्यपूर्विकां कान्तामसपिंडां यवीयसीम्।

( याज्ञ0 1।52 )

’असपिंडां समान एकः पिंडो देहो यस्याः सा सपिंडा न संपिंडा असपिंडा ताम्। सपिंडता च एकशरीरावयवान्येन भवति। तथा हि पुत्रस्य पितृशरीरावयवान्वयेन पित्रासह । एवं पितामहाहदभिरपि पितृद्वारेण तच्छरीरावयवान्वयात्। एवं मातृशरीरावयवान्वयेनम मात्रा। तथा मातामहादिभिरपि मातृद्वारेण। तथा मातृष्वसृमातुलादिभिरप्येकशरीरावयवान्वयात्। तथा पितृस्वस्त्रादिभिरपि। तथा पत्यासह पत्न्या परस्परमेकशरीरारब्धैः सहैक शरीराम्भकत्वकन। एवं यन्त्र यन्त्र सपिंडशब्दस्तत्र तत्र साक्षात् परम्परया वा एक शरीरावय वान्वयो वेदितव्यः ।‘

बतलाना यह था कि ऐसी युवती कन्या से विवाह करे जो ’असपिंडा‘ हो यहाँ विज्ञानेश्वर कहते हैं कि ’असपिंड‘ वह है जो सपिड न हो । पिंड कहते हैं देह को । जिसकी एक देह हो वह सपिंड है। शरीर के अवयवो के अन्वय से सपिंडता होती है। पुत्र के शरीर में पिता के शरीर के अवयव होते है इसलिए पिता और पुत्र सपिंड है। इसी प्रकार से पितामह के शरीर के अवयव पिता के द्वारा पुत्र के शरीर में आते है। इसलिये पितामह भी पौत्र का सपिंड है। इसी प्रकार माता के शरीर के अवयव भी पुत्र के शरीर में आते है। इसलिये माता और पुत्र सपिंड हुए। इसी प्रकार नाना के शरीर के अवयव भी माता के द्वारा पुत्र मे आते है इसलिये नाना भी दौहित्र का सपिंड हुआ। इसी प्रकार मौसी और मामा के साथ भी सपिंडता होती है। इसी प्रकार चाचा और फूफी के साथ भी इसी प्रकार पति और पत्नी की सपिंडता आरम्भ हो जाती है । इसी प्रकार भौजाइयों के साथ भी । इस प्रकार जहाॅ जहाॅ सपिंड शब्द है वहाॅ वहाॅ सीधा या परम्परा से शरीर के अवयवों का अन्वय समझना चाहिये।

विज्ञानेश्रवर ने यहाॅ बडी उत्तम रीति से ’सपिंड‘ शब्द का अर्थ समझा दिया। जो लोग यह समझते है कि ‘सपिंड’ शब्द मृतक-श्राद्ध के पिंडो से सम्बन्ध रखता है वे भारी भूल करते है और पिंड के मौलिक अर्थों को त्यागकर उसके गौण और कल्पित अर्थ ले लेते है।  दायभाग का भी मुख्य प्रयोजन यही था। अर्थात् पिता के शरीर के अधिकांश अवयव पुत्र के शरीर में विद्ययमान है। पितामह की सम्पत्ति के कई पौत्र अधिकारी है, क्योकि पितामह से शरीर के अवयव बॅंटकर  पौत्रो तक पहुँचते है। पुत्र के शरीर में अधिक अवयव पिता के शरीर के होते है और पितामह के शरीर के कम । परिवार और कुटुम्ब के पुरूषो का अधिकार इसी अपेक्षा से कम होता जाता है। संभव है कि जब मृतक-श्राद्ध की परिपाटा चल पडी तो श्राद्ध करने का कर्तव्य भी उनका अधिकार ठहरा जो सपिंड थे। अर्थात् जिनके शरीर में अपने पूर्वजो के शरीर के अधिक अवयव थे । पीछे से सपिंड शब्द का अर्थ उलट गया । सपिंड इसलिये नहीं है कि पिंड देता है, किन्तु इस लिये है कि पिंड अर्थात् देह के  अवयवों का साझी है । यह भी कुछ कम आश्र्चय-जनक बात नहीं है कि वेदों में ’सपिड‘ शब्द कही नही आया। एक स्थान पर अर्थात् ऋग्वेद, 1।62।19 या यजुर्वेद 25।42 में ’पिण्डानां’ शब्द आया है।  और इसी वेद-मंत्र में उसका पय्र्याय ’गात्रारंभान्‘ पड़ा हैं। और इससे सिद्ध होता है कि पिण्ड का अर्थ शरीर है। और मृतक-श्राद्ध और दायभाग में कुछ भी सम्बन्ध नही है। पितृ शब्द का अर्थ बहुत से लोग मृत पितरों का हो लेने लगे हैं और वेद के कई मंत्रो में आये हुए ‘पितरो’ का अर्थ ऐसा ही मान बैठे है । यहाॅ सायणाचार्य के  ऋग्वेद-भाष्य से एक उदाहरण ही पय्र्याप्त होगा। ऋग्वेद मण्डल 1, सूत्र 106 का 3 रा मंत्र यह है:-

अवन्तु नः पितरः सुप्रवाचना उतदेवी देवपुत्रे ऋतावृधाः।

( ऋ0 1।106।3 )

इस प्रकार श्री सायणार्चाय लिखते है:-

नोऽस्मान् पितरोऽग्निष्वात्तादयोऽवन्तु। रक्षन्तु। कीघ्शाः। सुप्रवाचनाः सुग्वेन प्रवक्तुं स्तोतुं शक्याः।

अर्थात् अग्निष्वात्ता आदि पितर हमारी रक्षा करे । कैसे ? जो भीली भाॅति बातचीत करने में समर्थ है। यहाॅ अग्निष्वात्ता शब्द इसलिये दिया है कि ऋग्वेद के एक और मंत्र की ओर संकेत है जहाॅ इस शब्द का प्रयोग हुआ है।

दायभाग सम्बन्धी श्लोकों के विषय में हम आगे भी कहगें। जहाॅ केवल श्राद्ध-सम्बन्धी संकेत कर दिया गया है।

मांस भक्षण और मनुस्मृति : पण्डित गंगा प्रसाद उपाध्याय

( 1 ) मासं भक्षण सम्बधी- ऊपर बताया जा चुका है कि मनुस्मृति का मौलिक सिद्धान्त मासं भक्षण सम्बन्धी अहिसा है। वेद मे अहिसा पर विशेष बल क्षेपक दिया गया है। यजुर्वेद कहता है:-

मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।

अर्थात प्रत्येक प्राणी को मित्र की दृष्टि से देखना चाहिये। न केवल वैदिक किन्तु सभी धर्मो का आधार अहिंसा होनी चाहिये। यदि मनुष्य दूसरों  को कष्ट पहुॅचान में संकोच न करे तो सदाचार के किसी भाव का पालन नहीं कर सकता । मनुस्मृति ने इस बात को बहुत स्पष्ट रीति से वर्णन किया है, इसलिये जहाॅ कहीं पशु-वध का विधान है वह सब मिलावट है । कुछ लोग समझते है कि यज्ञों में पशु-वध विहित है। परन्तु मनुस्मृति के मौलिक सिद्धान्त इस बात की पुष्टि नही करते। देखिये:-

पन्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषयुपस्करः।                                                                                   कएडनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन्।।                                                                                                                                                                   (3।68)

यहाॅ गृहस्य के पाॅच ऐसे पातकों का उल्लेख किया जो प्रत्येक गृहस्थी को बिना जाने बूझे करने पडते है। जैसे, चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली, और घडौची। इनके  प्रयोग से छोटे छोटे कीडे दबकर मर जाते है । गृहस्थियों को यह हिंसा बिना इच्छा के ही करनी पडती है। वे नहीं चाहते कि किसी को पीडा दें, परन्तु पहुॅच जाती है। जिस धर्म में अनजाने चीटियों के मर जाने से भी मनुष्य दोषी ठहरता हो उसमे जान-बूझकर किसी को मार डलना कितना बडा पाप न होगा। इसी सूना दोष मिटाने के लिये एक प्रकार के दैनिक प्रायश्चित के रूप में महायज्ञों का विधान है:-

तासां क्रमेण सर्वासां निष्कृत्यर्थ महर्षिभिः।

पन्च क्लप्ता महायज्ञाः प्रत्यहं गृहमेधिनाम्।।

ये पाॅच महायज्ञ यह है:-

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।

होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथि पूजनम्।।

ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, बलिवैश्वयज्ञ और नरयज्ञ। लोग यह समझते है कि यज्ञ और पशु वध का विशेष सम्बन्ध है। यज्ञ का अर्थ ही बहुत लोग मारना समझते हैं, और यही ’बलि‘ शब्द  का अर्थ समझा जाता है। दुर्भाग्य का विषय है कि यह दोनों शब्द अपनी उत्कृष्टता से गिरकर इस अधोगति को पहुॅच गये है। ‘यज्ञ’ यज धातु से निकलता है जिसका अर्थ है देव-पूजा, संगतिकरण तथा दान । इससे और मारने से क्या सम्बन्ध ? कुछ लोग यहाॅ तक समझते है कि नरयज्ञ वह यज्ञ है जिसमें मनुष्य को मारकर उसमें मासं की आहुति दी जाती है। इन भले आदमियो से पूछो कि क्या इसी प्रकार ब्रह्मयज्ञ में ब्रह्म को मारा जाता होगा। और पितृयज्ञ में माता-पिता को अर्थ अनर्थ करनेवालो के लिये क्या कहा जाय। नरयज्ञ का पय्र्याय अतिथियज्ञ है। मनुस्मृति कहती है कि नरयज्ञ का अर्थ है अतिथिपूजन। फिर भी लोग यज्ञ को हिंसापरक समझने लगे तो इसमें विचारे शब्द का क्या दोष ? इसी प्रकार बलि का अर्थ है ‘भूत-यज्ञ’ अर्थात  चीटी कौवे आदि को भोजन पहुॅचाना। इसलिये पितृयज्ञ में पशु-हिंसा करने का विधान स्पष्टतया पीछे की मिलावट है। जिस समय महात्मा बुद्ध ने अपने धर्म का प्रचार किया उस समय यज्ञों में पशुओं को मारकर चढाना एक साधारण बात थी। इसी अत्याचार से दुखी होकर महात्मा बुद्ध ने वैदिक यज्ञों का निषेध किया था क्योकि वस्तुतः वह यज्ञ वैदिक नही रह गये थे। वाम-मार्ग अर्थात उलटे मार्ग का प्रचार था। प्रतीत होता है कि उसी समय या उसके पश्चात् मनुस्मृति में यह मिलावट हुई।