मनु स्मृति के प्रथम अध्याय के प्रक्षिप्त श्लोकों की समीक्षा :पण्डित भीमसेन शर्मा

अब प्रथमाध्याय के प्रक्षिप्त श्लोकों की समीक्षा वा विचार किया जाता है। मैं इस अध्याय वा दूसरे आदि अध्यायों में जिन-जिन श्लोकों को प्रक्षिप्त कहूं वा जताऊंगा वहां सर्वत्र अपनी अनुमति का प्रकाश करना ही प्रयोजन है। किन्तु वहां कुछ आग्रहपूर्वक कहना उचित नहीं। यदि उसमें किसी विद्वान् वा समुदाय को विरोध जान पड़े तो उसको मित्रता पूर्वक कहना चाहिये कि इसको इस प्रकार करना योग्य है। यदि सत्य से विपरीत हो गया दीख वा जान पड़ेगा, तो शीघ्र वैसा अविरुद्ध सुधार दिया जायेगा।

जहां-जहां यह पीछे मिलाया गया वा यह प्रक्षिप्त है ऐसा कहेंगे वहां-वहां मुख्य कर निम्नलिखित कारण जानने चाहियें। जो वाक्य किसी प्रकार वेद के आशय वा वेद के सिद्धान्त से तथा अन्य ब्राह्मण, उपनिषद्, न्याय और मीमांसादि अनेक ग्रन्थों से विरुद्ध हो वह प्रक्षिप्त है अर्थात् किसी विद्वान्, ऋषि, महर्षि का बनाया नहीं है। क्योंकि वेदानुयायी, शुद्ध, आप्त, तपस्वी, बहुदृष्ट, बहुश्रुत, जिन्होंने जानने योग्य को जान लिया और यथार्थ सत्य को प्राप्त कर लिया, ऐसे ऋषियों का कथन कदापि वेद से विरुद्ध नहीं हो सकता। तथा जो असम्बद्ध प्रलाप के तुल्य अयोग्य स्थान में प्रयुक्त, प्रकरण से विरुद्ध दूर से दीखता है। क्योंकि विद्वान् लोग प्रकरणविरुद्ध कथन कहीं नहीं करते। इससे प्रकरणविरुद्ध प्रक्षिप्त है। तीसरे पुनरुक्त श्लोक भी प्रक्षिप्त हैं, जैसे प्रथमाध्याय में जो कहा वही तीसरे अथवा चौथे में वैसे ही वा उसके पर्यायवाचक वा उस प्रकार के आशय वाले पदों से फिर-फिर कहा जावे, वह पुनरुक्त होने से प्रक्षिप्त समझा जाता है। तथा जो परस्पर विरुद्ध हो कि पूर्व जो कहा उससे विरुद्ध आगे कहा जावे। उन दोनों में एक ही ठीक वा सत्य ठहर सकता है। परन्तु सम्मतिभेद को छोड़कर, अर्थात् जहां कहीं सम्मतिभेद दिखाया गया वहां तो दूसरे की विरुद्ध सम्मति जताने के लिये ही ग्रन्थकर्त्ता ने दो प्रकार के वचन कहे हैं, किन्तु वहां विरोध नहीं है, जिस कारण प्रक्षिप्त हो। इत्यादि कारण प्रक्षिप्त जताने के लिये होते हैं, जिनका यहां उदाहरण मात्र दिखाया है।

प्रथमाध्याय में सृष्टि प्रक्रिया का सामान्य कर वर्णन है। उसके पश्चात् सब ग्रन्थ भर के विषयों का सूचीपत्र श्लोकों से ही कहा है। वहां जगत् की उत्पत्ति विषय के पश्चात् गर्भाधानादि संस्कार द्वितीयाध्याय में कहे हैं। इन उक्त दोनों विषयों के बीच ही सत् युगादि की व्यवस्था, पाप-पुण्य का न्यूनाधिक उपयोग, ब्राह्मणादि वर्णों के कर्म और ब्राह्मण वर्ण की विशेष प्रशंसा इत्यादि कथन प्रकरण विरुद्ध हैं। और सूचीपत्र में लिखे विषयों से बाह्य वा पृथक् हैं, इससे प्रक्षिप्त हैं ऐसा अनुमान होता है। इस समय वर्तमान पुस्तकों में ११९ (एक सौ उन्नीस) श्लोक छपे हुए मिलते हैं। और पाठान्तर रूप श्लोक इनसे भिन्न हैं। और वे किन्हीं-किन्हीं पुस्तकों में मिलते हैं, इससे ही उनका नाम पाठान्तर रखा गया। तिससे अनुमान होता है कि वे पाठान्तर रूप श्लोक वा वाक्य शीघ्र थोड़े काल से मिलाये गये हैं। और जो बहुत काल से मिलाये गये वे सब पुस्तकों में मिल जाने से सर्वत्र प्राप्त होते हैं अर्थात् जो वस्तु किसी में मिलाया जाता है, वह काल पाकर उसके सर्वांश से सम्बद्ध हो जाता है।

इस प्रथमाध्याय के प्रारम्भ में १३ श्लोक तो निर्विघ्न हैं। अर्थात् बत्तीसवें श्लोक को तेरहवें के आगे चौदहवां रखना चाहिये, ऐसा विचार ठीक जान पड़ता है। इस श्लोक पर मेधातिथि आदि सब भाष्यकारों ने जो अर्थ किया है वह वेदादि शास्त्रविपरीत और तुच्छ है। यह स्पष्ट जान पड़ता है [यह बात मेरे कहने मात्र से नहीं किन्तु जो कोई उस अर्थ को सुनेगा वही ऊटपटांग कहेगा कि ब्रह्मा ने अपने शरीर को बीच से चीर के दो टुकड़े किये उनमें एक से पुरुष और दूसरे से स्त्री हुई। भला किसी पुरुष के शरीर को बीच से चीर देने से स्त्री-पुरुष दो हो जावें यह सम्भव है ? यदि ऐसा हो सकता हो तो जो पुरुष स्त्रियों के बिना दुःखी हैं, जिनको स्त्री नहीं मिलती, वे अपने शरीर को चीर डालें तो उसी शरीर से स्त्री भी निकल आवे। विचार कर देखिये तो चीरने से वह पुरुष भी मर जावेगा। दो होना तो पृथक् रहा वहां एक भी रहना असम्भव है] वेदादि शास्त्रों में सर्वत्र ही एक परमेश्वर से सब सृष्टि उत्पन्न हुई, ऐसा लिखा है। जिससे पुरुष हुए उसी से सब स्त्रियां भी उत्पन्न हुईं, किन्तु स्त्री-पुरुष रूप दो भेद बनाने के लिये किसी देह- धारी मनुष्य के दो खण्ड करना उचित नहीं। कदाचित् पुरुष के दो खण्ड होने से स्त्री-पुरुष का भेद सिद्ध हो जावे। (यद्यपि यह असम्भव है तो भी अभ्युपगम सिद्धान्त से मान लो कि यह ऐसा हो) तो भी पशु-पक्षी आदि में स्त्री भेद कैसे होगा ? क्या वहां भी किसी पशु आदि के दो खण्ड कर स्त्री-पुरुष भेद मानना चाहिये ? देखो ! अथर्ववेद में१ लिखा है कि “देव- विद्वान् पुरुष कर्म- प्रधान, पितर- दीर्घदर्शी, बहुश्रुत, साधारण मनुष्य तथा गानविद्या में प्रवीण पुरुष और स्त्री ये सब उसी नित्य निराकार परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।” यहां स्पष्ट अप्सरस् शब्दवाच्य स्त्रियों की उत्पत्ति परमेश्वर से हुई लिखी है। किन्तु यहां किसी पुरुषविशेष के दो टुकड़ों से उत्पत्ति नहीं है। इस प्रकार वेदों में सैकड़ों प्रमाण प्राप्त होंगे, जिनके द्वारा साक्षात् परमात्मा से ही भोग्य-भोक्तारूप स्त्री-पुरुष दोनों की निरन्तर उत्पत्ति सिद्ध हो जायेगी। अर्थात् पुरुष के टुकड़ों से वेदों में कहीं भी स्त्री-पुरुष के भेद की उत्पत्ति नहीं है। तथा यह अर्थ असम्भव भी है कि जो एक पुरुषशरीर के दो खण्ड करने से स्त्री-पुरुष हो जावें। क्या सिर की ओर से लम्बाई में दो खण्ड किये वा चौड़ाई में ? यदि लम्बा-लम्बा बीच से शरीर चीर दिया तो एक आंख, एक कान, एक बांह और एक गोड़े वाला पुरुष वा स्त्री होने चाहिये! यदि बीच नाभि वा कटिभाग से दो टुकड़े किये गये हों तो नीचे वा ऊपर के ही अवयवों वाला एक होता सो तो दीखता नहीं, इत्यादि कारणों से उपहासयोग्य होने से यह अर्थ अग्राह्य है। और सत्य अर्थ यह है- किसी प्रकार विकारी हुए तन्मात्र और विषयरूप से वृद्धि को प्राप्त, सब स्थूल वस्तुओं का पूर्वरूप कार्यकारण के मध्य में अवस्थित प्रकृति के कार्यरूप अपने देह को परमेश्वर ने दो भाग करके आधे से पुरुष और आधे से स्त्री को बनाया और स्त्री में इस सब ब्रह्माण्ड को उत्पन्न किया अर्थात् जड़ चेतन प्रत्येक पदार्थ में स्त्री-पुरुषरूप दो प्रकार का भेद किया। पुरुष में वीर्य छोड़ने की शक्ति तथा कठिनता दृढ़ और प्रबल शक्ति रखी गयी तथा स्त्री में गर्भधारणशक्ति, कोमलता और निर्बलता रखी गयी। इसीलिये स्त्री को अबला भी कहते हैं। यह अर्थ सम्भव वेदानुकूल और गम्भीरता युक्त भी है। ऐसा अर्थ होने पर वह श्लोक स्थान भ्रष्ट अर्थात् जहां रखना चाहिये वहां नहीं है। क्योंकि सब वस्तु की विशेष रचना से पूर्व ही ऐसा श्लोक होना चाहिये, पीछे ब्राह्मणादि चेतन वा जड़ की सृष्टि कहने में ब्राह्मणी आदि उस-उसकी         सम्बन्धिनी स्त्री की रचना भी आ जायेगी। यह बात प्रश्नोपनिषद् में रयि-प्राण और चन्द्र-सूर्य शब्दों से स्पष्ट दिखायी है। यहां भी ऐसा मानने पर ही उसके अनुकूल होगा। और ठीक भी ऐसा ही है, जो विशेष रचना से पूर्व ही स्त्री-पुरुषरूप भोग्यभोक्तृशक्तियों की वस्तुमात्र के सब कारण में ही भेद कल्पना करनी चाहिये ऐसा ही प्रश्नोपनिषद् में भी कहा है।

इस प्रकार यहां सब भाष्यकारों का भ्रम ही प्रतीत होता है। इस गूढ़ और गम्भीर शास्त्र के अर्थ में राघवानन्द भाष्यकार की पूर्णतः नहीं किन्तु कुछ थोड़ी बुद्धि चली है। इस सब कथन से सिद्ध हुआ कि सृष्टिप्रक्रिया में १३ (तेरहवें) श्लोक के आगे इस बत्तीसवें (द्विधा कृत्वा०) श्लोक को रखा जावे तो अनुचित नहीं जान पड़ेगा किन्तु ठीक सग्त जान पड़ेगा यह मेरी सम्मति है।

(द्विधा कृत्वा०) इस बत्तीसवें श्लोक के पश्चात् अर्थात् “तपस्तप्त्वा०” यहां से लेकर “जग्मम्॰” यहां तक पढ़े गए नौ श्लोक (३३-४१) प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं। जैसे एक देश में बहुत राजा नहीं हो सकते वैसे सृष्टिकर्त्ता भी अनेक नहीं हो सकते। अर्थात् इन नव श्लोकों में कई सृष्टिकर्त्ता दिखाये हैं सो ठीक नहीं। वेदों में देवादि रचना भी साक्षात् परमात्मा से ही दिखायी गयी है, किन्तु अनेक मनुओं से नहीं, इसमें विशेष विचार वहां ही लिखा जायेगा, जहां वे पद्य पढ़े हैं।

आगे इक्यासीवें श्लोक से लेकर “दानमेकं कलौ युगे०” इस श्लोक पर्यन्त छह श्लोक प्रक्षिप्त हैं। क्योंकि सृष्टि प्रकरण में सत् युगादि में होने वाले धर्म की न्यूनाधिक व्यवस्था करना प्रकरणानुकूल नहीं हो सकती। इससे एक तो प्रकरण विरुद्ध है। द्वितीय किसी समयविशेष में सर्वथा धर्म वा अधर्म ही नहीं ठहर सकता, क्योंकि वे दोनों प्रकाश और अन्धकार के तुल्य सापेक्ष हैं। यदि प्रकाश कोई वस्तु न हो तो किसको अन्धकार कहें। जैसे शीत के अभाव में उष्ण का और उष्ण के अभाव में शीत का कोई वस्तु ठहरना असम्भव है। इसी प्रकार कृतयुग में भी   अधर्म की स्थिति अवश्य माननी चाहिये। तथा तीसरे वेदों में भी “सौ वर्ष देखें। सौ वर्ष आयु वाला पुरुष होता है” इत्यादि प्रमाण हैं। वे सब कलियुग के लिये ही हों यह नहीं हो सकता। ऐसा हो तो अन्य युगों के आयु की भी वेद में व्यवस्था होनी चाहिये। और यह कलियुग के लिये आयु है ऐसा नहीं लिखा, इससे सामान्य कर यह सब युगों के लिये है, यही सत्य जानो। इस कारण वेद से विरुद्ध होने से भी उक्त श्लोक प्रक्षिप्त हैं, यह मेरा विचार है।

आगे सत्तासीवें श्लोक से लेकर एकानवें (८७-९१) श्लोक पर्यन्त पांच श्लोकों में दशमाध्याय के “ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था०” इत्यादि श्लोकों के साथ किसी प्रकार पुनरुक्ति प्रतीत होती है, परन्तु वह समाधान करने योग्य है। क्योंकि यहां प्रथमाध्याय में ब्राह्मणादि के कर्मों का विभाग है अर्थात् सृष्टि के आरम्भ में अपने-अपने कर्म में सब वर्णों को युक्त करना ही प्रयोजन है। इस ब्राह्मणादि के कर्मविभाग का सृष्टिप्रक्रिया के साथ सम्बन्ध है, ऐसा मानकर प्रथमाध्याय में वर्णन है। तथा ब्राह्मणादि वर्णों को आपत्काल में कैसे जीविका करनी चाहिये, यह आशय दिखाने के लिये कर्मों का अनुवाद करके दसवें अध्याय में वर्णन है। इस प्रकार पुनरुक्ति दोष नहीं जान पड़ता।

आगे चौरानवें-पिच्यानवें (९४-९५) दोनों श्लोक प्रक्षिप्त हैं, क्योंकि इन दोनों की इकत्तीसवें और तिरानवें श्लोक के साथ पुनरुक्ति भी आती है, और चौरानवें का यह “सर्वस्यास्य च गुप्तये” अंश भी सत्तासीवें (८७) श्लोक के साथ पुनरुक्त होने से प्रक्षिप्त है। तथा ब्राह्मण के मुख से देवता और पितृलोग हव्य-कव्य खाते हैं यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्य के मुख से अन्य नहीं खा सकता। होमने योग्य पदार्थ जो सूर्यादि देवों को प्राप्त होते हैं, वे ब्राह्मण के मुख द्वारा नहीं, किन्तु अग्नि मुख से प्राप्त होते हैं। अर्थात् अग्नि में होमा गया द्रव्य प्रकारान्तर से प्रदेशान्तर को प्राप्त होता है, यह न्याय से सिद्ध है। क्योंकि ब्राह्मण के द्वारा किया गया भोजन किसी प्रकार से मेघमण्डल में जाता हो, यह नहीं कह सकते। इसलिये अनुमान से जान पड़ता है कि अन्य के भोजन की प्रतिक्षण तृष्णा रखने वाले भोजनभट्ट उदरम्भर नाममात्र के ब्राह्मणों ने ही ऐसे श्लोक बनाकर मिलाये हैं। केवल तिरानवें (९३) श्लोक में यथोचित प्रशंसा ब्राह्मण की की गई है।

तथा अठानवें से लेकर एक सौ एक (९८-१०१) पर्यन्त प्रक्षिप्त हैं। उन श्लोकों का एकदेशी होना तो प्रसिद्ध ही है। इन श्लोकों में अनुचित, पुनरुक्त, असम्बद्ध, पक्षपात वा स्वार्थपरक ब्राह्मण वर्ण की प्रशंसा है, जिससे ये भी चारों श्लोक प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं। इन पर विशेष विचार वहीं भाष्य में होगा। तथा एक सौ दो श्लोक से लेकर एक सौ सात (१०२-१०७) श्लोक पर्यन्त निष्प्रयोजन वा अल्पप्रयोजन परक श्लोक हैं। तथा किसी प्रकार असम्बद्ध, पक्षपातयुक्त और वेद से विरुद्ध तथा आत्मश्लाघा दोष वा अत्यन्त प्रशंसारूप दोष से युक्त हैं, इस कारण तुच्छ होने से पीछे किन्हीं स्वार्थियों ने मिलाये हैं, ऐसा अनुमान होता है।

आगे एक सौ सात से लेकर एक सौ दश (१०७-११०) पर्यन्त चार श्लोक चतुर्थाध्याय के १५५,१५६ श्लोकों के साथ पुनरुक्त जान पड़ते हैं। तो भी चतुर्थाध्याय के उक्त दो श्लोकों पर सबसे पहले भाष्यकर्त्ता मेधातिथि का भाष्य नहीं मिलता, तिससे अनुमान होता है कि मेधातिथि के भाष्य करने के समय में वे दोनों श्लोक चतुर्थाध्याय में नहीं थे। यदि भाष्य किया होता तो क्यों नहीं मिलता। इससे प्रथमाध्याय के आचारप्रतिपादक चारों श्लोक प्रक्षिप्त नहीं, ऐसा जान पड़ता है। आगे एक सौ ग्यारह श्लोक से लेकर सब ग्रन्थ का सूचीपत्र कहा गया है, उसमें कुछ विरोध नहीं है। इस प्रकार इन दोनों प्रकार के मिलाकर एक सौ उन्नीस श्लोक इस प्रथमाध्याय में मिलते हैं। उनमें उक्त प्रकार से मेरी सम्मति से प्रक्षिप्त समझे गये यदि छब्बीस (२६) श्लोक प्रक्षिप्त ठहरें तो शेष तिरानवें श्लोक शुद्ध ऋषिकृत मानने चाहियें।

आर्यसमाज की सैद्धान्तिक विजयः राजेन्द्र जिज्ञासु

यह ठीक है कि इस समय देश में अंधविश्वासों की अंधी आंधी चल रही है। नित्य नये-नये भगवानों व मुर्दों की पूजा की बाढ़ सी आई हुई है। तान्त्रिकों की संया अंग्रेजों के शासन काल से कहीं अधिक है। राजनेता, अभिनेता व टी. वी. जड़ पूजा तथा अंधविश्वासों को खाद-पानी दे रहे हैं।

आर्यसमाज के दीवाने विद्वानों, संन्यासियों तथा निडर भजनोपदेशकों ने अतीत में अंधेरों को चीरकर वेद का उजाला किया। उसी लगन व उत्साह से आज भी आर्यसमाज अंधविश्वासों के अंधकार का संहार कर सकता है।

स्वर्ग-नर्क, जन्नत-जहन्नुम की कहानियों का सब मत-पंथों में बहुत प्रचार रहा। ऋषियों ने घोष किया कि सुख विशेष का नाम स्वर्ग है और दुःख विशेष का नाम नर्क है। महान् विचारक डा. राधाकृष्णन् जी ने ऋषि के स्वर में स्वर मिला कर लिखा हैः-

Heaven and hell are not physical areas. A soul tormented with remorse for it deeds is in hell, a soul with satisfaction of a life well lived is in heaven. The reward for virtuous living is the good life. Virtue it is said, is its own reward.

(The Present Crisis of Faith. Page19 )

अर्थात् बहिश्त व दोज़ख कोईाूगोलीय क्षेत्र नहीं हैं। अपने दुष्कर्मों के कारण अनुतप्त आत्मा नर्क में है व अपने द्वारा किये गये सत्कर्मों से तृप्त, सन्तुष्ट आत्मा स्वर्गस्थ है। सदाचरणमय जीवन का पुरस्कार अथवा प्रतिफल श्रेष्ठ जीवन ही तो है। कहा जाता है कि पुण्य-भलाई अपना पुरस्कार आप ही है।

डॉ. राधाकृष्णन् ने अपने सुन्दर मार्मिक शदों में महर्षि दयानन्द के स्वर्ग-नर्क विषयक वेदोक्त दृष्टिकोण की पुष्टि तो की ही है, साथ ही पाठकों को स्मरण करवा दें कि देश के विााजन से पूर्व जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने एक आर्य-बाला कल्याणी देवी को धर्म विज्ञान की एम. ए. कक्षा में प्रवेश देकर काशी के तिलकधारी पौराणिक पण्डितों के दबाव में वेद पढ़ाने से इनकार कर दिया, तब डॉ. राधाकृष्णन् जी ही उपकुलपति थे। मालवीय जी भी पौराणिक ब्राह्मणों की धांधली का विरोध न कर सके और डॉ. राधाकृष्णन् जी भी सब कुछ जानते हुए चुप रहे।

आर्यसमाज ने डटकर अपना आन्दोलन छेड़ा। आर्यों के सर सेनापति स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी स्वयं काशी में मालवीय जी से जाकर मिले। मालवीय जी स्वामी जी के पुराने प्रेमी, साथी व प्रशंसक थे। आपने आर्यसमाज का पक्ष उनके सामने रखा। डॉ. राधाकृष्णन् जी ने तो स्पष्ट ही लिखा कि विश्वविद्यालय आर्यसमाज का दृष्टिकोण जानता है। मैंने इस आन्दोलन का सारा इतिहास स्वामी जी के श्रीमुख तथा पं. धर्मदेव जी से सुना था। विजय आर्यों की ही हुई।

कुछ समय पश्चात् डॉ. राधाकृष्णन् जी ने अपनी पुस्तक Religion and Society में स्त्रियों के वेदाध्ययन के अधिकार के बारे में खुलकर सप्रमाण लिखा। डॉ. राधाकृष्णन् जी का कर्मफल-सिद्धान्त पर भी वही दृष्टिकोण है जो ऋषि का है। आर्यसमाज को चेतनाशून्य हिन्दू समाज को अपने आचार्य की सैद्धान्तिक दिग्विजय का यदा-कदा बोध करवाते रहना चाहिये। इससे हमारी नई पीढ़ी भी तो अनुप्राणित व उत्साहित होगी।

कुरान समीक्षा : ईसा के बाद अहमद आवेगा

ईसा के बाद अहमद आवेगा

खुदा ने ऐसी गलत बात क्यों कही जो ईसा ने कभी भी इन्जील में नहीं कही थी कि जिसे खुदा ने अपना पैगम्बर बताया था, इससे कुरान में झूठी बात लिखी होने का ऐब भी है। यह आयत कुरान पारा १५ सूरे कहफ रूकू १ आयत १ को गलत साबित कर देती है।

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

व इज् का- ल अीसब्नु मर्-य……………।।

(कुरान मजीद पारा २८ सूरा सफ्फ रूकू १ आयत ६)

ईसा ने कहा….. एक पैगाम्बर की खुशखबरी देता हूँ जो मेरे बाद आवेगा उसका नाम ‘‘अहमद’’ होगा।

समीक्षा

ईसा ने इन्जील में यह भविष्यवाणी कभी नहीं की थी कि मेरे बाद ‘‘अहमद’’आवेगा, कुरान की यह बात बिल्कुल गलत है।

कुरान समीक्षा : औरतों को चेली बनाने की स्वीकृति

औरतों को चेली बनाने की स्वीकृति

बतावें कि यदि चेलियों से जिना किया गया है तो वह गुनाह तो नहीं माना जावेगा। चेली और प्रेमिका में इस्लाम की निगाह में अन्तर क्या है?

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

या अय्युहन्नबिय्यु इजा जा-…………।।

(कुरान मजीद पारा २८ सूरा मुम्तहिना रूकू २ आयत १२)

ऐ पैगम्बर! जब तेरे पास मुसलमान औरतें आवें और इस पर तेरी चेली बनाना चाहें…..तो तुम उनको चेली बना लिया करो…………।

समीक्षा

खुदा मुहम्मद साहब के हर शौक को पूरा किया करता था और उनको औरतें भी भेज देता था बांदियां व चेलियाँ रखने की भी इजाजत थी।

बुआओं, मौसियों आदि की बेटियों को भी निकाह में लेने की आज्ञा केवल उन्हीं को दे रखी थी

कुरान समीक्षा : खुदा को कर्ज दो बदले में दूना मिलेगा

खुदा को कर्ज दो बदले में दूना मिलेगा

कुरान पारा ६ सूरे मायदा रूकू २ आयत १२ में खुदा को कर्ज देने से गुनाह माफ का कुरान ने वायदा किया था और यहां खुदा कर्ज लेने पर उसे दूना, मयसूद के वापस देने का वायदा करता है। बतावें कि सूद देना व लेना इस्लाम में गुनाह कैसे हो सकता है।

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

मन् जल्लजी युक्रिजुल्ला-ह कर्…………।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा हदीद रूकू २ आयत ११)

ऐसा कौन है जो अल्लाह को खुश दिली से उधार दे फिर वह उसके लिए दूना कर दे और उसके लिए इज्जत का फल जन्नत है।

समीक्षा

उधार के लिए कर्ज देना मुनासिब होगा। आश्चर्य है कि खुदा को भी कर्ज मांगना पड़ा है और पाप माफ करने का लालच देना पड़ा है।

कुरान समीक्षा : सूरज के निकलने और डूबने की जगह है

सूरज के निकलने और डूबने की जगह है

सूरज निकलने और डूबने की जगह कहां पर है बताने का कष्ट करें। क्या इससे यह जाहिर नहीं है कि खुदा की इल्मी लियाकत बहुत ही कम थी जो वह सूरज निकलने व डूबने की जगह भी जानता था।

देखिये कुरान में कहा गया है कि-

रब्बुल-मश्रिकैनि व रब्बुल-मग्रिबैनि………..।।

(कुरान मजीद पारा २७ सूरा रहमान रूकू १ आयत १७)

और वहीं सूरज निकलने और डूबने की जगहों का मालिक है।

समीक्षा

अरब में यह जगह कहाँ पर है? यह बात कुरान को और खोल देनी चाहिए थी तो खुदा के सही इल्म का सभी को ज्ञान हो जाता। कुरान की बातें ऐसी ही हैं जिन पर पढ़े लिखे लोग हँसे बिना न रह सकेंगे।

रचना के क्रम का विचार: पण्डित भीमसेन शर्मा

अब संक्षेप से उत्पत्ति का क्रम लिखा जाता है। इसमें संदेह यह है कि पहले जड़ की उत्पत्ति होती वा चेतन की और चेतनों में पशु, पक्षी, कीट, पतगदि वा मनुष्य इनमें कौन पहले उत्पन्न होते हैं ? तथा पांच तत्त्वों में आकाश की उत्पत्ति कैसे संभव होती है इत्यादि सैकड़ों विरोध सृष्टि-प्रक्रिया में हैं, उनको हटाने के लिए यहां संक्षेप में लिखते हैं।

पहले जड़ वस्तु उत्पन्न होते हैं किन्तु चेतन नहीं। जड़ों में पृथिव्यादि भूतों की रचना के पश्चात् मनुष्यादि के भक्ष्य ओषधि आदि पदार्थ और उसके पश्चात् मनुष्यादि चर प्राणियों की उत्पत्ति होती है। परन्तु शरीरधारियों में छोटे कीट पतगदि, तिस पीछे पशु-पक्षी आदि प्राणी उत्पन्न होते हैं और सबसे पीछे मनुष्य उत्पन्न होते हैं, क्योंकि मनुष्य से नीचे योनि के सब प्राणी मनुष्य के उपकारार्थ हैं, इसलिये सुख के वा दुःख के साधन पहले बनाये जाते हैं। तथा कीट-पतग् आदि सूक्ष्म जन्तु हैं, स्थूल से पहले प्रायः सूक्ष्म की उत्पत्ति न्यायानुकूल माननी चाहिये। क्योंकि कारण सदा सूक्ष्म और कार्य सदा स्थूल होता है। यही क्रम प्रायः सभी शिष्ट लोगों के सम्मत है। ऐसा मान करके ही तैत्तिरीय उपनिषद् में लिखा है कि- “उस परमेश्वर से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथिवी, पृथिवी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न, अन्न से वीर्य और वीर्य से मनुष्यादि के शरीर उत्पन्न होते हैं।”१ तथा सांख्य में लिखा है कि- “सत्त्व, रजस् और तमोगुण की साम्यावस्था प्रकृति कहाती है, उससे द्वितीय कक्षा में महत्तत्त्व उत्पन्न होता है, जिसको कोई लोग हिरण्यगर्भ कहते हैं, उसी को कोई विधि-विधाता वा ब्रह्मा कहते हैं कि कार्यरूप संसार की वृद्धि होने का वह पहला परिणाम है और ब्रह्मा शब्द का अर्थ भी यही है कि जिससे वृद्धि हो। तृतीय कक्षा में अहटार उत्पन्न होता है, अहटार से पांच सूक्ष्म भूत और उनसे इन्द्रिय इत्यादि।”२ इन प्रमाणों से स्पष्ट निश्चय होता है कि- आकाशादि क्रम से जड़ तत्त्व पहले उत्पन्न होते हैं। यदि आधारस्वरूप, आकाशादि तत्त्व पहले न हों तो उत्पन्न हुए प्राणी किसके आश्रय से ठहरें और क्या खाकर के जीवित रहें ? और चेतन शरीरों के कारण भी पृथिव्यादि तत्त्व हैं, उन कारणरूप तत्त्वों की उत्पत्ति हुए बिना प्राणियों के शरीर उत्पन्न नहीं हो सकते, क्योंकि कारण के बिना कार्य नहीं होता। इसलिये सब वस्तुओं के कारणभूत द्रव्य पहले उत्पन्न होते हैं और पीछे कार्यवस्तु होते हैं। सूक्ष्म प्रकृतिरूप अन्तिम कारण की अपेक्षा यद्यपि तन्मात्रादि सूक्ष्मभूत भी कार्य ही हैं, तो भी स्थूल भूतों की अपेक्षा से वे कारण ही समझे जाते हैं। यद्यपि कार्यरूप अग्नि, वायु का कार्य है, तो भी जल की उत्पत्ति की अपेक्षा से अग्नि कारण भी है। इस प्रकार कार्य-कारण व्यवस्था सापेक्ष है। अर्थात् जो कारण है वह किसी की अपेक्षा से कार्य और ऐसे ही कार्य कारण हो जाता है।

सृष्टि के आरम्भ में सबसे पहले प्रकाश उत्पन्न होता है, तब सृष्टि करने को उद्यतरूप से परमात्मा जागता है।१ इस प्रकार उस परमेश्वर का सृष्टि करने को उद्यत होना ही प्रकाश की उत्पत्ति है। उसको कोई अन्य जगाता नहीं किन्तु वह स्वयमेव उद्यत होता है। इसीलिये वह स्वयम्भू कहाता है। यही बात मनुस्मृति के छठे श्लोक में (प्रादुरासीत्तमोनुद०) इत्यादि प्रकार कही है। उस परमेश्वर से द्वितीयावस्था में आकाश उत्पन्न होता है, जो सब वस्तुओं का आधार, जिसमें सूर्यादि ज्योति नियम पूर्वक तपते, घूमते और प्रकाशित होते हैं। और उसके अवकाश देने स्वरूप होने से नित्य होना कह सकते हैं, फिर उसकी उत्पत्ति क्यों दिखायी जाती है ? इसका उत्तर संक्षेप में यह है कि- घड़ा आदि के तुल्य आकाश उत्पन्न नहीं होता। यदि कभी किसी प्रकार तैजस वस्तुओं का सर्वथा अभाव होने से अन्धकार हो जावे। कोई कहीं जा भी न सके तो अवकाश के रहने पर भी कार्यसिद्धि का हेतु न होने से उसका अभाव जैसे कह सकते हैं। और प्रकाश रहने पर कार्यसिद्धि का हेतु होने से आकाश उत्पन्न होता ऐसा व्यवहार किया जाता है। इसी प्रकार आकाश शब्द दीप्ति अर्थ वाले काश धातु से यौगिक पक्ष में परमात्मा का नाम है। और योगरूढ़ दशा में शब्दगुण वाले आकाश तत्त्व का नाम है। अच्छे प्रकार प्रकाशित होता है इसलिये सर्वविध प्रकाश के आधार का नाम आकाश है। इसी से सूर्यादि ज्योंतियों के प्रकाश से रहित प्रलय दशा में   अन्धकार रूप शून्य की आकाश संज्ञा नहीं कह सकते, इसी से आकाश नहीं है ऐसा व्यवहार कर सकते हैं। और सृष्टि के आरम्भ में फिर व्यवहार होता है कि आकाश हो गया। यह भी उस आकाश की उत्पत्ति है। तथा अवकाश अनन्त है। जहां सृष्टि नहीं है, वहां भी शून्यरूप पोल है, उसमें से जितने अवकाश में ब्रह्माण्ड रचा गया, सृष्टि के आरम्भ में उसकी आकाश संज्ञा धरी गयी, क्योंकि सूर्यादि ज्योतियों के वहां रहने से ब्रह्माण्डस्थ ही शून्य प्रकाश युक्त होता उसी में वायु आदि साधनों के विद्यमान रहने से शब्द की भी उत्पत्ति हो सकती है इसलिये वही आकाश है अन्य शून्य आकाश नहीं, यह भी आकाश की उत्पत्ति दिखाने का आशय है। इस प्रकार आकाश की उत्पत्ति होती है, पर घटादि के तुल्य नहीं। आकाश का शब्द गुण है, उस शब्द की उत्पत्ति में वायु भी सहयोगी कारण है। वायु के बिना केवल आकाश से शब्द का श्रवण नहीं हो सकता। पर तो भी शब्द का मूल कारण आकाश है। तथा संयोग-विभाग से शब्द की उत्पत्ति होती (अर्थात् ताल्वादि स्थानों के संयोग से वा भेरी-दण्डादि के संयोग से शब्द की उत्पत्ति होती है वे संयोग-विभाग बिना अवकाश के नहीं हो सकते) इससे भी शब्द का मूल कारण आकाश होता है। तथा उस आकाश का शब्द गुण सहित होना प्रलयदशा में नहीं घटता ऐसा मानकर सृष्टि के आरम्भ में शब्द का आश्रय बनने से आकाश की उत्पत्ति अर्थात् प्रादुर्भाव मानना पड़ता है।

पीछे आकाश से वायु उत्पन्न होता है और वह वायु गतिवाला होता है। सब वस्तु की गति अवकाश होने पर ही हो सकती है। वायु इधर-उधर चलने से शरीर में लगता और तृणादि को इधर-उधर चलाता है, इससे अनुमान होता है कि वायु है। यदि आकाश न हो तो वायु का भी चलना न हो सके। वह शून्यरूप पोल तो सदा ही है किन्तु तैजस प्रकाश से युक्त आकाश प्रलयावस्था में नहीं रहता, इसी कारण उस समय वायु का भी अभाव है। तैजस कारणरूप प्रकाश के फैलने रूप आकाश से वायु की उत्पत्ति होती है। और वह शब्दगुणवाले आकाश से उत्पन्न हुआ वायु स्वयं स्पर्श गुण वाला होता है। और उसमें कारण का गुण भी आता है इसीलिये शब्द और स्पर्श दो गुणों वाला वायु अपने कारणरूप सूक्ष्म आकाश से स्थूल उत्पन्न होता है। आकाश के होने पर वायु का होना और उसके न होने पर वायु का न होना, इस प्रकार वायु और आकाश का कार्यकारण सम्बन्ध है। कार्य-कारणों की एकता कई प्रकार से मानी जाती है। उनमें यहां अस्तित्व सामान्य वा कारण की सत्ता में कार्य का होना अर्थात् जिसकी विद्यमानता में जो रहे और जिसके न रहने पर जो न रहे, वह उसका कारण कहाता है। इस प्रकार यहां दोनों कार्य-कारण की एकरूपता है। इसी प्रकार वायु का भी शब्द गुण है यह वायु के कारण आकाश के सम्बन्ध से कह सकते हैं। इसीलिये वर्णोच्चारणशिक्षा में शब्द की उत्पत्ति में कहा है कि- “आकाश और वायु दोनों से शब्द उत्पन्न होता है”।१

तथा वायु से अग्नि उत्पन्न होता है। यहां सब स्थलों में प्रभव अपादान के तुल्य कारकपन मान वा विचार के आकाश वायु आदि शब्दों में पञ्चमी विभक्ति की गयी है। जैसे कहा जाता है कि “हिमालय से गग निकलती वा प्रकट होती है”२ इसी प्रकार यहां भी निकलना वा प्रकट होना अर्थ है। और (सम्भूतः) यह पद उत्पत्ति के कारण को जताता है। इससे वायु का आकाश अथवा अग्नि का वायु, घड़ा का मिट्टी के समान उपादान कारण नहीं अर्थात् जैसे मिट्टी स्वयं घड़ारूप बन जाती है वैसे आकाश वायुरूप और वायु अग्निरूप नहीं बन जाता। घड़े का उपादान कारण मिट्टी है पर वायु का उपादान आकाश और अग्नि का उपादान वायु नहीं है। और जहां घड़े के उपादान मिट्टी के तुल्य साक्षात् कार्य का उपादान कारण होता है वहां विशेष कर कार्यकारण की एकरूपता अपेक्षित होती है। इसी प्रकार यहां साक्षात् उपादान कारण न होने से वायु के साथ अग्नि का सारूप्य अपेक्षित नहीं होता, किन्तु वायु की विद्यमानता में अग्नि की उत्पत्ति होती है, इसलिये अग्नि का कारण वायु माना जाता है। जैसे वायु के होने पर अग्नि और दीपक जलते हैं, न होने पर नहीं। इसी से जहां वायु का आना-जाना घड़ा आदि से रोक दिया जाता है, वहां दीपादि नहीं जल सकता। जैसे जलते हुए दीपक को एक घड़े में धरके घड़े का मुख बन्द कर दिया जावे जिससे उसमें किञ्चित् भी वायु न पहुंचे तो उसी क्षण भर में दीपक बुझ जायेगा। ऐसा होने पर स्थूल वायु के आने-जाने से अग्नि जलता है अन्यथा नहीं। इससे अग्नि का कारण वायु है, यह कथन सम्भव है। तथा कहीं अग्नि भी वायु का कारण होता है। उसमें भेद यह है कि सूक्ष्म बिजली आदि कारणरूप अग्नि वायु का कारण है। और यही कारण अग्नि सबसे पहले उत्पन्न होता है, इसी के सम्बन्ध से शून्य का आकाश नाम पड़ता है, इसी की व्याप्ति से वायु चलता है, इसलिये इसी को वायु का कारण मानते हैं, पर स्थूल अग्नि का स्थूल वायु ही कारण है, यह पूर्व से सिद्ध हो चुका।

अग्नि के पश्चात् जल उत्पन्न होता है, इसी कारण ग्रीष्म ऋतु के तपने के पश्चात् वर्षा ऋतु होता है, अर्थात् ग्रीष्म ऋतु का अच्छे प्रकार तपना ही वर्षा का कारण है। तथा अन्य समय में भी जब-जब वर्षा होती है, तब-तब उष्णता की उत्तेजना पूर्वक ही होती है, इससे भी जलों की उत्पत्ति का कारण अग्नि आता है। यदि जगत् में अग्नि न हो तो जल में बहनारूप द्रवगुण रहना भी असम्भव है। तथा किसी यन्त्र से जल में व्याप्त अग्नि निकाल लिया जावे तो जलाकार की कठिनता हो जाने से जल का अपने रूप में ठहरना ही सम्भव नहीं (जल में से अग्नि का भाग निकाल लेने पर ही बरफ बन जाता है, वही अग्नि वायु के सम्बन्ध से फिर जलरूप होकर बहने लगता है) और जिसके अभाव में जिसका अभाव होता है, वह उसका कारण हो यह भी न्याय से सिद्ध ही है, जैसे तैल के न रहने पर दीपक नहीं जलता। तथा जल से पृथिवी उत्पन्न होती है। इसी कारण जब वर्षादि द्वारा पृथिवी को जल प्राप्त होता है, तभी पृथिवी सम्बन्धी सब वस्तुएं ठहरती हैं। जल न रहे तो संयोग से बने पृथिवी सम्बन्धी सब वस्तुओं के अवयवों का वियोग होकर विनाश हो जावे। इससे पृथिवी का कारण जल सिद्ध होता है। जहां-जहां जल की प्रवृत्ति है, वहां-वहां पृथिवी की ठीक दशा है। पृथिवी के सम्बन्ध से फल पकते समय स्वरूप से सूखने वा नष्ट होने वाली ओषधियां, उन ओषधियों से उनका फलरूप अन्न तथा खाये हुए अन्न से साररूप रसादि धातु उत्पन्न होते, और उन धातुओं का परस्पर विपरिणाम होते-होते वीर्य धातु उत्पन्न होता है, वह वीर्य प्राणियों के शरीरों का उपादान कारण है। इस प्रकार ओषधियों से अन्न उत्पन्न होने पर प्राणियों के शरीरों की उत्पत्ति होती है। अन्नादि भोग्य वस्तुओं के होने पर भी भोक्ताओं के बिना रसादि धातु न होने से प्राणियों के शरीर नहीं उत्पन्न होते। इसलिये अन्न और ओषधि की रचना के अनन्तर सर्वशक्तिमान् परमात्मा ने वैसे ही सूक्ष्म कारण से प्राणियों के शरीर उत्पन्न किये। उनके द्वारा खाये अन्न से फिर वीर्यादि धातु होकर मैथुनी सृष्टि हुई। स्थूल स्त्री-पुरुषों के संयोग के बिना अद्भुत शिल्पयुक्त प्राणियों के शरीरों की उत्पत्ति की है, इससे उस परमेश्वर का सर्वज्ञ होना सिद्ध है। फिर भी सृष्टि के आरम्भ में प्रथम बुद्धि में दो भेद कल्पित किये। उनका नाम स्त्री-पुरुष रखा गया, पीछे स्त्री-पुरुषरूप दो शक्तियों से युक्त परमाणुओं के संयोग से सबको उत्पन्न किया। इस प्रकार स्त्री-पुरुषों के संयोग से सब उत्पन्न होता है, यह आशय निकलता है। अथवा पुरुष नाम परमात्मा सृष्टि का निमित्त है और प्रकृति उपादानरूप स्त्री उन दोनों के सम्बन्ध से उत्पन्न हुई सृष्टि भी मैथुनी कहाती है। इस प्रकार यहां सृष्टिप्रक्रिया में उत्पत्ति का क्रम तथा अन्य भी यथासम्भव कहा। अब इस विषय में अधिक लिखना समाप्त करते हैं। आगे प्रथमाध्याय की समीक्षा लिखी जायेगी।