‘पंडित चमूपति द्वारा अमर दयानन्द का स्तवन’

ओ३म्

पंडित चमूपति द्वारा अमर दयानन्द का स्तवन

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

पंडित चमूपति आर्यसमाज के विलक्षण विद्वान सहित हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, अरबी व फारसी आदि अनेक भाषाओं के विद्वान थे। आपने कई भाषाओं में अनेक प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है। गुरुकुल में अध्यापन भी कराया, आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के उपदेशक व प्रचारक भी रहे। सोम सरोवर, चौदहवीं का चांद, जवाहिरे जावेद आदि आपकी प्रसिद्ध रचनायें हैं। सोम सरोवर ऐसी रचना है जिसका स्वाध्याय कर पाठक इस वेद ज्ञान की गंगा रूपी सोम सरोवर में स्नान का सा भरपूर आनन्द ले सकते हैं। इस ग्रन्थ में आपका लिखा एक एक शब्द अनमोल व पठनीय है जिसमें ईश्वर, वेद, व ऋषि दयानन्द के प्रति गहरी श्रद्धा व भक्ति के भाव भरे हुए हैं। प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने पं. चमूपति जी की विस्तृत जीवनी कविर्मनीषी पं. चमूपति के नाम से लिखी है जिसने इस विभूति को अमर कर दिया है। आज के इस संक्षिप्त लेख में हम पं. चमूपति जी की ऋषि दयानन्द को भाव भरित दयानन्द वन्दन रूपी श्रद्धांजलि के कुछ प्रेरणा व प्रभावशाली शब्दों को  प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इन शब्दों को पढ़ेंगे तो यह दयानन्द स्तवन आपकी ओर से ऋषि के प्रति श्रद्धांजलि होगी। इसे पढ़कर इसका आनन्द अवश्य लें।

 

पं. चमूपति जी लिखते हैं कि आज केवल भारत ही नहीं, सारे धार्मिक सामाजिक, राजनैतिक संसार पर दयानन्द का सिक्का है। मतों के प्रचारकों ने अपने मन्तव्य बदल लिए हैं, धर्म पुस्तकों के अर्थों का संशोधन किया है, महापुरुषों की जीवनियों में परिवर्तन किया है। स्वामी जी का जीवन इन जीवनियों में बोलता है। ऋषि मरा नहीं करते, अपने भावों के रूप में जीते हैं। दलितोद्धार का प्राण कौन है? पतित पावन दयानन्द। समाज सुधार की जान कौन है? आदर्श सुधारक दयानन्द। शिक्षा के प्रचार की प्रेरणा कहां से आती है? गुरुवर दयानन्द के आचरण से। वेद का जय जयकार कौन पुकारता है? ब्रह्मार्षि दयानन्द। माता आदि देवियों के सत्कार का मार्ग कौन सिखाता है? देवी पूजक दयानन्द। गोरक्षा के विषय में प्राणिमात्र पर करूणा दिखाने का बीड़ा कौन उठाता है? करुणानिधि दयानन्द।

           

            आओ ! हम अपने आप को ऋषि दयानन्द के रंग में रंगें। हमारा विचार ऋषि का विचार हो, हमारा आचार ऋषि का आचार हो, हमारा प्रचार ऋषि का प्रचार हो। हमारी प्रत्येक चेष्टा ऋषि की चेष्टा हो। नाड़ी नाड़ी से ध्वनि उठेमहर्षि दयानन्द की जय। 

 

            पापों और पाखण्डों से ऋषि राज छुड़ाया था तूने।

भयभीत निराश्रित जाति को, निर्भीक बनाया था तूने।।

बलिदान तेरा था अद्वितीय हो गई दिशाएं गुंजित थी।

जन जन को देगा प्रकाश वह दीप जलाया था तूने।।

 

हमारा सौभाग्य है और अपने इस सौभाग्य पर हमें गर्व है कि हम महर्षि दयानन्द द्वारा प्रदर्शित ईश्वरीय ज्ञान वेदों के अनुयायी है। महर्षि दयानन्द द्वारा प्रदर्शित मार्ग ऐहिक व पारलौकिक उन्नति अथवा अभ्युदय व निःश्रेयस प्राप्त कराता है। इसे यह भी कह सकते हैं कि वेद मार्ग योग का मार्ग है जिस पर चल कर धर्म, अर्थ काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार की यह सबसे बड़ी सम्पादायें हैं। अन्य सभी भौतिक सम्पदायें तो नाशवान है परन्तु दयानन्द जी द्वारा दिखाई व दिलाई गई यह सम्पदायें जीते जी तो सुख देती ही हैं, मरने के बाद भी लाभ ही लाभ पहुंचाती हैं। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः09412985121

‘मत-पंथों की विज्ञान एवं मनुष्य स्वभाव विषयक असत्य मान्यतायें’

ओ३म्

मतपंथों की विज्ञान एवं मनुष्य स्वभाव विषयक असत्य मान्यतायें

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

भारत व विदेशों में प्रचलित सभी मत-मतान्तर आज से पांच हजार एक सौ 118 वर्ष पूर्व हुए महाभारत के विनाशकारी युद्ध के बाद अस्तित्व में आये हैं। महाभारत युद्ध के बाद न केवल भारत अपितु विदेशों में भी अविद्यान्धकार छा गया था। इस कारण सर्वत्र अज्ञान, अन्धविश्वास व कुरीतियां फैल गईं थीं। इन्हें दूर करने के लिए समय-समय पर कुछ महात्मा देश-देशान्तर में हुए और उन्होंने समाज सुधार की दृष्टि से प्रचार किया। उन्होंने अथवा उनके अनुयायियों ने उनके नाम पर मत स्थापित कर दिए और उनकी शिक्षाओं के आधार पर अपने अपने मत-पन्थ-धर्म के ग्रन्थ बना दिये। यह सर्वविदित व सर्वमान्य तथ्य है कि मनुष्य अल्पज्ञ होता है। अतः उसकी कुछ बातें सत्य व कुछ, अल्पज्ञता के कारण, असत्य भी हुआ करती हैं। महर्षि दयानन्द इस तथ्य को भली प्रकार से जानते थे इसलिए उन्होंने कहा है कि मैं सर्वज्ञ नहीं हूं। सर्वज्ञ तो केवल परमात्मा हैं। इसलिए दयानन्द जी की भी कुछ बातें ऐसी हो सकती हैं जो सत्य न हो। उसके लिए उन्होंने विद्वानों को परीक्षा करने व यदि उनकी कोई मान्यता व विचार वस्तुतः असत्य पाया जाये तो उसके संशोधन का अधिकार भी उन्होंने स्वयं अपने अनुयायियों को दिया है। यह बात अन्य किसी मत में नहीं है। मतों की सत्य व असत्य मान्यताओं के अन्वेषण व परीक्षा हेतु ही ऋषि दयानन्द सत्यासत्य के खण्डन-मण्डन में प्रवृत्त हुए थे जिससे उन उन मतों में उपलब्ध सत्य को जानने के साथ उनके अनुयायी असत्य से भी परिचित हो सकें और उससे सबको परिचित कराकर सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए प्रेरित कर सके। ऐसा इसलिए क्योंकि सत्य ही एकमात्र मनुष्य जाति की उन्नति का कारण है। यदि कोई व्यक्ति अपने मत की असत्य बातांे को नहीं छोड़गा तो सृष्टि की प्रलयावस्था तक भी वह सत्य को प्राप्त न होने के कारण उन्नति नहीं कर सकता।

 

एक प्रमुख मत का अध्ययन करते हुए महर्षि दयानन्द के सम्मुख उस मत के प्रवर्तक की यह मान्यता दृष्टिगोचर हुई जिसमें कहा गया है कि ईश्वर ने सूर्य व चन्द्र को फिरने वाला (घूमने वाला या गति करने वाला) किया है। इसी प्रसंग में उस मत में यह भी कहा गया है कि निश्चय मनुष्य अवश्य अन्याय और पाप करने वाला है।

 

महर्षि दयानन्द ने इस साम्प्रदायिक वा पन्थीय मान्यता पर विचार कर लिखा है कि क्या चन्द्र, सूर्य सदा फिरते और पृथिवी नहीं फिरती? जो पृथिवी नहीं फिरे तो कई वर्ष का दिन रात होंवे। (यदि पृथिवी अपनी धूरी पर न घूमे तो रात्रि व दिन नहीं हांेगे और यदि सूर्य की परिक्रमा न करे तो फिर दिन, महीने व वर्ष की काल गणना भी नहीं हो सकती। पृथिवी यदि न घूमती होती तो पृथिवी व चन्द्रमा गुरुत्वाकर्षण के कारण एक दूसरे से टकरा कर कब के नष्ट भ्रष्ट हो जाते। ऋतु परिवर्तन भी पृथिवी के घूमने के कारण होता है, वह भी पृथिवी के घूमने व गति न करने से न होता।) और जो मनुष्य निश्चय (स्वभाव से) अन्याय और पाप करने वाला है तो धर्म प्रवत्र्तक का धर्म ग्रन्थ के द्वारा शिक्षा करना व्यर्थ है। क्योंकि जिनका (मनुष्यों का) स्वभाव ही पाप करने का है तो उन में पुण्यात्मता कभी न होगी (क्योंकि वस्तु का स्वभाव अपरिवर्तनीय होता है) और संसार में पुण्यात्मा और पापात्मा सदा दीखते हैं। (इन दोनों प्रकार के लोगों के पाये जाने से यह ज्ञात होता है यह गुण स्वभाव के कारण नहीं अपतिु ज्ञान, शिक्षा व पूर्व जन्म के संस्कार आदि के निमित्त से व संगति आदि के कारण हैं।) इसलिये ऐसी बात (सत्य के विपरीत बात) ईश्वरकृत पुस्तक की नहीं हो सकती। (निभ्र्रान्त व पूर्णसत्यमय ग्रन्थ केवल वेद हैं जो ईश्वर प्रदत्त हैं।)।

 

हम आशा करते हैं कि आर्य व अन्य सभी पाठक ऋषि दयानन्द के विचारों से सहमत होंगे। हम निवेदन करते हैं कि सत्य व असत्य के ज्ञान के लिए पाठक सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करें। इसे पढ़कर और आचरण में लाकर उनका मानव जीवन सफल हो सकता है।

                                                                                                                                       –मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

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‘आर्यसमाज की स्थापना के समय ऋषि दयानन्द द्वारा व्यक्त की गई आशंका’

ओ३म्

आर्यसमाज की स्थापना के समय ऋषि दयानन्द द्वारा व्यक्त की गई आशंका

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

महर्षि दयानन्द ने 10 अप्रैल, सन् 1875 के दिन मुम्बई के गिरगांव मोहल्ले में प्रथम आर्य समाज की स्थापना की थी। वर्तमान में यह आर्यसमाज काकाड़वाडी के नाम से प्रसिद्ध है। हमारा सौभाग्य है कि वर्ष, 1992 में एक बार हमें इस आर्यसमाज में जाने व वहां प्रातःकालीन यज्ञ में यजमान के आसन पर बैठने का अवसर मिला। आर्यसमाज अन्य धार्मिक संस्थाओं की तरह कोई संस्था या प्रचलित मतों की भांति कोई नवीन मत नहीं था। यह एक धार्मिक व सामाजिक आन्दोलन था जिसका उद्देश्य महाभारत काल के बाद वैदिक धर्म में आई अशुद्धियों, अज्ञान, अन्धविश्वासों व कुरीतियों आदि का संशोधन कर, वेद के आदर्श कृण्वन्तो विश्वमार्यम् वा सत्य वैदिक मत का प्रचार कर उसको देश देशान्तर में प्रतिष्ठित करना था। यह सुविदित है कि जब महर्षि दयानन्द जी ने आर्यसमाज की स्थापना की, उस समय देश अंग्रेजों का गुलाम था। महाभारत काल के बाद लगभग 5,000 वर्षों से लोग अज्ञान, अन्धविश्वासों सहित गुलामी का जीवन बिताने के कारण वह कुरीतियों के एक प्रकार से अभ्यस्त हो गये थे। बहुत से लोगों को महर्षि दयानन्द के सुधार व असत्य मतों के खण्डन के पीछे मनुष्य व देशहित की छिपी भावना के दर्शन नही होते थे। उस समय की अवस्था के विषय में यह कह सकते हैं कि अधिकांश देशवासियों के ज्ञान चक्षु अति मन्द दृष्टि के समान हो गये थे जिसमें उनको अपना स्पष्ट हित भी दिखाई देना बन्द हो गया था और वह एक प्रकार से विनाशकारी मार्ग, अन्धविश्वास व कुरीतियों का मार्ग, पर चल रहे थे। उनमें से अधिकांश अपनी अज्ञानता व कुछ अपने स्वार्थों को बनायें व बचायें रखने के लिए उनका विरोध करते थे। ऋषि दयानन्द के विचारों व मान्यताओं में स्वदेश भक्ति वा स्वदेश प्रेम की मात्रा भी विशेष उन्नत व प्रखर थी। इस कारण अंग्रेज भी आन्तरिक व गुप्त रूप से उनके विरोधी व शत्रु थे। ऐसी परिस्थितियों में ऋषि दयानन्द ने व्यक्ति, समाज व देश के सुधार के लिए आर्यसमाज की स्थापना की। इस स्थापना के समय ही महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज से जुड़़ने वाले लोगों को एक चेतावनी भी दी थी जिसे हम आज पाठकों को ज्ञानार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

महर्षि दयानन्द द्वारा इस अवसर पर कहे गये शब्द लिखित रूप में उपलब्ध हैं। वह स्थापना के समय उपस्थित सभी लोगों का आह्वान करते हुए कहते हैं कि आप यदि समाज (बनाकर इस) से (मिलकर सामूहिक) पुरुषार्थ कर परोपकार कर सकते हों, (तो) समाज कर लो (बना लो), इस में मेरी कोई मनाई नहीं। परन्तु इसमें यथोचित व्यवस्था रखोगे तो आगे गड़बड़ाध्याय (अव्यवस्था) हो जाएगा। मैं तो मात्र जैसा अन्य को उपदेश करता हूं वैसा ही आपको भी करूंगा और इतना लक्ष में रखना कि कोई स्वतन्त्र मेरा मत नहीं है। और मैं सर्वज्ञ भी नहीं हूं। इस से यदि कोई मेरी गलती आगे पाइ जाए, युक्तिपूर्वक परीक्षा करके इस को भी सुधार लेना। यदि ऐसा करोगे तो आगे यह भी एक मत हो जायेगा, और इसी प्रकार से बाबा वाक्यं प्रमाणं करके इस भारत में नाना प्रकार के मतमतान्तर प्रचलित होके, भीतर भीतर दुराग्रह रखके धर्मान्ध होके (आपस में) लड़के नाना प्रकार की सद्विद्या का नाश करके यह भारतवर्ष दुर्दशा को प्राप्त हुआ है इसमें, यह (आर्यसमाज) भी एक मत बढ़ेगा। मेरा अभिप्राय तो है कि इस भारतवर्ष में नाना प्रकार के मतमतान्तर प्रचलित है वो भी () वे सब वेदों को मानते हैं, इस से वेदशास्त्ररूपी समुद्र में यह सब नदी नाव पुनः मिला देने से धर्म ऐक्यता होगी और धर्म ऐक्यता से सांसारिक और व्यवहारिक सुधारणा होगी और इससे कला कौशल्यादि सब अभीष्ट सुधार होके मनुष्यमात्र का जीवन सफल होके अन्त में अपने धर्म (के) बल से अर्थ काम और मोक्ष मिल सकता है।

 

महर्षि धर्म संशोधक ऋषि व समाज सुधारक महामानव थे। उनसे पूर्व उत्पन्न किसी धर्म प्रवर्तक वा समाज संशोधक ने अपने विषय में ऐसे उत्तम विचार व्यक्त नहीं किये। यदि किये भी होंगे तो उनके शिष्यों द्वारा उनका रक्षण नहीं किया गया। इन विचारों को व्यक्त करने से ऋषि दयानन्द एक अपूर्व निःस्वार्थ व निष्पक्ष महात्मा तथा आदर्श धर्म संशोधक समाज सुधारक ऋषि सिद्ध होते हैं। ऋषि दयानन्द ने जो आशंका व्यक्त की थी उसका प्रभाव हम आर्यसमाज के संगठन में देख सकते हैं। आर्यसमाज का संगठन गुटबाजी व अयोग्य लोगों के पदों पर प्रतिष्ठित होने से त्रस्त है। सभाओं में भी झगड़े देखने को मिलते हैं। इन्हें समाप्त करने के झुट पुट प्रयत्न भी हाते हैं परन्तु सफलता नहीं मिलती। इसका मूल कारण अविद्या है जिसे दूर नही किया जा सक रहा है। यही कारण है कि आर्यसमाज के सामने मनुष्य के जीवन व चरित्र के सुधार सहित जीवन निर्माण का जो महान लक्ष्य था, वह पूरा न हो सका। हम आर्यसमाज के सभी अधिकारियों व सदस्यों को ऋषि दयानन्द के उपर्युक्त विचारों पर ध्यान देने व विचार करने का अनुरोध करते हैं। यदि हमने ऋषि के सन्देश को समझ कर, अपनी अविद्या को हटाकर, उसको आचरण में ले लिया तो पूर्व की भांति आर्यसमाज सहित देश का कल्याण हो सकता है। इसी के साथ इन पंक्तियों को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

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‘मैं इष्ट वरदान देने वाली वेदमाता की स्तुति करता हूं’

ओ३म्

मैं इष्ट वरदान देने वाली वेदमाता की स्तुति करता हूं

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

अथर्ववेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। सृष्टि के आरम्भ में अंगिरा ऋषि को ईश्वर ने अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। 20 काण्डो वाले अथर्ववेद में कुल 731 सूक्त और 5977 मन्त्र हैं। उन्नीसवीं शताब्दी व उसके बाद अथर्ववेद के हिन्दी भाष्यकारों में पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी, पण्डित विश्वनाथ विद्यालंकार, पं. जयदेव शर्मा विद्यालंकार, पद्मविभूषण डा. दामोदर सातवलेकर  आदि भाष्यकार प्रमुख हैं। स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती और स्वामी ब्रह्ममुनि जी ने भी अर्थववेद का आंशिक भाष्य किया है। अथर्ववेद का अंग्रेजी में अनुवाद डा. सत्यप्रकाश सरस्वती और पंडित उदयवीर विराज ने संयुक्त रूप से किया है। अथर्ववेद के पाश्चात्य अंग्रेजी अनुवादकों में व्हिटनी, ब्लूमफील्ड और ग्रिफीथ महानुभाव सम्मिलित हैं। आज हम इस लेख में अथर्ववेद के उन्नीसवें काण्ड के इकहत्तरवें सूक्त का प्रथम वा एकमात्र मन्त्र प्रस्तुत कर उसका हिन्दी मे पदार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं। वेदों के अनेक शब्द हिन्दी में ज्यों के त्यों व कुछ पाठ व प्रकार भेद से प्रचलित हैं जो अत्यन्त सरल एवं सुबोध हैं। यदि संस्कृत का व्याकरण जान लिया जाये तो वेद के मन्त्रों का अर्थ जानना व समझना सरल हो जाता है। हिन्दी भाष्यों के माध्यम से भी प्रत्येक हिन्दी पठित व्यक्ति वेदों का अध्ययन कर सकता है। अथर्ववेद का 19/71/1 मन्त्र निम्न हैः

 

ओ३म् स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्।

आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्।

मह्यं दत्तवा व्रजत ब्रह्मलोकम्।।

 

इस मन्त्र के प्रत्येक पद वा शब्द का पं. विश्वनाथ विद्यालंकार कृत अर्थ हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। (मया) मैंने (वरदा) इष्टफल देनेवाली (वेदमाता) वेदरूपी माता का (स्तुता) स्तवन अर्थात् अध्ययन कर लिया है। (प्र चोदयन्ताम्) हे गुरुजनो ! इस का मुझे और प्रवचन कीजिये। (द्विजानाम् पावमनी) द्विजन्मों वा द्विजों को यह वेदमाता पवित्र करती है। (आयुः) स्वस्थ और दीर्घ आयु, (प्राणम्) प्राणविद्या, (प्रजाम्) उत्तम सन्तानों, (पशुम्) पशुपालन, (कीर्तिम्) पुण्य और यश, (द्रविणम्) धनोपार्जनविद्या, (ब्रह्मवर्चसम्) ब्रह्म के तेजस्वरूप का परिज्ञान इनका सदुपदेश (मह्यं दत्तवा) मुझे देकर, हे गुरुजनों ! (ब्रह्मलोकम्) आलोकमय ब्रह्म तक (व्रजत=वाज्रयत) मुझे पहुंचाइये।

 

पण्डित विश्वनाथ जी ने मन्त्रस्थ वेदमाता पद पर विचार करते हुए लिखा है कि ‘‘वेदमाता शब्द द्वारा वेदरूपी माता अर्थात् ‘‘वेदवाणी ही अभिप्रत है। वेदवाणी मातृसदृश उपकारिणी है। इस वेदमाता का ही स्तवन अर्थात् अध्ययन अथर्ववेद के 1 से 19 काण्डों तक अभिप्रत प्रतीत होता है जिसकी ओर कि निर्देश ‘‘स्तुता मया वरदा वेदमाता द्वारा किया गया है। उनके अनुसार मन्त्रस्थ शब्द ब्रह्मलोकम् का अर्थ ब्रह्म का दर्शन है। दर्शन शब्द का अर्थ साक्षात् ज्ञान लेना समीचीन है। आंखों से निराकार वस्तुओं को नहीं देखा जा सकता। इसी प्रकार सूर्यसम व उससे अधिक प्रकाशवान् पदार्थों को भी आंखों से समुचित रूप से नहीं देखा जा सकता व देखें तो आंखों को हानि की सम्भावना होती है। अतः ब्रह्म का साक्षात् ज्ञान ही ब्रह्मलोकम् शब्द से अभिप्रेत प्रतीत होता है। पं. विश्वनाथ जी ने यह भी लिखा है कि अभी तक मन्त्र के स्तोता वा उपासक ने आयुः, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, द्रविणं का प्रवचन गुरुमुख से सुना है। बह्मदर्शन (=ब्रह्मलोक) का वह मुख्यरूप से प्रवचन अभी तक नहीं सुन पाया, जिसका कि वर्णन अथर्ववेद के बीसवें काण्ड में है।

 

मन्त्र को साधारण व्यक्ति की भाषा मे इस प्रकार भी कह सकते कि मैंने वरदान देने वाली वेदमाता की स्तुति अर्थात् उसका यथोचित गुण कीर्तन व अध्ययन किया है। यह वेदवाणी अध्ययन करने वालों को प्रेरणा देने वाली है और उन अध्ययनकर्ता द्विजों को पवित्र करती है। इस वेदमाता वेदवाणी के अध्ययन से अध्येता को लम्बी आयु, स्वस्थ प्राण वा जीवन, प्रकृष्ट योग्य सन्तानें, दुग्ध देने वाली गाय, भेड़, बकरी व अश्व आदि पशु, यश व कीर्ति, भौतिक व आध्यात्मिक साधना रूपी धन सहित ब्रह्मवर्चस प्राप्त होता है। ब्रह्मवर्चस् हमें सब प्रकार के ज्ञान जिसमें आध्यात्मिक ज्ञान प्रमुख है, प्रतीत होता है जो कि वेदमाता के अध्ययनकर्ता को ही प्राप्त होता है। अन्त में वेदमाता के स्तोता की मृत्यु के समय वेदमाता अर्थात् परमात्मा अपने उस प्रिय अध्ययनकर्ता पुत्र को अपने पास ब्रह्लोक वा मोक्ष में ले जाती है। हमने यह अर्थ साधारण लोगों के लिए किया है। इतने अधिक लाभ वेदों को पढ़ने, अध्ययन, स्वाध्याय व स्तुति आदि प्रशंसा करने से मनुष्यों को प्राप्त होते हैं। अतः संसार के प्रत्येक मनुष्य को वेदमाता का स्वाध्याय नित्य प्रति अधिक से अधिक समय करना चाहिये जिससे उसे मन्त्रस्थ सभी प्रकार के लाभों व धनों की प्राप्ति हो।

 

इन पंक्तियों को लिखने का हमारा प्रयोजन वेदमाता विषयक वेदमन्त्र के अर्थ को पाठकों को परिचित कराना है जिससे पाठक वेदमन्त्र निहित विचारों से लाभान्वित हो सकें। अपनी जन्मदात्री माता से भी इसी प्रकार के अनेकानेक लाभ सन्तान को प्राप्त होते हैं। अतः हमें अपनी माता की भी सेवा व प्रशंसा तथा उसको अपना सर्वस्व अर्पण कर उसकी स्तुति करनी चाहिये। आशा है कि पाठक इससे लाभान्वित होंगे।

मनमोहन कुमार आर्य

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सृष्टि का आरम्भ और कृषि विज्ञान

ओ३म्

सृष्टि का आरम्भ और कृषि विज्ञान

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

ज्ञान और विज्ञान परस्पर पूरक शब्द हैं। वस्तुओं का साधारण ज्ञान सामान्य ज्ञान के अन्तर्गत आता है और उनका विशेष ज्ञान विज्ञान कहलता है। कृषि का तात्पर्य मनुष्यों के आहार के पदार्थो यथा फल, वनस्पतियां व अन्न आदि का अच्छा व गुणवत्तायुक्त प्रचुर मात्रा में उत्पादन करने को कह सकते हैं। सृष्टि के आरम्भ मे जब प्रथम मनुष्यों अर्थात् स्त्री व पुरुषों का जन्म हुआ होगा तो उन्हें श्वांस के लिए वायु, पिपासा की शान्ति के लिए शुद्ध जल व क्षुधा निवृत्ति के लिए भोजन की आवश्यकता पड़ी होगी। हम वेदादि ग्रन्थों के अध्ययन से यह समझ पायें हैं कि सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य युवावस्था में उत्पन्न हुए थे। इसका कारण यह है कि यदि वह बच्चे होते तो उनका पालन-पोषण करने के लिए माता-पिता की आवश्यकता होती जो कि आरम्भ में नहीं थी और यदि वह वृद्ध उत्पन्न होते तो उनसे सन्तानों आदि के न होने से सृष्टि का क्रम आगे नहीं चल सकता था। अतः यह मानना होगा और यही सत्य है कि सृष्टि क आरम्भ में मनुष्य युवावस्था में पृथिवी माता के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। दूसरा प्रश्न यह है कि पृथिवी की आरम्भ अवस्था कैसी थी और सृष्टि कहां उत्पन्न हुई थी। इसका उत्तर यह मिलता है कि मानवोत्पत्ति के समय पृथिवी पूर्णतयः निर्मित होकर सामान्य स्थिति में आ चुकी थी। इस पर वायु सर्वत्र बह रही थी, शुद्ध जल भी यत्र-तत्र वा स्थान-स्थान पर नदियों, नहरो व जल स्रोतों में उपलब्ध था। मनुष्यों के निकट ही फलों के वृक्ष थे जिनमें नाना प्रकार के फल लगे हुए थे। आस पास गौवें भी थी जो दुग्ध देने वाली थी। मनुष्यों के उत्पत्ति स्थान तिब्बत वा त्रिविष्टिप के पास की समतल भूमि पर खाद्य अन्न व वनस्पतियां भी लहलहा रहीं थी। सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को चार वेदों का ज्ञान ईश्वर से मिला। इस वेद ज्ञान को ईश्वर ने चार ऋषियों के अन्तःकरणों में स्थापित किया। वेदों की भाषा व वेदों के अर्थ का ज्ञान भी ऋषियों को प्राप्त हुए ज्ञान में सम्मिलित था। हम समझते हैं कि ऋषियों से इतर स्त्री व पुरुषों को भी आवश्यकतानुसार परस्पर व्यवहारार्थ भाषा ज्ञान सहित भोजन आदि करने कराने का ज्ञान भी सृष्टिकत्र्ता द्वारा अवश्य दिया गया होगा। जिस ईश्वर ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड वा सृष्टि सहित मनुष्य आदि सभी प्राणियों को बनाया वह आदिकालीन मनुष्यों को भोजन व परस्पर व्यवहार का ज्ञान उनके अन्तःकरण वा आत्मा में न दे, ऐसा मानना यथार्थ को झुठलाने के समान है। यह ज्ञान भी अवश्य ही दिया गया था। इस तथ्य को मानने पर सृष्टि के आदि काल संबंधी सारी गुत्थियां सुलझ जाती है। विधि वा कानून का सिद्धान्त है कि वह Benefit of doubt का लाभ पीडि़त व्यक्ति को देता है। सृष्टि के आरम्भ में जिन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते उसका लाभ ईश्वर विषयक सिद्धान्त को मानकर ही करना होगा। संसार के प्राचीनतम ग्रन्थ वेद और वैदिक साहित्य इस विषय में प्रमाण हैं और इसका अन्य कोई विकल्प हमारे व किसी के पास नहीं है। संशय पालने व नाना कल्पनायें करने से कोई लाभ नहीं है। इस प्रकार ईश्वर से वेदों का ज्ञान, मनुष्यों को व्यवहार व भोजन आदि का ज्ञान तथा सृष्टि में उत्पन्न व उपलब्ध भोज्य व अन्य पदार्थों का ज्ञान आरम्भ में ईश्वर वा वेदों से ही मिला था जिसमें कृषि का ज्ञान भी सम्मिलित है।

 

वेद मन्त्रों के अर्थ जानने की अपनी प्रक्रिया है। इसके लिए अध्येता को संस्कृत की आर्ष व्याकरण पद्धति से मन्त्र का पदच्छेद कर उसके सम्भावित अर्थों पर विचार करना पड़ता है। वर्तमान में निरुक्त एवं निघण्टु ग्रन्थ हैं जिससे पदों के अर्थ व उनके निर्वचन देख कर सार्थक अर्थ ग्रहण किये जाते हैं। अर्थ जानने के लिए बुद्धि की ऊहा शक्ति से चिन्तन, मनन कर व ध्यान द्वारा अर्थ में प्रवेश करना होता है। यदि पूर्व ऋषियों व विद्वानों के लिए हुए अर्थ उपलब्ध हो तो उनका भी सहयोग लेकर यथार्थ अर्थ ग्रहण किया जाता है। ऐसा ही कुछ-कुछ वेदार्थ का प्रकार सृष्टि के आरम्भ व उसके बाद रहा है। वेद के अध्येता को यह भी निश्चय करना चाहिये कि वेद ईश्वरीय ज्ञान होने सहित सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इसमें सृष्टि क्रम वा ज्ञान-विज्ञान विरुद्ध कोई बात नहीं है। यदि कहीं भ्रम हो तो उसे अपनी ऊहा व चिन्तन-मनन आदि से दूर करना चाहिये। विचार व चिन्तन करने पर यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने कुछ सौ या कुछ हजार की संख्या में स्त्री व पुरुषों को उत्पन्न किया होगा। उस ईश्वर ने चार ऋषियों को वेद ज्ञान दिया तथा इन चार ने अन्य ऋषि ब्रह्मा को इन चारों वेदों का ज्ञान दिया। परस्पर संवाद व संगति से पांचों ऋषि वेदों के पूर्ण ज्ञानी हो गये थे, यह अनुमान होता है। इन पांच ऋषियों ने शेष मनुष्यों को एकत्र कर भाषा व वेदों का आवश्यकतानुसार ज्ञान दिया होगा। इस कार्य के अतिरिक्त इन पांच ऋषियों के पास अन्य कोई कार्य करने के लिए था ही नहीं। यह भी ज्ञात होता है कि यह पांचों ऋषि योगी थे। यह प्रातः व सायं ईश्वर का घंटों ध्यान व चिन्तन करते थे। इस अवस्था में इन्हें ईश्वर से अपने सभी प्रश्नों व शंकाओं के उत्तर मिल जाते थे। इससे कृषि कार्य सम्पादित करने में इन्हें किसी विशेष समस्या से झूझना नहीं पड़ा होगा। आज भी हम यही तो करते हैं कि हमें जिस बात का ज्ञान नहीं होता उसके लिए हम अन्य अनुभवी व वृद्धों की शरण में जाकर पूछताछ कर व निजी ध्यान-चिन्तन-मनन से समस्या का हल करते हैं। इसी प्रकार से कृषि विज्ञान विकसित हुआ और महाभारत काल तक उन्नति को प्राप्त होता गया।

 

आईये ! कुछ वेद प्रमाणों पर भी विचार करते हैं। यजुर्वेद 23/46 में कहा गया है भूमिरावपनं महत् अर्थात् (बीज) बोने काकृषि कामहान् स्थान भूमि ही है। इससे हमारे प्रथम पीढ़ी के पूवर्जों को यह ज्ञान मिल गया कि अन्न आदि खाद्य पदार्थ प्राप्त करने के लिए उन्हें पृथिवी में बीज वपन करने होंगे। यजुर्वेद के मन्त्र 4/10 में कहा गया है सुसस्याः कृषीस्कृधि अर्थात् उत्तम अन्नों की कृषि करें एवं करावें। मंत्र में सुसस्या कहकर खराब अन्न उत्पन्न करने का निषेध किया गया है। खराब अन्न की उत्पत्ति का समाज के जीवन पर प्रतिकूल ही प्रभाव पड़ता है। अन्नं वै प्राणिनां प्राणाः कहकर बताया गया है कि अन्न प्राणियों का जीवन है अर्थात् प्राण है। प्राण ही जीवन एवं जीवन ही प्राण होता है। प्राण नहीं तो जीवन नहीं और जीवन नहीं तो प्राण नहीं।अन्नं प्राणस्य षड्विंशः अन्न हमारे प्राण का छब्बीसवां भाग बनता है, अतः यदि हम खराब-दूषित या मलिन अन्न का सेवन करेंगे तो उसका प्रभाव हमारे जीवन पर अनिवार्य रूप से खराब ही पड़ेगा। जिस प्रकार विषयुक्त अन्न के सेवन से शरीर विषाक्त हो जाता है और जीवन की हानि होती है उसी प्रकार दूषित अन्न के सेवन करने से समाज के व्यक्तियों के शरीर एवं मन के संस्कार भी दूषित हो जाते हैं। बुद्धि भी दूषित हो जाती है। अतः कृषि के कार्य को उत्तम रीति से एवं सुसंस्कारपूर्वक करना चाहिए। यहां यह भी ध्यातव्य है कि वर्तमान समय में अधिकाधिक कृषि उत्पादन पर ही ध्यान दिया जाता है न कि अन्न की गुणवत्ता, पवित्रता, शुद्धता व विषमुक्तता पर जिसके बुरे परिणाम रोगों व अल्पायु के रूप में हमारे सामने हैं।

 

कृषि को अच्छी प्रकार करने के वेदों ने अनेक उपाय बतायें हैं वा मनुष्यों का मार्गदर्शन किया है। वेद के अनुसार कृषि कार्य में यज्ञ का उपयोग करना चाहिये। यजुर्वेद 18/9 में कहा है कृषिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् अर्थात् कृषि के लिए भूमि को उपयोगी बनाते समय यज्ञ का प्रयोग करो। यज्ञ से भूमि कृषि कार्य में समर्थ शक्तिशाली बनेगी। यज्ञ करने से भूमि की उत्पादन सामर्थ्य में वृद्धि होगी। कृषि कार्य में असमर्थ भूमि में यज्ञ करने से वह कृषि के लिए समर्थ होगी और कृषि भूमि में यज्ञ करने से उसकी उर्वरा शक्ति में वृद्धि होगी। यज्ञ से भूमि माता कृषि के लिए समर्थ बने, यह प्रार्थना यजुर्वेद 18/22 मन्त्र पृथिवी मे यज्ञेन कल्पन्ताम्। में की गई है। यज्ञ किए बिना पृथिवी को जीवन नहीं मिलेगा। यज्ञ करने से भूमि में विद्यमान तत्व एवं द्रव्य शक्ति सम्पन्न होते हैं। कृषि का वृष्टि वा वर्षा से गहरा सम्बन्ध है। यजुर्वेद 18/9 मन्त्र में कहा गया है वृष्टिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् कृषि के लिए वर्षा जल की आवश्यकता है वह वर्षा जल भी यज्ञ के द्वारा समर्थ होना चाहिये। कृषि के लिए जो जल वृष्टि से प्राप्त हो वह यज्ञ से सुसंस्कृत हो और उसी वृष्टि जल से पूर्ण नदी, तालाब, कूवे, बावड़ी, रूीलें भी हों जिससे वृक्ष, वनस्पतियों को सदा यज्ञ का जल प्राप्त होता रहे। प्रकृतिस्थ वृक्ष वनस्पतियों को जो वायु प्राप्त हो वह भी यज्ञ द्वारा सुसंस्कृत हो। इस विषयक यजुर्वेद मन्त्र 18/17 मरुतश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्। अर्थात् वायु भी यज्ञ के द्वारा समर्थ हो। कृषि कार्यों से संबंधित यजुर्वेद का एक मन्त्र 9/22 नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्या ….. कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा।। भी महत्वपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि हे भूमि माता ! तुझे प्रणाम हो। हे भूमि माता ! तुझे शतशः वन्दन है। तुझे कृषि के लिए हम स्वीकार करते हैं। तुझे अपनी रक्षा के लिए ग्रहण करते हैं। तुझे ऐश्वर्य के लिए हम चाहते हैं और तुझे अपने पोषण के लिए माता तुल्य वन्दनीय समझते हैं।

 

इस लेख में हमने जो विवरण प्रस्तुत किया है उसके आधार पर यह निश्चित है कि कृषि का आरम्भ सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा के मिले वेदों के ज्ञान वा उनकी शिक्षा से हुआ। वेदों के आधार पर सृष्टि के आरम्भ में हमारे पूर्वजों ने कृषि करके कृषि विषयक अपने ज्ञान व अनुभव को बढ़ाते हुए प्रगति करते रहे। महाभारतकाल के बाद आलस्य व प्रमाद के कारण वैदिक ज्ञान का सूर्य लुप्त हो गया जिससे सभी क्षेत्रों में अवनति हुई। कृषि क्षेत्र में भी ज्ञान की न्यूनता आई। आज सौभाग्य से सभी क्षेत्रों में ज्ञान की निरन्तर वृद्धि हो रही है अर्थात् विलुप्त ज्ञान का प्रकाश हो रहा है। आज भी कृषि के क्षेत्र में शुद्ध, पवित्र तथा दूषित अन्न के परस्पर भेद का हमारे कृषकों व देशवासियों को ज्ञान नहीं है। यज्ञ व कृषि का परस्पर गहरा सम्बन्ध है, इससे भी विश्व अनभिज्ञ है। यज्ञ व कृषि पर अनुसंधान कर वेद वर्णित विज्ञान को समझना आज के समय की मुख्य आवश्यकता है। यदि हमें वेदानुसार यज्ञ का अनुष्ठान करते हुए कृषि करेंगे तो हमें शुद्ध अन्न प्राप्त होगा जिससे रोग न्यूनातिन्यून होंगे। कृषि कार्यों में वेदों से मार्गदर्शन लिया जाना चाहिये। हमने इस लेख में आर्यजगत के विद्वान स्व. श्री वीरसेन वेदश्रमी जी के ग्रन्थ वैदिक सम्पदा की सामग्री का उपयोग किया है। उनका धन्यवाद कर इस लेख को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

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‘सृष्टि उत्पत्ति विषयक वैदिक सिद्धान्त और महर्षि दयानन्द’

ओ३म्

सृष्टि उत्पत्ति विषयक वैदिक सिद्धान्त और महर्षि दयानन्द

 

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में महाभारत काल के बाद उत्पन्न मत-मतान्तरों के साहित्य में अनेक प्रकार की अवैज्ञानिक व अविश्वनीय विचार पायें जाते हैं। महर्षि दयानन्द इन सबमें अपवाद हैं। उनके जीवन में शिवरात्रि को घटी चूहे की घटना बताती है कि उन्होनें किशोरावस्था में ही जीवन की सभी बातों को तर्क व युक्ति के आधार पर सिद्ध होने पर ही स्वीकार करने का मन बना लिया था। यही कारण था कि वइ ईश्वर, जीव, प्रकृति व सृष्टि विषयक सत्य ज्ञान की खोज में अनेक वर्षों तक अध्ययन व अनुसंधान आदि करते रहे। उन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति विषयक अपने विचार मुख्यतः सत्यार्थप्रकाश के आठवें समुल्लास में व्यक्त किये हैं जिनका आधार वेद, दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थ हैं। हमनें भी महर्षि दयानन्द के इस विषय के विचारों का अनेक बार पाठ व मनन किया है और हमारा विश्वास है कि आने वाले समय में विज्ञान इन विचारों को पूर्णतः स्वीकार कर लेगा जिसका कारण वेदों का ईश्वर प्रदत्त होने से निर्भ्रांत होना व वैदिक साहित्य अल्पज्ञ वैज्ञानिकों से भी कहीं अधिक उच्च ज्ञान व विज्ञान के उच्च कोटि के चिन्तक मनीषी ऋषियों की देन है।

 

सत्यार्थप्रकाश में ऋग्वेद 12/129/7 मन्त्र के आधार पर महर्षि दयानन्द कहते हैं कि यह विविध सृष्टि इस जगत के स्वामी ईश्वर से प्रकाशित हुई है। वह इस जगत् का धारण व प्रलयकर्त्ता है। इस सृष्टि को बनाने वाला ईश्वर इस जगत में व्यापक है। उसी से यह सब जगत उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय को प्राप्त होता है। मनुष्य अर्थात् आत्मा को उस परमात्मा को जानना चाहिये और उसके स्थान पर किसी अन्य को सृष्टिकर्त्ता नहीं मानना चाहिये। ऋग्वेद के मन्त्र 10/29/3 में बताया गया है कि जगत की रचना से पूर्व सब जगत् अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य, आकाशरूप तथा तुच्छ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सम्मुख एकदेशी आच्छादित था। पश्चात् परमेश्वर ने अपने सामर्थ्य से इस कारणरूप जगत् को कार्यरूप कर दिया अर्थात् बना दिया। ऋग्वेद के मन्त्र 10/129/1 में कहा गया है कि सब सूर्यादि तेजस्वी पदार्थो का आधार और जो यह जगत् हुआ है और होगा उस का एक अद्वितीय पति परमात्मा इस जगत् की उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान था और जिस ने पृथिवी से लेके सूर्यपर्यन्त जगत् को उत्पन्न किया है, हे मनुष्य ! उस परमात्म देव की प्रेम से भक्ति किया करें। यजुर्वेद के मन्त्र 31/2 में ईश्वर ने बताया है कि जो ईश्वर सब सृष्टिगत पदार्थों में पूर्ण पुरुष है, जो नाशरहित कारण जड़ प्रकृति और जीव का स्वामी है तथा जो पृथिव्यादि जड़ और जीव से अतिरिक्त है, हे मनुष्य ! वही पुरुष इस सब भूत, भविष्यत् और वर्तमानस्थ जगत् का बनाने वाला है, ऐसा सब मनुष्यों को जानना चाहिये। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहा गया है कि जिस परमात्मा द्वारा रचना करने से ये सब पृथिव्यादि भूत पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिस से जीते और जिससे जिसमें प्रलय को प्राप्त होते हैं, वह ब्रह्म है। उस को जानने की इच्छा सभी मनुष्यों को करनी चाहिये। शारीरिक सूत्रों में कहा गया है कि इस जगत् का जन्म, स्थिति और प्रलय जिस से होता है, वह ब्रह्म है और वह जानने के योग्य है।

 

प्राचीन वैदिक सिद्धान्तों के अनुसार यह समस्त जगत् इसको बनाने वाले निमित्त कारण परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है। परमेश्वर ने इस जगत् को उपादान कारण अर्थात् सत्व, रज व तम गुणों वाली सूक्ष्म व मूल प्रकृति से बनाया है। इस मूल प्रकृति को ईश्वर ने उत्पन्न नहीं किया। यह भी जानने योग्य है कि संसार में ईश्वर, जीव व प्रकृति, यह तीन पदार्थ अनादि व नित्य हैं। इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस संसार में पापपुण्यरूप फलों को अच्छे प्रकार भोक्ता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को न भोक्ता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर व बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न स्वरूप व तीनों अनादि हैं। उपनिषद् में बताया गया है कि प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों अज अर्थात् जिन का जन्म कभी नही होता और न कभी यह तीन पदार्थ जन्म लेते हैं अर्थात् ये तीन पदार्थ सब जगत् के कारण हैं। इन का कारण कोई नहीं। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ शुभ व अशुभ कर्म के बन्धनों में फंसता है और उस में परमात्मा नहीं फंसता क्योंकि वह प्रकृति व उसके पदार्थों का भोग नहीं करता।

 

प्रकृति क्या है, इसका वर्णन सांख्य दर्शन में है। इसके अनुसार प्रकृति (सत्व) शुद्ध (रजः) मध्य (तमः) जाड्य अर्थात् जडता गुणों से युक्त है। यह तीन गुण मिलकर इनका जो संघात है उस का नाम प्रकृति है अर्थात् सत्व, रज व तम गुणों का संघात प्रकृति के सूक्ष्तम कण की एक इकाई के समान है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर इस प्रकृति के सूक्ष्म सत्व, रज व तम कणों में अपनी मनस शक्ति से विकार व विक्षोभ उत्पन्न कर इनसे महत्तत्व बुद्धि, उससे अर्थात् उस महतत्व बुद्धि से अहंकार, उस से पांच तन्मात्रा सूक्ष्म भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत ये चौबीस पदार्थ बनते हैं। पच्चीसवां पुरुष अर्थात् जीव और परमेश्वर हैं। इनमें से सत्व, रज व तम गुणों वाली प्रकृति अधिकारिणी और महतत्व बुद्धि, अहंकार तथा पांच सूक्ष्म भूत प्रकृति का कार्य हैं। यही पदार्थ इंद्रियों, मन तथा स्थूल भूतों के कारण हैं। पुरुष अर्थात् जीवात्मा न किसी की प्रकृति, न किसी का उपादान कारण और न किसी का कार्य है। एक उपनिषद वचन में कहा गया है कि हे श्वेतकेतो ! यह जगत् सृष्टि के पूर्व सत्, असत्, आत्मा और ब्रह्मरूप था। वही परमात्मा अपनी इच्छा से प्रकृति जीवों के द्वारा बहुरूप वा जगतरूप हो गया।

 

जगत् की उत्पत्ति के तीन कारण क्रमशः निमित्त, उपादान तथा साधारण, यह तीन कारण होते हैं। निमित्त कारण उसको कहते हैं कि जिसके बनाने से कुछ बने, न बनाने से न बने, आप स्वयं बने नहीं और दूसरे को प्रकारान्तर बना देवे। दूसरा उपादान कारण उस को कहते हैं जिस के बिना कुछ न बने, वही अवस्थान्तर रूप होकर बने व बिगड़े भी। तीसरा साधारण कारण उस को कहते हैं कि जो बनाने में साधन और साधारण निमित्त हो। निमित्त कारण दो प्रकार के होते हैं। एक-सब को कारण से बनाने, धारण करने और प्रलय करने तथा सब की व्यवस्था रखने वाला मुख्य निमित्त कारण परमात्मा। दूसरा-परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेकविध कार्यान्तर बनाने वाला साधारण निमित्त कारण जीव। सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति को कहते हैं। प्रकृति वा परमाणुरूप प्रकृति जिस को सब संसार के बनाने की सामग्री कहते हैं। वह जड़ होने से अपने आप बन और बिगड़ सकती है किन्तु दूसरे के बनाने से बनती और बिगाड़ने से बिगड़ती है। कहींकही जड़ के निमित्त से जड़ भी बन और बिगड़ भी जाता है। जैसे परमेश्वर के रचित बीज पृथिवी से गिरने और जल पाने से वृक्षाकार हो जाते हैं और अग्नि आदि जड़ के संयोग से बिगड़ भी जाते हैं। परन्तु इनका नियमपूर्वक बनना और वा बिगड़ना परमेश्वर और जीव के आधीन है।

 

जब कोई वस्तु बनाई जाती है तब जिन-जिन साधनों का प्रयोग करते हैं वह ज्ञान, दर्शन, बल, हाथ और नाना प्रकार के साधन कहलाते हैं और दिशा, काल और आकाश साधारण कारण होते हैं। जैसे घड़े का बनाने वाला कुम्हार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण और दण्ड चक्र आदि सामान्य कारण। दिशा, काल, आकाश, प्रकाश, आंख, हाथ, ज्ञान, क्रिया आदि साधारण और निमित्त कारण भी होते हैं। इन तीन कारणों के बिना कोई भी वस्तु नहीं बन सकती और न बिगड़ सकती है।

 

इस प्रकार से यह समस्त जगत् जिसमें सूर्य, चन्द्र, तारें, पृथिवी व पृथिवी के सभी पदार्थ तथा प्राणी जगत सम्मिलित है निमित्त कारण ईश्वर द्वारा उपादान कारण परमाणु रूप प्रकृति से बनाये गये हैं। परमात्मा के सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, अनादि, नित्य आदि गुणों से युक्त होने से उसके द्वारा सृष्टि बनाने व उसे संचालित करने में असम्भव जैसा कुछ भी नहीं है। यह वर्णन पूर्णतः सत्य, वैज्ञानिक, तर्क संगत, विश्वसनीय, निभ्र्रान्त व वेदों के प्रमाणों से पुष्ट है। अतः इस सिद्धान्त को सभी आध्यात्मवादियों व भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को मानना चाहिये। इसके विपरीत वैज्ञानिकों के पास अभी तक सृष्टि उत्पत्ति का कोई सन्तोषजनक उत्तर इसलिए नहीं है कि यह सृष्टि अनादि निमित्त कारण ईश्वर द्वारा अनादि उपादान कारण प्रकृति से निर्मित की गई है जिसका उद्देश्य अनादि जीवात्माओं को उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का सुख व दुःखरूपी फल प्रदान करना है। सृष्टि रचना विषयक इस ज्ञान के विस्तार व संशयों के निवारण के लिए महर्षि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश का आठवां समुल्लास व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के सृष्टि की रचना व उत्पत्ति के प्रकरणों को देखना चाहिये। वेद, उपनिषदों व दर्शनों का अध्ययन भी इस विषय की सभी शंकाओं को दूर करता है। योग का अभ्यास, ध्यान व समाधि से भी ईश्वर द्वारा सृष्टि रचना का यह गुप्त व सूक्ष्म विषय जाना जा सकता है। हम आशा करते हैं कि पाठक इस लेख से लाभान्वित होंगे। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं।

मनमोहन कुमार आर्य

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‘महर्षि दयानन्द के योग शिष्य लक्ष्मणानन्द’

ओ३म्

विस्मृत व्यक्तित्व

महर्षि दयानन्द के योग शिष्य लक्ष्मणानन्द

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

स्वामी लक्ष्मणानन्द जी ने स्वामी दयानन्द की अमृतसर यात्रा में उनसे योग सीखा था और उसके बाद उन्होंने योगाभ्यास व इसकी शिक्षा को ही अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया प्रतीत होता है। आप आर्यजगत के विख्यात विद्वान पं. भगवद्दत्त रिसर्चस्कालर के भी गुरू रहे। ध्यान योग प्रकाश आपकी योग पर महत्वपूर्ण कृति है जिसके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। अन्तिम संस्करण रामलाल कपूर टस्ट्र, रेवली-सोनीपत-हरयाणा से कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ है जो वहां बिक्री के लिए उपलब्ध है। सम्प्रति हमारे पास भी इस ग्रन्थ के दो-तीन संस्करण विद्यमान हैं। अध्यात्म व योग का गहरा सम्बन्ध है। हमारा मानना है कि स्वामी दयानन्द ने समाज सुधार सहित समग्र सामाजिक क्रान्ति का जो महान कार्य किया उसके मूल में भी उनकी योग एवं वेद विद्या ही कारण है। अतः स्वामी लक्ष्मणानन्द जी पर उपलब्ध जानकारी से पाठकों को अवगत कराने का विचार हुआ, जिसका परिणाम यह पंक्तियां हैं।

 

स्वामी लक्ष्मणानन्द जी का जन्म अमृतसर के एक खत्री परिवार में विक्रमी संवत् 1887 (सन् 1831) में हुआ था। दो वर्ष की आयु होने पर ही लक्ष्मणानन्द जी के पिता का देहान्त हो गया। अनुमान कर सकते हैं कि माता ने कितनी कठिनाईयों से अपने पुत्र लक्ष्मणानन्द का पालन किया होगा। वह समय ऐसा था जब लोगों में धर्म-कर्म की बातों को आज की तुलना में कहीं अधिक महत्व दिया जाता था। सम्भवतः इसी कारण आपकी साधु-संन्यासियों की संगति में विशेष रूचि हो गई थी और धर्म-कर्म विषयक अनेक उचित अनुचित बातों का आपकों ज्ञान हो गया था। आपकी माता को आपकी यह रूचि पसन्द नहीं थी। कुछ बड़े होकर आपने धनोपार्जन करना आरम्भ किया और आपको अच्छी सफलता मिली जिससे आपकी माता की अप्रसन्नता दूर हो गई। आप विवाह के प्रति उदासीन रहे। कालान्तर में जब स्वामी दयानन्द जी अमृतसर में आये तो आपने न केवल वहां उनके प्रवचन ही सुने अपितु उनके पास जाकर योगाभ्यास सीखने की भी इच्छा की जिसका परिणाम यह हुआ कि स्वामी दयानन्द जी ने आपको योगाभ्यास की समस्त आवश्यक क्रियाओं का क्रियात्मक अभ्यास कराया। इस प्रकार स्वामी दयानन्द ही आपके योगगुरु हुए। आपने ब्रह्मचर्य से सीधे ही संन्यास की दीक्षा ली। डा. भवानीलाल भारतीय जी ने आपके संन्यास के विषय में लिखा है कि आपने सम्वत् 1943 अर्थात् सन् 1887 में संस्कार विधि की पद्धति से ही संन्यास की दीक्षा ली। आपके संन्यास गुरु कौन रहे होंगे, इसका उल्लेख हमें नहीं मिल सका। मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, एकादशी व्रत आदि पौराणिक कर्मकाण्डों के प्रति आपमें आरम्भ से ही अरूचि थी। ऐसा भी उल्लेख है कि स्वामी दयानन्द से योग की दीक्षा लेने से पूर्व आपने पहले दो योगियों से योग का कुछ प्रशिक्षण प्राप्त किया था तथा स्वामी दयानन्द जी ने आपको अष्टांग योग की पूर्ण विधि सिखाई थी।

 

आर्य सिद्धान्तों का स्वामी लक्ष्मणानन्द जी पूरी तरह से पालन करते थे। उन दिनों आर्य पद्धति से परिवार के किसी सदस्य की अन्त्येष्टि करने पर जातिबन्धु विरोध करते थे और जाति बाह्य भी कर देते थे। हम देखते हैं कि जब पण्डित गुरुदत्त विद्यार्थी जी के पिता का देहान्त हुआ तो आर्य पद्धति से उनकी अन्त्येष्टि का उनके प्रायः सभी जाति बन्धुओं ने विरोध किया था। पं. गुरुदत्त जी की आर्य सिद्धान्तों व पद्धति में गहरी निष्ठा होने के कारण उन्होंने उसकी कोई परवाह नहीं की थी, अतः वह संस्कार वैदिक पद्धति से ही सम्पन्न हुआ था। कालान्तर में जब स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की माता की मृत्यु हुई तो आपने संस्कारविधि वर्णित आर्य पद्धति से ही अपनी माता की अंत्येष्टि कर वैदिक सिद्धान्तों में अपनी गहरी निष्ठा व विश्वास का परिचय दिया।

 

स्वामी लक्ष्मणानन्द जी ने योग पर ध्यान योग प्रकाश नाम से अपने अनुभवों पर आधारित पुस्तक लिखी है जिसका पहला संस्करण सन् 1902 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद सन् 1914, 1938, 1964 तथा 1976 में इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हुए। इसका नया संस्करण रामलाल कपूर ट्रस्ट से कुछ वर्ष पूर्व ही प्रकाशित हुआ है और अब यही संस्करण पाठकों को बिक्री हेतु सुलभ है। हमारी दृष्टि में आपकी यह पुस्तक ही आपका स्मारक है। जो भी व्यक्ति इसे पढ़ेगा वह अवश्य इससे लाभान्वित होगा।

 

स्वामी लक्ष्मणानन्द जी का महर्षि दयानन्द का शिष्य होने व उनसे परिपूर्ण योग विद्या सीखने के कारण अपना ऐतिहासिक महत्व है। इसके साथ हमें इस बात ने भी प्रभावित किया है कि स्वामी लक्ष्मणानन्द जी आर्यजगत के प्रख्यात विद्वान पं. भगवद्दत्त जी के गुरु रहे हैं और इनकी शिक्षाओं का आपके जीवन पर गहरा प्रभाव हुआ। स्वामी लक्ष्मणानन्द जी के जीवन पर इससे अधिक जानकारी हमें प्राप्त न हो सकी। जितनी प्राप्त हुई, उसी से सन्तोष कर वह सामग्री हम पाठकों को इस भावना से भेंट कर रहे हैं कि स्यात् यह किसी को पसन्द आये।

मनमोहन कुमार आर्य

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